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               <title>First Verdict Media - kaun banega vidhayak</title>
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               <lastBuildDate><![CDATA[Fri, 01 May 2026 08:51:39 +0530]]></lastBuildDate>
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            	<title>First Verdict Media - kaun banega vidhayak</title>
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            <description>First Verdict Media provides the latest information from and in-depth coverage of India and the world. Find breaking news, India news, Himachal news, top stories, elections, politics, business, cricket, movies, lifestyle, health, videos, photos and more.</description>
            
           <item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/balbir-again-in-chintpurni-or-bablu-this-time]]></guid>
                       <title><![CDATA[चिंतपूर्णी में फिर बलबीर या इस बार बबलू ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/balbir-again-in-chintpurni-or-bablu-this-time]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 04 Nov 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद 18 अक्टूबर को कांग्रेस ने 46 प्रत्याशियों की अपनी पहली लिस्ट जारी कर दी थी। पर इस सूची में चिंतपूर्णी सीट शामिल नहीं थी। बावजूद इसके अगले दिन शाम को चिंतपूर्णी से टिकट के दावेदार सुदर्शन सिंह बबलू ने समर्थकों सहित पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया। पत्रकार वार्ता में बबलू ने आंसू भी बहाएं और कांग्रेस पर आरोप भी लगाएं। पर इसके बाद जब पार्टी प्रत्याशियों की लिस्ट आई तो चिंतपूर्णी से टिकट वरिष्ठ नेता कुलदीप कुमार को नहीं बल्कि उन्हीं बबलू को मिला जो पार्टी छोड़कर जा रहे थे। फिर जैसा अपेक्षित था, टिकट न मिलने से कुलदीप कुमार खफा हुए और शुरुआत में बगावती तेवर भी दिखाएँ, लेकिन बाद में कांग्रेस यहाँ बगावत साधने में कामयाब रही। बहरहाल टिकट वितरण तक दिखी सियासी उठापठक के बाद चिंतपूर्णी में कांग्रेस के सुदर्शन बबलू ने&nbsp; दमदार तरीके से चुनाव लड़ा है और पार्टी यहाँ जीत का दावा भी कर रही है। उधर भाजपा ने एक बार फिर सीटिंग विधायक बलबीर सिंह को यहाँ मैदान में उतारा है। चिंतपूर्णी में सिटींग विधायक को लेकर थोड़ी नाराजगी भी दिखती रही है। ऐसे में जाहिर है यहाँ एंटी इंकम्बैंसी का खामियाज़ा भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। इसके अलावा ओपीएस और महंगाई जैसे चुनावी मुद्दे भी भाजपा को भारी पड़ सकते है। बावजूद इसके बलबीर सिंह का दावा यहाँ कमतर नहीं माना जा सकता।

इतिहास पर निगाह डाले तो चिंतपूर्णी विधानसभा सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। यहाँ भाजपा को केवल 3 दफा ही जीत हासिल हुई है। 1967 में यहां से कांग्रेस के चौधरी हरिराम ने जीत दर्ज की थी, जबकि 1972 में कांग्रेस के ओंकार चंद यहां से विजयी रहे थे। फिर 1977 में जनता पार्टी की लहर में हंसराज अकरोट यहाँ से जीते। 1980 में हंसराज अकरोट ने कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़कर यहाँ दूसरी बार जीत दर्ज की। 1985 में कांग्रेस लहर में गणेश दत्त भरवाल ने यहां जीत का परचम लहराया था। 1990 में यहाँ भाजपा यहाँ पहली बार जीती और सुषमा शर्मा विधानसभा पहुंची। 1993 में आजाद प्रत्याशी हरिदत्त यहा विजयी रहे, 1998 में भाजपा के प्रवीण शर्मा ने जीत दर्ज की थी। 2003 में राकेश कालिया ने भाजपा के प्रवीण शर्मा को 11 हजार से अधिक मतों से हरा कर ये सीट फिर कांग्रेस के नाम की। 2007 में कालिया ने लगातार दूसरी बार यहां जीत दर्ज की। फिर 2008 के परिसीमन के बाद&nbsp; यह क्षेत्र अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हो गया, जिसके बाद गगरेट से चुनाव लड़ते आ रहे कुलदीप कुमार ने इस क्षेत्र से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ा। तब नजदीकी मुकाबले में उन्होंने भाजपा के बलबीर चौधरी को 438 मतों से हराया। जबकि 2017 में भाजपा के बलबीर चौधरी ने कांग्रेस के कुलदीप कुमार को 8579 मतों से पराजित किया और करीब दो दशक बाद ये सीट भाजपा की झोली में डाली। अब फिर भाजपा से बलबीर चौधरी मैदान में है, तो कांग्रेस ने यहाँ से सुदर्शन बबलू को मैदान में उतारा है। मौजूदा चुनाव में चिंतपूर्णी की गिनती प्रदेश की उन सीटों में है जहाँ बेहद काम अंतर से जीत-हार का फैसला हो सकता है। पर यदि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के लिए वोट डला है, तो जाहिर है यहाँ भी कांग्रेस का पलड़ा कुछ भारी हो सकता है।&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद 18 अक्टूबर को कांग्रेस ने 46 प्रत्याशियों की अपनी पहली लिस्ट जारी कर दी थी। पर इस सूची में चिंतपूर्णी सीट शामिल नहीं थी। बावजूद इसके अगले दिन शाम को चिंतपूर्णी से टिकट के दावेदार सुदर्शन सिंह बबलू ने समर्थकों सहित पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया। पत्रकार वार्ता में बबलू ने आंसू भी बहाएं और कांग्रेस पर आरोप भी लगाएं। पर इसके बाद जब पार्टी प्रत्याशियों की लिस्ट आई तो चिंतपूर्णी से टिकट वरिष्ठ नेता कुलदीप कुमार को नहीं बल्कि उन्हीं बबलू को मिला जो पार्टी छोड़कर जा रहे थे। फिर जैसा अपेक्षित था, टिकट न मिलने से कुलदीप कुमार खफा हुए और शुरुआत में बगावती तेवर भी दिखाएँ, लेकिन बाद में कांग्रेस यहाँ बगावत साधने में कामयाब रही। बहरहाल टिकट वितरण तक दिखी सियासी उठापठक के बाद चिंतपूर्णी में कांग्रेस के सुदर्शन बबलू ने&nbsp; दमदार तरीके से चुनाव लड़ा है और पार्टी यहाँ जीत का दावा भी कर रही है। उधर भाजपा ने एक बार फिर सीटिंग विधायक बलबीर सिंह को यहाँ मैदान में उतारा है। चिंतपूर्णी में सिटींग विधायक को लेकर थोड़ी नाराजगी भी दिखती रही है। ऐसे में जाहिर है यहाँ एंटी इंकम्बैंसी का खामियाज़ा भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। इसके अलावा ओपीएस और महंगाई जैसे चुनावी मुद्दे भी भाजपा को भारी पड़ सकते है। बावजूद इसके बलबीर सिंह का दावा यहाँ कमतर नहीं माना जा सकता।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इतिहास पर निगाह डाले तो चिंतपूर्णी विधानसभा सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। यहाँ भाजपा को केवल 3 दफा ही जीत हासिल हुई है। 1967 में यहां से कांग्रेस के चौधरी हरिराम ने जीत दर्ज की थी, जबकि 1972 में कांग्रेस के ओंकार चंद यहां से विजयी रहे थे। फिर 1977 में जनता पार्टी की लहर में हंसराज अकरोट यहाँ से जीते। 1980 में हंसराज अकरोट ने कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़कर यहाँ दूसरी बार जीत दर्ज की। 1985 में कांग्रेस लहर में गणेश दत्त भरवाल ने यहां जीत का परचम लहराया था। 1990 में यहाँ भाजपा यहाँ पहली बार जीती और सुषमा शर्मा विधानसभा पहुंची। 1993 में आजाद प्रत्याशी हरिदत्त यहा विजयी रहे, 1998 में भाजपा के प्रवीण शर्मा ने जीत दर्ज की थी। 2003 में राकेश कालिया ने भाजपा के प्रवीण शर्मा को 11 हजार से अधिक मतों से हरा कर ये सीट फिर कांग्रेस के नाम की। 2007 में कालिया ने लगातार दूसरी बार यहां जीत दर्ज की। फिर 2008 के परिसीमन के बाद&nbsp; यह क्षेत्र अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हो गया, जिसके बाद गगरेट से चुनाव लड़ते आ रहे कुलदीप कुमार ने इस क्षेत्र से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ा। तब नजदीकी मुकाबले में उन्होंने भाजपा के बलबीर चौधरी को 438 मतों से हराया। जबकि 2017 में भाजपा के बलबीर चौधरी ने कांग्रेस के कुलदीप कुमार को 8579 मतों से पराजित किया और करीब दो दशक बाद ये सीट भाजपा की झोली में डाली। अब फिर भाजपा से बलबीर चौधरी मैदान में है, तो कांग्रेस ने यहाँ से सुदर्शन बबलू को मैदान में उतारा है। मौजूदा चुनाव में चिंतपूर्णी की गिनती प्रदेश की उन सीटों में है जहाँ बेहद काम अंतर से जीत-हार का फैसला हो सकता है। पर यदि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के लिए वोट डला है, तो जाहिर है यहाँ भी कांग्रेस का पलड़ा कुछ भारी हो सकता है।&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[Balbir again in Chintpurni or Bablu this time?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/mandi-kangra-una-hamirpur-sirmaur-kaun-banega-vidhayak-chunav-202]]></guid>
                       <title><![CDATA[भाजपा की बगावत के बीच महेश राज आशावान]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/mandi-kangra-una-hamirpur-sirmaur-kaun-banega-vidhayak-chunav-202]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sun, 04 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[करसोग विधानसभा सीट वो सीट है जहाँ जनता के लिए पार्टी का चिन्ह बाद में, अपनी पसंद पहले आती है। करसोग के चुनावी नतीजे तो यही कहते है। यहाँ की सियासत में मनसा राम का दबदबा रहा है। जनता ने पार्टी चिन्ह के बिना भी मनसा राम पर अपना प्यार बरसाया है। मनसा राम कुल 9 बार चुनावी संग्राम में उतरे और पांच बार करसोग से विधायक बने जिसमें 4 बार कैबिनेट मंत्री तथा एक बार सीपीएस रहे। 1967 में मनसा राम ने बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीता भी। दूसरी बार 1972 में कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़े और जीते लेकिन 1977 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। मनसा राम ने 1982 में फिर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीते। इसके बाद 1998 में हिमाचल विकास कांग्रेस और 2012 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर मनसा राम इस क्षेत्र से विधायक बने। दिलचस्प बात ये है कि मनसा राम प्रदेश के एक मात्र ऐसे नेता हैं, जो यशवंत सिंह परमार सहित चार मुख्यमंत्रियों की कैबिनेट में काम कर चुके हैं। अब अपनी राजनीतिक विरासत मनसा राम ने अपने बेटे महेश राज को सौंप दी है, जो इस बार कांग्रेस से मैदान में है। यहाँ भाजपा ने अपने सिटींग विधायक का टिकट काट कर दीपराज कपूर को मैदान में उतारा है। यहाँ दोनों ही प्रत्याशी पहली बार चुनावी रण में है ऐसे में मुकाबला कांटे का दिख रहा है।&nbsp;&nbsp;

करसोग में भाजपा केवल तीन दफा ही जीत दर्ज कर पाई है। 1985 और 1990 में भाजपा के जोगिन्दर पाल ने ये सीट भाजपा की झोली में डाली थी। 2017 में इस सीट पर हीरा&nbsp; लाल ने भाजपा का परचम लहराया। माना जाता है कि तब बगावत कांग्रेस की हार का कारण बनी थी जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिला। पर दशकों बाद करसोग में कमल खिलाने वाले हीरालाल का टिकट काट कर भाजपा ने एक नए चेहरे को मैदान में उतारा है। क्षेत्र में हीरालाल को लेकर नाराज़गी भी दिखती रही है जाहिर है ऐसे में एंटी इंकम्बैंसी को खत्म करने के लिए भाजपा ने यहाँ टिकट बदला है, लेकिन यहाँ भीतरघात की संभावना से भी इंकार नहीं किया सकता है। बहरहाल,करसोग में मुकाबला कांटे का दिख रहा है और इस बार जीत का परचम कौन लहराता है ये तो नतीजे आने के बाद ही पता लगेगा।&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">करसोग विधानसभा सीट वो सीट है जहाँ जनता के लिए पार्टी का चिन्ह बाद में, अपनी पसंद पहले आती है। करसोग के चुनावी नतीजे तो यही कहते है। यहाँ की सियासत में मनसा राम का दबदबा रहा है। जनता ने पार्टी चिन्ह के बिना भी मनसा राम पर अपना प्यार बरसाया है। मनसा राम कुल 9 बार चुनावी संग्राम में उतरे और पांच बार करसोग से विधायक बने जिसमें 4 बार कैबिनेट मंत्री तथा एक बार सीपीएस रहे। 1967 में मनसा राम ने बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीता भी। दूसरी बार 1972 में कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़े और जीते लेकिन 1977 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। मनसा राम ने 1982 में फिर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीते। इसके बाद 1998 में हिमाचल विकास कांग्रेस और 2012 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर मनसा राम इस क्षेत्र से विधायक बने। दिलचस्प बात ये है कि मनसा राम प्रदेश के एक मात्र ऐसे नेता हैं, जो यशवंत सिंह परमार सहित चार मुख्यमंत्रियों की कैबिनेट में काम कर चुके हैं। अब अपनी राजनीतिक विरासत मनसा राम ने अपने बेटे महेश राज को सौंप दी है, जो इस बार कांग्रेस से मैदान में है। यहाँ भाजपा ने अपने सिटींग विधायक का टिकट काट कर दीपराज कपूर को मैदान में उतारा है। यहाँ दोनों ही प्रत्याशी पहली बार चुनावी रण में है ऐसे में मुकाबला कांटे का दिख रहा है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">करसोग में भाजपा केवल तीन दफा ही जीत दर्ज कर पाई है। 1985 और 1990 में भाजपा के जोगिन्दर पाल ने ये सीट भाजपा की झोली में डाली थी। 2017 में इस सीट पर हीरा&nbsp; लाल ने भाजपा का परचम लहराया। माना जाता है कि तब बगावत कांग्रेस की हार का कारण बनी थी जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिला। पर दशकों बाद करसोग में कमल खिलाने वाले हीरालाल का टिकट काट कर भाजपा ने एक नए चेहरे को मैदान में उतारा है। क्षेत्र में हीरालाल को लेकर नाराज़गी भी दिखती रही है जाहिर है ऐसे में एंटी इंकम्बैंसी को खत्म करने के लिए भाजपा ने यहाँ टिकट बदला है, लेकिन यहाँ भीतरघात की संभावना से भी इंकार नहीं किया सकता है। बहरहाल,करसोग में मुकाबला कांटे का दिख रहा है और इस बार जीत का परचम कौन लहराता है ये तो नतीजे आने के बाद ही पता लगेगा।&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[]]></media:description>
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                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/kullu-bilaspur-kinnaur-chamba-lahaul-and-spiti-kaun-banega-vidhayak-chunav-2022-politics]]></guid>
                       <title><![CDATA[आनी में इधर भी बागी और उधर भी बागी]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/kullu-bilaspur-kinnaur-chamba-lahaul-and-spiti-kaun-banega-vidhayak-chunav-2022-politics]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sun, 04 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[2017 में आनी निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के किशोरी लाल ने कांग्रेस के परसराम को हराकर ये सीट भाजपा की झोली में डाली थी। पर इस बार भाजपा ने यहां से अपने सीटिंग विधायक का टिकट काटकर लोकेन्द्र कुमार पर दांव खेला है। इसके बाद किशोरी लाल ने बगावत कर दी और निर्दलीय चुनाव लड़ा है। उधर कांग्रेस में भी कहानी कुछ ऐसी ही है। पार्टी ने पिछली बार प्रत्याशी रहे परसराम की जगह बंसीलाल को मैदान में उतारा। नतीजन परसराम भी बागी हो गए और उन्होंने भी निर्दलीय चुनाव लड़ा है। अब भाजपा -कांग्रेस उम्मीदवारों के साथ -साथ दोनों तरफ के बागी नेता भी दमखम से चुनाव लड़े है और आनी का चुनाव बेहद रोचक हो गया है।

&nbsp;मतदान के बाद भी बड़े से बड़े सियासी दिग्गज दावे के साथ ये नहीं कह पा रहे है कि आनी का अगला विधायक कौन होगा। यहां इस सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पहले दो स्थानों पर कहीं पार्टी प्रत्याशियों की जगह बागी न काबिज हो जाएँ। ये ही कारण है कि दोनों दल बेशक अपने -अपने बागी नेताओं को निष्कासित कर चुके हो लेकिन बड़े नेता इनसे संपर्क साढ़े हुए है ताकि जरुरत पड़ें पर इन्हे पाने पाले में लिया जा सके। आनी के सियासी अतीत में झांके तो 1977 से लेकर 2017&nbsp; तक यहाँ कांग्रेस और भाजपा ही जीतते आएं है। कभी कोई निर्दलीय आनी में नहीं जीता है। ऐसे में यदि किशोरी लाल&nbsp; या परसराम में से कोई यहां जीतता है तो इतिहास रच देगा।&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">2017 में आनी निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के किशोरी लाल ने कांग्रेस के परसराम को हराकर ये सीट भाजपा की झोली में डाली थी। पर इस बार भाजपा ने यहां से अपने सीटिंग विधायक का टिकट काटकर लोकेन्द्र कुमार पर दांव खेला है। इसके बाद किशोरी लाल ने बगावत कर दी और निर्दलीय चुनाव लड़ा है। उधर कांग्रेस में भी कहानी कुछ ऐसी ही है। पार्टी ने पिछली बार प्रत्याशी रहे परसराम की जगह बंसीलाल को मैदान में उतारा। नतीजन परसराम भी बागी हो गए और उन्होंने भी निर्दलीय चुनाव लड़ा है। अब भाजपा -कांग्रेस उम्मीदवारों के साथ -साथ दोनों तरफ के बागी नेता भी दमखम से चुनाव लड़े है और आनी का चुनाव बेहद रोचक हो गया है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;मतदान के बाद भी बड़े से बड़े सियासी दिग्गज दावे के साथ ये नहीं कह पा रहे है कि आनी का अगला विधायक कौन होगा। यहां इस सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पहले दो स्थानों पर कहीं पार्टी प्रत्याशियों की जगह बागी न काबिज हो जाएँ। ये ही कारण है कि दोनों दल बेशक अपने -अपने बागी नेताओं को निष्कासित कर चुके हो लेकिन बड़े नेता इनसे संपर्क साढ़े हुए है ताकि जरुरत पड़ें पर इन्हे पाने पाले में लिया जा सके। आनी के सियासी अतीत में झांके तो 1977 से लेकर 2017&nbsp; तक यहाँ कांग्रेस और भाजपा ही जीतते आएं है। कभी कोई निर्दलीय आनी में नहीं जीता है। ऐसे में यदि किशोरी लाल&nbsp; या परसराम में से कोई यहां जीतता है तो इतिहास रच देगा।&nbsp;</span></p>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[  Kullu    Bilaspur    Kinnaur    Chamba    Lahaul and Spiti  kaun banega vidhayak    chunav 2022  Politics ]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/shimla-solan-mandi-kangra-una-hamirpur-sirmaur-kullu-bilaspur-kinnaur-chamba-lahaul-and-spiti-kaun-banega-vidhayak-chunav-2022]]></guid>
                       <title><![CDATA[बिखरी भाजपा क्या रोक पाई है भवानी को ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/shimla-solan-mandi-kangra-una-hamirpur-sirmaur-kullu-bilaspur-kinnaur-chamba-lahaul-and-spiti-kaun-banega-vidhayak-chunav-2022]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sun, 04 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[फतेहपुर भाजपा के टिकट आवंटन के बाद सबसे चर्चित सीटों में से एक है। दरअसल ये वो सीट है जहाँ भाजपा ने नजदीकी निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्याशी इम्पोर्ट किया है। नूरपुर से विधायक और कैबिनेट मंत्री राकेश पठानिया को भाजपा ने इस मर्तबा फतेहपुर फ़तेह करने का जिम्मा सौपा है। वैसे भी डॉ राजन सुशांत के पार्टी छोड़ने के बाद से इस क्षेत्र में भाजपा कभी कांग्रेस को जोरदार टक्कर नहीं दे पाई है। बगावत मानो यहाँ भाजपा की नियति बन चुकी है। यहाँ पार्टी दो उपचुनाव सहित लगातार चार चुनाव हार चुकी है। ऐसे में पार्टी ने इस बार राकेश पठानिया को उतार कर बड़ा गैम्बल खेला है।

दरअसल इस क्षेत्र में पार्टी टिकट के दो मुख्य दावेदार थे, बलदेव ठाकुर और कृपाल परमार। पिछले चुनावों को देखे तो पार्टी अगर एक को टिकट देती है, तो दूसरा नाराज हो जाता है। संभवतः पार्टी को लगा हो किसी तीसरे को लेकर पार्टी को एकजुट किया जा सकता है। पर दाव उलटा पड़ गया। कृपाल ने बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा है। दिलचस्प बात तो ये है कि कृपाल को मनाने के लिए खुद पीएम मोदी का फोन आया था, जो काफी वायरल भी हुआ। पर पीएम के मनाने पर भी कृपाल माने नहीं। अब कृपाल पर मतदाताओं की कितनी कृपा रही, ये देखना रोचक होगा। तो वहीं कभी भाजपा के नेता रहे पूर्व सांसद राजन सुशांत इस बार आम आदमी पार्टी से मैदान में है। पर डॉ राजन सुशांत का प्रचार प्रसार इस बार ज्यादा आक्रामक नहीं दिखा है। पर इस क्षेत्र से वो चार बार विधायक रहे है और उनका एक सेट वोट बैंक है जिसके चलते उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता।&nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;

उधर कांग्रेस ने एक बार फिर भवानी सिंह पठानिया को मैदान में उतारा है। कांग्रेस में भवानी के नाम को लेकर कोई विरोध नहीं दिखा। भवानी सिंह पठानिया कॉर्पोरेट जगत की नौकरी छोड़कर अपने पिता स्व सुजान सिंह पठानिया की राजनैतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए फतेहपुर लौटे है। पर पिछले चुनाव को जीत कर भवानी ने ये साबित कर दिया था की वे राजनीति के लिए नए नहीं है। बहरहाल कांग्रेस में &#39;जय भवानी&#39; का नारा बुलंद है और समर्थक तो उन्हें भावी मंत्री भी बताने लगे है। जानकारों का मानना है कि यदि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है और भवानी भी ये चुनाव जीतते है तो उन्हें मंत्री पद या कोई अहम ज़िम्मेदारी मिल सकती है। बहरहाल, भवानी और विधानसभा के बीच भाजपा के बड़े नेता और मंत्री राकेश पठानिया, कृपाल परमार और राजन सुशांत जैसे दिग्गज है। अब फतेहपुर में युवा जोश की जीत होती है या अनुभव की, ये तो नतीजे ही तय करेंगे।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">फतेहपुर भाजपा के टिकट आवंटन के बाद सबसे चर्चित सीटों में से एक है। दरअसल ये वो सीट है जहाँ भाजपा ने नजदीकी निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्याशी इम्पोर्ट किया है। नूरपुर से विधायक और कैबिनेट मंत्री राकेश पठानिया को भाजपा ने इस मर्तबा फतेहपुर फ़तेह करने का जिम्मा सौपा है। वैसे भी डॉ राजन सुशांत के पार्टी छोड़ने के बाद से इस क्षेत्र में भाजपा कभी कांग्रेस को जोरदार टक्कर नहीं दे पाई है। बगावत मानो यहाँ भाजपा की नियति बन चुकी है। यहाँ पार्टी दो उपचुनाव सहित लगातार चार चुनाव हार चुकी है। ऐसे में पार्टी ने इस बार राकेश पठानिया को उतार कर बड़ा गैम्बल खेला है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">दरअसल इस क्षेत्र में पार्टी टिकट के दो मुख्य दावेदार थे, बलदेव ठाकुर और कृपाल परमार। पिछले चुनावों को देखे तो पार्टी अगर एक को टिकट देती है, तो दूसरा नाराज हो जाता है। संभवतः पार्टी को लगा हो किसी तीसरे को लेकर पार्टी को एकजुट किया जा सकता है। पर दाव उलटा पड़ गया। कृपाल ने बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा है। दिलचस्प बात तो ये है कि कृपाल को मनाने के लिए खुद पीएम मोदी का फोन आया था, जो काफी वायरल भी हुआ। पर पीएम के मनाने पर भी कृपाल माने नहीं। अब कृपाल पर मतदाताओं की कितनी कृपा रही, ये देखना रोचक होगा। तो वहीं कभी भाजपा के नेता रहे पूर्व सांसद राजन सुशांत इस बार आम आदमी पार्टी से मैदान में है। पर डॉ राजन सुशांत का प्रचार प्रसार इस बार ज्यादा आक्रामक नहीं दिखा है। पर इस क्षेत्र से वो चार बार विधायक रहे है और उनका एक सेट वोट बैंक है जिसके चलते उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता।&nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उधर कांग्रेस ने एक बार फिर भवानी सिंह पठानिया को मैदान में उतारा है। कांग्रेस में भवानी के नाम को लेकर कोई विरोध नहीं दिखा। भवानी सिंह पठानिया कॉर्पोरेट जगत की नौकरी छोड़कर अपने पिता स्व सुजान सिंह पठानिया की राजनैतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए फतेहपुर लौटे है। पर पिछले चुनाव को जीत कर भवानी ने ये साबित कर दिया था की वे राजनीति के लिए नए नहीं है। बहरहाल कांग्रेस में &#39;जय भवानी&#39; का नारा बुलंद है और समर्थक तो उन्हें भावी मंत्री भी बताने लगे है। जानकारों का मानना है कि यदि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है और भवानी भी ये चुनाव जीतते है तो उन्हें मंत्री पद या कोई अहम ज़िम्मेदारी मिल सकती है। बहरहाल, भवानी और विधानसभा के बीच भाजपा के बड़े नेता और मंत्री राकेश पठानिया, कृपाल परमार और राजन सुशांत जैसे दिग्गज है। अब फतेहपुर में युवा जोश की जीत होती है या अनुभव की, ये तो नतीजे ही तय करेंगे।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25875.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/-1670141748]]></guid>
                       <title><![CDATA[क्या आठ दिसम्बर को दिखेगा मंत्री बिक्रम का सियासी पराक्रम ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/-1670141748]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sun, 04 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[जसवां परागपुर विधानसभा क्षेत्र भाजपा सरकार में मंत्री बिक्रम ठाकुर का गढ़ रहा है। 2012 और 2017 में लगातार जीत दर्ज करने वाले बिक्रम ठाकुर यहां से तीन बार विधायक बने है। दरअसल 2008 के परिसीमन से पहले इस क्षेत्र को जसवां के नाम से जाना जाता था और तब 2003 में बिक्रम पहली बार इस सीट से विधायक बने थे। हालांकि 2007 का चुनाव वे हार गए लेकिन इसमें कोई संशय नहीं है कि वे इस क्षेत्र में आहिस्ता-आहिस्ता मजबूत होते रहे। 2017&nbsp; में तीसरी बार विधायक बनने के बाद उन्हें&nbsp; जयराम कैबिनेट में मंत्री पद मिला और उद्योग और परिवहन जैसे महत्वपूर्ण महकमे उनके पास रहे है। जाहिर है बिक्रम ठाकुर मंत्री बने तो इस क्षेत्र के लोगों की अपेक्षाएं भी उनसे बढ़ी।

इस बार भी यहां भाजपा से बिक्रम सिंह ठाकुर ही प्रत्याशी है, जबकि कांग्रेस ने पूर्व में प्रत्याशी रहे सुरेंद्र सिंह मनकोटिया को मैदान में उतारा है। इन दोनों के अलावा निर्दलीय चुनाव लड़ रहे समाजसेवी कैप्टेन संजय पराशर ने यहाँ के मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। वहीँ कभी बिक्रम सिंह ठाकुर के करीबी रहे मुकेश ठाकुर अब यहाँ से कांग्रेस के बागी है। सो ये सीट वोटों के ध्रुवीकरण के फेर में फंसी है और इस सीट पर बिक्रम ठाकुर का कड़ा इम्तिहान है। क्या कांग्रेस के सुरेंद्र मनकोटिया को इस ध्रुवीकरण का ज्यादा लाभ मिल सकता है, ये बड़ा और अहम सवाल है।

इस सीट के इतिहास पर निगाह डाले तो यहां कभी कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव नहीं जीता है। 1972 से 2017 तक हुए 11 विधानसभा चुनावों में यहां 5 बार कांग्रेस, 5&nbsp; बार भाजपा एक बार जनता पार्टी की जीत हुई है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता विप्लव ठाकुर भी यहाँ से तीन बार विधायक रही है। विप्लव 1985, 1993 और 1998&nbsp; में यहां से जीतकर विधानसभा पहुंची और 1995 से 1998 तक वीरभद्र सरकार में मंत्री भी रही। इसके बाद 2017 में बिक्रम ठकुर ही इस सीट से जीतकर मंत्री बन सके है। बहरहाल मतदान हो चुका है और नतीजे तक स्वाभाविक है सभी नेता अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे है। जानकारों की माने तो यहाँ बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है और जो भी जीते, मुमकिन है अंतर बेहद कम रहे।&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जसवां परागपुर विधानसभा क्षेत्र भाजपा सरकार में मंत्री बिक्रम ठाकुर का गढ़ रहा है। 2012 और 2017 में लगातार जीत दर्ज करने वाले बिक्रम ठाकुर यहां से तीन बार विधायक बने है। दरअसल 2008 के परिसीमन से पहले इस क्षेत्र को जसवां के नाम से जाना जाता था और तब 2003 में बिक्रम पहली बार इस सीट से विधायक बने थे। हालांकि 2007 का चुनाव वे हार गए लेकिन इसमें कोई संशय नहीं है कि वे इस क्षेत्र में आहिस्ता-आहिस्ता मजबूत होते रहे। 2017&nbsp; में तीसरी बार विधायक बनने के बाद उन्हें&nbsp; जयराम कैबिनेट में मंत्री पद मिला और उद्योग और परिवहन जैसे महत्वपूर्ण महकमे उनके पास रहे है। जाहिर है बिक्रम ठाकुर मंत्री बने तो इस क्षेत्र के लोगों की अपेक्षाएं भी उनसे बढ़ी।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस बार भी यहां भाजपा से बिक्रम सिंह ठाकुर ही प्रत्याशी है, जबकि कांग्रेस ने पूर्व में प्रत्याशी रहे सुरेंद्र सिंह मनकोटिया को मैदान में उतारा है। इन दोनों के अलावा निर्दलीय चुनाव लड़ रहे समाजसेवी कैप्टेन संजय पराशर ने यहाँ के मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। वहीँ कभी बिक्रम सिंह ठाकुर के करीबी रहे मुकेश ठाकुर अब यहाँ से कांग्रेस के बागी है। सो ये सीट वोटों के ध्रुवीकरण के फेर में फंसी है और इस सीट पर बिक्रम ठाकुर का कड़ा इम्तिहान है। क्या कांग्रेस के सुरेंद्र मनकोटिया को इस ध्रुवीकरण का ज्यादा लाभ मिल सकता है, ये बड़ा और अहम सवाल है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस सीट के इतिहास पर निगाह डाले तो यहां कभी कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव नहीं जीता है। 1972 से 2017 तक हुए 11 विधानसभा चुनावों में यहां 5 बार कांग्रेस, 5&nbsp; बार भाजपा एक बार जनता पार्टी की जीत हुई है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता विप्लव ठाकुर भी यहाँ से तीन बार विधायक रही है। विप्लव 1985, 1993 और 1998&nbsp; में यहां से जीतकर विधानसभा पहुंची और 1995 से 1998 तक वीरभद्र सरकार में मंत्री भी रही। इसके बाद 2017 में बिक्रम ठकुर ही इस सीट से जीतकर मंत्री बन सके है। बहरहाल मतदान हो चुका है और नतीजे तक स्वाभाविक है सभी नेता अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे है। जानकारों की माने तो यहाँ बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है और जो भी जीते, मुमकिन है अंतर बेहद कम रहे।&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
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                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/bindals-toughest-test-in-the-competition]]></guid>
                       <title><![CDATA[कांटे के मुकाबले में बिंदल का सबसे कड़ा इम्तिहान !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/bindals-toughest-test-in-the-competition]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 03 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[2008 के परिसीमन के बाद सोलन सीट आरक्षित हो गई थी। तब 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले चर्चा ये थी कि भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ राजीव बिंदल कहाँ से चुनाव लड़ेंगे और बिंदल ने चुनी नाहन सीट। वो ही नाहन जहाँ अपने गठन के बाद से कभी भाजपा नहीं जीती थी। हालांकि जनसंघ से निकली श्यामा शर्मा ने जरूर ये सीट 1977 और 1982&nbsp; में जनता पार्टी के टिकट पर और 1990 में जनता दल के टिकट पर जीती थी, पर यहां कमल नहीं खिला था। उधर 1993 से 2007 तक हुए चार विधानसभा चुनाव में से तीन चुनाव डॉ यशवंत सिंह परमार के पुत्र कुश परमार जीत चुके थे। जबकि 2003 में लोक जनशक्ति पार्टी के सदानंद चौहान को विजय मिली थी।

2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी कुश परमार सीटिंग विधायक थे और प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा को लेकर कुछ एंटी इंकमबैंसी भी स्वाभाविक थी। बावजूद इसके बिंदल ने परमार को करीब 13 हजार वोट से हराया। इसके बाद बिंदल नाहन के हो गए। 2017 में वे दूसरी बार चुनाव लड़े और तब कांग्रेस ने उनके सामने अजय सोलंकी को उतारा। बिंदल फिर जीते, लेकिन जीत का अंतर 13 हजार से घटकर करीब 4 हजार रह गया। अब इस सीट पर इस बार फिर बिंदल और सोलंकी आमने-सामने है।

मौजूदा चुनाव की बात करें तो अजय सोलंकी ने इस बार दमदार तरीके से चुनाव लड़ा है। ओपीएस का मुद्दा हो या महिलाओं को पंद्रह सौ रुपये देने का वादा, सोलंकी को इससे लाभ हो सकता है। नाहन में अल्पसंख्यक वोट भी खासी तादाद में है और इस वोट से भी इस बार कांग्रेस को उम्मीद है। ऐसे में बिंदल की राह मुश्किल जरूर है। पर बिंदल के तजुर्बे और उनकी बेमिसाल पोलिटिकल मैनेजमेंट को देखते हुए उन्हें कम नहीं आँका जा सकता। बहरहाल नाहन इस बार हॉट सीट है और यहां कांटे का मुकाबला दिख रहा है।


बिंदल के लिए उतार चढ़ाव भरे रहे पांच साल :
यहां जिक्र बीते पांच साल में बिंदल के राजनैतिक जीवन में आएं उतार चढ़ाव का भी करते है। 2017 में भाजपा की सत्ता वापसी के बाद बिंदल मंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। पर ऐसा हुआ नहीं और बिंदल को विधानसभा अध्यक्ष के पद पर बैठा दिया गया। पर 2019 के अंत में समीकरण बदले और बिंदल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बन गए। फिर आया 2020 का कोरोना काल और प्रदेश में हुए स्वास्थ्य घोटाले में बिंदल का नाम उछला। इसके बाद बिंदल ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बिंदल को पार्टी ने सोलन नगर निगम और अर्की उपचुनाव का प्रभारी बनाया, लेकिन दोनों जगह पार्टी हार गई। मौजूदा चुनाव में भाजपा ने बिंदल के अनुभव को देखते हुए उन्हें प्रदेश चुनाव मैनेजमेंट कमेटी का अध्यक्ष बनाया है। पांच साल से चले आ रहे इस उतार चढ़ाव के बीच बिंदल के लिए नाहन से जीत बेहद जरूरी दिख रही है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">2008 के परिसीमन के बाद सोलन सीट आरक्षित हो गई थी। तब 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले चर्चा ये थी कि भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ राजीव बिंदल कहाँ से चुनाव लड़ेंगे और बिंदल ने चुनी नाहन सीट। वो ही नाहन जहाँ अपने गठन के बाद से कभी भाजपा नहीं जीती थी। हालांकि जनसंघ से निकली श्यामा शर्मा ने जरूर ये सीट 1977 और 1982&nbsp; में जनता पार्टी के टिकट पर और 1990 में जनता दल के टिकट पर जीती थी, पर यहां कमल नहीं खिला था। उधर 1993 से 2007 तक हुए चार विधानसभा चुनाव में से तीन चुनाव डॉ यशवंत सिंह परमार के पुत्र कुश परमार जीत चुके थे। जबकि 2003 में लोक जनशक्ति पार्टी के सदानंद चौहान को विजय मिली थी।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी कुश परमार सीटिंग विधायक थे और प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा को लेकर कुछ एंटी इंकमबैंसी भी स्वाभाविक थी। बावजूद इसके बिंदल ने परमार को करीब 13 हजार वोट से हराया। इसके बाद बिंदल नाहन के हो गए। 2017 में वे दूसरी बार चुनाव लड़े और तब कांग्रेस ने उनके सामने अजय सोलंकी को उतारा। बिंदल फिर जीते, लेकिन जीत का अंतर 13 हजार से घटकर करीब 4 हजार रह गया। अब इस सीट पर इस बार फिर बिंदल और सोलंकी आमने-सामने है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मौजूदा चुनाव की बात करें तो अजय सोलंकी ने इस बार दमदार तरीके से चुनाव लड़ा है। ओपीएस का मुद्दा हो या महिलाओं को पंद्रह सौ रुपये देने का वादा, सोलंकी को इससे लाभ हो सकता है। नाहन में अल्पसंख्यक वोट भी खासी तादाद में है और इस वोट से भी इस बार कांग्रेस को उम्मीद है। ऐसे में बिंदल की राह मुश्किल जरूर है। पर बिंदल के तजुर्बे और उनकी बेमिसाल पोलिटिकल मैनेजमेंट को देखते हुए उन्हें कम नहीं आँका जा सकता। बहरहाल नाहन इस बार हॉट सीट है और यहां कांटे का मुकाबला दिख रहा है।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>बिंदल के लिए उतार चढ़ाव भरे रहे पांच साल :</strong><br />
यहां जिक्र बीते पांच साल में बिंदल के राजनैतिक जीवन में आएं उतार चढ़ाव का भी करते है। 2017 में भाजपा की सत्ता वापसी के बाद बिंदल मंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। पर ऐसा हुआ नहीं और बिंदल को विधानसभा अध्यक्ष के पद पर बैठा दिया गया। पर 2019 के अंत में समीकरण बदले और बिंदल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बन गए। फिर आया 2020 का कोरोना काल और प्रदेश में हुए स्वास्थ्य घोटाले में बिंदल का नाम उछला। इसके बाद बिंदल ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बिंदल को पार्टी ने सोलन नगर निगम और अर्की उपचुनाव का प्रभारी बनाया, लेकिन दोनों जगह पार्टी हार गई। मौजूदा चुनाव में भाजपा ने बिंदल के अनुभव को देखते हुए उन्हें प्रदेश चुनाव मैनेजमेंट कमेटी का अध्यक्ष बनाया है। पांच साल से चले आ रहे इस उतार चढ़ाव के बीच बिंदल के लिए नाहन से जीत बेहद जरूरी दिख रही है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25860.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
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                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/if-congress-comes-chandra-kumar-will-also-be-the-prime-face]]></guid>
                       <title><![CDATA[कांग्रेस आई तो चंद्र कुमार भी होंगे प्राइम फेस !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/if-congress-comes-chandra-kumar-will-also-be-the-prime-face]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 03 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[ज्वाली की सियासत अर्से से एक प्रोफेसर और उनके परिवार के इर्द गिर्द घूमती रही है। हम बात कर रहे है कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष चौधरी चंद्र कुमार की। 1977 में चौधरी चंद्र कुमार निर्दलीय यहाँ से चुनाव लड़े थे। तब इस सीट का नाम था गुलेर, जो 2008 के परिसीमन के बाद ज्वाली पड़ा। अपना पहला चुनाव चौधरी चंद्र कुमार हार गए और सियासत से दूरी बनाकर शिमला के सेंट बीड्स कॉलेज में पढ़ाने लगे। पर सियासत किसी को आसानी से कहाँ छोड़ती है। चंद्र कुमार कांग्रेस के सम्पर्क में आए और नौकरी छोड़ कर फिर सियासत में एंट्री हो गई।

1982 से 2003 तक हुए 6 विधानसभा चुनावों में सिर्फ 1990 को छोड़कर पांच बार चौधरी चंद्र कुमार को जीत मिली। इस दौरान वे वीरभद्र सिंह के करीबी रहे और मंत्री भी रहे। उनके कद को देखते हुए पार्टी ने उन्हें 2004 में कांगड़ा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़वाया और वे लोकसभा पहुंच गए। उनके सांसद बनने के बाद पार्टी ने उनके पुत्र नीरज भारती को उपचुनाव में उतारा, हालांकि नीरज चुनाव हार गए। पर इसके बाद&nbsp; 2007 और 2012 में नीरज ने इस सीट पर जीत दर्ज की। फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने एक बार फिर चौधरी चंद्र कुमार को मैदान में उतारा लेकिन वे भाजपा के अर्जुन सिंह से हार गए। इस बार फिर चंद्र कुमार मैदान में है।&nbsp;&nbsp;

उधर भाजपा ने सीटिंग विधायक अर्जुन सिंह का टिकट काटकर संजय गुलेरिया पर दांव खेला है। निसंदेह यहाँ एंटी इंकम्बेंसी को खत्म करने के लिए भाजपा ने नए चेहरे को मैदान में उतारा है, लेकिन भाजपा का ये फैसला कितना सही साबित होता है ये तो नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा। अर्जुन सिंह का टिकट काटने के बाद शुरुआत में भाजपा को यहाँ विरोध का सामना भी करना पड़ा था, लेकिन आखिरकार भाजपा द्वारा रूठों को मना लिया गया। इसके बाद लड़ाई चौधरी चंद्र कुमार बनाम संजय गुलेरिया ही रही है। संजय गुलेरिया को अंडर एस्टीमेट नहीं किया जा सकता है। क्षेत्र में उनकी पकड़ काफी मजबूत है, लेकिन चुनौती कड़ी है क्योंकि उनके सामने कांग्रेस के अनुभवी नेता चौधरी चंद्र कुमार है। यहाँ कौन जीतेगा ये तो आठ दिसंबर को तय होगा लेकिन कांग्रेस यहाँ जीत को लेकर आश्वस्त जरूर दिख रही है।


बड़ा ओहदा मिलना लगभग तय&nbsp;
अगर प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता वापसी हुई और चौधरी चंद्र कुमार भी चुनाव जीत जाते है तो उन्हें अहम ज़िम्मा मिलना तय है। चुनाव से कुछ वक्त पहले पवन काजल के भाजपा में शामिल होने के बाद कांग्रेस ने चौधरी चंद्र कुमार को प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। चंद्र कुमार बड़ा ओबीसी चेहरा है और उस&nbsp; जिला कांगड़ा से ताल्लुख रखते है जो प्रदेश की सत्ता का रास्ता प्रशस्त करता है। ऐसे में सीएम पद को लेकर भी उनके नाम को खारिज नहीं किया जा सकता। बहरहाल अगर वे जीते और कांग्रेस सरकार बनी तो उन्हें बड़ा ओहदा मिलना तो लगभग तय है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ज्वाली की सियासत अर्से से एक प्रोफेसर और उनके परिवार के इर्द गिर्द घूमती रही है। हम बात कर रहे है कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष चौधरी चंद्र कुमार की। 1977 में चौधरी चंद्र कुमार निर्दलीय यहाँ से चुनाव लड़े थे। तब इस सीट का नाम था गुलेर, जो 2008 के परिसीमन के बाद ज्वाली पड़ा। अपना पहला चुनाव चौधरी चंद्र कुमार हार गए और सियासत से दूरी बनाकर शिमला के सेंट बीड्स कॉलेज में पढ़ाने लगे। पर सियासत किसी को आसानी से कहाँ छोड़ती है। चंद्र कुमार कांग्रेस के सम्पर्क में आए और नौकरी छोड़ कर फिर सियासत में एंट्री हो गई।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">1982 से 2003 तक हुए 6 विधानसभा चुनावों में सिर्फ 1990 को छोड़कर पांच बार चौधरी चंद्र कुमार को जीत मिली। इस दौरान वे वीरभद्र सिंह के करीबी रहे और मंत्री भी रहे। उनके कद को देखते हुए पार्टी ने उन्हें 2004 में कांगड़ा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़वाया और वे लोकसभा पहुंच गए। उनके सांसद बनने के बाद पार्टी ने उनके पुत्र नीरज भारती को उपचुनाव में उतारा, हालांकि नीरज चुनाव हार गए। पर इसके बाद&nbsp; 2007 और 2012 में नीरज ने इस सीट पर जीत दर्ज की। फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने एक बार फिर चौधरी चंद्र कुमार को मैदान में उतारा लेकिन वे भाजपा के अर्जुन सिंह से हार गए। इस बार फिर चंद्र कुमार मैदान में है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उधर भाजपा ने सीटिंग विधायक अर्जुन सिंह का टिकट काटकर संजय गुलेरिया पर दांव खेला है। निसंदेह यहाँ एंटी इंकम्बेंसी को खत्म करने के लिए भाजपा ने नए चेहरे को मैदान में उतारा है, लेकिन भाजपा का ये फैसला कितना सही साबित होता है ये तो नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा। अर्जुन सिंह का टिकट काटने के बाद शुरुआत में भाजपा को यहाँ विरोध का सामना भी करना पड़ा था, लेकिन आखिरकार भाजपा द्वारा रूठों को मना लिया गया। इसके बाद लड़ाई चौधरी चंद्र कुमार बनाम संजय गुलेरिया ही रही है। संजय गुलेरिया को अंडर एस्टीमेट नहीं किया जा सकता है। क्षेत्र में उनकी पकड़ काफी मजबूत है, लेकिन चुनौती कड़ी है क्योंकि उनके सामने कांग्रेस के अनुभवी नेता चौधरी चंद्र कुमार है। यहाँ कौन जीतेगा ये तो आठ दिसंबर को तय होगा लेकिन कांग्रेस यहाँ जीत को लेकर आश्वस्त जरूर दिख रही है।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>बड़ा ओहदा मिलना लगभग तय</strong>&nbsp;<br />
अगर प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता वापसी हुई और चौधरी चंद्र कुमार भी चुनाव जीत जाते है तो उन्हें अहम ज़िम्मा मिलना तय है। चुनाव से कुछ वक्त पहले पवन काजल के भाजपा में शामिल होने के बाद कांग्रेस ने चौधरी चंद्र कुमार को प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। चंद्र कुमार बड़ा ओबीसी चेहरा है और उस&nbsp; जिला कांगड़ा से ताल्लुख रखते है जो प्रदेश की सत्ता का रास्ता प्रशस्त करता है। ऐसे में सीएम पद को लेकर भी उनके नाम को खारिज नहीं किया जा सकता। बहरहाल अगर वे जीते और कांग्रेस सरकार बनी तो उन्हें बड़ा ओहदा मिलना तो लगभग तय है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25859.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[If Congress comes, Chandra Kumar will also be the prime face!]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/congress-working-president-stuck-in-election-season]]></guid>
                       <title><![CDATA[चुनावी समर में फंसे कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/congress-working-president-stuck-in-election-season]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 03 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[इस बार रेणुका सीट पर बीजेपी नारायण-नारायण कर रही है। 2011 में हुए उपचुनाव में जीत हासिल करने के बाद एक बार फिर बीजेपी जीत को लेकर आशावान है। इस बार भाजपा ने यहां से एक नए चेहरे नारायण सिंह को टिकट दिया है।  भाजपा पूरी तरह से आश्वस्त है कि हाटी समुदाय के मुद्दे और मौजूदा विधायक के खिलाफ संभावित एंटी इंकमबैंसी के आधार पर  इस सीट पर उसे बड़ा उलटफेर करने में सफलता हासिल होगी। उधर, कांग्रेस ने फिर एक बार विनय कुमार को टिकट दिया है। विनय कुमार दो बार के विधायक है और कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष भी। कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में उन्हें अहम पद मिलना भी लगभग तय है। विनय कुमार इस बार यहां जीत की हैट्रिक लगाने का दावा कर रहे है। हालाँकि क्षेत्र में उनको लेकर दिख रही एंटी इंकम्बैंसी और क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर नाराजगी को भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता। बावजूद इसके विनय कुमार का मिलनसार व्यवहार और क्षेत्र में उनकी पकड़ उनका दावा मजबूत करते  है।

इतिहास पर नजर डाले तो यह सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। 1982 से 2007 तक हुए सात विधानसभा चुनावों में 1990 को छोड़कर हर बार कांग्रेस के प्रेम सिंह को जीत मिली फिर 2011 में प्रेम सिंह का स्वर्गवास हो गया। उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने प्रेम सिंह के पुत्र विनय कुमार को टिकट दिया, जबकि भाजपा ने तब आईएएस अधिकारी हिरदा राम को वीआरएस दिला कर मैदान में उतारा। तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का ये मास्टर स्टॉक काम कर गया और इस सीट पर भाजपा प्रत्याशी ने जीत हासिल कर ली। तब हिरदा राम ने विनय कुमार को करीब 3000 वोट से हराया। फिर 2012 में  विनय कुमार ने कांग्रेस टिकट पर चुनाव जीता और हिरदा राम को करीब सात सौ के अंतर से हराया।  2017 में भी विनय की जीत का सिलसिला जारी रहा और उन्होंने भाजपा के बलबीर सिंह को करीब पांच हजार के अंतर से हराया। अब एक बार फिर कांग्रेस ने उन्हें चुनावी दंगल में उतारा है।



हाटी फैक्टर का होगा कितना असर ?
अब मौजूदा चुनाव में सबसे बड़े फैक्टर की बात करते है जिससे भाजपा को बड़ी आस है।हाटी समुदाय को जनजातीय दर्जा देने के फैसले का इस विधानसभा क्षेत्र  में सीधा असर है। इस फैसले से  रेणुका जी में 44 पंचायतों के 122 गांवों के 40,317 संबंधित लोगों को लाभ होगा। जबकि यहां एससी के 29,990 लोग बाहर होंगे।  इस मुद्दे को भाजपा ने चुनाव में जमकर भुनाने की कोशिश की है। बाकायदा सतौन में गृह मंत्री अमित शाह का कार्यक्रम आयोजित करवाया गया। पर इसका कितना चुनावी लाभ भाजपा को मिला, ये तो नतीजे ही तय करेंगे।

]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस बार रेणुका सीट पर बीजेपी नारायण-नारायण कर रही है। 2011 में हुए उपचुनाव में जीत हासिल करने के बाद एक बार फिर बीजेपी जीत को लेकर आशावान है। इस बार भाजपा ने यहां से एक नए चेहरे नारायण सिंह को टिकट दिया है।  भाजपा पूरी तरह से आश्वस्त है कि हाटी समुदाय के मुद्दे और मौजूदा विधायक के खिलाफ संभावित एंटी इंकमबैंसी के आधार पर  इस सीट पर उसे बड़ा उलटफेर करने में सफलता हासिल होगी। उधर, कांग्रेस ने फिर एक बार विनय कुमार को टिकट दिया है। विनय कुमार दो बार के विधायक है और कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष भी। कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में उन्हें अहम पद मिलना भी लगभग तय है। विनय कुमार इस बार यहां जीत की हैट्रिक लगाने का दावा कर रहे है। हालाँकि क्षेत्र में उनको लेकर दिख रही एंटी इंकम्बैंसी और क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर नाराजगी को भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता। बावजूद इसके विनय कुमार का मिलनसार व्यवहार और क्षेत्र में उनकी पकड़ उनका दावा मजबूत करते  है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इतिहास पर नजर डाले तो यह सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। 1982 से 2007 तक हुए सात विधानसभा चुनावों में 1990 को छोड़कर हर बार कांग्रेस के प्रेम सिंह को जीत मिली फिर 2011 में प्रेम सिंह का स्वर्गवास हो गया। उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने प्रेम सिंह के पुत्र विनय कुमार को टिकट दिया, जबकि भाजपा ने तब आईएएस अधिकारी हिरदा राम को वीआरएस दिला कर मैदान में उतारा। तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का ये मास्टर स्टॉक काम कर गया और इस सीट पर भाजपा प्रत्याशी ने जीत हासिल कर ली। तब हिरदा राम ने विनय कुमार को करीब 3000 वोट से हराया। फिर 2012 में  विनय कुमार ने कांग्रेस टिकट पर चुनाव जीता और हिरदा राम को करीब सात सौ के अंतर से हराया।  2017 में भी विनय की जीत का सिलसिला जारी रहा और उन्होंने भाजपा के बलबीर सिंह को करीब पांच हजार के अंतर से हराया। अब एक बार फिर कांग्रेस ने उन्हें चुनावी दंगल में उतारा है।</span></p>

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<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>हाटी फैक्टर का होगा कितना असर ?</strong><br />
अब मौजूदा चुनाव में सबसे बड़े फैक्टर की बात करते है जिससे भाजपा को बड़ी आस है।हाटी समुदाय को जनजातीय दर्जा देने के फैसले का इस विधानसभा क्षेत्र  में सीधा असर है। इस फैसले से  रेणुका जी में 44 पंचायतों के 122 गांवों के 40,317 संबंधित लोगों को लाभ होगा। जबकि यहां एससी के 29,990 लोग बाहर होंगे।  इस मुद्दे को भाजपा ने चुनाव में जमकर भुनाने की कोशिश की है। बाकायदा सतौन में गृह मंत्री अमित शाह का कार्यक्रम आयोजित करवाया गया। पर इसका कितना चुनावी लाभ भाजपा को मिला, ये तो नतीजे ही तय करेंगे।</span></p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25857.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Congress working president stuck in election season]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-the-decision-of-giving-ticket-to-narottam-prove-to-be-good]]></guid>
                       <title><![CDATA[क्या उत्तम साबित होगा नरोत्तम को टिकट देने का निर्णय ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-the-decision-of-giving-ticket-to-narottam-prove-to-be-good]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 03 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[कहते है न सियासत महाठगिनी है। इस चुनाव में सियासत ने कई नेताओं को ठगा और नतीजों के बाद न जाने कितने ठगा सा महसूस करेंगे। इसी लिस्ट में एक नाम है प्रदेश की सियासत के दिग्गज नेता महेश्वर सिंह का। विधानसभा चुनाव के काफी पहले से चर्चा थी कि क्या भाजपा इस बार कुल्लू सीट से महेश्वर सिंह को एक बार फिर मैदान में उतारेगी? फिर दशहरे के दौरान पीएम मोदी भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा में शामिल हुए और उसके बाद कयास लगने लगे कि शायद महेश्वर को टिकट मिल जाएँ। इस बीच महेश्वर सिंह का भी ब्यान आया कि उन्हें किसी मंत्री पद की लालसा नहीं है बस एक बार और कुल्लू का विधायक बनने की तमन्ना है। तमन्ना पूरी हुई और भाजपा ने कुल्लू सदर सीट से महेश्वर सिंह को टिकट दे दिया। पर उनके बेटे हितेश्वर सिंह बंजार से टिकट न मिलने के चलते निर्दलीय चुनाव लड़ने मैदान में उतर गए। भाजपा को ये गवारा नहीं था कि पिता पार्टी उम्मीदवार और बेटा दूसरी सीट पर बागी। फिर सियासत ने करवट बदली और भाजपा ने यहाँ नामांकन से  ठीक एक दिन पहले वरिष्ठ नेता महेश्वर सिंह ठाकुर का टिकट काट दिया।

अब बात करते है मौजूदा सियासी समीकरण की। कुल्लू सदर सीट से भाजपा ने टिकट बदल कर नरोत्तम ठाकुर को मैदान में उतारा। उधर, हिमाचल बीजेपी उपाध्यक्ष और 2012 के भाजपा प्रत्याशी रहे राम सिंह ठाकुर भी टिकट की मांग कर रहे थे। टिकट न मिलने से खफा हुए राम सिंह बतौर निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरे और यहाँ मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। निसंदेह राम सिंह के मैदान में होने से यहाँ नरोत्तम ठाकुर की मुश्किलें बढ़ी है। ऐसे में गुटों में बंटी भाजपा इस सीट पर कितना डैमेज कण्ट्रोल कर पायी है, यह तो नतीजे आने के बाद ही पता लग पायेगा। वहीं कांग्रेस ने सुन्दर सिंह ठाकुर को तीसरी बार टिकट दिया है। सुन्दर सिंह ठाकुर पहली बार 2012 में कांग्रेस टिकट से चुनाव लड़े थे और तब हार गए थे। फिर 2017 में उन्होंने चुनाव लड़ा और भाजपा के महेश्वर सिंह ठाकुर को करीब ढाई हजार मतों से पराजित किया। सुन्दर ठाकुर तीसरी बार चुनावी मैदान में है। हालाँकि भाजपा में गुटबाजी और राम सिंह ठाकुर के निर्दलीय चुनावी मैदान में होने से सुन्दर सिंह ठाकुर जीत को लेकर आश्वस्त दिख रहे है। वहीं उनके समर्थक तो अभी से उन्हें बतौर मंत्री प्रोजेक्ट करने लगे है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कहते है न सियासत महाठगिनी है। इस चुनाव में सियासत ने कई नेताओं को ठगा और नतीजों के बाद न जाने कितने ठगा सा महसूस करेंगे। इसी लिस्ट में एक नाम है प्रदेश की सियासत के दिग्गज नेता महेश्वर सिंह का। विधानसभा चुनाव के काफी पहले से चर्चा थी कि क्या भाजपा इस बार कुल्लू सीट से महेश्वर सिंह को एक बार फिर मैदान में उतारेगी? फिर दशहरे के दौरान पीएम मोदी भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा में शामिल हुए और उसके बाद कयास लगने लगे कि शायद महेश्वर को टिकट मिल जाएँ। इस बीच महेश्वर सिंह का भी ब्यान आया कि उन्हें किसी मंत्री पद की लालसा नहीं है बस एक बार और कुल्लू का विधायक बनने की तमन्ना है। तमन्ना पूरी हुई और भाजपा ने कुल्लू सदर सीट से महेश्वर सिंह को टिकट दे दिया। पर उनके बेटे हितेश्वर सिंह बंजार से टिकट न मिलने के चलते निर्दलीय चुनाव लड़ने मैदान में उतर गए। भाजपा को ये गवारा नहीं था कि पिता पार्टी उम्मीदवार और बेटा दूसरी सीट पर बागी। फिर सियासत ने करवट बदली और भाजपा ने यहाँ नामांकन से  ठीक एक दिन पहले वरिष्ठ नेता महेश्वर सिंह ठाकुर का टिकट काट दिया।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">अब बात करते है मौजूदा सियासी समीकरण की। कुल्लू सदर सीट से भाजपा ने टिकट बदल कर नरोत्तम ठाकुर को मैदान में उतारा। उधर, हिमाचल बीजेपी उपाध्यक्ष और 2012 के भाजपा प्रत्याशी रहे राम सिंह ठाकुर भी टिकट की मांग कर रहे थे। टिकट न मिलने से खफा हुए राम सिंह बतौर निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरे और यहाँ मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। निसंदेह राम सिंह के मैदान में होने से यहाँ नरोत्तम ठाकुर की मुश्किलें बढ़ी है। ऐसे में गुटों में बंटी भाजपा इस सीट पर कितना डैमेज कण्ट्रोल कर पायी है, यह तो नतीजे आने के बाद ही पता लग पायेगा। </span><span style="font-size: 18px;">वहीं कांग्रेस ने सुन्दर सिंह ठाकुर को तीसरी बार टिकट दिया है। सुन्दर सिंह ठाकुर पहली बार 2012 में कांग्रेस टिकट से चुनाव लड़े थे और तब हार गए थे। फिर 2017 में उन्होंने चुनाव लड़ा और भाजपा के महेश्वर सिंह ठाकुर को करीब ढाई हजार मतों से पराजित किया। सुन्दर ठाकुर तीसरी बार चुनावी मैदान में है। हालाँकि भाजपा में गुटबाजी और राम सिंह ठाकुर के निर्दलीय चुनावी मैदान में होने से सुन्दर सिंह ठाकुर जीत को लेकर आश्वस्त दिख रहे है। वहीं उनके समर्थक तो अभी से उन्हें बतौर मंत्री प्रोजेक्ट करने लगे है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25856.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Will the decision of giving ticket to Narottam prove to be good?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/thakur-saheb-is-also-involved-in-the-race-to-reach-oak-over]]></guid>
                       <title><![CDATA[ओक ओवर पहुंचने की दौड़ में भी शामिल है ठाकुर साहब]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/thakur-saheb-is-also-involved-in-the-race-to-reach-oak-over]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 03 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[कभी कबड्डी के मैदान में विरोधियों को पटकनी देने वाले वरिष्ठ कांग्रेस नेता रामलाल ठाकुर सियासत के मैदान के भी मंजे हुए खिलाड़ी है। इस बार ठाकुर अपनी परंपरागत सीट श्री नैनादेवी से नौवीं बार मैदान में है और छठी जीत दर्ज करने को लेकर आश्वस्त दिख रहे है। रामलाल ठाकुर की निगाहें तो विधानसभा पर टिकी है लेकिन उनका निशाना ओक ओवर पर भी है। दरअसल रामलाल ठाकुर का नाम कांग्रेस से सीएम पद के दावेदारों में शुमार है। ऐसे में जाहिर है इस बार नैनादेवी निर्वाचन क्षेत्र सूबे की हॉट सीटों में शुमार है।&nbsp;&nbsp;

इस सीट के अतीत पर निगाह डाले तो यहां रामलाल ठाकुर का वर्चस्व स्पष्ट दिखता है। 2008 के परिसीमन से पहले इस सीट को कोट कहलूर के नाम से जाना जाता था और फिर इसका नाम श्री नैनादेवी हो गया। रामलाल ठाकुर 1985&nbsp; में पहली बार यहां से मैदान में उतरे और विधानसभा पहुंचे। पर 1990 में सीपीआई नेता केके कौशल ने उन्हें हरा दिया। उसके बाद रामलाल ठाकुर 1993, 1998 और 2003 में लगातार तीन बार जीते।&nbsp; इस दौरान वह कानून, खेल व अन्य विभागों के मंत्री भी रहे। उन्होंने स्वास्थ्य, उद्योग व वन विभाग भी संभाला। पर साल 2007 और 2012 में कांग्रेस के इस मजबूत किले में भाजपा ने सेंध लगाई और रणधीर शर्मा यहां से दो बार लगातार विधायक रहे। इसके बाद&nbsp; साल 2017 में रामलाल ठाकुर ने यहां से फिर चुनाव जीत कर वापसी की।

मौजूदा स्थिति की बात करें तो श्री नैना देवी सीट पर एक बार फिर राम लाल ठाकुर और भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता रणधीर शर्मा आमने सामने है। इस बार भी यहाँ करीबी मुकाबला संभव है। रामलाल ठाकुर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता है और प्रदेश में यदि कांग्रेस सरकार बनती है तो ठाकुर सीएम पद के दावेदारों में से एक होंगे। यदि सीएम पद की दौड़ में पिछड़ भी गए तो भी ठाकुर को अहम जिम्मा मिलना लगभग तय है। जाहिर है मतदाता भी इस बात को समझता है और सम्भवतः इसका लाभ ठाकुर को मिला हो। इसके अलावा ओपीएस और महिला सम्मान राशि जैसे कांग्रेस के वादे भी लाभदायक सिद्ध हो सकते है। ऐसे में रामलाल ठाकुर अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिख रहे है। उधर भाजपा भी जीत का दावा कर रही है। बहरहाल नतीजों के लिए आठ दिसम्बर का इन्तजार करना होगा।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कभी कबड्डी के मैदान में विरोधियों को पटकनी देने वाले वरिष्ठ कांग्रेस नेता रामलाल ठाकुर सियासत के मैदान के भी मंजे हुए खिलाड़ी है। इस बार ठाकुर अपनी परंपरागत सीट श्री नैनादेवी से नौवीं बार मैदान में है और छठी जीत दर्ज करने को लेकर आश्वस्त दिख रहे है। रामलाल ठाकुर की निगाहें तो विधानसभा पर टिकी है लेकिन उनका निशाना ओक ओवर पर भी है। दरअसल रामलाल ठाकुर का नाम कांग्रेस से सीएम पद के दावेदारों में शुमार है। ऐसे में जाहिर है इस बार नैनादेवी निर्वाचन क्षेत्र सूबे की हॉट सीटों में शुमार है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस सीट के अतीत पर निगाह डाले तो यहां रामलाल ठाकुर का वर्चस्व स्पष्ट दिखता है। 2008 के परिसीमन से पहले इस सीट को कोट कहलूर के नाम से जाना जाता था और फिर इसका नाम श्री नैनादेवी हो गया। रामलाल ठाकुर 1985&nbsp; में पहली बार यहां से मैदान में उतरे और विधानसभा पहुंचे। पर 1990 में सीपीआई नेता केके कौशल ने उन्हें हरा दिया। उसके बाद रामलाल ठाकुर 1993, 1998 और 2003 में लगातार तीन बार जीते।&nbsp; इस दौरान वह कानून, खेल व अन्य विभागों के मंत्री भी रहे। उन्होंने स्वास्थ्य, उद्योग व वन विभाग भी संभाला। पर साल 2007 और 2012 में कांग्रेस के इस मजबूत किले में भाजपा ने सेंध लगाई और रणधीर शर्मा यहां से दो बार लगातार विधायक रहे। इसके बाद&nbsp; साल 2017 में रामलाल ठाकुर ने यहां से फिर चुनाव जीत कर वापसी की।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मौजूदा स्थिति की बात करें तो श्री नैना देवी सीट पर एक बार फिर राम लाल ठाकुर और भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता रणधीर शर्मा आमने सामने है। इस बार भी यहाँ करीबी मुकाबला संभव है। रामलाल ठाकुर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता है और प्रदेश में यदि कांग्रेस सरकार बनती है तो ठाकुर सीएम पद के दावेदारों में से एक होंगे। यदि सीएम पद की दौड़ में पिछड़ भी गए तो भी ठाकुर को अहम जिम्मा मिलना लगभग तय है। जाहिर है मतदाता भी इस बात को समझता है और सम्भवतः इसका लाभ ठाकुर को मिला हो। इसके अलावा ओपीएस और महिला सम्मान राशि जैसे कांग्रेस के वादे भी लाभदायक सिद्ध हो सकते है। ऐसे में रामलाल ठाकुर अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिख रहे है। उधर भाजपा भी जीत का दावा कर रही है। बहरहाल नतीजों के लिए आठ दिसम्बर का इन्तजार करना होगा।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25855.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Thakur Saheb is also involved in the race to reach Oak Over]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/jaisinghpur-close-contest-expected-will-goma-make-a-comeback]]></guid>
                       <title><![CDATA[जयसिंहपुर : कांटे का मुकाबला अपेक्षित, क्या वापसी करेंगे गोमा ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/jaisinghpur-close-contest-expected-will-goma-make-a-comeback]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 03 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[2008 में परिसीमन बदलने के बाद अस्तित्व में आया जयसिंहपुर विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। 2012 में यहां कांग्रेस नेता यादविंदर गोमा विधायक बने तो, 2017 में भाजपा नेता रविंद्र धीमान ने गोमा को 10 हजार से अधिक मतों से हराया। इस बार यहां कांग्रेस ने यादविंदर गोमा को ही मैदान में उतारा है, जबकि भाजपा की ओर से रविंदर धीमान मैदान में है। दोनों ही प्रत्याशियों ने इस चुनाव में एड़ी चोटी का ज़ोर लगाया है और यहां मुकाबला टक्कर का दिखाई दे रहा है। 2017 के चुनाव में रविंदर धीमान यहां करीब 10,000&nbsp; मतों से जीते थे, मगर इस बार जिस भी प्रत्याशी की जीत होगी अंतर बहुत कम रहने की संभावना है।&nbsp;&nbsp;

शुरूआती दौर में यहाँ सीटिंग विधायक रविंद्र धीमान की राह थोड़ी आसान दिख रही थी। दरअसल कांग्रेस में टिकट के दो दावेदार थे, गोमा और सुशील कौल। इसके चलते कांग्रेस के टिकट आवंटन में काफी देर हुई। पर आखिरकार कांग्रेस ने गोमा पर ही भरोसा जताया। पर टिकट मिलने के बाद गोमा का प्रचार काफी आक्रामक रहा। इसके अलावा ओपीएस और महिलाओं को पंद्रह सौ रुपये देने के कांग्रेस के वादों का भी यहाँ जमीनी असर दिखा। नतीजन अब कांग्रेस यहाँ जीत के दावे कर रही है। उधर, कांग्रेस से मौका न मिलने के बाद सुशील कौल ने राष्ट्रीय देवभूमि पार्टी का दामन थामा और चुनाव लड़ा। अब कौल कितने वोट ले जाते है और किसको कितना नुक्सान पहुंचाते है, इस पर भी सबकी निगाह है। बहरहाल नतीजा आठ तारीख को आएगा और यहाँ कांटे का मुकाबला अपेक्षित है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">2008 में परिसीमन बदलने के बाद अस्तित्व में आया जयसिंहपुर विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। 2012 में यहां कांग्रेस नेता यादविंदर गोमा विधायक बने तो, 2017 में भाजपा नेता रविंद्र धीमान ने गोमा को 10 हजार से अधिक मतों से हराया। इस बार यहां कांग्रेस ने यादविंदर गोमा को ही मैदान में उतारा है, जबकि भाजपा की ओर से रविंदर धीमान मैदान में है। दोनों ही प्रत्याशियों ने इस चुनाव में एड़ी चोटी का ज़ोर लगाया है और यहां मुकाबला टक्कर का दिखाई दे रहा है। 2017 के चुनाव में रविंदर धीमान यहां करीब 10,000&nbsp; मतों से जीते थे, मगर इस बार जिस भी प्रत्याशी की जीत होगी अंतर बहुत कम रहने की संभावना है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शुरूआती दौर में यहाँ सीटिंग विधायक रविंद्र धीमान की राह थोड़ी आसान दिख रही थी। दरअसल कांग्रेस में टिकट के दो दावेदार थे, गोमा और सुशील कौल। इसके चलते कांग्रेस के टिकट आवंटन में काफी देर हुई। पर आखिरकार कांग्रेस ने गोमा पर ही भरोसा जताया। पर टिकट मिलने के बाद गोमा का प्रचार काफी आक्रामक रहा। इसके अलावा ओपीएस और महिलाओं को पंद्रह सौ रुपये देने के कांग्रेस के वादों का भी यहाँ जमीनी असर दिखा। नतीजन अब कांग्रेस यहाँ जीत के दावे कर रही है। उधर, कांग्रेस से मौका न मिलने के बाद सुशील कौल ने राष्ट्रीय देवभूमि पार्टी का दामन थामा और चुनाव लड़ा। अब कौल कितने वोट ले जाते है और किसको कितना नुक्सान पहुंचाते है, इस पर भी सबकी निगाह है। बहरहाल नतीजा आठ तारीख को आएगा और यहाँ कांटे का मुकाबला अपेक्षित है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25850.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Jaisinghpur: Close contest expected, will Goma make a comeback?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/defection-and-rebellion-made-the-battle-of-banjar-interesting]]></guid>
                       <title><![CDATA[दलबदल और बगावत ने रोचक बनाई बंजार की जंग]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/defection-and-rebellion-made-the-battle-of-banjar-interesting]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 03 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[भाजपाई कांग्रेसी हो गए और कांग्रेस वाले भाजपाई। बंजार में इस बार सियासत रोमांच से गुलजार रही है। विधानसभा चुनाव से कुछ वक्त पहले भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और दो बार विधायक रहे खीमी राम ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। तो चुनाव के दौरान टिकट न मिलने से खफा होकर कांग्रेस के आदित्य विक्रम सिंह भाजपा में चले गए। आदित्य विक्रम सिंह वीरभद्र सरकार में मंत्री रहे स्व कर्ण सिंह के पुत्र है और 2017 में इस सीट से कांग्रेस प्रत्याशी थे। वे इस बार भी टिकट चाहते थे लेकिन पार्टी ने खीमी राम को तवज्जो दी जिसके बाद वे भाजपा में शामिल हो गए। वहीं भाजपा ने इस बार भी इस सीट से सीटिंग विधायक सुरेंद्र शौरी को ही टिकट दिया है।

बंजार की सियासत को समझने के लिए यहाँ का सियासी इतिहास भी समझना होगा। ये सीट भाजपा का गढ़ रही है और 1982 से 2017 तक हुए 9 विधानसभा चुनाव में यहाँ भाजपा 6 बार जीती है और कांग्रेस&nbsp; सिर्फ तीन बार। इस सीट पर महेश्वर सिंह ने 1977&nbsp; पर जनता पार्टी और 1982 में भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 1985 में कांग्रेस के सत्य प्रकाश जीते। 1990 में भाजपा ने यहाँ से कर्ण सिंह को टिकट दिया और वे जीत दर्ज करने में कामयाब रहे। इसके उपरांत 1993 में सत्य प्रकाश और 1998 में कर्ण सिंह जीते। पर 2003&nbsp; में भाजपा ने यहां से खीमीराम को टिकट दिया और पार्टी का ये दावं&nbsp; सही पड़ा। 2007 में भी खीमीराम ही जीते। इस बीच दो बार भाजपा के विधायक रहे कर्ण सिंह कांग्रेस में शामिल हो चुके थे और 2012 में वे कांग्रेस के टिकट पर चुनाव भी जीत गए। कर्ण सिंह मंत्री भी बने लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद कांग्रेस ने उनके पुत्र आदित्य विक्रम सिंह को टिकट दिया। उधर भाजपा ने भी खीमीराम का टिकट काटकर सुरेंद्र शौरी पर दांव खेला। तब शौरी चुनाव जीत गए।

अब मौजूदा चुनाव में सुरेंद्र शौरी का मुकाबला पूर्व भाजपाई खीमी राम से है जो कांग्रेस में शामिल हो चुके है। जहाँ आदित्य विक्रम के भाजपा में जाने का लाभ शौरी को मिल सकता है, वहीँ हितेश्वर सिंह की बगावत ने उनके समीकरण प्रभावित किये है। इस पर खीमीराम की इस क्षेत्र में अच्छी पकड़ है और उन्हें हल्का नहीं आँका जा सकता। सरकार के खिलाफ एंटी इंकमबैंसी के साथ-साथ ओपीएस और महंगाई जैसे चुनावी मुद्दों का लाभ भी उन्हें मिलता दिख रहा है। ऐसे में बंजार में रोचक मुकाबला तय है।

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">भाजपाई कांग्रेसी हो गए और कांग्रेस वाले भाजपाई। बंजार में इस बार सियासत रोमांच से गुलजार रही है। विधानसभा चुनाव से कुछ वक्त पहले भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और दो बार विधायक रहे खीमी राम ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। तो चुनाव के दौरान टिकट न मिलने से खफा होकर कांग्रेस के आदित्य विक्रम सिंह भाजपा में चले गए। आदित्य विक्रम सिंह वीरभद्र सरकार में मंत्री रहे स्व कर्ण सिंह के पुत्र है और 2017 में इस सीट से कांग्रेस प्रत्याशी थे। वे इस बार भी टिकट चाहते थे लेकिन पार्टी ने खीमी राम को तवज्जो दी जिसके बाद वे भाजपा में शामिल हो गए। वहीं भाजपा ने इस बार भी इस सीट से सीटिंग विधायक सुरेंद्र शौरी को ही टिकट दिया है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बंजार की सियासत को समझने के लिए यहाँ का सियासी इतिहास भी समझना होगा। ये सीट भाजपा का गढ़ रही है और 1982 से 2017 तक हुए 9 विधानसभा चुनाव में यहाँ भाजपा 6 बार जीती है और कांग्रेस&nbsp; सिर्फ तीन बार। इस सीट पर महेश्वर सिंह ने 1977&nbsp; पर जनता पार्टी और 1982 में भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 1985 में कांग्रेस के सत्य प्रकाश जीते। 1990 में भाजपा ने यहाँ से कर्ण सिंह को टिकट दिया और वे जीत दर्ज करने में कामयाब रहे। इसके उपरांत 1993 में सत्य प्रकाश और 1998 में कर्ण सिंह जीते। पर 2003&nbsp; में भाजपा ने यहां से खीमीराम को टिकट दिया और पार्टी का ये दावं&nbsp; सही पड़ा। 2007 में भी खीमीराम ही जीते। इस बीच दो बार भाजपा के विधायक रहे कर्ण सिंह कांग्रेस में शामिल हो चुके थे और 2012 में वे कांग्रेस के टिकट पर चुनाव भी जीत गए। कर्ण सिंह मंत्री भी बने लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद कांग्रेस ने उनके पुत्र आदित्य विक्रम सिंह को टिकट दिया। उधर भाजपा ने भी खीमीराम का टिकट काटकर सुरेंद्र शौरी पर दांव खेला। तब शौरी चुनाव जीत गए।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अब मौजूदा चुनाव में सुरेंद्र शौरी का मुकाबला पूर्व भाजपाई खीमी राम से है जो कांग्रेस में शामिल हो चुके है। जहाँ आदित्य विक्रम के भाजपा में जाने का लाभ शौरी को मिल सकता है, वहीँ हितेश्वर सिंह की बगावत ने उनके समीकरण प्रभावित किये है। इस पर खीमीराम की इस क्षेत्र में अच्छी पकड़ है और उन्हें हल्का नहीं आँका जा सकता। सरकार के खिलाफ एंटी इंकमबैंसी के साथ-साथ ओपीएस और महंगाई जैसे चुनावी मुद्दों का लाभ भी उन्हें मिलता दिख रहा है। ऐसे में बंजार में रोचक मुकाबला तय है।</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25849.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Defection and rebellion made the battle of Banjar interesting]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/baijnath-congress-confident-of-returning-to-pandit-santrams-bastion]]></guid>
                       <title><![CDATA[बैजनाथ : पंडित संतराम के गढ़ में कांग्रेस को वापसी का भरोसा]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/baijnath-congress-confident-of-returning-to-pandit-santrams-bastion]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 03 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[90 के दशक में कांगड़ा की सियासत में बैजनाथ विधानसभा क्षेत्र की तूती बोला करती थी। दरअसल ये वीरभद्र सरकार में मंत्री रहे दिग्गज नेता पंडित संत राम का गढ़ रहा है। पंडित संत राम यहाँ से 6 बार विधायक रहे। पहले यहां पंडित संत राम का बोल बाला रहा और फिर उनके बेटे और कांग्रेस नेता सुधीर शर्मा का। हालाँकि 2008 में ये सीट रिज़र्व हो गई और सुधीर शर्मा ने इसके बाद धर्मशाला को अपना चुनाव क्षेत्र बना लिया।

पंडित संत राम इस सीट से 1972 से 1985&nbsp; तक लगातार चार चुनाव जीते। हालांकि 1990 की भाजपा लहर में वे हार गए। पर 1993 और 1998 में उन्होंने फिर जीत दर्ज की। इसके बाद पंडित संतराम का निधन हो गया और बैजनाथ में उपचुनाव हुआ। पंडित संतराम कांग्रेस के एक ऐसे नेता थे जिन्हें बैजनाथ की जनता कभी नहीं भूल सकती। पर उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके बेटे सुधीर शर्मा को पराजय का मुंह देखना पड़ा था। तब&nbsp; जनता ने दूलो राम को जीतवाकर विधानसभा भेजा। 2003 में सुधीर ने वापसी की और 2007 में वे दूसरी बार विधायक बने।
&nbsp;
2012 के चुनाव से पहले बैजनाथ सीट आरक्षित हो गई थी और तब कांग्रेस नेता किशोरी लाल ग्राम पंचायत प्रधान से विधायक बने। किशोरी लाल को सुधीर शर्मा का पूरा समर्थन था। पर पांच साल बाद 2017 में ही जनता का मोहभंग हो गया और भाजपा के मुल्खराज विधायक बने। इस बार कांग्रेस ने फिर यहाँ किशोरी लाल और भाजपा ने फिर से सीटिंग विधायक मुल्खराज प्रेमी को मैदान में उतारा है। अब देखना ये है कि क्या कांग्रेस फिर से एक बार अपने गढ़ पर कब्जा जमा पाएगी या जनता दोबारा से भाजपा के प्रत्याशी पर अपना वोट रूपी आशीर्वाद बरसाएगी। बहरहाल कांग्रेस यहाँ वापसी को लेकर आश्वस्त जरूर दिख रही है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">90 के दशक में कांगड़ा की सियासत में बैजनाथ विधानसभा क्षेत्र की तूती बोला करती थी। दरअसल ये वीरभद्र सरकार में मंत्री रहे दिग्गज नेता पंडित संत राम का गढ़ रहा है। पंडित संत राम यहाँ से 6 बार विधायक रहे। पहले यहां पंडित संत राम का बोल बाला रहा और फिर उनके बेटे और कांग्रेस नेता सुधीर शर्मा का। हालाँकि 2008 में ये सीट रिज़र्व हो गई और सुधीर शर्मा ने इसके बाद धर्मशाला को अपना चुनाव क्षेत्र बना लिया।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">पंडित संत राम इस सीट से 1972 से 1985&nbsp; तक लगातार चार चुनाव जीते। हालांकि 1990 की भाजपा लहर में वे हार गए। पर 1993 और 1998 में उन्होंने फिर जीत दर्ज की। इसके बाद पंडित संतराम का निधन हो गया और बैजनाथ में उपचुनाव हुआ। पंडित संतराम कांग्रेस के एक ऐसे नेता थे जिन्हें बैजनाथ की जनता कभी नहीं भूल सकती। पर उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके बेटे सुधीर शर्मा को पराजय का मुंह देखना पड़ा था। तब&nbsp; जनता ने दूलो राम को जीतवाकर विधानसभा भेजा। 2003 में सुधीर ने वापसी की और 2007 में वे दूसरी बार विधायक बने।<br />
&nbsp;<br />
2012 के चुनाव से पहले बैजनाथ सीट आरक्षित हो गई थी और तब कांग्रेस नेता किशोरी लाल ग्राम पंचायत प्रधान से विधायक बने। किशोरी लाल को सुधीर शर्मा का पूरा समर्थन था। पर पांच साल बाद 2017 में ही जनता का मोहभंग हो गया और भाजपा के मुल्खराज विधायक बने। इस बार कांग्रेस ने फिर यहाँ किशोरी लाल और भाजपा ने फिर से सीटिंग विधायक मुल्खराज प्रेमी को मैदान में उतारा है। अब देखना ये है कि क्या कांग्रेस फिर से एक बार अपने गढ़ पर कब्जा जमा पाएगी या जनता दोबारा से भाजपा के प्रत्याशी पर अपना वोट रूपी आशीर्वाद बरसाएगी। बहरहाल कांग्रेस यहाँ वापसी को लेकर आश्वस्त जरूर दिख रही है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25847.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Baijnath: Congress confident of returning to Pandit Santram's bastion]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/bail-was-forfeited-in-2017-is-congress-coming-to-dehra-this-time]]></guid>
                       <title><![CDATA[2017 में हुई थी जमानत जब्त, क्या इस बार देहरा में कांग्रेस आ रही है ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/bail-was-forfeited-in-2017-is-congress-coming-to-dehra-this-time]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 02 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[कहते है, देहरा कोई नहीं तेरा। पर विधायक बनने की चाह इस बार अच्छे अच्छों को देहरा खींच कर ले गई। नतीजन इस बार देहरा का चुनाव बेहद रोचक है। कौन जीतेगा, कौन हारेगा, ये तो आठ दिसम्बर को पता चलेगा, लेकिन मुमकिन है इस बार देहरा में परफेक्ट बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिले। शुरुआत भाजपा से करते है। भाजपा प्रत्याशी रमेश धवाला अपना पुराना निर्वाचन क्षेत्र ज्वालामुखी छोड़कर चुनाव लड़ने देहरा पहुंचे है। हालाँकि धवाला का घर देहरा निर्वाचन क्षेत्र में आता है लेकिन उनकी कर्म भूमि ज्वालामुखी ही रही है। ऐसे में बेशक धवाला वापस घाट लौट आये हो लेकिन घरवालों ने भी क्या वोटों से उनका स्वागत किया है, ये फिलवक्त बड़ा सवाल है।&nbsp;

वहीं कांगड़ा में किस्मत आजमाने के बाद कांग्रेस नेता डॉ राजेश शर्मा ने तो देहरा में घर भी बना लिया। जैसा अपेक्षित था डॉक्टर साहब ही इस बार देहरा से कांग्रेस उम्मीदवार रहे। पिछले चुनाव में कांग्रेस के तरफ से देहरा में वरिष्ठ नेता विप्लव ठाकुर मैदान में थी और उनकी जमानत जब्त हुई थी। पर इस बार ऐसे हाल नहीं है और राजेश शर्मा की दावेदारी दमदार दिख रही है। इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आठ दिसंबर को देहरा में कांग्रेस की वापसी हो।&nbsp;&nbsp;

देहरा में तीसरा और अहम नाम है होशियार सिंह का। चुनाव से पहले देहरा से निर्दलीय विधायक होशियार सिंह भाजपा में शामिल हुए। इसे भाजपा की बड़ी जीत के तौर पर देखा गया और लग रहा था मानों इस बार देहरा से होशियार सिंह ही भाजपा के प्रत्याशी होंगे। मगर भाजपा ने होशियार सिंह को गच्चा दे दिया। पार्टी ने होशियार सिंह नहीं बल्कि रमेश धवाला को टिकट दिया और होशियार सिंह को एक बार फिर से बतौर निर्दलीय मैदान में उतरना पड़ा। होशियार सिंह इस बार भी दोनों ही राजनैतिक दलों को कड़ी टक्कर देते हुए दिखाई दे रहे है और देहरा में मुकाबला रोचक हो चला है।

देहरा के चुनाव में दो नामो का जिक्र और जरूरी है। एक है निर्दलीय चुनाव लाडे वरुण कुमार और दूसरे है आम आदमी पार्टी के प्रत्यशी कर्नल मनीष। माहिर मान रहे है कि ये दोनों भी इस चुनाव में अपनी उपस्तिथि दर्ज करवाने में कामयाब रहे है और इनके द्वारा लिए गए वोट इस चुनाव में जीत-हार के समीकरण बदल सकते है। विशेषकर वरुण कुमार पर निगाह रहने वाली है कि उन्होंने कहाँ और कितनी सेंध लगाईं है।कुल मिलाकर इस बार देहरा का चुनाव बेहद रोचक है और यहाँ नतीजों से पहले जीत हार को लेकर कयासबाजी चरम पर है। आठ दिसम्बर को नतीजा आएगा और ये देखना&nbsp;भी रोचक होगा कि&nbsp;क्या धवाला को यहाँ से चुनाव लड़वाने का भाजपा का दाव उल्टा पड़ने वाला है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कहते है, देहरा कोई नहीं तेरा। पर विधायक बनने की चाह इस बार अच्छे अच्छों को देहरा खींच कर ले गई। नतीजन इस बार देहरा का चुनाव बेहद रोचक है। कौन जीतेगा, कौन हारेगा, ये तो आठ दिसम्बर को पता चलेगा, लेकिन मुमकिन है इस बार देहरा में परफेक्ट बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिले। शुरुआत भाजपा से करते है। भाजपा प्रत्याशी रमेश धवाला अपना पुराना निर्वाचन क्षेत्र ज्वालामुखी छोड़कर चुनाव लड़ने देहरा पहुंचे है। हालाँकि धवाला का घर देहरा निर्वाचन क्षेत्र में आता है लेकिन उनकी कर्म भूमि ज्वालामुखी ही रही है। ऐसे में बेशक धवाला वापस घाट लौट आये हो लेकिन घरवालों ने भी क्या वोटों से उनका स्वागत किया है, ये फिलवक्त बड़ा सवाल है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">वहीं कांगड़ा में किस्मत आजमाने के बाद कांग्रेस नेता डॉ राजेश शर्मा ने तो देहरा में घर भी बना लिया। जैसा अपेक्षित था डॉक्टर साहब ही इस बार देहरा से कांग्रेस उम्मीदवार रहे। पिछले चुनाव में कांग्रेस के तरफ से देहरा में वरिष्ठ नेता विप्लव ठाकुर मैदान में थी और उनकी जमानत जब्त हुई थी। पर इस बार ऐसे हाल नहीं है और राजेश शर्मा की दावेदारी दमदार दिख रही है। इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आठ दिसंबर को देहरा में कांग्रेस की वापसी हो।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">देहरा में तीसरा और अहम नाम है होशियार सिंह का। चुनाव से पहले देहरा से निर्दलीय विधायक होशियार सिंह भाजपा में शामिल हुए। इसे भाजपा की बड़ी जीत के तौर पर देखा गया और लग रहा था मानों इस बार देहरा से होशियार सिंह ही भाजपा के प्रत्याशी होंगे। मगर भाजपा ने होशियार सिंह को गच्चा दे दिया। पार्टी ने होशियार सिंह नहीं बल्कि रमेश धवाला को टिकट दिया और होशियार सिंह को एक बार फिर से बतौर निर्दलीय मैदान में उतरना पड़ा। होशियार सिंह इस बार भी दोनों ही राजनैतिक दलों को कड़ी टक्कर देते हुए दिखाई दे रहे है और देहरा में मुकाबला रोचक हो चला है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">देहरा के चुनाव में दो नामो का जिक्र और जरूरी है। एक है निर्दलीय चुनाव लाडे वरुण कुमार और दूसरे है आम आदमी पार्टी के प्रत्यशी कर्नल मनीष। माहिर मान रहे है कि ये दोनों भी इस चुनाव में अपनी उपस्तिथि दर्ज करवाने में कामयाब रहे है और इनके द्वारा लिए गए वोट इस चुनाव में जीत-हार के समीकरण बदल सकते है। विशेषकर वरुण कुमार पर निगाह रहने वाली है कि उन्होंने कहाँ और कितनी सेंध लगाईं है।कुल मिलाकर इस बार देहरा का चुनाव बेहद रोचक है और यहाँ नतीजों से पहले जीत हार को लेकर कयासबाजी चरम पर है। आठ दिसम्बर को नतीजा आएगा और ये देखना&nbsp;भी रोचक होगा कि&nbsp;क्या धवाला को यहाँ से चुनाव लड़वाने का भाजपा का दाव उल्टा पड़ने वाला है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25840.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Bail was forfeited in 2017, is Congress coming to Dehra this time?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/father-son-won-9-elections-is-chauhan-in-shillai-this-time-too]]></guid>
                       <title><![CDATA[पिता-पुत्र ने जीते 9 चुनाव, क्या शिलाई में इस बार भी चौहान ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/father-son-won-9-elections-is-chauhan-in-shillai-this-time-too]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 02 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[शिलाई विधानसभा सीट पर अब तक हुए 11 विधानसभा चुनाव में से 9 बार एक ही परिवार ने राज किया है। ये सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। इस सीट पर गुमान सिंह चौहान का दबदबा रहा है और गुमान सिंह के बाद उनकी सियासत की विरासत को उनके बेटे हर्षवर्धन सिंह चौहान ने आगे बढ़ाया है। दिलचस्प बात ये है कि इस सीट पर गुमान सिंह चौहान अपराजित रहे। वे 1972 से 1985 तक लगातार चार चुनाव जीते। फिर 1990&nbsp; में इस सीट से उनके बेटे हर्षवर्धन चौहान ने चुनाव लड़ा लेकिन तब भाजपा-जनता दल की लहर में वे अपना पहला चुनाव ही हार गए। पर इसके बाद 1993&nbsp; से 2007 तक हर्षवर्धन फिर जीतते रहे। 2012 में हर्षवर्धन दूसरी बार चुनाव हारे, हालांकि 2017 में वे फिर जितने में कामयाब रहे।

अब पांच बार विधायक रहे हर्षवर्धन आठवीं बार इस सीट से मैदान में है और अपनी छठी जीत को लेकर आश्वस्त भी। उनका सामना हुआ है भाजपा के बदलेव तोमर से, वो ही बलदेव तोमर जिन्होंने 2012 में हर्षवर्धन को पटकनी दी थी। हालांकि इसके बाद 2017&nbsp; में बलदेव हारे थे लेकिन इस बार भाजपा भी आश्वस्त है कि बलदेव फिर बल दिखाएंगे।&nbsp;दरअसल इस बार हाटी फैक्टर ने शिलाई के सियासी समीकरण पूरी तरह से बदल दिए है।

हाटी समुदाय को जनजातीय दर्जा देने के फैसले का इस विधानसभा क्षेत्र में सीधा असर है।&nbsp; जानकारी के अनुसार इस विधानसभा क्षेत्र में 58 पंचायतों के 95 गांवों के 66,775 लोग इससे प्रभावित होते है। पर इस विधानसभा क्षेत्र में 30,450 एससी समुदाय के लोग भी है, जो इस फैसले से नाखुश दिखे है। पर भाजपा ने इन्हें इसके दायरे से बाहर रखने का आश्वान देते हुए इन्हें साधने का भी प्रयास किया है। इस चुनाव में भाजपा ने मुद्दे को जमकर भुनाने की कोशिश की है। बाकायदा सतौन में गृह मंत्री अमित शाह का कार्यक्रम आयोजित करवाया गया। पर इसका कितना चुनावी लाभ भाजपा को मिला, ये तो नतीजे ही तय करेंगे।&nbsp;&nbsp;

शिलाई का चुनाव इस बार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्यों कि हर्षवर्धन के लिए ये सिर्फ विधायक बनने का चुनाव नहीं है। दरअसल हर्षवर्धन चौहान भी मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में शामिल है। अगर वे मुख्यमंत्री नहीं भी बनते तो भी उन्हें अहम् दायित्व मिलना तय है।&nbsp;बहरहाल मुख्यमंत्री पद की आस बरकरार रखने के लिए पहले हर्षवर्धन का विधायक बनना जरूरी है। मतदान हो चूका है और शिलाई विधानसभा सीट पर मुकाबला कांटे का दिख रहा है। फिलहाल नतीजों के लिए 8 दिसम्बर का इंतज़ार जारी है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शिलाई विधानसभा सीट पर अब तक हुए 11 विधानसभा चुनाव में से 9 बार एक ही परिवार ने राज किया है। ये सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। इस सीट पर गुमान सिंह चौहान का दबदबा रहा है और गुमान सिंह के बाद उनकी सियासत की विरासत को उनके बेटे हर्षवर्धन सिंह चौहान ने आगे बढ़ाया है। दिलचस्प बात ये है कि इस सीट पर गुमान सिंह चौहान अपराजित रहे। वे 1972 से 1985 तक लगातार चार चुनाव जीते। फिर 1990&nbsp; में इस सीट से उनके बेटे हर्षवर्धन चौहान ने चुनाव लड़ा लेकिन तब भाजपा-जनता दल की लहर में वे अपना पहला चुनाव ही हार गए। पर इसके बाद 1993&nbsp; से 2007 तक हर्षवर्धन फिर जीतते रहे। 2012 में हर्षवर्धन दूसरी बार चुनाव हारे, हालांकि 2017 में वे फिर जितने में कामयाब रहे।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अब पांच बार विधायक रहे हर्षवर्धन आठवीं बार इस सीट से मैदान में है और अपनी छठी जीत को लेकर आश्वस्त भी। उनका सामना हुआ है भाजपा के बदलेव तोमर से, वो ही बलदेव तोमर जिन्होंने 2012 में हर्षवर्धन को पटकनी दी थी। हालांकि इसके बाद 2017&nbsp; में बलदेव हारे थे लेकिन इस बार भाजपा भी आश्वस्त है कि बलदेव फिर बल दिखाएंगे।&nbsp;दरअसल इस बार हाटी फैक्टर ने शिलाई के सियासी समीकरण पूरी तरह से बदल दिए है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हाटी समुदाय को जनजातीय दर्जा देने के फैसले का इस विधानसभा क्षेत्र में सीधा असर है।&nbsp; जानकारी के अनुसार इस विधानसभा क्षेत्र में 58 पंचायतों के 95 गांवों के 66,775 लोग इससे प्रभावित होते है। पर इस विधानसभा क्षेत्र में 30,450 एससी समुदाय के लोग भी है, जो इस फैसले से नाखुश दिखे है। पर भाजपा ने इन्हें इसके दायरे से बाहर रखने का आश्वान देते हुए इन्हें साधने का भी प्रयास किया है। इस चुनाव में भाजपा ने मुद्दे को जमकर भुनाने की कोशिश की है। बाकायदा सतौन में गृह मंत्री अमित शाह का कार्यक्रम आयोजित करवाया गया। पर इसका कितना चुनावी लाभ भाजपा को मिला, ये तो नतीजे ही तय करेंगे।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शिलाई का चुनाव इस बार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्यों कि हर्षवर्धन के लिए ये सिर्फ विधायक बनने का चुनाव नहीं है। दरअसल हर्षवर्धन चौहान भी मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में शामिल है। अगर वे मुख्यमंत्री नहीं भी बनते तो भी उन्हें अहम् दायित्व मिलना तय है।&nbsp;बहरहाल मुख्यमंत्री पद की आस बरकरार रखने के लिए पहले हर्षवर्धन का विधायक बनना जरूरी है। मतदान हो चूका है और शिलाई विधानसभा सीट पर मुकाबला कांटे का दिख रहा है। फिलहाल नतीजों के लिए 8 दिसम्बर का इंतज़ार जारी है।</span></p>
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                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25838.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Father-son won 9 elections, is Chauhan in Shillai this time too?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-jairam-thakur-win-with-a-record-margin]]></guid>
                       <title><![CDATA[क्या रिकॉर्ड अंतर से जीतेंगे जयराम ठाकुर ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-jairam-thakur-win-with-a-record-margin]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 02 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&quot;जयराम ठाकुर ने सिर्फ सिराज का विकास किया है, उनके राज में सिर्फ सिराज में ही काम हुआ है।&quot;... ये हम नहीं कह रहे है ये तो कांग्रेस कहती आ रही है। अक्सर कांग्रेस जयराम ठाकुर को सिर्फ सिराज का मुख्यमंत्री कहती रही है। यानी एक किस्म से कांग्रेस भी मानती रही है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने सिराज में विकास के काम करवाएं है। ऐसे में अगर सिराज की जनता ने विकास के नाम पर वोट किया है, तो नतीजा क्या होगा ये सभी जानते है। वैसे भी सिराज की जनता ने 1998 से जयराम ठाकुर की ही जय बोली है। पांच बार के विधायक और मौजूदा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर अब यहाँ से जीत का छक्का लगाने को लेकर आश्वस्त है। उधर कांग्रेस ने उनके मुकाबले चेतराम को मैदान में उतारा है।

सिराज सीट का इतिहास बेहद रोचक है। 2008 के परिसीमन से पहले ये सीट चच्योट के नाम से जानी जाती थी। ये टेरिटोरियल काउंसिल के अध्यक्ष रहे ठाकुर कर्म सिंह का भी निर्वाचन क्षेत्र रहा है। वे यहाँ से 1967 और 1972 में विधायक रहे। ठाकुर कर्म सिंह डा. परमार की कैबिनेट में वित्त मंत्री थे। वे विधानसभा अध्यक्ष के अलावा विभिन्न विभागों के मंत्री भी रहे। पर दिलचस्प बात ये है कि वर्ष 1962 में ठाकुर कर्म सिंह मुख्यमंत्री पद के भी दावेदार थे। माना जाता है कि उस वक्त अधिकांश विधायकों का समर्थन भी उनके साथ था। बावजूद इसके वे डॉ. यशवंत सिंह परमार से इस दौड़ में पिछड़ गए।

ठाकुर कर्म सिंह के अलावा यहाँ की सियासत में दूसरा बड़ा नाम रहा मोती राम का जो चार बार विधायक बने। मोती राम 1977 में जनता पार्टी से जीते, 1982&nbsp; में निर्दलीय, 1990&nbsp; में जनता दल से और 1993 में कांग्रेस से। वह परिवहन व कृषि मंत्री रहे। जयराम ठाकुर अपना पहला चुनाव 1993 में मोतीराम के खिलाफ ही हारे थे। सिराज के सियासी अतीत का जिक्र करते हुए पंडित शिवलाल का जिक्र भी जरूरी है। वे 1985 में कांग्रेस के विधायक बने। उन्होंने प्रदेश में सहकारिता आंदोलन को बढ़ावा दिया और वह प्रदेश राज्य सहकारी बैंक और भूमि विकास बैंक के अध्यक्ष भी रहे। बाद में उन्होंने सीडी सहकारी बैंक की स्थापना की। इसमें सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला हुआ है। बहरहाल मौजूदा स्थिति पर लौटते है। 1998 से लगातार यहाँ चुनाव जीतते आ रहे जयराम ठाकुर जीतेंगे या नहीं, राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा नहीं है। चर्चा दरअसल ये है कि जयराम ठाकुर कितने वोटों से जीतेंगे। क्या जयराम इस बार रिकॉर्ड अंतर से ये सीट अपने&nbsp; नाम करेंगे। बहरहाल जनता अपना वर्डिक्ट दे चुकी है और सभी सवालों का जवाब आठ दिसम्बर को मिलेगा।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>&quot;जयराम ठाकुर ने सिर्फ सिराज का विकास किया है, उनके राज में सिर्फ सिराज में ही काम हुआ है।&quot;... </strong>ये हम नहीं कह रहे है ये तो कांग्रेस कहती आ रही है। अक्सर कांग्रेस जयराम ठाकुर को सिर्फ सिराज का मुख्यमंत्री कहती रही है। यानी एक किस्म से कांग्रेस भी मानती रही है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने सिराज में विकास के काम करवाएं है। ऐसे में अगर सिराज की जनता ने विकास के नाम पर वोट किया है, तो नतीजा क्या होगा ये सभी जानते है। वैसे भी सिराज की जनता ने 1998 से जयराम ठाकुर की ही जय बोली है। पांच बार के विधायक और मौजूदा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर अब यहाँ से जीत का छक्का लगाने को लेकर आश्वस्त है। उधर कांग्रेस ने उनके मुकाबले चेतराम को मैदान में उतारा है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">सिराज सीट का इतिहास बेहद रोचक है। 2008 के परिसीमन से पहले ये सीट चच्योट के नाम से जानी जाती थी। ये टेरिटोरियल काउंसिल के अध्यक्ष रहे ठाकुर कर्म सिंह का भी निर्वाचन क्षेत्र रहा है। वे यहाँ से 1967 और 1972 में विधायक रहे। ठाकुर कर्म सिंह डा. परमार की कैबिनेट में वित्त मंत्री थे। वे विधानसभा अध्यक्ष के अलावा विभिन्न विभागों के मंत्री भी रहे। पर दिलचस्प बात ये है कि वर्ष 1962 में ठाकुर कर्म सिंह मुख्यमंत्री पद के भी दावेदार थे। माना जाता है कि उस वक्त अधिकांश विधायकों का समर्थन भी उनके साथ था। बावजूद इसके वे डॉ. यशवंत सिंह परमार से इस दौड़ में पिछड़ गए।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ठाकुर कर्म सिंह के अलावा यहाँ की सियासत में दूसरा बड़ा नाम रहा मोती राम का जो चार बार विधायक बने। मोती राम 1977 में जनता पार्टी से जीते, 1982&nbsp; में निर्दलीय, 1990&nbsp; में जनता दल से और 1993 में कांग्रेस से। वह परिवहन व कृषि मंत्री रहे। जयराम ठाकुर अपना पहला चुनाव 1993 में मोतीराम के खिलाफ ही हारे थे। सिराज के सियासी अतीत का जिक्र करते हुए पंडित शिवलाल का जिक्र भी जरूरी है। वे 1985 में कांग्रेस के विधायक बने। उन्होंने प्रदेश में सहकारिता आंदोलन को बढ़ावा दिया और वह प्रदेश राज्य सहकारी बैंक और भूमि विकास बैंक के अध्यक्ष भी रहे। बाद में उन्होंने सीडी सहकारी बैंक की स्थापना की। इसमें सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला हुआ है। बहरहाल मौजूदा स्थिति पर लौटते है। 1998 से लगातार यहाँ चुनाव जीतते आ रहे जयराम ठाकुर जीतेंगे या नहीं, राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा नहीं है। चर्चा दरअसल ये है कि जयराम ठाकुर कितने वोटों से जीतेंगे। क्या जयराम इस बार रिकॉर्ड अंतर से ये सीट अपने&nbsp; नाम करेंगे। बहरहाल जनता अपना वर्डिक्ट दे चुकी है और सभी सवालों का जवाब आठ दिसम्बर को मिलेगा।</span></p>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[Will Jairam Thakur win with a record margin?]]></media:description>
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                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-kajal-become-the-noor-of-kangra-again]]></guid>
                       <title><![CDATA[क्या काजल फिर बनेंगे कांगड़ा का नूर ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-kajal-become-the-noor-of-kangra-again]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 02 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[काँगड़ा विधानसभा क्षेत्र में इस बार गजब की सियासत देखने को मिली है। यहां कौन भाजपाई है और कौन कांग्रेसी, समझना बड़ा मुश्किल हो गया। चुनाव से पहले नेताओं ने पार्टियां भी बदली और विचारधाराएं भी। यहां कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष और सीटिंग विधायक काजल चुनाव से पहले भाजपा के हो गए और भाजपाई खेमे से चौधरी सुरेंद्र काकू ने कांग्रेस में घर वापसी कर ली। पवन काजल काँगड़ा से दो बार विधायक रहे है। 2012 में काजल निर्दलीय चुनाव जीत कर विधायक बने और 2017 में काजल कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ कर विधानसभा पहुंचे। इस बार कांग्रेस ने काजल को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया और काजल ने चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। काजल भाजपा में शामिल हुए और चुनाव भी भाजपा टिकट पर ही लड़ा। हालांकि काजल को टिकट देने पर भाजपा मंडल ने उनका कड़ा विरोध किया, कुछ नेताओं को मना लिया गया लेकिन कुछ नेता आखिर तक नही माने। भाजपा से नाराज़ होकर कुलभाष चौधरी ने इस दफा आजाद चुनाव लड़ा है। वहीं कांग्रेस ने इस बार&nbsp; पूर्व विधायक चौधरी सुरेंद्र काकू को मैदान में उतारा है।&nbsp;&nbsp;

काँगड़ा विधानसभा सीट के अतीत पर निगाह डाले तो यहां 1982 से 1990 तक भाजपा के विद्यासागर चौधरी ने जीत की हैट्रिक लगाई है। 1993 में यहाँ कांग्रेस के दौलत राम को जीत मिली थी, लेकिन पांच साल बाद 1998 में विद्यासागर चौधरी ने फिर इस सीट को भाजपा की झोली में डाला। 2003 में कांग्रेस के सुरिंदर काकू ने यहाँ जीत दर्ज की। 2007 में सत्ता परिवर्तन हुआ और बसपा के संजय चौधरी ने यहाँ जीत का परचम लहराया। फिर 2012 में निर्दलीय रहे पवन काजल ने यहां जीत हासिल की और पिछले विधानसभा चुनाव यानि 2017 में पवन काजल ने कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा और जीता भी। इस बार भी काँगड़ा सीट पर काजल सहज दिख रहे है। पवन काजल अपने क्षेत्र में लोकप्रिय नेता है। ऐसे में जाहिर है काजल को लेकर किसी तरह की कोई नाराज़गी भी नहीं दिखती है। विरोध के बावजूद काजल अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है। अगर काजल जीते तो वे तीसरी बार विधायक बनेंगे और दिलचस्प बात ये है कि वे अलग-अलग सिंबल से चुनाव लड़ कर जीत की हैट्रिक लगाने वाले विधायक होंगे। उधर कांग्रेस, भाजपा की बगावत और संभावित भीतरघात में जीत की किरण देख रही है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">काँगड़ा विधानसभा क्षेत्र में इस बार गजब की सियासत देखने को मिली है। यहां कौन भाजपाई है और कौन कांग्रेसी, समझना बड़ा मुश्किल हो गया। चुनाव से पहले नेताओं ने पार्टियां भी बदली और विचारधाराएं भी। यहां कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष और सीटिंग विधायक काजल चुनाव से पहले भाजपा के हो गए और भाजपाई खेमे से चौधरी सुरेंद्र काकू ने कांग्रेस में घर वापसी कर ली। पवन काजल काँगड़ा से दो बार विधायक रहे है। 2012 में काजल निर्दलीय चुनाव जीत कर विधायक बने और 2017 में काजल कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ कर विधानसभा पहुंचे। इस बार कांग्रेस ने काजल को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया और काजल ने चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। काजल भाजपा में शामिल हुए और चुनाव भी भाजपा टिकट पर ही लड़ा। हालांकि काजल को टिकट देने पर भाजपा मंडल ने उनका कड़ा विरोध किया, कुछ नेताओं को मना लिया गया लेकिन कुछ नेता आखिर तक नही माने। भाजपा से नाराज़ होकर कुलभाष चौधरी ने इस दफा आजाद चुनाव लड़ा है। वहीं कांग्रेस ने इस बार&nbsp; पूर्व विधायक चौधरी सुरेंद्र काकू को मैदान में उतारा है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">काँगड़ा विधानसभा सीट के अतीत पर निगाह डाले तो यहां 1982 से 1990 तक भाजपा के विद्यासागर चौधरी ने जीत की हैट्रिक लगाई है। 1993 में यहाँ कांग्रेस के दौलत राम को जीत मिली थी, लेकिन पांच साल बाद 1998 में विद्यासागर चौधरी ने फिर इस सीट को भाजपा की झोली में डाला। 2003 में कांग्रेस के सुरिंदर काकू ने यहाँ जीत दर्ज की। 2007 में सत्ता परिवर्तन हुआ और बसपा के संजय चौधरी ने यहाँ जीत का परचम लहराया। फिर 2012 में निर्दलीय रहे पवन काजल ने यहां जीत हासिल की और पिछले विधानसभा चुनाव यानि 2017 में पवन काजल ने कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा और जीता भी। इस बार भी काँगड़ा सीट पर काजल सहज दिख रहे है। पवन काजल अपने क्षेत्र में लोकप्रिय नेता है। ऐसे में जाहिर है काजल को लेकर किसी तरह की कोई नाराज़गी भी नहीं दिखती है। विरोध के बावजूद काजल अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है। अगर काजल जीते तो वे तीसरी बार विधायक बनेंगे और दिलचस्प बात ये है कि वे अलग-अलग सिंबल से चुनाव लड़ कर जीत की हैट्रिक लगाने वाले विधायक होंगे। उधर कांग्रेस, भाजपा की बगावत और संभावित भीतरघात में जीत की किरण देख रही है।</span></p>
]]></content:encoded>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[Will Kajal become the Noor of Kangra again?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-rajat-be-able-to-maintain-mahendra-singhs-magic]]></guid>
                       <title><![CDATA[क्या महेंद्र सिंह का तिलिस्म बरकरार रख पाएंगे रजत !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-rajat-be-able-to-maintain-mahendra-singhs-magic]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 02 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[1990 की शांता लहर में इस सीट से एक निर्दलीय उम्मीदवार जीता। फिर 1993 में कांग्रेस जीती, 1998 में हिमाचल विकास कांग्रेस, 2003 में लोकतांत्रिक मोर्चा और 2007, 2012 और 2017 में भाजपा। हम बात कर रहे है जिला मंडी के धर्मपुर निर्वाचन क्षेत्र की। खास बात ये नहीं है कि पिछले सात चुनाव में यहाँ की जनता पांच अलग अलग चुनाव चिन्ह के साथ गई है, खास ये है कि चिन्ह कोई भी रहा हो उम्मीदवार हर मौके पर एक ही रहा है। ये नेता है महेंद्र सिंह ठाकुर। शायद ही कोई और नेता ऐसा हो जो अपने राजनीतिक जीवन के सात चुनाव में से पांच अलग-अलग सिंबल पर जीता हो। दिलचस्प बात ये है कि 1990&nbsp; से 2003&nbsp;तक हर बार महेंद्र सिंह ठाकुर की राजनीतिक निष्ठा बदली, पर बावजूद इसके वे जीते। दल बेशक बदलते रहे लेकिन जनता का भरोसा महेंद्र सिंह पर बरकरार रहा है। हालांकि पिछले तीन चुनाव वे भारतीय जनता पार्टी से ही जीते है। इस बार वे लम्बे अर्से बाद चुनावी मैदान में नहीं है और उनकी सीट से अब उनके बेटे रजत ठाकुर ने चुनाव लड़ा है।&nbsp;&nbsp;

इसे महेंद्र सिंह ठाकुर का सियासी तिलिस्म ही कहेंगे कि वे जयराम कैबिनेट के सबसे शक्तिशाली मंत्री माने जाते है। कोई उन्हें नंबर टू कहता है तो कोई पर्दे के पीछे का सीएम। दिलचस्प बात ये है कि इस बार महेंद्र सिंह अपने बेटे रजत ठाकुर के लिए टिकट मांग रहे थे और माहिर मानते थे कि परिवारवाद के नाम पर कांग्रेस को अक्सर घेरने वाली भाजपा ऐसा नहीं कर पायेगी। पर भाजपा ने रजत ठाकुर को टिकट दे दिया, इससे महेंद्र सिंह&nbsp;ठाकुर के रसूख का अंदाज लगाया जा सकता है। वैसे बता दें कि इस सीट से नरेंद्र अत्रि भी टिकट के प्रबल दावेदार थे।&nbsp;बहरहाल टिकट तो रजत ले आएं लेकिन इस बार धर्मपुर की जंग दिलचस्प दिख रही है। कांग्रेस ने तो यहाँ दमखम से चुनाव लड़ा ही है, भाजपा के भीतर भी सब कुछ कण्ट्रोल में है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। अब धर्मपुर की&nbsp; सियासत के सिकंदर रहे महेंद्र सिंह के बेटे का मुक्कदर ईवीएम में कैद हो चुका है और आठ दिसम्बर को नतीजा सामने होगा।
&nbsp;
उधर कांग्रेस को इस सीट पर अंतिम बार 1993 में जीत मिली थी और दिलचस्प बात ये है कि तब कांग्रेस उम्मीदवार थे महेंद्र सिंह ठाकुर। इसके बाद हुए पांच चुनाव में कांग्रेस ने महेंद्र सिंह के आगे पानी नहीं मांगा। बीते तीन चुनाव पर नज़र डाले तो 2007 में पार्टी यहाँ दस हज़ार वोट से हारी। 2012 में पार्टी ने बेहतर किया और ये अंतर करीब एक हजार वोट का रह गया, पर 2017 में फिर बढ़कर करीब दस हजार पहुंच गया। तीनों मर्तबा पार्टी के कैंडिडेट थे चंद्रशेखर। इस बार फिर पार्टी ने चंद्रशेखर को ही मौका दिया है। चंद्रशेखर को लेकर इस बार थोड़ी सहानुभूति भी दिखी है। ऐसे में यहाँ अर्से बार कांग्रेस वापसी की उम्मीद में है।&nbsp;&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">1990 की शांता लहर में इस सीट से एक निर्दलीय उम्मीदवार जीता। फिर 1993 में कांग्रेस जीती, 1998 में हिमाचल विकास कांग्रेस, 2003 में लोकतांत्रिक मोर्चा और 2007, 2012 और 2017 में भाजपा। हम बात कर रहे है जिला मंडी के धर्मपुर निर्वाचन क्षेत्र की। खास बात ये नहीं है कि पिछले सात चुनाव में यहाँ की जनता पांच अलग अलग चुनाव चिन्ह के साथ गई है, खास ये है कि चिन्ह कोई भी रहा हो उम्मीदवार हर मौके पर एक ही रहा है। ये नेता है महेंद्र सिंह ठाकुर। शायद ही कोई और नेता ऐसा हो जो अपने राजनीतिक जीवन के सात चुनाव में से पांच अलग-अलग सिंबल पर जीता हो। दिलचस्प बात ये है कि 1990&nbsp; से 2003&nbsp;तक हर बार महेंद्र सिंह ठाकुर की राजनीतिक निष्ठा बदली, पर बावजूद इसके वे जीते। दल बेशक बदलते रहे लेकिन जनता का भरोसा महेंद्र सिंह पर बरकरार रहा है। हालांकि पिछले तीन चुनाव वे भारतीय जनता पार्टी से ही जीते है। इस बार वे लम्बे अर्से बाद चुनावी मैदान में नहीं है और उनकी सीट से अब उनके बेटे रजत ठाकुर ने चुनाव लड़ा है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इसे महेंद्र सिंह ठाकुर का सियासी तिलिस्म ही कहेंगे कि वे जयराम कैबिनेट के सबसे शक्तिशाली मंत्री माने जाते है। कोई उन्हें नंबर टू कहता है तो कोई पर्दे के पीछे का सीएम। दिलचस्प बात ये है कि इस बार महेंद्र सिंह अपने बेटे रजत ठाकुर के लिए टिकट मांग रहे थे और माहिर मानते थे कि परिवारवाद के नाम पर कांग्रेस को अक्सर घेरने वाली भाजपा ऐसा नहीं कर पायेगी। पर भाजपा ने रजत ठाकुर को टिकट दे दिया, इससे महेंद्र सिंह&nbsp;ठाकुर के रसूख का अंदाज लगाया जा सकता है। वैसे बता दें कि इस सीट से नरेंद्र अत्रि भी टिकट के प्रबल दावेदार थे।&nbsp;बहरहाल टिकट तो रजत ले आएं लेकिन इस बार धर्मपुर की जंग दिलचस्प दिख रही है। कांग्रेस ने तो यहाँ दमखम से चुनाव लड़ा ही है, भाजपा के भीतर भी सब कुछ कण्ट्रोल में है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। अब धर्मपुर की&nbsp; सियासत के सिकंदर रहे महेंद्र सिंह के बेटे का मुक्कदर ईवीएम में कैद हो चुका है और आठ दिसम्बर को नतीजा सामने होगा।<br />
&nbsp;<br />
उधर कांग्रेस को इस सीट पर अंतिम बार 1993 में जीत मिली थी और दिलचस्प बात ये है कि तब कांग्रेस उम्मीदवार थे महेंद्र सिंह ठाकुर। इसके बाद हुए पांच चुनाव में कांग्रेस ने महेंद्र सिंह के आगे पानी नहीं मांगा। बीते तीन चुनाव पर नज़र डाले तो 2007 में पार्टी यहाँ दस हज़ार वोट से हारी। 2012 में पार्टी ने बेहतर किया और ये अंतर करीब एक हजार वोट का रह गया, पर 2017 में फिर बढ़कर करीब दस हजार पहुंच गया। तीनों मर्तबा पार्टी के कैंडिडेट थे चंद्रशेखर। इस बार फिर पार्टी ने चंद्रशेखर को ही मौका दिया है। चंद्रशेखर को लेकर इस बार थोड़ी सहानुभूति भी दिखी है। ऐसे में यहाँ अर्से बार कांग्रेस वापसी की उम्मीद में है।&nbsp;&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25834.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Will Rajat be able to maintain Mahendra Singh's magic?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/congress-has-hope-after-eight-consecutive-defeats-in-bhoranj]]></guid>
                       <title><![CDATA[भोरंज में लगातार आठ हार के बाद कांग्रेस को आस !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/congress-has-hope-after-eight-consecutive-defeats-in-bhoranj]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 02 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[कभी मेवा विस क्षेत्र के नाम से मशहूर रही भोरंज सीट के अतीत पर निगाह डालें तो ये सीट भाजपा के लिए सच में मेवा ही रही है। कहते है की एक शिक्षक ने लंबे समय तक इस विधानसभा क्षेत्र की सेवा की जिसका मेवा भाजपा को मिला। अध्यापन से राजनीति में आए ईश्वर दास धीमान यहां से लगातार छह बार विधायक रहे और दो बार प्रदेश के शिक्षा मंत्री भी रहे। बेशक वर्ष 2008 में विधानसभा पुनर्सीमांकन के बाद इस विधानसभा क्षेत्र का नाम भोरंज हो गया, लेकिन भाजपा का सिक्का यहां चलता रहा। जब तक आईडी धीमान जीवित रहे भोरंज में भाजपा के लिए सब ठीक था। उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे अनिल धीमान को 2017 में टिकट मिला और प्रदेश में &nbsp;कांग्रेस की सरकार होते हुए भी वह सीट निकाल गए। बेशक डॉ अनिल धीमान ने कांग्रेस सरकार के रहते हुए उपचुनाव जीतकर भाजपा की जीत की परंपरा को आगे बढ़ाया था लेकिन उसी विधानसभा चुनाव में विधायक रहते हुए भी उनका टिकट काटकर भाजपा ने कमलेश कुमारी को दे दिया। जयराम सरकार में फिर भाजपा ने कमलेश कुमारी को उप मुख्य सचेतक बनाकर उन्हें मजबूत करने की कोशिश भी की, लेकिन दूसरी ओर डॉक्टर अनिल धीमान और उनके समर्थक &nbsp;खोई हुई राजनीतिक जमीन को पाने के लिए &nbsp;मैदान में डटे रहे। डॉ अनिल धीमान ने सार्वजनिक मंच से यह घोषणा कर दी है कि अगर भाजपा ने उनको टिकट नहीं दिया तो वह निर्दलीय मैदान में उतरेंगे। नतीजन इस बार भाजपा ने यहां से सीटिंग विधायक कमलेश कुमारी का टिकट काटकर &nbsp;डॉ अनिल धीमान पर भरोसा जताया है। पर भाजपा के बागी पवन कुमार ने यहां से निर्दलीय चुनाव लड़ा है, जो इस बार यहाँ के समीकरण बदल सकता है। भोरंज में कांग्रेस की बात की जाए तो यहां पार्टी कभी भी ना तो सहज दिखी है न ही स्थिर। पार्टी हर बार चेहरे बदलती रही जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतान पड़ा। पर इस बार पार्टी ने यहां 2017 के प्रतयाशी सुरेश कुमार को ही फिर टिकट दिया है। वहीं पार्टी काफी हद तक एकजुट भी दिखी है। ऐसे में 1990 से लगातार आठ बार हार के बाद इस बार यहां कांग्रेस बेहतर करती दिख रही है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कभी मेवा विस क्षेत्र के नाम से मशहूर रही भोरंज सीट के अतीत पर निगाह डालें तो ये सीट भाजपा के लिए सच में मेवा ही रही है। कहते है की एक शिक्षक ने लंबे समय तक इस विधानसभा क्षेत्र की सेवा की जिसका मेवा भाजपा को मिला। अध्यापन से राजनीति में आए ईश्वर दास धीमान यहां से लगातार छह बार विधायक रहे और दो बार प्रदेश के शिक्षा मंत्री भी रहे। बेशक वर्ष 2008 में विधानसभा पुनर्सीमांकन के बाद इस विधानसभा क्षेत्र का नाम भोरंज हो गया, लेकिन भाजपा का सिक्का यहां चलता रहा। जब तक आईडी धीमान जीवित रहे भोरंज में भाजपा के लिए सब ठीक था। उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे अनिल धीमान को 2017 में टिकट मिला और प्रदेश में &nbsp;कांग्रेस की सरकार होते हुए भी वह सीट निकाल गए। बेशक डॉ अनिल धीमान ने कांग्रेस सरकार के रहते हुए उपचुनाव जीतकर भाजपा की जीत की परंपरा को आगे बढ़ाया था लेकिन उसी विधानसभा चुनाव में विधायक रहते हुए भी उनका टिकट काटकर भाजपा ने कमलेश कुमारी को दे दिया। जयराम सरकार में फिर भाजपा ने कमलेश कुमारी को उप मुख्य सचेतक बनाकर उन्हें मजबूत करने की कोशिश भी की, लेकिन दूसरी ओर डॉक्टर अनिल धीमान और उनके समर्थक &nbsp;खोई हुई राजनीतिक जमीन को पाने के लिए &nbsp;मैदान में डटे रहे। डॉ अनिल धीमान ने सार्वजनिक मंच से यह घोषणा कर दी है कि अगर भाजपा ने उनको टिकट नहीं दिया तो वह निर्दलीय मैदान में उतरेंगे। नतीजन इस बार भाजपा ने यहां से सीटिंग विधायक कमलेश कुमारी का टिकट काटकर &nbsp;डॉ अनिल धीमान पर भरोसा जताया है। पर भाजपा के बागी पवन कुमार ने यहां से निर्दलीय चुनाव लड़ा है, जो इस बार यहाँ के समीकरण बदल सकता है। भोरंज में कांग्रेस की बात की जाए तो यहां पार्टी कभी भी ना तो सहज दिखी है न ही स्थिर। पार्टी हर बार चेहरे बदलती रही जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतान पड़ा। पर इस बार पार्टी ने यहां 2017 के प्रतयाशी सुरेश कुमार को ही फिर टिकट दिया है। वहीं पार्टी काफी हद तक एकजुट भी दिखी है। ऐसे में 1990 से लगातार आठ बार हार के बाद इस बार यहां कांग्रेस बेहतर करती दिख रही है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25833.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Congress has hope after eight consecutive defeats in Bhoranj!]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/who-is-winning-this-time-in-kutlehar-who-lost-the-post-of-cm-in-1977]]></guid>
                       <title><![CDATA[1977 में सीएम पद खोने वाली कुटलैहड़ में इस बार कौन जीत रहा है ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/who-is-winning-this-time-in-kutlehar-who-lost-the-post-of-cm-in-1977]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 02 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[आज विश्लेषण करते है कुटलैहड़ विधानसभा क्षेत्र का और वर्तमान चुनाव से पहले बात करते है कुटलैहड़ के इतिहास से जुड़े एक महत्वपूर्ण सियासी अध्याय की। दरअसल इसी निर्वाचन क्षेत्र से ठाकुर रणजीत सिंह तीन बार विधायक रहे है। पहली बार 1967 में वे निर्दलीय चुनाव जीते। दूसरी बार 1982 में जनता पार्टी के टिकट पर और तीसरी बार 1990 में जनता दल प्रत्याशी के तौर पर। वे 1977 की जनता लहर में हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद भी चुने गए। दिलचस्प बात ये है कि 1977&nbsp; में जा हिमाचल प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार आई तो रंजीत सिंह भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। तब निर्दलीयों सहित कुल 59 विधायक सरकार के समर्थन में थे और इनमें से 29 की पसंद शांता कुमार थे और 29 की पसंद ठाकुर रंजीत सिंह। तब अपने ही वोट से शांता कुमार मुख्यमंत्री बने। अगर तब रंजीत सिंह भी विधानसभा का चुनाव लड़ा होते तो शायद कुटलैहड़ को मुख्यमंत्री मिल गए होता।

बताया जाता है कि तब जिला ऊना के दो विधायकों ने रणजीत सिंह को इसलिए वोट नहीं दिया था क्योंकि अगर वह मुख्यमंत्री चुने जाते तो उन्हें छह माह में सांसद का पद छोड़कर विधानसभा चुनाव लड़ना जरूरी था। अपने राजनीतिक भविष्य से चिंतित जिले के दो विधायकों ने ठाकुर रणजीत सिंह के पक्ष वोट न करते हुए शांता कुमार को वोट दिया था। अब आते है मौजूदा चुनाव पर। लगातार सात चुनाव हारने के बाद क्या इस बार कुटलैहड़ में कांग्रेस वापसी कर पायेगी ? क्या चार बार के विधायक और जयराम कैबिनेट में मंत्री वीरेंद्र कंवर को लगातार पांचवीं जीत दर्ज करने से कांग्रेस रोक पायेगी ? इस सवाल का जवाब तो आठ दिसम्बर को ही मिलेगा लेकिन इतना तय है कि नतीजा जो भी हो इस बार कुटलैहड़ में मुकाबला बेहद कड़ा है।&nbsp;&nbsp;

कुटलैहड़ एक ऐसी विधानसभा सीट है जहाँ दशकों से भाजपा का एकछत्र राज रहा है और कांग्रेस हमेशा कमजोर रही है। 1967 से लेकर अब तक यहां कांग्रेस सिर्फ 2 बार जीत दर्ज कर पायी है। पार्टी को आखिरी बार 1985&nbsp; में यहाँ जीत नसीब हुई थी। अब इस बार कांग्रेस यहाँ जीत की आस में है।&nbsp; दरअसल, कुटलैहड़ के लिए कहा जाता है कि यदि यहाँ कांग्रेस एकजुट हो कर चुनाव लड़ती तो शायद यहाँ का सियासी इतिहास कुछ और होता और इस बार कुछ ऐसे ही समीकरण बनते भी दिख रहे है। इस बार कांग्रेस के देवेंद्र कुमार भुट्टो यहाँ से मैदान में है जिन्हें वीरेंद्र कँवर का राइट हैंड माना जाता था, लेकिन बदली राजनीतिक परिस्थितियों में चुनावी रण में दोनों एक-दूसरे के सामने हैं। इस बार मोटे तौर पर कांग्रेस एकजुट भी दिखी है और ऐसे में पार्टी को देवेंद्र कुमार भुट्&zwnj;टो से करिश्मे की आस है। अब भुट्&zwnj;टो 32 वर्षों से चले आ रहे जीत के सूखे को खत्म करते हैं या फिर वीरेंद्र कंवर कांग्रेस के चक्रव्यूह को तोड़कर 5वीं दफा विधायक बनते हैं, ये तो नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा। बहरहाल यहाँ मुकाबला कांटे का दिख रहा है।

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">आज विश्लेषण करते है कुटलैहड़ विधानसभा क्षेत्र का और वर्तमान चुनाव से पहले बात करते है कुटलैहड़ के इतिहास से जुड़े एक महत्वपूर्ण सियासी अध्याय की। दरअसल इसी निर्वाचन क्षेत्र से ठाकुर रणजीत सिंह तीन बार विधायक रहे है। पहली बार 1967 में वे निर्दलीय चुनाव जीते। दूसरी बार 1982 में जनता पार्टी के टिकट पर और तीसरी बार 1990 में जनता दल प्रत्याशी के तौर पर। वे 1977 की जनता लहर में हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद भी चुने गए। दिलचस्प बात ये है कि 1977&nbsp; में जा हिमाचल प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार आई तो रंजीत सिंह भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। तब निर्दलीयों सहित कुल 59 विधायक सरकार के समर्थन में थे और इनमें से 29 की पसंद शांता कुमार थे और 29 की पसंद ठाकुर रंजीत सिंह। तब अपने ही वोट से शांता कुमार मुख्यमंत्री बने। अगर तब रंजीत सिंह भी विधानसभा का चुनाव लड़ा होते तो शायद कुटलैहड़ को मुख्यमंत्री मिल गए होता।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बताया जाता है कि तब जिला ऊना के दो विधायकों ने रणजीत सिंह को इसलिए वोट नहीं दिया था क्योंकि अगर वह मुख्यमंत्री चुने जाते तो उन्हें छह माह में सांसद का पद छोड़कर विधानसभा चुनाव लड़ना जरूरी था। अपने राजनीतिक भविष्य से चिंतित जिले के दो विधायकों ने ठाकुर रणजीत सिंह के पक्ष वोट न करते हुए शांता कुमार को वोट दिया था। अब आते है मौजूदा चुनाव पर। लगातार सात चुनाव हारने के बाद क्या इस बार कुटलैहड़ में कांग्रेस वापसी कर पायेगी ? क्या चार बार के विधायक और जयराम कैबिनेट में मंत्री वीरेंद्र कंवर को लगातार पांचवीं जीत दर्ज करने से कांग्रेस रोक पायेगी ? इस सवाल का जवाब तो आठ दिसम्बर को ही मिलेगा लेकिन इतना तय है कि नतीजा जो भी हो इस बार कुटलैहड़ में मुकाबला बेहद कड़ा है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कुटलैहड़ एक ऐसी विधानसभा सीट है जहाँ दशकों से भाजपा का एकछत्र राज रहा है और कांग्रेस हमेशा कमजोर रही है। 1967 से लेकर अब तक यहां कांग्रेस सिर्फ 2 बार जीत दर्ज कर पायी है। पार्टी को आखिरी बार 1985&nbsp; में यहाँ जीत नसीब हुई थी। अब इस बार कांग्रेस यहाँ जीत की आस में है।&nbsp; दरअसल, कुटलैहड़ के लिए कहा जाता है कि यदि यहाँ कांग्रेस एकजुट हो कर चुनाव लड़ती तो शायद यहाँ का सियासी इतिहास कुछ और होता और इस बार कुछ ऐसे ही समीकरण बनते भी दिख रहे है। इस बार कांग्रेस के देवेंद्र कुमार भुट्टो यहाँ से मैदान में है जिन्हें वीरेंद्र कँवर का राइट हैंड माना जाता था, लेकिन बदली राजनीतिक परिस्थितियों में चुनावी रण में दोनों एक-दूसरे के सामने हैं। इस बार मोटे तौर पर कांग्रेस एकजुट भी दिखी है और ऐसे में पार्टी को देवेंद्र कुमार भुट्&zwnj;टो से करिश्मे की आस है। अब भुट्&zwnj;टो 32 वर्षों से चले आ रहे जीत के सूखे को खत्म करते हैं या फिर वीरेंद्र कंवर कांग्रेस के चक्रव्यूह को तोड़कर 5वीं दफा विधायक बनते हैं, ये तो नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा। बहरहाल यहाँ मुकाबला कांटे का दिख रहा है।</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25832.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Who is winning this time in Kutlehar, who lost the post of CM in 1977?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/prakash-looking-for-fourth-win-interesting-contest-in-balh]]></guid>
                       <title><![CDATA[चौथी जीत की तलाश में प्रकाश, बल्ह में रोचक मुकाबला]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/prakash-looking-for-fourth-win-interesting-contest-in-balh]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 02 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[बल्ह में इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प दिख रहा है। यहाँ दो पुराने प्रतिद्वंदी तीसरी बार आमने-सामने है। भाजपा ने यहाँ से सीटिंग विधयक इन्द्र सिंह को फिर मैदान में उतारा है, तो कांग्रेस ने पूर्व मंत्री प्रकाश चौधरी को। 2012 में दोनों पहली बार आमने-सामने थे और तब प्रकाश चौधरी की जीत हुई। इसके बाद चौधरी वीरभद्र सरकार में मंत्री भी रहे लेकिन 2017 में उन्हें इंद्र सिंह ने हरा दिया। अब इस बार चौधरी फिर वापसी की उम्मीद में है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;

बल्ह विधानसभा सीट का इतिहास भी बेहद रोचक रहा है। 1967 से 2017 तक यहाँ पांच दफा कांग्रेस, तो तीन दफा भाजपा को जीत मिली है। इसके अलावा यहां माकपा, जनता दल और हिमाचल विकास कांग्रेस पार्टी ने भी जीत का परचम लहराया है। भाजपा के दामोदर दास वो नेता है जिन्होंने पहली बार 1990 में बल्ह विधानसभा सीट पर कमल खिलाया था। फिर 1998 में जब स्वर्गीय पंडित सुखराम ने हिमाचल विकास कांग्रेस पार्टी का गठन किया तो बल्ह से प्रकाश चौधरी ने हिमाचल विकास कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़ा और जीता भी। इसके बाद 2003 में दामोदर दास ने हिमाचल विकास कांग्रेस पार्टी के प्रकाश चौधरी को हराकर यहाँ भाजपा का परचम लहराया। फिर प्रकाश चौधरी कांग्रेस में शामिल हो गए और 2007 व 2012 में बल्ह सीट पर जीत हासिल कर ये सीट कांग्रेस की झोली में डाली। पिछले विधानसभा चुनाव में इंद्र सिंह गाँधी ने यहां जीत हासिल की और एक बार फिर वे ही मैदान में है।

कांग्रेस प्रत्याशी&nbsp; प्रकाश चौधरी निसंदेह एक अनुभवी नेता है और इस बार उन्होंने पुरे दमखम के साथ चुनाव लड़ा है। ये उनका छठा चुनाव है और अब तक उन्हें तीन बार जीत मिली है। वे दो बार मंत्री रहे है और दिलचस्प बात ये है कि मंत्री बनने के बाद अगला चुनाव वे हारे है। बहरहाल इस बार चौधरी फिर जीत को लेकर आश्वस्त है। उधर इंद्र सिंह भी जीत का दावा कर रहे है। मंडी संसदीय उपचुनाव में भी इस क्षेत्र में भाजपा को लीड मिली थी, ऐसे में उन्हें भी हल्का नहीं आंका जा सकता।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बल्ह में इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प दिख रहा है। यहाँ दो पुराने प्रतिद्वंदी तीसरी बार आमने-सामने है। भाजपा ने यहाँ से सीटिंग विधयक इन्द्र सिंह को फिर मैदान में उतारा है, तो कांग्रेस ने पूर्व मंत्री प्रकाश चौधरी को। 2012 में दोनों पहली बार आमने-सामने थे और तब प्रकाश चौधरी की जीत हुई। इसके बाद चौधरी वीरभद्र सरकार में मंत्री भी रहे लेकिन 2017 में उन्हें इंद्र सिंह ने हरा दिया। अब इस बार चौधरी फिर वापसी की उम्मीद में है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बल्ह विधानसभा सीट का इतिहास भी बेहद रोचक रहा है। 1967 से 2017 तक यहाँ पांच दफा कांग्रेस, तो तीन दफा भाजपा को जीत मिली है। इसके अलावा यहां माकपा, जनता दल और हिमाचल विकास कांग्रेस पार्टी ने भी जीत का परचम लहराया है। भाजपा के दामोदर दास वो नेता है जिन्होंने पहली बार 1990 में बल्ह विधानसभा सीट पर कमल खिलाया था। फिर 1998 में जब स्वर्गीय पंडित सुखराम ने हिमाचल विकास कांग्रेस पार्टी का गठन किया तो बल्ह से प्रकाश चौधरी ने हिमाचल विकास कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़ा और जीता भी। इसके बाद 2003 में दामोदर दास ने हिमाचल विकास कांग्रेस पार्टी के प्रकाश चौधरी को हराकर यहाँ भाजपा का परचम लहराया। फिर प्रकाश चौधरी कांग्रेस में शामिल हो गए और 2007 व 2012 में बल्ह सीट पर जीत हासिल कर ये सीट कांग्रेस की झोली में डाली। पिछले विधानसभा चुनाव में इंद्र सिंह गाँधी ने यहां जीत हासिल की और एक बार फिर वे ही मैदान में है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कांग्रेस प्रत्याशी&nbsp; प्रकाश चौधरी निसंदेह एक अनुभवी नेता है और इस बार उन्होंने पुरे दमखम के साथ चुनाव लड़ा है। ये उनका छठा चुनाव है और अब तक उन्हें तीन बार जीत मिली है। वे दो बार मंत्री रहे है और दिलचस्प बात ये है कि मंत्री बनने के बाद अगला चुनाव वे हारे है। बहरहाल इस बार चौधरी फिर जीत को लेकर आश्वस्त है। उधर इंद्र सिंह भी जीत का दावा कर रहे है। मंडी संसदीय उपचुनाव में भी इस क्षेत्र में भाजपा को लीड मिली थी, ऐसे में उन्हें भी हल्का नहीं आंका जा सकता।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25830.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-the-sitting-mla-and-former-mla-together-be-able-to-stop-chaitanya]]></guid>
                       <title><![CDATA[क्या सीटिंग विधायक और पूर्व विधायक मिलकर चैतन्य को रोक पाएं ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-the-sitting-mla-and-former-mla-together-be-able-to-stop-chaitanya]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 02 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[गगरेट निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव इस बार बेहद रोचक दिखा है। दरअसल चुनाव से कुछ दिन पहले तक यहाँ सबसे बड़ी चर्चा ये नहीं थी कि इस बार कौन जीतेगा, चर्चा ये थी कि चैतन्य शर्मा किस पार्टी में शामिल होंगे। दरअसल चैतन्य शर्मा जिला परिषद चुनाव में रिकाॅर्ड मतों से आजाद चुनाव जीते थे और इस क्षेत्र में लगातार समाजसेवा कर रहे थे। चैतन्य विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान भी कर चुके थे सो उन्हें लेकर जिज्ञासा होने स्वाभाविक था। आखिरकार चुनावी बेला में&nbsp; तमाम कयासों पर विराम लगा और चैतन्य ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। जैसा अपेक्षित था कांग्रेस ने चैतन्य शर्मा को ही टिकट दिया। इससे पूर्व विधायक राकेश कालिया खफा हो गए और भाजपा में चले गए। उधर भाजपा ने सीटिंग विधायक राजेश ठाकुर पर ही यहाँ से दाव खेला है। बहरहाल यहाँ मुख्य मुकाबला कांग्रेस के चैतन्य शर्मा और भाजपा के राजेश ठाकुर के बीच दिख रहा है।

इतिहास पर निगाह डालें तो कभी इस सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री कुलदीप कुमार का वर्चस्व था। कुलदीप ने यहां से 1993, 1998 और 2003 में जीत की हैट्रिक लगाई लेकिन 2007 में गगरेट की जनता ने उन्हें नकार दिया। फिर 2008 में परिसीमन हुआ और चिंतपूर्णी विधानसभा क्षेत्र की कुछ पंचायतें गगरेट में आ गई और गगरेट का कुछ क्षेत्र चिंतपूर्णी में चला गया। परिसीमन के बाद चिंतपूर्णी सीट भी आरक्षित हो गई और इसी के चलते 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने एक सियासी प्रयोग करते हुए चिंतपूर्णी के विधायक राकेश कालिया को गगरेट और कुलदीप कुमार को चिंतपूर्णी से मैदान में उतारा। प्रयोग सफल रहा और दोनों सीटें कांग्रेस की झोली में गई, लेकिन 2017 आते -आते इन दोनों नेताओं से जनता का मोहभंग हुआ और दोनों चुनाव हार गए।

अब इस बार गगरेट में कांग्रेस वापसी की जद्दोजहद में है तो भाजपा के लिए इस सीट पर कब्ज़ा बरकरार रखना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि राजेश ठाकुर को लेकर क्षेत्र में एंटी इंकम्बैंसी भी दिखती रही है जिसका खामियाज़ा भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। यहाँ राकेश कालिया के भाजपा में जाने का कितना फर्क पड़ता है ये भी देखना रोचक होगा। उधर चैतन्य लगातार क्षेत्र में समाज सेवा करते रहे है जिसका लाभ उन्हें मिल सकता है। बहरहाल सवाल ये ही है कि क्या सीटिंग विधायक राजेश ठाकुर&nbsp; और पूर्व विधायक राकेश कालिया मिलकर चैतन्य को रोक पाएं है ? इसका जवाब तो आठ दिसम्बर को ही मिलेगा।

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">गगरेट निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव इस बार बेहद रोचक दिखा है। दरअसल चुनाव से कुछ दिन पहले तक यहाँ सबसे बड़ी चर्चा ये नहीं थी कि इस बार कौन जीतेगा, चर्चा ये थी कि चैतन्य शर्मा किस पार्टी में शामिल होंगे। दरअसल चैतन्य शर्मा जिला परिषद चुनाव में रिकाॅर्ड मतों से आजाद चुनाव जीते थे और इस क्षेत्र में लगातार समाजसेवा कर रहे थे। चैतन्य विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान भी कर चुके थे सो उन्हें लेकर जिज्ञासा होने स्वाभाविक था। आखिरकार चुनावी बेला में&nbsp; तमाम कयासों पर विराम लगा और चैतन्य ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। जैसा अपेक्षित था कांग्रेस ने चैतन्य शर्मा को ही टिकट दिया। इससे पूर्व विधायक राकेश कालिया खफा हो गए और भाजपा में चले गए। उधर भाजपा ने सीटिंग विधायक राजेश ठाकुर पर ही यहाँ से दाव खेला है। बहरहाल यहाँ मुख्य मुकाबला कांग्रेस के चैतन्य शर्मा और भाजपा के राजेश ठाकुर के बीच दिख रहा है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इतिहास पर निगाह डालें तो कभी इस सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री कुलदीप कुमार का वर्चस्व था। कुलदीप ने यहां से 1993, 1998 और 2003 में जीत की हैट्रिक लगाई लेकिन 2007 में गगरेट की जनता ने उन्हें नकार दिया। फिर 2008 में परिसीमन हुआ और चिंतपूर्णी विधानसभा क्षेत्र की कुछ पंचायतें गगरेट में आ गई और गगरेट का कुछ क्षेत्र चिंतपूर्णी में चला गया। परिसीमन के बाद चिंतपूर्णी सीट भी आरक्षित हो गई और इसी के चलते 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने एक सियासी प्रयोग करते हुए चिंतपूर्णी के विधायक राकेश कालिया को गगरेट और कुलदीप कुमार को चिंतपूर्णी से मैदान में उतारा। प्रयोग सफल रहा और दोनों सीटें कांग्रेस की झोली में गई, लेकिन 2017 आते -आते इन दोनों नेताओं से जनता का मोहभंग हुआ और दोनों चुनाव हार गए।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अब इस बार गगरेट में कांग्रेस वापसी की जद्दोजहद में है तो भाजपा के लिए इस सीट पर कब्ज़ा बरकरार रखना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि राजेश ठाकुर को लेकर क्षेत्र में एंटी इंकम्बैंसी भी दिखती रही है जिसका खामियाज़ा भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। यहाँ राकेश कालिया के भाजपा में जाने का कितना फर्क पड़ता है ये भी देखना रोचक होगा। उधर चैतन्य लगातार क्षेत्र में समाज सेवा करते रहे है जिसका लाभ उन्हें मिल सकता है। बहरहाल सवाल ये ही है कि क्या सीटिंग विधायक राजेश ठाकुर&nbsp; और पूर्व विधायक राकेश कालिया मिलकर चैतन्य को रोक पाएं है ? इसका जवाब तो आठ दिसम्बर को ही मिलेगा।</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25829.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Will the sitting MLA and former MLA together be able to stop Chaitanya?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/what-is-the-state-general-secretary-losing-on-the-seat-of-the-national-president]]></guid>
                       <title><![CDATA[राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पर क्या हार रहे है प्रदेश महामंत्री ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/what-is-the-state-general-secretary-losing-on-the-seat-of-the-national-president]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 02 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा इसी सीट से तीन बार विधायक रहे। 1993 में इसी सीट से वे पहली बार विधानसभा पहुंचे और विपक्ष के नेता भी बन गए। हम बात कर रहे है बिलासपुर सदर सीट की। ये खुद नड्डा की सीट रही है तो ऐसे में जाहिर है यहाँ भाजपा की जीत - हार को भी सीधे नड्डा की राजनैतिक प्रतिष्ठता से जोड़ा जायेगा। इतिहास पर नज़र डाले तो भाजपा की स्थापना के बाद से ही इस सीट पर पार्टी का दबदबा रहा है। 1982 से 2017 तक हुए 9 विधानसभा चुनावों में 6 बार भाजपा तो 3 बार कांग्रेस को इस सीट पर जीत मिली है। जेपी नड्डा ने खुद इस सीट से चार दफा चुनाव चुनाव लड़ा है। 1993 और 1998 में नड्डा ने इस सीट पर जीत दर्ज की लेकिन 2003 के विधानसभा चुनाव में नड्डा को हार का सामना करना पड़ा था। 2007 में जेपी नड्डा ने इस सीट से अपना आख&zwj;िरी चुनाव लड़ा था तब नड्डा ने फिर फतह हास&zwj;िल की थी। 2012 में इस सीट पर कांग्रेस के बंबर ठाकुर ने जीत हासिल की थी। वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के सुभाष ठाकुर ने कांग्रेस के बंबर ठाकुर को मात देकर जीत दर्ज की और ये सीट फिर भाजपा की झोली में चली गयी।अब आते है मौजूदा चुनाव पर। इस बार भाजपा ने सीटिंग विधायक सुभाष ठाकुर का टिकट काटकर प्रदेश महामंत्री त्रिलोक जम्वाल पर दांव खेला है। इसके बाद भाजपा सुभाष ठाकुर को तो मनाने में कामयाब रही लेकिन एक अन्य टिकट के चाहवान सुभाष शर्मा ने निर्दलीय ताल ठोक दी। यानी इस बार नड्डा के घर में भी बगावत को भाजपा रोक नहीं पाई। उधर कांग्रेस ने गहन चिंतन मंथन के बाद बम्बर ठाकुर को ही टिकट दिया है। अब भाजपा की बगावत का कितना लाभ बम्बर ठाकुर को मिलता है, ये तो चुनाव के नतीजे ही बताएँगे। बहरहाल इस सीट पर कांटे का मुकाबला है और यदि कांग्रेस जीत दर्ज करती है तो स्वाभाविक है भाजपा के भीतर भी कई सवाल उठेंगे।&nbsp;&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा इसी सीट से तीन बार विधायक रहे। 1993 में इसी सीट से वे पहली बार विधानसभा पहुंचे और विपक्ष के नेता भी बन गए। हम बात कर रहे है बिलासपुर सदर सीट की। ये खुद नड्डा की सीट रही है तो ऐसे में जाहिर है यहाँ भाजपा की जीत - हार को भी सीधे नड्डा की राजनैतिक प्रतिष्ठता से जोड़ा जायेगा। इतिहास पर नज़र डाले तो भाजपा की स्थापना के बाद से ही इस सीट पर पार्टी का दबदबा रहा है। 1982 से 2017 तक हुए 9 विधानसभा चुनावों में 6 बार भाजपा तो 3 बार कांग्रेस को इस सीट पर जीत मिली है। जेपी नड्डा ने खुद इस सीट से चार दफा चुनाव चुनाव लड़ा है। 1993 और 1998 में नड्डा ने इस सीट पर जीत दर्ज की लेकिन 2003 के विधानसभा चुनाव में नड्डा को हार का सामना करना पड़ा था। 2007 में जेपी नड्डा ने इस सीट से अपना आख&zwj;िरी चुनाव लड़ा था तब नड्डा ने फिर फतह हास&zwj;िल की थी। 2012 में इस सीट पर कांग्रेस के बंबर ठाकुर ने जीत हासिल की थी। वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के सुभाष ठाकुर ने कांग्रेस के बंबर ठाकुर को मात देकर जीत दर्ज की और ये सीट फिर भाजपा की झोली में चली गयी।</span><span style="font-size: 18px;">अब आते है मौजूदा चुनाव पर। इस बार भाजपा ने सीटिंग विधायक सुभाष ठाकुर का टिकट काटकर प्रदेश महामंत्री त्रिलोक जम्वाल पर दांव खेला है। इसके बाद भाजपा सुभाष ठाकुर को तो मनाने में कामयाब रही लेकिन एक अन्य टिकट के चाहवान सुभाष शर्मा ने निर्दलीय ताल ठोक दी। यानी इस बार नड्डा के घर में भी बगावत को भाजपा रोक नहीं पाई। उधर कांग्रेस ने गहन चिंतन मंथन के बाद बम्बर ठाकुर को ही टिकट दिया है। अब भाजपा की बगावत का कितना लाभ बम्बर ठाकुर को मिलता है, ये तो चुनाव के नतीजे ही बताएँगे। बहरहाल इस सीट पर कांटे का मुकाबला है और यदि कांग्रेस जीत दर्ज करती है तो स्वाभाविक है भाजपा के भीतर भी कई सवाल उठेंगे।&nbsp;&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25828.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[What is the State General Secretary losing on the seat of the National President?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/no-one-could-score-a-hat-trick-of-victory-in-bhatiyat-will-jariyal-create-history]]></guid>
                       <title><![CDATA[भटियात में कोई नहीं लगा पाया जीत की हैट्रिक, क्या जरियाल रचेंगे इतिहास ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/no-one-could-score-a-hat-trick-of-victory-in-bhatiyat-will-jariyal-create-history]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 02 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

भटियात विधानसभा सीट पर पुराने प्रतिद्वंदी एक बार फिर आमने-सामने है। भाजपा से यहाँ विक्रम जरियाल मैदान में है, तो कांग्रेस से कुलदीप पठानिया। पिछले दो चुनावों के नतीजों पर गौर करे तो यहाँ विक्रम जरियाल कमल खिलाने में सफल रहे है। कुलदीप 2012 में सिर्फ 112 वोट से हारे थे, जबकि 2017 में ये अंतर सात हजार के करीब था। 2017 में चुनाव जीतने के बाद भाजपा विधायक विक्रम जरियाल को मंत्री पद का दावेदार भी माना जा रहा था, लेकिन भाजपा ने जिला से चुराह विधायक हंसराज को डिप्टी स्पीकर बनाया और जरियाल के हाथ खाली रहे। अब फिर जरियाल जीत की हैट्रिक लगाने को मैदान में है। इस बार भी यहाँ नजदीकी मुकाबला देखने को मिल रहा है। विक्रम जरियाल और कुलदीप पठानिया के बीच कांटे का मुकाबला अपेक्षित है।

भटियात विधानसभा में राजपूत व अनुसूचित जाति के मतदाताओं की बहुलता है। अगर 2012 के विधानसभा को देखें तो जरियाल यह चुनाव सिर्फ 112 मतों से जितने में सफल रहे थे, जबकि चार बार के विधायक रहे पठानिया आसानी से हार गए थे। इसका कारण था यहाँ से निर्दलीय उम्मीदवार रहे भूपिंदर सिंह चौहान, जिन्होंने दस हज़ार के आस-पास मत प्राप्त किये थे। साफ़ तौर पर मतों का विभाजन यहाँ दिखता है। 2017 में फिर जरियाल को यहाँ के लोगों ने विधानसभा पहुँचाया। पर इस बार भटियात में विक्रम जरियाल की राह आसान नहीं दिख रही। दरअसल प्रदेश की अपनी ही सरकार होने के बावजूद भटियात क्षेत्र के लिए कोई बड़ी उपलब्धि लाना भी उनके लिए दूर की कौड़ी साबित हुआ है।&nbsp; कांगड़ा और चंबा की सीमा से लगते इस विधानसभा क्षेत्र के बाबत अगर बुनियादी सुविधाओं की बात की जाए तो अच्छे स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए यहाँ के बाशिंदों को टाँडा मेडिकल कॉलेज कांगड़ा और धर्मशाला का रुख करना पड़ता है। अगर इस क्षेत्र के स्वास्थ्य केंद्रों, आयुर्वेदिक डिस्पेंसरियो, प्लस टू किए गए स्कूलों की उद्घाटन पट्टिकाओं पर नज़र डालें तो ज्यादातर पर कुलदीप पठानिया का नाम दर्ज है।

भटियात के इतिहास पर निगाह डाले तो किसी भी नेता ने यहाँ जीत की हैट्रिक नहीं लगाईं है। शिव कुमार यहाँ से 1977 और 1982 में जीते लेकिन 1985&nbsp; का चुनाव हार गए। हालांकि 1990 में वे फिर जीते। इसी तरह 1985 और 1993&nbsp; में जीतने के बाद कुलदीप पठानिया 2003 और 2007 में लगातार दो चुनाव जीते लेकिन 2012 में हार गए। अब विक्रम जरियाल यहाँ से लगातार दो चुनाव जीत चुके है और यदि इस बार भी जीते तो वे यहाँ जीत की हैट्रिक लगाने वाले पहले नेता होंगे।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">भटियात विधानसभा सीट पर पुराने प्रतिद्वंदी एक बार फिर आमने-सामने है। भाजपा से यहाँ विक्रम जरियाल मैदान में है, तो कांग्रेस से कुलदीप पठानिया। पिछले दो चुनावों के नतीजों पर गौर करे तो यहाँ विक्रम जरियाल कमल खिलाने में सफल रहे है। कुलदीप 2012 में सिर्फ 112 वोट से हारे थे, जबकि 2017 में ये अंतर सात हजार के करीब था। 2017 में चुनाव जीतने के बाद भाजपा विधायक विक्रम जरियाल को मंत्री पद का दावेदार भी माना जा रहा था, लेकिन भाजपा ने जिला से चुराह विधायक हंसराज को डिप्टी स्पीकर बनाया और जरियाल के हाथ खाली रहे। अब फिर जरियाल जीत की हैट्रिक लगाने को मैदान में है। इस बार भी यहाँ नजदीकी मुकाबला देखने को मिल रहा है। विक्रम जरियाल और कुलदीप पठानिया के बीच कांटे का मुकाबला अपेक्षित है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">भटियात विधानसभा में राजपूत व अनुसूचित जाति के मतदाताओं की बहुलता है। अगर 2012 के विधानसभा को देखें तो जरियाल यह चुनाव सिर्फ 112 मतों से जितने में सफल रहे थे, जबकि चार बार के विधायक रहे पठानिया आसानी से हार गए थे। इसका कारण था यहाँ से निर्दलीय उम्मीदवार रहे भूपिंदर सिंह चौहान, जिन्होंने दस हज़ार के आस-पास मत प्राप्त किये थे। साफ़ तौर पर मतों का विभाजन यहाँ दिखता है। 2017 में फिर जरियाल को यहाँ के लोगों ने विधानसभा पहुँचाया। पर इस बार भटियात में विक्रम जरियाल की राह आसान नहीं दिख रही। दरअसल प्रदेश की अपनी ही सरकार होने के बावजूद भटियात क्षेत्र के लिए कोई बड़ी उपलब्धि लाना भी उनके लिए दूर की कौड़ी साबित हुआ है।&nbsp; कांगड़ा और चंबा की सीमा से लगते इस विधानसभा क्षेत्र के बाबत अगर बुनियादी सुविधाओं की बात की जाए तो अच्छे स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए यहाँ के बाशिंदों को टाँडा मेडिकल कॉलेज कांगड़ा और धर्मशाला का रुख करना पड़ता है। अगर इस क्षेत्र के स्वास्थ्य केंद्रों, आयुर्वेदिक डिस्पेंसरियो, प्लस टू किए गए स्कूलों की उद्घाटन पट्टिकाओं पर नज़र डालें तो ज्यादातर पर कुलदीप पठानिया का नाम दर्ज है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">भटियात के इतिहास पर निगाह डाले तो किसी भी नेता ने यहाँ जीत की हैट्रिक नहीं लगाईं है। शिव कुमार यहाँ से 1977 और 1982 में जीते लेकिन 1985&nbsp; का चुनाव हार गए। हालांकि 1990 में वे फिर जीते। इसी तरह 1985 और 1993&nbsp; में जीतने के बाद कुलदीप पठानिया 2003 और 2007 में लगातार दो चुनाव जीते लेकिन 2012 में हार गए। अब विक्रम जरियाल यहाँ से लगातार दो चुनाव जीत चुके है और यदि इस बार भी जीते तो वे यहाँ जीत की हैट्रिक लगाने वाले पहले नेता होंगे।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25827.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[No one could score a hat-trick of victory in Bhatiyat, will Jariyal create history?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-the-custom-change-this-time-in-bharmour]]></guid>
                       <title><![CDATA[क्या भरमौर में इस बार बदलेगा रिवाज ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-the-custom-change-this-time-in-bharmour]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 01 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[प्रदेश की सियासत में डॉक्टरों का चुनाव लड़ना पुराना रिवाज रहा है। कई मौकों पर डॉक्टर मरीजों की नब्ज जांचते जांचते चुनावी बैटल फील्ड में उतरे है। 2017&nbsp; में आईजीएमसी के डॉक्टर राजेश कश्यप वीआरएस लेकर सोलन से चुनाव लड़े थे और अब फुल टाइम पॉलिटिशियन बन चुके है। वहीं इस बार तो आईजीएमसी के एमएस रहे डॉ जनकराज ने वीआरएस लेकर जिला चम्बा की भरमौर सीट से चुनाव लड़ा है। प्रचार के दौरान स्टेथॉस्कोप थामे हुए डॉ जनकराज की कई तस्वीरें भी वायरल हुई। बहरहाल मतदान हो चूका है और डॉ जनकराज अब विधानसभा पहुंचने को लेकर आश्वस्त दिख रहे है। हालांकि उनकी राह आसान बिलकुल नहीं है।&nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;

जिस भरमौर सीट से डॉ जनकराज ने चुनाव लड़ा है ये कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी का निर्वाचन क्षेत्र है। इस सीट से भरमौरी दसवीं बार मैदान में है और अब तक पांच बार जीत चुके है। 2017 में भरमौरी भाजपा के जिया लाल से चुनाव हार गए थे। वहीं इस बार उनके टिकट को युवा कांग्रेस के नेता सुरजीत भरमौरी ने चुनौती दी थी। पर पार्टी ने ठाकुर सिंह भरमौरी के अनुभव पर भरोसा जताया और उन्हें एक बार फिर मैदान में उतारा है। इस सीट को लेकर एक और रोचक तथ्य है। 1985&nbsp; से लेकर यहां कोई भी पार्टी लगातार दो बार नहीं जीती और ठाकुर सिंह भरमौरी यहां&nbsp; एक चुनाव छोड़कर एक चुनाव जीतते आ रहे है।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;

अब बात भाजपा की करते है। पिछले साल हुए मंडी संसदीय उपचुनाव में भरमौर विधानसभा सीट पर कांग्रेस को लीड मिली और भाजपा पिछड़ी। माना जाता है इसका खामियाज़ा सिटींग विधायक जियालाल को भुगतना पड़ा है और इस बार भाजपा ने यहाँ जियालाल का टिकट काट कर डॉ जनकराज को टिकट दिया है। जियालाल ने बगावत तो नहीं की और भाजपा बाहरी तौर पर एकजुट भी दिखी है। पर माहिर मानते है कि यहां भीतरघात हुआ है या नहीं, ये नतीजे ही तय करेंगे। बहरहाल इस सीट पर सीधा मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच है और यहां दोनों के बीच कांटे का मुकाबला दिख रहा है।&#39;&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">प्रदेश की सियासत में डॉक्टरों का चुनाव लड़ना पुराना रिवाज रहा है। कई मौकों पर डॉक्टर मरीजों की नब्ज जांचते जांचते चुनावी बैटल फील्ड में उतरे है। 2017&nbsp; में आईजीएमसी के डॉक्टर राजेश कश्यप वीआरएस लेकर सोलन से चुनाव लड़े थे और अब फुल टाइम पॉलिटिशियन बन चुके है। वहीं इस बार तो आईजीएमसी के एमएस रहे डॉ जनकराज ने वीआरएस लेकर जिला चम्बा की भरमौर सीट से चुनाव लड़ा है। प्रचार के दौरान स्टेथॉस्कोप थामे हुए डॉ जनकराज की कई तस्वीरें भी वायरल हुई। बहरहाल मतदान हो चूका है और डॉ जनकराज अब विधानसभा पहुंचने को लेकर आश्वस्त दिख रहे है। हालांकि उनकी राह आसान बिलकुल नहीं है।&nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जिस भरमौर सीट से डॉ जनकराज ने चुनाव लड़ा है ये कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी का निर्वाचन क्षेत्र है। इस सीट से भरमौरी दसवीं बार मैदान में है और अब तक पांच बार जीत चुके है। 2017 में भरमौरी भाजपा के जिया लाल से चुनाव हार गए थे। वहीं इस बार उनके टिकट को युवा कांग्रेस के नेता सुरजीत भरमौरी ने चुनौती दी थी। पर पार्टी ने ठाकुर सिंह भरमौरी के अनुभव पर भरोसा जताया और उन्हें एक बार फिर मैदान में उतारा है। इस सीट को लेकर एक और रोचक तथ्य है। 1985&nbsp; से लेकर यहां कोई भी पार्टी लगातार दो बार नहीं जीती और ठाकुर सिंह भरमौरी यहां&nbsp; एक चुनाव छोड़कर एक चुनाव जीतते आ रहे है।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अब बात भाजपा की करते है। पिछले साल हुए मंडी संसदीय उपचुनाव में भरमौर विधानसभा सीट पर कांग्रेस को लीड मिली और भाजपा पिछड़ी। माना जाता है इसका खामियाज़ा सिटींग विधायक जियालाल को भुगतना पड़ा है और इस बार भाजपा ने यहाँ जियालाल का टिकट काट कर डॉ जनकराज को टिकट दिया है। जियालाल ने बगावत तो नहीं की और भाजपा बाहरी तौर पर एकजुट भी दिखी है। पर माहिर मानते है कि यहां भीतरघात हुआ है या नहीं, ये नतीजे ही तय करेंगे। बहरहाल इस सीट पर सीधा मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच है और यहां दोनों के बीच कांटे का मुकाबला दिख रहा है।&#39;&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25793.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Will the custom change this time in Bharmour?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-this-time-only-taste-the-taste-of-victory]]></guid>
                       <title><![CDATA[क्या इस बार केवल चखेंगे जीत का स्वाद ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-this-time-only-taste-the-taste-of-victory]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 01 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[शाहपुर विधानसभा क्षेत्र की सियासत भी शाही है। भाजपा, कांग्रेस, जनता पार्टी, जनता दल, निर्दलीय सभी को इस सीट पर जनता का साथ मिला है। इस सीट के पचास साल के इतिहास पर निगाह डाले तो 1972 में यहाँ कांग्रेस जीती, 1977 में जनता पार्टी, 1982 में आजाद, 1985 में कांग्रेस, 1990 में जनता दल, 1993&nbsp; में कांग्रेस, 1998&nbsp; में भाजपा और 2003 में फिर कांग्रेस। यानी 1972 से 2003 तक यहाँ किसी पार्टी ने रिपीट नहीं किया। पर 2007 से 2017 तक हुए तीनों चुनाव यहाँ बीजेपी जीती।

ये तो बात हुई राजनीतिक दलों की। अब चेहरों पर आते है। कांग्रेस से यहां मेजर विजय सिंह मनकोटिया 1985, 1993 और 2003&nbsp; में चुनाव जीते। पर ये ही मेजर मनकोटिया 1982 में निर्दलीय जीते थे, तो 1990 में जनता दल के टिकट पर। रोचक बात ये है कि वर्तमान में मेजर साहब भाजपाई हो चुके है। उधर भाजपा की बात करें तो 1998 से अब तक हुए 6 विधानसभा चुनाव में सरवीण चौधरी ही पार्टी का चेहरा रही है और 2003 के अलावा चार मौकों पर जीती है। वहीं वर्तमान चुनाव का परिणाम आना अभी बाकी है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;

अब मौजूदा दौर में कांग्रेस की बात करते है। मेजर मनकोटिया के कांग्रेस से बाहर होने के बाद कांग्रेस में एंट्री हुई केवल पठानिया की। 2007 में केवल पहली बार चुनाव लड़े&nbsp; और तीसरे स्थान पर रहे। तब दूसरे नंबर थी बहुजन समाज पार्टी। उधर 2012 आते -आते मेजर साहब फिर कांग्रेस में आ चुके थे और फिर कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके। पर 2017 तक फिर कांग्रेस और मेजर की राहें जुदा हो चुकी थी। ऐसे में 2017 में पार्टी ने फिर केवल पर दाव खेला। पर मेजर मनकोटिया भी निर्दलीय मैदान में थे। तब यहां केवल और मेजर की आपसी लड़ाई में बाजी सरवीण&nbsp; जीत गई। दिलचस्प बात ये है कि केवल तीसरे स्थान पर रहे।&nbsp;&nbsp;

मौजूदा चुनाव की बात करें तो इस बार मेजर विजय सिंह मनकोटिया मैदान में नहीं है। वहीं&nbsp; भाजपा से एक बागी उम्मीदवार सरवीण चौधरी के खिलाफ मैदान में उतरे है। ऐसे में कांग्रेस के केवल सिंह पठानिया क्या इस बार जीत का स्वाद चख पाएंगे, इस पर सभी की नजरें है। पर अगर केवल अभी भी नहीं जीते तो ये उनकी तीसरी हार होगी और ऐसे में उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठना भी लाजमी होगा। हालांकि मंत्री सरवीण चौधरी को लेकर इस क्षेत्र में एंटी इंकम्बेंसी जरूर दिखी है। पर ऐसा पिछले दो चुनाव में भी था लेकिन, बावजूद इसके सरवीण आसानी से जीती थी। ऐसे में अब आठ दिसम्बर को क्या नतीजा आता है, इसका अनुमान अभी से लगाना मुश्किल है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शाहपुर विधानसभा क्षेत्र की सियासत भी शाही है। भाजपा, कांग्रेस, जनता पार्टी, जनता दल, निर्दलीय सभी को इस सीट पर जनता का साथ मिला है। इस सीट के पचास साल के इतिहास पर निगाह डाले तो 1972 में यहाँ कांग्रेस जीती, 1977 में जनता पार्टी, 1982 में आजाद, 1985 में कांग्रेस, 1990 में जनता दल, 1993&nbsp; में कांग्रेस, 1998&nbsp; में भाजपा और 2003 में फिर कांग्रेस। यानी 1972 से 2003 तक यहाँ किसी पार्टी ने रिपीट नहीं किया। पर 2007 से 2017 तक हुए तीनों चुनाव यहाँ बीजेपी जीती।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ये तो बात हुई राजनीतिक दलों की। अब चेहरों पर आते है। कांग्रेस से यहां मेजर विजय सिंह मनकोटिया 1985, 1993 और 2003&nbsp; में चुनाव जीते। पर ये ही मेजर मनकोटिया 1982 में निर्दलीय जीते थे, तो 1990 में जनता दल के टिकट पर। रोचक बात ये है कि वर्तमान में मेजर साहब भाजपाई हो चुके है। उधर भाजपा की बात करें तो 1998 से अब तक हुए 6 विधानसभा चुनाव में सरवीण चौधरी ही पार्टी का चेहरा रही है और 2003 के अलावा चार मौकों पर जीती है। वहीं वर्तमान चुनाव का परिणाम आना अभी बाकी है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अब मौजूदा दौर में कांग्रेस की बात करते है। मेजर मनकोटिया के कांग्रेस से बाहर होने के बाद कांग्रेस में एंट्री हुई केवल पठानिया की। 2007 में केवल पहली बार चुनाव लड़े&nbsp; और तीसरे स्थान पर रहे। तब दूसरे नंबर थी बहुजन समाज पार्टी। उधर 2012 आते -आते मेजर साहब फिर कांग्रेस में आ चुके थे और फिर कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके। पर 2017 तक फिर कांग्रेस और मेजर की राहें जुदा हो चुकी थी। ऐसे में 2017 में पार्टी ने फिर केवल पर दाव खेला। पर मेजर मनकोटिया भी निर्दलीय मैदान में थे। तब यहां केवल और मेजर की आपसी लड़ाई में बाजी सरवीण&nbsp; जीत गई। दिलचस्प बात ये है कि केवल तीसरे स्थान पर रहे।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मौजूदा चुनाव की बात करें तो इस बार मेजर विजय सिंह मनकोटिया मैदान में नहीं है। वहीं&nbsp; भाजपा से एक बागी उम्मीदवार सरवीण चौधरी के खिलाफ मैदान में उतरे है। ऐसे में कांग्रेस के केवल सिंह पठानिया क्या इस बार जीत का स्वाद चख पाएंगे, इस पर सभी की नजरें है। पर अगर केवल अभी भी नहीं जीते तो ये उनकी तीसरी हार होगी और ऐसे में उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठना भी लाजमी होगा। हालांकि मंत्री सरवीण चौधरी को लेकर इस क्षेत्र में एंटी इंकम्बेंसी जरूर दिखी है। पर ऐसा पिछले दो चुनाव में भी था लेकिन, बावजूद इसके सरवीण आसानी से जीती थी। ऐसे में अब आठ दिसम्बर को क्या नतीजा आता है, इसका अनुमान अभी से लगाना मुश्किल है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25792.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Will this time only taste the taste of victory?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/chunav-2022/by-winning-haroli-will-agnihotri-find-the-way-to-oakover]]></guid>
                       <title><![CDATA[हरोली जीतकर क्या ओकओवर का रास्ता पकड़ेंगे अग्निहोत्री ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/chunav-2022/by-winning-haroli-will-agnihotri-find-the-way-to-oakover]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 01 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[इस दफा ऊना जिला की हरोली सीट का चुनाव बड़े मायने रखता है। यह नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री की गृह सीट है। अग्निहोत्री कांग्रेस के तेज तर्रार नेताओं में से हैं, जो 5 साल भाजपा सरकार को विधानसभा के भीतर से लेकर बाहर तक घेरते रहे हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई तो बड़ा सवाल था कि आखिर सदन में कांग्रेस की अगुवाई कौन करेगा ?&nbsp;निगाहें उम्रदराज वीरभद्र सिंह पर थी और उन्होंने अपना भरोसा जताया मुकेश अग्निहोत्री पर। अग्निहोत्री भी भरोसे पर खरा उतरे। वे चौथी बार के विधायक थे और वीरभद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके थे। वीरभद्र सिंह से सियासत की बारीकियां सीखते-सीखते आगे बढ़ रहे थे, सो मात कैसे खाते। सदन में मुकेश अग्निहोत्री ने दमदार तरीके से न सिर्फ कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया बल्कि हर मुमकिन मौके पर जयराम सरकार को भी जमकर घेरा।&nbsp;

कभी पेशे से मुकेश अग्निहोत्री पत्रकार थे और जनसत्ता अखबार के लिए लिखा करते थे। तभी राजनीतिक खबरें लिखते-लिखते राजनीति ने न जाने कब मुकेश को अपने पाले में&nbsp; कर लिया और पत्रकारिता छोड़ अग्निहोत्री सियासी अखाड़े में उतर आएं। 2003&nbsp; में वे संतोखगढ़ से अपना पहला चुनाव लड़े और विधानसभा पहुंच गए। 2007 में इसी सीट से दूसरी बार जीते। फिर नए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आये हरोली विधानसभा क्षेत्र से वे 2012 और 2017 में चुनाव जीते। इस दौरान वे वीरभद्र सिंह के करीबी रहे और उन्हीं की सरपरस्ती में लगातार आगे बढ़ते रहे। अब इस बार मुकेश अग्निहोत्री ने पांचवी बार विधानसभा का चुनाव का लड़ा है और वे फिर अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है।

हरोली सीट की बात करें तो इस बार तीसरी बार मुकेश अग्निहोत्री और भाजपा के प्रो राम कुमार आमने सामने है। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में&nbsp; मुकेश अग्निहोत्री ने भाजपा के राम कुमार को 5172 वोटों&nbsp; से हराया तो यही अंतर साल 2017 के चुनाव में 7377 हो गया। अब इस चुनाव में भाजपा ने हरोली सीट पर एड़ी चोटी का जोर लगाया है। जयराम सरकार के विकास कार्यों और केंद्र की बल्क ड्रग पार्क की सौगात के सहारे भाजपा उलटफेर की कोशिश में रही है। उधर मुकेश अग्निहोत्री ने भी निसंदेह हरोली में काफी विकास&nbsp; करवाया है। पर खास बात ये है कि उन्होंने भावी सीएम के टैग के साथ इस बार चुनाव लड़ा है। हालांकि बेशक खुद मुकेश अग्निहोत्री बार -बार सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात दोहराते रहे हो, लेकिन उनके समर्थक तो उन्हें भावी सीएम ही मानते रहे है। दरअसल यदि प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनती है तो मुकेश अग्निहोत्री भी मुख्यमंत्री की रेस में है। जाहिर है ऐसे में हरोली सीट पर सबकी निगाह टिकी है। बहरहाल मुकेश अग्निहोत्री अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है।


ये है सीएम पद के दावेदार&nbsp;
अब बात कर लेते है कांग्रेस में सीएम पद के दावेदारों की। कुछ माह पूर्व प्रदेश में हुए फेरबदल के दौरान कांग्रेस आलाकमान ने तीन नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मे दिए थे। प्रतिभा सिंह प्रदेश अध्यक्ष, सुखविंद्र सिंह सुक्खू चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष और मुकेश अग्निहोत्री नेता प्रतिपक्ष। जाहिर है ये तीनों कांग्रेस की सत्ता वापसी की स्थिति में सीएम पद के दावेदार है। इनके अलावा कौल सिंह ठाकुर, राम लाल ठाकुर, आशा कुमारी सहित कई और नाम है जिन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। जानकार मानते है कि होलीलॉज और मुकेश के बीच सीएम को लेकर एकराय दिख सकती है, चेहरा चाहे कोई भी हो।


तब रणजीत सिंह नहीं कर पाएं, अब मुकेश पर निगाहें :
ऊना जिला को कभी सीएम पद नहीं मिला है। हालांकि इतिहास में एक मौका ऐसा आया जब ऊना को सीएम पद मिलते-मिलते रह गया। 1977 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में जनता पार्टी सत्ता में आई थी। तब जनता पार्टी को 53 सीटें मिली थी। जबकि कांग्रेस को महज 9 सीट मिली थी। उस चुनाव में 6 निर्दलीय भी जीते थे और सभी ने जनता पार्टी को समर्थन दिया। इस तरह जनता पार्टी के समर्थन में कुल विधायकों का आंकड़ा पहुंच गया 59। चुनाव के बाद बारी आई मुख्यमंत्री चुनने की। सीएम पद के लिए शांता कुमार का मुकाबला हमीरपुर के लोकसभा सदस्य ठाकुर रणजीत सिंह से था। ठाकुर रणजीत सिंह ऊना जिला के कुटलैहड़ से ताल्लुख रखते थे।&nbsp;तब सीएम पद के लिए एक गुट ने सांसद रणजीत सिंह का नाम आगे किया, तो दूसरे ने शांता कुमार के नाम का प्रस्ताव रखा। दोनों गुट सीएम पद पर समझौता करने को तैयार नहीं थे। ऐसे में वोटिंग ही इकलौता रास्ता रह गया था। शांता कुमार के अलावा कुल 58 विधायक थे और जब वोटिंग हुई तो इनमें से 29 ने शांता कुमार का समर्थन किया और 29 ने ठाकुर रणजीत सिंह का। इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। तब अपने ही वोट से शांता कुमार के समर्थक विधायकों का आंकड़ा 30 पंहुचा और इस तरह वे पहली बार मुख्यमंत्री बने। तब ऊना को सीएम पद मिलते-मिलते रह गया था। अब अगर मुकेश अग्निहोत्री सीएम पद तक पहुंच पाएं तो 45 वर्ष पहले टुटा जिला ऊना का अरमान पूरा होगा।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस दफा ऊना जिला की हरोली सीट का चुनाव बड़े मायने रखता है। यह नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री की गृह सीट है। अग्निहोत्री कांग्रेस के तेज तर्रार नेताओं में से हैं, जो 5 साल भाजपा सरकार को विधानसभा के भीतर से लेकर बाहर तक घेरते रहे हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई तो बड़ा सवाल था कि आखिर सदन में कांग्रेस की अगुवाई कौन करेगा ?&nbsp;निगाहें उम्रदराज वीरभद्र सिंह पर थी और उन्होंने अपना भरोसा जताया मुकेश अग्निहोत्री पर। अग्निहोत्री भी भरोसे पर खरा उतरे। वे चौथी बार के विधायक थे और वीरभद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके थे। वीरभद्र सिंह से सियासत की बारीकियां सीखते-सीखते आगे बढ़ रहे थे, सो मात कैसे खाते। सदन में मुकेश अग्निहोत्री ने दमदार तरीके से न सिर्फ कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया बल्कि हर मुमकिन मौके पर जयराम सरकार को भी जमकर घेरा।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कभी पेशे से मुकेश अग्निहोत्री पत्रकार थे और जनसत्ता अखबार के लिए लिखा करते थे। तभी राजनीतिक खबरें लिखते-लिखते राजनीति ने न जाने कब मुकेश को अपने पाले में&nbsp; कर लिया और पत्रकारिता छोड़ अग्निहोत्री सियासी अखाड़े में उतर आएं। 2003&nbsp; में वे संतोखगढ़ से अपना पहला चुनाव लड़े और विधानसभा पहुंच गए। 2007 में इसी सीट से दूसरी बार जीते। फिर नए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आये हरोली विधानसभा क्षेत्र से वे 2012 और 2017 में चुनाव जीते। इस दौरान वे वीरभद्र सिंह के करीबी रहे और उन्हीं की सरपरस्ती में लगातार आगे बढ़ते रहे। अब इस बार मुकेश अग्निहोत्री ने पांचवी बार विधानसभा का चुनाव का लड़ा है और वे फिर अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हरोली सीट की बात करें तो इस बार तीसरी बार मुकेश अग्निहोत्री और भाजपा के प्रो राम कुमार आमने सामने है। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में&nbsp; मुकेश अग्निहोत्री ने भाजपा के राम कुमार को 5172 वोटों&nbsp; से हराया तो यही अंतर साल 2017 के चुनाव में 7377 हो गया। अब इस चुनाव में भाजपा ने हरोली सीट पर एड़ी चोटी का जोर लगाया है। जयराम सरकार के विकास कार्यों और केंद्र की बल्क ड्रग पार्क की सौगात के सहारे भाजपा उलटफेर की कोशिश में रही है। उधर मुकेश अग्निहोत्री ने भी निसंदेह हरोली में काफी विकास&nbsp; करवाया है। पर खास बात ये है कि उन्होंने भावी सीएम के टैग के साथ इस बार चुनाव लड़ा है। हालांकि बेशक खुद मुकेश अग्निहोत्री बार -बार सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात दोहराते रहे हो, लेकिन उनके समर्थक तो उन्हें भावी सीएम ही मानते रहे है। दरअसल यदि प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनती है तो मुकेश अग्निहोत्री भी मुख्यमंत्री की रेस में है। जाहिर है ऐसे में हरोली सीट पर सबकी निगाह टिकी है। बहरहाल मुकेश अग्निहोत्री अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>ये है सीएम पद के दावेदार&nbsp;</strong><br />
अब बात कर लेते है कांग्रेस में सीएम पद के दावेदारों की। कुछ माह पूर्व प्रदेश में हुए फेरबदल के दौरान कांग्रेस आलाकमान ने तीन नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मे दिए थे। प्रतिभा सिंह प्रदेश अध्यक्ष, सुखविंद्र सिंह सुक्खू चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष और मुकेश अग्निहोत्री नेता प्रतिपक्ष। जाहिर है ये तीनों कांग्रेस की सत्ता वापसी की स्थिति में सीएम पद के दावेदार है। इनके अलावा कौल सिंह ठाकुर, राम लाल ठाकुर, आशा कुमारी सहित कई और नाम है जिन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। जानकार मानते है कि होलीलॉज और मुकेश के बीच सीएम को लेकर एकराय दिख सकती है, चेहरा चाहे कोई भी हो।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>तब रणजीत सिंह नहीं कर पाएं, अब मुकेश पर निगाहें :</strong><br />
ऊना जिला को कभी सीएम पद नहीं मिला है। हालांकि इतिहास में एक मौका ऐसा आया जब ऊना को सीएम पद मिलते-मिलते रह गया। 1977 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में जनता पार्टी सत्ता में आई थी। तब जनता पार्टी को 53 सीटें मिली थी। जबकि कांग्रेस को महज 9 सीट मिली थी। उस चुनाव में 6 निर्दलीय भी जीते थे और सभी ने जनता पार्टी को समर्थन दिया। इस तरह जनता पार्टी के समर्थन में कुल विधायकों का आंकड़ा पहुंच गया 59। चुनाव के बाद बारी आई मुख्यमंत्री चुनने की। सीएम पद के लिए शांता कुमार का मुकाबला हमीरपुर के लोकसभा सदस्य ठाकुर रणजीत सिंह से था। ठाकुर रणजीत सिंह ऊना जिला के कुटलैहड़ से ताल्लुख रखते थे।&nbsp;तब सीएम पद के लिए एक गुट ने सांसद रणजीत सिंह का नाम आगे किया, तो दूसरे ने शांता कुमार के नाम का प्रस्ताव रखा। दोनों गुट सीएम पद पर समझौता करने को तैयार नहीं थे। ऐसे में वोटिंग ही इकलौता रास्ता रह गया था। शांता कुमार के अलावा कुल 58 विधायक थे और जब वोटिंग हुई तो इनमें से 29 ने शांता कुमार का समर्थन किया और 29 ने ठाकुर रणजीत सिंह का। इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। तब अपने ही वोट से शांता कुमार के समर्थक विधायकों का आंकड़ा 30 पंहुचा और इस तरह वे पहली बार मुख्यमंत्री बने। तब ऊना को सीएम पद मिलते-मिलते रह गया था। अब अगर मुकेश अग्निहोत्री सीएम पद तक पहुंच पाएं तो 45 वर्ष पहले टुटा जिला ऊना का अरमान पूरा होगा।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25791.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[By winning Haroli, will Agnihotri find the way to Oakover?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/dharamsala-has-the-slogan-sudhir-hi-sudhar-hai-worked]]></guid>
                       <title><![CDATA[धर्मशाला : क्या काम कर गया 'सुधीर ही सुधार है' का नारा ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/dharamsala-has-the-slogan-sudhir-hi-sudhar-hai-worked]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 01 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[धर्मशाला प्रदेश की दूसरी &quot;कागजी&quot; राजधानी है। कहते है धर्मशाला में सियासत कभी थमती नहीं। इस चुनाव में भी धर्मशाला हॉट सीट बनी हुई है। ये कांग्रेस के दिग्गज नेता सुधीर शर्मा की सीट है और यहाँ इस बार भी सुधीर शर्मा ने पूरे दमखम से चुनाव लड़ा है। वहीं दूसरी ओर इस बार धर्मशाला में भाजपा ने सिटींग विधायक का टिकट काट कर हाल ही में आम आदमी पार्टी से भाजपा में लौटे राकेश चौधरी को मैदान में उतारा है। इस टिकट के बदलाव के चलते भाजपा ने यहां विरोध का सामना भी किया। पार्टी ने यहां सीटिंग विधायक विशाल नेहरिया को तो मना लिया, लेकिन पार्टी टिकट के एक अन्य चाहवान विपिन नेहरिया को नहीं मना पाई। विपिन नेहरिया भाजपा जनजातीय मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे है, परन्तु टिकट न मिलने पर उन्होंने बगावत कर दी और बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा।

यूँ तो कांग्रेस में सुधीर शर्मा को टिकट मिलने से कई लोग नाराज थे, लेकिन उन्होंने खुल कर बगावत नहीं की। जानकर मानते है कि जितनी नाराजगी भाजपा में राकेश चौधरी को लेकर रही, उतनी ही नाराजगी कांग्रेस में सुधीर शर्मा को लेकर भी रही, बस फर्क रहा कि भाजपा की नाराजगी खुले तौर पर सामने आई और कांग्रेस की नाराजगी अंदर ही अंदर चलती रही। फिर भी यहाँ सुधीर शर्मा 2012 से 2017 के अपने कार्यकाल में करवाएं गए विकास कार्यों को लेकर दमखम से चुनाव लड़े है। उनका नारा &#39;सुधीर ही सुधार है&#39; भी चर्चा में रहा और वे जीत को लेकर आश्वस्त दिख रहे है। सुधीर का दावा है कि धर्मशाला की जनता सुधार कर चुकी है और आठ दिसम्बर को वे फिर धर्मशाला के विधायक होंगे।&nbsp;&nbsp;

उधर भाजपा अगर जीत दर्ज नहीं कर सकी तो कई सवाल उठेंगे। दरअसल सवाल तो अभी से उठ रहे है। 2019 में इसी धर्मशाला सीट पर उपचुनाव हुआ था और तब पार्टी ने विशाल नेहरिया को टिकट दिया था। विरोध में राकेश चौधरी ने निर्दलीय चुनाव लड़ा। हालांकि तब जीत विशाल की हुई लेकिन अब भाजपा ने तब बगावत करने वाले को ही टिकट दे दिया। इस पर राकेश चौधरी इस बीच आम आदमी पार्टी में जाकर भी वापस आएं है। फिर भी पार्टी को चौधरी में ही जीत की सम्भावना दिखी। अब चौधरी जीत गए तो ठीक, वरना अभी से पार्टी के भीतर उठे रहे सवाल भाजपा को बहुत चुभने वाले है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">धर्मशाला प्रदेश की दूसरी &quot;कागजी&quot; राजधानी है। कहते है धर्मशाला में सियासत कभी थमती नहीं। इस चुनाव में भी धर्मशाला हॉट सीट बनी हुई है। ये कांग्रेस के दिग्गज नेता सुधीर शर्मा की सीट है और यहाँ इस बार भी सुधीर शर्मा ने पूरे दमखम से चुनाव लड़ा है। वहीं दूसरी ओर इस बार धर्मशाला में भाजपा ने सिटींग विधायक का टिकट काट कर हाल ही में आम आदमी पार्टी से भाजपा में लौटे राकेश चौधरी को मैदान में उतारा है। इस टिकट के बदलाव के चलते भाजपा ने यहां विरोध का सामना भी किया। पार्टी ने यहां सीटिंग विधायक विशाल नेहरिया को तो मना लिया, लेकिन पार्टी टिकट के एक अन्य चाहवान विपिन नेहरिया को नहीं मना पाई। विपिन नेहरिया भाजपा जनजातीय मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे है, परन्तु टिकट न मिलने पर उन्होंने बगावत कर दी और बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">यूँ तो कांग्रेस में सुधीर शर्मा को टिकट मिलने से कई लोग नाराज थे, लेकिन उन्होंने खुल कर बगावत नहीं की। जानकर मानते है कि जितनी नाराजगी भाजपा में राकेश चौधरी को लेकर रही, उतनी ही नाराजगी कांग्रेस में सुधीर शर्मा को लेकर भी रही, बस फर्क रहा कि भाजपा की नाराजगी खुले तौर पर सामने आई और कांग्रेस की नाराजगी अंदर ही अंदर चलती रही। फिर भी यहाँ सुधीर शर्मा 2012 से 2017 के अपने कार्यकाल में करवाएं गए विकास कार्यों को लेकर दमखम से चुनाव लड़े है। उनका नारा &#39;सुधीर ही सुधार है&#39; भी चर्चा में रहा और वे जीत को लेकर आश्वस्त दिख रहे है। सुधीर का दावा है कि धर्मशाला की जनता सुधार कर चुकी है और आठ दिसम्बर को वे फिर धर्मशाला के विधायक होंगे।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उधर भाजपा अगर जीत दर्ज नहीं कर सकी तो कई सवाल उठेंगे। दरअसल सवाल तो अभी से उठ रहे है। 2019 में इसी धर्मशाला सीट पर उपचुनाव हुआ था और तब पार्टी ने विशाल नेहरिया को टिकट दिया था। विरोध में राकेश चौधरी ने निर्दलीय चुनाव लड़ा। हालांकि तब जीत विशाल की हुई लेकिन अब भाजपा ने तब बगावत करने वाले को ही टिकट दे दिया। इस पर राकेश चौधरी इस बीच आम आदमी पार्टी में जाकर भी वापस आएं है। फिर भी पार्टी को चौधरी में ही जीत की सम्भावना दिखी। अब चौधरी जीत गए तो ठीक, वरना अभी से पार्टी के भीतर उठे रहे सवाल भाजपा को बहुत चुभने वाले है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall25787.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Dharamsala: Has the slogan 'Sudhir Hi Sudhar Hai' worked?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/the-royal-family-never-allowed-lotus-to-bloom-on-this-seat]]></guid>
                       <title><![CDATA[इस सीट पर राजपरिवार ने कभी कमल नहीं खिलने दिया]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/the-royal-family-never-allowed-lotus-to-bloom-on-this-seat]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 01 Dec 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[1980 में भाजपा की स्थापना हुई थी और हिमाचल प्रदेश में 1982 के अपने पहले विधानसभा चुनाव में ही पार्टी ने 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी। प्रदेश में पार्टी का जनधार लगातार बढ़ता रहा और एक- एक कर कांग्रेस के कई मजबूत गढ़ों में भाजपा ने सेंध लगाईं। पर एक सीट ऐसी है जिसे अब तक भाजपा जीत नहीं पाई है और ये सीट है रामपुर। इस सीट पर कांग्रेस सिर्फ 1977 की जनता लहर में हारी थी। इसके बाद हर बार यहाँ कांग्रेस ही जीती है।&nbsp;दरअसल रामपुर सीट पर रामपुर बुशहर रियासत के राजा और हिमाचल की सियासत के भी राजा रहे स्व वीरभद्र सिंह का ख़ासा प्रभाव रहा है। हालांकि आरक्षित होने के चलते इस सीट पर कभी राजपरिवार का कोई सदस्य खुद चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन चेहरा चाहे कोई भी रहा हो यहां वोट राजपरिवार के नाम पर ही पड़ते आएं है। अब वीरभद्र सिंह के निधन के बाद भी इस सीट पर राजपरिवार का प्रभाव दिखता है। पिछले साल हुए मंडी संसदीय उपचुनाव में भी इस सीट पर कांग्रेस को रिकॉर्ड लीड मिली थी।&nbsp;इस सीट के इतिहास पर निगाह डाले तो 1982 से लेकर 2003 तक यहाँ कांग्रेस के सिंघीराम ने लगातार जीत दर्ज की। सिंघीराम कभी वीरभद्र सिंह के करीबी थे, लेकिन दोनों में दूरियां बढ़ी तो 2007 में राज परिवार का आशीर्वाद नंदलाल को मिला। तब से नंदलाल तीन बार जीत चुके है और इस मर्तबा उन्होंने अपना चौथा चुनाव लड़ा है।

&nbsp;पर इसी रामपुर सीट पर एक आंकड़ा कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है। 2003 के चुनाव में कांग्रेस 17247 वोट से इस सीट पर जीती थी। 2007 में कांग्रेस ने यहाँ से प्रत्याशी बदला, और नंदलाल को मैदान में उतारा। नंदलाल को जीत तो मिली लेकिन अंतर घटकर 6470 वोट का रह गया। 2012 में नंदलाल 9471 वोट से जीते, पर 2017 में अंतर 4037 वोट का ही रहा। अब इस बार इस क्षेत्र में नंदलाल को लेकर ख़ासा विरोध दिखा है। हालांकि होलीलॉज से नजदीकी नंदलाल के काम आई और वे फिर टिकट ले आए, किन्तु पहली बार इस सीट पर नजदीकी मुकाबले के कयास लग रहे है। उधर इस बार भाजपा ने रामपुर विधानसभा सीट से युवा चेहरे कौल सिंह नेगी को मैदान में उतारा है। इसमें कोई संशय नहीं है कि कौल सिंह नेगी ने पुरे दमखम के साथ चुनाव लड़ा है। अब उनकी मुहीम रंग लाती है या नहीं, इसके लिए फिलवक्त आठ दिसंबर का इन्तजार करना होगा।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">1980 में भाजपा की स्थापना हुई थी और हिमाचल प्रदेश में 1982 के अपने पहले विधानसभा चुनाव में ही पार्टी ने 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी। प्रदेश में पार्टी का जनधार लगातार बढ़ता रहा और एक- एक कर कांग्रेस के कई मजबूत गढ़ों में भाजपा ने सेंध लगाईं। पर एक सीट ऐसी है जिसे अब तक भाजपा जीत नहीं पाई है और ये सीट है रामपुर। इस सीट पर कांग्रेस सिर्फ 1977 की जनता लहर में हारी थी। इसके बाद हर बार यहाँ कांग्रेस ही जीती है।&nbsp;</span><span style="font-size: 18px;">दरअसल रामपुर सीट पर रामपुर बुशहर रियासत के राजा और हिमाचल की सियासत के भी राजा रहे स्व वीरभद्र सिंह का ख़ासा प्रभाव रहा है। हालांकि आरक्षित होने के चलते इस सीट पर कभी राजपरिवार का कोई सदस्य खुद चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन चेहरा चाहे कोई भी रहा हो यहां वोट राजपरिवार के नाम पर ही पड़ते आएं है। अब वीरभद्र सिंह के निधन के बाद भी इस सीट पर राजपरिवार का प्रभाव दिखता है। पिछले साल हुए मंडी संसदीय उपचुनाव में भी इस सीट पर कांग्रेस को रिकॉर्ड लीड मिली थी।&nbsp;</span><span style="font-size: 18px;">इस सीट के इतिहास पर निगाह डाले तो 1982 से लेकर 2003 तक यहाँ कांग्रेस के सिंघीराम ने लगातार जीत दर्ज की। सिंघीराम कभी वीरभद्र सिंह के करीबी थे, लेकिन दोनों में दूरियां बढ़ी तो 2007 में राज परिवार का आशीर्वाद नंदलाल को मिला। तब से नंदलाल तीन बार जीत चुके है और इस मर्तबा उन्होंने अपना चौथा चुनाव लड़ा है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;पर इसी रामपुर सीट पर एक आंकड़ा कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है। 2003 के चुनाव में कांग्रेस 17247 वोट से इस सीट पर जीती थी। 2007 में कांग्रेस ने यहाँ से प्रत्याशी बदला, और नंदलाल को मैदान में उतारा। नंदलाल को जीत तो मिली लेकिन अंतर घटकर 6470 वोट का रह गया। 2012 में नंदलाल 9471 वोट से जीते, पर 2017 में अंतर 4037 वोट का ही रहा। अब इस बार इस क्षेत्र में नंदलाल को लेकर ख़ासा विरोध दिखा है। हालांकि होलीलॉज से नजदीकी नंदलाल के काम आई और वे फिर टिकट ले आए, किन्तु पहली बार इस सीट पर नजदीकी मुकाबले के कयास लग रहे है। उधर इस बार भाजपा ने रामपुर विधानसभा सीट से युवा चेहरे कौल सिंह नेगी को मैदान में उतारा है। इसमें कोई संशय नहीं है कि कौल सिंह नेगी ने पुरे दमखम के साथ चुनाव लड़ा है। अब उनकी मुहीम रंग लाती है या नहीं, इसके लिए फिलवक्त आठ दिसंबर का इन्तजार करना होगा।</span></p>
]]></content:encoded>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[The royal family never allowed lotus to bloom on this seat]]></media:description>
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                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-the-former-mlas-wife-be-able-to-get-the-bjp-back]]></guid>
                       <title><![CDATA[पूर्व विधायक की पत्नी क्या करवा पाएंगी भाजपा की वापसी]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kaun-banega-vidhayak/will-the-former-mlas-wife-be-able-to-get-the-bjp-back]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 30 Nov 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[बड़सर विधानसभा सीट वो सीट है जहाँ अक्सर बगावत और भीतरघात के कारण राजनितिक दलों को हार का ही सामना करना पड़ा है। कभी ये सीट भाजपा की गढ़ थी। 1980 में भाजपा का गठन हुआ और उसके बाद 1982&nbsp; में हुए पहले चुनाव में ही भाजपा ने यहाँ जीत के साथ खाता खोला था। 2007 तक यहाँ भाजपा सिर्फ दो चुनाव हारी थी,और 1998 से 2007 तक तीन चुनाव जीतकर बलदेव शर्मा यहाँ जीत की हैट्रिक लगा चुके थे। पर परिसीमन के बाद ये सीट बड़सर हो गई और यहाँ के समीकरण भी बदल गए। 2012 में कांग्रेस के इंद्रदत्त लखनपाल ने लम्बे अंतराल के बाद इस सीट को कांग्रेस के नाम किया। 2017 में फिर इंद्रदत्त लखनपाल ने बड़सर विधानसभा सीट पर जीत हासिल की। इस बार फिर कांग्रेस से इंद्रदत्त लखनपाल मैदान में है।

उधर भाजपा से टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे राकेश शर्मा बबली के आकस्मिक निधन के बाद भाजपा ने पूर्व विधायक बलदेव शर्मा की पत्नी माया शर्मा को मैदान में उतारा है। जबकि भाजपा से टिकट की मांग कर रहे राकेश बबली के भाई संजीव&nbsp; ने टिकट न मिलने पर इस बार निर्दलीय ताल ठोकी है। निसंदेह बलदेव शर्मा की क्षेत्र में पकड़ है जिसका लाभ माया शर्मा को मिल सकता है, लेकिन संजीव के मैदान में होने से भाजपा को बगावत का सामना करना पड़ा है। ऐसे में जाहिर है कि इसका सीधा लाभ कांग्रेस के इंद्रदत्त लखनपाल को मिलता दिख रहा है। बहरहाल इस बार इंद्रदत्त लखनपाल जीत की हैट्रिक लगा पाते है या नहीं, ये तो नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।


कांग्रेस और लखनपाल दोनों जीते, तो भी मंत्री पद पक्का नहीं !
अगर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है और इंद्रदत्त लखनपाल भी अपना चुनाव जीत जाते है, तो उन्हें अहम् दायित्व मिल सकता है। पर मसला ये है कि जिला हमीरपुर में कांग्रेस के तीन ऐसे नेता है जिनको सरकार में बड़ा दायित्व मिलने के कयास है। लखनपाल&nbsp; के अलावा चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष सुखविंद्र&nbsp; सिंह सुक्खू और प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष राजेंद्र राणा भी हमीरपुर जिला से ही है। ऐसे में अगर कांग्रेस जीतती है और ये सभी नेता भी चुनाव जीत जाते है, तब भी जीत की हैट्रिक के बावजूद लखनपाल मंत्री पद से वंचित रह सकते है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बड़सर विधानसभा सीट वो सीट है जहाँ अक्सर बगावत और भीतरघात के कारण राजनितिक दलों को हार का ही सामना करना पड़ा है। कभी ये सीट भाजपा की गढ़ थी। 1980 में भाजपा का गठन हुआ और उसके बाद 1982&nbsp; में हुए पहले चुनाव में ही भाजपा ने यहाँ जीत के साथ खाता खोला था। 2007 तक यहाँ भाजपा सिर्फ दो चुनाव हारी थी,और 1998 से 2007 तक तीन चुनाव जीतकर बलदेव शर्मा यहाँ जीत की हैट्रिक लगा चुके थे। पर परिसीमन के बाद ये सीट बड़सर हो गई और यहाँ के समीकरण भी बदल गए। 2012 में कांग्रेस के इंद्रदत्त लखनपाल ने लम्बे अंतराल के बाद इस सीट को कांग्रेस के नाम किया। 2017 में फिर इंद्रदत्त लखनपाल ने बड़सर विधानसभा सीट पर जीत हासिल की। इस बार फिर कांग्रेस से इंद्रदत्त लखनपाल मैदान में है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उधर भाजपा से टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे राकेश शर्मा बबली के आकस्मिक निधन के बाद भाजपा ने पूर्व विधायक बलदेव शर्मा की पत्नी माया शर्मा को मैदान में उतारा है। जबकि भाजपा से टिकट की मांग कर रहे राकेश बबली के भाई संजीव&nbsp; ने टिकट न मिलने पर इस बार निर्दलीय ताल ठोकी है। निसंदेह बलदेव शर्मा की क्षेत्र में पकड़ है जिसका लाभ माया शर्मा को मिल सकता है, लेकिन संजीव के मैदान में होने से भाजपा को बगावत का सामना करना पड़ा है। ऐसे में जाहिर है कि इसका सीधा लाभ कांग्रेस के इंद्रदत्त लखनपाल को मिलता दिख रहा है। बहरहाल इस बार इंद्रदत्त लखनपाल जीत की हैट्रिक लगा पाते है या नहीं, ये तो नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>कांग्रेस और लखनपाल दोनों जीते, तो भी मंत्री पद पक्का नहीं !</strong><br />
अगर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है और इंद्रदत्त लखनपाल भी अपना चुनाव जीत जाते है, तो उन्हें अहम् दायित्व मिल सकता है। पर मसला ये है कि जिला हमीरपुर में कांग्रेस के तीन ऐसे नेता है जिनको सरकार में बड़ा दायित्व मिलने के कयास है। लखनपाल&nbsp; के अलावा चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष सुखविंद्र&nbsp; सिंह सुक्खू और प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष राजेंद्र राणा भी हमीरपुर जिला से ही है। ऐसे में अगर कांग्रेस जीतती है और ये सभी नेता भी चुनाव जीत जाते है, तब भी जीत की हैट्रिक के बावजूद लखनपाल मंत्री पद से वंचित रह सकते है।</span></p>
]]></content:encoded>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[Will the former MLA's wife be able to get the BJP back]]></media:description>
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