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               <title>First Verdict Media - Kavya Rath</title>
               <link>https://www.firstverdict.com</link>
               <lastBuildDate><![CDATA[Fri, 01 May 2026 08:51:55 +0530]]></lastBuildDate>
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            	<title>First Verdict Media - Kavya Rath</title>
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            <description>First Verdict Media provides the latest information from and in-depth coverage of India and the world. Find breaking news, India news, Himachal news, top stories, elections, politics, business, cricket, movies, lifestyle, health, videos, photos and more.</description>
            
           <item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/himachal/half-burnt-cigarettes-empty-cups-of-tea-and-incomplete-love]]></guid>
                       <title><![CDATA[अधजली सिगरेट, चाय के झूठे प्याले और अधूरा इश्क़..]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/himachal/half-burnt-cigarettes-empty-cups-of-tea-and-incomplete-love]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 21 Nov 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[साहिर लुधियानवी के&nbsp;अल्फाज़ न जाने कितनी अधूरी प्रेम कहानियों का दर्द बयाँ करते है। वह दर्द जो ख़ामोशी के नीचे दबे उस मशहूर मगर अनकहे एहसास की दास्तान है, जिसे हर आशिक़ ने हिज्र के बाद कहीं न कहीं महसूस किया है। अधूरे इश्क़ का अंजाम दिखाती उनके जीवन से जुड़ी एक कहानी जो शुरू तो हुई,&nbsp; मगर मंज़िल तक कभी पहुँच न सकी। एक ऐसी मोहब्बत जो ज़माने की बनाई लकीरों से अलग थी, और जो आखिर में आधी जली सिगरेटों, चाय के झूठे प्यालों और ढेरों ख़तों में सिमटकर रह गई।&nbsp;

यह कहानी है उर्दू के मशहूर शायर साहिर लुधियानवी और पंजाब की पहली बाग़ी कवयित्री अमृता प्रीतम की। अधूरी मोहब्बत का यह एक ऐसा मुकम्मल फ़साना है, जिसके जैसा दूसरा ढूँढ पाना मुश्किल है; एक फ़साना जो मंज़िल तक पहुँचने से पहले लड़खड़ाया ज़रूर, मगर उसका असर कभी फीका नहीं पड़ा।

16 साल में अमृता की करवा दी गयी शादी&nbsp;&nbsp;
अमृता एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती थी जहां धर्म के धागे इंसान की किस्मत तय किया करते थे। जहां उनकी नानी मां अन्य समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोगों के बर्तन भी अलग रखती थी, जहां शादी का मतलब जिंदगी भर का साथ होता था। ऐसे परिवार में जन्मी थी वो बेख़ौफ़ कवियत्री जिसने अपनी जिंदगी में दो लोगों से प्यार किया जिनमें से एक मुस्लमान था। ज़ाहिर है की अमृता प्रीतम वो महिला थी जो अपने दौर से बहुत आगे थी। अमृता जब 16 साल की थीं, तो उनकी शादी प्रीतम सिंह से करवा दी गई। शादी के बाद वे अमृता कौर से अमृता प्रीतम बन गई। अमृता ने अपने पति का नाम तो अपनाया लेकिन वो उनकी अभिन्न अंग नहीं बन पाई।&nbsp;

साहिर-अमृता की पहली मुलाकात&nbsp;
ये बात 1944 की है जब साहिर अमृता पहली बार एक दूसरे से मिले थे। जगह थी लाहौर और दिल्ली के बीच स्थित प्रीत नगर जहां एक बड़े मुशायरे का आयोजन किया गया था अमृता यहां पहुंची थी। इसी मुशायरे में आम सा दिखने वाला, लेकिन अच्छी कदकाठी का एक युवक भी आया था जिसका नाम था साहिर लुधियाना। साहिर जुनुनी और आदर्शवादी थे, अमृता बेहद दिलकश अपनी खूबसूरती में भी और अपनी लेखनी में भी। बेहद क्रांतिकारी मिजाज के साहिर अमृता को पहली ही मुलाक़ात में भा गए थे। वहीं अमृता भी पहली ही मुलाकात में साहिर को अपना दिल दे बैठी थी। इस मुलाकात में कोई बात नहीं हुई। दोनों घंटो खामोश बैठे रहें। शायद उस समय की मोहब्बत ख़ामोशी से शुरू हुआ करती होगी, वैसे भी जहां इश्क़ ब्यां करने के लिए लफ़्ज़ों की ज़रूरत पड़े वो मोहब्बत कैसी। अमृता ने लिखा, &quot;मुझे नहीं मालूम की वो साहिर के लफ्जो की जादूगरी थी, या उनकी खामोश नज़र का कमाल था, लेकिन कुछ तो था जिसने मुझे अपनी तरफ खींच लिया, आज जब उस रात को आँखें मूंद कर देखती हूँ तो ऐसा समझ आता है कि तकदीर ने मेरे दिल में इश्क़ का बीज डाला जिसे बारिश की फुहारों ने बढ़ा दिया, उस दिन बारिश हुई थी।&quot;&nbsp;&nbsp;

साहिर से मिलने के बाद अमृता ने उनके लिए एक कविता भी लिखी थी &#39;अब रात गिरने लगी तो तू मिला है, तू भी उदास, चुप, शांत और अडोल। मैं भी उदास, चुप, शांत और अडोल। सिर्फ- दूर बहते समुद्र में तूफान है&hellip;&#39;


आत्मकथाओं में लिखे मोहब्बत के किस्से&nbsp;
साहिर और अमृता की प्रेम कहानी के किस्से इन दोनों की आत्मकथाओं में मिलते है, अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में अमृता प्रीतम ने साहिर के साथ हुई मुलाकातों का जिक्र किया है। वो लिखती है कि, &quot;वो खामोशी से सिगरेट जलाता और फिर आधी सिगरेट ही बुझा देता, फिर एक नई सिगरेट जला लेता। जब तक वो विदा लेता, कमरा सिगरेट की महक से भर जाता। मैं इन सिगरेटों को हिफाजत से उठाकर अलमारी में रख देती और जब कमरे में अकेली होती तो उन सिगरेटों को एक-एक करके पीती। मेरी उंगलियों में फंसी सिगरेट, ऐसा लगता कि मैं उसकी उंगलियों को छू रही हूं। मुझे धुएं में उसकी शक्ल दिखाई पड़ती। ऐसे मुझे सिगरेट पीने की लत लग गई।&quot;&nbsp;

अमृता लिखती है-&nbsp;&nbsp;
&quot;यह आग की बात है&nbsp;
तूने यह बात सुनाई है&nbsp;
यही ज़िन्दगी की वहीं सिगरेट है&nbsp;
जो तूने कभी सुलगायी थी&nbsp;
चिंगारी तूने दी थी&nbsp;
ये दिल सदा जलता रहा&nbsp;
वक्त कलम पकड़ कर&nbsp;
कोई हिसाब लिखता रहा&nbsp;
ज़िन्दगी का अब गम नहीं&nbsp;
इस आग को संभाल ले&nbsp;
तेरे हाथ की खेर मांगती हूँ&nbsp;
अब और सिगरेट जला ले &quot;&nbsp;

वैसे साहिर भी कुछ कम नहीं थे। उनकी ज़िंदगी से जुड़ा एक किस्सा अक्सर सुनाया जाता है। जब साहिर और संगीतकार जयदेव किसी गीत पर काम कर रहे थे, तभी जयदेव की नज़र साहिर के घर में रखे एक&nbsp;झूठे&nbsp;कप पर पड़ी। उन्होंने उसे साफ़ करने की बात कही, तो साहिर ने तुरंत रोकते हुए कहा &quot;इसे मत छूना, अमृता ने आख़िरी बार यहीं बैठकर इसी कप में चाय पी थी।&quot; अमृता और साहिर के बीच मोहब्बत तो थी, मगर उनकी राहों में कई रुकावटें थीं। अमृता जब साहिर से मिलीं, तब वे विवाहित थीं हालाँकि वह रिश्ता कभी भी उनके मन को रास नहीं आया। दूसरी ओर साहिर लुधियानवी नए रिश्ते की ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं थे। फिर भी, अमृता ही थीं जिन्होंने उनके दिल में एक ऐसी जगह बनाई जो कोई और कभी नहीं ले सका। साहिर की जीवनी &ldquo;साहिर: ए पीपुल्स पोइट&rdquo; के लेखक अक्षय मानवानी लिखते हैं कि अमृता शायद वह अकेली स्त्री थीं जो साहिर को शादी के लिए मना सकती थीं। एक बार अमृता जब दिल्ली में साहिर की माँ से मिलने आई थीं, तो उनके जाने के बाद साहिर ने अपनी माँ से कहा था &quot;वो अमृता प्रीतम थी&hellip; जो आपकी बहू बन सकती थी।&quot;
लेकिन साहिर ने यह बात कभी अमृता से नहीं कही। शायद वही चुप्पी, वही अनकहा इज़हार, अमृता के दिल में इमरोज़ के लिए जगह बनाता चला गया।

अमृता के जीवन में इमरोज़ का आना&nbsp;
अमृता इमरोज़ से 1958 में मिले, मिलते ही इमरोज़ को अमृता से इश्क़ हो गया। इमरोज़ एक चित्रकार थे साहिर और अमृता की मुलाकात तो यूं ही संयोग से हो गई थी, लेकिन इमरोज़ से तो अमृता की मुलाकात करवाई गई थी। एक दोस्त ने दोनों को मिलवाया था। इमरोज़ ने तब अमृता का साथ दिया जब साहिर को कोई और मिल गया था।&nbsp;

इमरोज़ के साथ अमृता ने अपनी जिंदगी के आखिरी 40 साल गुजारे, इमरोज़, अमृता की पेंटिंग भी बनाते और उनकी किताबों के कवर भी डिजाइन करते। इमरोज़ और अमृता एक छत के नीचे ज़रूर रहे मगर एक दूसरे के साथ नहीं। उनकी जिंदगी के ऊपर एक किताब भी है &#39;अमृता इमरोज़: एक प्रेम कहानी&#39;। एक ही छत के नीचे दो अलग कमरे इन दोनों का बसेरा बनें। अपने एक लेख &quot;मुझे फिर मिलेगी अमृता&quot; में इमरोज़ लिखते है की कोई रिश्ता बांधने से नहीं बंधता न तो मैंने कभी अमृता से कहा कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ न कभी अमृता ने मुझसे। मैं तुम्हे फिर मिलूंगी कविता में शायद अमृता ने इमरोज़ के लिए ही लिखा था-

&quot;मैं तैनू फ़िर मिलांगी
कित्थे ? किस तरह पता नई
शायद तेरे ताखियल दी चिंगारी बण के
तेरे केनवास ते उतरांगी
जा खोरे तेरे केनवास दे उत्ते
इक रह्स्म्यी लकीर बण के&nbsp;
खामोश तैनू तक्दी रवांगी

जा खोरे सूरज दी लौ बण के
तेरे रंगा विच घुलांगी
जा रंगा दिया बाहवां विच बैठ के
तेरे केनवास नु वलांगी
पता नही किस तरह कित्थे&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;
पर तेनु जरुर मिलांगी&quot;

इमरोज़ अमृता से बेइन्तिहाँ मोहब्बत करते थे मगर अमृता के दिलों दिमाग पर साहिर का राज था। किस्&zwj;सा तो यह भी है कि इमरोज के पीछे स्&zwj;कूटर पर बैठी अमृता सफर के दौरान ख्यालों में गुम होतीं तो इमरोज की पीठ पर अंगुलियां फेरकर &#39;साहिर&#39; लिख दिया करती थीं। ये मोहब्बत अधूरी रही और इस मोहब्बत के गवाह बने आधी जली सिगरेट के टुकड़े, चाय का झूठा प्याला और ढेर सारे खुतूत।&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">साहिर लुधियानवी के&nbsp;अल्फाज़</span><span style="font-size:18px;"> न जाने कितनी अधूरी प्रेम कहानियों का दर्द बयाँ करते है। वह दर्द जो ख़ामोशी के नीचे दबे उस मशहूर मगर अनकहे एहसास की दास्तान है, जिसे हर आशिक़ ने हिज्र के बाद कहीं न कहीं महसूस किया है। अधूरे इश्क़ का अंजाम दिखाती उनके जीवन से जुड़ी एक कहानी जो शुरू तो हुई,&nbsp; मगर मंज़िल तक कभी पहुँच न सकी। एक ऐसी मोहब्बत जो ज़माने की बनाई लकीरों से अलग थी, और जो आखिर में आधी जली सिगरेटों, चाय के झूठे प्यालों और ढेरों ख़तों में सिमटकर रह गई।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">यह कहानी है उर्दू के मशहूर शायर साहिर लुधियानवी और पंजाब की पहली बाग़ी कवयित्री अमृता प्रीतम की। अधूरी मोहब्बत का यह एक ऐसा मुकम्मल फ़साना है, जिसके जैसा दूसरा ढूँढ पाना मुश्किल है; एक फ़साना जो मंज़िल तक पहुँचने से पहले लड़खड़ाया ज़रूर, मगर उसका असर कभी फीका नहीं पड़ा।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>16 साल में अमृता की करवा दी गयी शादी</strong>&nbsp;&nbsp;<br />
अमृता एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती थी जहां धर्म के धागे इंसान की किस्मत तय किया करते थे। जहां उनकी नानी मां अन्य समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोगों के बर्तन भी अलग रखती थी, जहां शादी का मतलब जिंदगी भर का साथ होता था। ऐसे परिवार में जन्मी थी वो बेख़ौफ़ कवियत्री जिसने अपनी जिंदगी में दो लोगों से प्यार किया जिनमें से एक मुस्लमान था। ज़ाहिर है की अमृता प्रीतम वो महिला थी जो अपने दौर से बहुत आगे थी। अमृता जब 16 साल की थीं, तो उनकी शादी प्रीतम सिंह से करवा दी गई। शादी के बाद वे अमृता कौर से अमृता प्रीतम बन गई। अमृता ने अपने पति का नाम तो अपनाया लेकिन वो उनकी अभिन्न अंग नहीं बन पाई।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>साहिर-अमृता की पहली मुलाकात&nbsp;</strong><br />
ये बात 1944 की है जब साहिर अमृता पहली बार एक दूसरे से मिले थे। जगह थी लाहौर और दिल्ली के बीच स्थित प्रीत नगर जहां एक बड़े मुशायरे का आयोजन किया गया था अमृता यहां पहुंची थी। इसी मुशायरे में आम सा दिखने वाला, लेकिन अच्छी कदकाठी का एक युवक भी आया था जिसका नाम था साहिर लुधियाना। साहिर जुनुनी और आदर्शवादी थे, अमृता बेहद दिलकश अपनी खूबसूरती में भी और अपनी लेखनी में भी। बेहद क्रांतिकारी मिजाज के साहिर अमृता को पहली ही मुलाक़ात में भा गए थे। वहीं अमृता भी पहली ही मुलाकात में साहिर को अपना दिल दे बैठी थी। इस मुलाकात में कोई बात नहीं हुई। दोनों घंटो खामोश बैठे रहें। शायद उस समय की मोहब्बत ख़ामोशी से शुरू हुआ करती होगी, वैसे भी जहां इश्क़ ब्यां करने के लिए लफ़्ज़ों की ज़रूरत पड़े वो मोहब्बत कैसी। अमृता ने लिखा, &quot;मुझे नहीं मालूम की वो साहिर के लफ्जो की जादूगरी थी, या उनकी खामोश नज़र का कमाल था, लेकिन कुछ तो था जिसने मुझे अपनी तरफ खींच लिया, आज जब उस रात को आँखें मूंद कर देखती हूँ तो ऐसा समझ आता है कि तकदीर ने मेरे दिल में इश्क़ का बीज डाला जिसे बारिश की फुहारों ने बढ़ा दिया, उस दिन बारिश हुई थी।&quot;&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">साहिर से मिलने के बाद अमृता ने उनके लिए एक कविता भी लिखी थी &#39;<em><strong>अब रात गिरने लगी तो तू मिला है, तू भी उदास, चुप, शांत और अडोल। मैं भी उदास, चुप, शांत और अडोल। सिर्फ- दूर बहते समुद्र में तूफान है&hellip;</strong></em>&#39;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;"><strong>आत्मकथाओं में लिखे मोहब्बत के किस्से&nbsp;</strong><br />
साहिर और अमृता की प्रेम कहानी के किस्से इन दोनों की आत्मकथाओं में मिलते है, अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में अमृता प्रीतम ने साहिर के साथ हुई मुलाकातों का जिक्र किया है। वो लिखती है कि, &quot;वो खामोशी से सिगरेट जलाता और फिर आधी सिगरेट ही बुझा देता, फिर एक नई सिगरेट जला लेता। जब तक वो विदा लेता, कमरा सिगरेट की महक से भर जाता। मैं इन सिगरेटों को हिफाजत से उठाकर अलमारी में रख देती और जब कमरे में अकेली होती तो उन सिगरेटों को एक-एक करके पीती। मेरी उंगलियों में फंसी सिगरेट, ऐसा लगता कि मैं उसकी उंगलियों को छू रही हूं। मुझे धुएं में उसकी शक्ल दिखाई पड़ती। ऐसे मुझे सिगरेट पीने की लत लग गई।&quot;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अमृता लिखती है-&nbsp;&nbsp;<br />
<strong>&quot;यह</strong> <em>आग की बात है&nbsp;<br />
तूने यह बात सुनाई है&nbsp;<br />
यही ज़िन्दगी की वहीं सिगरेट है&nbsp;<br />
जो तूने कभी सुलगायी थी&nbsp;<br />
चिंगारी तूने दी थी&nbsp;<br />
ये दिल सदा जलता रहा&nbsp;<br />
वक्त कलम पकड़ कर&nbsp;<br />
कोई हिसाब लिखता रहा&nbsp;<br />
ज़िन्दगी का अब गम नहीं&nbsp;<br />
इस आग को संभाल ले&nbsp;<br />
तेरे हाथ की खेर मांगती हूँ&nbsp;<br />
अब और सिगरेट जला ले &quot;&nbsp;</em></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">वैसे साहिर भी कुछ कम नहीं थे। उनकी ज़िंदगी से जुड़ा एक किस्सा अक्सर सुनाया जाता है। जब साहिर और संगीतकार जयदेव किसी गीत पर काम कर रहे थे, तभी जयदेव की नज़र साहिर के घर में रखे एक&nbsp;झूठे</span><span style="font-size:18px;">&nbsp;कप पर पड़ी। उन्होंने उसे साफ़ करने की बात कही, तो साहिर ने तुरंत रोकते हुए कहा &quot;इसे मत छूना, अमृता ने आख़िरी बार यहीं बैठकर इसी कप में चाय पी थी।&quot; अमृता और साहिर के बीच मोहब्बत तो थी, मगर उनकी राहों में कई रुकावटें थीं। अमृता जब साहिर से मिलीं, तब वे विवाहित थीं हालाँकि वह रिश्ता कभी भी उनके मन को रास नहीं आया। दूसरी ओर साहिर लुधियानवी नए रिश्ते की ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं थे। फिर भी, अमृता ही थीं जिन्होंने उनके दिल में एक ऐसी जगह बनाई जो कोई और कभी नहीं ले सका। साहिर की जीवनी &ldquo;साहिर: ए पीपुल्स पोइट&rdquo; के लेखक अक्षय मानवानी लिखते हैं कि अमृता शायद वह अकेली स्त्री थीं जो साहिर को शादी के लिए मना सकती थीं। एक बार अमृता जब दिल्ली में साहिर की माँ से मिलने आई थीं, तो उनके जाने के बाद साहिर ने अपनी माँ से कहा था &quot;<em><strong>वो अमृता प्रीतम थी&hellip; जो आपकी बहू बन सकती थी</strong></em>।&quot;<br />
लेकिन साहिर ने यह बात कभी अमृता से नहीं कही। शायद वही चुप्पी, वही अनकहा इज़हार, अमृता के दिल में इमरोज़ के लिए जगह बनाता चला गया।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>अमृता के जीवन में इमरोज़ का आना</strong>&nbsp;<br />
अमृता इमरोज़ से 1958 में मिले, मिलते ही इमरोज़ को अमृता से इश्क़ हो गया। इमरोज़ एक चित्रकार थे साहिर और अमृता की मुलाकात तो यूं ही संयोग से हो गई थी, लेकिन इमरोज़ से तो अमृता की मुलाकात करवाई गई थी। एक दोस्त ने दोनों को मिलवाया था। इमरोज़ ने तब अमृता का साथ दिया जब साहिर को कोई और मिल गया था।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इमरोज़ के साथ अमृता ने अपनी जिंदगी के आखिरी 40 साल गुजारे, इमरोज़, अमृता की पेंटिंग भी बनाते और उनकी किताबों के कवर भी डिजाइन करते। इमरोज़ और अमृता एक छत के नीचे ज़रूर रहे मगर एक दूसरे के साथ नहीं। उनकी जिंदगी के ऊपर एक किताब भी है &#39;अमृता इमरोज़: एक प्रेम कहानी&#39;। एक ही छत के नीचे दो अलग कमरे इन दोनों का बसेरा बनें। अपने एक लेख &quot;मुझे फिर मिलेगी अमृता&quot; में इमरोज़ लिखते है की कोई रिश्ता बांधने से नहीं बंधता न तो मैंने कभी अमृता से कहा कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ न कभी अमृता ने मुझसे। मैं तुम्हे फिर मिलूंगी कविता में शायद अमृता ने इमरोज़ के लिए ही लिखा था-</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><span style="font-size:18px;">&quot;मैं तैनू फ़िर मिलांगी<br />
कित्थे ? किस तरह पता नई<br />
शायद तेरे ताखियल दी चिंगारी बण के<br />
तेरे केनवास ते उतरांगी<br />
जा खोरे तेरे केनवास दे उत्ते<br />
इक रह्स्म्यी लकीर बण के&nbsp;<br />
खामोश तैनू तक्दी रवांगी</span></em></p>

<p style="text-align: justify;"><em><span style="font-size:18px;">जा खोरे सूरज दी लौ बण के<br />
तेरे रंगा विच घुलांगी<br />
जा रंगा दिया बाहवां विच बैठ के<br />
तेरे केनवास नु वलांगी<br />
पता नही किस तरह कित्थे&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;<br />
पर तेनु जरुर मिलांगी&quot;</span></em></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इमरोज़ अमृता से बेइन्तिहाँ मोहब्बत करते थे मगर अमृता के दिलों दिमाग पर साहिर का राज था। किस्&zwj;सा तो यह भी है कि इमरोज के पीछे स्&zwj;कूटर पर बैठी अमृता सफर के दौरान ख्यालों में गुम होतीं तो इमरोज की पीठ पर अंगुलियां फेरकर &#39;साहिर&#39; लिख दिया करती थीं। ये मोहब्बत अधूरी रही और इस मोहब्बत के गवाह बने आधी जली सिगरेट के टुकड़े, चाय का झूठा प्याला और ढेर सारे खुतूत।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[Half-burnt cigarettes, empty cups of tea and incomplete love]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/literature/kavya-rath/best-sher-of-wasim-barelvi]]></guid>
                       <title><![CDATA[शायरी के बादशाह कहलाते है वसीम बरेलवी, पढ़े उनके कुछ चुनिंदा शेर ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/literature/kavya-rath/best-sher-of-wasim-barelvi]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 18 Feb 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp; वसीम बरेलवी उर्दू के बेहद लोकप्रिय शायर हैं। उनकी ग़ज़लें बेहद मक़बूल हैं जिन्हें जगजीत सिंह से लेकर कई अजीज़ गायकों ने अपनी आवाज़ दी है। वसीम बरेलवी अपनी शायरी और गजल के जरिए लाखों दिलों पर राज करते हैं। कोई भी मुशायरा उनके बगैर पूरा नहीं माना जाता।&nbsp;

&nbsp; &nbsp;18 फरवरी 1940 को वसीम बरेलवी का जन्म बरेली में हुआ था।&nbsp; पिता जनाब शाहिद हसन&nbsp; के रईस अमरोहवी और जिगर मुरादाबादी से बहुत अच्छे संबंध थे। दोनों का आना-जाना अक्सर उनके घर पर होता रहता था। इसी के चलते वसीम बरेलवी का झुकाव बचपन से शेर-ओ-शायरी की ओर हो गया। वसीम बरेलवी ने अपनी पढ़ाई बरेली के ही बरेली कॉलेज से की। उन्होंने एमए उर्दू में गोल्ड मेडल हासिल किया। बाद में इसी कॉलेज में वो उर्दू विभाग के अध्यक्ष भी बने।&nbsp; 60 के दशक में वसीम बरेलवी मुशायरों में जाने लगे। आहिस्ता आहिस्ता ये शौक उनका जुनून बन गया। पेश हैं उनके कुछ चुनिंदा शेर

&nbsp;


अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे


&nbsp;


जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा

किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता


&nbsp;

&nbsp;


आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है

भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है


&nbsp;


ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं

तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी


&nbsp;


ग़म और होता सुन के गर आते न वो &#39;वसीम&#39;

अच्छा है मेरे हाल की उन को ख़बर नहीं


&nbsp;


जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा

किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता


&nbsp;

&nbsp;


जो मुझ में तुझ में चला आ रहा है बरसों से

कहीं हयात इसी फ़ासले का नाम न हो


&nbsp;

&nbsp;



कुछ है कि जो घर दे नहीं पाता है किसी को

वर्ना कोई ऐसे तो सफ़र में नहीं रहता&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;



&nbsp; &nbsp; &nbsp; 


उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में

इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए


&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;



दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता

तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता


&nbsp;

&nbsp;


वो मेरे सामने ही गया और मैं

रास्ते की तरह देखता रह गया



&nbsp;


अपने अंदाज़ का अकेला था

इसलिए मैं बड़ा अकेला था


&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">&nbsp; वसीम बरेलवी उर्दू के बेहद लोकप्रिय शायर हैं। उनकी ग़ज़लें बेहद मक़बूल हैं जिन्हें जगजीत सिंह से लेकर कई अजीज़ गायकों ने अपनी आवाज़ दी है। वसीम बरेलवी अपनी शायरी और गजल के जरिए लाखों दिलों पर राज करते हैं। कोई भी मुशायरा उनके बगैर पूरा नहीं माना जाता।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;18 फरवरी 1940 को वसीम बरेलवी का जन्म बरेली में हुआ था।&nbsp; पिता जनाब शाहिद हसन&nbsp; के रईस अमरोहवी और जिगर मुरादाबादी से बहुत अच्छे संबंध थे। दोनों का आना-जाना अक्सर उनके घर पर होता रहता था। इसी के चलते वसीम बरेलवी का झुकाव बचपन से शेर-ओ-शायरी की ओर हो गया। वसीम बरेलवी ने अपनी पढ़ाई बरेली के ही बरेली कॉलेज से की। उन्होंने एमए उर्दू में गोल्ड मेडल हासिल किया। बाद में इसी कॉलेज में वो उर्दू विभाग के अध्यक्ष भी बने।&nbsp; 60 के दशक में वसीम बरेलवी मुशायरों में जाने लगे। आहिस्ता आहिस्ता ये शौक उनका जुनून बन गया। पेश हैं उनके कुछ चुनिंदा शेर</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 18px;">जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 18px;">ग़म और होता सुन के गर आते न वो &#39;वसीम&#39;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 18px;">अच्छा है मेरे हाल की उन को ख़बर नहीं</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">जो मुझ में तुझ में चला आ रहा है बरसों से</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">कहीं हयात इसी फ़ासले का नाम न हो</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;"><strong>कुछ है कि जो घर दे नहीं पाता है किसी को</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">वर्ना कोई ऐसे तो सफ़र में नहीं रहता&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; </span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;"><strong>दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 18px;">वो मेरे सामने ही गया और मैं</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">रास्ते की तरह देखता रह गया</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><br />
&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">अपने अंदाज़ का अकेला था</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">इसलिए मैं बड़ा अकेला था</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall39514.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[best-sher-of-wasim-barelvi]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/literature/revival-of-forts-for-tourism-author-sheela-singh]]></guid>
                       <title><![CDATA['पयर्टन के लिए किलों का पुनरुद्धार' - लेखिका शीला सिंह]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/literature/revival-of-forts-for-tourism-author-sheela-singh]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 17 Sep 2024 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[पयर्टन की दृष्टि से हिमाचल प्रदेश देशभर के मुख्य स्थलों में सबसे ऊपर है। इसी के अन्तर्गत जिला बिलासपुर भी किसी से कम नहीं, जहाँ पर्यटन स्थलों की लम्बी सूची देखी जा सकती है। इस दृष्टि से बिलासपुर जिला में राजाओं के समय बनाये गए किले अपना विशेष महत्व रखते हैं जिनका पहाड़ी के शीर्ष पर पर्यावरणीय और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण वातावरण में स्थापन किया गया है। जिला बिलासपुर की तहसील घुमारवीं के त्यून खास का किला उनमें से एक है। त्यून किले के अवशेष त्यून श्रेणी के नाम से जानी जाने वाली पहाड़ी जो सतरह किलोमीटर लम्बी है के शिखर पर स्थित है।

घुमारवीं से इसकी दूरी लगभग दस किलोमीटर है और बिलासपुर मुख्यालय से लगभग पैंतालीस किलोमीटर है। खण्डहरनुमा यह किला अपने भीतर डरा देने वाली अनेक कहानियों/स्मृतियों को समेटे हुए हैं।
यह आज भी उस प्राचीन युद्ध मय अशान्त समय की याद दिलाता है,जहाँ विशाल मालखाना था और वहाँ पर राजाओं के समय में बड़ी संख्या में हथियार जमा किये जाते थे।इस क्षेत्र में युद्ध एक नियमित विशेषता थी। राजा काहन चंद ने इस का निर्माण 1142 विक्रमी संवत में करवाया था। किले का क्षेत्रफल लगभग 14 हेक्टेयर है और आकार में यह आयताकार है। इसकी लम्बाई 400 मीटर और चौडा़ई 200 मीटर है ।&nbsp;

इस किले की दीवारों की ऊँचाई 2 से लेकर 10 मीटर तक लगभग है। किले के मुख्य द्वार की ऊँचाई 3 मीटर व चौड़ाई 5 या 5 1/2मीटर है। पानी की व्यवस्था हेतु दो टैंक और दो बड़े-बड़े अन्न भण्डार थे जिनमें लगभग 3000 कि0 ग्रा0 से भी अधिक अन्न रखा जा सकता था। आज इन ऐतिहासिक किलों को पयर्टन की दृष्टि से विकसित करने के लिए कार्य किया जा सकता है।&nbsp;

फोरलेन से लगते गाँव पनोह से त्यून किले तक करीब 10किलोमीटर पैदल टरैक बनाया जा सकता है। ताकि पयर्टक इस पर ट्रैकिंग कर सकें। पनोह से किरतपुर -नेरचौक- कुल्लू मनाली&nbsp; फोरलेन गुजर रहा है। इसे जब ट्रैक से जोड़ा जायेगा&nbsp; तो देश विदेश से लोग इस किले के सौंदर्य को निहारने के लिए त्यून खास अवश्य पहुंचेंगे। इस प्रकार इन किलों को पयर्टन के लिए विकसित किया जियेगा तो जनता को सुविधाएं और सरकार को आय का साधन बनेगा।

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">पयर्टन की दृष्टि से हिमाचल प्रदेश देशभर के मुख्य स्थलों में सबसे ऊपर है। इसी के अन्तर्गत जिला बिलासपुर भी किसी से कम नहीं, जहाँ पर्यटन स्थलों की लम्बी सूची देखी जा सकती है। इस दृष्टि से बिलासपुर जिला में राजाओं के समय बनाये गए किले अपना विशेष महत्व रखते हैं जिनका पहाड़ी के शीर्ष पर पर्यावरणीय और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण वातावरण में स्थापन किया गया है। जिला बिलासपुर की तहसील घुमारवीं के त्यून खास का किला उनमें से एक है। त्यून किले के अवशेष त्यून श्रेणी के नाम से जानी जाने वाली पहाड़ी जो सतरह किलोमीटर लम्बी है के शिखर पर स्थित है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">घुमारवीं से इसकी दूरी लगभग दस किलोमीटर है और बिलासपुर मुख्यालय से लगभग पैंतालीस किलोमीटर है। खण्डहरनुमा यह किला अपने भीतर डरा देने वाली अनेक कहानियों/स्मृतियों को समेटे हुए हैं।<br />
यह आज भी उस प्राचीन युद्ध मय अशान्त समय की याद दिलाता है,जहाँ विशाल मालखाना था और वहाँ पर राजाओं के समय में बड़ी संख्या में हथियार जमा किये जाते थे।इस क्षेत्र में युद्ध एक नियमित विशेषता थी। राजा काहन चंद ने इस का निर्माण 1142 विक्रमी संवत में करवाया था। किले का क्षेत्रफल लगभग 14 हेक्टेयर है और आकार में यह आयताकार है। इसकी लम्बाई 400 मीटर और चौडा़ई 200 मीटर है ।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस किले की दीवारों की ऊँचाई 2 से लेकर 10 मीटर तक लगभग है। किले के मुख्य द्वार की ऊँचाई 3 मीटर व चौड़ाई 5 या 5 1/2मीटर है। पानी की व्यवस्था हेतु दो टैंक और दो बड़े-बड़े अन्न भण्डार थे जिनमें लगभग 3000 कि0 ग्रा0 से भी अधिक अन्न रखा जा सकता था। आज इन ऐतिहासिक किलों को पयर्टन की दृष्टि से विकसित करने के लिए कार्य किया जा सकता है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">फोरलेन से लगते गाँव पनोह से त्यून किले तक करीब 10किलोमीटर पैदल टरैक बनाया जा सकता है। ताकि पयर्टक इस पर ट्रैकिंग कर सकें। पनोह से किरतपुर -नेरचौक- कुल्लू मनाली&nbsp; फोरलेन गुजर रहा है। इसे जब ट्रैक से जोड़ा जायेगा&nbsp; तो देश विदेश से लोग इस किले के सौंदर्य को निहारने के लिए त्यून खास अवश्य पहुंचेंगे। इस प्रकार इन किलों को पयर्टन के लिए विकसित किया जियेगा तो जनता को सुविधाएं और सरकार को आय का साधन बनेगा।</span></p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall37795.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA['Revival of forts for tourism' - Author Sheela Singh]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/national-news/kavya-rath/shiv-kumar-batalvi]]></guid>
                       <title><![CDATA[शिव कुमार बटालवी : वो शायर जिसे मरने की बहुत जल्दी थी]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/national-news/kavya-rath/shiv-kumar-batalvi]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 16 Jun 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[*अमृता प्रीतम ने बटालवी को कहा था &#39;बिरह का सुल्तान&#39;

&nbsp; &nbsp;&#39; बिरहा बिरहा आखीए, बिरहा तू सुल्तान। जिस तन बिरहा ना उपजे, सो तन जाण मसान ...&#39; प्रसिद्ध कवयित्री अमृता प्रीतम के शब्दों में वो &lsquo;बिरह का सुल्तान&rsquo; था। पंजाब का एक ऐसा शायर जिसके जैसा न कोई था, न है और न कोई और होगा। वो हिंदुस्तान में भी खूब छाया और पाकिस्तान ने भी उसे जमकर चाहा. वो था&nbsp; पंजाब का पहला सुपरस्टार शायर शिव कुमार बटालवी। वो शायर जिसने शराब में डूबकर वो रच दिया जिसे होश वाले शायद कभी न उकेर पाते। वो शायर जो मरने की बहुत जल्दी में था।
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &#39;असां तां जोबन रुत्ते मरनां, जोबन रूत्ते जो भी मरदा फूल बने या तारा, जोबन रुत्ते आशिक़ मरदे या कोई करमा वाला&#39;.. बटालवी का&nbsp; कहना था कि जवानी में जो मरता है वो या तो फूल बनता है या तारा। जवानी में या तो आशिक मरते हैं या वो जो बहुत करमों वाले होते हैं। जैसा वो कहते थे वैसा हुआ भी, महज 35 की उम्र में बटालवी दुनिया को अलविदा कह गए। पर जाने से पहले इतना खूबसूरत लिख गए कि शायरी का हर ज़िक्र उनके बगैर अधूरा है।&nbsp;&nbsp;
शिव कुमार बटालवी 23 जुलाई 1936 को पंजाब के सियालकोट में पैदा हुए, जो बंटवारे के बाद से पाकिस्तान में है। उनके पिता एक तहसीलदार थे पर न जाने कैसे शिव शायर हो गए। आजादी के बाद जब देश का बंटवारा हुआ तो बटालवी का परिवार पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत में पंजाब के गुरदासपुर जिले के बटाला में आ गया। उस वक़्त शिव कुमार बटालवी की उम्र महज़ दस साल थी।&nbsp; नका कुछ बचपन और किशोरावस्था यहीं गुजरी। बटालवी ने इन दिनों में गांव की मिट्टी, खेतों की फसलों, त्योहारों और मेलों को भरपूर जिया, जो बाद में उनकी कविताओं में खुशबू बनकर महका। उन्होंने अपने नाम में भी बटालवी जोड़ा, जो बटाला गांव के प्रति उनका उन्मुक्त लगाव दर्शाता है। बटालवी&nbsp; जिंदगी के सफर में&nbsp; बटाला, कादियां, बैजनाथ होते हुए नाभा पहुंचे लेकिन अपने नाम में बटालवी जोड़ खुद को ताउम्र के लिए बटाला से जोड़े रखा। कुछ बड़े होने के बाद उन्हें गांव से बाहर पढ़ने भेजा गया। वो खुद तो गांव से आ गए मगर उनका दिल गांव की मिटटी पर ही अटका रहा। कहते है उनका गांव छूट जाना उन पर पहला प्रहार था, जिसका गहरा जख्म उन्हें सदैव पीड़ा देता रहा।
&nbsp; &nbsp; गांव से निकलकर आगे की पढ़ाई के लिए शिव कादियां के एस. एन. कॉलेज के कला विभाग गए। पर दूसरे साल ही उन्होंने उसे बीच में छोड़ दिया। उसके बाद उन्हें हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ के एक स्कूल में इंजीनियरिंग की पढ़ाई हेतु भेजा गया। पर पिछली बार की तरह ही उन्होंने उसे भी बीच में छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने नाभा के सरकारी कॉलेज में अध्ययन किया। उनका बार-बार बीच में ही अभ्यास छोड़ देना, उनके भीतर पल रही अराजकता और अनिश्चितता का बीजारोपण था। पिता शिव को कुछ बनता हुआ देखना चाहते थे। जो पिता शिव के लिए चाहते थे वो शिव ने अपने लिए कभी नहीं चाहा, इसीलिए पिता - पुत्र में कभी नहीं बनी।
&nbsp; &nbsp;बटालवी की छोटी सी जीवन यात्रा तमाम उतार चढ़ाव समेटे हुए है, किसी खूबसूरत चलचित्र की तरह जिसमें स्टारडम है, विरह का तड़का है और जिसका अंत तमाम वेदना समेटे हुए है। शिव कुमार बटालवी के गीतों में &lsquo;बिरह की पीड़ा&rsquo; इस कदर थी कि उस दौर की प्रसिद्ध कवयित्री अमृता प्रीतम ने उन्हें &lsquo;बिरह का सुल्तान&rsquo; नाम दे दिया। शिव कुमार बटालवी यानी पंजाब का वह शायर जिसके गीत हिंदी में न आकर भी वह बहुत लोकप्रिय हो गया। कहते है उन्हें मेले में एक लड़की से मोहब्बत हो गयी थी। मेले के बाद जब लड़की नज़रों से ओझल हुई तो उसे ढूंढने के लिए एक गीत लिख डाला। गीत क्या मानो इश्तहार लिखा हो;

&lsquo;इक कुड़ी जिहदा नाम मुहब्बत ग़ुम है&rsquo;

ओ साद मुरादी, सोहनी फब्बत

गुम है, गुम है, गुम है

ओ सूरत ओस दी, परियां वर्गी

सीरत दी ओ मरियम लगदी

हस्ती है तां फूल झडदे ने

तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी...

ये वहीँ गीत है जो फिल्म उड़ता पंजाब में इस्तेमाल हुआ और इस नए दौर में भी युवाओं की जुबा पर इस कदर चढ़ा कि मानो हर कोई बटालवी की&nbsp; महबूबा को ढूंढ़ते के लिए गा रहा हो। कहते है बटालवी का ये लड़कपन का प्यार अधूरा रहा क्यों कि एक बीमारी के चलते उस लड़की की मौत हो गयी। खैर ज़िंदगी बढ़ने का नाम है सो बटालवी भी अवसाद से निकलकर आगे बढ़ने लगे। फिर एक लड़की मिली और फिर शिव को उनसे मोहब्बत हो गई। पर इस मर्तबा भी अंजाम विरह ही था। दरअसल, जिसे शिव दिल ओ जान से मोहब्बत करते थे उसने किसी और का घर बसाया और शादी करके विदेश चली गयी। एक बार फिर शिव तनहा हुए और विरह के समुन्दर में गोते खाने लगे।&nbsp; तब शराब और अवसाद में डूबे शिव ने जो लिखा वो कालजयी हो गया ...........

माए नी माए मैं इक शिकरा यार बनाया

चूरी कुट्टाँ ताँ ओह खाओंदा नाहीं

वे असाँ दिल दा मास खवाया

इक उड़ारी ऐसी मारी

इक उड़ारी ऐसी मारी

ओह मुड़ वतनीं ना आया, ओ माये नी!

मैं इक शिकरा यार बना

शिकरा पक्षी दूर से अपने शिकार को देखकर सीधे उसका मांस नोंच कर फिर उड़ जाता है। शिव ने अपनी उस बेवफा प्रेमिका को शिकरा कहा। हालांकि वो लड़की कौन थी इसे लेकर तरह तरह की बातें प्रचलित है । पर&nbsp; इसके बारे में आधिकारिक रुप से आज तक कोई जानकारी नहीं है और ना वो ख़ुद ही कभी लोगों के सामने आई। शिव की उस बेवफा प्रेमिका के बारे में एक किस्सा अमृता प्रीतम ने भी बयां किया है।&nbsp;&nbsp;
शिव एक दिन अमृता प्रीतम के घर पहुंचे और उन्हें बताया कि जो लड़की उनसे इतनी प्यार भरी बातें किया करती थी वो उन्हें छोड़कर चली गयी है। उसने विदेश जाकर शादी कर ली है। अमृता प्रीतम ने उन्हें जिंदगी की हकीकत और फ़साने का अंतर समझाने का प्रत्यन किया पर शिव का मासूम&nbsp; दिल टूट चूका था। कहते है शिव उसके बाद ताउम्र उसी लड़की के ग़म में लिखते रहे। सिर्फ 24 साल की उम्र में शिव कुमार बटालवी की कविताओं का पहला संकलन &quot;पीड़ां दा परागा&quot; प्रकाशित हुआ, जो उन दिनों काफी चर्चित रहा। उसी दौर में शिव ने लिखा ........

अज्ज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा

तेरे चुम्मण पिछली संग वरगा

है किरणा दे विच नशा जिहा

किसे चिम्मे सप्प दे दंग वरगा


&nbsp; &nbsp; &nbsp;आखिरकार, 1967 में बटालवी ने अरुणा से शादी कर ली और उनके साथ दो बेटियां हुई। शिव शादी के बाद चंडीगढ़ चले गये। वहां वे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत रहे। पर कहते है बटालवी उस लड़की को नहीं भूल नहीं सके और उसकी याद में लिखते गए।&nbsp;&nbsp;

की पुछ दे ओ हाल फ़कीरां दा

साडा नदियों बिछड़े नीरां दा

साडा हंज दी जूने आयां दा

साडा दिल जलया दिलगीरां दा

धीरे-धीरे, बटालवी शराब की दुसाध्य लत के चलते 7 मई 1973 को लीवर सिरोसिस के परिणामस्वरूप जग को अलविदा कह गए। कहते है कि जीवन के अंतिम दौर में उनकी माली हालत भी ठीक नहीं थी और अपने ससुर के घर उन्होंने अंतिम सांस ली। पर बटालवी जैसे शायर तो पुरानी शराब की तरह होते है, दौर भले बदले&nbsp; पर नशा वक्त के साथ गाढ़ा होता जाता है।

&lsquo;लूणा&rsquo; के लिए मिला साहित्य अकादमी पुरस्कार :
ऐसा नहीं है कि शिव कुमार बटालवी सिर्फ विरह के शायर थे। बटालवी का नाम साहित्य के गलियारों में बड़े अदब के साथ लिया जाता है। ऐसा हो भी क्यों ना&nbsp; इस दुनिया को अलविदा कहने&nbsp; से पहले वे&nbsp; &lsquo;लूणा&rsquo; जैसा महाकाव्य लिख गए। इसी के लिए उन्हें सबसे कम उम्र में यानी महज 31 वर्ष की उम्र में साहित्य अकादमी पुरूस्कार भी मिला। ये सम्मान प्राप्त करने वाले वे सबसे कम उम्र के साहित्यकार है। &lsquo;लूणा&rsquo; को पंजाबी साहित्य में &lsquo;मास्टरपीस&rsquo; का दर्ज़ा प्राप्त है और साहित्य जगत में इसकी आभा बरक़रार है। कहा जाता था कि कविता हिंदी में है और शायरी उर्दू में। पर शिव ने जब पंजाबी में अपनी जादूगरी दिखाई तो उस दौर के तमाम हिंदी और उर्दू के बड़े बड़े शायर कवि हैरान रह गए।&nbsp;&nbsp;

नायाब गायकों ने गाये बटालवी के गीत :
बटालवी की नज्मों को सबसे पहले नुसरत फतेह अली खान ने अपनी आवाज दी थी। उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान ने उनकी कविता &#39;मायें नी मायें मेरे गीतां दे नैणां विच&#39; को गाया था । जगजीत सिंह ने उनका एक गीत &#39;मैंनू तेरा शबाब ले बैठा&#39; गाया तो दुनिया को पता चला की शब्दों की जादूगरी क्या होती है। नुसरत साहब और जगजीत सिंह - चित्रा सिंह के अलावा रबी शेरगिल, हंस राज हंस, दीदार सिंह परदेसी सहित एक से बढ़कर एक नायाब गायकों ने बटालवी की कविताएं गाई। उनकी लिखी रचनाओं को गाकर न जाने कितने गायक शौहरत पा गए। बटालवी आज भी हर दिल अजीज है। बटालवी और विरह जुदा नहीं । बटालवी तो आखिर बटालवी है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;"><strong>*अमृता प्रीतम ने बटालवी को कहा था &#39;बिरह का सुल्तान&#39;</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;&#39; बिरहा बिरहा आखीए, बिरहा तू सुल्तान। जिस तन बिरहा ना उपजे, सो तन जाण मसान ...&#39; प्रसिद्ध कवयित्री अमृता प्रीतम के शब्दों में वो &lsquo;बिरह का सुल्तान&rsquo; था। पंजाब का एक ऐसा शायर जिसके जैसा न कोई था, न है और न कोई और होगा। वो हिंदुस्तान में भी खूब छाया और पाकिस्तान ने भी उसे जमकर चाहा. वो था&nbsp; पंजाब का पहला सुपरस्टार शायर शिव कुमार बटालवी। वो शायर जिसने शराब में डूबकर वो रच दिया जिसे होश वाले शायद कभी न उकेर पाते। वो शायर जो मरने की बहुत जल्दी में था।<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &#39;असां तां जोबन रुत्ते मरनां, जोबन रूत्ते जो भी मरदा फूल बने या तारा, जोबन रुत्ते आशिक़ मरदे या कोई करमा वाला&#39;.. बटालवी का&nbsp; कहना था कि जवानी में जो मरता है वो या तो फूल बनता है या तारा। जवानी में या तो आशिक मरते हैं या वो जो बहुत करमों वाले होते हैं। जैसा वो कहते थे वैसा हुआ भी, महज 35 की उम्र में बटालवी दुनिया को अलविदा कह गए। पर जाने से पहले इतना खूबसूरत लिख गए कि शायरी का हर ज़िक्र उनके बगैर अधूरा है।&nbsp;&nbsp;<br />
शिव कुमार बटालवी 23 जुलाई 1936 को पंजाब के सियालकोट में पैदा हुए, जो बंटवारे के बाद से पाकिस्तान में है। उनके पिता एक तहसीलदार थे पर न जाने कैसे शिव शायर हो गए। आजादी के बाद जब देश का बंटवारा हुआ तो बटालवी का परिवार पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत में पंजाब के गुरदासपुर जिले के बटाला में आ गया। उस वक़्त शिव कुमार बटालवी की उम्र महज़ दस साल थी।&nbsp; नका कुछ बचपन और किशोरावस्था यहीं गुजरी। बटालवी ने इन दिनों में गांव की मिट्टी, खेतों की फसलों, त्योहारों और मेलों को भरपूर जिया, जो बाद में उनकी कविताओं में खुशबू बनकर महका। उन्होंने अपने नाम में भी बटालवी जोड़ा, जो बटाला गांव के प्रति उनका उन्मुक्त लगाव दर्शाता है। बटालवी&nbsp; जिंदगी के सफर में&nbsp; बटाला, कादियां, बैजनाथ होते हुए नाभा पहुंचे लेकिन अपने नाम में बटालवी जोड़ खुद को ताउम्र के लिए बटाला से जोड़े रखा। कुछ बड़े होने के बाद उन्हें गांव से बाहर पढ़ने भेजा गया। वो खुद तो गांव से आ गए मगर उनका दिल गांव की मिटटी पर ही अटका रहा। कहते है उनका गांव छूट जाना उन पर पहला प्रहार था, जिसका गहरा जख्म उन्हें सदैव पीड़ा देता रहा।<br />
&nbsp; &nbsp; गांव से निकलकर आगे की पढ़ाई के लिए शिव कादियां के एस. एन. कॉलेज के कला विभाग गए। पर दूसरे साल ही उन्होंने उसे बीच में छोड़ दिया। उसके बाद उन्हें हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ के एक स्कूल में इंजीनियरिंग की पढ़ाई हेतु भेजा गया। पर पिछली बार की तरह ही उन्होंने उसे भी बीच में छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने नाभा के सरकारी कॉलेज में अध्ययन किया। उनका बार-बार बीच में ही अभ्यास छोड़ देना, उनके भीतर पल रही अराजकता और अनिश्चितता का बीजारोपण था। पिता शिव को कुछ बनता हुआ देखना चाहते थे। जो पिता शिव के लिए चाहते थे वो शिव ने अपने लिए कभी नहीं चाहा, इसीलिए पिता - पुत्र में कभी नहीं बनी।<br />
&nbsp; &nbsp;बटालवी की छोटी सी जीवन यात्रा तमाम उतार चढ़ाव समेटे हुए है, किसी खूबसूरत चलचित्र की तरह जिसमें स्टारडम है, विरह का तड़का है और जिसका अंत तमाम वेदना समेटे हुए है। शिव कुमार बटालवी के गीतों में &lsquo;बिरह की पीड़ा&rsquo; इस कदर थी कि उस दौर की प्रसिद्ध कवयित्री अमृता प्रीतम ने उन्हें &lsquo;बिरह का सुल्तान&rsquo; नाम दे दिया। शिव कुमार बटालवी यानी पंजाब का वह शायर जिसके गीत हिंदी में न आकर भी वह बहुत लोकप्रिय हो गया। कहते है उन्हें मेले में एक लड़की से मोहब्बत हो गयी थी। मेले के बाद जब लड़की नज़रों से ओझल हुई तो उसे ढूंढने के लिए एक गीत लिख डाला। गीत क्या मानो इश्तहार लिखा हो;</span></p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;इक कुड़ी जिहदा नाम मुहब्बत ग़ुम है&rsquo;</span></strong></span></p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">ओ साद मुरादी, सोहनी फब्बत</span></strong></span></p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">गुम है, गुम है, गुम है</span></strong></span></p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">ओ सूरत ओस दी, परियां वर्गी</span></strong></span></p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">सीरत दी ओ मरियम लगदी</span></strong></span></p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">हस्ती है तां फूल झडदे ने</span></strong></span></p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी...</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ये वहीँ गीत है जो फिल्म उड़ता पंजाब में इस्तेमाल हुआ और इस नए दौर में भी युवाओं की जुबा पर इस कदर चढ़ा कि मानो हर कोई बटालवी की&nbsp; महबूबा को ढूंढ़ते के लिए गा रहा हो। कहते है बटालवी का ये लड़कपन का प्यार अधूरा रहा क्यों कि एक बीमारी के चलते उस लड़की की मौत हो गयी। खैर ज़िंदगी बढ़ने का नाम है सो बटालवी भी अवसाद से निकलकर आगे बढ़ने लगे। फिर एक लड़की मिली और फिर शिव को उनसे मोहब्बत हो गई। पर इस मर्तबा भी अंजाम विरह ही था। दरअसल, जिसे शिव दिल ओ जान से मोहब्बत करते थे उसने किसी और का घर बसाया और शादी करके विदेश चली गयी। एक बार फिर शिव तनहा हुए और विरह के समुन्दर में गोते खाने लगे।&nbsp; तब शराब और अवसाद में डूबे शिव ने जो लिखा वो कालजयी हो गया ...........</span></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;"><span style="color:#000080;">माए नी माए मैं इक शिकरा यार बनाया</span></span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;"><span style="color:#000080;">चूरी कुट्टाँ ताँ ओह खाओंदा नाहीं</span></span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;"><span style="color:#000080;">वे असाँ दिल दा मास खवाया</span></span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;"><span style="color:#000080;">इक उड़ारी ऐसी मारी</span></span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;"><span style="color:#000080;">इक उड़ारी ऐसी मारी</span></span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;"><span style="color:#000080;">ओह मुड़ वतनीं ना आया, ओ माये नी!</span></span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;"><span style="color:#000080;">मैं इक शिकरा यार बना</span></span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शिकरा पक्षी दूर से अपने शिकार को देखकर सीधे उसका मांस नोंच कर फिर उड़ जाता है। शिव ने अपनी उस बेवफा प्रेमिका को शिकरा कहा। हालांकि वो लड़की कौन थी इसे लेकर तरह तरह की बातें प्रचलित है । पर&nbsp; इसके बारे में आधिकारिक रुप से आज तक कोई जानकारी नहीं है और ना वो ख़ुद ही कभी लोगों के सामने आई। शिव की उस बेवफा प्रेमिका के बारे में एक किस्सा अमृता प्रीतम ने भी बयां किया है।&nbsp;&nbsp;<br />
शिव एक दिन अमृता प्रीतम के घर पहुंचे और उन्हें बताया कि जो लड़की उनसे इतनी प्यार भरी बातें किया करती थी वो उन्हें छोड़कर चली गयी है। उसने विदेश जाकर शादी कर ली है। अमृता प्रीतम ने उन्हें जिंदगी की हकीकत और फ़साने का अंतर समझाने का प्रत्यन किया पर शिव का मासूम&nbsp; दिल टूट चूका था। कहते है शिव उसके बाद ताउम्र उसी लड़की के ग़म में लिखते रहे। सिर्फ 24 साल की उम्र में शिव कुमार बटालवी की कविताओं का पहला संकलन &quot;पीड़ां दा परागा&quot; प्रकाशित हुआ, जो उन दिनों काफी चर्चित रहा। उसी दौर में शिव ने लिखा ........</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">अज्ज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">तेरे चुम्मण पिछली संग वरगा</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">है किरणा दे विच नशा जिहा</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">किसे चिम्मे सप्प दे दंग वरगा</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;आखिरकार, 1967 में बटालवी ने अरुणा से शादी कर ली और उनके साथ दो बेटियां हुई। शिव शादी के बाद चंडीगढ़ चले गये। वहां वे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत रहे। पर कहते है बटालवी उस लड़की को नहीं भूल नहीं सके और उसकी याद में लिखते गए।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">की पुछ दे ओ हाल फ़कीरां दा</span></strong></span></p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">साडा नदियों बिछड़े नीरां दा</span></strong></span></p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">साडा हंज दी जूने आयां दा</span></strong></span></p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:18px;">साडा दिल जलया दिलगीरां दा</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">धीरे-धीरे, बटालवी शराब की दुसाध्य लत के चलते 7 मई 1973 को लीवर सिरोसिस के परिणामस्वरूप जग को अलविदा कह गए। कहते है कि जीवन के अंतिम दौर में उनकी माली हालत भी ठीक नहीं थी और अपने ससुर के घर उन्होंने अंतिम सांस ली। पर बटालवी जैसे शायर तो पुरानी शराब की तरह होते है, दौर भले बदले&nbsp; पर नशा वक्त के साथ गाढ़ा होता जाता है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&lsquo;<strong>लूणा&rsquo; के लिए मिला साहित्य अकादमी पुरस्कार :</strong><br />
ऐसा नहीं है कि शिव कुमार बटालवी सिर्फ विरह के शायर थे। बटालवी का नाम साहित्य के गलियारों में बड़े अदब के साथ लिया जाता है। ऐसा हो भी क्यों ना&nbsp; इस दुनिया को अलविदा कहने&nbsp; से पहले वे&nbsp; &lsquo;लूणा&rsquo; जैसा महाकाव्य लिख गए। इसी के लिए उन्हें सबसे कम उम्र में यानी महज 31 वर्ष की उम्र में साहित्य अकादमी पुरूस्कार भी मिला। ये सम्मान प्राप्त करने वाले वे सबसे कम उम्र के साहित्यकार है। &lsquo;लूणा&rsquo; को पंजाबी साहित्य में &lsquo;मास्टरपीस&rsquo; का दर्ज़ा प्राप्त है और साहित्य जगत में इसकी आभा बरक़रार है। कहा जाता था कि कविता हिंदी में है और शायरी उर्दू में। पर शिव ने जब पंजाबी में अपनी जादूगरी दिखाई तो उस दौर के तमाम हिंदी और उर्दू के बड़े बड़े शायर कवि हैरान रह गए।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>नायाब गायकों ने गाये बटालवी के गीत :</strong><br />
बटालवी की नज्मों को सबसे पहले नुसरत फतेह अली खान ने अपनी आवाज दी थी। उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान ने उनकी कविता &#39;मायें नी मायें मेरे गीतां दे नैणां विच&#39; को गाया था । जगजीत सिंह ने उनका एक गीत &#39;मैंनू तेरा शबाब ले बैठा&#39; गाया तो दुनिया को पता चला की शब्दों की जादूगरी क्या होती है। नुसरत साहब और जगजीत सिंह - चित्रा सिंह के अलावा रबी शेरगिल, हंस राज हंस, दीदार सिंह परदेसी सहित एक से बढ़कर एक नायाब गायकों ने बटालवी की कविताएं गाई। उनकी लिखी रचनाओं को गाकर न जाने कितने गायक शौहरत पा गए। बटालवी आज भी हर दिल अजीज है। बटालवी और विरह जुदा नहीं । बटालवी तो आखिर बटालवी है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall30034.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[शिव कुमार बटालवी : वो शायर जिसे मरने की बहुत जल्दी थी]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/shakeel-badyuni-poet-writer-gazal-shyari]]></guid>
                       <title><![CDATA[शकील बदायूनी..जो लिखा बेमिसाल लिखा,पढ़े 5 खूबसूरत ग़ज़लें ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/shakeel-badyuni-poet-writer-gazal-shyari]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 08 Jun 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[उत्तर प्रदेश का बदायूं जिला तीन चीजों के लिए मशहूर है- पीर, पेड़े और कवि। इसी बदायूं से ताल्लुख रखते हैं शकील बदायूनी। आप उर्दू&nbsp; के बड़े नामों में से एक हैं, साथ ही विख्यात फ़िल्म गीतकार भी है। चौदहवीं का चांद, प्यार किया तो डरना क्या, न जाओ सैंया छुड़ा के बैयां कसम तुम्हारी, हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं और सुहानी रात ढल चुकी जैसे न जाने कितने ही गाने हैं, जो शकील बदायूनी ने लिखे हैं।&nbsp;

शकील बदायूनी की लिखी कई गजलें बेमिसाल हैं, सब एक से बढ़कर एक और नायाब। पेश हैं उनकी लिखी पांच खूबसूरत ग़ज़लें...&nbsp;&nbsp;

&nbsp;

चाँदनी में रुख़-ए-ज़ेबा नहीं देखा जाता

&nbsp;

चाँदनी में रुख़-ए-ज़ेबा नहीं देखा जाता&nbsp;

माह ओ ख़ुर्शीद को यकजा नहीं देखा जाता&nbsp;

यूँ तो उन आँखों से क्या क्या नहीं देखा जाता&nbsp;

हाँ मगर अपना ही जल्वा नहीं देखा जाता&nbsp;

दीदा-ओ-दिल की तबाही मुझे मंज़ूर मगर&nbsp;

उन का उतरा हुआ चेहरा नहीं देखा जाता&nbsp;

ज़ब्त-ए-ग़म हाँ वही अश्कों का तलातुम इक बार&nbsp;

अब तो सूखा हुआ दरिया नहीं देखा जाता&nbsp;

ज़िंदगी आ तुझे क़ातिल के हवाले कर दूँ&nbsp;

मुझ से अब ख़ून-ए-तमन्ना नहीं देखा जाता&nbsp;

अब तो झूटी भी तसल्ली ब-सर-ओ-चश्म क़ुबूल&nbsp;

दिल का रह रह के तड़पना नहीं देखा जाता&nbsp;


नज़र-नवाज़ नज़ारों में जी नहीं लगता

&nbsp;

नज़र-नवाज़ नज़ारों में जी नहीं लगता&nbsp;

वो क्या गए कि बहारों में जी नहीं लगता&nbsp;

शब-ए-फ़िराक़ को ऐ चाँद आ के चमका दे&nbsp;

नज़र उदास है तारों में जी नहीं लगता&nbsp;

ग़म-ए-हयात के मारे तो हम भी हैं लेकिन&nbsp;

ग़म-ए-हयात के मारों में जी नहीं लगता&nbsp;

न पूछ मुझ से तिरे ग़म में क्या गुज़रती है&nbsp;

यही कहूँगा हज़ारों में जी नहीं लगता&nbsp;

कुछ इस क़दर है ग़म-ए-ज़िंदगी से दिल मायूस&nbsp;

ख़िज़ाँ गई तो बहारों में जी नहीं लगता&nbsp;

फ़साना-ए-शब-ए-ग़म ख़त्म होने वाला है&nbsp;

&#39;शकील&#39; चाँद सितारों में जी नहीं लगता&nbsp;


&nbsp;

हुई हम से ये नादानी तिरी महफ़िल में आ बैठे

&nbsp;

हुई हम से ये नादानी तिरी महफ़िल में आ बैठे&nbsp;

ज़मीं की ख़ाक हो कर आसमाँ से दिल लगा बैठे&nbsp;

हुआ ख़ून-ए-तमन्ना उस का शिकवा क्या करें तुम से&nbsp;

न कुछ सोचा न कुछ समझा जिगर पर तीर खा बैठे&nbsp;

ख़बर की थी गुलिस्तान-ए-मोहब्बत में भी ख़तरे हैं&nbsp;

जहाँ गिरती है बिजली हम उसी डाली पे जा बैठे&nbsp;

न क्यूँ अंजाम-ए-उल्फ़त देख कर आँसू निकल आएँ&nbsp;

जहाँ को लूटने वाले ख़ुद अपना घर लुटा बैठे&nbsp;

&nbsp;


कहीं हुस्न का तक़ाज़ा कहीं वक़्त के इशारे

&nbsp;

कहीं हुस्न का तक़ाज़ा कहीं वक़्त के इशारे&nbsp;

न बचा सकेंगे दामन ग़म-ए-ज़िंदगी के मारे&nbsp;

शब-ए-ग़म की तीरगी में मिरी आह के शरारे&nbsp;

कभी बन गए हैं आँसू कभी बन गए हैं तारे&nbsp;

न ख़लिश रही वो मुझ में न कशिश रही वो मुझ में&nbsp;

जिसे ज़ो&#39;म-ए-आशिक़ी हो वही अब तुझे पुकारे&nbsp;

जिन्हें हो सका न हासिल कभी कैफ़-ए-क़ुर्ब-ए-मंज़िल&nbsp;

वही दो-क़दम हैं मुझ को तिरी जुस्तुजू से प्यारे&nbsp;

मैं &#39;शकील&#39; उन का हो कर भी न पा सका हूँ उन को&nbsp;

मिरी तरह ज़िंदगी में कोई जीत कर न हारे&nbsp;

&nbsp;

मेरी दीवानगी नहीं जाती

&nbsp;

मेरी दीवानगी नहीं जाती&nbsp;

रो रहा हूँ हँसी नहीं जाती&nbsp;

तेरे जल्वों से आश्कारा हूँ&nbsp;

चाँद की चाँदनी नहीं जाती&nbsp;

तर्क-ए-मय ही समझ ले ऐ नासेह&nbsp;

इतनी पी है कि पी नहीं जाती&nbsp;

जब से देखा है उन को बे-पर्दा&nbsp;

नख़वत-ए-आगही नहीं जाती&nbsp;

शोख़ी-ए-हुस्न-ए-बे-अमाँ की क़सम&nbsp;

हुस्न की सादगी नहीं जाती&nbsp;

उन की दरिया-दिली को क्या कहिए&nbsp;

मेरी तिश्ना-लबी नहीं जाती&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">उत्तर प्रदेश का बदायूं जिला तीन चीजों के लिए मशहूर है- पीर, पेड़े और कवि। इसी बदायूं से ताल्लुख रखते हैं शकील बदायूनी। आप उर्दू&nbsp; के बड़े नामों में से एक हैं, साथ ही विख्यात फ़िल्म गीतकार भी है। चौदहवीं का चांद, प्यार किया तो डरना क्या, न जाओ सैंया छुड़ा के बैयां कसम तुम्हारी, हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं और सुहानी रात ढल चुकी जैसे न जाने कितने ही गाने हैं, जो शकील बदायूनी ने लिखे हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शकील बदायूनी की लिखी कई गजलें बेमिसाल हैं, सब एक से बढ़कर एक और नायाब। पेश हैं उनकी लिखी पांच खूबसूरत ग़ज़लें...&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#800000;"><span style="font-size:20px;"><strong>चाँदनी में रुख़-ए-ज़ेबा नहीं देखा जाता</strong></span></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">चाँदनी में रुख़-ए-ज़ेबा नहीं देखा जाता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">माह ओ ख़ुर्शीद को यकजा नहीं देखा जाता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">यूँ तो उन आँखों से क्या क्या नहीं देखा जाता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हाँ मगर अपना ही जल्वा नहीं देखा जाता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">दीदा-ओ-दिल की तबाही मुझे मंज़ूर मगर&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उन का उतरा हुआ चेहरा नहीं देखा जाता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ज़ब्त-ए-ग़म हाँ वही अश्कों का तलातुम इक बार&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अब तो सूखा हुआ दरिया नहीं देखा जाता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ज़िंदगी आ तुझे क़ातिल के हवाले कर दूँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मुझ से अब ख़ून-ए-तमन्ना नहीं देखा जाता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अब तो झूटी भी तसल्ली ब-सर-ओ-चश्म क़ुबूल&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">दिल का रह रह के तड़पना नहीं देखा जाता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<strong><span style="color:#800000;"><span style="font-size:20px;">नज़र-नवाज़ नज़ारों में जी नहीं लगता</span></span></strong></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नज़र-नवाज़ नज़ारों में जी नहीं लगता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">वो क्या गए कि बहारों में जी नहीं लगता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शब-ए-फ़िराक़ को ऐ चाँद आ के चमका दे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नज़र उदास है तारों में जी नहीं लगता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ग़म-ए-हयात के मारे तो हम भी हैं लेकिन&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ग़म-ए-हयात के मारों में जी नहीं लगता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">न पूछ मुझ से तिरे ग़म में क्या गुज़रती है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">यही कहूँगा हज़ारों में जी नहीं लगता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कुछ इस क़दर है ग़म-ए-ज़िंदगी से दिल मायूस&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ख़िज़ाँ गई तो बहारों में जी नहीं लगता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">फ़साना-ए-शब-ए-ग़म ख़त्म होने वाला है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&#39;शकील&#39; चाँद सितारों में जी नहीं लगता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong><span style="color:#800000;"><span style="font-size:20px;">हुई हम से ये नादानी तिरी महफ़िल में आ बैठे</span></span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हुई हम से ये नादानी तिरी महफ़िल में आ बैठे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ज़मीं की ख़ाक हो कर आसमाँ से दिल लगा बैठे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हुआ ख़ून-ए-तमन्ना उस का शिकवा क्या करें तुम से&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">न कुछ सोचा न कुछ समझा जिगर पर तीर खा बैठे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ख़बर की थी गुलिस्तान-ए-मोहब्बत में भी ख़तरे हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जहाँ गिरती है बिजली हम उसी डाली पे जा बैठे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">न क्यूँ अंजाम-ए-उल्फ़त देख कर आँसू निकल आएँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जहाँ को लूटने वाले ख़ुद अपना घर लुटा बैठे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;"><strong><span style="color:#800000;"><span style="font-size:20px;">कहीं हुस्न का तक़ाज़ा कहीं वक़्त के इशारे</span></span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कहीं हुस्न का तक़ाज़ा कहीं वक़्त के इशारे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">न बचा सकेंगे दामन ग़म-ए-ज़िंदगी के मारे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शब-ए-ग़म की तीरगी में मिरी आह के शरारे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कभी बन गए हैं आँसू कभी बन गए हैं तारे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">न ख़लिश रही वो मुझ में न कशिश रही वो मुझ में&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जिसे ज़ो&#39;म-ए-आशिक़ी हो वही अब तुझे पुकारे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जिन्हें हो सका न हासिल कभी कैफ़-ए-क़ुर्ब-ए-मंज़िल&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">वही दो-क़दम हैं मुझ को तिरी जुस्तुजू से प्यारे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मैं &#39;शकील&#39; उन का हो कर भी न पा सका हूँ उन को&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मिरी तरह ज़िंदगी में कोई जीत कर न हारे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="color:#800000;"><span style="font-size:20px;">मेरी दीवानगी नहीं जाती</span></span></strong></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मेरी दीवानगी नहीं जाती&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">रो रहा हूँ हँसी नहीं जाती&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">तेरे जल्वों से आश्कारा हूँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">चाँद की चाँदनी नहीं जाती&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">तर्क-ए-मय ही समझ ले ऐ नासेह&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इतनी पी है कि पी नहीं जाती&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जब से देखा है उन को बे-पर्दा&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नख़वत-ए-आगही नहीं जाती&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शोख़ी-ए-हुस्न-ए-बे-अमाँ की क़सम&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हुस्न की सादगी नहीं जाती&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उन की दरिया-दिली को क्या कहिए&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मेरी तिश्ना-लबी नहीं जाती&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall29816.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[shakeel-badyuni-poet-writer-gazal-shyari]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/mirja-galib-romantic-shyari]]></guid>
                       <title><![CDATA[ग़ालिब : जिसकी शायरी के बिना हर मोहब्बत अधूरी है, पढ़े 15 नायाब शेर ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/mirja-galib-romantic-shyari]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 07 Jun 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ &ldquo;ग़ालिब&rdquo; उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के वो महान शायर जिनकी शायरी के बगैर हर मोहब्बत अधूरी है। वो शायर जिन्हें उर्दू भाषा का सर्वकालिक महान शायर माना गया है। वो शायर जिसे फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी दिया जाता है।

&nbsp;ग़ालिब को मुख्यतः उनकी उर्दू ग़ज़लों को लिए याद किया जाता आज&nbsp; जानिए मिरज़ा ग़ालिब के वो 15 शेर है जो आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp;


उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है


&nbsp;


वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं

कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं


&nbsp;


हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले


&nbsp;


रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है


&nbsp;


इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना

दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना




आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

कौन जीता है तेरी&nbsp; ज़ुल्फ़ के सर होते तक


&nbsp;


बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे


&nbsp;


क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ

रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन


&nbsp;


मेहरबान होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक्त

मैं गया वक्त नहीं हूँ की फिर आ भी न सकूँ


&nbsp;


कितना खौफ होता है रात के अंधेरों में

पूछ उन परिंदो से जिनके घर नहीं होते


&nbsp;


इस सादगी पे कौन न मर जाये ऐ खुदा

लड़ते है और हाथ में तलवार भी नहीं


&nbsp;


इश्क़ ने &#39;ग़ालिब&#39; निकम्मा कर दिया

वरना हम भी आदमी थे काम के


&nbsp;


मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का

उसी को देखकर जीते है जिस काफिर पे दम निकले


&nbsp;


हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है


&nbsp;


यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं,

अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो


&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ &ldquo;ग़ालिब&rdquo; उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के वो महान शायर जिनकी शायरी के बगैर हर मोहब्बत अधूरी है। वो शायर जिन्हें उर्दू भाषा का सर्वकालिक महान शायर माना गया है। वो शायर जिसे फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी दिया जाता है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;ग़ालिब को मुख्यतः उनकी उर्दू ग़ज़लों को लिए याद किया जाता आज&nbsp; जानिए मिरज़ा ग़ालिब के वो 15 शेर है जो आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size:18px;">वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size: 18px;">हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size: 18px;">रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size:18px;">इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p><br />
<span style="font-size:18px;">आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">कौन जीता है तेरी&nbsp; ज़ुल्फ़ के सर होते तक</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size:18px;">बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size: 18px;">क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size:18px;">मेहरबान होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक्त</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मैं गया वक्त नहीं हूँ की फिर आ भी न सकूँ</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size:18px;">कितना खौफ होता है रात के अंधेरों में</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">पूछ उन परिंदो से जिनके घर नहीं होते</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size:18px;">इस सादगी पे कौन न मर जाये ऐ खुदा</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">लड़ते है और हाथ में तलवार भी नहीं</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size:18px;">इश्क़ ने &#39;ग़ालिब&#39; निकम्मा कर दिया</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">वरना हम भी आदमी थे काम के</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size: 18px;">मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">उसी को देखकर जीते है जिस काफिर पे दम निकले</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size: 18px;">हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<blockquote>
<p><span style="font-size: 18px;">यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं,</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो</span></p>
</blockquote>

<p>&nbsp;</p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall29787.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[mirja-galib-romantic-shyari]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/shiv-kumar-batalvi]]></guid>
                       <title><![CDATA[शिव कुमार बटालवी... वो शायर जो मरने की बहुत जल्दी में था]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/shiv-kumar-batalvi]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 07 Jun 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[प्रसिद्ध कवयित्री अमृता प्रीतम के शब्दों में वो &lsquo;बिरह का सुल्तान&rsquo; था। पंजाब का एक ऐसा शायर जिसके जैसा न कोई था , न है और न कोई और होगा। वो हिंदुस्तान में भी खूब छाया और पाकिस्तान ने भी उसे जमकर चाहा। पंजाब का पहला सुपरस्टार शायर शिव कुमार बटालवी। वो शायर जिसने शराब में डूबकर वो रच दिया जिसे होश वाले शायद कभी न उकेर&nbsp; पाते।&nbsp; वो शायर जो मरने की बहुत जल्दी में था।

असां तां जोबन रुत्ते मरनां
जोबन रूत्ते जो भी मरदा फूल बने या तारा
जोबन रुत्ते आशिक़ मरदे या कोई करमा वाला

बटालवी का&nbsp; कहना था कि जवानी में जो मरता है वो या तो फूल बनता है&nbsp; या तारा। जवानी में या तो आशिक मरते हैं या वो जो बहुत करमों वाले होते हैं। जैसा वो कहते थे वैसा हुआ भी महज 35 की उम्र में बटालवी दुनिया को अलविदा कह गए।&nbsp; पर जाने से पहले इतना खूबसूरत लिख गए कि शायरी का हर ज़िक्र उनके बगैर अधूरा है।&nbsp;&nbsp;


शिव कुमार बटालवी 23 जुलाई 1936 को पंजाब के सियालकोट में पैदा हुए, जो बंटवारे के बाद से पाकिस्तान में है। उनके पिता एक तहसीलदार थे पर न जाने कैसे शिव&nbsp; शायर हो गए। विभाजन के बाद शिव हिंदुस्तान आ गए, और गुरदासपुर में बस गए। जिंदगी के सफर में&nbsp; बटाला, कादियां, बैजनाथ होते हुए नाभा पहुंचे लेकिन अपने नाम में बटालवी जोड़ खुद को ताउम्र के लिए&nbsp; बटाला&nbsp; से जोड़ लिया।

बटालवी की छोटी सी जीवन यात्रा तमाम उतार चढ़ाव समेटे हुए है , किसी खूबसूरत चलचित्र की तरह जिसमें&nbsp; स्टारडम है , विरह का तड़का है और जिसका अंत तमाम वेदना समेटे हुए है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp;कहते है उन्हें मेले में एक लड़की से मोहब्बत हो गयी। मेले के बाद जब लड़की नज़रों से ओझल हुई तो उसे ढूंढने के लिए एक गीत लिख डाला।&nbsp; गीत क्या मानो इश्तहार लिखा हो

&lsquo;इक कुड़ी जिहदा नाम मुहब्बत ग़ुम है&rsquo;
ओ साद मुरादी, सोहनी फब्बत
गुम है, गुम है, गुम है
ओ सूरत ओस दी, परियां वर्गी
सीरत दी ओ मरियम लगदी
हस्ती है तां फूल झडदे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी

ये वहीँ गीत है जो फिल्म उड़ता पंजाब में इस्तेमाल हुआ और इस नए दौर में भी युवाओं की जुबा पर इस कदर चढ़ा कि मानो हर कोई बटालवी की&nbsp; महबूबा को ढूंढ़ते के लिए गा रहा हो।
कहते है बटालवी का ये लड़कपन का प्यार अधूरा रहा क्यों कि एक बीमारी के चलते उस लड़की की मौत हो गयी।

खैर ज़िंदगी बढ़ने का नाम है सो बटालवी भी अवसाद से निकलकर आगे बढ़ने लगे।&nbsp; फिर एक लड़की मिली और फिर शिव को उनसे मोहब्बत हो गई। पर इस मर्तबा भी अंजाम विरह ही था।&nbsp; दरअसल, जिसे शिव दिल ओ जान से मोहब्बत करते थे उसने किसी और का घर बसाया और शादी करके विदेश चली गयी। एक बार फिर शिव तनहा हुए और विरह के समुन्दर में गोते खाने लगे।&nbsp;&nbsp;

तब शराब और अवसाद में डूबे शिव ने जो लिखा वो कालजयी हो गया ...........

माए नी माए मैं इक शिकरा यार बनाया
चूरी कुट्टाँ ताँ ओह खाओंदा नाहीं
वे असाँ दिल दा मास खवाया
इक उड़ारी ऐसी मारी
इक उड़ारी ऐसी मारी
ओह मुड़ वतनीं ना आया, ओ माये नी!
मैं इक शिकरा यार बना

शिकरा&nbsp; पक्षी&nbsp; दूर से अपने शिकार को देखकर सीधे उसका मांस नोंच कर फिर उड़ जाता है। शिव ने अपनी उस बेवफा प्रेमिका को शिकरा कहा।
हालांकि वो लड़की कौन थी इसे लेकर तरह तरह की बातें प्रचलित है । पर&nbsp; इसके बारे में आधिकारिक रुप से आज तक कोई जानकारी नहीं है और ना वो ख़ुद ही कभी लोगों के सामने आई ।

शिव की उस बेवफा प्रेमिका के बारे में एक किस्सा अमृता प्रीतम ने भी बयां किया है।&nbsp;&nbsp;
शिव एक दिन अमृता प्रीतम के घर पहुंचे और उन्हें बताया कि जो लड़की उनसे इतनी प्यार भरी बातें किया करती थी वो उन्हें छोड़कर चली गयी है। उसने विदेश जाकर शादी कर ली है। अमृता प्रीतम ने उन्हें जिंदगी की हकीकत और फ़साने का अंतर समझने का प्रत्यन किया पर शिव का मस्सों दिल टूट चूका था। कहते है शिव उसके बाद ताउम्र उसी लड़की&nbsp; के ग़म में लिखते रहे।

उसी दौर में शिव ने लिखा ........

अज्ज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा

तेरे चुम्मण पिछली संग वरगा

है किरणा दे विच नशा जिहा

किसे चिम्मे सप्प दे दंग वरगा


&nbsp;आखिरकार, 1967 में बटालवी ने अरुणा से शादी कर ली और उनके साथ दो बेटियां हुई।&nbsp; पर कहते है बटालवी उस लड़की को नहीं भूल नहीं सके और उसकी याद में लिखते गए।&nbsp;&nbsp;

की पुछ दे ओ हाल फ़कीरां दा
साडा नदियों बिछड़े नीरां दा
साडा हंज दी जूने आयां दा
साडा दिल जलया दिलगीरां दा

धीरे-धीरे, बटालवी शराब की दुसाध्य लत के चलते 7 मई 1973 को लीवर सिरोसिस के परिणामस्वरूप&nbsp; जग को अलविदा कह गए।&nbsp; कहते है कि जीवन के अंतिम दौर में उनकी माली हालत भी ठीक नहीं थी और अपने ससुर के घर उन्होंने अंतिम सांस ली। पर बटालवी जैसे शायर तो पुरानी शराब की तरह होते है, दौर भले बदले&nbsp; पर नशा वक्त के साथ गाढ़ा होता जाता है।&nbsp;&nbsp;

ऐसा नहीं है कि शिव कुमार बटालवी सिर्फ विरह के शायर थे। बटालवी का नाम साहित्य के गलियारों में बड़े अदब के साथ लिया जाता है। ऐसा हो भी क्यों ना।&nbsp; इस दुनिया को अलविदा कहने&nbsp; से पहले वे&nbsp; &lsquo;लूणा&rsquo; जैसा महाकाव्य लिख गए। इसी के लिए उन्हें सबसे कम उम्र में यानी महज 31 वर्ष की उम्र में साहित्य अकादमी पुरूस्कार भी मिला। &lsquo;लूणा&rsquo; को पंजाबी साहित्य में &lsquo;मास्टरपीस&rsquo; का दर्ज़ा प्राप्त है और साहित्य जगत में इसकी आभा बरक़रार है।

कहा जाता था कि कविता हिंदी में है और शायरी उर्दू में। पर शिव ने जब पंजाबी में अपनी जादूगरी दिखाई तो उस दौर के तमाम हिंदी और उर्दू के बड़े बड़े शायर कवि हैरान रह गए।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;

बटालवी की नज्मों को सबसे पहले नुसरत फतेह अली खान ने अपनी आवाज दी थी। उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान ने उनकी कविता &#39;मायें नी मायें मेरे गीतां दे नैणां विच&#39; को गाया था ।&nbsp;&nbsp;

जगजीत सिंह ने उनका एक गीत &#39;मैंनू तेरा शबाब ले बैठा&#39; गाया तो दुनिया को पता चला की शब्दों की जादूगरी क्या होती है।

मैंनू तेरा शबाब ले बैठा,
रंग गोरा गुलाब ले बैठा।
&nbsp;
किन्नी-बीती ते किन्नी बाकी है,
मैंनू एहो हिसाब ले बैठा।

मैंनू जद वी तूसी तो याद आये,
दिन दिहाड़े शराब ले बैठा।
&nbsp;

चन्गा हुन्दा सवाल ना करदा,
मैंनू तेरा जवाब ले बैठा।

नुसरत साहब और जगजीत सिंह - चित्रा सिंह के अलावा रबी शेरगिल, हंस राज हंस, दीदार सिंह परदेसी सहित एक से बढ़कर एक नायाब&nbsp; गायकों ने बटालवी की कविताएं गाई।

बटालवी आज भी हर दिल अजीज है।&nbsp;बटालवी और विरह जुदा नहीं।&nbsp;बटालवी तो आखिर बटालवी है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">प्रसिद्ध कवयित्री अमृता प्रीतम के शब्दों में वो &lsquo;बिरह का सुल्तान&rsquo; था। पंजाब का एक ऐसा शायर जिसके जैसा न कोई था , न है और न कोई और होगा। वो हिंदुस्तान में भी खूब छाया और पाकिस्तान ने भी उसे जमकर चाहा। पंजाब का पहला सुपरस्टार शायर शिव कुमार बटालवी। वो शायर जिसने शराब में डूबकर वो रच दिया जिसे होश वाले शायद कभी न उकेर&nbsp; पाते।&nbsp; वो शायर जो मरने की बहुत जल्दी में था।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><em><span style="font-size:18px;">असां तां जोबन रुत्ते मरनां<br />
जोबन रूत्ते जो भी मरदा फूल बने या तारा<br />
जोबन रुत्ते आशिक़ मरदे या कोई करमा वाला</span></em></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बटालवी का&nbsp; कहना था कि जवानी में जो मरता है वो या तो फूल बनता है&nbsp; या तारा। जवानी में या तो आशिक मरते हैं या वो जो बहुत करमों वाले होते हैं। जैसा वो कहते थे वैसा हुआ भी महज 35 की उम्र में बटालवी दुनिया को अलविदा कह गए।&nbsp; पर जाने से पहले इतना खूबसूरत लिख गए कि शायरी का हर ज़िक्र उनके बगैर अधूरा है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">शिव कुमार बटालवी 23 जुलाई 1936 को पंजाब के सियालकोट में पैदा हुए, जो बंटवारे के बाद से पाकिस्तान में है। उनके पिता एक तहसीलदार थे पर न जाने कैसे शिव&nbsp; शायर हो गए। विभाजन के बाद शिव हिंदुस्तान आ गए, और गुरदासपुर में बस गए। जिंदगी के सफर में&nbsp; बटाला, कादियां, बैजनाथ होते हुए नाभा पहुंचे लेकिन अपने नाम में बटालवी जोड़ खुद को ताउम्र के लिए&nbsp; बटाला&nbsp; से जोड़ लिया।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बटालवी की छोटी सी जीवन यात्रा तमाम उतार चढ़ाव समेटे हुए है , किसी खूबसूरत चलचित्र की तरह जिसमें&nbsp; स्टारडम है , विरह का तड़का है और जिसका अंत तमाम वेदना समेटे हुए है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;कहते है उन्हें मेले में एक लड़की से मोहब्बत हो गयी। मेले के बाद जब लड़की नज़रों से ओझल हुई तो उसे ढूंढने के लिए एक गीत लिख डाला।&nbsp; गीत क्या मानो इश्तहार लिखा हो</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><span style="color:#000080;"><span style="font-size:18px;">&lsquo;इक कुड़ी जिहदा नाम मुहब्बत ग़ुम है&rsquo;<br />
ओ साद मुरादी, सोहनी फब्बत<br />
गुम है, गुम है, गुम है<br />
ओ सूरत ओस दी, परियां वर्गी<br />
सीरत दी ओ मरियम लगदी<br />
हस्ती है तां फूल झडदे ने<br />
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी</span></span></em></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ये वहीँ गीत है जो फिल्म उड़ता पंजाब में इस्तेमाल हुआ और इस नए दौर में भी युवाओं की जुबा पर इस कदर चढ़ा कि मानो हर कोई बटालवी की&nbsp; महबूबा को ढूंढ़ते के लिए गा रहा हो।<br />
कहते है बटालवी का ये लड़कपन का प्यार अधूरा रहा क्यों कि एक बीमारी के चलते उस लड़की की मौत हो गयी।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">खैर ज़िंदगी बढ़ने का नाम है सो बटालवी भी अवसाद से निकलकर आगे बढ़ने लगे।&nbsp; फिर एक लड़की मिली और फिर शिव को उनसे मोहब्बत हो गई। पर इस मर्तबा भी अंजाम विरह ही था।&nbsp; दरअसल, जिसे शिव दिल ओ जान से मोहब्बत करते थे उसने किसी और का घर बसाया और शादी करके विदेश चली गयी। एक बार फिर शिव तनहा हुए और विरह के समुन्दर में गोते खाने लगे।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">तब शराब और अवसाद में डूबे शिव ने जो लिखा वो कालजयी हो गया ...........</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><em><span style="font-size:18px;">माए नी माए मैं इक शिकरा यार बनाया<br />
चूरी कुट्टाँ ताँ ओह खाओंदा नाहीं<br />
वे असाँ दिल दा मास खवाया<br />
इक उड़ारी ऐसी मारी<br />
इक उड़ारी ऐसी मारी<br />
ओह मुड़ वतनीं ना आया, ओ माये नी!<br />
मैं इक शिकरा यार बना</span></em></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शिकरा&nbsp; पक्षी&nbsp; दूर से अपने शिकार को देखकर सीधे उसका मांस नोंच कर फिर उड़ जाता है। शिव ने अपनी उस बेवफा प्रेमिका को शिकरा कहा।<br />
हालांकि वो लड़की कौन थी इसे लेकर तरह तरह की बातें प्रचलित है । पर&nbsp; इसके बारे में आधिकारिक रुप से आज तक कोई जानकारी नहीं है और ना वो ख़ुद ही कभी लोगों के सामने आई ।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शिव की उस बेवफा प्रेमिका के बारे में एक किस्सा अमृता प्रीतम ने भी बयां किया है।&nbsp;&nbsp;<br />
शिव एक दिन अमृता प्रीतम के घर पहुंचे और उन्हें बताया कि जो लड़की उनसे इतनी प्यार भरी बातें किया करती थी वो उन्हें छोड़कर चली गयी है। उसने विदेश जाकर शादी कर ली है। अमृता प्रीतम ने उन्हें जिंदगी की हकीकत और फ़साने का अंतर समझने का प्रत्यन किया पर शिव का मस्सों दिल टूट चूका था। कहते है शिव उसके बाद ताउम्र उसी लड़की&nbsp; के ग़म में लिखते रहे।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उसी दौर में शिव ने लिखा ........</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><span style="color:#000080;"><span style="font-size:18px;">अज्ज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा</span></span></em></p>

<p style="text-align: justify;"><em><span style="color:#000080;"><span style="font-size:18px;">तेरे चुम्मण पिछली संग वरगा</span></span></em></p>

<p style="text-align: justify;"><em><span style="color:#000080;"><span style="font-size:18px;">है किरणा दे विच नशा जिहा</span></span></em></p>

<p style="text-align: justify;"><em><span style="color:#000080;"><span style="font-size:18px;">किसे चिम्मे सप्प दे दंग वरगा</span></span></em></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;आखिरकार, 1967 में बटालवी ने अरुणा से शादी कर ली और उनके साथ दो बेटियां हुई।&nbsp; पर कहते है बटालवी उस लड़की को नहीं भूल नहीं सके और उसकी याद में लिखते गए।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><em><span style="font-size:18px;">की पुछ दे ओ हाल फ़कीरां दा<br />
साडा नदियों बिछड़े नीरां दा<br />
साडा हंज दी जूने आयां दा<br />
साडा दिल जलया दिलगीरां दा</span></em></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">धीरे-धीरे, बटालवी शराब की दुसाध्य लत के चलते 7 मई 1973 को लीवर सिरोसिस के परिणामस्वरूप&nbsp; जग को अलविदा कह गए।&nbsp; कहते है कि जीवन के अंतिम दौर में उनकी माली हालत भी ठीक नहीं थी और अपने ससुर के घर उन्होंने अंतिम सांस ली। पर बटालवी जैसे शायर तो पुरानी शराब की तरह होते है, दौर भले बदले&nbsp; पर नशा वक्त के साथ गाढ़ा होता जाता है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ऐसा नहीं है कि शिव कुमार बटालवी सिर्फ विरह के शायर थे। बटालवी का नाम साहित्य के गलियारों में बड़े अदब के साथ लिया जाता है। ऐसा हो भी क्यों ना।&nbsp; इस दुनिया को अलविदा कहने&nbsp; से पहले वे&nbsp; &lsquo;लूणा&rsquo; जैसा महाकाव्य लिख गए। इसी के लिए उन्हें सबसे कम उम्र में यानी महज 31 वर्ष की उम्र में साहित्य अकादमी पुरूस्कार भी मिला। &lsquo;लूणा&rsquo; को पंजाबी साहित्य में &lsquo;मास्टरपीस&rsquo; का दर्ज़ा प्राप्त है और साहित्य जगत में इसकी आभा बरक़रार है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कहा जाता था कि कविता हिंदी में है और शायरी उर्दू में। पर शिव ने जब पंजाबी में अपनी जादूगरी दिखाई तो उस दौर के तमाम हिंदी और उर्दू के बड़े बड़े शायर कवि हैरान रह गए।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">बटालवी की नज्मों को सबसे पहले नुसरत फतेह अली खान ने अपनी आवाज दी थी। उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान ने उनकी कविता &#39;मायें नी मायें मेरे गीतां दे नैणां विच&#39; को गाया था ।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जगजीत सिंह ने उनका एक गीत &#39;मैंनू तेरा शबाब ले बैठा&#39; गाया तो दुनिया को पता चला की शब्दों की जादूगरी क्या होती है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><em><span style="font-size:18px;">मैंनू तेरा शबाब ले बैठा,<br />
रंग गोरा गुलाब ले बैठा।<br />
&nbsp;<br />
किन्नी-बीती ते किन्नी बाकी है,<br />
मैंनू एहो हिसाब ले बैठा।</span></em></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><span style="color:#000080;"><em>मैंनू जद वी तूसी तो याद आये,<br />
दिन दिहाड़े शराब ले बैठा।</em></span></span><br />
&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><em><span style="font-size:18px;">चन्गा हुन्दा सवाल ना करदा,<br />
मैंनू तेरा जवाब ले बैठा।</span></em></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नुसरत साहब और जगजीत सिंह - चित्रा सिंह के अलावा रबी शेरगिल, हंस राज हंस, दीदार सिंह परदेसी सहित एक से बढ़कर एक नायाब&nbsp; गायकों ने बटालवी की कविताएं गाई।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बटालवी आज भी हर दिल अजीज है।&nbsp;बटालवी और विरह जुदा नहीं।&nbsp;बटालवी तो आखिर बटालवी है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;</span><br />
&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall29779.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[shiv-kumar-batalvi]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/jaun-elia-famous-shyari]]></guid>
                       <title><![CDATA[जॉन एलिया: आज की पीढ़ी का पसंदीदा शायर, पेश है कुछ चुनिंदा शेर ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/jaun-elia-famous-shyari]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 07 Jun 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
पूरा नाम सय्यद हुसैन जॉन असग़र । जॉन का जन्म 14&nbsp; दिसंबर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ। शुरूआती तालीम अमरोहा में&nbsp; ही ली और उर्दू, फ़ारसी, और अर्बी सीखते - सीखते अल्हड़ उम्र में ही शायर हो गए।

मुल्क आज़ाद हुआ और आज़ादी अपने साथ बंटवारे बंटवारे का ज़लज़ला भी लाई। 1947 में तो सय्यद हुसैन जॉन असग़र ने हिंदुस्तान में&nbsp; रहना तय किया पर 1957 आते-आते समझौते के तौर पर&nbsp; पाकिस्तान चले गए और पूरी उम्र वहीँ गुजारी।&nbsp;

जॉन एलिया के शेर आज की युवा पीढ़ी के सिर चढ़कर बोलते है। इनके श्यारी में दर्द भी है, व्यंग भी और दार्शनिकता भी। भाषा इतनी सरल कि हर आम और ख़ास के समझ आ जाएँ। पेश है जॉन एलिया के कुछ चुनिंदा शेर।&nbsp; &nbsp;


&nbsp;

जो गुज़ारी न जा सकी हम से&nbsp;
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है&nbsp;


मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस&nbsp;
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;

ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता&nbsp;

एक ही शख़्स था जहान में क्या&nbsp;


ज़िंदगी किस तरह बसर होगी&nbsp;
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में&nbsp;


बहुत नज़दीक आती जा रही हो&nbsp;
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं&nbsp;
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं&nbsp;


&nbsp;कौन इस घर की देख-भाल करे&nbsp;
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है&nbsp;


क्या सितम है कि अब तिरी सूरत&nbsp;
ग़ौर करने पे याद आती है&nbsp;


&nbsp;किस लिए देखती हो आईना&nbsp;
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई&nbsp;
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया&nbsp;


मुस्तक़िल बोलता ही रहता हूँ&nbsp;
कितना ख़ामोश हूँ मैं अंदर से&nbsp;


&nbsp;इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ&nbsp;
वगरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैं ने&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
मुझे अब तुम से डर लगने लगा है&nbsp;
तुम्हें मुझ से मोहब्बत हो गई क्या&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
उस गली ने ये सुन के सब्र किया&nbsp;
जाने वाले यहाँ के थे ही नहीं&nbsp;


हम को यारों ने याद भी न रखा&nbsp;
&#39;जौन&#39; यारों के यार थे हम तो&nbsp;


कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल-जू हूँ मैं&nbsp;
क्या सितम है कि हम लोग मर जाएँगे&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
क्या कहा इश्क़ जावेदानी है!&nbsp;
आख़िरी बार मिल रही हो क्या&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
और तो क्या था बेचने के लिए&nbsp;
अपनी आँखों के ख़्वाब बेचे हैं&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो&nbsp;
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर&nbsp;
अब किसे रात भर जगाती है&nbsp;

&nbsp;

दिल की तकलीफ़ कम नहीं करते&nbsp;
अब कोई शिकवा हम नहीं करते&nbsp;


&nbsp;मेरी बाँहों में बहकने की सज़ा भी सुन ले&nbsp;
अब बहुत देर में आज़ाद करूँगा तुझ को&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का&nbsp;
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे&nbsp;


ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को&nbsp;
अपने अंदाज़ से गँवाने का&nbsp;


बिन तुम्हारे कभी नहीं आई&nbsp;
क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है&nbsp;


मैं रहा उम्र भर जुदा ख़ुद से&nbsp;
याद मैं ख़ुद को उम्र भर आया&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
अब मिरी कोई ज़िंदगी ही नहीं&nbsp;
अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
याद उसे इंतिहाई करते हैं&nbsp;
सो हम उस की बुराई करते हैं&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
अब नहीं कोई बात ख़तरे की&nbsp;
अब सभी को सभी से ख़तरा है&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे&nbsp;
जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम&nbsp;
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
यूँ जो तकता है आसमान को तू&nbsp;
कोई रहता है आसमान में क्या&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
जान-लेवा थीं ख़्वाहिशें वर्ना&nbsp;
वस्ल से इंतिज़ार अच्छा था&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
अब तो हर बात याद रहती है&nbsp;
ग़ालिबन मैं किसी को भूल गया&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
ऐ शख़्स मैं तेरी जुस्तुजू से&nbsp;
बे-ज़ार नहीं हूँ थक गया हूँ&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
इक अजब हाल है कि अब उस को&nbsp;
याद करना भी बेवफ़ाई है&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
मुझ को आदत है रूठ जाने की&nbsp;
आप मुझ को मना लिया कीजे&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में&nbsp;
जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
काम की बात मैं ने की ही नहीं&nbsp;
ये मिरा तौर-ए-ज़िंदगी ही नहीं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था&nbsp;
आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
अपना रिश्ता ज़मीं से ही रक्खो&nbsp;
कुछ नहीं आसमान में रक्खा&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
&nbsp;अपने सब यार काम कर रहे हैं&nbsp;
और हम हैं कि नाम कर रहे हैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
&nbsp;कोई मुझ तक पहुँच नहीं पाता&nbsp;
इतना आसान है पता मेरा&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
मैं जो हूँ &#39;जौन-एलिया&#39; हूँ जनाब&nbsp;
इस का बेहद लिहाज़ कीजिएगा&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
एक ही तो हवस रही है हमें&nbsp;
अपनी हालत तबाह की जाए&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
&nbsp;हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ&nbsp;
आख़िर मिरे मिज़ाज में क्यूँ दख़्ल दे कोई&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
आज मुझ को बहुत बुरा कह कर&nbsp;
आप ने नाम तो लिया मेरा&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;

नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी&nbsp;
तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँ करें हम&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
जुर्म में हम कमी करें भी तो क्यूँ&nbsp;
तुम सज़ा भी तो कम नहीं करते&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
तुम्हारी याद में जीने की आरज़ू है अभी&nbsp;
कुछ अपना हाल सँभालूँ अगर इजाज़त हो&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
अब जो रिश्तों में बँधा हूँ तो खुला है मुझ पर&nbsp;
कब परिंद उड़ नहीं पाते हैं परों के होते&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
गँवाई किस की तमन्ना में ज़िंदगी मैं ने&nbsp;
वो कौन है जिसे देखा नहीं कभी मैं ने&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
शौक़ है इस दिल-ए-दरिंदा को&nbsp;
आप के होंट काट खाने का&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
&nbsp;शब जो हम से हुआ मुआफ़ करो&nbsp;
नहीं पी थी बहक गए होंगे&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
&nbsp;जाते जाते आप इतना काम तो कीजे मिरा&nbsp;
याद का सारा सर-ओ-सामाँ जलाते जाइए&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
ज़िंदगी क्या है इक कहानी है&nbsp;
ये कहानी नहीं सुनानी है&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
&nbsp;हर शख़्स से बे-नियाज़ हो जा&nbsp;
फिर सब से ये कह कि मैं ख़ुदा हूँ&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
ये बहुत ग़म की बात हो शायद&nbsp;
अब तो ग़म भी गँवा चुका हूँ मैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
&nbsp;अपने सर इक बला तो लेनी थी&nbsp;
मैं ने वो ज़ुल्फ़ अपने सर ली है&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
एक ही हादसा तो है और वो ये कि आज तक&nbsp;
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
&nbsp;इतना ख़ाली था अंदरूँ मेरा&nbsp;
कुछ दिनों तो ख़ुदा रहा मुझ में&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
&nbsp;रोया हूँ तो अपने दोस्तों में&nbsp;
पर तुझ से तो हँस के ही मिला हूँ&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
मेरी हर बात बे-असर ही रही&nbsp;
नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
हैं दलीलें तिरे ख़िलाफ़ मगर&nbsp;
सोचता हूँ तिरी हिमायत में&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
आज बहुत दिन ब&#39;अद मैं अपने कमरे तक आ निकला था&nbsp;
जूँ ही दरवाज़ा खोला है उस की ख़ुश्बू आई है&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
उस के होंटों पे रख के होंट अपने&nbsp;
बात ही हम तमाम कर रहे हैं&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
हम कहाँ और तुम कहाँ जानाँ&nbsp;
हैं कई हिज्र दरमियाँ जानाँ&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
हमारी ही तमन्ना क्यूँ करो तुम&nbsp;
तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँ करें हम&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
&nbsp;जानिए उस से निभेगी किस तरह&nbsp;
वो ख़ुदा है मैं तो बंदा भी नहीं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
मुझ से अब लोग कम ही मिलते हैं&nbsp;
यूँ भी मैं हट गया हूँ मंज़र से&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
अब तो उस के बारे में तुम जो चाहो वो कह डालो&nbsp;
वो अंगड़ाई मेरे कमरे तक तो बड़ी रूहानी थी&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
मिल रही हो बड़े तपाक के साथ&nbsp;
मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
&nbsp;बोलते क्यूँ नहीं मिरे हक़ में&nbsp;
आबले पड़ गए ज़बान में क्या&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
मुझ को ख़्वाहिश ही ढूँडने की न थी&nbsp;
मुझ में खोया रहा ख़ुदा मेरा&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं&nbsp;
वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ करें हम&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
तेग़-बाज़ी का शौक़ अपनी जगह&nbsp;
आप तो क़त्ल-ए-आम कर रहे हैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
&nbsp;ख़र्च चलेगा अब मिरा किस के हिसाब में भला&nbsp;
सब के लिए बहुत हूँ मैं अपने लिए ज़रा नहीं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
तो क्या सच-मुच जुदाई मुझ से कर ली&nbsp;
तो ख़ुद अपने को आधा कर लिया क्या&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी&nbsp;
कोई हंगामा बरपा क्यूँ करें हम&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
क्या है जो बदल गई है दुनिया&nbsp;
मैं भी तो बहुत बदल गया हूँ&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
ये वार कर गया है पहलू से कौन मुझ पर&nbsp;
था मैं ही दाएँ बाएँ और मैं ही दरमियाँ था&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
सब मेरे बग़ैर मुतमइन हैं&nbsp;
मैं सब के बग़ैर जी रहा हूँ&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना पुराने हो गए हैं&nbsp;
कि उस गली में गए अब ज़माने हो गए हैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
अब तुम कभी न आओगे यानी कभी कभी&nbsp;
रुख़्सत करो मुझे कोई वादा किए बग़ैर&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
&nbsp;हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद&nbsp;
देखने वाले हाथ मलते हैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
आख़िरी बात तुम से कहना है&nbsp;
याद रखना न तुम कहा मेरा&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
आईनों को ज़ंग लगा&nbsp;
अब मैं कैसा लगता हूँ&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
कल का दिन हाए कल का दिन ऐ &#39;जौन&#39;&nbsp;
काश इस रात हम भी मर जाएँ&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं&nbsp;
शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
चाँद ने तान ली है चादर-ए-अब्र&nbsp;
अब वो कपड़े बदल रही होगी&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
जिस्म में आग लगा दूँ उस के&nbsp;
और फिर ख़ुद ही बुझा दूँ उस को&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
कौन से शौक़ किस हवस का नहीं&nbsp;
दिल मिरी जान तेरे बस का नहीं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
क्या पूछते हो नाम-ओ-निशान-ए-मुसाफ़िराँ&nbsp;
हिन्दोस्ताँ में आए हैं हिन्दोस्तान के थे&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
ख़ूब है शौक़ का ये पहलू भी&nbsp;
मैं भी बर्बाद हो गया तू भी&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
हासिल-ए-कुन है ये जहान-ए-ख़राब&nbsp;
यही मुमकिन था इतनी उजलत में&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
और क्या चाहती है गर्दिश-ए-अय्याम कि हम&nbsp;
अपना घर भूल गए उन की गली भूल गए&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
सब से पुर-अम्न वाक़िआ ये है&nbsp;
आदमी आदमी को भूल गया&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत&nbsp;
अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ करें हम&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
है वो बेचारगी का हाल कि हम&nbsp;
हर किसी को सलाम कर रहे हैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
मैं जुर्म का ए&#39;तिराफ़ कर के&nbsp;
कुछ और है जो छुपा गया हूँ&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
पड़ी रहने दो इंसानों की लाशें&nbsp;
ज़मीं का बोझ हल्का क्यूँ करें हम&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
मुझे अब होश आता जा रहा है&nbsp;
ख़ुदा तेरी ख़ुदाई जा रही है&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
मिल कर तपाक से न हमें कीजिए उदास&nbsp;
ख़ातिर न कीजिए कभी हम भी यहाँ के थे&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
दाद-ओ-तहसीन का ये शोर है क्यूँ&nbsp;
हम तो ख़ुद से कलाम कर रहे हैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
भूल जाना नहीं गुनाह उसे&nbsp;
याद करना उसे सवाब नहीं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
हम जो अब आदमी हैं पहले कभी&nbsp;
जाम होंगे छलक गए होंगे&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
तिरी क़ीमत घटाई जा रही है&nbsp;
मुझे फ़ुर्क़त सिखाई जा रही है&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
अपने अंदर हँसता हूँ मैं और बहुत शरमाता हूँ&nbsp;
ख़ून भी थूका सच-मुच थूका और ये सब चालाकी थी&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं&nbsp;
यही होता है ख़ानदान में क्या&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
उस से हर-दम मोआ&#39;मला है मगर&nbsp;
दरमियाँ कोई सिलसिला ही नहीं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
फुलाँ से थी ग़ज़ल बेहतर फुलाँ की&nbsp;
फुलाँ के ज़ख़्म अच्छे थे फुलाँ से&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
उस ने गोया मुझी को याद रखा&nbsp;
मैं भी गोया उसी को भूल गया&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
सारी गली सुनसान पड़ी थी बाद-ए-फ़ना के पहरे में&nbsp;
हिज्र के दालान और आँगन में बस इक साया ज़िंदा था&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
गो अपने हज़ार नाम रख लूँ&nbsp;
पर अपने सिवा मैं और क्या हूँ&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
हो कभी तो शराब-ए-वस्ल नसीब&nbsp;
पिए जाऊँ मैं ख़ून ही कब तक&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
मैं बिस्तर-ए-ख़याल पे लेटा हूँ उस के पास&nbsp;
सुब्ह-ए-अज़ल से कोई तक़ाज़ा किए बग़ैर&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
जम्अ&#39; हम ने किया है ग़म दिल में&nbsp;
इस का अब सूद खाए जाएँगे&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
हम ने क्यूँ ख़ुद पे ए&#39;तिबार किया&nbsp;
सख़्त बे-ए&#39;तिबार थे हम तो&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
इक अजब आमद-ओ-शुद है कि न माज़ी है न हाल&nbsp;
&#39;जौन&#39; बरपा कई नस्लों का सफ़र है मुझ में&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
जान-ए-मन तेरी बे-नक़ाबी ने&nbsp;
आज कितने नक़ाब बेचे हैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
हम हैं मसरूफ़-ए-इंतिज़ाम मगर&nbsp;
जाने क्या इंतिज़ाम कर रहे हैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
&nbsp;ख़ुदा से ले लिया जन्नत का व&#39;अदे&nbsp;
ये ज़ाहिद तो बड़े ही घाग निकले&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
&nbsp;अब नहीं मिलेंगे हम कूचा-ए-तमन्ना में&nbsp;
कूचा-ए-तमन्ना में अब नहीं मिलेंगे हम&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
हमें शिकवा नहीं इक दूसरे से&nbsp;
मनाना चाहिए इस पर ख़ुशी क्या&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
अपने सभी गिले बजा पर है यही कि दिलरुबा&nbsp;
मेरा तिरा मोआ&#39;मला इश्क़ के बस का था नहीं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
याद आते हैं मोजज़े अपने&nbsp;
और उस के बदन का जादू भी&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
अब ख़ाक उड़ रही है यहाँ इंतिज़ार की&nbsp;
ऐ दिल ये बाम-ओ-दर किसी जान-ए-जहाँ के थे&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
&nbsp;हम यहाँ ख़ुद आए हैं लाया नहीं कोई हमें&nbsp;
और ख़ुदा का हम ने अपने नाम पर रक्खा है नाम&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
घर से हम घर तलक गए होंगे&nbsp;
अपने ही आप तक गए होंगे&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
शाम हुई है यार आए हैं यारों के हमराह चलें&nbsp;
आज वहाँ क़व्वाली होगी &#39;जौन&#39; चलो दरगाह चलें&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
हमला है चार सू दर-ओ-दीवार-ए-शहर का&nbsp;
सब जंगलों को शहर के अंदर समेट लो&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
&nbsp;नई ख़्वाहिश रचाई जा रही है&nbsp;
तिरी फ़ुर्क़त मनाई जा रही है&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
&nbsp;मैं सहूँ कर्ब-ए-ज़िंदगी कब तक&nbsp;
रहे आख़िर तिरी कमी कब तक&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
&nbsp;फिर उस गली से अपना गुज़र चाहता है दिल&nbsp;
अब उस गली को कौन सी बस्ती से लाऊँ मैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
मुझ को ये होश ही न था तू मिरे बाज़ुओं में है&nbsp;
यानी तुझे अभी तलक मैं ने रिहा नहीं किया&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
अब कि जब जानाना तुम को है सभी पर ए&#39;तिबार&nbsp;
अब तुम्हें जानाना मुझ पर ए&#39;तिबार आया तो क्या&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
&#39;जौन&#39; दुनिया की चाकरी कर के&nbsp;
तू ने दिल की वो नौकरी क्या की&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
हम को हरगिज़ नहीं ख़ुदा मंज़ूर&nbsp;
या&#39;नी हम बे-तरह ख़ुदा के हैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
हम अजब हैं कि उस की बाहोँ में&nbsp;
शिकवा-ए-नारसाई करते हैं&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
मैं इस दीवार पर चढ़ तो गया था&nbsp;
उतारे कौन अब दीवार पर से&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;

मैं कहूँ किस तरह ये बात उस से&nbsp;
तुझ को जानम मुझी से ख़तरा है&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
इन लबों का लहू न पी जाऊँ&nbsp;
अपनी तिश्ना-लबी से ख़तरा है&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
हुस्न कहता था छेड़ने वाले&nbsp;
छेड़ना ही तो बस नहीं छू भी&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
एक क़त्ताला चाहिए हम को&nbsp;
हम ये एलान-ए-आम कर रहे हैं&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
किया था अहद जब लम्हों में हम ने&nbsp;
तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँ करें हम&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
हाए वो उस का मौज-ख़ेज़ बदन&nbsp;
मैं तो प्यासा रहा लब-ए-जू भी&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
शायद वो दिन पहला दिन था पलकें बोझल होने का&nbsp;
मुझ को देखते ही जब उस की अंगड़ाई शर्माई है&nbsp;


&nbsp;&nbsp;
न रखा हम ने बेश-ओ-कम का ख़याल&nbsp;
शौक़ को बे-हिसाब ही लिक्खा&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;

शीशे के इस तरफ़ से मैं सब को तक रहा हूँ&nbsp;
मरने की भी किसी को फ़ुर्सत नहीं है मुझ में&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;&nbsp;
&nbsp;ज़माना था वो दिल की ज़िंदगी का&nbsp;
तिरी फ़ुर्क़त के दिन लाऊँ कहाँ से&nbsp;

&nbsp;&nbsp;
&nbsp;
&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><span style="font-size: 18px;">पूरा नाम सय्यद हुसैन जॉन असग़र । जॉन का जन्म 14&nbsp; दिसंबर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ। शुरूआती तालीम अमरोहा में&nbsp; ही ली और उर्दू, फ़ारसी, और अर्बी सीखते - सीखते अल्हड़ उम्र में ही शायर हो गए।</span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><span style="font-size: 18px;">मुल्क आज़ाद हुआ और आज़ादी अपने साथ बंटवारे बंटवारे का ज़लज़ला भी लाई। 1947 में तो सय्यद हुसैन जॉन असग़र ने हिंदुस्तान में&nbsp; रहना तय किया पर 1957 आते-आते समझौते के तौर पर&nbsp; पाकिस्तान चले गए और पूरी उम्र वहीँ गुजारी।&nbsp;</span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><span style="font-size:18px;">जॉन एलिया के शेर आज की युवा पीढ़ी के सिर चढ़कर बोलते है। इनके श्यारी में दर्द भी है, व्यंग भी और दार्शनिकता भी। भाषा इतनी सरल कि हर आम और ख़ास के समझ आ जाएँ। पेश है जॉन एलिया के कुछ चुनिंदा शेर।&nbsp; &nbsp;</span></span></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जो गुज़ारी न जा सकी हम से&nbsp;<br />
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस&nbsp;<br />
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">एक ही शख़्स था जहान में क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">ज़िंदगी किस तरह बसर होगी&nbsp;<br />
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">बहुत नज़दीक आती जा रही हो&nbsp;<br />
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं&nbsp;<br />
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;कौन इस घर की देख-भाल करे&nbsp;<br />
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">क्या सितम है कि अब तिरी सूरत&nbsp;<br />
ग़ौर करने पे याद आती है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;किस लिए देखती हो आईना&nbsp;<br />
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई&nbsp;<br />
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">मुस्तक़िल बोलता ही रहता हूँ&nbsp;<br />
कितना ख़ामोश हूँ मैं अंदर से&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ&nbsp;<br />
वगरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैं ने&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
मुझे अब तुम से डर लगने लगा है&nbsp;<br />
तुम्हें मुझ से मोहब्बत हो गई क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
उस गली ने ये सुन के सब्र किया&nbsp;<br />
जाने वाले यहाँ के थे ही नहीं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">हम को यारों ने याद भी न रखा&nbsp;<br />
&#39;जौन&#39; यारों के यार थे हम तो&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल-जू हूँ मैं&nbsp;<br />
क्या सितम है कि हम लोग मर जाएँगे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
क्या कहा इश्क़ जावेदानी है!&nbsp;<br />
आख़िरी बार मिल रही हो क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
और तो क्या था बेचने के लिए&nbsp;<br />
अपनी आँखों के ख़्वाब बेचे हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो&nbsp;<br />
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर&nbsp;<br />
अब किसे रात भर जगाती है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">दिल की तकलीफ़ कम नहीं करते&nbsp;<br />
अब कोई शिकवा हम नहीं करते&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;मेरी बाँहों में बहकने की सज़ा भी सुन ले&nbsp;<br />
अब बहुत देर में आज़ाद करूँगा तुझ को&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का&nbsp;<br />
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को&nbsp;<br />
अपने अंदाज़ से गँवाने का&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">बिन तुम्हारे कभी नहीं आई&nbsp;<br />
क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">मैं रहा उम्र भर जुदा ख़ुद से&nbsp;<br />
याद मैं ख़ुद को उम्र भर आया&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
अब मिरी कोई ज़िंदगी ही नहीं&nbsp;<br />
अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
याद उसे इंतिहाई करते हैं&nbsp;<br />
सो हम उस की बुराई करते हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
अब नहीं कोई बात ख़तरे की&nbsp;<br />
अब सभी को सभी से ख़तरा है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे&nbsp;<br />
जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम&nbsp;<br />
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
यूँ जो तकता है आसमान को तू&nbsp;<br />
कोई रहता है आसमान में क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
जान-लेवा थीं ख़्वाहिशें वर्ना&nbsp;<br />
वस्ल से इंतिज़ार अच्छा था&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
अब तो हर बात याद रहती है&nbsp;<br />
ग़ालिबन मैं किसी को भूल गया&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
ऐ शख़्स मैं तेरी जुस्तुजू से&nbsp;<br />
बे-ज़ार नहीं हूँ थक गया हूँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
इक अजब हाल है कि अब उस को&nbsp;<br />
याद करना भी बेवफ़ाई है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
मुझ को आदत है रूठ जाने की&nbsp;<br />
आप मुझ को मना लिया कीजे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में&nbsp;<br />
जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
काम की बात मैं ने की ही नहीं&nbsp;<br />
ये मिरा तौर-ए-ज़िंदगी ही नहीं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था&nbsp;<br />
आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
अपना रिश्ता ज़मीं से ही रक्खो&nbsp;<br />
कुछ नहीं आसमान में रक्खा&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
&nbsp;अपने सब यार काम कर रहे हैं&nbsp;<br />
और हम हैं कि नाम कर रहे हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;कोई मुझ तक पहुँच नहीं पाता&nbsp;<br />
इतना आसान है पता मेरा&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
मैं जो हूँ &#39;जौन-एलिया&#39; हूँ जनाब&nbsp;<br />
इस का बेहद लिहाज़ कीजिएगा&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
एक ही तो हवस रही है हमें&nbsp;<br />
अपनी हालत तबाह की जाए&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
&nbsp;हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ&nbsp;<br />
आख़िर मिरे मिज़ाज में क्यूँ दख़्ल दे कोई&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
आज मुझ को बहुत बुरा कह कर&nbsp;<br />
आप ने नाम तो लिया मेरा&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी&nbsp;<br />
तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँ करें हम&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
जुर्म में हम कमी करें भी तो क्यूँ&nbsp;<br />
तुम सज़ा भी तो कम नहीं करते&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
तुम्हारी याद में जीने की आरज़ू है अभी&nbsp;<br />
कुछ अपना हाल सँभालूँ अगर इजाज़त हो&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
अब जो रिश्तों में बँधा हूँ तो खुला है मुझ पर&nbsp;<br />
कब परिंद उड़ नहीं पाते हैं परों के होते&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
गँवाई किस की तमन्ना में ज़िंदगी मैं ने&nbsp;<br />
वो कौन है जिसे देखा नहीं कभी मैं ने&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
शौक़ है इस दिल-ए-दरिंदा को&nbsp;<br />
आप के होंट काट खाने का&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;शब जो हम से हुआ मुआफ़ करो&nbsp;<br />
नहीं पी थी बहक गए होंगे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;जाते जाते आप इतना काम तो कीजे मिरा&nbsp;<br />
याद का सारा सर-ओ-सामाँ जलाते जाइए&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
ज़िंदगी क्या है इक कहानी है&nbsp;<br />
ये कहानी नहीं सुनानी है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;हर शख़्स से बे-नियाज़ हो जा&nbsp;<br />
फिर सब से ये कह कि मैं ख़ुदा हूँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
ये बहुत ग़म की बात हो शायद&nbsp;<br />
अब तो ग़म भी गँवा चुका हूँ मैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
&nbsp;अपने सर इक बला तो लेनी थी&nbsp;<br />
मैं ने वो ज़ुल्फ़ अपने सर ली है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
एक ही हादसा तो है और वो ये कि आज तक&nbsp;<br />
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;इतना ख़ाली था अंदरूँ मेरा&nbsp;<br />
कुछ दिनों तो ख़ुदा रहा मुझ में&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;रोया हूँ तो अपने दोस्तों में&nbsp;<br />
पर तुझ से तो हँस के ही मिला हूँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
मेरी हर बात बे-असर ही रही&nbsp;<br />
नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
हैं दलीलें तिरे ख़िलाफ़ मगर&nbsp;<br />
सोचता हूँ तिरी हिमायत में&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
आज बहुत दिन ब&#39;अद मैं अपने कमरे तक आ निकला था&nbsp;<br />
जूँ ही दरवाज़ा खोला है उस की ख़ुश्बू आई है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
उस के होंटों पे रख के होंट अपने&nbsp;<br />
बात ही हम तमाम कर रहे हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
हम कहाँ और तुम कहाँ जानाँ&nbsp;<br />
हैं कई हिज्र दरमियाँ जानाँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
हमारी ही तमन्ना क्यूँ करो तुम&nbsp;<br />
तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँ करें हम&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;जानिए उस से निभेगी किस तरह&nbsp;<br />
वो ख़ुदा है मैं तो बंदा भी नहीं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
मुझ से अब लोग कम ही मिलते हैं&nbsp;<br />
यूँ भी मैं हट गया हूँ मंज़र से&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
अब तो उस के बारे में तुम जो चाहो वो कह डालो&nbsp;<br />
वो अंगड़ाई मेरे कमरे तक तो बड़ी रूहानी थी&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
मिल रही हो बड़े तपाक के साथ&nbsp;<br />
मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;बोलते क्यूँ नहीं मिरे हक़ में&nbsp;<br />
आबले पड़ गए ज़बान में क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
मुझ को ख़्वाहिश ही ढूँडने की न थी&nbsp;<br />
मुझ में खोया रहा ख़ुदा मेरा&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं&nbsp;<br />
वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ करें हम&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
तेग़-बाज़ी का शौक़ अपनी जगह&nbsp;<br />
आप तो क़त्ल-ए-आम कर रहे हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;ख़र्च चलेगा अब मिरा किस के हिसाब में भला&nbsp;<br />
सब के लिए बहुत हूँ मैं अपने लिए ज़रा नहीं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
तो क्या सच-मुच जुदाई मुझ से कर ली&nbsp;<br />
तो ख़ुद अपने को आधा कर लिया क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी&nbsp;<br />
कोई हंगामा बरपा क्यूँ करें हम&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
क्या है जो बदल गई है दुनिया&nbsp;<br />
मैं भी तो बहुत बदल गया हूँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
ये वार कर गया है पहलू से कौन मुझ पर&nbsp;<br />
था मैं ही दाएँ बाएँ और मैं ही दरमियाँ था&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
सब मेरे बग़ैर मुतमइन हैं&nbsp;<br />
मैं सब के बग़ैर जी रहा हूँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना पुराने हो गए हैं&nbsp;<br />
कि उस गली में गए अब ज़माने हो गए हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
अब तुम कभी न आओगे यानी कभी कभी&nbsp;<br />
रुख़्सत करो मुझे कोई वादा किए बग़ैर&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद&nbsp;<br />
देखने वाले हाथ मलते हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
आख़िरी बात तुम से कहना है&nbsp;<br />
याद रखना न तुम कहा मेरा&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
आईनों को ज़ंग लगा&nbsp;<br />
अब मैं कैसा लगता हूँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
कल का दिन हाए कल का दिन ऐ &#39;जौन&#39;&nbsp;<br />
काश इस रात हम भी मर जाएँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं&nbsp;<br />
शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
चाँद ने तान ली है चादर-ए-अब्र&nbsp;<br />
अब वो कपड़े बदल रही होगी&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
जिस्म में आग लगा दूँ उस के&nbsp;<br />
और फिर ख़ुद ही बुझा दूँ उस को&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
कौन से शौक़ किस हवस का नहीं&nbsp;<br />
दिल मिरी जान तेरे बस का नहीं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
क्या पूछते हो नाम-ओ-निशान-ए-मुसाफ़िराँ&nbsp;<br />
हिन्दोस्ताँ में आए हैं हिन्दोस्तान के थे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
ख़ूब है शौक़ का ये पहलू भी&nbsp;<br />
मैं भी बर्बाद हो गया तू भी&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
हासिल-ए-कुन है ये जहान-ए-ख़राब&nbsp;<br />
यही मुमकिन था इतनी उजलत में&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
और क्या चाहती है गर्दिश-ए-अय्याम कि हम&nbsp;<br />
अपना घर भूल गए उन की गली भूल गए&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
सब से पुर-अम्न वाक़िआ ये है&nbsp;<br />
आदमी आदमी को भूल गया&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत&nbsp;<br />
अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ करें हम&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
है वो बेचारगी का हाल कि हम&nbsp;<br />
हर किसी को सलाम कर रहे हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
मैं जुर्म का ए&#39;तिराफ़ कर के&nbsp;<br />
कुछ और है जो छुपा गया हूँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
पड़ी रहने दो इंसानों की लाशें&nbsp;<br />
ज़मीं का बोझ हल्का क्यूँ करें हम&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
मुझे अब होश आता जा रहा है&nbsp;<br />
ख़ुदा तेरी ख़ुदाई जा रही है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
मिल कर तपाक से न हमें कीजिए उदास&nbsp;<br />
ख़ातिर न कीजिए कभी हम भी यहाँ के थे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
दाद-ओ-तहसीन का ये शोर है क्यूँ&nbsp;<br />
हम तो ख़ुद से कलाम कर रहे हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
भूल जाना नहीं गुनाह उसे&nbsp;<br />
याद करना उसे सवाब नहीं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
हम जो अब आदमी हैं पहले कभी&nbsp;<br />
जाम होंगे छलक गए होंगे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
तिरी क़ीमत घटाई जा रही है&nbsp;<br />
मुझे फ़ुर्क़त सिखाई जा रही है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
अपने अंदर हँसता हूँ मैं और बहुत शरमाता हूँ&nbsp;<br />
ख़ून भी थूका सच-मुच थूका और ये सब चालाकी थी&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं&nbsp;<br />
यही होता है ख़ानदान में क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
उस से हर-दम मोआ&#39;मला है मगर&nbsp;<br />
दरमियाँ कोई सिलसिला ही नहीं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
फुलाँ से थी ग़ज़ल बेहतर फुलाँ की&nbsp;<br />
फुलाँ के ज़ख़्म अच्छे थे फुलाँ से&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
उस ने गोया मुझी को याद रखा&nbsp;<br />
मैं भी गोया उसी को भूल गया&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
सारी गली सुनसान पड़ी थी बाद-ए-फ़ना के पहरे में&nbsp;<br />
हिज्र के दालान और आँगन में बस इक साया ज़िंदा था&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
गो अपने हज़ार नाम रख लूँ&nbsp;<br />
पर अपने सिवा मैं और क्या हूँ&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
हो कभी तो शराब-ए-वस्ल नसीब&nbsp;<br />
पिए जाऊँ मैं ख़ून ही कब तक&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
मैं बिस्तर-ए-ख़याल पे लेटा हूँ उस के पास&nbsp;<br />
सुब्ह-ए-अज़ल से कोई तक़ाज़ा किए बग़ैर&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
जम्अ&#39; हम ने किया है ग़म दिल में&nbsp;<br />
इस का अब सूद खाए जाएँगे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
हम ने क्यूँ ख़ुद पे ए&#39;तिबार किया&nbsp;<br />
सख़्त बे-ए&#39;तिबार थे हम तो&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
इक अजब आमद-ओ-शुद है कि न माज़ी है न हाल&nbsp;<br />
&#39;जौन&#39; बरपा कई नस्लों का सफ़र है मुझ में&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
जान-ए-मन तेरी बे-नक़ाबी ने&nbsp;<br />
आज कितने नक़ाब बेचे हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
हम हैं मसरूफ़-ए-इंतिज़ाम मगर&nbsp;<br />
जाने क्या इंतिज़ाम कर रहे हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;ख़ुदा से ले लिया जन्नत का व&#39;अदे&nbsp;<br />
ये ज़ाहिद तो बड़े ही घाग निकले&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
&nbsp;अब नहीं मिलेंगे हम कूचा-ए-तमन्ना में&nbsp;<br />
कूचा-ए-तमन्ना में अब नहीं मिलेंगे हम&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
हमें शिकवा नहीं इक दूसरे से&nbsp;<br />
मनाना चाहिए इस पर ख़ुशी क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
अपने सभी गिले बजा पर है यही कि दिलरुबा&nbsp;<br />
मेरा तिरा मोआ&#39;मला इश्क़ के बस का था नहीं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
याद आते हैं मोजज़े अपने&nbsp;<br />
और उस के बदन का जादू भी&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
अब ख़ाक उड़ रही है यहाँ इंतिज़ार की&nbsp;<br />
ऐ दिल ये बाम-ओ-दर किसी जान-ए-जहाँ के थे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;हम यहाँ ख़ुद आए हैं लाया नहीं कोई हमें&nbsp;<br />
और ख़ुदा का हम ने अपने नाम पर रक्खा है नाम&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
घर से हम घर तलक गए होंगे&nbsp;<br />
अपने ही आप तक गए होंगे&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
शाम हुई है यार आए हैं यारों के हमराह चलें&nbsp;<br />
आज वहाँ क़व्वाली होगी &#39;जौन&#39; चलो दरगाह चलें&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
हमला है चार सू दर-ओ-दीवार-ए-शहर का&nbsp;<br />
सब जंगलों को शहर के अंदर समेट लो&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;नई ख़्वाहिश रचाई जा रही है&nbsp;<br />
तिरी फ़ुर्क़त मनाई जा रही है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
&nbsp;मैं सहूँ कर्ब-ए-ज़िंदगी कब तक&nbsp;<br />
रहे आख़िर तिरी कमी कब तक&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
&nbsp;फिर उस गली से अपना गुज़र चाहता है दिल&nbsp;<br />
अब उस गली को कौन सी बस्ती से लाऊँ मैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
मुझ को ये होश ही न था तू मिरे बाज़ुओं में है&nbsp;<br />
यानी तुझे अभी तलक मैं ने रिहा नहीं किया&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
अब कि जब जानाना तुम को है सभी पर ए&#39;तिबार&nbsp;<br />
अब तुम्हें जानाना मुझ पर ए&#39;तिबार आया तो क्या&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
&#39;जौन&#39; दुनिया की चाकरी कर के&nbsp;<br />
तू ने दिल की वो नौकरी क्या की&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
हम को हरगिज़ नहीं ख़ुदा मंज़ूर&nbsp;<br />
या&#39;नी हम बे-तरह ख़ुदा के हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
हम अजब हैं कि उस की बाहोँ में&nbsp;<br />
शिकवा-ए-नारसाई करते हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
मैं इस दीवार पर चढ़ तो गया था&nbsp;<br />
उतारे कौन अब दीवार पर से&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मैं कहूँ किस तरह ये बात उस से&nbsp;<br />
तुझ को जानम मुझी से ख़तरा है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
इन लबों का लहू न पी जाऊँ&nbsp;<br />
अपनी तिश्ना-लबी से ख़तरा है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
हुस्न कहता था छेड़ने वाले&nbsp;<br />
छेड़ना ही तो बस नहीं छू भी&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
एक क़त्ताला चाहिए हम को&nbsp;<br />
हम ये एलान-ए-आम कर रहे हैं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
किया था अहद जब लम्हों में हम ने&nbsp;<br />
तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँ करें हम&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
हाए वो उस का मौज-ख़ेज़ बदन&nbsp;<br />
मैं तो प्यासा रहा लब-ए-जू भी&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
शायद वो दिन पहला दिन था पलकें बोझल होने का&nbsp;<br />
मुझ को देखते ही जब उस की अंगड़ाई शर्माई है&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
न रखा हम ने बेश-ओ-कम का ख़याल&nbsp;<br />
शौक़ को बे-हिसाब ही लिक्खा&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शीशे के इस तरफ़ से मैं सब को तक रहा हूँ&nbsp;<br />
मरने की भी किसी को फ़ुर्सत नहीं है मुझ में&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;ज़माना था वो दिल की ज़िंदगी का&nbsp;<br />
तिरी फ़ुर्क़त के दिन लाऊँ कहाँ से&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;</span><br />
&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[jaun-elia-famous-shyari]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/dr-rahat-indori-sher]]></guid>
                       <title><![CDATA[राहत इंदौरी के 15 चुनिंदा शेर...]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/dr-rahat-indori-sher]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 07 Jun 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[राहत इंदौरी वो शायर थे जिनका अंदाज सबसे अलहदा था। अपने झूमते हुए अंदाज में इशारों इशारों में वार करना राहत इन्दोरी को बखूबी आता था। व्यवस्था को आइना दिखाते उनके शेर लाजवाब है। पेश उनके कहे कुछ चुनिंदा शेर....



ज़ुबाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे
मैं कितनी बार लूटा हूँ मुझे हिसाब तो दे।




लोग हर मोड़ पे रुक रुक के संभलते क्यूँ है
इतना डरते है तो घर से निकलते क्यूँ है।




शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे




आँखों में पानी रखो होठों पे चिंगारी रखो
जिंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो।




एक ही नदी के है यह दो किनारे दोस्तो
दोस्ताना ज़िन्दगी से, मौत से यारी रखो।




फूक़ डालूगा मैं किसी रोज़ दिल की दुनिया
ये तेरा ख़त तो नहीं है की जला भी न सकूं।




प्यास तो अपनी सात समन्दर जैसी थी,
ना हक हमने बारिश का अहसान लिया।


&nbsp;


मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को
समझ रही थी की ऐसे ही छोड़ दूंगा उसे।




नये किरदार आते जा रहे है
मगर नाटक पुराना चल रहा है।




उस की याद आई है, साँसों ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनो से भी इबादत में ख़लल पड़ता है।




मैं वो दरिया हूँ की हर बूंद भँवर है जिसकी,
तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके।




दो ग़ज सही ये मेरी मिल्कियत तो है
ऐ मौत तूने मुझे जमींदार कर दिया।




ना हम-सफ़र ना किसी हम-नशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा।




बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाय।




रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
चाँद पागल है अंन्धेरे में निकल पड़ता है।

]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">राहत इंदौरी वो शायर थे जिनका अंदाज सबसे अलहदा था। अपने झूमते हुए अंदाज में इशारों इशारों में वार करना राहत इन्दोरी को बखूबी आता था। व्यवस्था को आइना दिखाते उनके शेर लाजवाब है। पेश उनके कहे कुछ चुनिंदा शेर....</span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">ज़ुबाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे<br />
मैं कितनी बार लूटा हूँ मुझे हिसाब तो दे।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">लोग हर मोड़ पे रुक रुक के संभलते क्यूँ है<br />
इतना डरते है तो घर से निकलते क्यूँ है।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम<br />
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">आँखों में पानी रखो होठों पे चिंगारी रखो<br />
जिंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">एक ही नदी के है यह दो किनारे दोस्तो<br />
दोस्ताना ज़िन्दगी से, मौत से यारी रखो।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">फूक़ डालूगा मैं किसी रोज़ दिल की दुनिया<br />
ये तेरा ख़त तो नहीं है की जला भी न सकूं।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">प्यास तो अपनी सात समन्दर जैसी थी,<br />
ना हक हमने बारिश का अहसान लिया।</span></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को<br />
समझ रही थी की ऐसे ही छोड़ दूंगा उसे।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">नये किरदार आते जा रहे है<br />
मगर नाटक पुराना चल रहा है।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">उस की याद आई है, साँसों ज़रा आहिस्ता चलो<br />
धड़कनो से भी इबादत में ख़लल पड़ता है।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">मैं वो दरिया हूँ की हर बूंद भँवर है जिसकी,<br />
तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">दो ग़ज सही ये मेरी मिल्कियत तो है<br />
ऐ मौत तूने मुझे जमींदार कर दिया।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">ना हम-सफ़र ना किसी हम-नशीं से निकलेगा<br />
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने पर<br />
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाय।</span></p>
</blockquote>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है<br />
चाँद पागल है अंन्धेरे में निकल पड़ता है।</span></p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall29777.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[dr-rahat-indori-sher]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/suraykant-tripathi-nirala-best-poems]]></guid>
                       <title><![CDATA[महाकवि निराला की पांच अमर रचनाएँ ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/suraykant-tripathi-nirala-best-poems]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 07 Jun 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी &lsquo;निराला&rsquo; प्रबुद्ध छायावादी कवि थे। वे कविताओं के साथ-साथ निबंध, उपन्यास व कहानियाँ भी रचते थे। सूर्यकान्त त्रिपाठी &lsquo;निराला&rsquo; का जन्म 21 फरवरी 1896 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में हुआ था। पिता पंडित रामसहाय त्रिपाठी एक सरकारी नौकरी करते थे। सूर्यकान्त बहुत छोटे थे जब उनकी माता का देहांत हो गया था। माता के निधन उपरांत , निराला का प्रारंभिक जीवन कठिनाइयों में बीता।&nbsp;

दिलचस्प बात ये है कि हिंदी के महान कवी निराला को ज्यादा हिंदी नहीं आती थी।&nbsp; निराला का विवाह मनोहरी देवी के साथ हुआ और मनोहरी की प्रेरणा से ही&nbsp; 20 वर्ष की आयु में निराला ने हिन्दी सीखी।&nbsp;
निराला जब 22 वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का देहांत हो गया। एक पुत्री थी, वह भी विधवा हो गयी और कुछ समय बाद उसका भी देहांत हो गया।&nbsp; पत्नी व पुत्री की मृत्यु के बाद, निराला का जीवन नीरस था। उन्होंने लेखन में अपना मन लगाया और लेखन ही उनका परिवार बन गया।

&nbsp;

वर दे वीणावादिनी वर दे !

वर दे, वीणावादिनि वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; भारत में भर दे!

काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; जगमग जग कर दे!

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; नव पर, नव स्वर दे!

वर दे, वीणावादिनि वर दे।
&nbsp;

चुम्बन

लहर रही शशिकिरण चूम निर्मल यमुनाजल,
चूम सरित की सलिल राशि खिल रहे कुमुद दल

कुमुदों के स्मिति-मन्द खुले वे अधर चूम कर,
बही वायु स्वछन्द, सकल पथ घूम घूम कर

है चूम रही इस रात को वही तुम्हारे मधु अधर
जिनमें हैं भाव भरे हुए सकल-शोक-सन्तापहर!
&nbsp;

तुम हमारे हो

नहीं मालूम क्यों यहाँ आया
ठोकरें खाते हुए दिन बीते।
उठा तो पर न सँभलने पाया
गिरा व रह गया आँसू पीते।

ताब बेताब हुई हठ भी हटी
नाम अभिमान का भी छोड़ दिया।
देखा तो थी माया की डोर कटी
सुना वह कहते हैं, हाँ खूब किया।

पर अहो पास छोड़ आते ही
वह सब भूत फिर सवार हुए।
मुझे गफलत में ज़रा पाते ही
फिर वही पहले के से वार हुए।

एक भी हाथ सँभाला न गया
और कमज़ोरों का बस क्या है।
कहा - निर्दय, कहाँ है तेरी दया,
मुझे दुख देने में जस क्या है।

रात को सोते यह सपना देखा
कि वह कहते हैं &quot;तुम हमारे हो
भला अब तो मुझे अपना देखा,
कौन कहता है कि तुम हारे हो।

अब अगर कोई भी सताये तुम्हें
तो मेरी याद वहीं कर लेना
नज़र क्यों काल ही न आये तुम्हें
प्रेम के भाव तुरत भर लेना&quot;।


&nbsp;
भेद कुल खुल जाए

भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है ।
देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है ।।

हार होंगे हृदय के खुलकर तभी गाने नये,
हाथ में आ जायेगा, वह राज जो महफिल में है ।

तरस है ये देर से आँखे गड़ी श्रृंगार में,
और दिखलाई पड़ेगी जो गुराई तिल में है ।

पेड़ टूटेंगे, हिलेंगे, जोर से आँधी चली,
हाथ मत डालो, हटाओ पैर, बिच्छू बिल में है।

ताक पर है नमक मिर्च लोग बिगड़े या बनें,
सीख क्या होगी पराई जब पसाई सिल में है।


&nbsp;
गीत गाने दो मुझे

गीत गाने दो मुझे तो,
वेदना को रोकने को।

चोट खाकर राह चलते
होश के भी होश छूटे,
हाथ जो पाथेय थे, ठग-
ठाकुरों ने रात लूटे,
कंठ रूकता जा रहा है,
आ रहा है काल देखो।

भर गया है ज़हर से
संसार जैसे हार खाकर,
देखते हैं लोग लोगों को,
सही परिचय न पाकर,
बुझ गई है लौ पृथा की,
जल उठो फिर सींचने को।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी &lsquo;निराला&rsquo; प्रबुद्ध छायावादी कवि थे। वे कविताओं के साथ-साथ निबंध, उपन्यास व कहानियाँ भी रचते थे। सूर्यकान्त त्रिपाठी &lsquo;निराला&rsquo; का जन्म 21 फरवरी 1896 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में हुआ था। पिता पंडित रामसहाय त्रिपाठी एक सरकारी नौकरी करते थे। सूर्यकान्त बहुत छोटे थे जब उनकी माता का देहांत हो गया था। माता के निधन उपरांत , निराला का प्रारंभिक जीवन कठिनाइयों में बीता।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">दिलचस्प बात ये है कि हिंदी के महान कवी निराला को ज्यादा हिंदी नहीं आती थी।&nbsp; निराला का विवाह मनोहरी देवी के साथ हुआ और मनोहरी की प्रेरणा से ही&nbsp; 20 वर्ष की आयु में निराला ने हिन्दी सीखी।&nbsp;<br />
निराला जब 22 वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का देहांत हो गया। एक पुत्री थी, वह भी विधवा हो गयी और कुछ समय बाद उसका भी देहांत हो गया।&nbsp; पत्नी व पुत्री की मृत्यु के बाद, निराला का जीवन नीरस था। उन्होंने लेखन में अपना मन लगाया और लेखन ही उनका परिवार बन गया।</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:20px;">वर दे वीणावादिनी वर दे !</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">वर दे, वीणावादिनि वर दे!<br />
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; भारत में भर दे!</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">काट अंध-उर के बंधन-स्तर<br />
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;<br />
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; जगमग जग कर दे!</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नव गति, नव लय, ताल-छंद नव<br />
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;<br />
नव नभ के नव विहग-वृंद को<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; नव पर, नव स्वर दे!</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">वर दे, वीणावादिनि वर दे।</span><br />
&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:20px;">चुम्बन</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">लहर रही शशिकिरण चूम निर्मल यमुनाजल,<br />
चूम सरित की सलिल राशि खिल रहे कुमुद दल</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कुमुदों के स्मिति-मन्द खुले वे अधर चूम कर,<br />
बही वायु स्वछन्द, सकल पथ घूम घूम कर</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">है चूम रही इस रात को वही तुम्हारे मधु अधर<br />
जिनमें हैं भाव भरे हुए सकल-शोक-सन्तापहर!</span><br />
&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;"><span style="color:#000080;"><strong>तुम हमारे हो</strong></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नहीं मालूम क्यों यहाँ आया<br />
ठोकरें खाते हुए दिन बीते।<br />
उठा तो पर न सँभलने पाया<br />
गिरा व रह गया आँसू पीते।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ताब बेताब हुई हठ भी हटी<br />
नाम अभिमान का भी छोड़ दिया।<br />
देखा तो थी माया की डोर कटी<br />
सुना वह कहते हैं, हाँ खूब किया।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">पर अहो पास छोड़ आते ही<br />
वह सब भूत फिर सवार हुए।<br />
मुझे गफलत में ज़रा पाते ही<br />
फिर वही पहले के से वार हुए।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">एक भी हाथ सँभाला न गया<br />
और कमज़ोरों का बस क्या है।<br />
कहा - निर्दय, कहाँ है तेरी दया,<br />
मुझे दुख देने में जस क्या है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">रात को सोते यह सपना देखा<br />
कि वह कहते हैं &quot;तुम हमारे हो<br />
भला अब तो मुझे अपना देखा,<br />
कौन कहता है कि तुम हारे हो।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अब अगर कोई भी सताये तुम्हें<br />
तो मेरी याद वहीं कर लेना<br />
नज़र क्यों काल ही न आये तुम्हें<br />
प्रेम के भाव तुरत भर लेना&quot;।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;<br />
<span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:20px;">भेद कुल खुल जाए</span></strong></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है ।<br />
देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है ।।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हार होंगे हृदय के खुलकर तभी गाने नये,<br />
हाथ में आ जायेगा, वह राज जो महफिल में है ।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">तरस है ये देर से आँखे गड़ी श्रृंगार में,<br />
और दिखलाई पड़ेगी जो गुराई तिल में है ।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">पेड़ टूटेंगे, हिलेंगे, जोर से आँधी चली,<br />
हाथ मत डालो, हटाओ पैर, बिच्छू बिल में है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ताक पर है नमक मिर्च लोग बिगड़े या बनें,<br />
सीख क्या होगी पराई जब पसाई सिल में है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp;<br />
<span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:20px;">गीत गाने दो मुझे</span></strong></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">गीत गाने दो मुझे तो,<br />
वेदना को रोकने को।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">चोट खाकर राह चलते<br />
होश के भी होश छूटे,<br />
हाथ जो पाथेय थे, ठग-<br />
ठाकुरों ने रात लूटे,<br />
कंठ रूकता जा रहा है,<br />
आ रहा है काल देखो।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">भर गया है ज़हर से<br />
संसार जैसे हार खाकर,<br />
देखते हैं लोग लोगों को,<br />
सही परिचय न पाकर,<br />
बुझ गई है लौ पृथा की,<br />
जल उठो फिर सींचने को।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall29776.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[suraykant-tripathi-nirala-best-poems]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/mahadevi-verma-poems]]></guid>
                       <title><![CDATA[महादेवी वर्मा की पांच बेहतरीन रचनाएँ ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/mahadevi-verma-poems]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 07 Jun 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
महादेवी वर्मा छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्हें &#39;आधुनिक युग की मीरा&#39; भी कहा जाता है। महादेवी वर्मा को ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। पढ़ें महादेवी वर्मा की लिखी कुछ श्रेष्ठ रचनाएं।



मैं नीर भरी

&nbsp;

मैं नीर भरी दु:ख की बदली!&nbsp;

स्पंदन में चिर निस्पंद बसा;&nbsp;

क्रंदन में आहत विश्व हँसा,&nbsp;

नयनों में दीपक-से जलते&nbsp;

पलकों में निर्झरिणी मचली!&nbsp;

मेरा पग-पग संगीत-भरा,&nbsp;

श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,&nbsp;

नभ के नव रँग बुनते दुकूल,&nbsp;

छाया में मलय-बयार पली!&nbsp;

मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,&nbsp;

चिंता का भार, बनी अविरल,&nbsp;

रज-कण पर जल-कण हो बरसी&nbsp;

नवजीवन-अंकुर बन निकली!&nbsp;

पथ को न मलिन करता आना,&nbsp;

पद-चिह्न न दे जाता जाना,&nbsp;

सुधि मेरे आगम की जग में&nbsp;

सुख की सिहरन हो अंत खिली!&nbsp;

विस्तृत नभ का कोई कोना;&nbsp;

मेरा न कभी अपना होना,&nbsp;

परिचय इतना इतिहास यही&nbsp;

उमड़ी कल थी मिट आज चली!&nbsp;

मैं नीर भरी दु:ख की बदली!&nbsp;

स्रोत :
पुस्तक : संधिनी (पृष्ठ 93) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन संस्करण : 2012


झिलमिलाती रात

&nbsp;

झिलमिलाती रात मेरी!&nbsp;

साँझ के अंतिम सुनहले&nbsp;

हास-सी चुपचाप आकर,&nbsp;

मूक चितवन की विभा&mdash;&nbsp;

तेरी अचानक छू गई भर;&nbsp;

बन गई दीपावली तब आँसुओं की पाँत मेरी!&nbsp;

अश्रु घन के बन रहे स्मित&mdash;&nbsp;

सुप्त वसुधा के अधर पर&nbsp;

कंज में साकार होते&nbsp;

वीचियों के स्वप्न सुंदर,&nbsp;

मुस्कुरा दी दामिनी में साँवली बरसात मेरी!&nbsp;

क्यों इसे अंबर न निज&nbsp;

सूने हृदय में आज भर ले?&nbsp;

क्यों न यह जड़ में पुलक का,&nbsp;

प्राण का संचार कर ले?&nbsp;

है तुम्हारी श्वास के मधु-भार-मंथर वात मेरी!&nbsp;

स्रोत :
पुस्तक : आत्मिका (पृष्ठ 48) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : राजपाल प्रकाशन संस्करण : 2015

&nbsp;

क्यों अश्रु न हों शृंगार मुझे!

&nbsp;

क्यों अश्रु न हों शृंगार मुझे!&nbsp;

रंगों के बादल निस्तरंग,&nbsp;

रूपों के शत-शत वीचि-भंग,&nbsp;

किरणों की रेखाओं में भर,&nbsp;

अपने अनंत मानस पट पर,&nbsp;

तुम देते रहते हो प्रतिपल,&nbsp;

जाने कितने आकार मुझे!&nbsp;

हर छवि में कर साकार मुझे!&nbsp;

लघु हृदय तुम्हारा अमर छंद,&nbsp;

स्पंदन में स्वर-लहरी अमंद,&nbsp;

हर स्वप्न स्नेह का चिर निबंध,&nbsp;

हर पुलक तुम्हारा भाव-बंध,&nbsp;

निज साँस तुम्हारी रचना का&nbsp;

लगती अखंड विस्तार मुझे!&nbsp;

हर पल रस का संसार मुझे!&nbsp;

मेरी मृदु पलकें मूँद-मूँद,&nbsp;

छलका आँसू की बूँद-बूँद,&nbsp;

लघुतम कलियों में नाप प्राण,&nbsp;

सौरभ पर मेरे तोल गान,&nbsp;

बिन माँगे तुमने दे डाला,&nbsp;

करुणा का पारावार मुझे!&nbsp;

चिर सुख-दुख के दो पार मुझे!&nbsp;

मैं चली कथा का क्षण लेकर,&nbsp;

मैं मिली व्यथा का कण देकर,&nbsp;

इसको नभ ने अवकाश दिया,&nbsp;

भू ने इसको इतिहास किया,&nbsp;

अब अणु-अणु सौंपे देता है&nbsp;

युग-युग का संचित प्यार मुझे!&nbsp;

कहकर पाहुन सुकुमार मुझे!&nbsp;

रोके मुझको जीवन अधीर,&nbsp;

दृग-ओट न करती सजग पीर,&nbsp;

नूपुर से शत-शत मिलन-पाश,&nbsp;

मुखरित, चरणों के आस-पास,&nbsp;

हर पग पर स्वर्ग बसा देती&nbsp;

धरती की नव मनुहार मुझे!&nbsp;

लय में अविराम पुकार मुझे&nbsp;

क्यों अश्रु न हों शृंगार मुझे!&nbsp;

&nbsp;

स्रोत :
पुस्तक : संधिनी (पृष्ठ 128) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन संस्करण : २०१२

&nbsp;

फिर विकल हैं प्राण मेरे!&nbsp;


फिर विकल हैं प्राण मेरे!&nbsp;

तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस ओर क्या है!&nbsp;

जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या है?&nbsp;

क्यों मुझे प्राचीन बनकर&nbsp;

आज मेरे श्वास घेरे?&nbsp;

सिंधु की निःसीमता पर लघु लहर का लास कैसा?&nbsp;

दीप लघु शिर पर धरे आलोक का आकाश कैसा?&nbsp;

दे रही मेरी चिरंतनता&nbsp;

क्षणों के साथ फेरे!&nbsp;

बिंबग्राहकता कणों को शलभ को चिर साधना दी,&nbsp;

पुलक से नभ भर धरा को कल्पनामय वेदना दी;&nbsp;

मत कहो हे विश्व &#39;झूठे&nbsp;

हैं अतुल वरदान तेरे!&#39;&nbsp;

नभ डुबा पाया न अपनी बाढ़ में भी क्षुद्र तारे,&nbsp;

ढूँढ़ने करुणा मृदुल घन चीर कर तूफान हारे;&nbsp;

अंत के तम में बुझे क्यों&nbsp;

आदि के अरमान मेरे!&nbsp;

स्रोत :
पुस्तक : संधिनी (पृष्ठ 95) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन संस्करण : २०१२

&nbsp;

इन आँखों ने देखी न राह कहीं&nbsp;


इन आँखों ने देखी न राह कहीं&nbsp;

इन्हें धो गया नेह का नीर नहीं,&nbsp;

करती मिट जाने की साध कभी,&nbsp;

इन प्राणों को मूक अधीर नहीं,&nbsp;

अलि छोड़ो न जीवन की तरणी,&nbsp;

उस सागर में जहाँ तीर नहीं!&nbsp;

कभी देखा नहीं वह देश जहाँ,&nbsp;

प्रिय से कम मादक पीर नहीं!&nbsp;

जिसको मरुभूमि समुद्र हुआ&nbsp;

उस मेघव्रती की प्रतीति नहीं,&nbsp;

जो हुआ जल दीपकमय उससे&nbsp;

कभी पूछी निबाह की रीति नहीं,&nbsp;

मतवाले चकोर ने सीखी कभी;&nbsp;

उस प्रेम के राज्य की नीति नहीं,&nbsp;

तूं अकिंचन भिक्षुक है मधु का,&nbsp;

अलि तृप्ति कहाँ जब प्रीति नहीं!&nbsp;

पथ में नित स्वर्णपराग बिछा,&nbsp;

तुझे देख जो फूली समाती नहीं,&nbsp;

पलकों से दलों में घुला मकरंद,&nbsp;

पिलाती कभी अनखाती नहीं,&nbsp;

किरणों में गुँथी मुक्तावलियाँ,&nbsp;

पहनाती रही सकुचाती नहीं,&nbsp;

अब फूल गुलाब में पंकज की,&nbsp;

अलि कैसे तुझे सुधि आती नहीं!&nbsp;

करते करुणा-घन छाँह वहाँ,&nbsp;

झुलसाता निदाध-सा दाह नहीं&nbsp;

मिलती शुचि आँसुओं की सरिता,&nbsp;

मृगवारि का सिंधु अथाह नहीं,&nbsp;

हँसता अनुराग का इंदु सदा,&nbsp;

छलना की कुहू का निबाह नहीं,&nbsp;

फिरता अलि भूल कहाँ भटका,&nbsp;

यह प्रेम के देश की राह नहीं!&nbsp;

स्रोत :
पुस्तक : संधिनी (पृष्ठ 48) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन संस्करण : 2012
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p><span style="color:#000080;"><span style="font-size: 18px;">महादेवी वर्मा छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्हें &#39;आधुनिक युग की मीरा&#39; भी कहा जाता है। महादेवी वर्मा को ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। पढ़ें महादेवी वर्मा की लिखी कुछ श्रेष्ठ रचनाएं।</span></span></p>
</blockquote>

<p><br />
<span style="font-size:18px;"><strong><span style="color:#000080;"><span style="font-size:20px;">मैं नीर भरी</span></span></strong></span></p>

<p>&nbsp;</p>

<p><span style="font-size:18px;">मैं नीर भरी दु:ख की बदली!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">स्पंदन में चिर निस्पंद बसा;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">क्रंदन में आहत विश्व हँसा,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">नयनों में दीपक-से जलते&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">पलकों में निर्झरिणी मचली!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मेरा पग-पग संगीत-भरा,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">नभ के नव रँग बुनते दुकूल,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">छाया में मलय-बयार पली!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">चिंता का भार, बनी अविरल,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">रज-कण पर जल-कण हो बरसी&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">नवजीवन-अंकुर बन निकली!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">पथ को न मलिन करता आना,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">पद-चिह्न न दे जाता जाना,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">सुधि मेरे आगम की जग में&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">सुख की सिहरन हो अंत खिली!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">विस्तृत नभ का कोई कोना;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मेरा न कभी अपना होना,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">परिचय इतना इतिहास यही&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">उमड़ी कल थी मिट आज चली!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मैं नीर भरी दु:ख की बदली!&nbsp;</span></p>

<p><span style="color:#696969;"><span style="font-size:14px;">स्रोत :<br />
पुस्तक : संधिनी (पृष्ठ 93) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन संस्करण : 2012</span></span></p>

<p><br />
<span style="font-size:18px;"><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:20px;">झिलमिलाती रात</span></strong></span></span></p>

<p>&nbsp;</p>

<p><span style="font-size:18px;">झिलमिलाती रात मेरी!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">साँझ के अंतिम सुनहले&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">हास-सी चुपचाप आकर,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मूक चितवन की विभा&mdash;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">तेरी अचानक छू गई भर;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">बन गई दीपावली तब आँसुओं की पाँत मेरी!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">अश्रु घन के बन रहे स्मित&mdash;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">सुप्त वसुधा के अधर पर&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">कंज में साकार होते&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">वीचियों के स्वप्न सुंदर,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मुस्कुरा दी दामिनी में साँवली बरसात मेरी!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">क्यों इसे अंबर न निज&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">सूने हृदय में आज भर ले?&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">क्यों न यह जड़ में पुलक का,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">प्राण का संचार कर ले?&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">है तुम्हारी श्वास के मधु-भार-मंथर वात मेरी!&nbsp;</span></p>

<p><span style="color:#696969;"><span style="font-size:14px;">स्रोत :<br />
पुस्तक : आत्मिका (पृष्ठ 48) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : राजपाल प्रकाशन संस्करण : 2015</span></span></p>

<p>&nbsp;</p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:20px;"><span style="font-family: sans-serif, Arial, Verdana, &quot;Trebuchet MS&quot;; background-color: rgb(255, 255, 255);">क्यों अश्रु न हों शृंगार मुझे!</span></span></strong></span></p>

<p>&nbsp;</p>

<p><span style="font-size: 18px;">क्यों अश्रु न हों शृंगार मुझे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">रंगों के बादल निस्तरंग,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">रूपों के शत-शत वीचि-भंग,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">किरणों की रेखाओं में भर,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">अपने अनंत मानस पट पर,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">तुम देते रहते हो प्रतिपल,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">जाने कितने आकार मुझे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">हर छवि में कर साकार मुझे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">लघु हृदय तुम्हारा अमर छंद,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">स्पंदन में स्वर-लहरी अमंद,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">हर स्वप्न स्नेह का चिर निबंध,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">हर पुलक तुम्हारा भाव-बंध,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">निज साँस तुम्हारी रचना का&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">लगती अखंड विस्तार मुझे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">हर पल रस का संसार मुझे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मेरी मृदु पलकें मूँद-मूँद,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">छलका आँसू की बूँद-बूँद,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">लघुतम कलियों में नाप प्राण,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">सौरभ पर मेरे तोल गान,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">बिन माँगे तुमने दे डाला,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">करुणा का पारावार मुझे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">चिर सुख-दुख के दो पार मुझे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मैं चली कथा का क्षण लेकर,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मैं मिली व्यथा का कण देकर,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">इसको नभ ने अवकाश दिया,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">भू ने इसको इतिहास किया,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">अब अणु-अणु सौंपे देता है&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">युग-युग का संचित प्यार मुझे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">कहकर पाहुन सुकुमार मुझे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">रोके मुझको जीवन अधीर,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">दृग-ओट न करती सजग पीर,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">नूपुर से शत-शत मिलन-पाश,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मुखरित, चरणों के आस-पास,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">हर पग पर स्वर्ग बसा देती&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">धरती की नव मनुहार मुझे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">लय में अविराम पुकार मुझे&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">क्यों अश्रु न हों शृंगार मुझे!&nbsp;</span></p>

<p>&nbsp;</p>

<p><span style="color:#696969;"><span style="font-size:14px;">स्रोत :<br />
पुस्तक : संधिनी (पृष्ठ 128) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन संस्करण : २०१२</span></span></p>

<p>&nbsp;</p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:20px;"><span style="font-family: sans-serif, Arial, Verdana, &quot;Trebuchet MS&quot;; background-color: rgb(255, 255, 255);">फिर विकल हैं प्राण मेरे!&nbsp;</span></span></strong></span></p>

<p><br />
<span style="font-size:18px;">फिर विकल हैं प्राण मेरे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस ओर क्या है!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या है?&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">क्यों मुझे प्राचीन बनकर&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">आज मेरे श्वास घेरे?&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">सिंधु की निःसीमता पर लघु लहर का लास कैसा?&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">दीप लघु शिर पर धरे आलोक का आकाश कैसा?&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">दे रही मेरी चिरंतनता&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">क्षणों के साथ फेरे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">बिंबग्राहकता कणों को शलभ को चिर साधना दी,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">पुलक से नभ भर धरा को कल्पनामय वेदना दी;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मत कहो हे विश्व &#39;झूठे&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">हैं अतुल वरदान तेरे!&#39;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">नभ डुबा पाया न अपनी बाढ़ में भी क्षुद्र तारे,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">ढूँढ़ने करुणा मृदुल घन चीर कर तूफान हारे;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">अंत के तम में बुझे क्यों&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">आदि के अरमान मेरे!&nbsp;</span></p>

<p><span style="color:#696969;"><span style="font-size:14px;">स्रोत :<br />
पुस्तक : संधिनी (पृष्ठ 95) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन संस्करण : २०१२</span></span></p>

<p>&nbsp;</p>

<p><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:20px;"><span style="font-family: sans-serif, Arial, Verdana, &quot;Trebuchet MS&quot;; background-color: rgb(255, 255, 255);">इन आँखों ने देखी न राह कहीं&nbsp;</span></span></strong></span></p>

<p><br />
<span style="font-size:18px;">इन आँखों ने देखी न राह कहीं&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">इन्हें धो गया नेह का नीर नहीं,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">करती मिट जाने की साध कभी,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">इन प्राणों को मूक अधीर नहीं,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">अलि छोड़ो न जीवन की तरणी,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">उस सागर में जहाँ तीर नहीं!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">कभी देखा नहीं वह देश जहाँ,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">प्रिय से कम मादक पीर नहीं!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">जिसको मरुभूमि समुद्र हुआ&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">उस मेघव्रती की प्रतीति नहीं,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">जो हुआ जल दीपकमय उससे&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">कभी पूछी निबाह की रीति नहीं,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मतवाले चकोर ने सीखी कभी;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">उस प्रेम के राज्य की नीति नहीं,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">तूं अकिंचन भिक्षुक है मधु का,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">अलि तृप्ति कहाँ जब प्रीति नहीं!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">पथ में नित स्वर्णपराग बिछा,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">तुझे देख जो फूली समाती नहीं,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">पलकों से दलों में घुला मकरंद,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">पिलाती कभी अनखाती नहीं,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">किरणों में गुँथी मुक्तावलियाँ,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">पहनाती रही सकुचाती नहीं,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">अब फूल गुलाब में पंकज की,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">अलि कैसे तुझे सुधि आती नहीं!&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">करते करुणा-घन छाँह वहाँ,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">झुलसाता निदाध-सा दाह नहीं&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मिलती शुचि आँसुओं की सरिता,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मृगवारि का सिंधु अथाह नहीं,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">हँसता अनुराग का इंदु सदा,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">छलना की कुहू का निबाह नहीं,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">फिरता अलि भूल कहाँ भटका,&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">यह प्रेम के देश की राह नहीं!&nbsp;</span></p>

<p><span style="color:#696969;"><span style="font-size:14px;">स्रोत :<br />
पुस्तक : संधिनी (पृष्ठ 48) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन संस्करण : 2012</span></span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall29775.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[mahadevi-verma-poems]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/gopal-das-neeraj-poems]]></guid>
                       <title><![CDATA[पढ़े महाकवि गोपालदास नीरज की कुछ अमर रचनाएँ ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/gopal-das-neeraj-poems]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 07 Jun 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;पद्मभूषण से सम्मानित गीतकार और महाकवि गोपालदास नीरज कभी कचहरी में टाइपिस्ट थे। 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरावली गांव में जन्में और छह साल की उम्र में उनके पिता बाबू बृजकिशोर सक्सेना का निधन हो गया। स्कूली पढ़ाई के बाद नीरज ने इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया। फिर रोजी रोटी दिल्ली ले गई जहाँ अलग-अलग जगह टाइपिस्ट या क्लर्क की नौकरी की। पर नौकरी के साथ ही नीरज ने पढ़ाई जारी रखी और हिन्दी साहित्य पढ़ते रहे। वे मेरठ कॉलेज में हिन्दी के व्याख्याता रहे। बाद में अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग में पढ़ाने लगे। इस बीच साहित्य से सम्बन्ध गहरा होता गया और उनकी काव्य प्रतिभा की लोकप्रियता फैलती गई। गोपालदास नीरज ने फिल्मों में भी गीत लिखे।&nbsp;
&nbsp; &nbsp; फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। 1970 में फिल्म चन्दा और बिजली के गीत &lsquo;काल का पहिया घूमे रे भइया!&rsquo;, 1971 में फिल्म पहचान के गीत &lsquo;बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं&rsquo; और 1972 में फिल्म मेरा नाम जोकर के गीत &lsquo;ए भाई! जरा देख के चलो&rsquo; के लिए उन्हें पुरस्कार मिला।



&nbsp; &nbsp;गोपालदास नीरज के ढेरों काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें &#39;दर्द दिया&#39;, &#39;प्राण गीत&#39;, &#39;आसावरी&#39;, &#39;बादर बरस गयो&#39;, &#39;दो गीत&#39;, &#39;नदी किनारे&#39;, &#39;नीरज की गीतिकाएं&#39;, &#39;संघर्ष&#39;, &#39;विभावरी&#39;, &#39;नीरज की पाती&#39; प्रमुख हैं।&nbsp;



गोपालदास नीरज की कुछ रचनाएं:

&nbsp;

मुझको याद किया जाएगा

आंसू जब सम्मानित होंगे

मुझको याद किया जाएगा
जहां प्रेम का चर्चा होगा मेरा नाम लिया जाएगा।
मान-पत्र मैं नहीं लिख सका राजभवन के सम्मानों का
मैं तो आशिक रहा जनम से सुंदरता के दीवानों का
लेकिन था मालूम नहीं ये केवल इस गलती के कारण
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा

मुझको याद किया जाएगा।

&nbsp;


आज की रात तुझे आखिरी खत और लिख दूं

आज की रात तुझे आखिरी खत और लिख दूं
कौन जाने यह दिया सुबह तक जले न जले?
बम-बारुद के इस दौर में मालूम नहीं&nbsp;
ऐसी रंगीन हवा फिर कभी चले न चले।


जीवन कटना था, कट गया

जीवन कटना था, कट गया
अच्छा कटा, बुरा कटा
यह तुम जानो
मैं तो यह समझता हूं
कपड़ा पुराना एक फटना था, फट गया
जीवन कटना था कट गया

&nbsp;


है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए


है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए

रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए

अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा
ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए

फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए

छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए

दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ
तुझको मुझसे इस समय सूने में मिलना चाहिए


हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे


हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे ।
होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे ।

इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे ।

वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी, न बिरहमन, न वो शेख,
वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुँचे ।

एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबाँ,
कल को शायद मेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचे ।

चाँद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख,
देखना ये है कि इन्सान कहाँ तक पहुँचे ।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;पद्मभूषण से सम्मानित गीतकार और महाकवि गोपालदास नीरज कभी कचहरी में टाइपिस्ट थे। 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरावली गांव में जन्में और छह साल की उम्र में उनके पिता बाबू बृजकिशोर सक्सेना का निधन हो गया। स्कूली पढ़ाई के बाद नीरज ने इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया। फिर रोजी रोटी दिल्ली ले गई जहाँ अलग-अलग जगह टाइपिस्ट या क्लर्क की नौकरी की। पर नौकरी के साथ ही नीरज ने पढ़ाई जारी रखी और हिन्दी साहित्य पढ़ते रहे। वे मेरठ कॉलेज में हिन्दी के व्याख्याता रहे। बाद में अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग में पढ़ाने लगे। इस बीच साहित्य से सम्बन्ध गहरा होता गया और उनकी काव्य प्रतिभा की लोकप्रियता फैलती गई। गोपालदास नीरज ने फिल्मों में भी गीत लिखे।&nbsp;<br />
&nbsp; &nbsp; फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। 1970 में फिल्म चन्दा और बिजली के गीत &lsquo;काल का पहिया घूमे रे भइया!&rsquo;, 1971 में फिल्म पहचान के गीत &lsquo;बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं&rsquo; और 1972 में फिल्म मेरा नाम जोकर के गीत &lsquo;ए भाई! जरा देख के चलो&rsquo; के लिए उन्हें पुरस्कार मिला।</span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;गोपालदास नीरज के ढेरों काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें &#39;दर्द दिया&#39;, &#39;प्राण गीत&#39;, &#39;आसावरी&#39;, &#39;बादर बरस गयो&#39;, &#39;दो गीत&#39;, &#39;नदी किनारे&#39;, &#39;नीरज की गीतिकाएं&#39;, &#39;संघर्ष&#39;, &#39;विभावरी&#39;, &#39;नीरज की पाती&#39; प्रमुख हैं।&nbsp;</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;"><strong>गोपालदास नीरज की कुछ रचनाएं:</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:20px;">मुझको याद किया जाएगा</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">आंसू जब सम्मानित होंगे</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मुझको याद किया जाएगा<br />
जहां प्रेम का चर्चा होगा मेरा नाम लिया जाएगा।<br />
मान-पत्र मैं नहीं लिख सका राजभवन के सम्मानों का<br />
मैं तो आशिक रहा जनम से सुंदरता के दीवानों का<br />
लेकिन था मालूम नहीं ये केवल इस गलती के कारण<br />
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मुझको याद किया जाएगा।</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;"><span style="color:#000080;"><span style="font-size:20px;"><strong>आज की रात तुझे आखिरी खत और लिख दूं</strong></span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">आज की रात तुझे आखिरी खत और लिख दूं<br />
कौन जाने यह दिया सुबह तक जले न जले?<br />
बम-बारुद के इस दौर में मालूम नहीं&nbsp;<br />
ऐसी रंगीन हवा फिर कभी चले न चले।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="color:#000080;"><span style="font-size:18px;"><strong><span style="font-size:20px;">जीवन कटना था, कट गया</span></strong></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जीवन कटना था, कट गया<br />
अच्छा कटा, बुरा कटा<br />
यह तुम जानो<br />
मैं तो यह समझता हूं<br />
कपड़ा पुराना एक फटना था, फट गया<br />
जीवन कटना था कट गया</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;"><strong><span style="font-size:20px;"><span style="color:#000080;">है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए</span></span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए<br />
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह<br />
अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा<br />
ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया<br />
जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो<br />
आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ<br />
तुझको मुझसे इस समय सूने में मिलना चाहिए</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;"><span style="color:#000080;"><strong><span style="font-size:20px;">हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे</span></strong></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे ।<br />
होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे ।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,<br />
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे ।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी, न बिरहमन, न वो शेख,<br />
वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुँचे ।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबाँ,<br />
कल को शायद मेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचे ।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">चाँद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख,<br />
देखना ये है कि इन्सान कहाँ तक पहुँचे ।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall29773.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[gopal-das-neeraj-poems]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/read-famous-couplets-of-saint-kabir-das]]></guid>
                       <title><![CDATA[पढ़िए संत कबीर दास के प्रसिद्ध दोहे]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/read-famous-couplets-of-saint-kabir-das]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 22 Feb 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
अर्थ: जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।


थी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ: बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

&nbsp;


साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

अर्थ: इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे।


तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !


माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ: कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या&nbsp; फेरो।


जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ: सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का&ndash;उसे ढकने वाले खोल का।


दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

अर्थ: यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह&nbsp; दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत।


जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ: जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते&nbsp; हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।


बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

अर्थ: यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,<br />
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।</strong><br />
अर्थ: जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>थी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,<br />
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong style="font-size: 18px;">अर्थ:</strong><span style="font-size: 18px;"> बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,<br />
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>अर्थ:</strong> इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,<br />
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>अर्थ: </strong>कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,<br />
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>अर्थ: </strong>कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या&nbsp; फेरो।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,<br />
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>अर्थ:</strong> सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का&ndash;उसे ढकने वाले खोल का।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,<br />
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>अर्थ:</strong> यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह&nbsp; दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,<br />
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>अर्थ: </strong>जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते&nbsp; हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,<br />
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>अर्थ: </strong>यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।</span></p>
]]></content:encoded>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[Read famous couplets of Saint Kabir Das]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/read-10-big-lions-of-rahat-indori]]></guid>
                       <title><![CDATA[पढ़िए राहत इंदौरी के 10 बड़े  शेर ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/read-10-big-lions-of-rahat-indori]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 21 Feb 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[हम अब मकान में ताला लगाने वाले हैं

पता चला है के मेहमान आने वाले हैं

&nbsp;

आँखों में पानी रखों, होंठो पे चिंगारी रखो

जिंदा रहना है तो तरकीबे बहुत सारी रखो

&nbsp;

तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो

मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो

&nbsp;

उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो

धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है

&nbsp;

ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई मांगे

जो हो परदेस में वो किससे रज़ाई मांगे

&nbsp;

घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया

घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है

&nbsp;

दोस्ती जब किसी से की जाए

दुश्मनों की भी राय ली जाए

&nbsp;

अपने हाकिम की फकीरी पर तरस आता है

जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे

&nbsp;

फैसला जो कुछ भी हो, हमें मंजूर होना चाहिए

जंग हो या इश्क हो, भरपूर होना चाहिए

&nbsp;

हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे

कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">हम अब मकान में ताला लगाने वाले हैं</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">पता चला है के मेहमान आने वाले हैं</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">आँखों में पानी रखों, होंठो पे चिंगारी रखो</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">जिंदा रहना है तो तरकीबे बहुत सारी रखो</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई मांगे</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">जो हो परदेस में वो किससे रज़ाई मांगे</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">दोस्ती जब किसी से की जाए</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">दुश्मनों की भी राय ली जाए</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">अपने हाकिम की फकीरी पर तरस आता है</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">फैसला जो कुछ भी हो, हमें मंजूर होना चाहिए</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">जंग हो या इश्क हो, भरपूर होना चाहिए</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;"><strong><span style="font-size: 18px;">कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 80px;">&nbsp;</p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall27366.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Rahat Indori- kavay-rath-update ]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/there-was-no-one-like-jagjit-and-no-one-will-be]]></guid>
                       <title><![CDATA[जगजीत जैसा न कोई था और न कोई होगा]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/there-was-no-one-like-jagjit-and-no-one-will-be]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 18 Jan 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[हिंदुस्तान में जब भी गजल गायकी का जिक्र होता है तो बात अमूमन जगजीत सिंह के नाम&nbsp;से शुरू होती है और उन्हीं पर खत्म हो जाती है। दरअसल हिंदुस्तान में गजल गायक तो बहुत हुए लेकिन ऐसे गायक बेहद कम है जिन्होंने सिर्फ ग़ज़ल ही गाई हो। जगजीत सिंह ऐसा ही नाम है। वो जगजीत सिंह ही थे जिन्होंने गजल से आम आदमी का तार्रुफ़ करवाया या यूँ कहे कि हर आम और ख़ास वर्ग को गजल के आगोश में लिया। जिस सादगी के साथ जगजीत सिंह ने गजल गाई, वैसा न तो उनसे पहले कभी हुआ था और उनके जाने के बाद होता दिखा। एक से बढ़कर एक अजीम शायरों की गजलों को जगजीत आवाज देते गए और जग को अपना दीवाना बनाते गए। जगजीत बेहद ख़ास थे, नायाब थे और ये ही कारण है कि उनके इंतकाल को बेशक ग्यारह साल बीत गए हो लेकिन संगीत जगत में उनकी कमी कोई पूरी नहीं कर पाया।

साल था 1941 और फरवरी महीने की आठ तारीख थी जब राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में सरदार अमर सिंह धमानी और बच्चन कौर के यहां भारतीय संगीत जगत को जीतने वाले जगजीत सिंह का जन्म हुआ। पिता चाहते थे कि जगजीत पढ़-लिखकर प्रशासनिक सेवा में जाए, मगर जगजीत की मंजिल तो कुछ और ही थी। शुरू से ही मन स्वर, लय और ताल में लगता था। संगीत की प्रारंभिक शिक्षा गंगानगर में ही पंडित छगन लाल शर्मा से मिली। फिर उस्ताद जमाल खान से भी उन्होंने संगीत के गुर सीखे। उस अल्हड़ उम्र में ही जगजीत ने संगीत को अपनी जिंदगी बना लिया था। कहते है जगजीत पैसे चुराकर फिल्में देखने जाते थे, क्योंकि फिल्मों में अच्छा संगीत सुनने को मिलता था। एकबार तो सिनेमा हॉल में पिता ने पकड़ लिया और पीटते हुए घर ले गए, मगर संगीत के जूनून में कोई कमी नहीं आई। पढ़ाई-लिखाई के इस दौर में ही पहली मोहब्बत भी हुई, लेकिन अंजाम तक नहीं पहुंच सकी।&nbsp; &nbsp;&nbsp;

कई साक्षात्कारों में जगजीत सिंह ने खुद बताया था कि साल 1965 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के नाम पर वे समय काट रहे थे। जब परीक्षाओं का समय आया, तब उन्होंने सोचा कि पढ़ाई कुछ की नहीं है तो परीक्षा में बैठने का क्या फायदा ? सो परीक्षा में बैठे ही नहीं।
जगजीत ने अपना सामान उठाया और अपनी किस्मत आजमाने के लिए मायानगरी मुंबई का रास्ता पकड़ लिया। पर मंजिल आसां नहीं थी। मुंबई पहुंचकर जगजीत का संघर्ष शुरू हुआ। शुरुआत में उन्होंने छोटी-छोटी पार्टियों में थोड़े से पैसों के लिए गाना शुरू किया और एक मौके की तलाश करते रहे।&nbsp;मुंबई में जगजीत सिंह का संघर्ष इसलिए भी ज्यादा था क्यों कि उनके गाने का अंदाज बिलकुल जुदा था। उनका संघर्ष रंग लाया 1965 में जब उनका पहला रिकॉर्ड निकला और इसके दो वर्ष बाद एक और रिकॉर्ड आया। पर इन दोनों से उन्हें ज्यादा पहचान नहीं मिली। फिर साल 1967 में जगजीत सिंह के जीवन में चित्रा सिंह आई, जिन्हें बाद में जगजीत ने गजल गायकी की शिक्षा दी और फिर 1969 में दोनों ने शादी कर ली। चित्रा पहले से ही शादीशुदा थी और कहते है उनके तलाक के बाद जगजीत ने उनके पहले पति से इजाजत लेकर उनसे शादी की थी।&nbsp;&nbsp;

जगजीत सिंह को असली पहचान 1976 में मिली जब उनका पहला लॉन्ग प्ले एल्बम &lsquo;&lsquo;द अनफॉरगेटेबल्स&rsquo;&rsquo; आया, जिसमें उनके साथ पत्नी चित्रा की आवाज भी शामिल थी। इस नायाब एल्बम में&nbsp; फिराक गोरखपुरी, जिगर मुरादाबादी, अमीर मिनाई, तारिक बदायुनी, सुदर्शन फाकिर जैसे बड़े गजलकारों की गजलों को जगजीत-चित्रा की आवाज ने अलहदा अंदाज में गाया इस एल्बम की सफलता के बाद जगजीत सिंह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके साथ ही जगजीत -चित्रा की जोड़ी भी हिट हो गई और इस जोड़ी ने एक के बाद एक कई हिट गीत-गजल दिए |सनं&nbsp;1981 में आया जगजीत सिंह का गीत &quot;होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो &quot; फिल्म &lsquo;प्रेम गीत&rsquo; का ये गीत सच में अमर हो गया। 1982 में &lsquo;साथ-साथ&rsquo; फिल्म में&nbsp; जगजीत सिंह और चित्रा के कई गीत हिट हुए। &#39;ये तेरा घर ये मेरा घर हो&#39;&nbsp; या &#39;तुमको देखा तो ये खयाल आया&#39; इस फिल्म के गीत आज भी हरदिल अजीज है। फिर 1983 में आई महेश भट्ट की फिल्म &lsquo;अर्थ&rsquo;। फिल्म में कुल पांच गाने थे, जिनमें से तीन थी कैफी आजमी की गजले। &#39;तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो&#39;, &#39;झुकी झुकी सी नजर&#39;, &#39;कोई ये कैसे बताए&#39;, कैफ़ी साहब की इन ग़ज़लों ने जगजीत सिंह को लोकप्रियता के क्षितिज पर पंहुचा दिया। । जगजीत ने सन् 1987 में &lsquo;बियोंड टाइम&rsquo; रिकॉर्ड किया, यह किसी भी भारतीय संगीतकार की पहली डिजिटल सीडी थी। 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह का निधन हुआ और तब तक वे लगातार अपनी नायाब गायकी से संगीत जगत को गुलजार करते रहे। जब तक जगजीत रहे बुलंदियों पर रहे और आज अपने निधन के इतने वर्ष बीत जाने पर भी जगजीत ही गजल सम्राट है।

&nbsp;

आम आदमी की प्ले लिस्ट में गजल को शामिल करवाया :
जगजीत सिंह ने गजल गायकी को बेहद सरल किया और गजल को आम आदमी की प्ले लिस्ट में शामिल करवाया। उनके गायन में शास्त्रीय संगीत की बुनियाद तो रही, लेकिन उसके अनावश्यक बोझ से गजल को मुक्त कर उसे सहज बनाया। वे वायलिन जैसे आधुनिक उपकरणों को प्रयोग में लाए। वो जगजीत ही थे जिन्होंने गजल में भी कोरस की का इस्तेमाल किया। कई गज़लकारों की ग़ज़लों को उन्होंने अपनी आवाज देकर अमर किया। उनका गजल गाने का तरीके बेशक अन्य प्रबुद्ध गजल गायकों जैसा नहीं था और कई लोगों ने उनकी आलोचना भी की, लेकिन न तो उन्होंने अपना तरीका बदला और न ही उनकी लोकप्रियता में कमी आई।

फिर कभी स्टेज पर नहीं लौटी चित्रा :
जगजीत सिंह और चित्रा की जोड़ी बुलंदियों को छू ही रहे थी&nbsp; कि उनकी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी त्रासदी हो गई। 1990 में उनका 18 वर्षीय बेटा विवेक एक दुर्घटना में मारा गया। इस सदमे ने उनकी जिंदगी पर विराम लगा दिया । चित्रा इसके बाद फिर कभी दोबारा स्टेज पर नहीं लौटी। जगजीत सिंह ने भी कई महीनों तक बोलना बंद कर दिया। वक्त गुजरने के बाद जगजीत सिंह वापस लौटे और संगीत के जरिये अपने दर्द को भुलाने में जुट गए। फिल्म दुश्मन में शामिल हुई उनकी गजल &#39;चिट्ठी न कोई सन्देश&#39; जिस दर्द को बयां करती है उसे उनकी बेटे के निधन से जोड़कर देखा जाता है।

कई सम्मान मिले :
सन 1998 में जगजीत सिंह को मध्य प्रदेश सरकार ने लता मंगेशकर सम्मान से नवाजा था। भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में सन 2003 में जगजीत सिंह को पद्म भूषण सम्मान से पुरस्कृत किया गया था। वही सन 2005 में दिल्ली सरकार द्वारा गालिब अकादमी पुरस्कार भी दिया गया था।इसके अलावा राजस्थान सरकार ने मरणोपरांत जगजीत सिंह को अपना उच्चतम नागरिक पुरस्कार यानी राजस्थान रत्न पुरस्कार प्रदान किया। जगजीत सिंह के सम्मान में भारत सरकार द्वारा 2014 में उनकी तस्वीर लगी एक डाक टिकट भी जारी की थी ।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हिंदुस्तान में जब भी गजल गायकी का जिक्र होता है तो बात अमूमन जगजीत सिंह के नाम&nbsp;से शुरू होती है और उन्हीं पर खत्म हो जाती है। दरअसल हिंदुस्तान में गजल गायक तो बहुत हुए लेकिन ऐसे गायक बेहद कम है जिन्होंने सिर्फ ग़ज़ल ही गाई हो। जगजीत सिंह ऐसा ही नाम है। वो जगजीत सिंह ही थे जिन्होंने गजल से आम आदमी का तार्रुफ़ करवाया या यूँ कहे कि हर आम और ख़ास वर्ग को गजल के आगोश में लिया। जिस सादगी के साथ जगजीत सिंह ने गजल गाई, वैसा न तो उनसे पहले कभी हुआ था और उनके जाने के बाद होता दिखा। एक से बढ़कर एक अजीम शायरों की गजलों को जगजीत आवाज देते गए और जग को अपना दीवाना बनाते गए। जगजीत बेहद ख़ास थे, नायाब थे और ये ही कारण है कि उनके इंतकाल को बेशक ग्यारह साल बीत गए हो लेकिन संगीत जगत में उनकी कमी कोई पूरी नहीं कर पाया।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">साल था 1941 और फरवरी महीने की आठ तारीख थी जब राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में सरदार अमर सिंह धमानी और बच्चन कौर के यहां भारतीय संगीत जगत को जीतने वाले जगजीत सिंह का जन्म हुआ। पिता चाहते थे कि जगजीत पढ़-लिखकर प्रशासनिक सेवा में जाए, मगर जगजीत की मंजिल तो कुछ और ही थी। शुरू से ही मन स्वर, लय और ताल में लगता था। संगीत की प्रारंभिक शिक्षा गंगानगर में ही पंडित छगन लाल शर्मा से मिली। फिर उस्ताद जमाल खान से भी उन्होंने संगीत के गुर सीखे। उस अल्हड़ उम्र में ही जगजीत ने संगीत को अपनी जिंदगी बना लिया था। कहते है जगजीत पैसे चुराकर फिल्में देखने जाते थे, क्योंकि फिल्मों में अच्छा संगीत सुनने को मिलता था। एकबार तो सिनेमा हॉल में पिता ने पकड़ लिया और पीटते हुए घर ले गए, मगर संगीत के जूनून में कोई कमी नहीं आई। पढ़ाई-लिखाई के इस दौर में ही पहली मोहब्बत भी हुई, लेकिन अंजाम तक नहीं पहुंच सकी।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कई साक्षात्कारों में जगजीत सिंह ने खुद बताया था कि साल 1965 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के नाम पर वे समय काट रहे थे। जब परीक्षाओं का समय आया, तब उन्होंने सोचा कि पढ़ाई कुछ की नहीं है तो परीक्षा में बैठने का क्या फायदा ? सो परीक्षा में बैठे ही नहीं।<br />
जगजीत ने अपना सामान उठाया और अपनी किस्मत आजमाने के लिए मायानगरी मुंबई का रास्ता पकड़ लिया। पर मंजिल आसां नहीं थी। मुंबई पहुंचकर जगजीत का संघर्ष शुरू हुआ। शुरुआत में उन्होंने छोटी-छोटी पार्टियों में थोड़े से पैसों के लिए गाना शुरू किया और एक मौके की तलाश करते रहे।&nbsp;</span><span style="font-size: 18px;">मुंबई में जगजीत सिंह का संघर्ष इसलिए भी ज्यादा था क्यों कि उनके गाने का अंदाज बिलकुल जुदा था। उनका संघर्ष रंग लाया 1965 में जब उनका पहला रिकॉर्ड निकला और इसके दो वर्ष बाद एक और रिकॉर्ड आया। पर इन दोनों से उन्हें ज्यादा पहचान नहीं मिली। फिर साल 1967 में जगजीत सिंह के जीवन में चित्रा सिंह आई, जिन्हें बाद में जगजीत ने गजल गायकी की शिक्षा दी और फिर 1969 में दोनों ने शादी कर ली। चित्रा पहले से ही शादीशुदा थी और कहते है उनके तलाक के बाद जगजीत ने उनके पहले पति से इजाजत लेकर उनसे शादी की थी।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">जगजीत सिंह को असली पहचान 1976 में मिली जब उनका पहला लॉन्ग प्ले एल्बम &lsquo;&lsquo;द अनफॉरगेटेबल्स&rsquo;&rsquo; आया, जिसमें उनके साथ पत्नी चित्रा की आवाज भी शामिल थी। इस नायाब एल्बम में&nbsp; फिराक गोरखपुरी, जिगर मुरादाबादी, अमीर मिनाई, तारिक बदायुनी, सुदर्शन फाकिर जैसे बड़े गजलकारों की गजलों को जगजीत-चित्रा की आवाज ने अलहदा अंदाज में गाया इस एल्बम की सफलता के बाद जगजीत सिंह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके साथ ही जगजीत -चित्रा की जोड़ी भी हिट हो गई और इस जोड़ी ने एक के बाद एक कई हिट गीत-गजल दिए |</span><span style="font-size: 18px;">सनं&nbsp;</span><span style="font-size: 18px;">1981 में आया जगजीत सिंह का गीत &quot;होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो &quot; फिल्म &lsquo;प्रेम गीत&rsquo; का ये गीत सच में अमर हो गया। 1982 में &lsquo;साथ-साथ&rsquo; फिल्म में&nbsp; जगजीत सिंह और चित्रा के कई गीत हिट हुए। &#39;ये तेरा घर ये मेरा घर हो&#39;&nbsp; या &#39;तुमको देखा तो ये खयाल आया&#39; इस फिल्म के गीत आज भी हरदिल अजीज है। फिर 1983 में आई महेश भट्ट की फिल्म &lsquo;अर्थ&rsquo;। फिल्म में कुल पांच गाने थे, जिनमें से तीन थी कैफी आजमी की गजले। &#39;तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो&#39;, &#39;झुकी झुकी सी नजर&#39;, &#39;कोई ये कैसे बताए&#39;, कैफ़ी साहब की इन ग़ज़लों ने जगजीत सिंह को लोकप्रियता के क्षितिज पर पंहुचा दिया। । जगजीत ने सन् 1987 में &lsquo;बियोंड टाइम&rsquo; रिकॉर्ड किया, यह किसी भी भारतीय संगीतकार की पहली डिजिटल सीडी थी। 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह का निधन हुआ और तब तक वे लगातार अपनी नायाब गायकी से संगीत जगत को गुलजार करते रहे। जब तक जगजीत रहे बुलंदियों पर रहे और आज अपने निधन के इतने वर्ष बीत जाने पर भी जगजीत ही गजल सम्राट है।</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>आम आदमी की प्ले लिस्ट में गजल को शामिल करवाया :</strong><br />
जगजीत सिंह ने गजल गायकी को बेहद सरल किया और गजल को आम आदमी की प्ले लिस्ट में शामिल करवाया। उनके गायन में शास्त्रीय संगीत की बुनियाद तो रही, लेकिन उसके अनावश्यक बोझ से गजल को मुक्त कर उसे सहज बनाया। वे वायलिन जैसे आधुनिक उपकरणों को प्रयोग में लाए। वो जगजीत ही थे जिन्होंने गजल में भी कोरस की का इस्तेमाल किया। कई गज़लकारों की ग़ज़लों को उन्होंने अपनी आवाज देकर अमर किया। उनका गजल गाने का तरीके बेशक अन्य प्रबुद्ध गजल गायकों जैसा नहीं था और कई लोगों ने उनकी आलोचना भी की, लेकिन न तो उन्होंने अपना तरीका बदला और न ही उनकी लोकप्रियता में कमी आई।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>फिर कभी स्टेज पर नहीं लौटी चित्रा :</strong><br />
जगजीत सिंह और चित्रा की जोड़ी बुलंदियों को छू ही रहे थी&nbsp; कि उनकी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी त्रासदी हो गई। 1990 में उनका 18 वर्षीय बेटा विवेक एक दुर्घटना में मारा गया। इस सदमे ने उनकी जिंदगी पर विराम लगा दिया । चित्रा इसके बाद फिर कभी दोबारा स्टेज पर नहीं लौटी। जगजीत सिंह ने भी कई महीनों तक बोलना बंद कर दिया। वक्त गुजरने के बाद जगजीत सिंह वापस लौटे और संगीत के जरिये अपने दर्द को भुलाने में जुट गए। फिल्म दुश्मन में शामिल हुई उनकी गजल &#39;चिट्ठी न कोई सन्देश&#39; जिस दर्द को बयां करती है उसे उनकी बेटे के निधन से जोड़कर देखा जाता है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>कई सम्मान मिले :</strong><br />
सन 1998 में जगजीत सिंह को मध्य प्रदेश सरकार ने लता मंगेशकर सम्मान से नवाजा था। भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में सन 2003 में जगजीत सिंह को पद्म भूषण सम्मान से पुरस्कृत किया गया था। वही सन 2005 में दिल्ली सरकार द्वारा गालिब अकादमी पुरस्कार भी दिया गया था।इसके अलावा राजस्थान सरकार ने मरणोपरांत जगजीत सिंह को अपना उच्चतम नागरिक पुरस्कार यानी राजस्थान रत्न पुरस्कार प्रदान किया। जगजीत सिंह के सम्मान में भारत सरकार द्वारा 2014 में उनकी तस्वीर लगी एक डाक टिकट भी जारी की थी ।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall26706.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[There was no one like Jagjit and no one will be]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/bhashir-badr-shayari]]></guid>
                       <title><![CDATA[आम ओ ख़ास के शायर बशीर बद्र के 20 बेहतरीन शेर]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/bhashir-badr-shayari]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 27 Apr 2022 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[बशीर बद्र शायरी के उन पैमानों को उजागर करते हैं जहां आसान शब्दों में गहरी बात कह दी जाती है। ऐसे शायर ही लोगों के दिलों तक का सफ़र कर पाते हैं। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि बशीर बद्र भी लोगों के शायर हैं जिन्हें आम से ख़ास तक हर कोई पसंद करता है। इनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर है। भोपाल से ताल्लुकात रखने वाले बशीर बद्र का जन्म कानपुर में हुआ था। न जाने कितनी बार अपनी बात कहने के लिए बशीर साहब को संसद में भी पढ़ा जा चुका है। आइए पढ़ते हैं बशीर साहब के लिखे ऐसे ही कुछ ख़ास शेर

&nbsp;


&nbsp;दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिन्दा न हों

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

शौहरत की बुलन्दी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है
मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला&nbsp;

उसे किसी की मुहब्बत का एतिबार नहीं
उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है
गुलाबों की तरह शबनम में अपना दिल भिगोते हैं
मुहब्बत करने वाले ख़ूबसूरत लोग होते हैं

चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं से ज़मीं
ग़ज़ल के शेर कहां रोज़-रोज़ होते हैं

अबके आंसू आंखों से दिल में उतरे
रुख़ बदला दरिया ने कैसा बहने का

ज़हीन सांप सदा आस्तीन में रहते हैं
ज़बां से कहते हैं दिल से मुआफ़ करते नहीं&nbsp;

सात सन्दूकों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें
आज इन्सां को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत

खुले से लॉन में सब लोग बैठें चाय पियें
दुआ करो कि ख़ुदा हमको आदमी कर दे

लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुशबू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तेरी आवाज़ चूम लूं

इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझको मेरा महबूब समझते होंगे&nbsp;

मुझको शाम बता देती है
तुम कैसे कपड़े पहने हो

इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया
ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे

ऐसे मिलो कि अपना समझता रहे सदा
जिस शख़्स से तुम्हारा दिली इख़्तिलाफ़ है

सच सियासत से अदालत तक बहुत मसरूफ़ है
झूट बोलो, झूट में अब भी मोहब्बत है बहुत
किताबें, रिसाले न अख़़बार पढना
मगर दिल को हर रात इक बार पढ़ना

मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत संवरती है
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतेराम करता हूं&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बशीर बद्र शायरी के उन पैमानों को उजागर करते हैं जहां आसान शब्दों में गहरी बात कह दी जाती है। ऐसे शायर ही लोगों के दिलों तक का सफ़र कर पाते हैं। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि बशीर बद्र भी लोगों के शायर हैं जिन्हें आम से ख़ास तक हर कोई पसंद करता है। इनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर है। भोपाल से ताल्लुकात रखने वाले बशीर बद्र का जन्म कानपुर में हुआ था। न जाने कितनी बार अपनी बात कहने के लिए बशीर साहब को संसद में भी पढ़ा जा चुका है। आइए पढ़ते हैं बशीर साहब के लिखे ऐसे ही कुछ ख़ास शेर</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;</span></p>

<p><br />
<em><span style="font-size:20px;">&nbsp;दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे<br />
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिन्दा न हों</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है<br />
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है<br />
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">शौहरत की बुलन्दी भी पल भर का तमाशा है<br />
जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है<br />
मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला<br />
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला&nbsp;</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">उसे किसी की मुहब्बत का एतिबार नहीं<br />
उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है<br />
गुलाबों की तरह शबनम में अपना दिल भिगोते हैं<br />
मुहब्बत करने वाले ख़ूबसूरत लोग होते हैं</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं से ज़मीं<br />
ग़ज़ल के शेर कहां रोज़-रोज़ होते हैं</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">अबके आंसू आंखों से दिल में उतरे<br />
रुख़ बदला दरिया ने कैसा बहने का</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">ज़हीन सांप सदा आस्तीन में रहते हैं<br />
ज़बां से कहते हैं दिल से मुआफ़ करते नहीं&nbsp;</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">सात सन्दूकों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें<br />
आज इन्सां को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">खुले से लॉन में सब लोग बैठें चाय पियें<br />
दुआ करो कि ख़ुदा हमको आदमी कर दे</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुशबू अज़ान दे<br />
जी चाहता है मैं तेरी आवाज़ चूम लूं</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरी<br />
लोग तुझको मेरा महबूब समझते होंगे&nbsp;</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">मुझको शाम बता देती है<br />
तुम कैसे कपड़े पहने हो</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया<br />
ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">ऐसे मिलो कि अपना समझता रहे सदा<br />
जिस शख़्स से तुम्हारा दिली इख़्तिलाफ़ है</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">सच सियासत से अदालत तक बहुत मसरूफ़ है<br />
झूट बोलो, झूट में अब भी मोहब्बत है बहुत<br />
किताबें, रिसाले न अख़़बार पढना<br />
मगर दिल को हर रात इक बार पढ़ना</span></em></p>

<p><em><span style="font-size:20px;">मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत संवरती है<br />
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतेराम करता हूं&nbsp;</span></em></p>

<p>&nbsp;</p>

<p>&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall20566.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[आम ओ ख़ास के शायर बशीर बद्र के 20 बेहतरीन शेर]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/i-know-i-will-call-you-soil-in-which-i-have-gone-a-hundred-times]]></guid>
                       <title><![CDATA[पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी, समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/i-know-i-will-call-you-soil-in-which-i-have-gone-a-hundred-times]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 20 Sep 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[भारत का एक ऐसा कवि जिसे स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रकवि की ख्याति प्राप्त हुई। ऐसा कवि जिसकी कविताओं में एक ओर ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति। एक ऐसा कवि जो साहित्य का वह सशक्त हस्ताक्षर हैं जिसकी कलम में दिनकर यानी सूर्य के समान चमक थी। हम बात कर रहे है रामधारी सिंह दिनकर की। उनकी ही लिखी कविता &#39;परिचय&#39; की इन पंक्तियों से बेहतर भला उनका परिचय क्या हो सकता है &#39; मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का,चिता का धूलिकण हूँ , शार हूँ मैं ,पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी, समा जिसमें चूका सौ बार हूँ मैं &#39; 23 सितम्बर को राष्ट्रकवि दिनकर की जयंती होती है। पूरा देश अपने राष्ट्रकवि को याद करता है, नमन करता है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह &#39;दिनकर&#39; वो कवि है जिनकी रचनाओं&nbsp; में ओज, शौर्य, प्रेम और सौंदर्य सब एक साथ आकार पाते हैं। वे आंदोलित भी करते हैं और आह्लादित भी। वे &#39;परशुराम की प्रतीक्षा&#39; भी लिखते है और &#39;उर्वशी&#39; भी। दिनकर द्वंद्वात्मक ऐक्य के कवि हैं।&nbsp; उन्हें समय को साधने वाला कवि गया। पर दिनकर &lsquo;राष्ट्रकवि&rsquo; ही नहीं &#39;जनकवि&#39; भी थे। वे उन चंद कवियों में शुमार रहे है जिनके द्वारा लिखी गई पंक्तियाँ आज भी आम जनमानस द्वारा पढ़ी और दोहराई जाती है। दिनकर वो कवि थे जिन्होंने देश के क्रांतिकारी आंदोलन को अपनी कविता से स्वर दिया। दिनकर वो कवि थे जिनके द्वारा लिखी गई पंक्तियाँ &#39;सिंहासन खाली करो की जनता आती है&#39; आज भी देश के जान आंदोलनों की आवाज है। रामधारी सिंह दिनकर जितने सुगढ़ कवि थे, उतने ही सचेत गद्य लेखक भी रहे। आज़ादी के बाद वे पंडित नेहरू और सत्ता के क़रीब भी रहे, कांग्रेस ने उन्हे राज्यसभा भी भेजा लेकिन राष्ट्रकवि का दायित्व उन्होंने हमेशा निभाया। दिनकर सारी उम्र सियासत से लोहा लेते रहे। उन्होंने कभी किसी नेता की जय-जयकार नहीं की, हमेशा उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि रहा। एक वाकिया ऐसा ही है जब लालकिले की सीढ़ियों से उतरते हुए नेहरू लड़खड़ा गए..तभी दिनकर ने उनको सहारा दिया।&nbsp; इसपर नेहरू ने कहा- शुक्रिया.., दिनकर तुरंत बोले-&#39;&#39;जब-जब राजनीति लड़खड़ाएगी, तब-तब साहित्य उसे सहारा देगा।&#39;&#39; उनके ये तेवर ताउम्र बरकरार रहे।


11 वर्षों की नौकरी में 23 बार हुआ था स्थानांतरण

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की राष्ट्रभक्ति ब्रिटिश हुकूमत को रास नहीं आती थी। 11 वर्षों की नौकरी में उनका 23 बार स्थानांतरण किया गया, पर उन्होंने अंग्रेजी अत्याचार के विरूद्ध लिखना नहीं छोड़ा। 23 सितंबर,1908 को&nbsp;बेगूसराय के सिमरिया गांव में जन्मे रामधारी सिंह दिनकर जब दो वर्ष के थे तब उनके पिता रवि सिंह का देहांत हो गया था। मां मनरूप देवी ने ही उनका पालन-पोषण किया। पटना कॉलेज से हिन्दी में स्नातक की डिग्री लेने के बाद 1928 में साइमन कमीशन के भारत आगमन के विरोध में गांधी मैदान में हुए आंदोलन में वे शामिल हो गए। इसके उपरांत वर्ष 1934 में उन्होंने पटना निबंधन कार्यालय में सब रजिस्ट्रार के पद पर सरकारी नौकरी शुरू कर दी।1945 तक उन्होंने यह नौकरी की। फिर 1945 में उन्हें प्रचार निदेशालय में उप निदेशक बना दिया गया। 1947 में देश की आजादी मिलने तक उन्होंने नौकरी की। इस बीच दिनकर ने जब वर्ष 1935 में जब &#39;रेणुका&#39; नामक कविता संग्रह की रचना की तो उनका तबादला पटना निबंधन कार्यालय से बाढ़ कार्यालय कर दिया गया। फिर वर्ष 1938 आया और उनका&nbsp;कविता संग्रह &#39;हुंकार&#39; प्रकाशित हुआ, तब फिर उनपर ब्रिटिश सरकार विरोधी होने के आरोप लगे और उनका तबादला नरकटियागंज कर दिया गया। जब-जब उनकी कोई नई पुस्तक प्रकाशित होती, उनका तबादला भी साथ-साथ होता रहता। पर दिनकर की कलम की धार कम नहीं हुई। द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होते ही ब्रिटिश हुकूमत की आँखों में दिनकर और ज्यादा अखरने लगे और&nbsp; उन्हें नौकरी छोड़ने को बाध्य किया जाने लगा। तब ब्रिटिश हुकूमत ने उनका तबादला 1945 में प्रचार विभाग में उप निदेशक के पद पर कर दिया। ब्रिटिश हुकूमत को उनसे शिकायत रहती थी कि उनकी रचनाओं से क्रांतिकारी आंदोलन को हवा मिलती थी, और ये सच भी था।
&nbsp;




&#39;उर्वशी&#39; के लिए मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार
दिनकर ने&nbsp; &#39;रेणुका&#39;, &#39;हुंकार&#39;, &#39;रसवंती&#39;, &#39;द्वंद्व गीत&#39;, &#39;कुरुक्षेत्र&#39;, &#39;धूपछांह&#39;, &#39;समधनी&#39;, &#39;बापू&#39; आदि महत्वपूर्ण कविता संग्रहों की रचना की थी। दिनकर को उनकी रचना &#39;उर्वशी&#39; के लिए 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1959 में भारत सरकार की ओर से पद्मभूषण सम्मान एवं 1959 में ही &#39;संस्कृति के चार अध्याय&#39; पुस्तक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ये उनकी तठस्तता ही थी कि उनको सत्ता का विरोध करने के बावजूद साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्मविभूषण आदि तमाम बड़े पुरस्कारों से नवाजा गया।
&nbsp;




&quot;सिंहासन खाली करो कि जनता आती है &quot;

सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है
&nbsp;
जनता ? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली
जब अँग-अँग में लगे साँप हो चूस रहे
तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली

जनता ? हाँ, लम्बी-बडी जीभ की वही कसम
&quot;जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।&quot;
&quot;सो ठीक, मगर, आखिर, इस पर जनमत क्या है ?&quot;
&#39;है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है ?&quot;

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में
अथवा कोई दूधमुँही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में

लेकिन होता भूडोल, बवण्डर उठते हैं
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अन्धकार
बीता; गवाक्ष अम्बर के दहके जाते हैं
यह और नहीं कोई, जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं

सब से विराट जनतन्त्र जगत का आ पहुँचा
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं, प्रजा का है
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो

आरती लिए तू किसे ढूँढ़ता है मूरख
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में ?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं
धूसरता सोने से शृँगार सजाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है


&quot;कलम, आज उनकी जय बोल &quot;

जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल


&quot; कृष्ण की चेतावनी &quot;

वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

&lsquo;दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशीष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
&lsquo;जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

&lsquo;उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

&lsquo;दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

&lsquo;शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

&lsquo;भूलोक, अतल, पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, इसमें कहाँ तू है।

&lsquo;अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

&lsquo;जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
छा जाता चारों ओर मरण।

&lsquo;बाँधने मुझे तो आया है,
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

&lsquo;हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

&lsquo;टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।

&lsquo;भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।&rsquo;

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित,
निर्भय, दोनों पुकारते थे &lsquo;जय-जय&rsquo;!


&rdquo; परशुराम की प्रतीक्षा &rdquo;

गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ?
शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?

उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,
तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था;
सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गये थे,
निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गये थे;

गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का;

सारी वसुन्धरा में गुरु-पद पाने को,
प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को
जो सन्त लोग सीधे पाताल चले थे,
(अच्छे हैं अबः; पहले भी बहुत भले थे।)

हम उसी धर्म की लाश यहाँ ढोते हैं,
शोणित से सन्तों का कलंक धोते हैं।


&rdquo; हमारे कृषक &rdquo;

जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है
छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है

मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है
वसन कहाँ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है

बैलों के ये बंधू वर्ष भर क्या जाने कैसे जीते हैं
बंधी जीभ, आँखें विषम गम खा शायद आँसू पीते हैं

पर शिशु का क्या, सीख न पाया अभी जो आँसू पीना
चूस-चूस सूखा स्तन माँ का, सो जाता रो-विलप नगीना

विवश देखती माँ आँचल से नन्ही तड़प उड़ जाती
अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज वज्र की छाती

कब्र-कब्र में अबोध बालकों की भूखी हड्डी रोती है
दूध-दूध की कदम-कदम पर सारी रात होती है

दूध-दूध औ वत्स मंदिरों में बहरे पाषान यहाँ है
दूध-दूध तारे बोलो इन बच्चों के भगवान कहाँ हैं

दूध-दूध गंगा तू ही अपनी पानी को दूध बना दे
दूध-दूध उफ कोई है तो इन भूखे मुर्दों को जरा मना दे

दूध-दूध दुनिया सोती है लाऊँ दूध कहाँ किस घर से
दूध-दूध हे देव गगन के कुछ बूँदें टपका अम्बर से

हटो व्योम के, मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं
दूध-दूध हे वत्स! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं


&rdquo; समर शेष है &rdquo;

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,
किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।

फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले !
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में ।

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा ।

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं।

कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे।

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो,
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो,
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे,
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे।

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर,
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर।

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं,
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं,
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है,
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है।

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल,
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल,

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना,
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना,
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे,
मंदिर औ&rsquo; मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे।

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">भारत का एक ऐसा कवि जिसे स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रकवि की ख्याति प्राप्त हुई। ऐसा कवि जिसकी कविताओं में एक ओर ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति। एक ऐसा कवि जो साहित्य का वह सशक्त हस्ताक्षर हैं जिसकी कलम में दिनकर यानी सूर्य के समान चमक थी। हम बात कर रहे है रामधारी सिंह दिनकर की। उनकी ही लिखी कविता &#39;परिचय&#39; की इन पंक्तियों से बेहतर भला उनका परिचय क्या हो सकता है &#39; मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का,चिता का धूलिकण हूँ , शार हूँ मैं ,पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी, समा जिसमें चूका सौ बार हूँ मैं &#39; 23 सितम्बर को राष्ट्रकवि दिनकर की जयंती होती है। पूरा देश अपने राष्ट्रकवि को याद करता है, नमन करता है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह &#39;दिनकर&#39; वो कवि है जिनकी रचनाओं&nbsp; में ओज, शौर्य, प्रेम और सौंदर्य सब एक साथ आकार पाते हैं। वे आंदोलित भी करते हैं और आह्लादित भी। वे &#39;परशुराम की प्रतीक्षा&#39; भी लिखते है और &#39;उर्वशी&#39; भी। दिनकर द्वंद्वात्मक ऐक्य के कवि हैं।&nbsp; उन्हें समय को साधने वाला कवि गया। पर दिनकर &lsquo;राष्ट्रकवि&rsquo; ही नहीं &#39;जनकवि&#39; भी थे। वे उन चंद कवियों में शुमार रहे है जिनके द्वारा लिखी गई पंक्तियाँ आज भी आम जनमानस द्वारा पढ़ी और दोहराई जाती है। दिनकर वो कवि थे जिन्होंने देश के क्रांतिकारी आंदोलन को अपनी कविता से स्वर दिया। दिनकर वो कवि थे जिनके द्वारा लिखी गई पंक्तियाँ &#39;सिंहासन खाली करो की जनता आती है&#39; आज भी देश के जान आंदोलनों की आवाज है। रामधारी सिंह दिनकर जितने सुगढ़ कवि थे, उतने ही सचेत गद्य लेखक भी रहे। आज़ादी के बाद वे पंडित नेहरू और सत्ता के क़रीब भी रहे, कांग्रेस ने उन्हे राज्यसभा भी भेजा लेकिन राष्ट्रकवि का दायित्व उन्होंने हमेशा निभाया। दिनकर सारी उम्र सियासत से लोहा लेते रहे। उन्होंने कभी किसी नेता की जय-जयकार नहीं की, हमेशा उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि रहा। एक वाकिया ऐसा ही है जब लालकिले की सीढ़ियों से उतरते हुए नेहरू लड़खड़ा गए..तभी दिनकर ने उनको सहारा दिया।&nbsp; इसपर नेहरू ने कहा- शुक्रिया.., दिनकर तुरंत बोले-&#39;&#39;जब-जब राजनीति लड़खड़ाएगी, तब-तब साहित्य उसे सहारा देगा।&#39;&#39; उनके ये तेवर ताउम्र बरकरार रहे।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>11 वर्षों की नौकरी में 23 बार हुआ था स्थानांतरण</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की राष्ट्रभक्ति ब्रिटिश हुकूमत को रास नहीं आती थी। 11 वर्षों की नौकरी में उनका 23 बार स्थानांतरण किया गया, पर उन्होंने अंग्रेजी अत्याचार के विरूद्ध लिखना नहीं छोड़ा। 23 सितंबर,1908 को&nbsp;बेगूसराय के सिमरिया गांव में जन्मे रामधारी सिंह दिनकर जब दो वर्ष के थे तब उनके पिता रवि सिंह का देहांत हो गया था। मां मनरूप देवी ने ही उनका पालन-पोषण किया। पटना कॉलेज से हिन्दी में स्नातक की डिग्री लेने के बाद 1928 में साइमन कमीशन के भारत आगमन के विरोध में गांधी मैदान में हुए आंदोलन में वे शामिल हो गए। इसके उपरांत वर्ष 1934 में उन्होंने पटना निबंधन कार्यालय में सब रजिस्ट्रार के पद पर सरकारी नौकरी शुरू कर दी।1945 तक उन्होंने यह नौकरी की। फिर 1945 में उन्हें प्रचार निदेशालय में उप निदेशक बना दिया गया। 1947 में देश की आजादी मिलने तक उन्होंने नौकरी की। इस बीच दिनकर ने जब वर्ष 1935 में जब &#39;रेणुका&#39; नामक कविता संग्रह की रचना की तो उनका तबादला पटना निबंधन कार्यालय से बाढ़ कार्यालय कर दिया गया। फिर वर्ष 1938 आया और उनका&nbsp;कविता संग्रह &#39;हुंकार&#39; प्रकाशित हुआ, तब फिर उनपर ब्रिटिश सरकार विरोधी होने के आरोप लगे और उनका तबादला नरकटियागंज कर दिया गया। जब-जब उनकी कोई नई पुस्तक प्रकाशित होती, उनका तबादला भी साथ-साथ होता रहता। पर दिनकर की कलम की धार कम नहीं हुई। द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होते ही ब्रिटिश हुकूमत की आँखों में दिनकर और ज्यादा अखरने लगे और&nbsp; उन्हें नौकरी छोड़ने को बाध्य किया जाने लगा। तब ब्रिटिश हुकूमत ने उनका तबादला 1945 में प्रचार विभाग में उप निदेशक के पद पर कर दिया। ब्रिटिश हुकूमत को उनसे शिकायत रहती थी कि उनकी रचनाओं से क्रांतिकारी आंदोलन को हवा मिलती थी, और ये सच भी था।</span><br />
&nbsp;</p>

<hr />
<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;"><strong>&#39;उर्वशी&#39; के लिए मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार<br />
दिनकर ने&nbsp; &#39;रेणुका&#39;, &#39;हुंकार&#39;, &#39;रसवंती&#39;, &#39;द्वंद्व गीत&#39;, &#39;कुरुक्षेत्र&#39;, &#39;धूपछांह&#39;, &#39;समधनी&#39;, &#39;बापू&#39; आदि महत्वपूर्ण कविता संग्रहों की रचना की थी। दिनकर को उनकी रचना &#39;उर्वशी&#39; के लिए 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1959 में भारत सरकार की ओर से पद्मभूषण सम्मान एवं 1959 में ही &#39;संस्कृति के चार अध्याय&#39; पुस्तक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ये उनकी तठस्तता ही थी कि उनको सत्ता का विरोध करने के बावजूद साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्मविभूषण आदि तमाम बड़े पुरस्कारों से नवाजा गया।</strong></span><br />
&nbsp;</p>
</blockquote>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;"><strong>&quot;सिंहासन खाली करो कि जनता आती है &quot;</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी<br />
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है<br />
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो<br />
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है<br />
&nbsp;<br />
जनता ? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही<br />
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली<br />
जब अँग-अँग में लगे साँप हो चूस रहे<br />
तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">जनता ? हाँ, लम्बी-बडी जीभ की वही कसम<br />
&quot;जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।&quot;<br />
&quot;सो ठीक, मगर, आखिर, इस पर जनमत क्या है ?&quot;<br />
&#39;है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है ?&quot;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं<br />
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में<br />
अथवा कोई दूधमुँही जिसे बहलाने के<br />
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">लेकिन होता भूडोल, बवण्डर उठते हैं<br />
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है<br />
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो<br />
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती<br />
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है<br />
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ ?<br />
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अन्धकार<br />
बीता; गवाक्ष अम्बर के दहके जाते हैं<br />
यह और नहीं कोई, जनता के स्वप्न अजय<br />
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">सब से विराट जनतन्त्र जगत का आ पहुँचा<br />
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो<br />
अभिषेक आज राजा का नहीं, प्रजा का है<br />
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">आरती लिए तू किसे ढूँढ़ता है मूरख<br />
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में ?<br />
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे<br />
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं<br />
धूसरता सोने से शृँगार सजाती है<br />
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो<br />
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है</span></strong></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&quot;कलम, आज उनकी जय बोल &quot;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">जला अस्थियाँ बारी-बारी<br />
चिटकाई जिनमें चिंगारी,<br />
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर<br />
लिए बिना गर्दन का मोल<br />
कलम, आज उनकी जय बोल।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">जो अगणित लघु दीप हमारे<br />
तूफानों में एक किनारे,<br />
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन<br />
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल<br />
कलम, आज उनकी जय बोल।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">पीकर जिनकी लाल शिखाएँ<br />
उगल रही सौ लपट दिशाएं,<br />
जिनके सिंहनाद से सहमी<br />
धरती रही अभी तक डोल<br />
कलम, आज उनकी जय बोल।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">अंधा चकाचौंध का मारा<br />
क्या जाने इतिहास बेचारा,<br />
साखी हैं उनकी महिमा के<br />
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल<br />
कलम, आज उनकी जय बोल</span></strong></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&quot; कृष्ण की चेतावनी &quot;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">वर्षों तक वन में घूम-घूम,<br />
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,<br />
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,<br />
पांडव आये कुछ और निखर।<br />
सौभाग्य न सब दिन सोता है,<br />
देखें, आगे क्या होता है।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">मैत्री की राह बताने को,<br />
सबको सुमार्ग पर लाने को,<br />
दुर्योधन को समझाने को,<br />
भीषण विध्वंस बचाने को,<br />
भगवान् हस्तिनापुर आये,<br />
पांडव का संदेशा लाये।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;दो न्याय अगर तो आधा दो,<br />
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,<br />
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,<br />
रक्खो अपनी धरती तमाम।<br />
हम वहीं खुशी से खायेंगे,<br />
परिजन पर असि न उठायेंगे!</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">दुर्योधन वह भी दे ना सका,<br />
आशीष समाज की ले न सका,<br />
उलटे, हरि को बाँधने चला,<br />
जो था असाध्य, साधने चला।<br />
जब नाश मनुज पर छाता है,<br />
पहले विवेक मर जाता है।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हरि ने भीषण हुंकार किया,<br />
अपना स्वरूप-विस्तार किया,<br />
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,<br />
भगवान् कुपित होकर बोले-<br />
&lsquo;जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,<br />
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">यह देख, गगन मुझमें लय है,<br />
यह देख, पवन मुझमें लय है,<br />
मुझमें विलीन झंकार सकल,<br />
मुझमें लय है संसार सकल।<br />
अमरत्व फूलता है मुझमें,<br />
संहार झूलता है मुझमें।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;उदयाचल मेरा दीप्त भाल,<br />
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,<br />
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,<br />
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।<br />
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,<br />
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,<br />
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,<br />
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,<br />
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।<br />
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,<br />
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,<br />
शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश,<br />
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,<br />
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।<br />
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,<br />
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;भूलोक, अतल, पाताल देख,<br />
गत और अनागत काल देख,<br />
यह देख जगत का आदि-सृजन,<br />
यह देख, महाभारत का रण,<br />
मृतकों से पटी हुई भू है,<br />
पहचान, इसमें कहाँ तू है।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;अम्बर में कुन्तल-जाल देख,<br />
पद के नीचे पाताल देख,<br />
मुट्ठी में तीनों काल देख,<br />
मेरा स्वरूप विकराल देख।<br />
सब जन्म मुझी से पाते हैं,<br />
फिर लौट मुझी में आते हैं।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,<br />
साँसों में पाता जन्म पवन,<br />
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,<br />
हँसने लगती है सृष्टि उधर!<br />
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,<br />
छा जाता चारों ओर मरण।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;बाँधने मुझे तो आया है,<br />
जंजीर बड़ी क्या लाया है?<br />
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,<br />
पहले तो बाँध अनन्त गगन।<br />
सूने को साध न सकता है,<br />
वह मुझे बाँध कब सकता है?</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;हित-वचन नहीं तूने माना,<br />
मैत्री का मूल्य न पहचाना,<br />
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,<br />
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।<br />
याचना नहीं, अब रण होगा,<br />
जीवन-जय या कि मरण होगा।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,<br />
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,<br />
फण शेषनाग का डोलेगा,<br />
विकराल काल मुँह खोलेगा।<br />
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।<br />
फिर कभी नहीं जैसा होगा।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&lsquo;भाई पर भाई टूटेंगे,<br />
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,<br />
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,<br />
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।<br />
आखिर तू भूशायी होगा,<br />
हिंसा का पर, दायी होगा।&rsquo;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">थी सभा सन्न, सब लोग डरे,<br />
चुप थे या थे बेहोश पड़े।<br />
केवल दो नर ना अघाते थे,<br />
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।<br />
कर जोड़ खड़े प्रमुदित,<br />
निर्भय, दोनों पुकारते थे &lsquo;जय-जय&rsquo;!</span></strong></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&rdquo; परशुराम की प्रतीक्षा &rdquo;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ?<br />
शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,<br />
तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था;<br />
सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गये थे,<br />
निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गये थे;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,<br />
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;<br />
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,<br />
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">सारी वसुन्धरा में गुरु-पद पाने को,<br />
प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को<br />
जो सन्त लोग सीधे पाताल चले थे,<br />
(अच्छे हैं अबः; पहले भी बहुत भले थे।)</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हम उसी धर्म की लाश यहाँ ढोते हैं,<br />
शोणित से सन्तों का कलंक धोते हैं।</span></strong></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&rdquo; हमारे कृषक &rdquo;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है<br />
छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है<br />
वसन कहाँ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">बैलों के ये बंधू वर्ष भर क्या जाने कैसे जीते हैं<br />
बंधी जीभ, आँखें विषम गम खा शायद आँसू पीते हैं</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">पर शिशु का क्या, सीख न पाया अभी जो आँसू पीना<br />
चूस-चूस सूखा स्तन माँ का, सो जाता रो-विलप नगीना</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">विवश देखती माँ आँचल से नन्ही तड़प उड़ जाती<br />
अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज वज्र की छाती</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">कब्र-कब्र में अबोध बालकों की भूखी हड्डी रोती है<br />
दूध-दूध की कदम-कदम पर सारी रात होती है</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">दूध-दूध औ वत्स मंदिरों में बहरे पाषान यहाँ है<br />
दूध-दूध तारे बोलो इन बच्चों के भगवान कहाँ हैं</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">दूध-दूध गंगा तू ही अपनी पानी को दूध बना दे<br />
दूध-दूध उफ कोई है तो इन भूखे मुर्दों को जरा मना दे</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">दूध-दूध दुनिया सोती है लाऊँ दूध कहाँ किस घर से<br />
दूध-दूध हे देव गगन के कुछ बूँदें टपका अम्बर से</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हटो व्योम के, मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं<br />
दूध-दूध हे वत्स! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं</span></strong></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&rdquo; समर शेष है &rdquo;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,<br />
किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?<br />
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से,<br />
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?<br />
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले !<br />
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!<br />
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,<br />
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,<br />
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है<br />
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है<br />
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है<br />
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज<br />
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?<br />
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?<br />
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?<br />
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में ।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा<br />
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा ।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा<br />
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा<br />
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं<br />
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे<br />
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो,<br />
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो,<br />
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे,<br />
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर,<br />
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं,<br />
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं,<br />
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है,<br />
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल,<br />
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल,</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना,<br />
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना,<br />
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे,<br />
मंदिर औ&rsquo; मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,<br />
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।</span></strong></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall14581.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[I know I will call you soil, in which I have gone a hundred times]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/-1626170573]]></guid>
                       <title><![CDATA[पढ़िए 'बारिश' पर कहे शायरों के ये अल्फ़ाज़ ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/-1626170573]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 13 Jul 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
मौसम-ए-इश्क़ है तू एक कहानी बन के आ,
मेरे रूह को भिगो दें जो तू वो पानी बन के आ! ?

&nbsp;

ए बादल इतना बरस की नफ़रतें धुल जायें,
इंसानियत तरस गयी है प्यार पाने के लिये..!!

&nbsp;

सुना है बहुत बारिश है तुम्हारे शहर में,
ज्यादा भीगना मत,
अगर धूल गई सारी ग़लतफहमियां,
तो फिर बहुत याद आएंगे हम!!

&nbsp;

कल उसकी याद पूरी रात आती रही,
हम जागे पूरी दुनिया सोती रही,
आसमान में बिजली पूरी रात होती रही,
बस एक बारिश थी जो मेरे साथ रोती रही!

&nbsp;

खुद भी रोता है,
मुझे भी रुला के जाता है,
ये बारिश का मौसम,
उसकी याद दिला के जाता है।

&nbsp;

आज मौसम कितना खुश गंवार हो गया,
खत्म सभी का इंतज़ार हो गया,
बारिश की बूंदे गिरी कुछ इस तरह से,
लगा जैसे आसमान को ज़मीन से प्यार हो गया!

&nbsp;

बादलों से कह दो,
जरा सोच समझ के बरसे,
अगर हमें उसकी याद आ गई,
तो मुकाबला बराबरी का होगा!&nbsp;

&nbsp;

याद आई वो पहली बारिश,
जब तुझे एक नज़र देखा था!

]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;"><strong><span style="font-size:18px;">मौसम-ए-इश्क़ है तू एक कहानी बन के आ,<br />
मेरे रूह को भिगो दें जो तू वो पानी बन के आ! ?</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;"><strong><span style="font-size:18px;">ए बादल इतना बरस की नफ़रतें धुल जायें,<br />
इंसानियत तरस गयी है प्यार पाने के लिये..!!</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;"><strong><span style="font-size:18px;">सुना है बहुत बारिश है तुम्हारे शहर में,<br />
ज्यादा भीगना मत,<br />
अगर धूल गई सारी ग़लतफहमियां,<br />
तो फिर बहुत याद आएंगे हम!!</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;"><strong><span style="font-size:18px;">कल उसकी याद पूरी रात आती रही,<br />
हम जागे पूरी दुनिया सोती रही,<br />
आसमान में बिजली पूरी रात होती रही,<br />
बस एक बारिश थी जो मेरे साथ रोती रही!</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;"><strong><span style="font-size:18px;">खुद भी रोता है,<br />
मुझे भी रुला के जाता है,<br />
ये बारिश का मौसम,<br />
उसकी याद दिला के जाता है।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;"><strong><span style="font-size:18px;">आज मौसम कितना खुश गंवार हो गया,<br />
खत्म सभी का इंतज़ार हो गया,<br />
बारिश की बूंदे गिरी कुछ इस तरह से,<br />
लगा जैसे आसमान को ज़मीन से प्यार हो गया!</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;"><strong><span style="font-size:18px;">बादलों से कह दो,<br />
जरा सोच समझ के बरसे,<br />
अगर हमें उसकी याद आ गई,<br />
तो मुकाबला बराबरी का होगा!&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify; margin-left: 40px;"><strong><span style="font-size:18px;">याद आई वो पहली बारिश,<br />
जब तुझे एक नज़र देखा था!</span></strong></p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall12045.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/today-the-birth-anniversary-of-the-great-saint-kabir-das-read-some-of-his-special-couplets]]></guid>
                       <title><![CDATA[महान संत कबीर दास की जयंती आज, पढ़िए उनके कुछ खास  दोहे ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/today-the-birth-anniversary-of-the-great-saint-kabir-das-read-some-of-his-special-couplets]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 24 Jun 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[आज महान संत कबीर दास की जयंती है। हर साल प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास में पूर्णिमा तिथि को उनकी जयंती मनाई जाती है।&nbsp;संत कबीरदास भक्तिकाल के महान कवि रहे हैं, जो जीवन समाज को सुधारने के लिए समर्पित रहे हैं।&nbsp;माना जाता है कि कबीर दास का जन्म सन् 1398 में हुआ था और&nbsp; इनकी मृत्यु सन् 1518 में मगहर में हुई। कबीर दास ने समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में अपना जीवन लोगों के लिए समर्पित कर दिया। कबीरदास जी के दोहे बहुत सुंदर और सजीव हैं, उनकी रचनाएं जीवन के सत्य को प्रदर्शित करती हैं। कबीर दास ने समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में अपना जीवन लोगों के लिए समर्पित कर दिया। भक्तिकाल के कवि संत कबीरदास की रचनाओं में भगवान की भक्ति का रस मिलता है। पढ़िए कबीर दास के दोहे&nbsp;


सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज ।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए ।।&nbsp;

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये ।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।।&nbsp;

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।
जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ।।&nbsp;

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए।
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए ।।&nbsp;

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना।&nbsp;
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।&nbsp;
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।&nbsp;

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।&nbsp;&nbsp;
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।।&nbsp;

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।&nbsp;

]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">आज महान संत कबीर दास की जयंती है। हर साल प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास में पूर्णिमा तिथि को उनकी जयंती मनाई जाती है।&nbsp;संत कबीरदास भक्तिकाल के महान कवि रहे हैं, जो जीवन समाज को सुधारने के लिए समर्पित रहे हैं।&nbsp;माना जाता है कि कबीर दास का जन्म सन् 1398 में हुआ था और&nbsp; इनकी मृत्यु सन् 1518 में मगहर में हुई। कबीर दास ने समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में अपना जीवन लोगों के लिए समर्पित कर दिया। कबीरदास जी के दोहे बहुत सुंदर और सजीव हैं, उनकी रचनाएं जीवन के सत्य को प्रदर्शित करती हैं। कबीर दास ने समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में अपना जीवन लोगों के लिए समर्पित कर दिया। भक्तिकाल के कवि संत कबीरदास की रचनाओं में भगवान की भक्ति का रस मिलता है। पढ़िए कबीर दास के दोहे&nbsp;</span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज ।<br />
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए ।।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये ।<br />
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।<br />
जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ।।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए।<br />
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए ।।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना।&nbsp;<br />
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।&nbsp;<br />
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।&nbsp;&nbsp;<br />
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।<br />
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।&nbsp;</span></strong></p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall11461.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Today, the birth anniversary of the great saint Kabir Das, read some of his special couplets]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/june-2021-19-update]]></guid>
                       <title><![CDATA[ये शेर तो सुना होगा ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/june-2021-19-update]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 19 Jun 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[हिंदी और उर्दू साहित्य में बड़े से बड़े कवियों और शायरों ने इश्क, दुनिया, दोस्ती, असबाब, गम, बेवफाई, रुसवाई सहित कई पहलुओं पर अपनी कविताएं और शायरी लिखी हैं। पेश है 20 बड़े शायरों के 20 बड़े शेर ।


1.दर्द को दिल में जगह दो अकबर&nbsp;

&nbsp; &nbsp;इल्म से शायरी नहीं होती&nbsp;

&nbsp; -अकबर इलाहाबादी&nbsp;

2. नाजुकी उन लबों की क्या कहिए

&nbsp; &nbsp; पंखुड़ी एक गुलाब की सी है&nbsp;

&nbsp; &nbsp;मीर उन नीमबाज आंखों में&nbsp;

&nbsp; &nbsp;सारी मस्ती शराब की सी है&nbsp;

&nbsp; -मीर

3. कितना है बदनसीब जफर दफ्न के लिए&nbsp;

&nbsp; &nbsp;दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में&nbsp;

&nbsp; &nbsp;-जफर&nbsp;

4. ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम है

&nbsp; &nbsp; मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं

&nbsp; &nbsp;-नासिख लखनवी

5. लोग टूट जाते हैं एक घर के बनाने में,

&nbsp; तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में.

-बशीर बद्र&nbsp;

6. कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊंगा&nbsp;

मैं तो दरिया हूं समन्दर में उतर जाऊंगा

-अहमद नदीम क़ासमी

7. ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है.

-अल्लामा इकबाल

8. ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजै

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

-जिगर मुरादाबादी

9. यहां लिबास की कीमत है आदमी की नहीं

मुझे गिलास बड़ा दे, शराब कम कर दे

-बशीर बद्र

10. हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले&nbsp;

&nbsp; &nbsp; बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले&nbsp;

&nbsp; &nbsp;-मिर्ज़ा गालिब

11. और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp; -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

12. हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp;दिल के ख़ुश रखने को &#39;ग़ालिब&#39; ये ख़याल अच्छा है&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp;-मिर्ज़ा ग़ालिब

13. हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp;वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती

&nbsp; &nbsp; &nbsp; -अकबर इलाहाबादी

14. मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp;लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp; -मजरूह सुल्तानपुरी

15. कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp; कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp;-निदा फ़ाज़ली

16. ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp;लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp; -मुज़फ़्फ़र रज़्मी

17. अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp; -दिवाकर राही

18. बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता

&nbsp; &nbsp; &nbsp;जो बीत गया है वो गुजर क्यों नहीं जाता&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp;-निदा फाजली&nbsp;

19. कहां तो तै था चिरागां हरेक घर के लिए

&nbsp; &nbsp; &nbsp; कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp;-दुष्यंत कुमार

20. वसीम सदियों की आंखों से देखिए मुझको

&nbsp; &nbsp; &nbsp; वो लफ्ज हूं जो कभी दास्तां नहीं होता&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;-वसीम बरेलवी

]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="font-size:18px;">हिंदी और उर्दू साहित्य में बड़े से बड़े कवियों और शायरों ने इश्क, दुनिया, दोस्ती, असबाब, गम, बेवफाई, रुसवाई सहित कई पहलुओं पर अपनी कविताएं और शायरी लिखी हैं। पेश है 20 बड़े शायरों के 20 बड़े शेर ।</span></strong></p>

<blockquote>
<p><strong><span style="font-size:18px;">1.दर्द को दिल में जगह दो अकबर&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;इल्म से शायरी नहीं होती&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; -अकबर इलाहाबादी&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">2. नाजुकी उन लबों की क्या कहिए</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; पंखुड़ी एक गुलाब की सी है&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;मीर उन नीमबाज आंखों में&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;सारी मस्ती शराब की सी है&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; -मीर</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">3. कितना है बदनसीब जफर दफ्न के लिए&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;-जफर&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">4. ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम है</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;-नासिख लखनवी</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">5. लोग टूट जाते हैं एक घर के बनाने में,</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में.</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">-बशीर बद्र&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">6. कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊंगा&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">मैं तो दरिया हूं समन्दर में उतर जाऊंगा</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">-अहमद नदीम क़ासमी</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">7. ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है.</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">-अल्लामा इकबाल</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">8. ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजै</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">इक आग का दरिया है और डूब के जाना है</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">-जिगर मुरादाबादी</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">9. यहां लिबास की कीमत है आदमी की नहीं</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">मुझे गिलास बड़ा दे, शराब कम कर दे</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">-बशीर बद्र</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">10. हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;-मिर्ज़ा गालिब</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">11. और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">12. हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;दिल के ख़ुश रखने को &#39;ग़ालिब&#39; ये ख़याल अच्छा है&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;-मिर्ज़ा ग़ालिब</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">13. हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; -अकबर इलाहाबादी</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">14. मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; -मजरूह सुल्तानपुरी</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">15. कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;-निदा फ़ाज़ली</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">16. ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; -मुज़फ़्फ़र रज़्मी</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">17. अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; -दिवाकर राही</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">18. बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;जो बीत गया है वो गुजर क्यों नहीं जाता&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;-निदा फाजली&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">19. कहां तो तै था चिरागां हरेक घर के लिए</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;-दुष्यंत कुमार</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">20. वसीम सदियों की आंखों से देखिए मुझको</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; वो लफ्ज हूं जो कभी दास्तां नहीं होता&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;-वसीम बरेलवी</span></strong></p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall11265.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[june-2021-19-update]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/news/kavya-rath/the-pain-of-partition-broken-in-literature-india-1947-may-24-2021]]></guid>
                       <title><![CDATA[साहित्य में सिमटा विभाजन का दर्द]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/news/kavya-rath/the-pain-of-partition-broken-in-literature-india-1947-may-24-2021]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 24 May 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[हिंदुस्तान की स्वतंत्रता को करीब 74 वर्ष बीत चुके है और इतना ही वक्त बीत चुका है देश के बंटवारे को। बंटवारे की टीस वक़्त के साथ धुंधली ज़रूर हो सकती हैं, मगर इसे दबा पाना मुमकिन नहीं। देश की हवा में मिट्टी की खुशबू के साथ एक गंध भी उठती है, उन सभी शवों की जिन्हें कोई जलाने, दफ़नाने वाला भी नहीं मिला था। अंग्रेज़ों की कूटनीति ने हमारे मुल्क़ को दो हिस्सों में बाँट कर रख दिया। बंटवारे की त्रासदी में कितने ही लोग बेघर हुए और कितने ही परिवारों के चिराग बुझ गए। उस दर्द की कल्पना भी कर पाना भी मुश्किल है। मगर इसे बेहद करीब से छुआ जा सकता है, उस समय का दर्द बयां करते कुछ साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़ कर।


अमृता प्रीतम ने &#39;पिंजर&#39; में उकेरा है विभाजन का दर्द 

जहां बेहतरीन लेखन और स्वतंत्रता की बात हो, वहां अमृता प्रीतम का नाम आना भी लाज़मी है। विद्रोही समझ वाली अमृता, न केवल महिलाओं के लिए बोला करती थी, बल्क़ि बेहतरीन, स्वतंत्र समझ का उदाहरण भी थी। अमृता के कई उपन्यासों में विभाजन का दर्द दिखाई देता है, जिनमें से एक है &#39;पिंजर &#39;। यूँ तो विभाजन पर कई उपन्यास लिखे गए हैं, परन्तु आज तक लिखे गए सभी उपन्यासों में पिंजर का अपना विशिष्ठ स्थान है। 1947 में हुए विभाजन का दर्द, अमृता ने अपने इस उपन्यास के ज़रिये 1950 के आसपास लिखा। अमृता के इस उपन्यास का अहम किरदार है &#39;पुरो&#39; जो एक हिन्दू परिवार में जन्म लेती है, परन्तु पारिवारिक रंजिश के चलते, एक मुस्लमान शेख द्वारा, ज़बरदस्ती विवाह सम्बन्ध में बांधी जाती है। इस उपन्यास में अमृता बात करती हैं एक ऐसे गांव की जहां मुसलमानों की आबादी हिन्दू आबादी से कहीं ज़्यादा है और दंगों के चलते सभी हिन्दू एक हवेली में छुप गए, जो भी हिन्दू बाहर आता वह मार दिया जाता था। अमृता लिखती हैं एक रात जब हिन्दू मिलिट्री के ट्रक गाँव में आए तो लोगों ने हवेली में आग लगा दी। मिलिट्री ने आग बुझा कर लोगों को बाहर निकाला। आधे जले हुए तीन आदमी भी निकाले गए, जिनके शरीर से चर्बी बह रही थी, जिनका मांस जलकर हड्डियों से अलग-अलग लटक गया था। कोहनियों और घुटनों पर से जिनका पिंजर बाहर निकल आया था। लोगों के लारियों में बैठते-बैठते उन तीनों ने जान निकाल दी। उन तीनों की लाशों को वही फेंककर लारियाँ चल दीं। उनके घर वाले चीखते-चिल्लाते रह गए, पर मिलिट्री के पास उन्हें जलाने-फूंकने का समय नहीं था। इस सिक्के के दूसरे पहलू पर भी रोशनी डालते हुए अमृता लिखती हैं कि कुछ शहरों में सीमाएं बना दी गई थी जिनकी एक ओर हिन्दू और दूसरी ओर सभी मुसलमान थे। दूसरी ओर से मुसलमान मरते कटते चले आ रहे थे, कुछ वहीँ मार दिए गए और कुछ रास्ते में मारे गए।


मोहन राकेश ने सुनाई बिछड़े अपनों की दास्ताँ&nbsp;

साहित्यकार मोहन राकेश अपने उपन्यास &#39;मलबे का मालिक&#39; में भी ऐसा ही कुछ दर्द बयां करते नज़र आए जिसमें कहानी के मुख्य किरदार &#39;गनी मियां&#39; दंगों के समय पाकिस्तान चले जाते हैं और उनके बेटे बहु और दो पोतियां यहीं हिंदुस्तान में रह जाते हैं। विभाजन के 7 साल बाद, जब दोनों देशों में आवाजाही के साधन खुलते हैं, तो हॉकी का मैच देखने के बहाने गनी मियां अमृतसर (भारत) आते हैं, इस आस में कि अपने पुराने घर परिवार को फिर देख सकेंगे, परन्तु यहां आ कर उन्हें पता चलता है कि उनके परिवार की 7 साल पहले ही हत्या हो चुकी है।&nbsp;&nbsp;


पियूष मिश्रा ने &#39;हुस्ना&#39; (नाटक) में किया अधूरी मोहब्बत का ज़िक्र&nbsp;

बंटवारे के समय हुई ऐसी कई घटनाओं का, कई परिवारों का दर्द साहित्य आज भी ज़िंदा रखे हुए है।&nbsp; पियूष मिश्रा ने एक नाटक किआ है, &#39;हुस्ना&#39;। पियूष मिश्रा ने न केवल इसे लिखा, बल्क़ि मंच पर बखूबी इसे निभाया भी। इस नाटक में दो मुल्क़ों के बंटवारे में कभी न बँट पाने वाली मोहब्बत की कहानी है। इसमें हिंदुस्तान में रहने वाले प्रेमी का खत है, जो की उसकी विभाजन के बाद सेपाकिस्तान में रह रही प्रेमिका के नाम है। खत को गाने के रूप में पेश किया गया है जिसके बोल हैं,


&quot;लाहौर के उस जिले के दो परांगना में पहुंचे ,
रेशमी गली के दूजे कूचे के चौथे मकां में पहुंचे,
और कहते हैं जिसको दूजा मुल्क़ उस पाकिस्तान में पहुंचे,&quot;

गाने की इन पंक्तियों में लेखक खुद के पाकिस्तान में होने की कल्पना करते हैं व कहते हैं&nbsp;&nbsp;
&quot;मुझे लगता है में लाहौर के पहले जिले के दुसरे राज्य में हूँ।&quot;

इसी गाने में पियूष मिश्रा ने दोनों मुल्क़ों की समानताओं की ओर इशारा करते हुए यह भी लिखा की

&quot;पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्तान में, वैसे ही जैसे झड़ते हैं यहाँ ओ हुस्ना,
होता क्या उजाला वहां वैसा ही, जैसा होता है हिन्दोस्तान में हाँ ओ हुस्ना।&quot;



जॉन ऐलिया का फ़ारेहा के नाम संदेश&nbsp;

सवाल है जो दर्द इधर हिन्दुस्तान में है क्या वही दर्द वहां दूसरी ओर भी उठता है? इसे समझने के लिए पाकिस्तानी लेखकों की रचनाओं पर भी रोशनी डालना ज़रूरी है। पाकिस्तान के मशहूर लेखक जॉन ऐलिया की ही बात करें तो, जॉन का जन्म 1931 में अमरोहा (भारत) में हुआ और विभाजन के समय वह पाकिस्तान चले गए। जॉन की कई ग़ज़लें उनकी बचपन की मोहब्बत &#39;फ़ारेहा&#39; के नाम हैं। फ़ारेहा हिंदुस्तान में रहा करती थीं और कहा जाता है विभाजन के बाद जॉन का फ़ारेहा से मिलना कभी नहीं हुआ। मगर जॉन की लिखी एक ग़ज़ल &#39;फ़ारेहा&#39; में उनका दर्द पढ़ा जा सकता है।


&quot; सारी बातें भूल जाना फ़ारेहा, था सब कुछ वो इक फ़साना फ़ारेहा,
&nbsp; हाँ मोहब्बत एक धोखा ही तो थी, अब कभी धोखा न खाना फ़ारेहा &quot;


इन पंक्तियों में जॉन अपनी बचपन की मोहब्बत फ़ारेहा से, सब कुछ भूल जाने को कहते हैं, क्योंकि वह जानते हैं के दो मुल्क़ों के बीच खिंच चुकी इस लकीर को मिटा पाना, और इस मोहब्बत को अनजाम देना भी अब मुमकिन नही। विभाजन से किसी का घर टूटा तो किसी का दिल, किसी के अपने बिछड़े तो किसी के अपने ही पराए हो गए। इस नुकसान की भरपाई तो अब की नहीं जा सकती, पर इस बात को नकारा भी नहीं जा सकता कि नुकसान दोनों ओर बराबर रहा होगा।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हिंदुस्तान की स्वतंत्रता को करीब 74 वर्ष बीत चुके है और इतना ही वक्त बीत चुका है देश के बंटवारे को। बंटवारे की टीस वक़्त के साथ धुंधली ज़रूर हो सकती हैं, मगर इसे दबा पाना मुमकिन नहीं। देश की हवा में मिट्टी की खुशबू के साथ एक गंध भी उठती है, उन सभी शवों की जिन्हें कोई जलाने, दफ़नाने वाला भी नहीं मिला था। अंग्रेज़ों की कूटनीति ने हमारे मुल्क़ को दो हिस्सों में बाँट कर रख दिया। बंटवारे की त्रासदी में कितने ही लोग बेघर हुए और कितने ही परिवारों के चिराग बुझ गए। उस दर्द की कल्पना भी कर पाना भी मुश्किल है। मगर इसे बेहद करीब से छुआ जा सकता है, उस समय का दर्द बयां करते कुछ साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़ कर।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>अमृता प्रीतम ने &#39;पिंजर&#39; में उकेरा है विभाजन का दर्द </strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जहां बेहतरीन लेखन और स्वतंत्रता की बात हो, वहां अमृता प्रीतम का नाम आना भी लाज़मी है। विद्रोही समझ वाली अमृता, न केवल महिलाओं के लिए बोला करती थी, बल्क़ि बेहतरीन, स्वतंत्र समझ का उदाहरण भी थी। अमृता के कई उपन्यासों में विभाजन का दर्द दिखाई देता है, जिनमें से एक है &#39;पिंजर &#39;। यूँ तो विभाजन पर कई उपन्यास लिखे गए हैं, परन्तु आज तक लिखे गए सभी उपन्यासों में पिंजर का अपना विशिष्ठ स्थान है। 1947 में हुए विभाजन का दर्द, अमृता ने अपने इस उपन्यास के ज़रिये 1950 के आसपास लिखा। अमृता के इस उपन्यास का अहम किरदार है &#39;पुरो&#39; जो एक हिन्दू परिवार में जन्म लेती है, परन्तु पारिवारिक रंजिश के चलते, एक मुस्लमान शेख द्वारा, ज़बरदस्ती विवाह सम्बन्ध में बांधी जाती है। इस उपन्यास में अमृता बात करती हैं एक ऐसे गांव की जहां मुसलमानों की आबादी हिन्दू आबादी से कहीं ज़्यादा है और दंगों के चलते सभी हिन्दू एक हवेली में छुप गए, जो भी हिन्दू बाहर आता वह मार दिया जाता था। अमृता लिखती हैं एक रात जब हिन्दू मिलिट्री के ट्रक गाँव में आए तो लोगों ने हवेली में आग लगा दी। मिलिट्री ने आग बुझा कर लोगों को बाहर निकाला। आधे जले हुए तीन आदमी भी निकाले गए, जिनके शरीर से चर्बी बह रही थी, जिनका मांस जलकर हड्डियों से अलग-अलग लटक गया था। कोहनियों और घुटनों पर से जिनका पिंजर बाहर निकल आया था। लोगों के लारियों में बैठते-बैठते उन तीनों ने जान निकाल दी। उन तीनों की लाशों को वही फेंककर लारियाँ चल दीं। उनके घर वाले चीखते-चिल्लाते रह गए, पर मिलिट्री के पास उन्हें जलाने-फूंकने का समय नहीं था। इस सिक्के के दूसरे पहलू पर भी रोशनी डालते हुए अमृता लिखती हैं कि कुछ शहरों में सीमाएं बना दी गई थी जिनकी एक ओर हिन्दू और दूसरी ओर सभी मुसलमान थे। दूसरी ओर से मुसलमान मरते कटते चले आ रहे थे, कुछ वहीँ मार दिए गए और कुछ रास्ते में मारे गए।</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 18px;">मोहन राकेश ने सुनाई बिछड़े अपनों की दास्ताँ&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">साहित्यकार मोहन राकेश अपने उपन्यास &#39;मलबे का मालिक&#39; में भी ऐसा ही कुछ दर्द बयां करते नज़र आए जिसमें कहानी के मुख्य किरदार &#39;गनी मियां&#39; दंगों के समय पाकिस्तान चले जाते हैं और उनके बेटे बहु और दो पोतियां यहीं हिंदुस्तान में रह जाते हैं। विभाजन के 7 साल बाद, जब दोनों देशों में आवाजाही के साधन खुलते हैं, तो हॉकी का मैच देखने के बहाने गनी मियां अमृतसर (भारत) आते हैं, इस आस में कि अपने पुराने घर परिवार को फिर देख सकेंगे, परन्तु यहां आ कर उन्हें पता चलता है कि उनके परिवार की 7 साल पहले ही हत्या हो चुकी है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 18px;">पियूष मिश्रा ने &#39;हुस्ना&#39; (नाटक) में किया अधूरी मोहब्बत का ज़िक्र&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बंटवारे के समय हुई ऐसी कई घटनाओं का, कई परिवारों का दर्द साहित्य आज भी ज़िंदा रखे हुए है।&nbsp; पियूष मिश्रा ने एक नाटक किआ है, &#39;हुस्ना&#39;। पियूष मिश्रा ने न केवल इसे लिखा, बल्क़ि मंच पर बखूबी इसे निभाया भी। इस नाटक में दो मुल्क़ों के बंटवारे में कभी न बँट पाने वाली मोहब्बत की कहानी है। इसमें हिंदुस्तान में रहने वाले प्रेमी का खत है, जो की उसकी विभाजन के बाद सेपाकिस्तान में रह रही प्रेमिका के नाम है। खत को गाने के रूप में पेश किया गया है जिसके बोल हैं,</span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&quot;लाहौर के उस जिले के दो परांगना में पहुंचे ,<br />
रेशमी गली के दूजे कूचे के चौथे मकां में पहुंचे,<br />
और कहते हैं जिसको दूजा मुल्क़ उस पाकिस्तान में पहुंचे,&quot;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">गाने की इन पंक्तियों में लेखक खुद के पाकिस्तान में होने की कल्पना करते हैं व कहते हैं&nbsp;&nbsp;<br />
&quot;मुझे लगता है में लाहौर के पहले जिले के दुसरे राज्य में हूँ।&quot;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">इसी गाने में पियूष मिश्रा ने दोनों मुल्क़ों की समानताओं की ओर इशारा करते हुए यह भी लिखा की</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&quot;पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्तान में, वैसे ही जैसे झड़ते हैं यहाँ ओ हुस्ना,<br />
होता क्या उजाला वहां वैसा ही, जैसा होता है हिन्दोस्तान में हाँ ओ हुस्ना।&quot;</span></strong></p>
</blockquote>

<hr />
<p style="text-align: justify;"><strong style="font-size: 18px;">जॉन ऐलिया का फ़ारेहा के नाम संदेश&nbsp;</strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">सवाल है जो दर्द इधर हिन्दुस्तान में है क्या वही दर्द वहां दूसरी ओर भी उठता है? इसे समझने के लिए पाकिस्तानी लेखकों की रचनाओं पर भी रोशनी डालना ज़रूरी है। पाकिस्तान के मशहूर लेखक जॉन ऐलिया की ही बात करें तो, जॉन का जन्म 1931 में अमरोहा (भारत) में हुआ और विभाजन के समय वह पाकिस्तान चले गए। जॉन की कई ग़ज़लें उनकी बचपन की मोहब्बत &#39;फ़ारेहा&#39; के नाम हैं। फ़ारेहा हिंदुस्तान में रहा करती थीं और कहा जाता है विभाजन के बाद जॉन का फ़ारेहा से मिलना कभी नहीं हुआ। मगर जॉन की लिखी एक ग़ज़ल &#39;फ़ारेहा&#39; में उनका दर्द पढ़ा जा सकता है।</span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&quot; सारी बातें भूल जाना फ़ारेहा, था सब कुछ वो इक फ़साना फ़ारेहा,<br />
&nbsp; हाँ मोहब्बत एक धोखा ही तो थी, अब कभी धोखा न खाना फ़ारेहा &quot;</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इन पंक्तियों में जॉन अपनी बचपन की मोहब्बत फ़ारेहा से, सब कुछ भूल जाने को कहते हैं, क्योंकि वह जानते हैं के दो मुल्क़ों के बीच खिंच चुकी इस लकीर को मिटा पाना, और इस मोहब्बत को अनजाम देना भी अब मुमकिन नही। विभाजन से किसी का घर टूटा तो किसी का दिल, किसी के अपने बिछड़े तो किसी के अपने ही पराए हो गए। इस नुकसान की भरपाई तो अब की नहीं जा सकती, पर इस बात को नकारा भी नहीं जा सकता कि नुकसान दोनों ओर बराबर रहा होगा।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall10618.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[The-pain-of-partition-broken-in-literature-india-1947-may-24-2021]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/gulzar-nazam-12-april]]></guid>
                       <title><![CDATA[किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से: गुलज़ार ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/gulzar-nazam-12-april]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 12 Apr 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
बस तेरा नाम ही मुकम्ल है ,
इससे बेहतर भी नज़म क्या होगी।&nbsp;


ऐसे शब्दों की जादूगरी सिर्फ गुलज़ार ही कर सकते है। गुलज़ार का जन्म 18 अगस्त 1936 को भारत के झेलम जिला पंजाब के दीना गाँव में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है। जिसे ये बटवारे के बाद छोर आए। बंटवारे के बाद उनका परिवार अमृतसर में आकर बस गया। वहीं से गुलज़ार साहब मुंबई चले गए। वर्ली के एक गेरेज में वे बतौर मेकेनिक काम करने लगे और खाली समय में कविताएं लिखने लगे। फ़िल्म इंडस्ट्री में उन्होंने बिमल राय, हृषिकेश मुख़र्जी और हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर काम शुरू किया। बिमल राय की फ़िल्म बन्दिनी के लिए गुलज़ार ने अपना पहला गीत लिखा। गुलज़ार एक ऐसे लेखक है जिन्होंने हर पीढ़ी से अपना नाता जोड़ा है। गुलज़ार साहब के हर फ़न ने सभी का दिल जीता है, चाहे वो बड़ा पर्दा हो या छोटा, या फिर मन का असीम पर्दा। हर पर्दे पर इनकी दास्ताँ लोगों के दिलों में घर कर गई।&nbsp;पढ़िए गुलज़ार साहब की एक खास नज़्म.......

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से

बड़ी हसरत से तकती है

महीनों अब मुलाकातें नहीं होती

जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं

अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर 

बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें

उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है

जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके

जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं

कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है

कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं

बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़

जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते

जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का

अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है

किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है

कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे

कभी गोदी में लेते थे

कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर

नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी

मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल

और महके हुए रुक्के

किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे

उनका क्या होगा वो शायद अब नही होंगे!!
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>बस तेरा नाम ही मुकम्ल है ,<br />
इससे बेहतर भी नज़म क्या होगी।&nbsp;</strong></span></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:16px;">ऐसे शब्दों की जादूगरी सिर्फ गुलज़ार ही कर सकते है। गुलज़ार का जन्म 18 अगस्त 1936 को भारत के झेलम जिला पंजाब के दीना गाँव में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है। जिसे ये बटवारे के बाद छोर आए। बंटवारे के बाद उनका परिवार अमृतसर में आकर बस गया। वहीं से गुलज़ार साहब मुंबई चले गए। वर्ली के एक गेरेज में वे बतौर मेकेनिक काम करने लगे और खाली समय में कविताएं लिखने लगे। फ़िल्म इंडस्ट्री में उन्होंने बिमल राय, हृषिकेश मुख़र्जी और हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर काम शुरू किया। बिमल राय की फ़िल्म बन्दिनी के लिए गुलज़ार ने अपना पहला गीत लिखा। गुलज़ार एक ऐसे लेखक है जिन्होंने हर पीढ़ी से अपना नाता जोड़ा है। गुलज़ार साहब के हर फ़न ने सभी का दिल जीता है, चाहे वो बड़ा पर्दा हो या छोटा, या फिर मन का असीम पर्दा। हर पर्दे पर इनकी दास्ताँ लोगों के दिलों में घर कर गई।&nbsp;पढ़िए गुलज़ार साहब की एक खास नज़्म.......</span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से</strong></span></p>

<p><strong style="font-size: 16px;">बड़ी हसरत से तकती है</strong></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>महीनों अब मुलाकातें नहीं होती</strong></span></p>

<p><strong style="font-size: 16px;">जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं</strong></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर </strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें</strong></span></p>

<p><strong style="font-size: 16px;">उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है</strong></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके</strong></span></p>

<p><strong style="font-size: 16px;">जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं</strong></p>

<p><strong style="font-size: 16px;">कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है</strong></p>

<p><strong style="font-size: 16px;">कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं</strong></p>

<p><strong style="font-size: 16px;">बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़</strong></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>कभी गोदी में लेते थे</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>और महके हुए रुक्के</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे</strong></span></p>

<p><span style="font-size:16px;"><strong>उनका क्या होगा वो शायद अब नही होंगे!!</strong></span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall9906.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[gulzar-nazam-12-april]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/sahir-ludhyanvi-poet-shayari-10-april]]></guid>
                       <title><![CDATA[पढ़िए साहिर लुधियानवी के वो शेर जिनमें जीवन का दर्शन छुपा है, तो मुहब्बत को हिज्र-ओ-विसाल भी हैं, इंक़लाब है तो ग़म भी है]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/sahir-ludhyanvi-poet-shayari-10-april]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 10 Apr 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[साहिर लुधियानवी एक प्रसिद्ध शायर तथा गीतकार थे। उनका जन्म 8 मार्च 1921 को लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था। जब साहिर का जन्म हुआ तो उनका नाम अब्दुल हयी साहिर रखा गया। लेकिन हर शायर की तरह साहिर ने भी बड़े होकर अपना खुद का नाम चुना, और वो नाम है साहिर लुधियानवी। साहिर की माने तो जादूगर और सही मायनों में साहिर शब्दों के जादूगर थे। इनका जन्म लुधियाना में हुआ था। हालांकि इनके पिता बहुत धनी थे पर माता-पिता में अलगाव होने के कारण उन्हें माता के साथ रहना पड़ा और अपना बचपन गरीबी में गुज़ारना पड़ा। शुरू से ही उनके दिल में बहुत दर्द और जोश था। उस दर्द को इन्होने अपने पहली किताब में शामिल भी किया। साहिर लुधियानवी की शायरी का फ़लक बहुत ऊंचा है। उन्होंने मोहब्बत से लेकर समाज तक सभी पर लिखा और बहुत गहराई से लिखा। पढ़िए साहिर लुधियानवी के वो शेर जिनमें जीवन का दर्शन छुपा है, तो मुहब्बत को हिज्र-ओ-विसाल भी हैं, इंक़लाब है तो ग़म भी है...

ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया

ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं

साँसों में घुल रही है किसी साँस की महक
दामन को छू रहा है कोई हाथ क्या करें

कभी मिलेंगे जो रास्ते में तो मुँह फिरा कर पलट पड़ेंगे
कहीं सुनेंगे जो नाम तेरा तो चुप रहेंगे नज़र झुका के

तुझ को ख़बर नहीं मगर इक सादा-लौह को
बरबाद कर दिया तिरे दो दिन के प्यार ने

अरे ओ आसमाँ वाले बता इस में बुरा क्या है
ख़ुशी के चार झोंके गर इधर से भी गुज़र जाएँ

अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब
अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं

बर्बादियों का सोग मनाना फ़ुज़ूल था
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया

ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">साहिर लुधियानवी एक प्रसिद्ध शायर तथा गीतकार थे। उनका जन्म 8 मार्च 1921 को लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था। जब साहिर का जन्म हुआ तो उनका नाम अब्दुल हयी साहिर रखा गया। लेकिन हर शायर की तरह साहिर ने भी बड़े होकर अपना खुद का नाम चुना, और वो नाम है साहिर लुधियानवी। साहिर की माने तो जादूगर और सही मायनों में साहिर शब्दों के जादूगर थे। इनका जन्म लुधियाना में हुआ था। हालांकि इनके पिता बहुत धनी थे पर माता-पिता में अलगाव होने के कारण उन्हें माता के साथ रहना पड़ा और अपना बचपन गरीबी में गुज़ारना पड़ा। शुरू से ही उनके दिल में बहुत दर्द और जोश था। उस दर्द को इन्होने अपने पहली किताब में शामिल भी किया। साहिर लुधियानवी की शायरी का फ़लक बहुत ऊंचा है। उन्होंने मोहब्बत से लेकर समाज तक सभी पर लिखा और बहुत गहराई से लिखा। </span><span style="font-size:18px;">पढ़िए साहिर लुधियानवी के वो शेर जिनमें जीवन का दर्शन छुपा है, तो मुहब्बत को हिज्र-ओ-विसाल भी हैं, इंक़लाब है तो ग़म भी है...</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ<br />
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा<br />
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें<br />
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>साँसों में घुल रही है किसी साँस की महक<br />
दामन को छू रहा है कोई हाथ क्या करें</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>कभी मिलेंगे जो रास्ते में तो मुँह फिरा कर पलट पड़ेंगे<br />
कहीं सुनेंगे जो नाम तेरा तो चुप रहेंगे नज़र झुका के</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>तुझ को ख़बर नहीं मगर इक सादा-लौह को<br />
बरबाद कर दिया तिरे दो दिन के प्यार ने</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>अरे ओ आसमाँ वाले बता इस में बुरा क्या है<br />
ख़ुशी के चार झोंके गर इधर से भी गुज़र जाएँ</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब<br />
अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>बर्बादियों का सोग मनाना फ़ुज़ूल था<br />
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ<br />
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया</strong></span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall9873.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[sahir-ludhyanvi-poet-shayari-10-april]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/read-the-10-selected-shayari-of-rahat-indor]]></guid>
                       <title><![CDATA[पढ़िए राहत इंदौरी के 10  चुनिंदा शेर...]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/read-the-10-selected-shayari-of-rahat-indor]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 08 Apr 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[मोहब्बत और बगावत की शायरी से युवाओं के दिल को जीतने वाले मशहूर शायर राहत इंदौरी अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी लिखे कई शेर महफिलों की शान बनते है। राहत इंदौरी उन शायरों में से थे जो हुक्मरानों पर तंज कसने से ज़रा भी नहीं हिचकिचाते थे। उन्होंने बॉलीवुड की कई फिल्मों के लिए गाने भी लिखे हैं। राहत का जन्म 1 जनवरी 1950 को इंदौर में रफ्तुल्लाह कुरैशी और मकबूल उन निशा बेगम के यहाँ हुआ था। इनके पिता वस्त्र कारख़ाने के कर्मचारी थे। पढ़िए उनके लिखे कुछ बेहतरीन शेर........

&nbsp;

&nbsp;1. ज़ुबाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे,
&nbsp; &nbsp; मैं कितनी बार लूटा हूँ मुझे हिसाब तो दे।&nbsp;

&nbsp;

2. सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में,
&nbsp; &nbsp; किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है।&nbsp;

&nbsp;

3. बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए,
&nbsp; &nbsp; मैं पीना चाहता हूं पिला देनी चाहिए।&nbsp;

&nbsp;

4. अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए,
&nbsp; &nbsp; कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए।&nbsp;

&nbsp;

5. दो गज सही मगर ये मेरी मिल्कियत तो है,
&nbsp; &nbsp; ऐ मौत तूने मुझको जमींदार कर दिया।&nbsp;

&nbsp;

6.&nbsp;दो ग़ज सही ये मेरी मिल्कियत तो है
&nbsp; &nbsp; &nbsp;ऐ मौत तूने मुझे जमींदार कर दिया।

&nbsp;

7.&nbsp; अब ना मैं हूँ ना बाक़ी हैं ज़माने मेरे ,
&nbsp; &nbsp; &nbsp;फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे।&nbsp;

&nbsp;

8. लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूं हैं,
&nbsp; &nbsp; इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूं हैं।&nbsp;
&nbsp;
9. एक ही नदी के है यह दो किनारे दोस्तो,
&nbsp; &nbsp; दोस्ताना ज़िन्दगी से, मौत से यारी रखो।&nbsp;

&nbsp;

10.उस की याद आई है, साँसों ज़रा आहिस्ता चलो,
&nbsp; &nbsp; &nbsp;धड़कनो से भी इबादत में ख़लल पड़ता है।&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मोहब्बत और बगावत की शायरी से युवाओं के दिल को जीतने वाले मशहूर शायर राहत इंदौरी अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी लिखे कई शेर महफिलों की शान बनते है। राहत इंदौरी उन शायरों में से थे जो हुक्मरानों पर तंज कसने से ज़रा भी नहीं हिचकिचाते थे। उन्होंने बॉलीवुड की कई फिल्मों के लिए गाने भी लिखे हैं। राहत का जन्म 1 जनवरी 1950 को इंदौर में रफ्तुल्लाह कुरैशी और मकबूल उन निशा बेगम के यहाँ हुआ था। इनके पिता वस्त्र कारख़ाने के कर्मचारी थे। पढ़िए उनके लिखे कुछ बेहतरीन शेर........</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="display: none;">&nbsp;</span><strong><span style="font-size:18px;">1. ज़ुबाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे,<br />
&nbsp; &nbsp; मैं कितनी बार लूटा हूँ मुझे हिसाब तो दे।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">2. सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में,<br />
&nbsp; &nbsp; किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">3. बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए,<br />
&nbsp; &nbsp; मैं पीना चाहता हूं पिला देनी चाहिए।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">4. अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए,<br />
&nbsp; &nbsp; कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">5. दो गज सही मगर ये मेरी मिल्कियत तो है,<br />
&nbsp; &nbsp; ऐ मौत तूने मुझको जमींदार कर दिया।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>6.&nbsp;<span style="color: rgb(0, 0, 0); font-family: Roboto, sans-serif;">दो ग़ज सही ये मेरी मिल्कियत तो है</span><br style="color: rgb(0, 0, 0); font-family: Roboto, sans-serif; font-size: 12px; overflow-wrap: break-word !important;" />
<span style="color: rgb(0, 0, 0); font-family: Roboto, sans-serif;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;ऐ मौत तूने मुझे जमींदार कर दिया।</span></strong></span><br style="color: rgb(0, 0, 0); font-family: Roboto, sans-serif; font-size: 12px; overflow-wrap: break-word !important;" />
<br style="overflow-wrap: break-word !important;" />
&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">7.&nbsp; अब ना मैं हूँ ना बाक़ी हैं ज़माने मेरे ,<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp;फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">8. लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूं हैं,<br />
&nbsp; &nbsp; इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूं हैं।&nbsp;<br />
&nbsp;<br />
9. एक ही नदी के है यह दो किनारे दोस्तो,<br />
&nbsp; &nbsp; दोस्ताना ज़िन्दगी से, मौत से यारी रखो।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">10.उस की याद आई है, साँसों ज़रा आहिस्ता चलो,<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp;धड़कनो से भी इबादत में ख़लल पड़ता है।</span></strong><span style="display: none;">&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall9837.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Read the 10 selected  shayari of Rahat Indor]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/literature/kavya-rath/jaun-ki-fareha-]]></guid>
                       <title><![CDATA[जॉन की फारेहा]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/literature/kavya-rath/jaun-ki-fareha-]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 16 Jan 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[मैं&nbsp;जो&nbsp;हूँ&nbsp;जॉन&nbsp;एलिया&nbsp;हूँ&nbsp;साहब&nbsp;
इस बात का बे-हद लिहाज़ कीजिएगा


पूरा नाम सय्यद हुसैन जॉन असग़र। जॉन का जन्म 14 दिसंबर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ। शुरूआती तालीम अमरोहा में&nbsp; ही ली और उर्दू, फ़ारसी और अर्बी सीखते-सीखते अल्हड़ उम्र में ही शायर हो गए। 1947 में&nbsp; मुल्क आज़ाद हुआ और आज़ादी अपने साथ बंटवारे का ज़लज़ला भी लाई। तब सय्यद हुसैन जॉन असग़र ने हिंदुस्तान में रहना तय किया पर 1957 आते-आते समझौते के तौर पर&nbsp; पाकिस्तान चले गए और पूरी उम्र वहीं गुज़ारी।&nbsp;

जॉन पाकिस्तान चले तो गए मगर यूँ समझिए के जॉन का दिल अमरोहा में ही रह गया। अमरोहा से चले जाने का अफ़सोस उन्हें ता-उम्र ही रहा, जॉन ने लिखा। जॉन को बे-हद दुःख था अमरोहा छोड़ के कराची जाने का और दोनों मुल्क़ों के दो हिस्से होने का।&nbsp;

मत पूछो कितना ग़मगीन&nbsp; हूँ, गंगा जी और जमना जी&nbsp;
में जो था अब मैं वो नहीं हूँ, गंगा जी और जमना जी&nbsp;

मैं जो बगुला बनके बिखरा,वक़्त की पागल आंधी में&nbsp;
क्या मैं तुम्हारी लहर नहीं हूँ, गंगा जी और जमना जी&nbsp;&nbsp;

बाण नदी के पास अमरोही में जो लड़का रहता था&nbsp;
अब वो कहाँ है, मैं तो वहीं हूँ, गंगा जी और जमना जी

दंगों के दौरान, जॉन पकिस्तान तो आ गए मगर जॉन इसे एक समझौता ही समझा करते थे। जॉन की नज़्मों और ग़ज़लों से अमरोहा और हिन्दुस्तान की मिटटी की खुशबू अक्सर आती रही। 1947 के सियासी&nbsp; माहौल को बयां करते हुए उन्होंने लिखा-

हरमो-दैर की सियासत है&nbsp;
और सब फैसले हैं नफरत के&nbsp;

यार कल सुबह आए हमको नज़र&nbsp;
आदमी कुछ अजीब सूरत के&nbsp;

इन दिनों हाल शहर का है अजीब&nbsp;
लोग मारे हुए हैं दहशत&nbsp; के


08 नवंबर 2002 को पाकिस्तान के कराची में ही इंतकाल हुआ पर तब तलक सय्यद हुसैन जॉन असग़र दुनिया के लिए जॉन एलिया बन चुके थे। लाखों दिलों के महबूब शायर बन चुके थे। जॉन वो शायर हो चुके थे जो हर मर्तबा जदीद लगे। जॉन वो शायर हो चुके थे जिसकी बेफिक्र शायरी में हर शख्श को अपना अक्स दिखे।&nbsp;&nbsp;

पर जॉन के असल दौर का आगाज़ तो अभी बाकी था। इस दुनिया में रहते हुए जो जॉन एक रस्मी शायर थे, दुनिया को अलविदा कहने के बाद सरताज़ हो गए। उनके इंतेक़ाल के बाद उन्हें बेशुमार नाम-ओ-शोहरत नसीब हुआ। कहते है एक बार जॉन ने कहा था आज किसी शायर का है, कल किसी और शायर का होगा और परसों मेरा होगा। उनकी जुबां मुबारक हुई और आज सोशल मीडिया के इस दौर में उनकी शायरी युवाओं को खुदरंग सी लगती है।&nbsp; &nbsp;

8 साल की उम्र से शायरी से दिल लगाने वाले जॉन ने बहुत कम उम्र से ही अपनी एक अलग ज़ेहनी दुनिया बसा ली थी शायद इसलिए भी फिर वक़्त के साथ ज़िन्दगी की हकीकत उन्हें न-पसंद रही।&nbsp;

जो देखता हूँ वो कहने का आदि हूँ&nbsp;
मैं अपने शहर का सबसे बड़ा फसादी हूँ

बातों को पहेलियों की शक्ल में पेश करने वालों में जॉन नहीं थे, वे जो कहते साफ़ कहते।&nbsp;

एक शायर के लिए अपने जिए और लिखे के बीच का फ़र्क़ कम करना ही उसकी मुसलसल कोशिश रहती हैं। मगर जॉन इस काम में माहिर थे, जॉन सच कहते थे, वे झूठ भी कहते तो खुद को &quot;झूठा कह कर सच्चे बन जाते। खुद के सिवा जॉन को किसी से भी, कोई शिकायत न थी, ज़िन्दगी जीनी तो थी मगर, ज़िन्दगी से भी मोहब्बत न थी।&nbsp;

हैं बतौर ये लोग तमाम
इनके सांचे में क्यों ढलें
मैं भी यहाँ से भाग चलूँ&nbsp;
तुम भी यहाँ से भाग चलो&nbsp;

दुनियादारी के रस्मों रिवाज़ों से ऊब चुके जॉन ने कुछ इस अंदाज़ से, दुनियादारी की परवाह छोड़ कर, अपनी शरीक-ए-मोहब्बत से दूसरी किसी दुनिया में चलने की बात कही। जॉन पकिस्तान के बड़े शायर थे और कहा जाता है कि जॉन की मोहब्बत &quot;फ़ारेहा&quot; हिन्दुस्तान में रहा करती थी। दो मुल्क़ों के बीच जॉन का उनसे मिलना तो मुमकिन नहीं हुआ मगर अपनी ग़ज़लों में फ़ारेहा का ज़िक्र, जॉन अक्सर किया करते थे। पाकिस्तान के मशहूर शायर &quot;जॉन&quot; की मोहब्बत की दास्ताँ एक अधूरा क़िस्सा ही रही, मगर वे ता-उम्र जॉन फ़ारेहा का नाम दोहराते रहे। अब जॉन की ये मोहब्बत एक-तरफ़ा थी या दो-तरफ़ा ये बात तो बस जॉन ही जानते थे।

फ़ारेहा के अलावा जॉन की ज़िन्दगी में तीन और भी नाम शामिल रहे जिसमें से एक थी सुरैय्या, जो अपने आप में एक पहेली है। उनकी ज़िन्दगी में बनावटी गम की इन्तेहाई उन्होंने खुद मानी और बयां की -&nbsp;&nbsp;

जाने-निगाहो-रूहे-तमन्ना चली गई&nbsp;
ऐ नज़दे आरज़ू, मेरी लैला चली गई&nbsp;

बर्बाद हो गई मेरी दुनिया-ए-जुस्तजू&nbsp;
दुनिया-ए-जुस्तजू मेरी दुनिया चली गई

ज़ोहरा मीरा सितारा-ए-क़िस्मत खराब है&nbsp;
नाहीद!आज मेरी&nbsp; &quot;सुरैय्या&quot;&nbsp; चली गई&nbsp;&nbsp;

किस्से कहूं कि एक सरापा वफ़ा मुझे&nbsp;
तन्हाइयों में छोड़ के चली&nbsp; गई&nbsp;

हालाँकि, कहा जाता है जॉन कि ये सुरैय्या और ये दुनिया ये गम ये तन्हाई की बातें सब मन घडन्त कहानियां थी, बिलकुल वैसे ही जैसे कोई परियों के देश कि कहानी होती है।&nbsp;

1970 में जॉन का निकाह &#39;ज़ाहिदा&#39; हिना से हुआ जो जॉन कि तरह 1947 में हिंदुस्तान से पाकिस्तान , कराची आयी थी। जॉन और ज़ाहिदा का निकाह उनका अपना फैसला था, बहर-हाल दोनों का ये फैसला गलत साबित हुआ। जॉन कि एहल-ए-ज़िंदगी ज़ाहिदा ता-उम्र तक साथ न रह सकी और दोनों कुछ सालों बाद अलग हो गए। कहा जाता है कि जॉन चाहते थे ज़ाहिदा घर संभालें और ज़ाहिदा एक पत्रकार थी, सारी घर की ज़िम्मेदारी उठाना उन्हें मुमकिन न लगा और ये बात दोनों के अलग होने का सबब बनी ।&nbsp;

जाहिदा से अलग होने के बाद जॉन ने लिखा&nbsp;

हम तो जी भी नहीं सके एक साथ&nbsp;&nbsp;
हमको तो एक साथ मरना था&nbsp;

अलग होने के बाद वे ज़ाहिदा को अक्सर खत लिखा करते थे जिन्हे उर्दू भाषा के एहम दस्तावेज़ों की शक्ल में भी देखा गया। जॉन ने ज़ाहिदा के लिए अपनी फ़िक्र और उनसे सभी गिले माफ़ करने का ज़िक्र भी अक्सर किया -

नया एक रिश्ता पैदा क्यों करें हम&nbsp;
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यों करें हम

ख़ामोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी&nbsp;
कोई हंगामा बरपा क्यों करें हम&nbsp;

ये क़ाफ़ी है के दुश्मन नहीं हैं हम&nbsp;
वफादारी का दावा क्यों करें हम&nbsp;

नहीं दुनिया को जब परवाह हमारी&nbsp;
तो दुनिया कि परवाह क्यों करें हम&nbsp;

ज़ाहिदा से अलैदगी के बाद जॉन ने 10 साल तक कुछ नहीं लिखा।&nbsp;

हुई नहीं मुझे कभी मोहब्बत किसी से&nbsp;
मगर यक़ीं सबको&nbsp; दिलाता रहा हूँ मैं

जॉन की ज़िन्दगी का एक फसलफा एक गुमनाम शख्सियत के नाम भी रहा। इस शख्सियत का नाम तो कोई नहीं जानता मगर कहा जाता है जॉन की ज़िन्दगी के आखिर पलों में जॉन ने इनके लिए लिखा, ज़ाहिदा से अलग होने के बाद वे जॉन के साथ थी मगर कभी उनकी शरीक-ए-मोहब्बत न बन सकी। जॉन उनसे झूठा प्यार जताने के बोझ में दब रहे थे।&nbsp;
जॉन ने बनावटी दुःख और झूठी तकलीफ प्यार की बात करते हुए लिखा-

तुम मेरा दुःख बाँट रही हो , मैं खुद से शर्मिंदा हूँ&nbsp;
अपने झूठे दुःख से तुमको कब तक दुःख पहुंचाऊंगा&nbsp;

एहद-ए-रफ़ाक़त ठीक है लेकिन मुझको ऐसा लगता है&nbsp;
तुम तो&nbsp; मेरे साथ&nbsp; रहोगी मैं&nbsp; तन्हा रह&nbsp; जाऊंगा।&nbsp;&nbsp;

ये गुमनाम हसीना जॉन से बे-इंतेहा मोहब्बत करने का दावा करती थी और जॉन उन्हें झूठे दिलासे दे दिया करते थे। दोनों एक दूसरे को खत भी लिखा करते थे। कहा जाता है उस लड़की का इंतेक़ाल टी-बी की बीमारी से हुआ, जिसको जॉन ने शायरी में लिखा और जॉन का इंतेक़ाल भी लम्बे अरसे तक टी-बी की बीमारी से लड़ने के बाद हुआ। -&nbsp;

आ गई दरमियाँ रूह की बात&nbsp;
ज़िक्र था जिस्म की ज़रुरत का&nbsp;

थूक कर खून रंग में रहना&nbsp;
में हुनरमंद हूँ अज़ीयत का&nbsp;


जॉन दोबारा कभी हिंदुस्तान नहीं आए और न ही फ़ारेहा से कभी मिले मगर फ़ारेहा का नाम जॉन से आज भी हमेशा जोड़ा जाता रहा&nbsp; है । जॉन ने फ़ारेहा के नाम कई बेहतरीन ग़ज़लें लिखी। फ़ारेहा जॉन की ज़िन्दगी का एक ज़रूरी हिस्सा थी और जॉन उन्हें शायद किसी मर्ज़ की दवा की तरह वक़्त वक़्त पर याद करते रहे।&nbsp;

फ़ारेहा के नाम जॉन की एक ग़ज़ल -

सारी&nbsp; बातें भूल जाना फ़ारेहा&nbsp;
था वो सब कुछ एक फ़साना फ़ारेहा&nbsp;

हाँ मोहब्बत एक धोखा ही तो थी&nbsp; &nbsp;&nbsp;
अब कभी धोखा न खाना फ़ारेहा&nbsp;

छेड़ दे अगर कोई मेरा तज़्कीरा&nbsp;
सुन के तंज़न मुस्कुराना फ़ारेहा&nbsp;

था फ़क़त रूहों के नालों की शिकस्त&nbsp;
वो&nbsp; तरन्नुम&nbsp; &nbsp;वो&nbsp; &nbsp;तराना&nbsp; &nbsp;फ़ारेहा&nbsp;

बेहेस क्या करना भला हालात से&nbsp;
हारना&nbsp; है&nbsp; &nbsp;हार&nbsp; &nbsp; जाना फ़ारेहा

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">मैं&nbsp;जो&nbsp;हूँ&nbsp;जॉन&nbsp;एलिया&nbsp;हूँ&nbsp;साहब&nbsp;<br />
इस बात का बे-हद लिहाज़ कीजिएगा</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">पूरा नाम सय्यद हुसैन जॉन असग़र। जॉन का जन्म 14 दिसंबर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ। शुरूआती तालीम अमरोहा में&nbsp; ही ली और उर्दू, फ़ारसी और अर्बी सीखते-सीखते अल्हड़ उम्र में ही शायर हो गए। 1947 में&nbsp; मुल्क आज़ाद हुआ और आज़ादी अपने साथ बंटवारे का ज़लज़ला भी लाई। तब सय्यद हुसैन जॉन असग़र ने हिंदुस्तान में रहना तय किया पर 1957 आते-आते समझौते के तौर पर&nbsp; पाकिस्तान चले गए और पूरी उम्र वहीं गुज़ारी।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जॉन पाकिस्तान चले तो गए मगर यूँ समझिए के जॉन का दिल अमरोहा में ही रह गया। अमरोहा से चले जाने का अफ़सोस उन्हें ता-उम्र ही रहा, जॉन ने लिखा। जॉन को बे-हद दुःख था अमरोहा छोड़ के कराची जाने का और दोनों मुल्क़ों के दो हिस्से होने का।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">मत पूछो कितना ग़मगीन&nbsp; हूँ, गंगा जी और जमना जी&nbsp;<br />
में जो था अब मैं वो नहीं हूँ, गंगा जी और जमना जी&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">मैं जो बगुला बनके बिखरा,वक़्त की पागल आंधी में&nbsp;<br />
क्या मैं तुम्हारी लहर नहीं हूँ, गंगा जी और जमना जी&nbsp;&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">बाण नदी के पास अमरोही में जो लड़का रहता था&nbsp;<br />
अब वो कहाँ है, मैं तो वहीं हूँ, गंगा जी और जमना जी</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">दंगों के दौरान, जॉन पकिस्तान तो आ गए मगर जॉन इसे एक समझौता ही समझा करते थे। जॉन की नज़्मों और ग़ज़लों से अमरोहा और हिन्दुस्तान की मिटटी की खुशबू अक्सर आती रही। 1947 के सियासी&nbsp; माहौल को बयां करते हुए उन्होंने लिखा-</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हरमो-दैर की सियासत है&nbsp;<br />
और सब फैसले हैं नफरत के&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">यार कल सुबह आए हमको नज़र&nbsp;<br />
आदमी कुछ अजीब सूरत के&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">इन दिनों हाल शहर का है अजीब&nbsp;<br />
लोग मारे हुए हैं दहशत&nbsp; के</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">08 नवंबर 2002 को पाकिस्तान के कराची में ही इंतकाल हुआ पर तब तलक सय्यद हुसैन जॉन असग़र दुनिया के लिए जॉन एलिया बन चुके थे। लाखों दिलों के महबूब शायर बन चुके थे। जॉन वो शायर हो चुके थे जो हर मर्तबा जदीद लगे। जॉन वो शायर हो चुके थे जिसकी बेफिक्र शायरी में हर शख्श को अपना अक्स दिखे।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">पर जॉन के असल दौर का आगाज़ तो अभी बाकी था। इस दुनिया में रहते हुए जो जॉन एक रस्मी शायर थे, दुनिया को अलविदा कहने के बाद सरताज़ हो गए। उनके इंतेक़ाल के बाद उन्हें बेशुमार नाम-ओ-शोहरत नसीब हुआ। कहते है एक बार जॉन ने कहा था आज किसी शायर का है, कल किसी और शायर का होगा और परसों मेरा होगा। उनकी जुबां मुबारक हुई और आज सोशल मीडिया के इस दौर में उनकी शायरी युवाओं को खुदरंग सी लगती है।&nbsp; &nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">8 साल की उम्र से शायरी से दिल लगाने वाले जॉन ने बहुत कम उम्र से ही अपनी एक अलग ज़ेहनी दुनिया बसा ली थी शायद इसलिए भी फिर वक़्त के साथ ज़िन्दगी की हकीकत उन्हें न-पसंद रही।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">जो देखता हूँ वो कहने का आदि हूँ&nbsp;<br />
मैं अपने शहर का सबसे बड़ा फसादी हूँ</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बातों को पहेलियों की शक्ल में पेश करने वालों में जॉन नहीं थे, वे जो कहते साफ़ कहते।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">एक शायर के लिए अपने जिए और लिखे के बीच का फ़र्क़ कम करना ही उसकी मुसलसल कोशिश रहती हैं। मगर जॉन इस काम में माहिर थे, जॉन सच कहते थे, वे झूठ भी कहते तो खुद को &quot;झूठा कह कर सच्चे बन जाते। खुद के सिवा जॉन को किसी से भी, कोई शिकायत न थी, ज़िन्दगी जीनी तो थी मगर, ज़िन्दगी से भी मोहब्बत न थी।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हैं बतौर ये लोग तमाम<br />
इनके सांचे में क्यों ढलें<br />
मैं भी यहाँ से भाग चलूँ&nbsp;<br />
तुम भी यहाँ से भाग चलो&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">दुनियादारी के रस्मों रिवाज़ों से ऊब चुके जॉन ने कुछ इस अंदाज़ से, दुनियादारी की परवाह छोड़ कर, अपनी शरीक-ए-मोहब्बत से दूसरी किसी दुनिया में चलने की बात कही। जॉन पकिस्तान के बड़े शायर थे और कहा जाता है कि जॉन की मोहब्बत &quot;फ़ारेहा&quot; हिन्दुस्तान में रहा करती थी। दो मुल्क़ों के बीच जॉन का उनसे मिलना तो मुमकिन नहीं हुआ मगर अपनी ग़ज़लों में फ़ारेहा का ज़िक्र, जॉन अक्सर किया करते थे। पाकिस्तान के मशहूर शायर &quot;जॉन&quot; की मोहब्बत की दास्ताँ एक अधूरा क़िस्सा ही रही, मगर वे ता-उम्र जॉन फ़ारेहा का नाम दोहराते रहे। अब जॉन की ये मोहब्बत एक-तरफ़ा थी या दो-तरफ़ा ये बात तो बस जॉन ही जानते थे।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">फ़ारेहा के अलावा जॉन की ज़िन्दगी में तीन और भी नाम शामिल रहे जिसमें से एक थी सुरैय्या, जो अपने आप में एक पहेली है। उनकी ज़िन्दगी में बनावटी गम की इन्तेहाई उन्होंने खुद मानी और बयां की -&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">जाने-निगाहो-रूहे-तमन्ना चली गई&nbsp;<br />
ऐ नज़दे आरज़ू, मेरी लैला चली गई&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">बर्बाद हो गई मेरी दुनिया-ए-जुस्तजू&nbsp;<br />
दुनिया-ए-जुस्तजू मेरी दुनिया चली गई</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">ज़ोहरा मीरा सितारा-ए-क़िस्मत खराब है&nbsp;<br />
नाहीद!आज मेरी&nbsp; &quot;सुरैय्या&quot;&nbsp; चली गई&nbsp;&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">किस्से कहूं कि एक सरापा वफ़ा मुझे&nbsp;<br />
तन्हाइयों में छोड़ के चली&nbsp; गई&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हालाँकि, कहा जाता है जॉन कि ये सुरैय्या और ये दुनिया ये गम ये तन्हाई की बातें सब मन घडन्त कहानियां थी, बिलकुल वैसे ही जैसे कोई परियों के देश कि कहानी होती है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">1970 में जॉन का निकाह &#39;ज़ाहिदा&#39; हिना से हुआ जो जॉन कि तरह 1947 में हिंदुस्तान से पाकिस्तान , कराची आयी थी। जॉन और ज़ाहिदा का निकाह उनका अपना फैसला था, बहर-हाल दोनों का ये फैसला गलत साबित हुआ। जॉन कि एहल-ए-ज़िंदगी ज़ाहिदा ता-उम्र तक साथ न रह सकी और दोनों कुछ सालों बाद अलग हो गए। कहा जाता है कि जॉन चाहते थे ज़ाहिदा घर संभालें और ज़ाहिदा एक पत्रकार थी, सारी घर की ज़िम्मेदारी उठाना उन्हें मुमकिन न लगा और ये बात दोनों के अलग होने का सबब बनी ।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जाहिदा से अलग होने के बाद जॉन ने लिखा&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हम तो जी भी नहीं सके एक साथ&nbsp;&nbsp;<br />
हमको तो एक साथ मरना था&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अलग होने के बाद वे ज़ाहिदा को अक्सर खत लिखा करते थे जिन्हे उर्दू भाषा के एहम दस्तावेज़ों की शक्ल में भी देखा गया। जॉन ने ज़ाहिदा के लिए अपनी फ़िक्र और उनसे सभी गिले माफ़ करने का ज़िक्र भी अक्सर किया -</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">नया एक रिश्ता पैदा क्यों करें हम&nbsp;<br />
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यों करें हम</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">ख़ामोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी&nbsp;<br />
कोई हंगामा बरपा क्यों करें हम&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">ये क़ाफ़ी है के दुश्मन नहीं हैं हम&nbsp;<br />
वफादारी का दावा क्यों करें हम&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">नहीं दुनिया को जब परवाह हमारी&nbsp;<br />
तो दुनिया कि परवाह क्यों करें हम&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ज़ाहिदा से अलैदगी के बाद जॉन ने 10 साल तक कुछ नहीं लिखा।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हुई नहीं मुझे कभी मोहब्बत किसी से&nbsp;<br />
मगर यक़ीं सबको&nbsp; दिलाता रहा हूँ मैं</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जॉन की ज़िन्दगी का एक फसलफा एक गुमनाम शख्सियत के नाम भी रहा। इस शख्सियत का नाम तो कोई नहीं जानता मगर कहा जाता है जॉन की ज़िन्दगी के आखिर पलों में जॉन ने इनके लिए लिखा, ज़ाहिदा से अलग होने के बाद वे जॉन के साथ थी मगर कभी उनकी शरीक-ए-मोहब्बत न बन सकी। जॉन उनसे झूठा प्यार जताने के बोझ में दब रहे थे।&nbsp;<br />
जॉन ने बनावटी दुःख और झूठी तकलीफ प्यार की बात करते हुए लिखा-</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">तुम मेरा दुःख बाँट रही हो , मैं खुद से शर्मिंदा हूँ&nbsp;<br />
अपने झूठे दुःख से तुमको कब तक दुःख पहुंचाऊंगा&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">एहद-ए-रफ़ाक़त ठीक है लेकिन मुझको ऐसा लगता है&nbsp;<br />
तुम तो&nbsp; मेरे साथ&nbsp; रहोगी मैं&nbsp; तन्हा रह&nbsp; जाऊंगा।&nbsp;&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ये गुमनाम हसीना जॉन से बे-इंतेहा मोहब्बत करने का दावा करती थी और जॉन उन्हें झूठे दिलासे दे दिया करते थे। दोनों एक दूसरे को खत भी लिखा करते थे। कहा जाता है उस लड़की का इंतेक़ाल टी-बी की बीमारी से हुआ, जिसको जॉन ने शायरी में लिखा और जॉन का इंतेक़ाल भी लम्बे अरसे तक टी-बी की बीमारी से लड़ने के बाद हुआ। -&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">आ गई दरमियाँ रूह की बात&nbsp;<br />
ज़िक्र था जिस्म की ज़रुरत का&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">थूक कर खून रंग में रहना&nbsp;<br />
में हुनरमंद हूँ अज़ीयत का&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">जॉन दोबारा कभी हिंदुस्तान नहीं आए और न ही फ़ारेहा से कभी मिले मगर फ़ारेहा का नाम जॉन से आज भी हमेशा जोड़ा जाता रहा&nbsp; है । जॉन ने फ़ारेहा के नाम कई बेहतरीन ग़ज़लें लिखी। फ़ारेहा जॉन की ज़िन्दगी का एक ज़रूरी हिस्सा थी और जॉन उन्हें शायद किसी मर्ज़ की दवा की तरह वक़्त वक़्त पर याद करते रहे।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:20px;">फ़ारेहा के नाम जॉन की एक ग़ज़ल -</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">सारी&nbsp; बातें भूल जाना फ़ारेहा&nbsp;<br />
था वो सब कुछ एक फ़साना फ़ारेहा&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हाँ मोहब्बत एक धोखा ही तो थी&nbsp; &nbsp;&nbsp;<br />
अब कभी धोखा न खाना फ़ारेहा&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">छेड़ दे अगर कोई मेरा तज़्कीरा&nbsp;<br />
सुन के तंज़न मुस्कुराना फ़ारेहा&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">था फ़क़त रूहों के नालों की शिकस्त&nbsp;<br />
वो&nbsp; तरन्नुम&nbsp; &nbsp;वो&nbsp; &nbsp;तराना&nbsp; &nbsp;फ़ारेहा&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">बेहेस क्या करना भला हालात से&nbsp;<br />
हारना&nbsp; है&nbsp; &nbsp;हार&nbsp; &nbsp; जाना फ़ारेहा</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall8269.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[jaun-ki-fareha-जॉन-की-फारेहा]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/national-news/pm-narendra-modi-reads-ramdhari-singh-dinkars-poem-during-covid-19-vaccine-launch]]></guid>
                       <title><![CDATA[देशवासियों का हौंसला बढ़ाने के लिए पीएम मोदी ने पढ़ी रामधारी सिंह दिनकर की ये कविता ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/national-news/pm-narendra-modi-reads-ramdhari-singh-dinkars-poem-during-covid-19-vaccine-launch]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 16 Jan 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[प्रधानमंत्री मोदी ने आज दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीनेशन अभियान का शुभारंभ किया। पीएम ने सुबह 10.30 बजे देश को संबोधित किया और इसके साथ ही पहले चरण में 3 करोड़ लोगों को कोरोना के टीके लगाने का काम शुरू हो गया। इस मौके पर उन्&zwj;होंने देशवासियों के हौसले बढ़ाते हुए राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता का जिक्र किया। कविता का शीर्ष है &#39;मानव जब जोर लगाता है, पत्&zwj;थर भी पानी बन जाता है।&#39; प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि महामारी कोविड-19 के लिए वैक्सीन लाने की राह कितनी कठिनाईयों से भरी थी जिसे हमारे वैज्ञानिक और वैक्सीन के रिसर्च से जुड़े लोगों के प्रयासों ने आसान और सरल बना दिया।

प्रधानमंत्री ने कहा, &#39;आज वो वैज्ञानिक, वैक्सीन रिसर्च से जुड़े अनेकों लोग विशेष प्रशंसा के हकदार हैं, जो बीते कई महीनों से कोरोना के खिलाफ वैक्सीन बनाने में जुटे थे। आमतौर पर एक वैक्सीन बनाने में बरसों लग जाते हैं। लेकिन इतने कम समय में एक नहीं, दो मेड इन इंडिया वैक्सीन तैयार हुई हैं।&#39;&nbsp;

पढ़िए रामधारी सिंह दिनकर की पूरी कविता जिसका जिक्र पीएम मोदी ने किया।&nbsp;

हो गया पूर्ण अज्ञात वास,&nbsp;
पाडंव लौटे वन से सहास,&nbsp;
पावक में कनक-सदृश तप कर,&nbsp;
वीरत्व लिए कुछ और प्रखर,&nbsp;
नस-नस में तेज-प्रवाह लिये,&nbsp;
कुछ और नया उत्साह लिये।

सच है, विपत्ति जब आती है,&nbsp;
कायर को ही दहलाती है,&nbsp;
शूरमा नहीं विचलित होते,&nbsp;
क्षण एक नहीं धीरज खोते,&nbsp;
विघ्नों को गले लगाते हैं,&nbsp;
काँटों में राह बनाते हैं।&nbsp;

मुख से न कभी उफ कहते हैं,&nbsp;
संकट का चरण न गहते हैं,&nbsp;
जो आ पड़ता सब सहते हैं,&nbsp;
उद्योग-निरत नित रहते हैं,&nbsp;
शूलों का मूल नसाने को,&nbsp;
बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।&nbsp;

है कौन विघ्न ऐसा जग में,&nbsp;
टिक सके वीर नर के मग में&nbsp;
खम ठोंक ठेलता है जब नर,&nbsp;
पर्वत के जाते पाँव उखड़।&nbsp;
मानव जब जोर लगाता है,&nbsp;
पत्थर पानी बन जाता है।&nbsp;

गुण बड़े एक से एक प्रखर,&nbsp;
हैं छिपे मानवों के भीतर,&nbsp;
मेंहदी में जैसे लाली हो,&nbsp;
वर्तिका-बीच उजियाली हो।&nbsp;
बत्ती जो नहीं जलाता है&nbsp;
रोशनी नहीं वह पाता है।&nbsp;

पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,&nbsp;
झरती रस की धारा अखण्ड,&nbsp;
मेंहदी जब सहती है प्रहार,&nbsp;
बनती ललनाओं का सिंगार।&nbsp;
जब फूल पिरोये जाते हैं,&nbsp;
हम उनको गले लगाते हैं।

वसुधा का नेता कौन हुआ?&nbsp;
भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?&nbsp;
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?&nbsp;
नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?&nbsp;
जिसने न कभी आराम किया,&nbsp;
विघ्नों में रहकर नाम किया।&nbsp;

जब विघ्न सामने आते हैं,&nbsp;
सोते से हमें जगाते हैं,&nbsp;
मन को मरोड़ते हैं पल-पल,&nbsp;
तन को झँझोरते हैं पल-पल।&nbsp;
सत्पथ की ओर लगाकर ही,&nbsp;
जाते हैं हमें जगाकर ही।&nbsp;

वाटिका और वन एक नहीं,&nbsp;
आराम और रण एक नहीं।&nbsp;
वर्षा, अंधड़, आतप अखंड,&nbsp;
पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।&nbsp;
वन में प्रसून तो खिलते हैं,&nbsp;
बागों में शाल न मिलते हैं।&nbsp;

कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर,&nbsp;
छाया देता केवल अम्बर,&nbsp;
विपदाएँ दूध पिलाती हैं,&nbsp;
लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।&nbsp;
जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,&nbsp;
वे ही शूरमा निकलते हैं।&nbsp;

बढ़कर विपत्तियों पर छा जा,&nbsp;
मेरे किशोर! मेरे ताजा!&nbsp;
जीवन का रस छन जाने दे,&nbsp;
तन को पत्थर बन जाने दे।&nbsp;
तू स्वयं तेज भयकारी है,&nbsp;
क्या कर सकती चिनगारी है?&nbsp;

वर्षों तक वन में घूम-घूम,&nbsp;
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,&nbsp;
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,&nbsp;
पांडव आये कुछ और निखर।&nbsp;
सौभाग्य न सब दिन सोता है,&nbsp;
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को,&nbsp;
सबको सुमार्ग पर लाने को,&nbsp;
दुर्योधन को समझाने को,&nbsp;
भीषण विध्वंस बचाने को,&nbsp;
भगवान् हस्तिनापुर आये,&nbsp;
पांडव का संदेशा लाये।&nbsp;

&#39;दो न्याय अगर तो आधा दो,&nbsp;
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,&nbsp;
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,&nbsp;
रक्खो अपनी धरती तमाम।&nbsp;
हम वहीं खुशी से खायेंगे,&nbsp;
परिजन पर असि न उठायेंगे!&nbsp;

दुर्योधन वह भी दे ना सका,&nbsp;
आशिष समाज की ले न सका,&nbsp;
उलटे, हरि को बाँधने चला,&nbsp;
जो था असाध्य, साधने चला।&nbsp;
जब नाश मनुज पर छाता है,&nbsp;
पहले विवेक मर जाता है।&nbsp;

हरि ने भीषण हुंकार किया,&nbsp;
अपना स्वरूप-विस्तार किया,&nbsp;
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,&nbsp;
भगवान् कुपित होकर बोले-&nbsp;
&#39;जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,&nbsp;
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।&nbsp;

यह देख, गगन मुझमें लय है,&nbsp;
यह देख, पवन मुझमें लय है,&nbsp;
मुझमें विलीन झंकार सकल,&nbsp;
मुझमें लय है संसार सकल।&nbsp;
अमरत्व फूलता है मुझमें,&nbsp;
संहार झूलता है मुझमें।&nbsp;

&#39;उदयाचल मेरा दीप्त भाल,&nbsp;
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,&nbsp;
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,&nbsp;
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।&nbsp;
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,&nbsp;
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।&nbsp;

&#39;दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,&nbsp;
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,&nbsp;
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,&nbsp;
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।&nbsp;
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,&nbsp;
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

&#39;शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,&nbsp;
शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,&nbsp;
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,&nbsp;
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।&nbsp;
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,&nbsp;
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।&nbsp;

&#39;भूलोक, अतल, पाताल देख,&nbsp;
गत और अनागत काल देख,&nbsp;
यह देख जगत का आदि-सृजन,&nbsp;
यह देख, महाभारत का रण,&nbsp;
मृतकों से पटी हुई भू है,&nbsp;
पहचान, कहाँ इसमें तू है।&nbsp;

&#39;अम्बर में कुन्तल-जाल देख,&nbsp;
पद के नीचे पाताल देख,&nbsp;
मुट्ठी में तीनों काल देख,&nbsp;
मेरा स्वरूप विकराल देख।&nbsp;
सब जन्म मुझी से पाते हैं,&nbsp;
फिर लौट मुझी में आते हैं।&nbsp;

&#39;जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,&nbsp;
साँसों में पाता जन्म पवन,&nbsp;
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,&nbsp;
हँसने लगती है सृष्टि उधर!&nbsp;
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,&nbsp;
छा जाता चारों ओर मरण।&nbsp;

&#39;बाँधने मुझे तो आया है,&nbsp;
जंजीर बड़ी क्या लाया है?&nbsp;
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,&nbsp;
पहले तो बाँध अनन्त गगन।&nbsp;
सूने को साध न सकता है,&nbsp;
वह मुझे बाँध कब सकता है?&nbsp;

&#39;हित-वचन नहीं तूने माना,&nbsp;
मैत्री का मूल्य न पहचाना,&nbsp;
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,&nbsp;
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।&nbsp;
याचना नहीं, अब रण होगा,&nbsp;
जीवन-जय या कि मरण होगा।&nbsp;

&#39;टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,&nbsp;
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,&nbsp;
फण शेषनाग का डोलेगा,&nbsp;
विकराल काल मुँह खोलेगा।&nbsp;
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।&nbsp;
फिर कभी नहीं जैसा होगा।&nbsp;

&#39;भाई पर भाई टूटेंगे,&nbsp;
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,&nbsp;
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,&nbsp;
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।&nbsp;
आखिर तू भूशायी होगा,&nbsp;
हिंसा का पर, दायी होगा।&#39;&nbsp;

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,&nbsp;
चुप थे या थे बेहोश पड़े।&nbsp;
केवल दो नर ना अघाते थे,&nbsp;
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।&nbsp;
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,&nbsp;
दोनों पुकारते थे &#39;जय-जय&#39;!
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">प्रधानमंत्री मोदी ने आज दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीनेशन अभियान का शुभारंभ किया। पीएम ने सुबह 10.30 बजे देश को संबोधित किया और इसके साथ ही पहले चरण में 3 करोड़ लोगों को कोरोना के टीके लगाने का काम शुरू हो गया। इस मौके पर उन्&zwj;होंने देशवासियों के हौसले बढ़ाते हुए राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता का जिक्र किया। कविता का शीर्ष है &#39;मानव जब जोर लगाता है, पत्&zwj;थर भी पानी बन जाता है।&#39; प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि महामारी कोविड-19 के लिए वैक्सीन लाने की राह कितनी कठिनाईयों से भरी थी जिसे हमारे वैज्ञानिक और वैक्सीन के रिसर्च से जुड़े लोगों के प्रयासों ने आसान और सरल बना दिया।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">प्रधानमंत्री ने कहा, &#39;आज वो वैज्ञानिक, वैक्सीन रिसर्च से जुड़े अनेकों लोग विशेष प्रशंसा के हकदार हैं, जो बीते कई महीनों से कोरोना के खिलाफ वैक्सीन बनाने में जुटे थे। आमतौर पर एक वैक्सीन बनाने में बरसों लग जाते हैं। लेकिन इतने कम समय में एक नहीं, दो मेड इन इंडिया वैक्सीन तैयार हुई हैं।&#39;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">पढ़िए रामधारी सिंह दिनकर की पूरी कविता जिसका जिक्र पीएम मोदी ने किया।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हो गया पूर्ण अज्ञात वास,&nbsp;<br />
पाडंव लौटे वन से सहास,&nbsp;<br />
पावक में कनक-सदृश तप कर,&nbsp;<br />
वीरत्व लिए कुछ और प्रखर,&nbsp;<br />
नस-नस में तेज-प्रवाह लिये,&nbsp;<br />
कुछ और नया उत्साह लिये।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">सच है, विपत्ति जब आती है,&nbsp;<br />
कायर को ही दहलाती है,&nbsp;<br />
शूरमा नहीं विचलित होते,&nbsp;<br />
क्षण एक नहीं धीरज खोते,&nbsp;<br />
विघ्नों को गले लगाते हैं,&nbsp;<br />
काँटों में राह बनाते हैं।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">मुख से न कभी उफ कहते हैं,&nbsp;<br />
संकट का चरण न गहते हैं,&nbsp;<br />
जो आ पड़ता सब सहते हैं,&nbsp;<br />
उद्योग-निरत नित रहते हैं,&nbsp;<br />
शूलों का मूल नसाने को,&nbsp;<br />
बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">है कौन विघ्न ऐसा जग में,&nbsp;<br />
टिक सके वीर नर के मग में&nbsp;<br />
खम ठोंक ठेलता है जब नर,&nbsp;<br />
पर्वत के जाते पाँव उखड़।&nbsp;<br />
मानव जब जोर लगाता है,&nbsp;<br />
पत्थर पानी बन जाता है।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">गुण बड़े एक से एक प्रखर,&nbsp;<br />
हैं छिपे मानवों के भीतर,&nbsp;<br />
मेंहदी में जैसे लाली हो,&nbsp;<br />
वर्तिका-बीच उजियाली हो।&nbsp;<br />
बत्ती जो नहीं जलाता है&nbsp;<br />
रोशनी नहीं वह पाता है।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,&nbsp;<br />
झरती रस की धारा अखण्ड,&nbsp;<br />
मेंहदी जब सहती है प्रहार,&nbsp;<br />
बनती ललनाओं का सिंगार।&nbsp;<br />
जब फूल पिरोये जाते हैं,&nbsp;<br />
हम उनको गले लगाते हैं।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">वसुधा का नेता कौन हुआ?&nbsp;<br />
भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?&nbsp;<br />
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?&nbsp;<br />
नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?&nbsp;<br />
जिसने न कभी आराम किया,&nbsp;<br />
विघ्नों में रहकर नाम किया।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">जब विघ्न सामने आते हैं,&nbsp;<br />
सोते से हमें जगाते हैं,&nbsp;<br />
मन को मरोड़ते हैं पल-पल,&nbsp;<br />
तन को झँझोरते हैं पल-पल।&nbsp;<br />
सत्पथ की ओर लगाकर ही,&nbsp;<br />
जाते हैं हमें जगाकर ही।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">वाटिका और वन एक नहीं,&nbsp;<br />
आराम और रण एक नहीं।&nbsp;<br />
वर्षा, अंधड़, आतप अखंड,&nbsp;<br />
पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।&nbsp;<br />
वन में प्रसून तो खिलते हैं,&nbsp;<br />
बागों में शाल न मिलते हैं।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर,&nbsp;<br />
छाया देता केवल अम्बर,&nbsp;<br />
विपदाएँ दूध पिलाती हैं,&nbsp;<br />
लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।&nbsp;<br />
जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,&nbsp;<br />
वे ही शूरमा निकलते हैं।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">बढ़कर विपत्तियों पर छा जा,&nbsp;<br />
मेरे किशोर! मेरे ताजा!&nbsp;<br />
जीवन का रस छन जाने दे,&nbsp;<br />
तन को पत्थर बन जाने दे।&nbsp;<br />
तू स्वयं तेज भयकारी है,&nbsp;<br />
क्या कर सकती चिनगारी है?&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">वर्षों तक वन में घूम-घूम,&nbsp;<br />
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,&nbsp;<br />
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,&nbsp;<br />
पांडव आये कुछ और निखर।&nbsp;<br />
सौभाग्य न सब दिन सोता है,&nbsp;<br />
देखें, आगे क्या होता है।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">मैत्री की राह बताने को,&nbsp;<br />
सबको सुमार्ग पर लाने को,&nbsp;<br />
दुर्योधन को समझाने को,&nbsp;<br />
भीषण विध्वंस बचाने को,&nbsp;<br />
भगवान् हस्तिनापुर आये,&nbsp;<br />
पांडव का संदेशा लाये।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&#39;दो न्याय अगर तो आधा दो,&nbsp;<br />
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,&nbsp;<br />
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,&nbsp;<br />
रक्खो अपनी धरती तमाम।&nbsp;<br />
हम वहीं खुशी से खायेंगे,&nbsp;<br />
परिजन पर असि न उठायेंगे!&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">दुर्योधन वह भी दे ना सका,&nbsp;<br />
आशिष समाज की ले न सका,&nbsp;<br />
उलटे, हरि को बाँधने चला,&nbsp;<br />
जो था असाध्य, साधने चला।&nbsp;<br />
जब नाश मनुज पर छाता है,&nbsp;<br />
पहले विवेक मर जाता है।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हरि ने भीषण हुंकार किया,&nbsp;<br />
अपना स्वरूप-विस्तार किया,&nbsp;<br />
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,&nbsp;<br />
भगवान् कुपित होकर बोले-&nbsp;<br />
&#39;जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,&nbsp;<br />
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">यह देख, गगन मुझमें लय है,&nbsp;<br />
यह देख, पवन मुझमें लय है,&nbsp;<br />
मुझमें विलीन झंकार सकल,&nbsp;<br />
मुझमें लय है संसार सकल।&nbsp;<br />
अमरत्व फूलता है मुझमें,&nbsp;<br />
संहार झूलता है मुझमें।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&#39;उदयाचल मेरा दीप्त भाल,&nbsp;<br />
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,&nbsp;<br />
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,&nbsp;<br />
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।&nbsp;<br />
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,&nbsp;<br />
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&#39;दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,&nbsp;<br />
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,&nbsp;<br />
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,&nbsp;<br />
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।&nbsp;<br />
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,&nbsp;<br />
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&#39;शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,&nbsp;<br />
शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,&nbsp;<br />
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,&nbsp;<br />
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।&nbsp;<br />
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,&nbsp;<br />
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&#39;भूलोक, अतल, पाताल देख,&nbsp;<br />
गत और अनागत काल देख,&nbsp;<br />
यह देख जगत का आदि-सृजन,&nbsp;<br />
यह देख, महाभारत का रण,&nbsp;<br />
मृतकों से पटी हुई भू है,&nbsp;<br />
पहचान, कहाँ इसमें तू है।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&#39;अम्बर में कुन्तल-जाल देख,&nbsp;<br />
पद के नीचे पाताल देख,&nbsp;<br />
मुट्ठी में तीनों काल देख,&nbsp;<br />
मेरा स्वरूप विकराल देख।&nbsp;<br />
सब जन्म मुझी से पाते हैं,&nbsp;<br />
फिर लौट मुझी में आते हैं।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&#39;जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,&nbsp;<br />
साँसों में पाता जन्म पवन,&nbsp;<br />
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,&nbsp;<br />
हँसने लगती है सृष्टि उधर!&nbsp;<br />
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,&nbsp;<br />
छा जाता चारों ओर मरण।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&#39;बाँधने मुझे तो आया है,&nbsp;<br />
जंजीर बड़ी क्या लाया है?&nbsp;<br />
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,&nbsp;<br />
पहले तो बाँध अनन्त गगन।&nbsp;<br />
सूने को साध न सकता है,&nbsp;<br />
वह मुझे बाँध कब सकता है?&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&#39;हित-वचन नहीं तूने माना,&nbsp;<br />
मैत्री का मूल्य न पहचाना,&nbsp;<br />
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,&nbsp;<br />
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।&nbsp;<br />
याचना नहीं, अब रण होगा,&nbsp;<br />
जीवन-जय या कि मरण होगा।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&#39;टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,&nbsp;<br />
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,&nbsp;<br />
फण शेषनाग का डोलेगा,&nbsp;<br />
विकराल काल मुँह खोलेगा।&nbsp;<br />
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।&nbsp;<br />
फिर कभी नहीं जैसा होगा।&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&#39;भाई पर भाई टूटेंगे,&nbsp;<br />
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,&nbsp;<br />
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,&nbsp;<br />
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।&nbsp;<br />
आखिर तू भूशायी होगा,&nbsp;<br />
हिंसा का पर, दायी होगा।&#39;&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">थी सभा सन्न, सब लोग डरे,&nbsp;<br />
चुप थे या थे बेहोश पड़े।&nbsp;<br />
केवल दो नर ना अघाते थे,&nbsp;<br />
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।&nbsp;<br />
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,&nbsp;<br />
दोनों पुकारते थे &#39;जय-जय&#39;!</span></strong></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall8260.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[रामधारी सिंह दिनकर ]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rathmir-taki-mir-shayari-ka-khuda-best-sher]]></guid>
                       <title><![CDATA[मीर तक़ी मीर : शायरी का ख़ुदा]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rathmir-taki-mir-shayari-ka-khuda-best-sher]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 15 Jan 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
मीर तक़ी&nbsp;मीर साहब उर्दू अदब के वो नयाब हीरे थे जिनके बारे में अकबर इलाहाबादी साहब ने कहा था &quot;मैं हूँ क्या चीज़ जो इस तर्ज़ पे जाऊं &quot;अकबर &quot; मसिखो-ज़ौक़ भी चल न सके मीर के साथ।&quot; उर्दू के सर्वकालिक महान शायरों में शुमार मीर तकी मीर इस दुनिया-ए-फानी से कूच कर चुके है। मीर को शायरी का ख़ुदा कहा जाता है। यह तक की उर्दू के बेताज बादशाह कहे जाने वाले ग़ालिब ने जब एक फकीर से मीर की एक नज्म सुनी तो उनके मुंह से बेसाख्ता निकला, &#39;रेख्ते के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब, कहते हैं पिछले ज़माने में कोई मीर भी था।&#39; मीर को उर्दू के उस प्रचलन के लिए याद किया जाता है जिसमें फ़ारसी और हिन्दुस्तानी के शब्दों का अच्छा मिश्रण और सामंजस्य हो। उनके कूछ लाजवाब शेर हम आपके लिए लाए है-

राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या&nbsp;
आगे आगे देखिए होता है क्या

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है&nbsp;
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है&nbsp;

उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया&nbsp;
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया&nbsp;

अब तो जाते हैं बुत-कदे से &#39;मीर&#39;&nbsp;
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया&nbsp;

आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम&nbsp;
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये&nbsp;

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए&nbsp;
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है&nbsp;

बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो&nbsp;
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो&nbsp;

हम हुए तुम हुए कि &#39;मीर&#39; हुए&nbsp;
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए&nbsp;

दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है&nbsp;
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया&nbsp;

इश्क़ इक &#39;मीर&#39; भारी पत्थर है&nbsp;
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है

&nbsp;







&nbsp;





]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<div alegreya="" class="news-content" font-size:="" style="box-sizing: border-box; color: rgb(0, 0, 0); font-family: ">
<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; text-align: justify; font-size: 18px !important;"><span style="box-sizing: border-box;">मीर तक़ी&nbsp;</span><span style="box-sizing: border-box;">मीर साहब उर्दू अदब के वो नयाब हीरे थे जिनके बारे में अकबर इलाहाबादी साहब ने कहा था &quot;मैं हूँ क्या चीज़ जो इस तर्ज़ पे जाऊं &quot;अकबर &quot; मसिखो-ज़ौक़ भी चल न सके मीर के साथ।&quot; उर्दू के सर्वकालिक महान शायरों में शुमार मीर तकी मीर इस दुनिया-ए-फानी से कूच कर चुके है। मीर को शायरी का ख़ुदा कहा जाता है। यह तक की उर्दू के बेताज बादशाह कहे जाने वाले ग़ालिब ने जब एक फकीर से मीर की एक नज्म सुनी तो उनके मुंह से बेसाख्ता निकला, &#39;रेख्ते के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब, कहते हैं पिछले ज़माने में कोई मीर भी था।&#39; मीर को उर्दू के उस प्रचलन के लिए याद किया जाता है जिसमें फ़ारसी और हिन्दुस्तानी के शब्दों का अच्छा मिश्रण और सामंजस्य हो। उनके कूछ लाजवाब शेर हम आपके लिए लाए है-</span></p>

<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; text-align: justify; font-size: 18px !important;"><span style="box-sizing: border-box;">राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
आगे आगे देखिए होता है क्या</span></p>

<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; text-align: justify; font-size: 18px !important;"><span style="box-sizing: border-box;">पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है&nbsp;</span></p>

<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; text-align: justify; font-size: 18px !important;"><span style="box-sizing: border-box;">उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया&nbsp;</span></p>

<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; text-align: justify; font-size: 18px !important;"><span style="box-sizing: border-box;">अब तो जाते हैं बुत-कदे से &#39;मीर&#39;&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया&nbsp;</span></p>

<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; text-align: justify; font-size: 18px !important;"><span style="box-sizing: border-box;">आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये&nbsp;</span></p>

<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; text-align: justify; font-size: 18px !important;"><span style="box-sizing: border-box;">नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है&nbsp;</span></p>

<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; text-align: justify; font-size: 18px !important;"><span style="box-sizing: border-box;">बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो&nbsp;</span></p>

<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; text-align: justify; font-size: 18px !important;"><span style="box-sizing: border-box;">हम हुए तुम हुए कि &#39;मीर&#39; हुए&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए&nbsp;</span></p>

<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; text-align: justify; font-size: 18px !important;"><span style="box-sizing: border-box;">दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया&nbsp;</span></p>

<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; text-align: justify; font-size: 18px !important;"><span style="box-sizing: border-box;">इश्क़ इक &#39;मीर&#39; भारी पत्थर है&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है</span></p>

<div>&nbsp;</div>
</div>

<div alegreya="" class="masonry-slide-ad1 owl-carousel owl-theme" font-size:="" opacity:="" style="box-sizing: border-box; position: relative; width: 737.5px; color: rgb(0, 0, 0); font-family: ">
<div class="owl-wrapper-outer" style="box-sizing: border-box; overflow: hidden; position: relative; width: 737.5px;">
<div class="owl-wrapper" style="box-sizing: border-box; position: relative; transform: translate3d(0px, 0px, 0px); backface-visibility: hidden; width: 1476px; left: 0px; transition: all 1000ms ease 0s;">
<div class="owl-item" style="box-sizing: border-box; float: left; backface-visibility: hidden; transform: translate3d(0px, 0px, 0px); width: 738px;">
<div class="item" style="box-sizing: border-box;">
<div class="mas-item " style="box-sizing: border-box; position: relative; overflow: hidden;">&nbsp;</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall8229.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[मीर तक़ी मीर : शायरी का ख़ुदा]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/famous-sher-of-allama-iqbal-ke-mashoor-sher]]></guid>
                       <title><![CDATA[अल्लामा इक़बाल के मशहूर शेर जो आपको बना देंगे उनका मुरीद]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/famous-sher-of-allama-iqbal-ke-mashoor-sher]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 11 Jan 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[जब-जब किसी शायर ने अपनी क़लम उठाई है, तब-तब ज़िंदगी के किसी न किसी पहलू को शेर के रूप में हमारे सामने पेश किया है। ऐसे ही एक शायर हैं अल्लामा इक़बाल, जिन्होंने सिर्फ़ प्यार ही नहीं, बल्कि जीवन के हर एक भाव को अपने शेर में ढाला है। अल्लामा इकबाल का जन्म पंजाब, पाकिस्तान में 9 नवंबर 1877 को हुआ था और उनका देहांत 21 अप्रैल 1938 में हुआ था। इकबाल की रचनाएं उम्मीदों के साथ जिंदगी में हमेशा नए रास्तों की ईजाद करती रहीं। उर्दू और फ़ारसी में इनकी शायरी को आधुनिक काल की सर्वश्रेष्ठ शायरी में गिना जाता है। उनके उन्हीं शेर में से कुछ आज हम आपके लिए लेकर आए हैं।&nbsp;


1. सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा,&nbsp;
&nbsp; &nbsp; हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा।

&nbsp;

2. लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी
&nbsp; &nbsp; ज़िंदगी शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी!

&nbsp;

3. मिटा दे अपनी हस्ती को गर कुछ मर्तबा चाहिए,&nbsp;
&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कि दाना खाक में मिलकर, गुले-गुलजार होता है।

&nbsp;

4. ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,&nbsp;
&nbsp;&nbsp;&nbsp;ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।

&nbsp;

5. जफा जो इश्क में होती है वह जफा ही नहीं,
&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;सितम न हो तो मुहब्बत में कुछ मजा ही नहीं।

&nbsp;

6. सितारों से आगे जहाँ और भी हैं&nbsp;
&nbsp; &nbsp;&nbsp;अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं,
&nbsp; &nbsp;&nbsp;तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ&nbsp;
&nbsp; &nbsp;&nbsp;यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं।

&nbsp;

7. माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं,&nbsp;
&nbsp; &nbsp;&nbsp;तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख।

&nbsp;

8. नशा पिला के गिराना तो सब को आता है,&nbsp;
&nbsp; &nbsp;&nbsp;मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी।

&nbsp;

9. ज़ाहिद-ए-तंग-नज़र ने मुझे काफ़िर जाना,&nbsp;
&nbsp; &nbsp;&nbsp;और काफ़िर ये समझता है मुसलमान हूँ मैं।

&nbsp;

10. अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल,&nbsp;
&nbsp; &nbsp;&nbsp;&nbsp; &nbsp;लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे।

&nbsp;

11. दिल से जो बात निकलती है असर रखती है,&nbsp;
&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &nbsp;&nbsp;पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है।

&nbsp;

12. तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ,
&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &nbsp;&nbsp;मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ।

&nbsp;

13. जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी,&nbsp;
&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &nbsp;&nbsp;उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो।

&nbsp;

14. कभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई है,&nbsp;
&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &nbsp;&nbsp;बात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई है।

&nbsp;

15. जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में,&nbsp;
&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &nbsp;&nbsp;बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><span style="font-size:18px;">जब-जब किसी शायर ने अपनी क़लम उठाई है, तब-तब ज़िंदगी के किसी न किसी पहलू को शेर के रूप में हमारे सामने पेश किया है। ऐसे ही एक शायर हैं अल्लामा इक़बाल, जिन्होंने सिर्फ़ प्यार ही नहीं, बल्कि जीवन के हर एक भाव को अपने शेर में ढाला है। अल्लामा इकबाल का जन्म पंजाब, पाकिस्तान में 9 नवंबर 1877 को हुआ था और उनका देहांत 21 अप्रैल 1938 में हुआ था। इकबाल की रचनाएं उम्मीदों के साथ जिंदगी में हमेशा नए रास्तों की ईजाद करती रहीं। उर्दू और फ़ारसी में इनकी शायरी को आधुनिक काल की सर्वश्रेष्ठ शायरी में गिना जाता है। उनके उन्हीं शेर में से कुछ आज हम आपके लिए लेकर आए हैं।&nbsp;</span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="color:#000000;"><span style="font-size:18px;"><strong>1. सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा,&nbsp;<br />
&nbsp; &nbsp; हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा।</strong></span></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">2. लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी<br />
&nbsp; &nbsp; ज़िंदगी शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी!</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">3. मिटा दे अपनी हस्ती को गर कुछ मर्तबा चाहिए,&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px; text-align: justify;">&nbsp;&nbsp;&nbsp;</strong>&nbsp;<span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">कि दाना खाक में मिलकर, गुले-गुलजार होता है।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">4. ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px; text-align: justify;">&nbsp;&nbsp;&nbsp;</strong><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">5. जफा जो इश्क में होती है वह जफा ही नहीं,</span></strong></span><br />
<strong style="color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px; text-align: justify;">&nbsp;&nbsp;&nbsp;</strong>&nbsp;<span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">सितम न हो तो मुहब्बत में कुछ मजा ही नहीं।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">6. सितारों से आगे जहाँ और भी हैं&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp; &nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं,</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp; &nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp; &nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">7. माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं,&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp; &nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">8. नशा पिला के गिराना तो सब को आता है,&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp; &nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">9. ज़ाहिद-ए-तंग-नज़र ने मुझे काफ़िर जाना,&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp; &nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">और काफ़िर ये समझता है मुसलमान हूँ मैं।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">10. अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल,&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp; &nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span>&nbsp; &nbsp;<span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">11. दिल से जो बात निकलती है असर रखती है,&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp;&nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="text-align: justify;">&nbsp; &nbsp;</span>&nbsp;<span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">12. तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ,</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp;&nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="text-align: justify;">&nbsp; &nbsp;</span><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">13. जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी,&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp;&nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="text-align: justify;">&nbsp; &nbsp;</span><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">14. कभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई है,&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp;&nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="text-align: justify;">&nbsp; &nbsp;</span><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">बात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई है।</span></strong></span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">15. जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में,&nbsp;</span></strong></span><br />
<strong style="text-align: justify; color: rgb(0, 0, 0); font-size: 18px;">&nbsp;&nbsp;</strong><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="text-align: justify;">&nbsp; &nbsp;</span><span style="text-align: justify;">&nbsp;</span><span style="color:#000000;"><strong><span style="font-size:18px;">बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते।</span></strong></span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall8171.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[famous-sher-of-allama-iqbal-ke-mashoor-sher]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/best-poem-of-faiz-ahmad-faiz-kuch-ishq-kia-kuch-kam-kia]]></guid>
                       <title><![CDATA[ कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/best-poem-of-faiz-ahmad-faiz-kuch-ishq-kia-kuch-kam-kia]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 09 Jan 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[फैज़ अहमद फैज़&nbsp;

मशहूर नगमानिगार फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एक बेमिसाल शायर थे।&nbsp; उनकी शायरी में अहसास, बदलाव, प्रेम और सुकुन सब कुछ था। वो&nbsp; भारतीय उपमहाद्वीप के एक विख्यात पंजाबी शायर थे, जिन्हें अपनी क्रांतिकारी रचनाओं में रसिक भाव&nbsp; के मेल की वजह से जाना जाता है। सेना, जेल तथा निर्वासन में जीवन व्यतीत करने वाले फ़ैज़ ने कई नज़्में और ग़ज़लें लिखी तथा उर्दू शायरी में आधुनिक प्रगतिवादी&nbsp; दौर की रचनाओं को सबल किया। पढ़िए उनकी लिखी एक ख़ूबसूरत नज़्म : कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

&nbsp;कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

वो लोग बोहत खुश-किस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे

हम जीते जी मसरूफ रहे
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आ कर हमने
दोनों को अधूरा छोड दिया
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size:18px;">फैज़ अहमद फैज़&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">मशहूर नगमानिगार फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एक बेमिसाल शायर थे।&nbsp; उनकी शायरी में अहसास, बदलाव, प्रेम और सुकुन सब कुछ था। वो&nbsp; भारतीय उपमहाद्वीप के एक विख्यात पंजाबी शायर थे, जिन्हें अपनी क्रांतिकारी रचनाओं में रसिक भाव&nbsp; के मेल की वजह से जाना जाता है। सेना, जेल तथा निर्वासन में जीवन व्यतीत करने वाले फ़ैज़ ने कई नज़्में और ग़ज़लें लिखी तथा उर्दू शायरी में आधुनिक प्रगतिवादी&nbsp; दौर की रचनाओं को सबल किया। पढ़िए उनकी लिखी एक ख़ूबसूरत नज़्म : कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp;<span style="font-size:20px;"><strong>कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया</strong></span></span></p>

<p><span style="font-size:18px;">वो लोग बोहत खुश-किस्मत थे<br />
जो इश्क़ को काम समझते थे<br />
या काम से आशिकी करते थे</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">हम जीते जी मसरूफ रहे<br />
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया<br />
काम इश्क के आड़े आता रहा<br />
और इश्क से काम उलझता रहा<br />
फिर आखिर तंग आ कर हमने<br />
दोनों को अधूरा छोड दिया</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall8154.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[best-poem-of-faiz-ahmad-faiz-kuch-ishq-kia-kuch-kam-kia ]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/famous-20-shayari-related-to-politics-mashoor-sher]]></guid>
                       <title><![CDATA[सियासत और शायरी ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/kavya-rath/famous-20-shayari-related-to-politics-mashoor-sher]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 08 Jan 2021 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[सियासत और शायरी का रिश्ता बहुत पुराना है। कभी कुछ लफ्ज़ आवाम कि आवाज़ बन जाते हैं, तो कभी कुछ हुकूमत के उज़्र। बड़े आंदोलनों के नारों से लेकर संसद के इशारों तक, सियासत का शायराना मिजाज़ हर किसी को लुभाता है। प्रस्तुत है सियासत पर लिखे कुछ उम्दा शेर-

1&nbsp; जंग में कत़्ल सिपाही होंगे
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;सुर्खरु ज़िल्ले इलाही होंगे
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;मौज रामपुरी

2&nbsp; दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; बशीर बद्र&nbsp;

3&nbsp; &nbsp;ऐ क़ाफ़िले वालों, तुम इतना भी नहीं समझे
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;लूटा है तुम्हे रहज़न ने, रहबर के इशारे पर&nbsp;
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; तरन्नुम कानपुरी

4&nbsp; &nbsp;कच्चे मकान जिनके जले थे फ़साद में
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; अफ़सोस उनका नाम ही बलवाइयों में था
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;नईम जज़्बी

5&nbsp; &nbsp;औरों के ख़यालात की लेते हैं तलाशी&nbsp;
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;और अपने गरेबान में झाँका नहीं जाता
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;मुज़फ्फर वारसी&nbsp;

6&nbsp; &nbsp;एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है&nbsp;
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; मुन्नवर राना&nbsp;

7&nbsp; काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ.
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; शकील बदायुनी&nbsp;

8&nbsp; &nbsp;तूफ़ान में हो नाव तो कुछ सब्र भी आ जाए&nbsp;
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; साहिल पे खड़े हो के तो डूबा नहीं जाता&nbsp;
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;मुज़फ़्फ़र वारसी

9&nbsp; हुकूमत से एजाज़ अगर चाहते हो
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; अंधेरा है लेकिन लिखो रोशनी है
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;अशरफ़ मालवी

10&nbsp; &nbsp;तबाह कर दिया अहबाब को सियासत ने&nbsp;
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; मगर मकान से झंडा नहीं उतरता है&nbsp;
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; शकील जमाली

11 कितने चेहरे लगे हैं चेहरों पर&nbsp;
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;क्या हक़ीक़त है और सियासत क्या&nbsp;
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; सागर ख़य्यामी

12&nbsp; हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;जिस को भी देखना हो कई बार देखना
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; निदा फ़ाज़ली


13&nbsp; नए किरदार आते जा रहे हैं
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;मगर नाटक पुराना चल रहा है
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;राहत इंदौरी

14&nbsp; कुर्सी है तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; अज्ञात

15&nbsp; देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;ढूँडोगे तो इस शहर में क़ातिल न मिलेगा
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

16&nbsp; धुआँ जो कुछ घरों से उठ रहा है
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; न पूरे शहर पर छाए तो कहना
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;जावेद अख़्तर

17&nbsp; इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;नादिम नदीम

18&nbsp; &nbsp; ये सच है रंग बदलता था वो हर इक लम्हा
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; मगर वही तो बहुत कामयाब चेहरा था
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;अम्बर बहराईची

19&nbsp; &nbsp;सियासत की दुकानों में रोशनी के लिए,
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;जरूरी है कि मुल्क मेरा जलता रहे।
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; अज्ञात&nbsp;

20&nbsp; &nbsp; &nbsp;कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये,
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये।
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; दुष्यंत कुमार
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">सियासत और शायरी का रिश्ता बहुत पुराना है। कभी कुछ लफ्ज़ आवाम कि आवाज़ बन जाते हैं, तो कभी कुछ हुकूमत के उज़्र। बड़े आंदोलनों के नारों से लेकर संसद के इशारों तक, सियासत का शायराना मिजाज़ हर किसी को लुभाता है। प्रस्तुत है सियासत पर लिखे कुछ उम्दा शेर-</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">1&nbsp; <strong>जंग में कत़्ल सिपाही होंगे<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;सुर्खरु ज़िल्ले इलाही होंगे</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="color:#2F4F4F;">&nbsp;<span style="font-size:18px;">मौज रामपुरी</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">2&nbsp; <strong>दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="font-size:18px;">&nbsp; <span style="color:#2F4F4F;">बशीर बद्र&nbsp;</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">3&nbsp; &nbsp;<strong>ऐ क़ाफ़िले वालों, तुम इतना भी नहीं समझे<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;लूटा है तुम्हे रहज़न ने, रहबर के इशारे पर&nbsp;</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="color:#2F4F4F;"><span style="font-size:18px;">तरन्नुम कानपुरी</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">4&nbsp; &nbsp;<strong>कच्चे मकान जिनके जले थे फ़साद में<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; अफ़सोस उनका नाम ही बलवाइयों में था</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="color:#2F4F4F;">&nbsp;<span style="font-size:18px;">नईम जज़्बी</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">5&nbsp; &nbsp;<strong>औरों के ख़यालात की लेते हैं तलाशी&nbsp;<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;और अपने गरेबान में झाँका नहीं जाता</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="color:#2F4F4F;">&nbsp;<span style="font-size:18px;">मुज़फ्फर वारसी</span>&nbsp;</span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">6&nbsp; &nbsp;<strong>एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है&nbsp;<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;<span style="font-size:18px;"><span style="color:#2F4F4F;"> मुन्नवर रा</span></span></span><span style="font-size:18px;"><span style="color:#2F4F4F;"><strong style="font-size: 20px; text-align: justify;">ना</strong>&nbsp;</span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">7&nbsp; <strong>काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ.</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="color:#2F4F4F;"><span style="font-size:18px;">शकील बदायुनी&nbsp;</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">8&nbsp; &nbsp;<strong>तूफ़ान में हो नाव तो कुछ सब्र भी आ जाए&nbsp;<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; साहिल पे खड़े हो के तो डूबा नहीं जाता&nbsp;</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;<span style="color:#2F4F4F;"><span style="font-size:18px;">मुज़फ़्फ़र वारसी</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">9&nbsp; <strong>हुकूमत से एजाज़ अगर चाहते हो<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; अंधेरा है लेकिन लिखो रोशनी है</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;<span style="color:#2F4F4F;"><span style="font-size:18px;">अशरफ़ मालवी</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">10&nbsp; &nbsp;<strong>तबाह कर दिया अहबाब को सियासत ने&nbsp;<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; मगर मकान से झंडा नहीं उतरता है&nbsp;</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="font-size:18px;"><span style="color:#2F4F4F;">शकील जमाली</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">11 <strong>कितने चेहरे लगे हैं चेहरों पर&nbsp;<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;क्या हक़ीक़त है और सियासत क्या</strong>&nbsp;<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;<span style="color:#2F4F4F;"><span style="font-size:18px;"> सागर ख़य्यामी</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">12&nbsp; <strong>हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;जिस को भी देखना हो कई बार देखना</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;<span style="font-size:18px;"><span style="color:#2F4F4F;"> निदा फ़ाज़ली</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:20px;">13&nbsp; <strong>नए किरदार आते जा रहे हैं<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;मगर नाटक पुराना चल रहा है</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;<span style="color:#2F4F4F;"><span style="font-size:18px;">राहत इंदौरी</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">14&nbsp; <strong>कुर्सी है तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="color:#2F4F4F;"><span style="font-size:18px;">अज्ञात</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">15&nbsp;<strong> देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;ढूँडोगे तो इस शहर में क़ातिल न मिलेगा</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="color:#2F4F4F;"><span style="font-size:18px;">मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">16&nbsp; <strong>धुआँ जो कुछ घरों से उठ रहा है<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; न पूरे शहर पर छाए तो कहना</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;<span style="font-size:18px;"><span style="color:#2F4F4F;">जावेद अख़्तर</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">17&nbsp; <strong>इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;<span style="font-size:18px;"><span style="color:#2F4F4F;">नादिम नदीम</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">18&nbsp; &nbsp; <strong>ये सच है रंग बदलता था वो हर इक लम्हा<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; मगर वही तो बहुत कामयाब चेहरा था</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="color:#2F4F4F;">&nbsp;<span style="font-size:18px;">अम्बर बहराईची</span></span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">19&nbsp; &nbsp;<strong>सियासत की दुकानों में रोशनी के लिए,<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;जरूरी है कि मुल्क मेरा जलता रहे।</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="color:#008080;">&nbsp; </span><span style="color:#2F4F4F;">अज्ञात&nbsp;</span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:20px;">20&nbsp; &nbsp; &nbsp;<strong>कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये,<br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये।</strong><br />
&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; <span style="color:#2F4F4F;"><span style="font-size:18px;">दुष्यंत कुमार</span></span></span></p>
]]></content:encoded>
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