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               <title>First Verdict Media - Siyasatnama</title>
               <link>https://www.firstverdict.com</link>
               <lastBuildDate><![CDATA[Fri, 01 May 2026 08:50:53 +0530]]></lastBuildDate>
            <language>en</language>	<image>
            	<title>First Verdict Media - Siyasatnama</title>
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            <description>First Verdict Media provides the latest information from and in-depth coverage of India and the world. Find breaking news, India news, Himachal news, top stories, elections, politics, business, cricket, movies, lifestyle, health, videos, photos and more.</description>
            
           <item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/congress-appointed-32-district-heads-in-haryana]]></guid>
                       <title><![CDATA[11 साल बाद हरियाणा कांग्रेस को मिले जिला अध्यक्ष, हिमाचल में भी 9 महीने से इन्तजार ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/congress-appointed-32-district-heads-in-haryana]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 13 Aug 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[बगैर संगठन के ही हरियाणा में कई चुनाव लड़ने और हारने के&nbsp; बाद&nbsp; आखिरकार 11 साल बाद मंगलवार देर रात कांग्रेस ने हरियाणा में 32 जिला अध्यक्षों के नामों की घोषणा की है। पानीपत शहरी के अलावा सभी अन्य 32 संगठनत्मक ज़िलों में अध्यक्षों की नियुक्ति हो गई है। माना जा रहा है की संगठन की शेष नियुक्तियां भी जल्द होगी। इन नियुक्तियों में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा का दबदबा रहा है। 32 में से 22 जिला अध्यक्ष हुड्डा गुट के बताए जा रहे हैं, जबकि सात सांसद कुमारी सैलजा, एक रणदीप सुरजेवाला और दो कैप्टन अजय यादव के समर्थक हैं।&nbsp; इस सूचि में सिर्फ दो महिलाएं है। संतोष बेनीवाल को सिरसा और मेवात के शाहिदा खान, जो कि एकमात्र मुस्लिम नेता को कमान दी गई है। जबकि विधानसभा चुनाव लड़ चुके चार नेताओं को जिलाध्यक्ष बनाया है।&nbsp;


हरियाणा में हुई इन नियुक्तियों के बाद अब निगाहें हिमाचल पर टिकी है, जहँ नौ महीने से भी ज्यादा वक्त से राज्य, जिला और ब्लॉक इकाइयां भंग है। इस बीच&nbsp; मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभग सिंह&nbsp; का कार्यकाल भी पूरा हो चूका है और नए अध्यक्ष के एलान का इन्तजार भी जारी है।&nbsp;&nbsp;



ये 32 नेता बने, जिला अध्यक्ष&nbsp;
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल की ओर से सूची के अनुसार, अंबाला कैंट से परविंदर परी,&nbsp; अंबाला सिटी से पवन अग्रवाल, अंबाला ग्रामीण से दुष्यंत चौहान, भिवानी ग्रामीण से अनिरुद्ध चौधरी, भिवानी शहरी से प्रदीप गुलिया, चरखी दादरी से सुशील धनक, फरीदाबाद से बलजीत कौशिक, फतेहाबाद से अरविंद शर्मा, गुरुग्राम ग्रामीण से वर्धन यादव, गुरुग्राम शहरी से पंकज दावर को जिला अध्यक्ष बनाया गया है। इसी तरह, हिसार ग्रामीण से बृज लाल खोवाल, हिसार शहरी से बजरंग दास गर्ग, झज्जर से संजय यादव, जींद से ऋषि पाल, कैथल से रामचंदर गुज्जर, करनाल ग्रामीण से राजेश वैद, करनाल शहरी से पराग गाबा, कुरुक्षेत्र से मेवा सिंह, महेंद्रगढ़ से सत्यवीर यादव, मेवात (नूंह) से शाहिदा खान, पलवल से नेत्रपाल अधाना, पंचकूला से संजय चौहान, पानीपत ग्रामीण से रमेश मलिक, रेवाड़ी ग्रामीण से सुभाष चंद चौवरी, रेवाड़ी शहरी से प्रवीण चौधरी, रोहतक ग्रामीण से बलवान सिंह रंगा, रोहतक शहरी से कुलदीप सिंह, सिरसा से संतोष बेनिवाल, सोनीपत ग्रामीण से संजीव कुमार दहिया, सोनीपत शहरी से कमल देवान, यमुनानगर ग्रामीण से नरपाल सिंह और यमुनानगर शहरी से देवेंद्र सिंह को जिम्मेदारी सौंपी गई है।&nbsp;&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">बगैर संगठन के ही हरियाणा में कई चुनाव लड़ने और हारने के&nbsp; बाद&nbsp; आखिरकार 11 साल बाद मंगलवार देर रात कांग्रेस ने हरियाणा में 32 जिला अध्यक्षों के नामों की घोषणा की है। पानीपत शहरी के अलावा सभी अन्य 32 संगठनत्मक ज़िलों में अध्यक्षों की नियुक्ति हो गई है। माना जा रहा है की संगठन की शेष नियुक्तियां भी जल्द होगी। इन नियुक्तियों में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा का दबदबा रहा है। 32 में से 22 जिला अध्यक्ष हुड्डा गुट के बताए जा रहे हैं, जबकि सात सांसद कुमारी सैलजा, एक रणदीप सुरजेवाला और दो कैप्टन अजय यादव के समर्थक हैं।&nbsp; इस सूचि में सिर्फ दो महिलाएं है। संतोष बेनीवाल को सिरसा और मेवात के शाहिदा खान, जो कि एकमात्र मुस्लिम नेता को कमान दी गई है। जबकि विधानसभा चुनाव लड़ चुके चार नेताओं को जिलाध्यक्ष बनाया है।&nbsp;</span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हरियाणा में हुई इन नियुक्तियों के बाद अब निगाहें हिमाचल पर टिकी है, जहँ नौ महीने से भी ज्यादा वक्त से राज्य, जिला और ब्लॉक इकाइयां भंग है। इस बीच&nbsp; मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभग सिंह&nbsp; का कार्यकाल भी पूरा हो चूका है और नए अध्यक्ष के एलान का इन्तजार भी जारी है।&nbsp;&nbsp;</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;"><strong>ये 32 नेता बने, जिला अध्यक्ष&nbsp;</strong><br />
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल की ओर से सूची के अनुसार, अंबाला कैंट से परविंदर परी,&nbsp; अंबाला सिटी से पवन अग्रवाल, अंबाला ग्रामीण से दुष्यंत चौहान, भिवानी ग्रामीण से अनिरुद्ध चौधरी, भिवानी शहरी से प्रदीप गुलिया, चरखी दादरी से सुशील धनक, फरीदाबाद से बलजीत कौशिक, फतेहाबाद से अरविंद शर्मा, गुरुग्राम ग्रामीण से वर्धन यादव, गुरुग्राम शहरी से पंकज दावर को जिला अध्यक्ष बनाया गया है। इसी तरह, हिसार ग्रामीण से बृज लाल खोवाल, हिसार शहरी से बजरंग दास गर्ग, झज्जर से संजय यादव, जींद से ऋषि पाल, कैथल से रामचंदर गुज्जर, करनाल ग्रामीण से राजेश वैद, करनाल शहरी से पराग गाबा, कुरुक्षेत्र से मेवा सिंह, महेंद्रगढ़ से सत्यवीर यादव, मेवात (नूंह) से शाहिदा खान, पलवल से नेत्रपाल अधाना, पंचकूला से संजय चौहान, पानीपत ग्रामीण से रमेश मलिक, रेवाड़ी ग्रामीण से सुभाष चंद चौवरी, रेवाड़ी शहरी से प्रवीण चौधरी, रोहतक ग्रामीण से बलवान सिंह रंगा, रोहतक शहरी से कुलदीप सिंह, सिरसा से संतोष बेनिवाल, सोनीपत ग्रामीण से संजीव कुमार दहिया, सोनीपत शहरी से कमल देवान, यमुनानगर ग्रामीण से नरपाल सिंह और यमुनानगर शहरी से देवेंद्र सिंह को जिम्मेदारी सौंपी गई है।&nbsp;&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images241170.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[CONGRESS-APPOINTED-32-DISTRICT-HEADS-IN-HARYANA]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/no-sangthan-for-himachal-congress-since-eight-months]]></guid>
                       <title><![CDATA[कांग्रेस संगठन : कार्यकर्त्ता हताश, बड़े नेताओं का एक ही जवाब - 'जल्द होगा']]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/no-sangthan-for-himachal-congress-since-eight-months]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 10 Jul 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
&nbsp;6 नवंबर से बेसंगठन हैं कांग्रेस, जल्द होने हैं पंचायत चुनाव&nbsp;

&nbsp; &nbsp;करीब एक साल पहले हिमाचल प्रदेश में उपचुनाव हुए और कांग्रेस ने शानदार जीत दर्ज की थी। पुरे प्रदेश में कांग्रेस के पक्ष में माहौल दिखा। तब कई माहिरों ने कहा कि जो 1985&nbsp; के बाद नहीं हुआ, मुमकिन है 2027 में हो। मुमकिन है सुखविंद्र सिंह सुक्खू , वीरभद्र सिंह के बाद रिपीट करने वाले पहले सीएम बन जाएं। पर अब उक्त तमाम माहिर चुप्पी ओढ़े है और इसका सबसे बड़ा कारण है कांग्रेस का संगठन, जो आठ महीने से है ही नहीं।&nbsp;&nbsp;

&nbsp; चुनाव के नतीजे संगठन की मेहनत और सरकारों के कामकाज से तय होते है। अब सत्ता का करीब आधा रास्ता ही तय हुआ है और चुनावी&nbsp; चश्मे से मौजूदा सरकार के कामकाज का विशलेषण करना जल्दबाजी होगा। पर संगठन का क्या ? पार्टी के भीतर पनप रहे असंतोष का क्या ?&nbsp;
झंडे उठाने वाले आम कार्यकर्ताओं से लेकर पीसीसी चीफ, कैबिनेट मंत्री और अब तो खुद मुख्यमंत्री भी संगठन में देरी को नुकसानदायक मान रहे है। फिर ये देरी क्यों , ये समझ से परे है।&nbsp;

मान लेते है मसला पीसीसी चीफ पद अटका हैं, और खींचतान के चलते आलाकमान निर्णय नहीं ले पा रहा , लेकिन क्या ज़िलों अध्यक्षों और प्रदेश के महत्वपूर्ण पदों पर भी नियुक्तियां नहीं की जा सकती थी। इसी साल के अंत में पंचायत चुनाव होने हैं, नई गठित नगर निगमों के चुनाव भी अपेक्षित हैं। ऐसे में आठ महीने से पार्टी का बगैर संगठन होना समझ से परे हैं।&nbsp;

&nbsp;इस बीच संगठन के गठन को लेकर अब भी कोई पुख्ता जानकारी नहीं हैं। कार्यकर्ताओं की हताशा लाजमी हैं और धैर्य धरे बड़े नेताओं के पास सिर्फ एक ही जवाब हैं, &#39;जल्द होगा&#39;।&nbsp;&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><br />
<strong><span style="font-size:18px;">&nbsp;6 नवंबर से बेसंगठन हैं कांग्रेस, जल्द होने हैं पंचायत चुनाव&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;करीब एक साल पहले हिमाचल प्रदेश में उपचुनाव हुए और कांग्रेस ने शानदार जीत दर्ज की थी। पुरे प्रदेश में कांग्रेस के पक्ष में माहौल दिखा। तब कई माहिरों ने कहा कि जो 1985&nbsp; के बाद नहीं हुआ, मुमकिन है 2027 में हो। मुमकिन है सुखविंद्र सिंह सुक्खू , वीरभद्र सिंह के बाद रिपीट करने वाले पहले सीएम बन जाएं। पर अब उक्त तमाम माहिर चुप्पी ओढ़े है और इसका सबसे बड़ा कारण है कांग्रेस का संगठन, जो आठ महीने से है ही नहीं।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; चुनाव के नतीजे संगठन की मेहनत और सरकारों के कामकाज से तय होते है। अब सत्ता का करीब आधा रास्ता ही तय हुआ है और चुनावी&nbsp; चश्मे से मौजूदा सरकार के कामकाज का विशलेषण करना जल्दबाजी होगा। पर संगठन का क्या ? पार्टी के भीतर पनप रहे असंतोष का क्या ?&nbsp;<br />
झंडे उठाने वाले आम कार्यकर्ताओं से लेकर पीसीसी चीफ, कैबिनेट मंत्री और अब तो खुद मुख्यमंत्री भी संगठन में देरी को नुकसानदायक मान रहे है। फिर ये देरी क्यों , ये समझ से परे है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मान लेते है मसला पीसीसी चीफ पद अटका हैं, और खींचतान के चलते आलाकमान निर्णय नहीं ले पा रहा , लेकिन क्या ज़िलों अध्यक्षों और प्रदेश के महत्वपूर्ण पदों पर भी नियुक्तियां नहीं की जा सकती थी। इसी साल के अंत में पंचायत चुनाव होने हैं, नई गठित नगर निगमों के चुनाव भी अपेक्षित हैं। ऐसे में आठ महीने से पार्टी का बगैर संगठन होना समझ से परे हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;इस बीच संगठन के गठन को लेकर अब भी कोई पुख्ता जानकारी नहीं हैं। कार्यकर्ताओं की हताशा लाजमी हैं और धैर्य धरे बड़े नेताओं के पास सिर्फ एक ही जवाब हैं, &#39;जल्द होगा&#39;।&nbsp;&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images240910.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[NO SANGTHAN FOR HIMACHAL CONGRESS SINCE EIGHT MONTHS ]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/jp-nadda-and-dhumal-meeting]]></guid>
                       <title><![CDATA[ मुलाक़ात हुई न जाने क्या बात हुई ...नड्डा और धूमल की गुप्त मंत्रणा ने मचाई हलचल ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/jp-nadda-and-dhumal-meeting]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 05 Jul 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;लम्बे समय तक हिमाचल में भाजपा की राजनीति का केंद्र रहे समीरपुर में खुद भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा पहुंचे, तो सियासी हलचल मचना तो लाजमी था। ये कोई आम औपचारिक मुलाकात होती तो बात न होती, लेकिन बंद कमरे में जेपी नड्डा और प्रेम कुमार धूमल के बीच लगभग 35 मिनट गुफ्तगू हुई, तो सियासी गलियारों में चर्चा तो होनी ही थी। इस बारे में कोई अधिकारिक जानकारी तो बाहर नहीं आई, लेकिन इस मंत्रणा को को आगामी संगठनात्मक बदलावों और प्रदेश भाजपा की आगामी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।&nbsp;

दरअसल, हिमाचल प्रदेश में भाजपा को लगातार शिकस्त का सामना करना पड़ रहा है। 2021 के उपचुनाव से शुरू हुआ पराजय का रथ अब तक नहीं थमा। माहिर इसका एक बड़ा कारण धूमल कैंप&nbsp; की उपेक्षा मानते रहे है। वहीँ, बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष जो जेपी नड्डा दिल्ली तक फ़तेह कर गए, घर में उनके प्रभाव पर भी खूब सवाल उठे है। कभी धूमल कैबिनेट में मंत्री रहे नड्डा को भी इल्म है कि हिमाचल की राजनैतिक जमीन में धूमल के प्रभाव की जड़े बेहद गहरी है।&nbsp;&nbsp;

धूमल पार्टी के सच्चे और अनुशासित सिपाही रहे है, कभी खुलकर नाराजगी नहीं जताई लेकिन उनके ख़ास माने जाने वाले कई नेता एक एक कर दरकिनार दीखते है। बलदेव शर्मा हो, रमेश चंद ध्वाला, राम लाल मार्कण्डेय या वीरेंदर कँवर; पिछले साल उपचुनाव में इन तमाम नेताओं&nbsp; के टिकट काटे गए। उक्त तमाम सीटें भाजपा हारी। वहीँ धूमल के गृह क्षेत्र की सीट सुजानपुर में तो उनके शागिर्द कैप्टेन रंजीत सिंह राणा कांग्रेस के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंच गए। ये फेहरिस्त लम्बी है, और अब भी ऐसी कई सीटें ही जहाँ धूमल के निष्ठावान नेता दरकिनार दीखते है और बड़ा फर्क भी डाल सकते है। माहिर मानते है की नड्डा और धूमल की मुलकात में संभव है इसे लेकर भी चर्चा हुई हो। संभव है भाजपा मध्यम मार्ग अपनाती दिखे।&nbsp;&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 16px;">&nbsp;लम्बे समय तक हिमाचल में भाजपा की राजनीति का केंद्र रहे समीरपुर में खुद भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा पहुंचे, तो सियासी हलचल मचना तो लाजमी था। ये कोई आम औपचारिक मुलाकात होती तो बात न होती, लेकिन बंद कमरे में जेपी नड्डा और प्रेम कुमार धूमल के बीच लगभग 35 मिनट गुफ्तगू हुई, तो सियासी गलियारों में चर्चा तो होनी ही थी। इस बारे में कोई अधिकारिक जानकारी तो बाहर नहीं आई, लेकिन इस मंत्रणा को को आगामी संगठनात्मक बदलावों और प्रदेश भाजपा की आगामी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:16px;">दरअसल, हिमाचल प्रदेश में भाजपा को लगातार शिकस्त का सामना करना पड़ रहा है। 2021 के उपचुनाव से शुरू हुआ पराजय का रथ अब तक नहीं थमा। माहिर इसका एक बड़ा कारण धूमल कैंप&nbsp; की उपेक्षा मानते रहे है। वहीँ, बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष जो जेपी नड्डा दिल्ली तक फ़तेह कर गए, घर में उनके प्रभाव पर भी खूब सवाल उठे है। कभी धूमल कैबिनेट में मंत्री रहे नड्डा को भी इल्म है कि हिमाचल की राजनैतिक जमीन में धूमल के प्रभाव की जड़े बेहद गहरी है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:16px;">धूमल पार्टी के सच्चे और अनुशासित सिपाही रहे है, कभी खुलकर नाराजगी नहीं जताई लेकिन उनके ख़ास माने जाने वाले कई नेता एक एक कर दरकिनार दीखते है। बलदेव शर्मा हो, रमेश चंद ध्वाला, राम लाल मार्कण्डेय या वीरेंदर कँवर; पिछले साल उपचुनाव में इन तमाम नेताओं&nbsp; के टिकट काटे गए। उक्त तमाम सीटें भाजपा हारी। वहीँ धूमल के गृह क्षेत्र की सीट सुजानपुर में तो उनके शागिर्द कैप्टेन रंजीत सिंह राणा कांग्रेस के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंच गए। ये फेहरिस्त लम्बी है, और अब भी ऐसी कई सीटें ही जहाँ धूमल के निष्ठावान नेता दरकिनार दीखते है और बड़ा फर्क भी डाल सकते है। माहिर मानते है की नड्डा और धूमल की मुलकात में संभव है इसे लेकर भी चर्चा हुई हो। संभव है भाजपा मध्यम मार्ग अपनाती दिखे।&nbsp;&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images240840.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[JP NADDA AND DHUMAL MEETING ]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/no-independent-mlas-in-himachal-voidhansabha]]></guid>
                       <title><![CDATA[पहली बार हिमाचल विधानसभा में नहीं बचा एक भी स्वतंत्र विधायक]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/no-independent-mlas-in-himachal-voidhansabha]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 27 Jun 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[हिमाचल प्रदेश की राजनीति में निर्दलीय विधायकों का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। निर्दलीयों को उन नेताओं के तौर पर देखा जाता रहा है जो न किसी पार्टी की छतरी में पले, न झंडे के सहारे जीते, सिर्फ जनसमर्थन के बल पर विधानसभा तक पहुंचे।

साल 1967 के चुनाव में रिकॉर्ड 16 निर्दलीय विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। इसके बाद भी कई चुनाव ऐसे रहे जब निर्दलीयों ने बड़ी संख्या में जीत दर्ज की। 1957 में 12, 1952 में 8, 1972 और 1993 में 7-7, 1977, 1982 और 2003 में 6-6, 2012 में 5, 1962, 2007 और 2022 में 3-3, 1985 और 2017 में 2-2 तथा 1990 और 1998 में 1-1 निर्दलीय विधायक चुने गए।

1998 में रमेश धवाला जैसे नेता तो किंगमेकर बन गए थे, जिन्होंने सत्ता का पूरा समीकरण पलट दिया था।

लेकिन वक्त के साथ तस्वीर बदल गई है।

वर्ष 2022 में तीन निर्दलीय विधायक, होशियार सिंह, आशीष शर्मा और के एल ठाकुर जनता के समर्थन से जीते थे। लेकिन 2024 में इन नेताओं ने अपने एक फैसले से इस जनादेश को दरकिनार कर दिया। दरअसल 2024 में राज्यसभा चुनावों के दौरान इन नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने के बाद न जाने किन कारणों से इस्तीफा देने का अप्रत्याशित निर्णय लिया।

तीन जून को उनके इस्तीफे स्वीकार हुए और दस जुलाई को उपचुनाव हुए। भाजपा ने तीनों को फिर से टिकट दिया और वे भाजपा उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़े। इन चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में थे, लेकिन कोई भी निर्दलीय चुनाव नहीं जीत सका।

नतीजन इन उपचुनावों के बाद विधानसभा से निर्दलीयों का पूरी तरह सफाया हो गया। हिमाचल के राजनीतिक इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि सदन में एक भी स्वतंत्र विधायक मौजूद नहीं है।

आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि सदन में निर्दलीय विधायक न बैठे हों। मगर अब यही हिमाचल की राजनीति की नई तस्वीर है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p data-end="413" data-start="185" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हिमाचल प्रदेश की राजनीति में निर्दलीय विधायकों का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। निर्दलीयों को उन नेताओं के तौर पर देखा जाता रहा है जो न किसी पार्टी की छतरी में पले, न झंडे के सहारे जीते, सिर्फ जनसमर्थन के बल पर विधानसभा तक पहुंचे।</span></p>

<p data-end="751" data-start="415" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">साल 1967 के चुनाव में रिकॉर्ड 16 निर्दलीय विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। इसके बाद भी कई चुनाव ऐसे रहे जब निर्दलीयों ने बड़ी संख्या में जीत दर्ज की। 1957 में 12, 1952 में 8, 1972 और 1993 में 7-7, 1977, 1982 और 2003 में 6-6, 2012 में 5, 1962, 2007 और 2022 में 3-3, 1985 और 2017 में 2-2 तथा 1990 और 1998 में 1-1 निर्दलीय विधायक चुने गए।</span></p>

<p data-end="848" data-start="753" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">1998 में रमेश धवाला जैसे नेता तो किंगमेकर बन गए थे, जिन्होंने सत्ता का पूरा समीकरण पलट दिया था।</span></p>

<p data-end="885" data-start="850" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">लेकिन वक्त के साथ तस्वीर बदल गई है।</span></p>

<p data-end="1221" data-start="887" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">वर्ष 2022 में तीन निर्दलीय विधायक, होशियार सिंह, आशीष शर्मा और के एल ठाकुर जनता के समर्थन से जीते थे। लेकिन 2024 में इन नेताओं ने अपने एक फैसले से इस जनादेश को दरकिनार कर दिया। दरअसल 2024 में राज्यसभा चुनावों के दौरान इन नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने के बाद न जाने किन कारणों से इस्तीफा देने का अप्रत्याशित निर्णय लिया।</span></p>

<p data-end="1453" data-start="1223" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">तीन जून को उनके इस्तीफे स्वीकार हुए और दस जुलाई को उपचुनाव हुए। भाजपा ने तीनों को फिर से टिकट दिया और वे भाजपा उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़े। इन चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में थे, लेकिन कोई भी निर्दलीय चुनाव नहीं जीत सका।</span></p>

<p data-end="1625" data-start="1455" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नतीजन इन उपचुनावों के बाद विधानसभा से निर्दलीयों का पूरी तरह सफाया हो गया। हिमाचल के राजनीतिक इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि सदन में एक भी स्वतंत्र विधायक मौजूद नहीं है।</span></p>

<p data-end="1739" data-start="1627" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि सदन में निर्दलीय विधायक न बैठे हों। मगर अब यही हिमाचल की राजनीति की नई तस्वीर है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40764.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[no independent mlas in himachal voidhansabha ]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/news/himachals-only-female-leader-of-opposition]]></guid>
                       <title><![CDATA[Vidya Stokes : हिमाचल की एक मात्र महिला नेता प्रतिपक्ष]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/news/himachals-only-female-leader-of-opposition]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 27 Jun 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[विद्या स्टोक्स। इस नाम के साथ यूं तो कई उपलब्धियां जुड़ी हैं, लेकिन इन तमाम उपलब्धियों में एक ऐसी उपलब्धि है जो उन्हें अद्वितीय बनाती है। विद्या स्टोक्स हिमाचल प्रदेश विधानसभा की इकलौती ऐसी महिला नेता हैं जो नेता प्रतिपक्ष के पद तक पहुंची हैं।

जी हां, आज तक इस प्रदेश के इतिहास में नेता विपक्ष की कुर्सी पर कोई और महिला नहीं पहुंची। विद्या स्टोक्स इकलौती थीं जिन्होंने इस मुकाम तक का सफर तय किया।

वर्ष 1990 में जब कांग्रेस विपक्ष में आई, पार्टी ने इस पद की जिम्मेदारी एक महिला को सौंपी। और तब से लेकर आज तक कोई दूसरी महिला उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी। यह केवल एक पद नहीं था, यह उस सोच का प्रतीक था कि महिलाएं सिर्फ सत्ता की साथी नहीं, सच्ची विपक्ष की भी आवाज बन सकती हैं। फिर वर्ष 2008 में जब एक बार फिर कांग्रेस विपक्ष में आई, स्टोक्स को दोबारा वही जिम्मेदारी सौंपी गई।

उन्होंने दोनों बार इस भूमिका को पूरे आत्मविश्वास और गरिमा के साथ निभाया। आज जब हम हिमाचल की विधानसभा की ओर देखते हैं तो महिलाएं गिनी चुनी दिखाई देती हैं। हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री पद अब भी पुरुषों के अधीन है। सत्ता पक्ष और विपक्ष की कमान भी अधिकतर पुरुषों के ही हाथ में रही है।

महिलाओं को लेकर बड़े बड़े दावे तो भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल करते हैं, मगर जब बात महिला नेतृत्व की आती है तो परिस्थिति कुछ और ही नजर आती है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p data-end="411" data-start="168" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">विद्या स्टोक्स। इस नाम के साथ यूं तो कई उपलब्धियां जुड़ी हैं, लेकिन इन तमाम उपलब्धियों में एक ऐसी उपलब्धि है जो उन्हें अद्वितीय बनाती है। विद्या स्टोक्स हिमाचल प्रदेश विधानसभा की इकलौती ऐसी महिला नेता हैं जो नेता प्रतिपक्ष के पद तक पहुंची हैं।</span></p>

<p data-end="565" data-start="413" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जी हां, आज तक इस प्रदेश के इतिहास में नेता विपक्ष की कुर्सी पर कोई और महिला नहीं पहुंची। विद्या स्टोक्स इकलौती थीं जिन्होंने इस मुकाम तक का सफर तय किया।</span></p>

<p data-end="938" data-start="567" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">वर्ष 1990 में जब कांग्रेस विपक्ष में आई, पार्टी ने इस पद की जिम्मेदारी एक महिला को सौंपी। और तब से लेकर आज तक कोई दूसरी महिला उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी। यह केवल एक पद नहीं था, यह उस सोच का प्रतीक था कि महिलाएं सिर्फ सत्ता की साथी नहीं, सच्ची विपक्ष की भी आवाज बन सकती हैं। फिर वर्ष 2008 में जब एक बार फिर कांग्रेस विपक्ष में आई, स्टोक्स को दोबारा वही जिम्मेदारी सौंपी गई।</span></p>

<p data-end="1221" data-start="940" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उन्होंने दोनों बार इस भूमिका को पूरे आत्मविश्वास और गरिमा के साथ निभाया। आज जब हम हिमाचल की विधानसभा की ओर देखते हैं तो महिलाएं गिनी चुनी दिखाई देती हैं। हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री पद अब भी पुरुषों के अधीन है। सत्ता पक्ष और विपक्ष की कमान भी अधिकतर पुरुषों के ही हाथ में रही है।</span></p>

<p data-end="1366" data-start="1223" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">महिलाओं को लेकर बड़े बड़े दावे तो भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल करते हैं, मगर जब बात महिला नेतृत्व की आती है तो परिस्थिति कुछ और ही नजर आती है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40763.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[himachals only female leader of opposition ]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/life-story-of-himachals-dynamic-women-leader-shyama-sharma]]></guid>
                       <title><![CDATA[श्यामा शर्मा: वो महिला नेता जो धारा के विरुद्ध तैरती रही]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/life-story-of-himachals-dynamic-women-leader-shyama-sharma]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 27 Jun 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[श्यामा शर्मा... हिमाचल की वह अकेली महिला नेता, जो आपातकाल के दौर में जेल गईं। जब पूरे देश में डर और चुप्पी का सन्नाटा था, तब श्यामा ने न सिर्फ आवाज़ उठाई, बल्कि जेपी आंदोलन की सक्रिय सिपाही बनकर सत्ता से टकराईं। वह कहती थीं, &quot;मैं अपने हिस्से की लड़ाई स्वयं लड़ती हूं और हमेशा धारा के विरुद्ध लड़ने का सामर्थ्य रखती हूं।&quot; वह न किसी राजनीतिक विरासत की मोहताज थीं, न किसी पहचान की। उन्होंने अपनी पहचान खुद बनाई, संघर्ष से, साहस से, संकल्प से।

उनकी कहानी शुरू होती है वर्ष 1948 में, सिरमौर के छोटे से गांव सरोगा से। किसान और जमींदार पंडित दुर्गादत्त की बेटी श्यामा बचपन से ही अलहदा थीं। जब बाकी लड़कियां गुड़ियों से खेलती थीं, श्यामा कानून, समाज और राजनीति की किताबों में डूबी रहती थीं। पढ़ाई के लिए उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, फिर इलाहाबाद और आगरा तक का सफर तय किया। विधि स्नातक की डिग्री ली और जब घर लौटीं, तो सबने सोचा अब ये वकील बनेगी। लेकिन श्यामा की मंजिल कुछ और थी, क्रांति का रास्ता।

साल 1975, देश में आपातकाल लग चुका था। लोकतंत्र की आवाज़ दबा दी गई थी, अखबारों की सुर्खियां सेंसर थीं और डर हर दिशा में फैला था।

लेकिन श्यामा चुप नहीं बैठीं। वह जेपी आंदोलन से जुड़ीं और खोदरी माजरी यमुना हाइड्रो प्रोजेक्ट में हो रहे मजदूरों के शोषण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यहां छह महीने तक मजदूरों से बिना वेतन काम करवाया जा रहा था। श्यामा ने विरोध शुरू किया, भाषण दिए, लोगों को संगठित किया और सरकार की नजरों में आ गईं। जब पुलिस उन्हें पकड़ने खोदरी माजरी पहुंची, तो श्यामा उफनती टोंस नदी को तैर कर पार कर गईं।

वह उत्तराखंड के जौनसार बाबर पहुंचीं, फिर दिल्ली और इलाहाबाद में छिप छिपकर आंदोलन चलाती रहीं। पूरे एक साल भूमिगत रहीं, लेकिन आवाज़ बंद नहीं हुई। पिता की मृत्यु पर जब वह घर लौटीं, तो सरकार ने उन पर मीसा और डीआईआर जैसी कठोर धाराएं लगा दीं। उन्हें गिरफ्तार कर कई दिन लॉकअप में रखा गया। फिर उन्हें भेजा गया सेंट्रल जेल नाहन, जहां वह शांता कुमार, जगत सिंह नेगी, महेंद्र नाथ सोफत और मुन्नीलाल वर्मा के साथ जेल में रहीं, लेकिन अकेली महिला आंदोलनकारी वही थीं।

जेल में रहते हुए भी उन्होंने आवाज़ उठाना नहीं छोड़ा। वह जनता की नेता बनीं, इतिहास की मिसाल भी। वर्ष 1977 में देश को आपातकाल से मुक्ति मिली। श्यामा ने नाहन से चुनाव लड़ा और सिरमौर की पहली महिला विधायक बन गईं। शांता कुमार की सरकार में उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया। बाद में 1980 और 1990 में वह दोबारा विधायक बनीं। वर्ष 1982 से 1984 तक लोक लेखा समिति की अध्यक्ष रहीं और वर्ष 2000 से 2003 तक योजना बोर्ड की उपाध्यक्ष रहीं।

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p data-end="646" data-start="207" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">श्यामा शर्मा... हिमाचल की वह अकेली महिला नेता, जो आपातकाल के दौर में जेल गईं। जब पूरे देश में डर और चुप्पी का सन्नाटा था, तब श्यामा ने न सिर्फ आवाज़ उठाई, बल्कि जेपी आंदोलन की सक्रिय सिपाही बनकर सत्ता से टकराईं। वह कहती थीं, &quot;मैं अपने हिस्से की लड़ाई स्वयं लड़ती हूं और हमेशा धारा के विरुद्ध लड़ने का सामर्थ्य रखती हूं।&quot; वह न किसी राजनीतिक विरासत की मोहताज थीं, न किसी पहचान की। उन्होंने अपनी पहचान खुद बनाई, संघर्ष से, साहस से, संकल्प से।</span></p>

<p data-end="1097" data-start="648" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उनकी कहानी शुरू होती है वर्ष 1948 में, सिरमौर के छोटे से गांव सरोगा से। किसान और जमींदार पंडित दुर्गादत्त की बेटी श्यामा बचपन से ही अलहदा थीं। जब बाकी लड़कियां गुड़ियों से खेलती थीं, श्यामा कानून, समाज और राजनीति की किताबों में डूबी रहती थीं। पढ़ाई के लिए उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, फिर इलाहाबाद और आगरा तक का सफर तय किया। विधि स्नातक की डिग्री ली और जब घर लौटीं, तो सबने सोचा अब ये वकील बनेगी। लेकिन श्यामा की मंजिल कुछ और थी, क्रांति का रास्ता।</span></p>

<p data-end="1226" data-start="1099" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">साल 1975, देश में आपातकाल लग चुका था। लोकतंत्र की आवाज़ दबा दी गई थी, अखबारों की सुर्खियां सेंसर थीं और डर हर दिशा में फैला था।</span></p>

<p data-end="1610" data-start="1228" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">लेकिन श्यामा चुप नहीं बैठीं। वह जेपी आंदोलन से जुड़ीं और खोदरी माजरी यमुना हाइड्रो प्रोजेक्ट में हो रहे मजदूरों के शोषण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यहां छह महीने तक मजदूरों से बिना वेतन काम करवाया जा रहा था। श्यामा ने विरोध शुरू किया, भाषण दिए, लोगों को संगठित किया और सरकार की नजरों में आ गईं। जब पुलिस उन्हें पकड़ने खोदरी माजरी पहुंची, तो श्यामा उफनती टोंस नदी को तैर कर पार कर गईं।</span></p>

<p data-end="2062" data-start="1612" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">वह उत्तराखंड के जौनसार बाबर पहुंचीं, फिर दिल्ली और इलाहाबाद में छिप छिपकर आंदोलन चलाती रहीं। पूरे एक साल भूमिगत रहीं, लेकिन आवाज़ बंद नहीं हुई। पिता की मृत्यु पर जब वह घर लौटीं, तो सरकार ने उन पर मीसा और डीआईआर जैसी कठोर धाराएं लगा दीं। उन्हें गिरफ्तार कर कई दिन लॉकअप में रखा गया। फिर उन्हें भेजा गया सेंट्रल जेल नाहन, जहां वह शांता कुमार, जगत सिंह नेगी, महेंद्र नाथ सोफत और मुन्नीलाल वर्मा के साथ जेल में रहीं, लेकिन अकेली महिला आंदोलनकारी वही थीं।</span></p>

<p data-end="2482" data-start="2064" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जेल में रहते हुए भी उन्होंने आवाज़ उठाना नहीं छोड़ा। वह जनता की नेता बनीं, इतिहास की मिसाल भी। वर्ष 1977 में देश को आपातकाल से मुक्ति मिली। श्यामा ने नाहन से चुनाव लड़ा और सिरमौर की पहली महिला विधायक बन गईं। शांता कुमार की सरकार में उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया। बाद में 1980 और 1990 में वह दोबारा विधायक बनीं। वर्ष 1982 से 1984 तक लोक लेखा समिति की अध्यक्ष रहीं और वर्ष 2000 से 2003 तक योजना बोर्ड की उपाध्यक्ष रहीं।</span></p>

<p data-end="2555" data-start="2484" style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40761.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[life story of himachals dynamic women leader shyama sharma ]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/shanta-kumar-in-jail-during-emergency]]></guid>
                       <title><![CDATA[जब रास्ते से उठाकर जेल में डाल दिए गए थे शांता कुमार]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/shanta-kumar-in-jail-during-emergency]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 27 Jun 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[वह 25 जून 1975 का दिन था। भारत के लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसा दिन जब पूरी आबादी को चुप करा दिया गया था। देश में आपातकाल लागू हुआ और संविधान की आत्मा को एक सत्तालोभी निर्णय ने कुचल कर रख दिया।

हिमाचल प्रदेश में भी इस तानाशाही की गूंज साफ सुनाई दी। और उसी दिन शांता कुमार को भी बिना किसी जुर्म, बिना किसी वारंट, बस रास्ते से उठाकर जेल में डाल दिया गया।

24 जून 1975 को शांता कुमार घर से शिमला के लिए निकले थे। पत्नी और बच्चों से बस इतना कहा कि &quot;परसों लौट आऊंगा।&quot; लेकिन अगले ही दिन, 25 जून की सुबह देश में आपातकाल की घोषणा हो गई। रास्ते में ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

किसी ने उन्हें कारण नहीं बताया, न कोई आदेश दिखाया। वह बार बार पूछते रहे, &quot;मुझे क्यों गिरफ्तार कर रहे हो?&quot; लेकिन पुलिस का केवल एक ही जवाब था, &quot;ऊपर से आदेश है।&quot;

शिमला से उन्हें सीधे नाहन जेल भेज दिया गया और वहीं से शुरू हुई उनकी 19 महीने लंबी कैद।

जेल में रहते हुए शांता कुमार ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की। उन्होंने कहा, &quot;मुझे बिना कारण कैद में रखा गया है। क्या मुझे जीने का भी अधिकार नहीं?&quot;

सरकार की ओर से जवाब आया, &quot;देश में इमरजेंसी लगी है, अब किसी को कोई अधिकार नहीं है।&quot; उनकी याचिका खारिज कर दी गई। उनकी आवाज अदालतों में भी नहीं सुनी गई। उस समय सच में न अपील थी, न दलील, न वकील।

शांता कुमार के अलावा और भी कई नेताओं को जेल में डाला गया था, जैसे डॉ राधा रमन शास्त्री, जिनकी पत्रिकाएं &#39;हिमबाला&#39; और &#39;हिमयुवक&#39; जब्त कर ली गईं। श्यामा शर्मा, जो इमरजेंसी के दौरान गिरफ्तार होने वाली हिमाचल की इकलौती महिला थीं। इसके अलावा स्वर्गीय जगत सिंह नेगी, महेंद्र नाथ सोफत, मुन्नीलाल वर्मा जैसे नेता भी नाहन जेल में एक ही छत के नीचे लोकतंत्र के लिए बंद थे।

आज भी शांता कुमार कहते हैं, &quot;देश में न बम फटा था, न कोई दंगा हुआ था, फिर भी पूरे देश को कैद कर दिया गया। सिर्फ इसलिए कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था।&quot;

उनके अनुसार इमरजेंसी एक राजनीतिक तानाशाही थी। वह कहते हैं कि इंदिरा गांधी की कुर्सी बचाने के लिए देश की आज़ादी को गिरवी रख दिया गया।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p data-end="371" data-start="178" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">वह 25 जून 1975 का दिन था। भारत के लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसा दिन जब पूरी आबादी को चुप करा दिया गया था। देश में आपातकाल लागू हुआ और संविधान की आत्मा को एक सत्तालोभी निर्णय ने कुचल कर रख दिया।</span></p>

<p data-end="533" data-start="373" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हिमाचल प्रदेश में भी इस तानाशाही की गूंज साफ सुनाई दी। और उसी दिन शांता कुमार को भी बिना किसी जुर्म, बिना किसी वारंट, बस रास्ते से उठाकर जेल में डाल दिया गया।</span></p>

<p data-end="754" data-start="535" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">24 जून 1975 को शांता कुमार घर से शिमला के लिए निकले थे। पत्नी और बच्चों से बस इतना कहा कि &quot;परसों लौट आऊंगा।&quot; लेकिन अगले ही दिन, 25 जून की सुबह देश में आपातकाल की घोषणा हो गई। रास्ते में ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।</span></p>

<p data-end="916" data-start="756" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">किसी ने उन्हें कारण नहीं बताया, न कोई आदेश दिखाया। वह बार बार पूछते रहे, &quot;मुझे क्यों गिरफ्तार कर रहे हो?&quot; लेकिन पुलिस का केवल एक ही जवाब था, &quot;ऊपर से आदेश है।&quot;</span></p>

<p data-end="1004" data-start="918" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शिमला से उन्हें सीधे नाहन जेल भेज दिया गया और वहीं से शुरू हुई उनकी 19 महीने लंबी कैद।</span></p>

<p data-end="1156" data-start="1006" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जेल में रहते हुए शांता कुमार ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की। उन्होंने कहा, &quot;मुझे बिना कारण कैद में रखा गया है। क्या मुझे जीने का भी अधिकार नहीं?&quot;</span></p>

<p data-end="1348" data-start="1158" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">सरकार की ओर से जवाब आया, &quot;देश में इमरजेंसी लगी है, अब किसी को कोई अधिकार नहीं है।&quot; उनकी याचिका खारिज कर दी गई। उनकी आवाज अदालतों में भी नहीं सुनी गई। उस समय सच में न अपील थी, न दलील, न वकील।</span></p>

<p data-end="1710" data-start="1350" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शांता कुमार के अलावा और भी कई नेताओं को जेल में डाला गया था, जैसे डॉ राधा रमन शास्त्री, जिनकी पत्रिकाएं &#39;हिमबाला&#39; और &#39;हिमयुवक&#39; जब्त कर ली गईं। श्यामा शर्मा, जो इमरजेंसी के दौरान गिरफ्तार होने वाली हिमाचल की इकलौती महिला थीं। इसके अलावा स्वर्गीय जगत सिंह नेगी, महेंद्र नाथ सोफत, मुन्नीलाल वर्मा जैसे नेता भी नाहन जेल में एक ही छत के नीचे लोकतंत्र के लिए बंद थे।</span></p>

<p data-end="1892" data-start="1712" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">आज भी शांता कुमार कहते हैं, &quot;देश में न बम फटा था, न कोई दंगा हुआ था, फिर भी पूरे देश को कैद कर दिया गया। सिर्फ इसलिए कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था।&quot;</span></p>

<p data-end="2026" data-start="1894" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उनके अनुसार इमरजेंसी एक राजनीतिक तानाशाही थी। वह कहते हैं कि इंदिरा गांधी की कुर्सी बचाने के लिए देश की आज़ादी को गिरवी रख दिया गया।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40760.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[shanta kumar in jail during emergency ]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/when-an-mla-in-himachal-was-sentenced-disqualified-from-the-assembly]]></guid>
                       <title><![CDATA[जब हिमाचल के विधायक को हुई थी सजा ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/when-an-mla-in-himachal-was-sentenced-disqualified-from-the-assembly]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 27 Jun 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[हिमाचल प्रदेश की राजनीति में एक किस्सा ऐसा भी है जो किसी भी विधायक के लिए बुरे सपने से कम नहीं होगा। यह वह किस्सा है जब हिमाचल के एक विधायक को अदालत ने हत्या के जुर्म में दोषी ठहराकर कठोर सजा सुनाई। विधायक को सजा भी हुई और विधायकी भी चली गई।

यह कहानी है राकेश सिंघा की। मामला वर्ष 1978 का है, जब राकेश सिंघा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के छात्र थे। शिमला के अल्फिन लॉज में एक विवाह समारोह के दौरान झड़प हुई, जो बाद में हिंसा में बदल गई। इस झगड़े में एक व्यक्ति की मौत हो गई और सिंघा समेत कुछ अन्य छात्रों पर हत्या और गंभीर रूप से घायल करने के आरोप लगे।

मुकदमा अदालत में चला और वर्ष 1988 में सत्र न्यायालय ने सिंघा को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 भाग दो, 325 और 452 के तहत दोषी करार देते हुए पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

हालांकि तब तक सिंघा राजनीति में सक्रिय हो चुके थे। वर्ष 1993 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के टिकट पर शिमला से विधानसभा चुनाव जीता और विधायक बने। लेकिन यह कार्यकाल लंबा नहीं चला।

मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय में हुई और फिर वर्ष 1996 में सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंची, जहां उनकी सजा को बरकरार रखा गया। इस फैसले के बाद उन्हें विधायक पद से अयोग्य घोषित कर दिया गया। यह हिमाचल प्रदेश की राजनीति में एक दुर्लभ घटना थी जब कोई मौजूदा विधायक अदालत के आदेश के चलते विधानसभा से बाहर हुआ।

इस घटना के बाद राकेश सिंघा की राजनीतिक यात्रा थमी नहीं, लेकिन उस पर एक स्थायी सवालिया निशान जरूर लग गया। उन्होंने लंबे समय तक प्रदेश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी को जिंदा रखने की कोशिश की और जनहित से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय रहे। अंततः वर्ष 2017 में वह ठियोग से दोबारा विधायक चुने गए।

हालांकि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सिंघा को हार का सामना करना पड़ा और एक बार फिर वह मुख्य धारा की राजनीति से बाहर हो गए। लेकिन आज भी सिंघा हिमाचल के लोगों खासकर बागवानों की आवाज बने हुए हैं।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p data-end="423" data-start="182" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हिमाचल प्रदेश की राजनीति में एक किस्सा ऐसा भी है जो किसी भी विधायक के लिए बुरे सपने से कम नहीं होगा। यह वह किस्सा है जब हिमाचल के एक विधायक को अदालत ने हत्या के जुर्म में दोषी ठहराकर कठोर सजा सुनाई। विधायक को सजा भी हुई और विधायकी भी चली गई।</span></p>

<p data-end="737" data-start="425" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">यह कहानी है राकेश सिंघा की। मामला वर्ष 1978 का है, जब राकेश सिंघा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के छात्र थे। शिमला के अल्फिन लॉज में एक विवाह समारोह के दौरान झड़प हुई, जो बाद में हिंसा में बदल गई। इस झगड़े में एक व्यक्ति की मौत हो गई और सिंघा समेत कुछ अन्य छात्रों पर हत्या और गंभीर रूप से घायल करने के आरोप लगे।</span></p>

<p data-end="919" data-start="739" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मुकदमा अदालत में चला और वर्ष 1988 में सत्र न्यायालय ने सिंघा को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 भाग दो, 325 और 452 के तहत दोषी करार देते हुए पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।</span></p>

<p data-end="1121" data-start="921" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हालांकि तब तक सिंघा राजनीति में सक्रिय हो चुके थे। वर्ष 1993 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के टिकट पर शिमला से विधानसभा चुनाव जीता और विधायक बने। लेकिन यह कार्यकाल लंबा नहीं चला।</span></p>

<p data-end="1420" data-start="1123" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय में हुई और फिर वर्ष 1996 में सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंची, जहां उनकी सजा को बरकरार रखा गया। इस फैसले के बाद उन्हें विधायक पद से अयोग्य घोषित कर दिया गया। यह हिमाचल प्रदेश की राजनीति में एक दुर्लभ घटना थी जब कोई मौजूदा विधायक अदालत के आदेश के चलते विधानसभा से बाहर हुआ।</span></p>

<p data-end="1721" data-start="1422" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस घटना के बाद राकेश सिंघा की राजनीतिक यात्रा थमी नहीं, लेकिन उस पर एक स्थायी सवालिया निशान जरूर लग गया। उन्होंने लंबे समय तक प्रदेश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी को जिंदा रखने की कोशिश की और जनहित से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय रहे। अंततः वर्ष 2017 में वह ठियोग से दोबारा विधायक चुने गए।</span></p>

<p data-end="1918" data-start="1723" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हालांकि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सिंघा को हार का सामना करना पड़ा और एक बार फिर वह मुख्य धारा की राजनीति से बाहर हो गए। लेकिन आज भी सिंघा हिमाचल के लोगों खासकर बागवानों की आवाज बने हुए हैं।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40759.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[When an MLA in Himachal Was Sentenced... Disqualified from the Assembly]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/rajan-sushants-humari-party-himachal-party]]></guid>
                       <title><![CDATA[कहानी राजन सुशांत और उनकी ‘हमारी पार्टी हिमाचल पार्टी’ की ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/rajan-sushants-humari-party-himachal-party]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 27 Jun 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[भाजपा और कांग्रेस से छिटक कर हिमाचल में कई नेताओं ने अपने राजनीतिक दल बनाने की कोशिश की। इनमें पंडित सुखराम, महेश्वर सिंह, महेंद्र सिंह ठाकुर जैसे नाम शामिल हैं। हालांकि, इनमें से पंडित सुखराम के अलावा कोई भी अपनी पार्टी को खास ऊंचाई पर ले जाने में सफल नहीं हो पाया। इन्हीं राजनीतिक असफलताओं में एक असफल प्रयास डॉ राजन सुशांत ने भी किया था। आज हम आपको बताएंगे उस पार्टी की कहानी, जो पूरी तरह बनने से पहले ही बिखर गई।

हमारी पार्टी हिमाचल पार्टी शायद आपने ये नाम न सुना हो या शायद आप ये नाम भूल गए हों, मगर यकीन मानिए हिमाचल में इस पार्टी का गठन किया गया था। और इस पार्टी का गठन करने वाले नेता थे डॉ राजन सुशांत। एक समय भाजपा के कद्दावर नेता रहे सुशांत, 1982 में सबसे कम उम्र के विधायक बने थे और बाद में प्रेम कुमार धूमल सरकार में राजस्व मंत्री भी रहे। वर्ष 2009 में वे भाजपा से कांगड़ा संसदीय सीट से सांसद चुने गए। लेकिन अपनी बेबाकी और पार्टी विरोधी रुख के चलते उन्हें 2011 में भाजपा से निलंबित कर दिया गया। फिर राजन सुशांत ने 2014 में आम आदमी पार्टी का दामन थामा और हिमाचल प्रदेश में पार्टी के राज्य संयोजक भी बने। हालांकि 2014 का लोकसभा चुनाव वे कांगड़ा से आप के टिकट पर हार गए। वहां भी राजनीतिक ऑक्सीजन की कमी महसूस हुई, तो 25 अक्टूबर 2020 में खुद की दुकान खोल ली और नाम रखा हमारी पार्टी हिमाचल पार्टी। इस पार्टी के गठन का मकसद था हिमाचल प्रदेश में तीसरा राजनीतिक विकल्प खड़ा करना और स्थानीय मुद्दों पर आधारित राजनीति को बढ़ावा देना। स्वतंत्र लड़ाई के वादे तो और भी बहुत हुए, मगर ये वादे धरे के धरे रह गए।

2022 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, सुशांत ने जनता से &quot;न हमारी न तुम्हारी&quot; कहकर अपनी ही बनाई पार्टी को दरकिनार कर दिया और 10 सितंबर 2022 को एक बार फिर आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए। इस बार उन्हें आप ने फतेहपुर विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। लेकिन 2022 के चुनाव में राजन सुशांत को सिर्फ 1266 वोट मिले और वे बुरी तरह से चुनाव हार गए।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p data-end="602" data-start="186" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">भाजपा और कांग्रेस से छिटक कर हिमाचल में कई नेताओं ने अपने राजनीतिक दल बनाने की कोशिश की। इनमें पंडित सुखराम, महेश्वर सिंह, महेंद्र सिंह ठाकुर जैसे नाम शामिल हैं। हालांकि, इनमें से पंडित सुखराम के अलावा कोई भी अपनी पार्टी को खास ऊंचाई पर ले जाने में सफल नहीं हो पाया। इन्हीं राजनीतिक असफलताओं में एक असफल प्रयास डॉ राजन सुशांत ने भी किया था। आज हम आपको बताएंगे उस पार्टी की कहानी, जो पूरी तरह बनने से पहले ही बिखर गई।</span></p>

<p data-end="1594" data-start="604" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हमारी पार्टी हिमाचल पार्टी शायद आपने ये नाम न सुना हो या शायद आप ये नाम भूल गए हों, मगर यकीन मानिए हिमाचल में इस पार्टी का गठन किया गया था। और इस पार्टी का गठन करने वाले नेता थे डॉ राजन सुशांत। एक समय भाजपा के कद्दावर नेता रहे सुशांत, 1982 में सबसे कम उम्र के विधायक बने थे और बाद में प्रेम कुमार धूमल सरकार में राजस्व मंत्री भी रहे। वर्ष 2009 में वे भाजपा से कांगड़ा संसदीय सीट से सांसद चुने गए। लेकिन अपनी बेबाकी और पार्टी विरोधी रुख के चलते उन्हें 2011 में भाजपा से निलंबित कर दिया गया। फिर राजन सुशांत ने 2014 में आम आदमी पार्टी का दामन थामा और हिमाचल प्रदेश में पार्टी के राज्य संयोजक भी बने। हालांकि 2014 का लोकसभा चुनाव वे कांगड़ा से आप के टिकट पर हार गए। वहां भी राजनीतिक ऑक्सीजन की कमी महसूस हुई, तो 25 अक्टूबर 2020 में खुद की दुकान खोल ली और नाम रखा हमारी पार्टी हिमाचल पार्टी। इस पार्टी के गठन का मकसद था हिमाचल प्रदेश में तीसरा राजनीतिक विकल्प खड़ा करना और स्थानीय मुद्दों पर आधारित राजनीति को बढ़ावा देना। स्वतंत्र लड़ाई के वादे तो और भी बहुत हुए, मगर ये वादे धरे के धरे रह गए।</span></p>

<p data-end="1932" data-start="1596" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">2022 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, सुशांत ने जनता से &quot;न हमारी न तुम्हारी&quot; कहकर अपनी ही बनाई पार्टी को दरकिनार कर दिया और 10 सितंबर 2022 को एक बार फिर आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए। इस बार उन्हें आप ने फतेहपुर विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। लेकिन 2022 के चुनाव में राजन सुशांत को सिर्फ 1266 वोट मिले और वे बुरी तरह से चुनाव हार गए।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40758.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[rajan sushants humari party himachal party ]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/new-districts-possible-in-himachal]]></guid>
                       <title><![CDATA[क्या सत्ता में 'प्लस' रहने के लिए ज़िलों का आकार होगा  'माइनस' ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/new-districts-possible-in-himachal]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 16 Jun 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
	छोटे-छोटे जिलों से सत्ता के खेल की तैयारी; अंदरखाते मंथन की सुगबुगाहट !
	कांगड़ा के नूरपुर, पालमपुर और देहरा नए जिलों की दौड़ में !
	शिमला, मंडी और सोलन के बंटवारे पर भी मंथन संभव !&nbsp;


हिमाचल में नए जिलों के गठन की चर्चा बीते कई वर्षों होती आ रही है, खासतौर से चुनाव से पहले नए ज़िलों का जिन्न बाहर आ जाता है। छोटे-छोटे जिले बनाकर सियासत की पिच को मुफीद बनाने की योजना पर धूमल से लेकर जयराम तक ने मंथन किया, हालांकि अमलीजामा कोई न पहना सका। अब फिर सुगबुगाहट है कि मौजूदा सरकार नए जिले बनाने की योजना पर आगे बढ़ सकती है। यानी मौजूदा ज़िलों के सियासी कद में कांट-छांट के आसार बन रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक इस पर अंदरखाते मंथन चला हुआ है कि छोटे-छोटे जिलों के मैदान में साल 2027 के लिए कोई बड़ा खेल खेला जाए। इसी कड़ी में चार ज़िलों का बंटवारा मुमकिन है; कांगड़ा, मंडी, सोलन और शिमला।&nbsp;&nbsp;

&nbsp; &nbsp;जिलों की मांग की सुगबुगाहट सबसे अधिक काँगड़ा में देखने को मिल रही है। यहां नूरपुर, पालमपुर और देहरा को जिला घोषित करने की मांग उठती रही है। नूरपुर से पूर्व विधायक व जयराम सरकार में मंत्री रहे राकेश पठानिया लम्बे वक्त से खुलकर इसके पक्ष में बोलते रहे है।&nbsp; &nbsp;वहीँ भाजपा सरकार के कार्यकाल में पालमपुर विधायक आशीष बुटेल भी पालमपुर को जिला घोषित करने की मांग करते रहे है। हालाँकि अब वे चुप है, लेकिन सम्भवतः इसके पक्ष में ही रहेंगे। वहीं मौजूदा स्थिति में&nbsp; देहरा का दावा भी नकारा नहीं जा सकता। वैसे भी देहरा पर सीएम सुक्खू की विशेष मेहरबानी है। यानी कांगड़ा को चार हिस्सों में बाँटने की मांग है। कांगड़ा, 15 विधानसभा क्षेत्रों वाला वो जिला है जो हिमाचल में सत्ता का रुख तय करता आया है। पर अगर नए जिलों का गठन होता है तो क्षेत्रफल के साथ -साथ कांगड़ा के सियासी बल का भी विभाजन होगा।&nbsp;&nbsp;

&nbsp; &nbsp;कांगड़ा की तरह ही&nbsp; मंडी जिले के करसोग और सुंदरनगर क्षेत्र के लोग भी कठिन भौगौलिक परिस्थितियों का तर्क देकर इन दोनों क्षेत्रों को जिला बनाने की मांग करते रहे है। करसोग से जिला हेडक्वार्टर मंडी से कुल 120 किलोमीटर दूर है। छोटे बड़े कार्यों के लिए क्षेत्रवासियों को 120 किलोमीटर का लम्बा सफर तय करना पड़ता है। वहीं सुंदरनगर से मंडी की दूरी तो कम है मगर तर्क है की सुंदरनगर एकमात्र ऐसा स्थान है, जिसे जिला बनाने की सूरत में सरकार को कोई भी आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। इसी तरह शिमला के रोहड़ू व रामपुर को भी जिला बनाने की मांग है। ये दोनों ही क्षेत्र भी जिला मुख्यालय से काफी दूर है। सोलन के बीबीएन क्षेत्र में भी लम्बे वक्त से अलग जिला बनाने की मांग उठती रही है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp;


अगर नए जिलों का गठन होता है कि कुछ लोगों को नए जिले की ख़ुशी होगा,तो कुछ को जिले के छोटा हो जाने का मलाल भी होगा। ऐसे में ज़ाहिर है सरकार &#39;पोलिटिकल रिस्क एस्सेसमेंट&#39; के बाद ही इस पर कोई फैसला लेगी। इस बीच सवाल ये भी है की क्या प्रदेश सरकार नए जिलों के वित्तीय व्यय का प्रबंधन करने में सक्षम है या नहीं ? मौजूदा आर्थिक हालात में ये निर्णय मुश्किल है। ऐसे में माहिर मानते है कि चुनावी वर्ष में ही सरकार किसी निष्कर्ष पर पपहुंचेगी। वहीँ इसके सियासी लाभ को लेकर भी माहिरों की राय बंटी हुई है।&nbsp;


&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<ul>
	<li style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 18px;">छोटे-छोटे जिलों से सत्ता के खेल की तैयारी; अंदरखाते मंथन की सुगबुगाहट !</span></strong></li>
	<li style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 18px;">कांगड़ा के नूरपुर, पालमपुर और देहरा नए जिलों की दौड़ में !</span></strong></li>
	<li style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">शिमला, मंडी और सोलन के बंटवारे पर भी मंथन संभव !&nbsp;</span></strong></li>
</ul>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हिमाचल में नए जिलों के गठन की चर्चा बीते कई वर्षों होती आ रही है, खासतौर से चुनाव से पहले नए ज़िलों का जिन्न बाहर आ जाता है। छोटे-छोटे जिले बनाकर सियासत की पिच को मुफीद बनाने की योजना पर धूमल से लेकर जयराम तक ने मंथन किया, हालांकि अमलीजामा कोई न पहना सका। अब फिर सुगबुगाहट है कि मौजूदा सरकार नए जिले बनाने की योजना पर आगे बढ़ सकती है। यानी मौजूदा ज़िलों के सियासी कद में कांट-छांट के आसार बन रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक इस पर अंदरखाते मंथन चला हुआ है कि छोटे-छोटे जिलों के मैदान में साल 2027 के लिए कोई बड़ा खेल खेला जाए। इसी कड़ी में चार ज़िलों का बंटवारा मुमकिन है; कांगड़ा, मंडी, सोलन और शिमला।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;जिलों की मांग की सुगबुगाहट सबसे अधिक काँगड़ा में देखने को मिल रही है। यहां नूरपुर, पालमपुर और देहरा को जिला घोषित करने की मांग उठती रही है। नूरपुर से पूर्व विधायक व जयराम सरकार में मंत्री रहे राकेश पठानिया लम्बे वक्त से खुलकर इसके पक्ष में बोलते रहे है।&nbsp; &nbsp;वहीँ भाजपा सरकार के कार्यकाल में पालमपुर विधायक आशीष बुटेल भी पालमपुर को जिला घोषित करने की मांग करते रहे है। हालाँकि अब वे चुप है, लेकिन सम्भवतः इसके पक्ष में ही रहेंगे। वहीं मौजूदा स्थिति में&nbsp; देहरा का दावा भी नकारा नहीं जा सकता। वैसे भी देहरा पर सीएम सुक्खू की विशेष मेहरबानी है। यानी कांगड़ा को चार हिस्सों में बाँटने की मांग है। कांगड़ा, 15 विधानसभा क्षेत्रों वाला वो जिला है जो हिमाचल में सत्ता का रुख तय करता आया है। पर अगर नए जिलों का गठन होता है तो क्षेत्रफल के साथ -साथ कांगड़ा के सियासी बल का भी विभाजन होगा।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;</span><span style="font-size: 18px;">कांगड़ा की तरह ही&nbsp; मंडी जिले के करसोग और सुंदरनगर क्षेत्र के लोग भी कठिन भौगौलिक परिस्थितियों का तर्क देकर इन दोनों क्षेत्रों को जिला बनाने की मांग करते रहे है। करसोग से जिला हेडक्वार्टर मंडी से कुल 120 किलोमीटर दूर है। छोटे बड़े कार्यों के लिए क्षेत्रवासियों को 120 किलोमीटर का लम्बा सफर तय करना पड़ता है। वहीं सुंदरनगर से मंडी की दूरी तो कम है मगर तर्क है की सुंदरनगर एकमात्र ऐसा स्थान है, जिसे जिला बनाने की सूरत में सरकार को कोई भी आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। इसी तरह शिमला के रोहड़ू व रामपुर को भी जिला बनाने की मांग है। ये दोनों ही क्षेत्र भी जिला मुख्यालय से काफी दूर है। सोलन के बीबीएन क्षेत्र में भी लम्बे वक्त से अलग जिला बनाने की मांग उठती रही है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अगर नए जिलों का गठन होता है कि कुछ लोगों को नए जिले की ख़ुशी होगा,तो कुछ को जिले के छोटा हो जाने का मलाल भी होगा। ऐसे में ज़ाहिर है सरकार &#39;पोलिटिकल रिस्क एस्सेसमेंट&#39; के बाद ही इस पर कोई फैसला लेगी। इस बीच सवाल ये भी है की क्या प्रदेश सरकार नए जिलों के वित्तीय व्यय का प्रबंधन करने में सक्षम है या नहीं ? मौजूदा आर्थिक हालात में ये निर्णय मुश्किल है। ऐसे में माहिर मानते है कि चुनावी वर्ष में ही सरकार किसी निष्कर्ष पर पपहुंचेगी। वहीँ इसके सियासी लाभ को लेकर भी माहिरों की राय बंटी हुई है।&nbsp;</span></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[new-districts-possible-in-himachal]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/vinay-kumar-in-delhi-to-meet-kharge]]></guid>
                       <title><![CDATA[मुख्यमंत्री क्षत्रिय, डिप्टी सीएम ब्राह्मण... अब कांग्रेस अध्यक्ष SC?            ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/vinay-kumar-in-delhi-to-meet-kharge]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 14 Jun 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp; हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू क्षत्रिय है, उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ब्राह्मण और अब कांग्रेस चाहती है कि एससी समुदाय से कोई प्रदेश अध्यक्ष हो। यानी कांग्रेस हिमाचल प्रदेश में परफेक्ट जातीय संतुलन चाह रही है, और इसीलिए सुगबुगाहट है कि किसी एससी चेहरे को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाएगा।&nbsp; इस कड़ी में जिस नेता का नाम खूब चर्चा में है वो है विनय कुमार। श्री रेणुकाजी से तीन बार के विधायक, पूर्व वर्किंग प्रेसिडेंट, और मौजूदा विधानसभा उपाध्यक्ष विनय कुमार आज दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मिल सकते हैं। पिछले तीन दिन से विनय दिल्ली में डटे हैं, इंतज़ार खड़गे की वापसी का था। आज खड़गे वापस दिल्ली लौटेंगे और मुमकिन है आज ही&nbsp; विनय कुमार कि उनसे मुलाकात हो।&nbsp;&nbsp;

विनय कुमार को मुकेश अग्निहोत्री का करीबी माना जाता है और पीसीसी अध्यक्ष पद के लिए उन्हें मुकेश अग्निहोत्री के कैंडिडेट के तौर पर भी देखा जा रहा है। वहीँ होली लॉज चाह रहा है की प्रतिभा सिंह ही रिपीट करें, लेकिन अगर सहमति न बनी तो माहिर मानते है कि होली लॉज भी विनय को सपोर्ट कर सकता है।
&nbsp;
हालाँकि मुख्यमंत्री सुक्खू इस समीकरण से ज़्यादा खुश हों, ऐसा ज़रूरी नहीं। सूत्रों की मानें तो सीएम एससी चेहरों में से विनोद सुल्तानपुरी या सुरेश कुमार को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, लेकिन सीनियर नेताओं की रज़ामंदी इन नामों पर नहीं बन पाई। दोनों पहली बार विधायक बने हैं, जबकि विनय तीसरी बार जीते हैं और पहले भी संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ निभा चुके हैं। वैसे विधानसभा उपाध्यक्ष बनाकर खुद सीएम सुक्खू ने ही विनय को एक बड़ी जिम्मेदारी दी थी। ऐसे में उनकी दावेदारी को क्या सीएम सुक्खू का सपोर्ट मिलेगा, ये देखना रोचक होगा। बहरहाल फैसलाआख़िर में हाईकमान को ही लेना है, लेकिन माना जा रहा है कि इस मुलाक़ात के बाद तस्वीर कुछ हद तक साफ़ हो सकती है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; </span><span style="font-size: 18px;">हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू क्षत्रिय है, उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ब्राह्मण और अब कांग्रेस चाहती है कि एससी समुदाय से कोई प्रदेश अध्यक्ष हो। यानी कांग्रेस हिमाचल प्रदेश में परफेक्ट जातीय संतुलन चाह रही है, और इसीलिए सुगबुगाहट है कि किसी एससी चेहरे को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाएगा।&nbsp; इस कड़ी में जिस नेता का नाम खूब चर्चा में है वो है विनय कुमार। श्री रेणुकाजी से तीन बार के विधायक, पूर्व वर्किंग प्रेसिडेंट, और मौजूदा विधानसभा उपाध्यक्ष विनय कुमार आज दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मिल सकते हैं। पिछले तीन दिन से विनय दिल्ली में डटे हैं, इंतज़ार खड़गे की वापसी का था। आज खड़गे वापस दिल्ली लौटेंगे और मुमकिन है आज ही&nbsp; विनय कुमार कि उनसे मुलाकात हो।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">विनय कुमार को मुकेश अग्निहोत्री का करीबी माना जाता है और पीसीसी अध्यक्ष पद के लिए उन्हें मुकेश अग्निहोत्री के कैंडिडेट के तौर पर भी देखा जा रहा है। वहीँ होली लॉज चाह रहा है की प्रतिभा सिंह ही रिपीट करें, लेकिन अगर सहमति न बनी तो माहिर मानते है कि होली लॉज भी विनय को सपोर्ट कर सकता है।<br />
&nbsp;<br />
हालाँकि मुख्यमंत्री सुक्खू इस समीकरण से ज़्यादा खुश हों, ऐसा ज़रूरी नहीं। सूत्रों की मानें तो सीएम एससी चेहरों में से विनोद सुल्तानपुरी या सुरेश कुमार को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, लेकिन सीनियर नेताओं की रज़ामंदी इन नामों पर नहीं बन पाई। दोनों पहली बार विधायक बने हैं, जबकि विनय तीसरी बार जीते हैं और पहले भी संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ निभा चुके हैं। वैसे विधानसभा उपाध्यक्ष बनाकर खुद सीएम सुक्खू ने ही विनय को एक बड़ी जिम्मेदारी दी थी। ऐसे में उनकी दावेदारी को क्या सीएम सुक्खू का सपोर्ट मिलेगा, ये देखना रोचक होगा। बहरहाल फैसलाआख़िर में हाईकमान को ही लेना है, लेकिन माना जा रहा है कि इस मुलाक़ात के बाद तस्वीर कुछ हद तक साफ़ हो सकती है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40652.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[VINAY-KUMAR-IN-DELHI-TO-MEET-KHARGE]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/himachal-congress-wait-for-sangathan-is-still-on]]></guid>
                       <title><![CDATA[कांग्रेसियों इन्तजार करो, आलाकमान 'संगठन सृजन' में व्यस्त है !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/himachal-congress-wait-for-sangathan-is-still-on]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 06 Jun 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;


गुजरात मॉडल अपनाया तो हिमाचल पर नज़र- ए -करम में लग सकता हैं और वक्त !

7 महीने बाद, कहाँ पहुंची हिमाचल में संगठन के गठन की बात ?

हिमाचल के कांग्रेसियों के साथ बड़ी &#39;खप&#39; न कर दे आलाकमान !


&nbsp; &nbsp;कांग्रेस आलाकमान इन दिनों कई राज्यों के संगठन सृजन अभियान में मशगूल हैं। दरअसल, कांग्रेस अपने गुजरात मॉडल की तर्ज पर मध्य प्रदेश और हरियाणा में संगठन की नियुक्तियां करने जा रही हैं। हिमाचल के भी तीन विधायक आब्जर्वर बनाये गए हैं, ताकि उक्त राज्यों में मजबूत संगठन बने। इनके बाद अन्य राज्यों का भी नंबर आएगा और शायद हिमाचल पर भी नज़र- ए -करम हो। पर सवाल ये हैं कि क्या हिमाचल में कांग्रेस अपने इस गुजरात मॉडल को नहीं अपनाएगी ? और अगर अपनाएगी तो अब तक की फीडबैक रिपोर्टों का क्या होगा, जिसमें सात महीने खप गए ? गुजरात मॉडल के लिहाज से तो मुमकिन हैं हिमाचल में नए सिरे से जिलावार आब्जर्वर नियुक्त हो। यानी ऐसा होता हैं तो संगठन के गठन में अभी और वक्त लगना तय हैं। ऐसे स्थिति में हिमाचल के आम बोल चाल में लोग कहते है &#39;खप हो गई&#39;। कांग्रेसियों के साथ भी &#39;खप&#39; होने की सम्भावना फिलहाल बनी हुई है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp; &nbsp; &nbsp;ठीक सात महीने पहले कांग्रेस आलाकमान ने एक फरमान जारी किया और हिमाचल में पार्टी संगठन भंग कर दिया गया। तब से हिमाचल कांग्रेस की इकलौती पदाधिकारी है पीसीसी चीफ प्रतिभा सिंह। हैरत हैं, देश के कई राज्यों में कांग्रेस संगठन सृजन अभियान चला रही हैं, लेकिन जिस हिमाचल में सत्ता पर काबिज हैं वहां संगठन की खैर खबर ही नहीं हैं। इन सात महीनों में&nbsp; कांग्रेस के भीतर बहुत कुछ घटा है। संगठन के गठन में हो रहे विलम्ब पर मंत्रियों / नेताओं / कार्यकर्ताओं ने खुलकर नाराजगी जताई हैं। प्रदेश प्रभारी बदले दिए गए। कई बार संगठन गठन की उम्मीदें जगी, लेकिन हर बार हाथ लगी सिर्फ मायूसी और नई तारीख। अब तो बेउम्मीदी इस कदर हावी हैं कि नई तारीख भी नहीं मिल रही।&nbsp;&nbsp;

&nbsp; नवंबर में संगठन भंग होते ही जानकारी आई कि कांग्रेस नए फॉर्मूले से संगठन का गठन करेगी। आब्जर्वर तैनात हुए, प्रदेश भर में गए, ग्राउंड फीडबैक लिया और रिपोर्ट सौंपी। इन सब में करीब चार महीने बीत गए। फिर लगने लगा किसी भी वक्त अब संगठन की प्रस्तावित नियुक्तियों को आलाकमान की हरी झंडी मिल सकती हैं। पर इस बीच अचानक 15 फरवरी को प्रभारी राजीव शुक्ला ही बदल दिए गए और रजनी पाटिल की एंट्री हुई। पाटिल भी अपनी नियुक्ति के दो सप्ताह बाद जोश -खरोश के साथ हिमाचल पहुंची। बैठकें हुई , फीडबैक लिया गया, गिले-शिकवों की सुनवाई हुई और जाते -जाते वादा भी किया गया कि दो सप्ताह में संगठन बन जायेगा। अब तीन महीने से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन पत्ता भी नहीं हिला। इस बीच रजनी पाटिल तीन बार हिमाचल आ चुकी हैं, लेकिन बात फीडबैक लेने और रिपोर्ट सौंपने से आगे बढ़ती नहीं दिखी।&nbsp;&nbsp;


&nbsp; &nbsp;सात महीनों में एक परिवर्तन और हुआ हैं। पीसीसी चीफ प्रतिभा सिंह का कार्यकाल भी अब पूरा हो चुका हैं और उन्हें बदलने की अटकलें भी लग रही हैं। हिमाचल कांग्रेस के तमाम गुट अपने -अपने निष्ठावानों की तैनाती के लिए लॉबिंग में जुटे हैं। स्थिति ये हैं कि पीसीसी चीफ कौन होगा, ये सवाल इतना प्रबल हो गया कि इसके आगे जमीनी संगठन का दर्द छिप सा गया हैं।&nbsp;&nbsp;


&nbsp; कांग्रेस की स्थिति समझनी हैं तो अंत में बात पीसीसी चीफ पद के दावेदारों की भी जरूरी हैं। प्रतिभा सिंह, मुकेश अग्निहोत्री, कुलदीप राठौर, आशा कुमारी, अनिरुद्ध सिंह , यादविंद्र गोमा, सुरेश कुमार, विनोद सुल्तानपुरी , चंद्रशेखर , संजय अवस्थी और विनय कुमार, कोई नाम रह गया हो तो हम क्षमा प्रार्थी हैं। ये तमाम वो नाम है जिन्हें पीसीसी चीफ की दौड़ में शामिल बताया जा रह है। हर गुजरते दिन के साथ कोई न कोई नया शिगूफा छिड़ जाता है, चौक -चौराहे से लेकर बंद कमरों तक सियासत के जानकार खूब चर्चा करते है। फिर यकायक नए राजनैतिक समीकरण सामने आते है, कुछ नया घटित होता है और फिर सियासी माहिर नए सिरे से अपने काम में जुट जाते है। गणित के क्रमपरिवर्तन और संयोजन सूत्र का बखूबी इस्तेमाल करते हुए माहिर फिर अपने कयासों के पिटारे से नई चर्चा को जन्म देते है और चर्चा में शामिल पुराने नाम सियासी हवा में गौते खाते रह जाते है। हिमाचल कांग्रेस पर विश्लेषण करने वालों की ये ही &quot;मोडस ऑपरेंडी&quot; बन गई हैं। दरअसल हकीकत ये हैं कि हिमाचल कांग्रेस को लेकर नेताओं या सूत्रों की किसी भी जानकारी में जान बची ही नहीं हैं। सो तमाम विश्लेषण भी &#39;बे जान&#39; सिद्ध हो रहे हैं। इस बीच आलाकमान के कमान में रखे तीर किस-किस को घायल करेंगे, नए दौर की कांग्रेस में इसका अनुमान लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हैं। बहरहाल गुजरात मॉडल से &#39;संगठन सृजन&#39; का डर जरूर कांग्रेसियों को सत्ता रहा होगा !
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">गुजरात मॉडल अपनाया तो हिमाचल पर नज़र- ए -करम में लग सकता हैं और वक्त !</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">7 महीने बाद, कहाँ पहुंची हिमाचल में संगठन के गठन की बात ?</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हिमाचल के कांग्रेसियों के साथ बड़ी &#39;खप&#39; न कर दे आलाकमान !</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;कांग्रेस आलाकमान इन दिनों कई राज्यों के संगठन सृजन अभियान में मशगूल हैं। दरअसल, कांग्रेस अपने गुजरात मॉडल की तर्ज पर मध्य प्रदेश और हरियाणा में संगठन की नियुक्तियां करने जा रही हैं। हिमाचल के भी तीन विधायक आब्जर्वर बनाये गए हैं, ताकि उक्त राज्यों में मजबूत संगठन बने। इनके बाद अन्य राज्यों का भी नंबर आएगा और शायद हिमाचल पर भी नज़र- ए -करम हो। पर सवाल ये हैं कि क्या हिमाचल में कांग्रेस अपने इस गुजरात मॉडल को नहीं अपनाएगी ? और अगर अपनाएगी तो अब तक की फीडबैक रिपोर्टों का क्या होगा, जिसमें सात महीने खप गए ? गुजरात मॉडल के लिहाज से तो मुमकिन हैं हिमाचल में नए सिरे से जिलावार आब्जर्वर नियुक्त हो। यानी ऐसा होता हैं तो संगठन के गठन में अभी और वक्त लगना तय हैं। ऐसे स्थिति में हिमाचल के आम बोल चाल में लोग कहते है &#39;खप हो गई&#39;। कांग्रेसियों के साथ भी &#39;खप&#39; होने की सम्भावना फिलहाल बनी हुई है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; &nbsp;ठीक सात महीने पहले कांग्रेस आलाकमान ने एक फरमान जारी किया और हिमाचल में पार्टी संगठन भंग कर दिया गया। तब से हिमाचल कांग्रेस की इकलौती पदाधिकारी है पीसीसी चीफ प्रतिभा सिंह। हैरत हैं, देश के कई राज्यों में कांग्रेस संगठन सृजन अभियान चला रही हैं, लेकिन जिस हिमाचल में सत्ता पर काबिज हैं वहां संगठन की खैर खबर ही नहीं हैं। इन सात महीनों में&nbsp; कांग्रेस के भीतर बहुत कुछ घटा है। संगठन के गठन में हो रहे विलम्ब पर मंत्रियों / नेताओं / कार्यकर्ताओं ने खुलकर नाराजगी जताई हैं। प्रदेश प्रभारी बदले दिए गए। कई बार संगठन गठन की उम्मीदें जगी, लेकिन हर बार हाथ लगी सिर्फ मायूसी और नई तारीख। अब तो बेउम्मीदी इस कदर हावी हैं कि नई तारीख भी नहीं मिल रही।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; नवंबर में संगठन भंग होते ही जानकारी आई कि कांग्रेस नए फॉर्मूले से संगठन का गठन करेगी। आब्जर्वर तैनात हुए, प्रदेश भर में गए, ग्राउंड फीडबैक लिया और रिपोर्ट सौंपी। इन सब में करीब चार महीने बीत गए। फिर लगने लगा किसी भी वक्त अब संगठन की प्रस्तावित नियुक्तियों को आलाकमान की हरी झंडी मिल सकती हैं। पर इस बीच अचानक 15 फरवरी को प्रभारी राजीव शुक्ला ही बदल दिए गए और रजनी पाटिल की एंट्री हुई। पाटिल भी अपनी नियुक्ति के दो सप्ताह बाद जोश -खरोश के साथ हिमाचल पहुंची। बैठकें हुई , फीडबैक लिया गया, गिले-शिकवों की सुनवाई हुई और जाते -जाते वादा भी किया गया कि दो सप्ताह में संगठन बन जायेगा। अब तीन महीने से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन पत्ता भी नहीं हिला। इस बीच रजनी पाटिल तीन बार हिमाचल आ चुकी हैं, लेकिन बात फीडबैक लेने और रिपोर्ट सौंपने से आगे बढ़ती नहीं दिखी।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;सात महीनों में एक परिवर्तन और हुआ हैं। पीसीसी चीफ प्रतिभा सिंह का कार्यकाल भी अब पूरा हो चुका हैं और उन्हें बदलने की अटकलें भी लग रही हैं। हिमाचल कांग्रेस के तमाम गुट अपने -अपने निष्ठावानों की तैनाती के लिए लॉबिंग में जुटे हैं। स्थिति ये हैं कि पीसीसी चीफ कौन होगा, ये सवाल इतना प्रबल हो गया कि इसके आगे जमीनी संगठन का दर्द छिप सा गया हैं।&nbsp;&nbsp;</span></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; कांग्रेस की स्थिति समझनी हैं तो अंत में बात पीसीसी चीफ पद के दावेदारों की भी जरूरी हैं। प्रतिभा सिंह, मुकेश अग्निहोत्री, कुलदीप राठौर, आशा कुमारी, अनिरुद्ध सिंह , यादविंद्र गोमा, सुरेश कुमार, विनोद सुल्तानपुरी , चंद्रशेखर , संजय अवस्थी और विनय कुमार, कोई नाम रह गया हो तो हम क्षमा प्रार्थी हैं। ये तमाम वो नाम है जिन्हें पीसीसी चीफ की दौड़ में शामिल बताया जा रह है। हर गुजरते दिन के साथ कोई न कोई नया शिगूफा छिड़ जाता है, चौक -चौराहे से लेकर बंद कमरों तक सियासत के जानकार खूब चर्चा करते है। फिर यकायक नए राजनैतिक समीकरण सामने आते है, कुछ नया घटित होता है और फिर सियासी माहिर नए सिरे से अपने काम में जुट जाते है। गणित के क्रमपरिवर्तन और संयोजन सूत्र का बखूबी इस्तेमाल करते हुए माहिर फिर अपने कयासों के पिटारे से नई चर्चा को जन्म देते है और चर्चा में शामिल पुराने नाम सियासी हवा में गौते खाते रह जाते है। हिमाचल कांग्रेस पर विश्लेषण करने वालों की ये ही &quot;मोडस ऑपरेंडी&quot; बन गई हैं। दरअसल हकीकत ये हैं कि हिमाचल कांग्रेस को लेकर नेताओं या सूत्रों की किसी भी जानकारी में जान बची ही नहीं हैं। सो तमाम विश्लेषण भी &#39;बे जान&#39; सिद्ध हो रहे हैं। इस बीच आलाकमान के कमान में रखे तीर किस-किस को घायल करेंगे, नए दौर की कांग्रेस में इसका अनुमान लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हैं। बहरहाल गुजरात मॉडल से &#39;संगठन सृजन&#39; का डर जरूर कांग्रेसियों को सत्ता रहा होगा !</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images240581.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[HIMACHAL-CONGRESS-WAIT-FOR-SANGATHAN-IS-STILL-ON]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/himachal-bjp-still-waiting-for-first-women-as-president]]></guid>
                       <title><![CDATA[अब तक 13 नेता बने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष, कोई महिला नहीं ....क्या इंदु गोस्वामी तोड़ेगी सिलसिला ? ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/himachal-bjp-still-waiting-for-first-women-as-president]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 06 Jun 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[पिछले लंबे समय से हिमाचल भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति टलती जा रही है। हर बार कोई न कोई पेंच ऐसा फंसता है कि फैसला आगे खिसक जाता है। लेकिन अब एक बार फिर सुगबुगाहट है कि जल्द ही भाजपा को नया प्रदेश अध्यक्ष मिलेगा। हालाँकि इस बार की चर्चा में एक नया एंगल जुड़ गया है, और वो है महिला नेतृत्व को प्राथमिकता। माना जा रहा है कि भाजपा हाईकमान महिला आरक्षण के संभावित असर को देखते हुए पहले से तैयारी में जुट गया है। 2029 तक लोकसभा में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं, और इसी रणनीति के तहत भाजपा संगठन में भी महिलाओं को अहम जिम्मेदारियां सौंपने की दिशा में सोच रही है।

अगर ऐसा हुआ तो वो एक नाम जो प्रदेश अध्यक्ष पद की रेस में सबसे आगे होगा वो है राज्यसभा संसद इंदु गोस्वामी। इंदु न केवल एक प्रभावशाली महिला नेता हैं, बल्कि काँगड़ा जैसे राजनीतिक रूप से अहम ज़िले से आती हैं और पार्टी हाईकमान से भी उनका सीधा जुड़ाव माना जाता है। इंदु ब्राह्मण नेता है तो पार्टी उनके नाम पर जातीय संतुलन भी साध पाएगी।

अपने करीब 45 साल के इतिहास में बीजेपी ने हिमाचल प्रदेश में अब तक 13 नेताओं को संगठन की कमान सौपी है, लेकिन इनमें एक भी महिला नहीं रही। ऐसे में इंदु गोस्वामी का नाम सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी अहम हो सकता है। अब देखना ये होगा कि क्या भाजपा वाकई हिमाचल की कमान पहली बार किसी महिला को सौंपने जा रही है, या फिर ये चर्चा भी वक्त के साथ ठंडी पड़ जाएगी।


जब इंदु को मिल गई थी अध्यक्ष बनने की बधाई&nbsp;
इंदु गोस्वामी&nbsp; पार्टी आलाकमान के करीबी मानी जाती है और पहले भी प्रदेश अध्यक्ष की रेस में रही है। 2020&nbsp; में तो भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्ज्ञ ने उन्हें बधाई भी दे दी थी,मगर न जाने कैसे परिस्थितियां बदली और अध्यक्ष सुरेश कश्यप बन गए। हालांकि इसके बाद इंदु को पार्टी ने राजयसभा भेजा। ऐसे में माहिर मान रहे है कि इंदु की दावेदारी को जरा भी हल्के में नहीं लिया जा सकता।&nbsp; &nbsp;

]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">पिछले लंबे समय से हिमाचल भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति टलती जा रही है। हर बार कोई न कोई पेंच ऐसा फंसता है कि फैसला आगे खिसक जाता है। लेकिन अब एक बार फिर सुगबुगाहट है कि जल्द ही भाजपा को नया प्रदेश अध्यक्ष मिलेगा। हालाँकि इस बार की चर्चा में एक नया एंगल जुड़ गया है, और वो है महिला नेतृत्व को प्राथमिकता। माना जा रहा है कि भाजपा हाईकमान महिला आरक्षण के संभावित असर को देखते हुए पहले से तैयारी में जुट गया है। 2029 तक लोकसभा में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं, और इसी रणनीति के तहत भाजपा संगठन में भी महिलाओं को अहम जिम्मेदारियां सौंपने की दिशा में सोच रही है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अगर ऐसा हुआ तो वो एक नाम जो प्रदेश अध्यक्ष पद की रेस में सबसे आगे होगा वो है राज्यसभा संसद इंदु गोस्वामी। इंदु न केवल एक प्रभावशाली महिला नेता हैं, बल्कि काँगड़ा जैसे राजनीतिक रूप से अहम ज़िले से आती हैं और पार्टी हाईकमान से भी उनका सीधा जुड़ाव माना जाता है। इंदु ब्राह्मण नेता है तो पार्टी उनके नाम पर जातीय संतुलन भी साध पाएगी।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अपने करीब 45 साल के इतिहास में बीजेपी ने हिमाचल प्रदेश में अब तक 13 नेताओं को संगठन की कमान सौपी है, लेकिन इनमें एक भी महिला नहीं रही। ऐसे में इंदु गोस्वामी का नाम सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी अहम हो सकता है। अब देखना ये होगा कि क्या भाजपा वाकई हिमाचल की कमान पहली बार किसी महिला को सौंपने जा रही है, या फिर ये चर्चा भी वक्त के साथ ठंडी पड़ जाएगी।</span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>जब इंदु को मिल गई थी अध्यक्ष बनने की बधाई&nbsp;</strong><br />
इंदु गोस्वामी&nbsp; पार्टी आलाकमान के करीबी मानी जाती है और पहले भी प्रदेश अध्यक्ष की रेस में रही है। 2020&nbsp; में तो भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्ज्ञ ने उन्हें बधाई भी दे दी थी,मगर न जाने कैसे परिस्थितियां बदली और अध्यक्ष सुरेश कश्यप बन गए। हालांकि इसके बाद इंदु को पार्टी ने राजयसभा भेजा। ऐसे में माहिर मान रहे है कि इंदु की दावेदारी को जरा भी हल्के में नहीं लिया जा सकता।&nbsp; &nbsp;</span></p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images240578.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[HIMACHAL BJP-STILL WAITING FOR FIRST WOMEN AS PRESIDENT]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/as-soon-as-bjp-became-red-lakhan-pal-became-the-one-with-the-red-cap]]></guid>
                       <title><![CDATA[कौन कहता है टोपियों का सियासी रंग नहीं होता  !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/as-soon-as-bjp-became-red-lakhan-pal-became-the-one-with-the-red-cap]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 06 Jun 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[

कांग्रेस के साथ -साथ लखनपाल ने हरी टोपी भी त्याग दी !

शांता कुमार, वीरभद्र सिंह और धूमल सभी ने बनाया टोपी को पहचान

जयराम और सुक्खू राज में कुछ कमजोर हुआ सियासत और टोपियों के बीच का रिश्ता


&nbsp; &nbsp;जब तक कांग्रेस में रहे हरी टोपी सर की शान रही, भाजपाई हुए तो टोपी का रंग भी बदल गया। बड़सर विधायक इंद्रदत्त लखनपाल सियासत का बेहद मजबूत चेहरा है। शिमला नगर निगम में पार्षद का चुनाव जीत अपनी चुनावी राजनीति शुरू की थी, और फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 2012 से 2022 तक बड़सर से तीन विधानसभा चुनाव जीते और कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में गिनती रही। वीरभद्र सिंह के शगिर्द रहे और उन्हीं की तरह हरी टोपी इनकी पहचान रही। फिर 2024 में लखनपाल ने कांग्रेस से बगावत कर दी और भाजपाई हो गए। उपचुनाव जीतकर फिर विधायक भी बन गए।&nbsp; फिर कांग्रेस के साथ -साथ इन्होंने हरी टोपी भी&nbsp; त्याग दी। यानी इनके लिए टोपी का सियासी रंग भी है और सियासी निष्ठा भी। इनकी सोशल मीडिया प्रोफाइल भी इसकी तस्दीक करती है ,जब तक कांग्रेसी रहे सारी तस्वीरें हरी टोपी वाली। भाजपा का लाल होते ही लाल टोपी वाले बन गए।&nbsp;&nbsp;

&nbsp; &nbsp; अतीत में झांके तो हिमाचल की सियासत में टोपियों का आगाज़ हुआ शांता कुमार के राजनैतिक आगमन के साथ। वर्ष 1977 में प्रदेश में पहली बार गैर-कांग्रेस सरकार का गठन हुआ और शांता कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तब उनके सिर पर धारीदार कुल्लवी टोपी पहचान बनी। शांता की इस टोपी को खूब ख्याति मिलती रही और उनके समर्थक भी इसी टोपी के रंग में रंगते चले गए। जब तक शांता कुमार प्रदेश की राजनीति का केंद्र बिंदु रहे तब तक इस टोपी ने प्रदेश में अपना वर्चस्व बनाए रखा। फिर दौर आया वीरभद्र सिंह और बुशहरी टोपी का। वर्ष 1984 में वीरभद्र सिंह पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने और साथ ही उनकी हरे रंग की बुशहरी टोपी कांग्रेस की पहचान बन गई। आज भी काफी हद तक हरी टोपी को कांग्रेस से जोड़कर देखा जाता है।

&nbsp; &nbsp; वर्ष 1998 में प्रेम कुमार धूमल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तब से मैरून रंग की टोपी ने अपनी पहचान बनाई।&nbsp; प्रो प्रेम कुमार धूमल के दौर में लाल टोपी का मतलब भाजपा बन गया। हालांकि जयराम ठाकुर और सुखविंद्र सिंह सुक्खू के दौर में&nbsp; ये रिश्ता कमजोर तो पड़ा, पर आईडी लखनपाल जैसे कई नेता अब भी टोपियों के सियासी रंगों के ध्वजवाहक बने हुए है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<strong><span style="font-size:18px;">कांग्रेस के साथ -साथ लखनपाल ने हरी टोपी भी त्याग दी !</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">शांता कुमार, वीरभद्र सिंह और धूमल सभी ने बनाया टोपी को पहचान</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">जयराम और सुक्खू राज में कुछ कमजोर हुआ सियासत और टोपियों के बीच का रिश्ता</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;जब तक कांग्रेस में रहे हरी टोपी सर की शान रही, भाजपाई हुए तो टोपी का रंग भी बदल गया। बड़सर विधायक इंद्रदत्त लखनपाल सियासत का बेहद मजबूत चेहरा है। शिमला नगर निगम में पार्षद का चुनाव जीत अपनी चुनावी राजनीति शुरू की थी, और फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 2012 से 2022 तक बड़सर से तीन विधानसभा चुनाव जीते और कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में गिनती रही। वीरभद्र सिंह के शगिर्द रहे और उन्हीं की तरह हरी टोपी इनकी पहचान रही। फिर 2024 में लखनपाल ने कांग्रेस से बगावत कर दी और भाजपाई हो गए। उपचुनाव जीतकर फिर विधायक भी बन गए।&nbsp; फिर कांग्रेस के साथ -साथ इन्होंने हरी टोपी भी&nbsp; त्याग दी। यानी इनके लिए टोपी का सियासी रंग भी है और सियासी निष्ठा भी। इनकी सोशल मीडिया प्रोफाइल भी इसकी तस्दीक करती है ,जब तक कांग्रेसी रहे सारी तस्वीरें हरी टोपी वाली। भाजपा का लाल होते ही लाल टोपी वाले बन गए।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; अतीत में झांके तो हिमाचल की सियासत में टोपियों का आगाज़ हुआ शांता कुमार के राजनैतिक आगमन के साथ। वर्ष 1977 में प्रदेश में पहली बार गैर-कांग्रेस सरकार का गठन हुआ और शांता कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तब उनके सिर पर धारीदार कुल्लवी टोपी पहचान बनी। शांता की इस टोपी को खूब ख्याति मिलती रही और उनके समर्थक भी इसी टोपी के रंग में रंगते चले गए। जब तक शांता कुमार प्रदेश की राजनीति का केंद्र बिंदु रहे तब तक इस टोपी ने प्रदेश में अपना वर्चस्व बनाए रखा। फिर दौर आया वीरभद्र सिंह और बुशहरी टोपी का। वर्ष 1984 में वीरभद्र सिंह पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने और साथ ही उनकी हरे रंग की बुशहरी टोपी कांग्रेस की पहचान बन गई। आज भी काफी हद तक हरी टोपी को कांग्रेस से जोड़कर देखा जाता है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; वर्ष 1998 में प्रेम कुमार धूमल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तब से मैरून रंग की टोपी ने अपनी पहचान बनाई।&nbsp; प्रो प्रेम कुमार धूमल के दौर में लाल टोपी का मतलब भाजपा बन गया। हालांकि जयराम ठाकुर और सुखविंद्र सिंह सुक्खू के दौर में&nbsp; ये रिश्ता कमजोर तो पड़ा, पर आईडी लखनपाल जैसे कई नेता अब भी टोपियों के सियासी रंगों के ध्वजवाहक बने हुए है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images240565.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[As soon as BJP became 'red', Lakhan Pal became the one with the red cap!]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/husband-wife-both-derved-as-pcc-chief-himachal]]></guid>
                       <title><![CDATA[पति-पत्नी की इन जोड़ियां ने संभाला हिमाचल कांग्रेस अध्यक्ष पद ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/husband-wife-both-derved-as-pcc-chief-himachal]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 30 May 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp; 77 सालों के इतिहास में अब तक कांग्रेस को हिमाचल में 32 प्रदेश अध्यक्ष मिले हैं और 24&nbsp; नेताओं ने ये पद संभाला है। दिलचस्प बात ये है कि इस फेहरिस्त में पति-पत्नी की दो जोड़ियां भी है। ये जोड़ियां है डॉ यशवंत सिंह परमार व सत्यवती डांग, और वीरभद्र सिंह व प्रतिभा सिंह की। इन चारों नेताओं ने पीसीसी अध्यक्ष का दायित्व संभाला है।

&nbsp; &nbsp;प्रथम मुख्यमंत्री डॉ यशवंत सिंह परमार 28 जुलाई 1948 को हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पहले अध्यक्ष बने थे और कुल तीन मर्तबा इस पद पर रहे। वहीँ उनकी पत्नी सत्यवती डांग 18&nbsp; जनवरी 1964 को पीसीसी अध्यक्ष बनी और 13 दिसंबर 1969 तक इस पद पर रही। हालांकि अध्यक्ष रहते वक्त उनका डॉ परमार के साथ विवाह नहीं हुआ था। राजनैतिक में साथ रहते दोनों के बीच प्रेम हुआ और साल 1974 में&nbsp; सत्यवती डांग, डॉक्टर परमार की दूसरी पत्नी बनी।&nbsp;&nbsp;

&nbsp; &nbsp;वहीँ आपातकाल के बाद कांग्रेस के बुरे दौर में 4 अक्टूबर 1977 को वीरभद्र सिंह पहली बार हिमाचल पीसीसी चीफ बने और कुल चार बार उन्होंने ये पद संभाला। वे इस पद पर सबसे ज्यादा बार रहने वाले व्यक्ति भी है। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह भी&nbsp; 26 अप्रैल 2022&nbsp; को पीसीसी चीफ बनी। इत्तेफ़ाक़ ये भी हैं कि प्रतिभा सिंह भी वीरभद्र सिंह की दूसरी पत्नी है।&nbsp;&nbsp;


&nbsp; &nbsp;इस जोड़ियों के बीच एक समानता और है। डॉ वाईएस परमार और वीरभद्र सिंह, दोनों नेता हिमाचल के मुख्यमंत्री भी रहे है। वहीँ सत्यवती डांग जहाँ राज्यसभा से संसद पहुंची, तो प्रतिभा सिंह तीन बार लोकसभा सांसद रही है।&nbsp;&nbsp;

]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">&nbsp; 77 सालों के इतिहास में अब तक कांग्रेस को हिमाचल में 32 प्रदेश अध्यक्ष मिले हैं और 24&nbsp; नेताओं ने ये पद संभाला है। दिलचस्प बात ये है कि इस फेहरिस्त में पति-पत्नी की दो जोड़ियां भी है। ये जोड़ियां है डॉ यशवंत सिंह परमार व सत्यवती डांग, और वीरभद्र सिंह व प्रतिभा सिंह की। इन चारों नेताओं ने पीसीसी अध्यक्ष का दायित्व संभाला है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;प्रथम मुख्यमंत्री डॉ यशवंत सिंह परमार 28 जुलाई 1948 को हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पहले अध्यक्ष बने थे और कुल तीन मर्तबा इस पद पर रहे। वहीँ उनकी पत्नी सत्यवती डांग 18&nbsp; जनवरी 1964 को पीसीसी अध्यक्ष बनी और 13 दिसंबर 1969 तक इस पद पर रही। हालांकि अध्यक्ष रहते वक्त उनका डॉ परमार के साथ विवाह नहीं हुआ था। राजनैतिक में साथ रहते दोनों के बीच प्रेम हुआ और साल 1974 में&nbsp; सत्यवती डांग, डॉक्टर परमार की दूसरी पत्नी बनी।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;वहीँ आपातकाल के बाद कांग्रेस के बुरे दौर में 4 अक्टूबर 1977 को वीरभद्र सिंह पहली बार हिमाचल पीसीसी चीफ बने और कुल चार बार उन्होंने ये पद संभाला। वे इस पद पर सबसे ज्यादा बार रहने वाले व्यक्ति भी है। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह भी&nbsp; 26 अप्रैल 2022&nbsp; को पीसीसी चीफ बनी। इत्तेफ़ाक़ ये भी हैं कि प्रतिभा सिंह भी वीरभद्र सिंह की दूसरी पत्नी है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;इस जोड़ियों के बीच एक समानता और है। डॉ वाईएस परमार और वीरभद्र सिंह, दोनों नेता हिमाचल के मुख्यमंत्री भी रहे है। वहीँ सत्यवती डांग जहाँ राज्यसभा से संसद पहुंची, तो प्रतिभा सिंह तीन बार लोकसभा सांसद रही है।&nbsp;&nbsp;</span></strong></p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images240491.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[husband-wife-both-derved-as-pcc-chief-himachal]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/pandit-santram-and-sudhir-sharma-both-served-as-cabinet-ministers-in-virbhadra-singh-governments]]></guid>
                       <title><![CDATA[पिता और पुत्र दोनों रहे वीरभद्र कैबिनेट का हिस्सा ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/pandit-santram-and-sudhir-sharma-both-served-as-cabinet-ministers-in-virbhadra-singh-governments]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 30 May 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[

पंडित संतराम और उनके पुत्र सुधीर शर्मा, दोनों अलग -अलग दौर में वीरभद्र सरकार में रहे मंत्री


सुधीरअब भाजपाई, लेकिन उनके गुरु आज भी वीरभद्र सिंह


&nbsp; छ बार हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह की छत्रछाया में सैकड़ों नेताओं ने राजनीति के गुर सीखे। उनकी कैबिनेट में कई पीढ़ियों के नेता शामिल रहे है। दिलस्चप बात ये है कि इनमे एक पिता-पुत्र की जोड़ी भी शामिल है, पंडित संतराम और उनके बेटे सुधीर शर्मा।&nbsp;&nbsp;
&nbsp; &nbsp;
&nbsp; &nbsp;8 अप्रैल 1983 को वीरभद्र सिंह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। तब पंडित संतराम ठाकुर रामलाल की कैबिनेट में बतौर शिक्षा मंत्री शामिल थे।&nbsp; वीरभद्र सरकार में भी उनका मंत्रिपद बरकरार रहा। फिर साल 1985 में वीरभद्र सरकार के रिपीट होने के बाद वे अगले पांच साल तक&nbsp; कृषि मंत्री रहे। 1993 में&nbsp; वीरभद्र सिंह जब वापस सत्ता में लौटे तो पंडित संतराम को वन मंत्री का दायित्व दिया गया। उस दौरे में हिमाचल प्रदेश की राजनीति में पंडित संत राम की तूती बोला करती थी और पंडित जी, वीरभद्र सिंह के बेहद करीबी थे। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की जब 30 जून 1998 को पंडित संतराम का निधन हुआ तो वीरभद्र सिंह ने कहा था कि संतराम का निधन ऐसा है, जैसे उनके शरीर से बाजू का अलग हो जाना। पंडित संत राम की गिनती वीरभद्र सिंह के खास सिपहसालारों में में होती थी।

&nbsp; पंडित संतराम के निधन के बाद उनकी सीट बैजनाथ से किस्मत आजमाई उनके पुत्र सुधीर शर्मा ने। हालांकि शुरुआत हार से हुई लेकिन सुधीर ने इसके बाद पीछा मुड़ कर नहीं देखा। 2003 और 2007&nbsp; में बैजनाथ से विधायक चुने गए और ये सीट आरक्षित होने के बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में धर्मशाला जाकर चुनाव लड़ा और जीता भी। पिता पंडित संतराम की तरह ही सुधीर भी वीरभद्र सिंह के करीबी हो गए और 2012 में जब सरकार बनी तो कैबिनेट मंत्री भी बन गए। तब वीरभद्र सरकार में सुधीर को नंबर दो माना जाता था।

&nbsp; &nbsp;हालांकि वीरभद्र सिंह के निधन के बाद कांग्रेस में बहुत कुछ बदला। इस बीच सुधीर भी अब निष्ठा बदल कर भाजपाई हो चुके है। हालांकि भाजपा में जाने के बावजूद सुधीर अब भी वीरभद्र सिंह को अपना राजनैतिक गुरु मानते है।&nbsp;&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<strong><span style="font-size:18px;">पंडित संतराम और उनके पुत्र सुधीर शर्मा, दोनों अलग -अलग दौर में वीरभद्र सरकार में रहे मंत्री</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<strong><span style="font-size:18px;">सुधीरअब भाजपाई, लेकिन उनके गुरु आज भी वीरभद्र सिंह</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; छ बार हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह की छत्रछाया में सैकड़ों नेताओं ने राजनीति के गुर सीखे। उनकी कैबिनेट में कई पीढ़ियों के नेता शामिल रहे है। दिलस्चप बात ये है कि इनमे एक पिता-पुत्र की जोड़ी भी शामिल है, पंडित संतराम और उनके बेटे सुधीर शर्मा।&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp; &nbsp;<br />
&nbsp; &nbsp;8 अप्रैल 1983 को वीरभद्र सिंह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। तब पंडित संतराम ठाकुर रामलाल की कैबिनेट में बतौर शिक्षा मंत्री शामिल थे।&nbsp; वीरभद्र सरकार में भी उनका मंत्रिपद बरकरार रहा। फिर साल 1985 में वीरभद्र सरकार के रिपीट होने के बाद वे अगले पांच साल तक&nbsp; कृषि मंत्री रहे। 1993 में&nbsp; वीरभद्र सिंह जब वापस सत्ता में लौटे तो पंडित संतराम को वन मंत्री का दायित्व दिया गया। उस दौरे में हिमाचल प्रदेश की राजनीति में पंडित संत राम की तूती बोला करती थी और पंडित जी, वीरभद्र सिंह के बेहद करीबी थे। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की जब 30 जून 1998 को पंडित संतराम का निधन हुआ तो वीरभद्र सिंह ने कहा था कि संतराम का निधन ऐसा है, जैसे उनके शरीर से बाजू का अलग हो जाना। पंडित संत राम की गिनती वीरभद्र सिंह के खास सिपहसालारों में में होती थी।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; पंडित संतराम के निधन के बाद उनकी सीट बैजनाथ से किस्मत आजमाई उनके पुत्र सुधीर शर्मा ने। हालांकि शुरुआत हार से हुई लेकिन सुधीर ने इसके बाद पीछा मुड़ कर नहीं देखा। 2003 और 2007&nbsp; में बैजनाथ से विधायक चुने गए और ये सीट आरक्षित होने के बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में धर्मशाला जाकर चुनाव लड़ा और जीता भी। पिता पंडित संतराम की तरह ही सुधीर भी वीरभद्र सिंह के करीबी हो गए और 2012 में जब सरकार बनी तो कैबिनेट मंत्री भी बन गए। तब वीरभद्र सरकार में सुधीर को नंबर दो माना जाता था।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;हालांकि वीरभद्र सिंह के निधन के बाद कांग्रेस में बहुत कुछ बदला। इस बीच सुधीर भी अब निष्ठा बदल कर भाजपाई हो चुके है। हालांकि भाजपा में जाने के बावजूद सुधीर अब भी वीरभद्र सिंह को अपना राजनैतिक गुरु मानते है।&nbsp;&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images240490.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[pandit-santram-and-sudhir-sharma-both-served-as-cabinet-ministers-in-virbhadra-singh-governments]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/women-as-pcc-chief-in-himachal]]></guid>
                       <title><![CDATA[सत्यवती डांग से लेकर प्रतिभा सिंह तक....अब तक 5 महिलाएं बनी हिमाचल कांग्रेस अध्यक्ष ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/women-as-pcc-chief-in-himachal]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 30 May 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
	बीजेपी को अब भी पहली महिला अध्यक्ष का इन्तजार&nbsp;


&nbsp; &nbsp;28 जुलाई 1948 को डॉ. यशवंत सिंह परमार हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) के पहले अध्यक्ष बने थे। वर्तमान में प्रतिभा सिंह कांग्रेस की 32वीं प्रदेश अध्यक्ष हैं। पिछले 77 वर्षों में कुल 24 नेताओं ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नेतृत्व किया है, जिनमें पांच महिलाएं शामिल हैं।

&nbsp; &nbsp;कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष सत्यवती डांग 18 जनवरी 1964 से 13 दिसंबर 1969 तक इस पद पर रहीं। इसके बाद 7 जुलाई 1979 से 18 अप्रैल 1983 तक सरला शर्मा पीसीसी अध्यक्ष रहीं। तीसरी महिला अध्यक्ष विद्या स्टोक्स थीं, जिन्होंने 17 दिसंबर 2000 से 28 नवंबर 2004 तक पार्टी की कमान संभाली। इसके बाद 25 जुलाई 2005 से 7 जुलाई 2008 तक विप्लव ठाकुर प्रदेश अध्यक्ष रहीं। वर्तमान अध्यक्ष प्रतिभा सिंह 26 अप्रैल 2022 से पद पर हैं। हालांकि, अब चर्चा है कि उन्हें फिर से मौका मिलेगा या नया नेतृत्व आएगा।


&nbsp;भारतीय जनता पार्टी की बात करें तो करीब 45 साल के अपने इतिहास में पार्टी ने हिमाचल प्रदेश में अब तक 13 नेताओं को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। इनमें से कुछ एक बार, कुछ दो बार और कुछ तीन बार इस पद पर रहे हैं। लेकिन अब तक भाजपा ने किसी महिला को प्रदेश अध्यक्ष बनने का मौका नहीं दिया है।


दिलचस्प बात यह है कि जल्द ही दोनों ही पार्टियों यानी कांग्रेस और भाजपा में नए प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त होने वाले हैं। कांग्रेस में मौजूदा अध्यक्ष प्रतिभा सिंह फिर से दावेदार हैं, जबकि भाजपा से इंदु गोस्वामी का नाम चर्चा में है। ऐसे में दोनों पार्टियों पर सबकी&nbsp; निगाहें टिकी हैं ।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<ul>
	<li><strong><span style="font-size:18px;">बीजेपी को अब भी पहली महिला अध्यक्ष का इन्तजार&nbsp;</span></strong></li>
</ul>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;28 जुलाई 1948 को डॉ. यशवंत सिंह परमार हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) के पहले अध्यक्ष बने थे। वर्तमान में प्रतिभा सिंह कांग्रेस की 32वीं प्रदेश अध्यक्ष हैं। पिछले 77 वर्षों में कुल 24 नेताओं ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नेतृत्व किया है, जिनमें पांच महिलाएं शामिल हैं।</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष सत्यवती डांग 18 जनवरी 1964 से 13 दिसंबर 1969 तक इस पद पर रहीं। इसके बाद 7 जुलाई 1979 से 18 अप्रैल 1983 तक सरला शर्मा पीसीसी अध्यक्ष रहीं। तीसरी महिला अध्यक्ष विद्या स्टोक्स थीं, जिन्होंने 17 दिसंबर 2000 से 28 नवंबर 2004 तक पार्टी की कमान संभाली। इसके बाद 25 जुलाई 2005 से 7 जुलाई 2008 तक विप्लव ठाकुर प्रदेश अध्यक्ष रहीं। वर्तमान अध्यक्ष प्रतिभा सिंह 26 अप्रैल 2022 से पद पर हैं। हालांकि, अब चर्चा है कि उन्हें फिर से मौका मिलेगा या नया नेतृत्व आएगा।</span></p>

<blockquote>
<p><strong><span style="font-size:18px;">&nbsp;भारतीय जनता पार्टी की बात करें तो करीब 45 साल के अपने इतिहास में पार्टी ने हिमाचल प्रदेश में अब तक 13 नेताओं को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। इनमें से कुछ एक बार, कुछ दो बार और कुछ तीन बार इस पद पर रहे हैं। लेकिन अब तक भाजपा ने किसी महिला को प्रदेश अध्यक्ष बनने का मौका नहीं दिया है।</span></strong></p>
</blockquote>

<p><span style="font-size:18px;">दिलचस्प बात यह है कि जल्द ही दोनों ही पार्टियों यानी कांग्रेस और भाजपा में नए प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त होने वाले हैं। कांग्रेस में मौजूदा अध्यक्ष प्रतिभा सिंह फिर से दावेदार हैं, जबकि भाजपा से इंदु गोस्वामी का नाम चर्चा में है। ऐसे में दोनों पार्टियों पर सबकी&nbsp; निगाहें टिकी हैं ।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images240489.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[women-as-pcc-chief-in-himachal]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/ex-congress-leaders-leading-political-attacks-on-congress]]></guid>
                       <title><![CDATA[कांग्रेस पर 'अपनों' के वार ज्यादा 'धारदार' !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/ex-congress-leaders-leading-political-attacks-on-congress]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 29 May 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
	सुधीर ने सोशल मीडिया को बनाया सियासी असला दागने का लांच पैड !
	हर्ष महाजन कब ब्लफ करते है और कब हकीकत बयां, समझना मुश्किल !


हिमाचल में सत्तारूढ़&nbsp;कांग्रेस पर भाजपा लगतार हमलावर है, पर&nbsp; &#39;अपनों&#39; के वार कांग्रेस पर ज्यादा &#39;धारदार&#39; दिख रहे है। दरअसल, मुद्दा कोई भी हो, जितना तीखे प्रहार कांग्रेस पर पुराने मूल भाजपाई नहीं करते, उसे कहीं ज्यादा वो नेता करते है जो कभी कांग्रेस के अपने थे। हर्ष महाजन और सुधीर शर्मा; खासतौर पर ये दो वो चेहरे है जो दशकों कांग्रेस में रहे, फिर भाजपाई हुए और अब ही अपनी पुरानी पार्टी के लिए सबसे बड़ा सरदर्द भी बन गए। भाजपा में अगर नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर को छोड़ दे, तो पुराने नेताओं में एकाध ही ऐसे चेहरे दीखते है जो हर मुद्दे पर और पूरी शिद्द्त से, कांग्रेस को घेरते भी है और असरदार भी दीखते है। बाकी तो मानो रस्म अदायगी चली हो।&nbsp;निसंदेह इसका कारण नेताओं की क्षमता नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर के अपने कारण है। इस पर विस्तृत चर्चा फिर कभी। पर फिलहाल भाजपा के सियासी हमलो को जो धार &#39;पुराने वाले&#39; भाजपाई नहीं दे पा रहे, उसकी कमी ये&nbsp; &#39;नए वाले&#39; जरूर पूरी कर रहे है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp; &nbsp;यदा-कदा प्रदेश के मुद्दों पर बोलने वाले हर्ष महाजन, जब भी बोलते है सियासी पारा चरम पर होता है। हर बार नया दावा और वार में ज्यादा धार। दिलचस्प बात ये है की हर्ष महाजन कब ब्लफ कर रहे है और कब हकीकत बयां कर रहे है, इसे समझना मुश्किल है। खासतौर से असंभव दिख रहा राज्यसभा चुनाव जीतकर उन्होंने साबित किया है कि उन्हें जरा भी हल्के में लेना कितना भारी साबित हो सकता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि हर्ष महाजन जब भी मीडिया से मुखातिब होते है, कांग्रेस को खज्जल (व्यथित ) करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। किसी भी नाम का जिक्र करते है और मानो&nbsp;कांग्रेस को काम पर लगा देते है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp; &nbsp; इसी तरह सुधीर शर्मा की बात करें तो सुक्खू सरकार के खिलाफ अमूमन हर मसले पर उनकी प्रतिक्रिया चर्चा में रहती है, कभी अंदाज के चलते तो कभी सटीक शब्द बाणों के चलते। सोशल मीडिया को एक किस्म से उन्होंने सियासी असला दागने का लांच पैड बना लिया है। सुधीर कोई मौका नहीं छोड़ते और लगभग हर बार, वार निशाने पर होता है। कब फिरकी लेनी है और कब आक्रमक होना है, इस सियासी अदा के वो माहिर है।&nbsp; इन दोनों नेताओं के अलावा राजेंद्र राणा भी लगातार कांग्रेस पर हमलावर दीखते है। हालाँकि राणा भाजपा से ही कांग्रेस में आये थे।&nbsp;&nbsp;
&nbsp; &nbsp;
&nbsp; &nbsp;उधर कांग्रेस से काउंटर अटैक एक जिम्मा मुख्य तौर पर खुद सीएम सुक्खू संभालते दीखते है। वे भाजपा के पांच गुट भी गिनाते है, और भाजपा में हावी पुराने कोंग्रेसियों का जिक्र कर पुराने भाजपाइयों से सियासी ठिठोली भी करते है।&nbsp; &nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<ul>
	<li style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">सुधीर ने सोशल मीडिया को बनाया सियासी असला दागने का लांच पैड !</span></li>
	<li style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हर्ष महाजन कब ब्लफ करते है और कब हकीकत बयां, समझना मुश्किल !</span></li>
</ul>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हिमाचल में सत्तारूढ़&nbsp;</span><span style="font-size:18px;">कांग्रेस पर भाजपा लगतार हमलावर है, पर&nbsp; &#39;अपनों&#39; के वार कांग्रेस पर ज्यादा &#39;धारदार&#39; दिख रहे है। दरअसल, मुद्दा कोई भी हो, जितना तीखे प्रहार कांग्रेस पर पुराने मूल भाजपाई नहीं करते, उसे कहीं ज्यादा वो नेता करते है जो कभी कांग्रेस के अपने थे। हर्ष महाजन और सुधीर शर्मा; खासतौर पर ये दो वो चेहरे है जो दशकों कांग्रेस में रहे, फिर भाजपाई हुए और अब ही अपनी पुरानी पार्टी के लिए सबसे बड़ा सरदर्द भी बन गए। भाजपा में अगर नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर को छोड़ दे, तो पुराने नेताओं में एकाध ही ऐसे चेहरे दीखते है जो हर मुद्दे पर और पूरी शिद्द्त से, कांग्रेस को घेरते भी है और असरदार भी दीखते है। बाकी तो मानो रस्म अदायगी चली हो।&nbsp;निसंदेह इसका कारण नेताओं की क्षमता नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर के अपने कारण है। इस पर विस्तृत चर्चा फिर कभी। पर फिलहाल भाजपा के सियासी हमलो को जो धार &#39;पुराने वाले&#39; भाजपाई नहीं दे पा रहे, उसकी कमी ये&nbsp; &#39;नए वाले&#39; जरूर पूरी कर रहे है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;यदा-कदा प्रदेश के मुद्दों पर बोलने वाले हर्ष महाजन, जब भी बोलते है सियासी पारा चरम पर होता है। हर बार नया दावा और वार में ज्यादा धार। दिलचस्प बात ये है की हर्ष महाजन कब ब्लफ कर रहे है और कब हकीकत बयां कर रहे है, इसे समझना मुश्किल है। खासतौर से असंभव दिख रहा राज्यसभा चुनाव जीतकर उन्होंने साबित किया है कि उन्हें जरा भी हल्के में लेना कितना भारी साबित हो सकता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि हर्ष महाजन जब भी मीडिया से मुखातिब होते है, कांग्रेस को खज्जल (व्यथित ) करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। किसी भी नाम का जिक्र करते है और </span><span style="font-size:18px;">मानो</span>&nbsp;<span style="font-size:18px;">कांग्रेस को काम पर लगा देते है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; इसी तरह सुधीर शर्मा की बात करें तो सुक्खू सरकार के खिलाफ अमूमन हर मसले पर उनकी प्रतिक्रिया चर्चा में रहती है, कभी अंदाज के चलते तो कभी सटीक शब्द बाणों के चलते। सोशल मीडिया को एक किस्म से उन्होंने सियासी असला दागने का लांच पैड बना लिया है। सुधीर कोई मौका नहीं छोड़ते और लगभग हर बार, वार निशाने पर होता है। कब फिरकी लेनी है और कब आक्रमक होना है, इस सियासी अदा के वो माहिर है।&nbsp; इन दोनों नेताओं के अलावा राजेंद्र राणा भी लगातार कांग्रेस पर हमलावर दीखते है। हालाँकि राणा भाजपा से ही कांग्रेस में आये थे।&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp;<em><strong> &nbsp;<br />
&nbsp; </strong></em><strong>&nbsp;</strong>उधर कांग्रेस से काउंटर अटैक एक जिम्मा मुख्य तौर पर खुद सीएम सुक्खू संभालते दीखते है। वे भाजपा के पांच गुट भी गिनाते है, और भाजपा में हावी पुराने कोंग्रेसियों का जिक्र कर पुराने भाजपाइयों से सियासी ठिठोली भी करते है।&nbsp; &nbsp;</span></p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images240481.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[EX-CONGRESS-LEADERS-LEADING-POLITICAL-ATTACKS-ON-CONGRESS]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/once-a-friend-now-enemy-number-1-in-politics]]></guid>
                       <title><![CDATA[कभी दोस्त थे, अब सियासत के दुश्मन नंबर -1 ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/siyasatnama/once-a-friend-now-enemy-number-1-in-politics]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 28 May 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[कभी दोस्त थे, अब सियासत के दुश्मन नंबर -1
▪️क्या हकीकत और क्या फसाना, हर्ष महाजन के बयानों को बुझ पाना मुश्किल !
▪️सुक्खू भी हर सियासी कौशल से संपन्न, हर वार पर कर रहे जबरदस्त पलटवार&nbsp;


दोनों पुराने दोस्त और अब हिमाचल की सियासत के दुश्मन नंबर 1 ; सुखविंद्र सिंह सुक्खू और हर्ष महाजन। एक दूजे के खिलाफ इन दोनों दिग्गज नेताओं के सियासी बाणों ने एक बार फिर सियासी पारा चढ़ा दिया है।

पिछले साल राज्यसभा चुनाव में हर्ष महाजन ने सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू और कांग्रेस को तगड़ा झटका देकर असंभव जीत को संभव में बदल दिया था। ये हर्ष महाजन ही थे जो कांग्रेस के बागियों और भाजपा के बीच की धूरी माने जाते है। हर्ष महाजन अब भी जब कोई ब्यान देते है, तो उसे हल्के में लेने की भूल शायद ही कोई करता हो। खासतौर से कांग्रेस और उनके पुराने मित्र। हर्ष महाजन और सुक्खू, दोनों युवा कांग्रेस से निकले है, पुराने साथी है। हालांकि दोनों अलग गुटों में रहे, लेकिन दोनों के रिश्तों कभी इस तरह तल्खियां नहीं दिखी, जैसी अब दिख रही है।

ये भी सच है कि कोई भी मुद्दा हो, जितना दर्द कांग्रेस को पुराने भाजपाई नहीं देते, उसे कहीं ज्यादा वो नेता देते है जो कभी कांग्रेस के अपने थे, चाहे हर्ष महाजन हो, या सुधीर शर्मा।&nbsp; फिलहाल हर्ष महाजन की ही बात करते है। &#39;डूब मरना चाहिए,&nbsp; नेताओं को भी और अफसरों को भी&#39; ; विमल नेगी प्रकरण को लेकर भी जितने तल्ख़ शब्दों में हर्ष महाजन ने सुक्खू सरकार पर वार किया, शायद ही ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किसी और नेता ने किया हो। वार पुराने दोस्त हर्ष महाजन ने किया था, तो ठेस भी गहरी पहुंची। नतीजन सीएम ने दिल्ली से लौटकर विमल नेगी मामले में जब पत्रकार वार्ता की, तो विशेष तौर पर हर्ष महाजन पर पलटवार भी किया। उन्हें MLA खरीद कर नया-नया बना MP बता दिया और भ्रष्टाचार में लिप्त भी।

बुधवार को फिर हर्ष महाजन हमलावर हुए। पिछले ब्यान से बिल्कुल अलग अंदाज में। हंसते- हंसते हर्ष महाजन ने सीएम सुक्खू को दोस्त भी बताया, उनके सियासी दर्द को समझने की बात कह चुटकी भी ली, और अपने ही अंदाज में मूर्छित करने की सियासी चेतावनी भी दे गए।

उधर कुल्लू पहुंचे CM सुक्खू ने भी जबरदस्त पलटवार किया। सीएम ने तंज कसते हुए कहा कि हर्ष महाजन ने भाजपा का अपहरण कर लिया है। जो पार्टी के नहीं हुए, अच्छा है आज भाजपा में है।

बहरहाल, इन दोनों दिग्गजों के वार -पलटवार से सियासी पारा हाई है। हर्ष महाजन का कौन सा ब्यान फसाना है और कौन सा हकीकत, इस बुझ पाना मुश्किल है। तो सीएम सुक्खू भी हर सियासी कौशल से संपन्न है।&nbsp;
दोनों सियासत के महारथी है, एक डाल -डाल तो दूजा पात -पात !
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कभी दोस्त थे, अब सियासत के दुश्मन नंबर -1<br />
▪️क्या हकीकत और क्या फसाना, हर्ष महाजन के बयानों को बुझ पाना मुश्किल !<br />
▪️सुक्खू भी हर सियासी कौशल से संपन्न, हर वार पर कर रहे जबरदस्त पलटवार&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">दोनों पुराने दोस्त और अब हिमाचल की सियासत के दुश्मन नंबर 1 ; सुखविंद्र सिंह सुक्खू और हर्ष महाजन। एक दूजे के खिलाफ इन दोनों दिग्गज नेताओं के सियासी बाणों ने एक बार फिर सियासी पारा चढ़ा दिया है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">पिछले साल राज्यसभा चुनाव में हर्ष महाजन ने सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू और कांग्रेस को तगड़ा झटका देकर असंभव जीत को संभव में बदल दिया था। ये हर्ष महाजन ही थे जो कांग्रेस के बागियों और भाजपा के बीच की धूरी माने जाते है। हर्ष महाजन अब भी जब कोई ब्यान देते है, तो उसे हल्के में लेने की भूल शायद ही कोई करता हो। खासतौर से कांग्रेस और उनके पुराने मित्र। हर्ष महाजन और सुक्खू, दोनों युवा कांग्रेस से निकले है, पुराने साथी है। हालांकि दोनों अलग गुटों में रहे, लेकिन दोनों के रिश्तों कभी इस तरह तल्खियां नहीं दिखी, जैसी अब दिख रही है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ये भी सच है कि कोई भी मुद्दा हो, जितना दर्द कांग्रेस को पुराने भाजपाई नहीं देते, उसे कहीं ज्यादा वो नेता देते है जो कभी कांग्रेस के अपने थे, चाहे हर्ष महाजन हो, या सुधीर शर्मा।&nbsp; फिलहाल हर्ष महाजन की ही बात करते है। &#39;डूब मरना चाहिए,&nbsp; नेताओं को भी और अफसरों को भी&#39; ; विमल नेगी प्रकरण को लेकर भी जितने तल्ख़ शब्दों में हर्ष महाजन ने सुक्खू सरकार पर वार किया, शायद ही ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किसी और नेता ने किया हो। वार पुराने दोस्त हर्ष महाजन ने किया था, तो ठेस भी गहरी पहुंची। नतीजन सीएम ने दिल्ली से लौटकर विमल नेगी मामले में जब पत्रकार वार्ता की, तो विशेष तौर पर हर्ष महाजन पर पलटवार भी किया। उन्हें MLA खरीद कर नया-नया बना MP बता दिया और भ्रष्टाचार में लिप्त भी।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बुधवार को फिर हर्ष महाजन हमलावर हुए। पिछले ब्यान से बिल्कुल अलग अंदाज में। हंसते- हंसते हर्ष महाजन ने सीएम सुक्खू को दोस्त भी बताया, उनके सियासी दर्द को समझने की बात कह चुटकी भी ली, और अपने ही अंदाज में मूर्छित करने की सियासी चेतावनी भी दे गए।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उधर कुल्लू पहुंचे CM सुक्खू ने भी जबरदस्त पलटवार किया। सीएम ने तंज कसते हुए कहा कि हर्ष महाजन ने भाजपा का अपहरण कर लिया है। जो पार्टी के नहीं हुए, अच्छा है आज भाजपा में है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">बहरहाल, इन दोनों दिग्गजों के वार -पलटवार से सियासी पारा हाई है। हर्ष महाजन का कौन सा ब्यान फसाना है और कौन सा हकीकत, इस बुझ पाना मुश्किल है। तो सीएम सुक्खू भी हर सियासी कौशल से संपन्न है।&nbsp;<br />
दोनों सियासत के महारथी है, एक डाल -डाल तो दूजा पात -पात !</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40472.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Once a friend, now enemy number 1 in politics]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/conflict-in-kutlehad-bjp-bhutto-vs-virendra-kanwar]]></guid>
                       <title><![CDATA[कुटलैहड़ में दो पूर्व विधायक और दो तिरंगा यात्रा .....क्या लकीर खींच चुकी है !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/conflict-in-kutlehad-bjp-bhutto-vs-virendra-kanwar]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 23 May 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;


	कुटलैहड़ भाजपा के भीतर के शीत युद्ध के ट्रेलर बराबर आ रहे सामने !


&nbsp; &nbsp;जिन देवेंद्र भुट्टों ने 2022 में अर्से बाद भाजपा का सबसे मजबूत किला माने जा रहे कुटलैहड़ को फ़तेह किया था, जो भाजपा की आँखों की किरकिरी थे, वो अब आँखों का नूर हो गए है। वहीँ जो वीरेंद्र कँवर अर्से तक पार्टी का फेस रहे, चार बार विधायक बने, मंत्री रहे, अब बदली स्थिति-परिस्तिथि में दरकिनार से दिख रहे है, या यूँ कहिये कटे -कटे से है। ये वहीँ वीरेंद्र कँवर है जिन्होंने 2017 में प्रो धूमल के चुनाव हारने पर अपनी सीट छोड़ने की पेशकश कर दी थी। जो आज भी धूमल के निष्ठावान है। तो क्या धूमल से इसी निष्ठा से कीमत उन्होंने चुकाई है, या कुटलैहड़ की इस सियासी फिल्म का क्लाइमेक्स कुछ और होगा, अभी से इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। पर कुटलैहड़ भाजपा के भीतर के शीत युद्ध के ट्रेलर जरूर बराबर सामने आ रहे है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp; &nbsp;बुधवार को कुटलैहड़ में भाजपा की तिरंगा यात्रा थी जिसमें त्रिलोक जम्वाल भी पहुंचे थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता हो चुके, पूर्व विधायक देवेंद्र कुमार भुट्टो की अगुवाई में इस यात्रा का आयोजन हुआ। पर पुराने वाले वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक वीरेंद्र कंवर गैर हाजिर रहे। पर अगले ही दिन वीरेंद्र कंवर की ओर से भी तिरंगा यात्रा निकाल दी गई, दो सामाजिक संगठनो के बैनर तले। दरअसल इत्तेफ़ाक़ ये है कि कुटलैहड़ में भाजपा के दो मंडल है और ये सामाजिक संगठन भी इन दोनों क्षेत्रों से है। अब देखने वाले इस तिरंगा यात्रा को सियासी यात्रा के तौर पर भी देख रहे है। हम तो ये कहेंगे&nbsp; &quot;जिन की रही भावना जैसी, तिरंगा यात्रा देखी तिन तैसी&quot;।&nbsp;&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>

<ul>
	<li><strong><em><span style="font-size:18px;">कुटलैहड़ भाजपा के भीतर के शीत युद्ध के ट्रेलर बराबर आ रहे सामने !</span></em></strong></li>
</ul>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;जिन देवेंद्र भुट्टों ने 2022 में अर्से बाद भाजपा का सबसे मजबूत किला माने जा रहे कुटलैहड़ को फ़तेह किया था, जो भाजपा की आँखों की किरकिरी थे, वो अब आँखों का नूर हो गए है। वहीँ जो वीरेंद्र कँवर अर्से तक पार्टी का फेस रहे, चार बार विधायक बने, मंत्री रहे, अब बदली स्थिति-परिस्तिथि में दरकिनार से दिख रहे है, या यूँ कहिये कटे -कटे से है। ये वहीँ वीरेंद्र कँवर है जिन्होंने 2017 में प्रो धूमल के चुनाव हारने पर अपनी सीट छोड़ने की पेशकश कर दी थी। जो आज भी धूमल के निष्ठावान है। तो क्या धूमल से इसी निष्ठा से कीमत उन्होंने चुकाई है, या कुटलैहड़ की इस सियासी फिल्म का क्लाइमेक्स कुछ और होगा, अभी से इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। पर कुटलैहड़ भाजपा के भीतर के शीत युद्ध के ट्रेलर जरूर बराबर सामने आ रहे है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;बुधवार को कुटलैहड़ में भाजपा की तिरंगा यात्रा थी जिसमें त्रिलोक जम्वाल भी पहुंचे थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता हो चुके, पूर्व विधायक देवेंद्र कुमार भुट्टो की अगुवाई में इस यात्रा का आयोजन हुआ। पर पुराने वाले वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक वीरेंद्र कंवर गैर हाजिर रहे। पर अगले ही दिन वीरेंद्र कंवर की ओर से भी तिरंगा यात्रा निकाल दी गई, दो सामाजिक संगठनो के बैनर तले। दरअसल इत्तेफ़ाक़ ये है कि कुटलैहड़ में भाजपा के दो मंडल है और ये सामाजिक संगठन भी इन दोनों क्षेत्रों से है। अब देखने वाले इस तिरंगा यात्रा को सियासी यात्रा के तौर पर भी देख रहे है। हम तो ये कहेंगे&nbsp; &quot;जिन की रही भावना जैसी, तिरंगा यात्रा देखी तिन तैसी&quot;।&nbsp;&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images240427.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[CONFLICT-IN-KUTLEHAD-BJP-BHUTTO-VS-VIRENDRA-KANWAR]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/more-delay-likely-in-reformation-of-himachal-congress-body]]></guid>
                       <title><![CDATA[कांग्रेस संगठन : पीसीसी चीफ पर पेंच अटका रहा, तो मुमकिन है इन्तजार कायम रहे !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/more-delay-likely-in-reformation-of-himachal-congress-body]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 19 May 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
	&nbsp; &nbsp;पाटिल के संभावित दौरे के बीच फिर कयासों का सिलसिला तेज&nbsp;
	&nbsp; &nbsp;जय हिंद यात्रा को लेकर अगले सप्ताह हिमाचल आ सकती है रजनी पाटिल


प्रदेश कांग्रेस प्रभारी रजनी पाटिल अगले सप्ताह हिमाचल आ सकती है। ये दौरा कांग्रेस की प्रस्तावित &#39;जय हिंद&#39; यात्रा को लेकर होगा, पाटिल के आने की ख़बरों के बीच एक बार फिर संगठन गठन को लेकर हलचल तेज है। माहिर मान रहे है कि पाटिल के दौरे से पहले अगर आलाकमान पीसीसी चीफ को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है, तो संभव है जमीनी संगठन के गठन की प्रक्रिया भी पाटिल के दौरे के साथ शुरू हो। किन्तु अगर पीसीसी चीफ को लेकर पेंच अटका रहा, तो मुमकिन है अभी इन्तजार कायम रहे।&nbsp; &nbsp;

&nbsp; आपको बता दें 6 नवंबर 2024 को कांग्रेस आलाकमान ने प्रदेश, जिला व सभी ब्लॉक इकाइयां भंग कर दी थी।&nbsp; तब से प्रतिभा सिंह ही संगठन की इकलौती पदाधिकारी है। हालांकि इस बीच उनका तीन साल का कार्यकाल भी पूर्ण हो गया है, ऐसे में उन्हें एक्सटेंशन मिलेगा या नए पीसीसी चीफ की ताजपोशी होगी, इसे लेकर भी कयासों का सिलसिला जारी है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp; &nbsp;कांग्रेस संगठन के गठन में हो रहे इस विलम्ब को लेकर आम कार्यकर्ताओं से लेकर मंत्रियों तक की हताशा दिखी है। बीते दिनों बिलासपुर में पीसीसी चीफ को कार्यकर्ताओं की नारजगी झेलनी पड़ी थी, तो मंत्री चौधरी चंद्र कुमार तो कांग्रेस संगठन को पेरालाइज़ड तक कह चुके है। खुद पीसीसी चीफ प्रतिभा सिंह भी इस विलम्ब को लेकर खुलकर निराशा व्यक्त करती रही है। बावजूद इसके अब तक आलाकमान ने संगठन के गठन को हरी झंडी नहीं दी है।&nbsp;

&nbsp; &nbsp;बहरहाल प्रदेश प्रभारी पद सँभालने के बाद ये रजनी पाटिल का तीसरा दौरा होगा। फरवरी के अंत में हुए अपने पहले पहले दौरे में पाटिल ने 15&nbsp; दिन में संगठन के गठन का वादा किया था,लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अब फिर रजनी पाटिल के दौरे को लेकर कयासों का बाजार गर्म है, और कांग्रेस के निष्ठावानों को उम्मीद है कि इन्तजार जल्द खत्म होगा।&nbsp; &nbsp;&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<ul>
	<li><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;</span><span style="font-size: 18px;">पाटिल के संभावित दौरे के बीच फिर कयासों का सिलसिला तेज&nbsp;</span></li>
	<li><span style="font-size: 18px;">&nbsp; &nbsp;</span><span style="font-size: 18px;">जय हिंद यात्रा को लेकर अगले सप्ताह हिमाचल आ सकती है रजनी पाटिल</span></li>
</ul>

<p><span style="font-size:18px;">प्रदेश कांग्रेस प्रभारी रजनी पाटिल अगले सप्ताह हिमाचल आ सकती है। ये दौरा कांग्रेस की प्रस्तावित &#39;जय हिंद&#39; यात्रा को लेकर होगा, पाटिल के आने की ख़बरों के बीच एक बार फिर संगठन गठन को लेकर हलचल तेज है। माहिर मान रहे है कि पाटिल के दौरे से पहले अगर आलाकमान पीसीसी चीफ को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है, तो संभव है जमीनी संगठन के गठन की प्रक्रिया भी पाटिल के दौरे के साथ शुरू हो। किन्तु अगर पीसीसी चीफ को लेकर पेंच अटका रहा, तो मुमकिन है अभी इन्तजार कायम रहे।&nbsp; &nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; आपको बता दें 6 नवंबर 2024 को कांग्रेस आलाकमान ने प्रदेश, जिला व सभी ब्लॉक इकाइयां भंग कर दी थी।&nbsp; तब से प्रतिभा सिंह ही संगठन की इकलौती पदाधिकारी है। हालांकि इस बीच उनका तीन साल का कार्यकाल भी पूर्ण हो गया है, ऐसे में उन्हें एक्सटेंशन मिलेगा या नए पीसीसी चीफ की ताजपोशी होगी, इसे लेकर भी कयासों का सिलसिला जारी है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;कांग्रेस संगठन के गठन में हो रहे इस विलम्ब को लेकर आम कार्यकर्ताओं से लेकर मंत्रियों तक की हताशा दिखी है। बीते दिनों बिलासपुर में पीसीसी चीफ को कार्यकर्ताओं की नारजगी झेलनी पड़ी थी, तो मंत्री चौधरी चंद्र कुमार तो कांग्रेस संगठन को पेरालाइज़ड तक कह चुके है। खुद पीसीसी चीफ प्रतिभा सिंह भी इस विलम्ब को लेकर खुलकर निराशा व्यक्त करती रही है। बावजूद इसके अब तक आलाकमान ने संगठन के गठन को हरी झंडी नहीं दी है।&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;बहरहाल प्रदेश प्रभारी पद सँभालने के बाद ये रजनी पाटिल का तीसरा दौरा होगा। फरवरी के अंत में हुए अपने पहले पहले दौरे में पाटिल ने 15&nbsp; दिन में संगठन के गठन का वादा किया था,लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अब फिर रजनी पाटिल के दौरे को लेकर कयासों का बाजार गर्म है, और कांग्रेस के निष्ठावानों को उम्मीद है कि इन्तजार जल्द खत्म होगा।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40389.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[MORE-DELAY-LIKELY-IN-REFORMATION-OF-HIMACHAL-CONGRESS-BODY]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/cm-sukkhu-met-mukesh-agnihotri-between-congress-infighting-in-himachal]]></guid>
                       <title><![CDATA[ मन के भेद तो तस्वीरों से जाहिर नहीं होते, पर ये तस्वीर अच्छी है ! ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/cm-sukkhu-met-mukesh-agnihotri-between-congress-infighting-in-himachal]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 19 May 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
	सुक्खू-अग्नहोत्री की मुलाकात क्या बर्फ पिघलायेगी !
	इन्तजार की इन्तेहाँ : साढ़े 6 महीने से संगठन नहीं, अब पीसीसी चीफ को लेकर अटकलें !
	सीएम सुक्खू के सर पर आलाकमान का हाथ&nbsp;
	कांग्रेस का हाल तय करेगी अग्नहोत्री की सियासी चाल&nbsp;
	पीसीसी चीफ का पद गया, तो क्या रहेगा होलीलॉज का रुख&nbsp; ?


&nbsp; अलबत्ता सियासत में मन के भेद तो तस्वीरों से जाहिर नहीं होते, लेकिन मतभेद की अटकलों को ख़ारिज करने के लिए&nbsp; नेता अक्सर तस्वीर का इस्तेमाल करते है। ऐसा ही आज सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू और डिप्टी सीएम मुकेश अग्निहोत्री ने भी किया है। दरअसल, कुछ वक्त से इन दोनों दिग्गज नेताओं के बीच तकरार की खबरें आ रही थी। खासतौर से अग्निहोत्री की एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद अटकलों का बाजार गर्म था।&nbsp;&nbsp;
इस बीच डिप्टी सीएम मुकेश अग्निहोत्री की चोटिल बेटी का कुशलक्षेम जाने सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू उनके निवास पर पहुंचे। फिर बाहर निकल दोनों नेताओं ने एक साथ तस्वीर भी खिंचवाई। क्या ये मुलाकात बर्फ पिघलायेगी, ये तो वक्त बताएगा, लेकिन तरह -तरह की अटकलों के बीच सामने आई ये तस्वीर कांग्रेस के निष्ठावानों के लिए जरूर राहत भरी है।&nbsp;

&nbsp; &nbsp; मौजूदा वक्त में हिमाचल में कांग्रेस बेहद चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। दरअसल, अंतर्कलह के चलते आलाकमान के फैसले न ले पाने की अक्षमता खुलकर उजागर हुई है। प्रदेश में करीब साढ़े छ महीने से कांग्रेस बेसंगठन है, ढाई साल बीत जाने के बावजूद कैबिनेट में एक मंत्री पद रिक्त है, और कई अहम बोर्ड निगमों में अब तक नियुक्तियां नहीं हो पाई है। कारण है कांग्रेस में कई प्रभावी खेमों का होना। जगजाहिर है कांग्रेस मौटे तौर पर तीन गुटों में बंटी है, सीएम सुक्खू का खेमा, डिप्टी सीएम मुकेश अग्नहोत्री का खेमा और पीसीसी चीफ प्रतिभा सिंह का खेमा। इन तीनों के बीच संतुलन बनाना आलाकमान के सामने बड़ी चुनौती है और ये ही कारण है जरूरी फैसले लेने में भी इन्तजार की इन्तेहाँ हो गई है।&nbsp;

&nbsp; वहीँ, बीत कुछ वक्त में पीसीसी चीफ को बदले जाने की भी सुगबुगाहट है। अटकलें थी कि सुक्खू खेमा डिप्टी सीएम को संगठन की कमान देकर सेटल करवाने की फ़िराक में था। इस बीच पहले हेलीकाप्टर लेकर मंत्री अनिरुद्ध सिंह का हरोली पहुंचना और फिर दिल्ली गए मुकेश अग्नहोत्री की सोशल मीडिया पोस्ट ने सियासी पारा हाई कर दिया। पाकिस्तान से हुई तकरार के चलते कुछ वक्त के लिए कांग्रेस के इस गृह युद्ध से लाइमलाइट हटी जरूर, मगर अब भी जमीन पर कुछ ख़ास बदला नहीं दिखता। हाँ, गुजरते वक्त के साथ पीसीसी चीफ और कैबिनेट की कुर्सी के दावेदारों की फेहरिस्त जरूर लम्बी होती जा रही है, पर हकीकत ये है कि आलाकमान के मन ठोह किसी को नहीं।&nbsp;&nbsp;


&nbsp; &nbsp;बहरहाल, मान रहे है कि आलाकमान का हाथ पूरी तरह सीएम सुक्खू के सर पर है। पिछले वर्ष हुई बगावत के बाद हुए उपचुनाव में सुक्खू के नेतृत्व में पार्टी के शानदार प्रदर्शन के बाद आलाकमान के मन में उन्हें लेकर कोई संदेह नहीं है। सो कुछ अप्रत्याशित नहीं हुआ तो सीएम सुक्खू ही पार्टी का चेहरा रहेंगे। दूसरा, आने वाले वक्त में मुकेश अग्नहोत्री की सियासी चाल कांग्रेस का हाल तय करेगी। जब विपक्ष पर हावी होना हो तो निसंदेह अग्निहोत्री का कोई सानी नहीं। मजबूत जनाधार वाले कुछ विधायक भी खुलकर उनके साथ है। चर्चा ये भी है कि अग्निहोत्री को साधने के लिए दोहरी जिम्मेदारी दी जा सकती है, यानी वे डिप्टी सीएम भी बने रहेंगे और उन्हें पीसीसी चीफ भी बनाया जा सकता है। जिक्र होलीलॉज का भी जरूरी है। अगर प्रतिभा सिंह पीसीसी चीफ नहीं रहती, तो होलीलॉज का रुख क्या रहता है, ये देखना भी दिलचस्प होगा।&nbsp;

&nbsp;

]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<ul>
	<li><em><span style="font-size:18px;">सुक्खू-अग्नहोत्री की मुलाकात क्या बर्फ पिघलायेगी !</span></em></li>
	<li><em><span style="font-size:18px;">इन्तजार की इन्तेहाँ : साढ़े 6 महीने से संगठन नहीं, अब पीसीसी चीफ को लेकर अटकलें !</span></em></li>
	<li><em><span style="font-size:18px;">सीएम सुक्खू के सर पर आलाकमान का हाथ&nbsp;</span></em></li>
	<li><em><span style="font-size:18px;">कांग्रेस का हाल तय करेगी अग्नहोत्री की सियासी चाल&nbsp;</span></em></li>
	<li><em><span style="font-size:18px;">पीसीसी चीफ का पद गया, तो क्या रहेगा होलीलॉज का रुख&nbsp; ?</span></em></li>
</ul>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; अलबत्ता सियासत में मन के भेद तो तस्वीरों से जाहिर नहीं होते, लेकिन मतभेद की अटकलों को ख़ारिज करने के लिए&nbsp; नेता अक्सर तस्वीर का इस्तेमाल करते है। ऐसा ही आज सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू और डिप्टी सीएम मुकेश अग्निहोत्री ने भी किया है। दरअसल, कुछ वक्त से इन दोनों दिग्गज नेताओं के बीच तकरार की खबरें आ रही थी। खासतौर से अग्निहोत्री की एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद अटकलों का बाजार गर्म था।&nbsp;&nbsp;<br />
इस बीच डिप्टी सीएम मुकेश अग्निहोत्री की चोटिल बेटी का कुशलक्षेम जाने सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू उनके निवास पर पहुंचे। फिर बाहर निकल दोनों नेताओं ने एक साथ तस्वीर भी खिंचवाई। क्या ये मुलाकात बर्फ पिघलायेगी, ये तो वक्त बताएगा, लेकिन तरह -तरह की अटकलों के बीच सामने आई ये तस्वीर कांग्रेस के निष्ठावानों के लिए जरूर राहत भरी है।&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; मौजूदा वक्त में हिमाचल में कांग्रेस बेहद चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। दरअसल, अंतर्कलह के चलते आलाकमान के फैसले न ले पाने की अक्षमता खुलकर उजागर हुई है। प्रदेश में करीब साढ़े छ महीने से कांग्रेस बेसंगठन है, ढाई साल बीत जाने के बावजूद कैबिनेट में एक मंत्री पद रिक्त है, और कई अहम बोर्ड निगमों में अब तक नियुक्तियां नहीं हो पाई है। कारण है कांग्रेस में कई प्रभावी खेमों का होना। जगजाहिर है कांग्रेस मौटे तौर पर तीन गुटों में बंटी है, सीएम सुक्खू का खेमा, डिप्टी सीएम मुकेश अग्नहोत्री का खेमा और पीसीसी चीफ प्रतिभा सिंह का खेमा। इन तीनों के बीच संतुलन बनाना आलाकमान के सामने बड़ी चुनौती है और ये ही कारण है जरूरी फैसले लेने में भी इन्तजार की इन्तेहाँ हो गई है।&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; वहीँ, बीत कुछ वक्त में पीसीसी चीफ को बदले जाने की भी सुगबुगाहट है। अटकलें थी कि सुक्खू खेमा डिप्टी सीएम को संगठन की कमान देकर सेटल करवाने की फ़िराक में था। इस बीच पहले हेलीकाप्टर लेकर मंत्री अनिरुद्ध सिंह का हरोली पहुंचना और फिर दिल्ली गए मुकेश अग्नहोत्री की सोशल मीडिया पोस्ट ने सियासी पारा हाई कर दिया। पाकिस्तान से हुई तकरार के चलते कुछ वक्त के लिए कांग्रेस के इस गृह युद्ध से लाइमलाइट हटी जरूर, मगर अब भी जमीन पर कुछ ख़ास बदला नहीं दिखता। हाँ, गुजरते वक्त के साथ पीसीसी चीफ और कैबिनेट की कुर्सी के दावेदारों की फेहरिस्त जरूर लम्बी होती जा रही है, पर हकीकत ये है कि आलाकमान के मन ठोह किसी को नहीं।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<blockquote>
<p><span style="font-size:18px;">&nbsp;<strong> &nbsp;बहरहाल, मान रहे है कि आलाकमान का हाथ पूरी तरह सीएम सुक्खू के सर पर है। पिछले वर्ष हुई बगावत के बाद हुए उपचुनाव में सुक्खू के नेतृत्व में पार्टी के शानदार प्रदर्शन के बाद आलाकमान के मन में उन्हें लेकर कोई संदेह नहीं है। सो कुछ अप्रत्याशित नहीं हुआ तो सीएम सुक्खू ही पार्टी का चेहरा रहेंगे। दूसरा, आने वाले वक्त में मुकेश अग्नहोत्री की सियासी चाल कांग्रेस का हाल तय करेगी। जब विपक्ष पर हावी होना हो तो निसंदेह अग्निहोत्री का कोई सानी नहीं। मजबूत जनाधार वाले कुछ विधायक भी खुलकर उनके साथ है। चर्चा ये भी है कि अग्निहोत्री को साधने के लिए दोहरी जिम्मेदारी दी जा सकती है, यानी वे डिप्टी सीएम भी बने रहेंगे और उन्हें पीसीसी चीफ भी बनाया जा सकता है। जिक्र होलीलॉज का भी जरूरी है। अगर प्रतिभा सिंह पीसीसी चीफ नहीं रहती, तो होलीलॉज का रुख क्या रहता है, ये देखना भी दिलचस्प होगा।&nbsp;</strong></span></p>

<p>&nbsp;</p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images240386.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[cm-sukkhu-met-mukesh-agnihotri-between-congress-infighting-in-himachal]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/kangna-deleted-her-post-on-trump]]></guid>
                       <title><![CDATA[कंगना ने कहा PM मोदी 'अल्फा मेल्स के  बाप', नड्डा के पोस्ट डिलीट करवा दिया ......विक्रमादित्य बहन कंगना के साथ !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/kangna-deleted-her-post-on-trump]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 16 May 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[15 मई की दोपहर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का एक बयान आया, जिसमें उन्होंने एप्पल के CEO टिम कुक को भारत में iPhone का प्रोडक्शन बढ़ाने को लेकर हड़का दिया।&nbsp; कुछ ही देर में ट्रम्प के इस बयान&nbsp; पर प्रतिक्रिया आई एक्टर टर्न्ड पॉलिटिशियन कंगना रनौत से ।&nbsp;

कंगना ने अपनी X पोस्ट में ट्रम्प पर तंज कसा। हालाँकि समझ&nbsp; बस इतना आया कि &#39;ट्रम्प से महान हमारे पीएम मोदी है। बिना शक ट्रंप एक &#39;अल्फा मेल&#39; हैं, लेकिन हमारे पीएम सबके बाप हैं।

अभी माहिर कंगना के इस बयान को पूरी तरह डिकोड करने की जद्दोजहद में लगे हुए थे, इस बीच कंगना ने इस पोस्ट को डिलीट कर दिया।&nbsp;&nbsp;
फिर कुछ देर बाद कंगना ने एक और पोस्ट लिख इसका कारण भी बता दिया।&nbsp;&nbsp;

कंगना ने लिखा -

&quot;राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मुझे फोन किया और कहा कि मैं वह ट्वीट डिलीट कर दूं जिसमें मैंने कहा था कि ट्रंप ने एप्पल के सीईओ टिम कुक से भारत में मैन्युफैक्चरिंग न करने को कहा था।&nbsp; मुझे खेद है कि मैंने अपनी एक निजी राय पोस्ट कर दी।&nbsp; निर्देश के अनुसार, मैंने तुरंत उसे इंस्टाग्राम से भी हटा दिया। &quot;

&nbsp; &nbsp;यानी कंगना की भाषा उनकी अपनी पार्टी को भी समझ नहीं आई और खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को कंगना को फोन करना पड़ गया।&nbsp; वैसे&nbsp; यह पहला मामला नहीं है जब कंगना के बयानों पर काबू पाने के लिए आलाकमान को आगे आना पड़ा हो।&nbsp;

&nbsp; इस बीच हिमाचल में कंगना के चिर प्रतिद्वंदी विक्रमादित्य सिंह ने भी इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देकर फिरकी ली हैं। उन्होंने कह इस मामले पर वो उनकी बड़ी बहन यानी कंगना के साथ खड़े है।&nbsp;&nbsp;

विक्रमादित्य सिंह ने लिखा -&nbsp;

&quot; डोनाल्ड ट्रम्प सीधे सीधे ऐपल के CEO टिम कुक को धमका रहें है की भारत मैं ऐपल की प्रोडक्शन नहीं होनी चाहिए, सवाल है की कोई कुछ बोल क्यों नहीं रहा ?&nbsp; हमारी बड़ी बहन ने कुछ बोलने की कोशिश की मगर उन्हें भी चुप करवा दिया गया, हम इस विषय पर उनके साथ खड़े हैं। हम तो उनके परम मित्र है ना ? &quot;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: 18px;">15 मई की दोपहर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का एक बयान आया, जिसमें उन्होंने एप्पल के CEO टिम कुक को भारत में iPhone का प्रोडक्शन बढ़ाने को लेकर हड़का दिया।&nbsp; कुछ ही देर में ट्रम्प के इस बयान&nbsp; पर प्रतिक्रिया आई एक्टर टर्न्ड पॉलिटिशियन कंगना रनौत से ।&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">कंगना ने अपनी X पोस्ट में ट्रम्प पर तंज कसा। हालाँकि समझ&nbsp; बस इतना आया कि &#39;ट्रम्प से महान हमारे पीएम मोदी है। बिना शक ट्रंप एक &#39;अल्फा मेल&#39; हैं, लेकिन हमारे पीएम सबके बाप हैं।</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">अभी माहिर कंगना के इस बयान को पूरी तरह डिकोड करने की जद्दोजहद में लगे हुए थे, इस बीच कंगना ने इस पोस्ट को डिलीट कर दिया।&nbsp;&nbsp;<br />
फिर कुछ देर बाद कंगना ने एक और पोस्ट लिख इसका कारण भी बता दिया।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;"><em>कंगना ने लिखा -</em></span></p>

<p><span style="font-size:18px;"><strong><em>&quot;राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मुझे फोन किया और कहा कि मैं वह ट्वीट डिलीट कर दूं जिसमें मैंने कहा था कि ट्रंप ने एप्पल के सीईओ टिम कुक से भारत में मैन्युफैक्चरिंग न करने को कहा था।&nbsp; मुझे खेद है कि मैंने अपनी एक निजी राय पोस्ट कर दी।&nbsp; निर्देश के अनुसार, मैंने तुरंत उसे इंस्टाग्राम से भी हटा दिया। &quot;</em></strong></span></p>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;यानी कंगना की भाषा उनकी अपनी पार्टी को भी समझ नहीं आई और खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को कंगना को फोन करना पड़ गया।&nbsp; वैसे&nbsp; यह पहला मामला नहीं है जब कंगना के बयानों पर काबू पाने के लिए आलाकमान को आगे आना पड़ा हो।&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;">&nbsp; इस बीच हिमाचल में कंगना के चिर प्रतिद्वंदी विक्रमादित्य सिंह ने भी इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देकर फिरकी ली हैं। उन्होंने कह इस मामले पर वो उनकी बड़ी बहन यानी कंगना के साथ खड़े है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p><span style="font-size:18px;"><em>विक्रमादित्य सिंह ने लिखा -&nbsp;</em></span></p>

<p><span style="font-size:18px;"><strong><em>&quot; डोनाल्ड ट्रम्प सीधे सीधे ऐपल के CEO टिम कुक को धमका रहें है की भारत मैं ऐपल की प्रोडक्शन नहीं होनी चाहिए, सवाल है की कोई कुछ बोल क्यों नहीं रहा ?&nbsp; हमारी बड़ी बहन ने कुछ बोलने की कोशिश की मगर उन्हें भी चुप करवा दिया गया, हम इस विषय पर उनके साथ खड़े हैं। हम तो उनके परम मित्र है ना ? &quot;</em></strong></span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40346.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[kangna-deleted-her-post-on-trump]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/congress-repeating-haryanas-blunder-in-himachal-pradesh]]></guid>
                       <title><![CDATA[साढ़े पांच महीने से हिमाचल कांग्रेस बेसंगठन, लगता नहीं हरियाणा से सबक लिया है !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/congress-repeating-haryanas-blunder-in-himachal-pradesh]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 22 Apr 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
हरियाणा में 12 साल से नहीं है जिला और ब्लॉक अध्यक्ष&nbsp;



&nbsp; &nbsp;क्या हिमाचल में कांग्रेस हरियाणा की पुर्नावृति चाहती है ? वहीँ हरियाणा जहाँ सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ गजब की एंटी इंकम्बैंसी के बावजूद कांग्रेस बुरी तरह विधानसभा चुनाव हारी है। जहाँ लगातार तीन विधानसभा चुनाव पार्टी हार चुकी है और अब भी सबक लेती नहीं दिख रही। यदि ऐसा नहीं है तो हिमाचल में पार्टी हरियाणा की राह पर क्यों बढ़ती दिख रही है ?&nbsp; हरियाणा में लगभग 12 सालों से कांग्रेस के जिला और ब्लॉक अध्यक्षों की&nbsp; नियुक्ति नहीं हुई है। इस बीच देश में तीन आम और राज्य में तीन असेंबली चुनाव हो गए, कई प्रदेश कई प्रदेशाध्यक्ष व प्रभारी बदल गए, लेकिन कोई भी संगठन की नियुक्तियां नहीं करवा पाया। इसकी एक बड़ी वजह मानी जाती है कि प्रदेश के वजनदार नेताओं का होना और इन नेताओं के आपसी मतभेद। इसके चलते कभी संगठन पदाधिकारियों सर्वमान्य सूची बन ही नहीं पाई। अब हिमाचल कांग्रेस कार्यकारणी के गठन में देरी तो ये ही इशारा देती है कि कांग्रेस ने हरियाणा से कोई सबक नहीं लिया है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp;
&nbsp; &nbsp;हिमाचल प्रदेश में 6 नवंबर से कांग्रेस संगठन भंग है। साढ़े पांच महीने में भी आलाकमान नए संगठन को हरी झंडी नहीं दे पाया है। दरअसल हिमाचल में भी कांग्रेस का मर्ज हरियाणा वाला ही है, गुटों में बंटे बड़े और वजनदार चेहरे। यहाँ भी अब तक आलाकमान फोई फैसला नहीं ले पाया। कांग्रेस के मंत्रियों सहित कई बड़े नेता सवाल उठा चुके है, आलाकमान को चेता चुके है, लेकिन अब तक नतीजा रहा है&nbsp;&nbsp;
सिफर। हैरत है कि कांग्रेस में अब भी कोई जल्दबाजी नहीं दिखती, या यूँ कहे कि शायद आलाकमान इस स्थिति के आगे बेबस है। बहरहाल कारण जो भी इस स्थिति में हिमाचल कांग्रेस का आम कार्यकर्त्ता जरूर मायूस दिख रहा है।&nbsp;&nbsp;


&nbsp;इस बीच दिलचस्प बात तो ये है बीते कुछ वक्त में कांग्रेस आलाकमान जिला अध्यक्षों को ताकतवर करने के संकेत देता रहा है। दिल्ली में बाकायदा राहुल गाँधी और खरगे सहित बड़े नेता जिला अध्यक्षों की वर्कशॉप ले चुके है। पर विडम्बना देखिये कि हरियाणा और हिमाचल जैसे राज्यों में जिला अध्यक्ष ही नहीं है।&nbsp;

]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">हरियाणा में 12 साल से नहीं है जिला और ब्लॉक अध्यक्ष&nbsp;</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;क्या हिमाचल में कांग्रेस हरियाणा की पुर्नावृति चाहती है ? वहीँ हरियाणा जहाँ सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ गजब की एंटी इंकम्बैंसी के बावजूद कांग्रेस बुरी तरह विधानसभा चुनाव हारी है। जहाँ लगातार तीन विधानसभा चुनाव पार्टी हार चुकी है और अब भी सबक लेती नहीं दिख रही। यदि ऐसा नहीं है तो हिमाचल में पार्टी हरियाणा की राह पर क्यों बढ़ती दिख रही है ?&nbsp; हरियाणा में लगभग 12 सालों से कांग्रेस के जिला और ब्लॉक अध्यक्षों की&nbsp; नियुक्ति नहीं हुई है। इस बीच देश में तीन आम और राज्य में तीन असेंबली चुनाव हो गए, कई प्रदेश कई प्रदेशाध्यक्ष व प्रभारी बदल गए, लेकिन कोई भी संगठन की नियुक्तियां नहीं करवा पाया। इसकी एक बड़ी वजह मानी जाती है कि प्रदेश के वजनदार नेताओं का होना और इन नेताओं के आपसी मतभेद। इसके चलते कभी संगठन पदाधिकारियों सर्वमान्य सूची बन ही नहीं पाई। अब हिमाचल कांग्रेस कार्यकारणी के गठन में देरी तो ये ही इशारा देती है कि कांग्रेस ने हरियाणा से कोई सबक नहीं लिया है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;<br />
&nbsp; &nbsp;हिमाचल प्रदेश में 6 नवंबर से कांग्रेस संगठन भंग है। साढ़े पांच महीने में भी आलाकमान नए संगठन को हरी झंडी नहीं दे पाया है। दरअसल हिमाचल में भी कांग्रेस का मर्ज हरियाणा वाला ही है, गुटों में बंटे बड़े और वजनदार चेहरे। यहाँ भी अब तक आलाकमान फोई फैसला नहीं ले पाया। कांग्रेस के मंत्रियों सहित कई बड़े नेता सवाल उठा चुके है, आलाकमान को चेता चुके है, लेकिन अब तक नतीजा रहा है&nbsp;&nbsp;<br />
सिफर। हैरत है कि कांग्रेस में अब भी कोई जल्दबाजी नहीं दिखती, या यूँ कहे कि शायद आलाकमान इस स्थिति के आगे बेबस है। बहरहाल कारण जो भी इस स्थिति में हिमाचल कांग्रेस का आम कार्यकर्त्ता जरूर मायूस दिख रहा है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: sans-serif, Arial, Verdana, &quot;Trebuchet MS&quot;; font-size: 18px; text-align: justify; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;<strong>इस बीच दिलचस्प बात तो ये है बीते कुछ वक्त में कांग्रेस आलाकमान जिला अध्यक्षों को ताकतवर करने के संकेत देता रहा है। दिल्ली में बाकायदा राहुल गाँधी और खरगे सहित बड़े नेता जिला अध्यक्षों की वर्कशॉप ले चुके है। पर विडम्बना देखिये कि हरियाणा और हिमाचल जैसे राज्यों में जिला अध्यक्ष ही नहीं है।&nbsp;</strong></span></p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40095.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Congress-repeating-Haryana's-blunder-in-Himachal-Pradesh]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/rajin-patil-likely-to-visit-shimla-on-april23]]></guid>
                       <title><![CDATA[पाटिल के आगमन के साथ क्या खत्म होगा संगठन का इन्तजार ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/rajin-patil-likely-to-visit-shimla-on-april23]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 21 Apr 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[

	&nbsp;क्या आलाकमान का फरमान भी लाएगी पाटिल ?
	अगर पीसीसी चीफ बदला जाना है तो और लम्बा खींच सकता है इन्तजार&nbsp;



&nbsp; खबर आ रही है कि 23 अप्रैल यानी बुधवार को प्रदेश कांग्रेस प्रभारी रजनी पाटिल शिमला आ सकती है।&nbsp; बताया जा रहा है कि इस दौरान वे नेशनल हेराल्ड मामले पर तो पार्टी को डिफेंड करेगी ही, लेकिन मुमकिन है उनके आगमन के साथ संगठन का इंतजार भी खत्म हो जाए। हिमाचल में कांग्रेस साढ़े पांच महीने से बगैर संगठन चल रही है। अब चर्चा है कि पाटिल कुछ ज़िलों में संगठन का ऐलान कर सकती है, जहाँ आम सहमति बन चुकी है। हालांकि इसे लेकर बड़े नेता आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं बोल रहे&nbsp;
और ये महज कयास है।&nbsp;
&nbsp; इस बीच कुछ माहिर ये भी मानते है कि जब तक पूर्ण सहमति नहीं बनती कार्यकारिणी की घोषणा नहीं होगी। ऐसे में संभव है पहले आलाकमान प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा करें और फिर जिला और ब्लॉक इकाइयों का गठन हो। वहीं&nbsp; यदि प्रदेश अध्यक्ष को बदला जाना है तो ये इन्तजार अभी और लम्बा खींच सकता है।&nbsp;&nbsp;
&nbsp; बहरहाल प्रदेश प्रभारी बनने के बाद ये रजनी पाटिल का दूसरा दौरा होगा। इससे पहले दो मार्च को शिमला में पाटिल ने पंद्रह दिन में संगठन बनने का दावा किया था। अब डेढ़ महीने से ज्यादा बीत जाने के बाद भी कांग्रेस कोई निर्णय नहीं ले सकी है। ऐसे में पाटिल के दूसरे दौरे से फिर उम्मीदें जरूर जगी है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<ul>
	<li style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: sans-serif, Arial, Verdana, &quot;Trebuchet MS&quot;; font-size: 13px; text-align: justify;"><em><strong><span style="font-size: 18px;">&nbsp;क्या आलाकमान का फरमान भी लाएगी पाटिल ?</span></strong></em></li>
	<li style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: sans-serif, Arial, Verdana, &quot;Trebuchet MS&quot;; font-size: 13px; text-align: justify;"><em><strong><span style="font-size: 18px;">अगर पीसीसी चीफ बदला जाना है तो और लम्बा खींच सकता है इन्तजार&nbsp;</span></strong></em></li>
</ul>
</blockquote>

<p style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: sans-serif, Arial, Verdana, &quot;Trebuchet MS&quot;; font-size: 13px; text-align: justify;"><span style="font-size: 18px;">&nbsp; खबर आ रही है कि 23 अप्रैल यानी बुधवार को प्रदेश कांग्रेस प्रभारी रजनी पाटिल शिमला आ सकती है।&nbsp; बताया जा रहा है कि इस दौरान वे नेशनल हेराल्ड मामले पर तो पार्टी को डिफेंड करेगी ही, लेकिन मुमकिन है उनके आगमन के साथ संगठन का इंतजार भी खत्म हो जाए। हिमाचल में कांग्रेस साढ़े पांच महीने से बगैर संगठन चल रही है। अब चर्चा है कि पाटिल कुछ ज़िलों में संगठन का ऐलान कर सकती है, जहाँ आम सहमति बन चुकी है। हालांकि इसे लेकर बड़े नेता आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं बोल रहे&nbsp;<br />
और ये महज कयास है।&nbsp;<br />
&nbsp; इस बीच कुछ माहिर ये भी मानते है कि जब तक पूर्ण सहमति नहीं बनती कार्यकारिणी की घोषणा नहीं होगी। ऐसे में संभव है पहले आलाकमान प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा करें और फिर जिला और ब्लॉक इकाइयों का गठन हो। वहीं&nbsp; यदि प्रदेश अध्यक्ष को बदला जाना है तो ये इन्तजार अभी और लम्बा खींच सकता है।&nbsp;&nbsp;<br />
&nbsp; बहरहाल प्रदेश प्रभारी बनने के बाद ये रजनी पाटिल का दूसरा दौरा होगा। इससे पहले दो मार्च को शिमला में पाटिल ने पंद्रह दिन में संगठन बनने का दावा किया था। अब डेढ़ महीने से ज्यादा बीत जाने के बाद भी कांग्रेस कोई निर्णय नहीं ले सकी है। ऐसे में पाटिल के दूसरे दौरे से फिर उम्मीदें जरूर जगी है।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40086.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[RAJIN-PATIL-LIKELY-TO-VISIT-SHIMLA-ON-APRIL23]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/speculations-high-on-cabinet-exit-of-veteran-ministers]]></guid>
                       <title><![CDATA[क्या 80 पार वाले होंगे कैबीनेट से बाहर ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/speculations-high-on-cabinet-exit-of-veteran-ministers]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 21 Apr 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[

	अटकलें जारी, पर आसान नहीं सबसे बड़े एससी और ओबीसी चेहरे को ड्राप करना&nbsp;
	मुमकिन है तीन मंत्री ड्राप हो, कैबिनेट में दिखे चार नए चेहरे
	क्या अवस्थी की होगी कैबिनेट में एंट्री ?
	बुटेल, भवानी और संजय रतन भी कैबिनेट की कतार में
	बढ़ सकता है गोमा के पोर्टफोलियो का वजन



&nbsp; क्या सुक्खू कैबिनेट से 80 पार वाले नेता बाहर होंगे, इसे&nbsp; लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। दरअसल सरकार बने करीब 28 महीने बीत जाने के बाद भी कैबिनेट में एक स्थान खाली है। इस बीच चर्चा है कि अब विस्तार के साथ -साथ कैबिनेट में फेरबदल भी होगा। कुछ मंत्री ड्राप हो सकते है और नए चेहरों की एंट्री होगी। साथ ही मौजूदा कुछ मंत्रियों के पोर्टफोलियो भी बदले जा सकते है।

&nbsp; बीते दिनों गुजरात में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में पार्टी ने नए और युवा चेहरों को तरजीह दी है। इसके बाद से ही कयास है कि हिमाचल कैबिनेट में भी इसका असर दिखेगा। 80 पार कर चुके दो मंत्री, कर्नल धनीराम शांडिल और चौधरी चंद्र कुमार को कैबिनेट से ड्राप कर नए चेहरों को जगह दी जा सकती है। हालांकि ये मजह कयास है, लेकिन इस सम्भावना को माहिर ख़ारिज नहीं कर रहे। साथ ही चर्चा है कि क्षेत्रीय संतुलन सुनिश्चित करने के लिए जिला शिमला से एक मंत्री भी ड्राप हो सकते है। ऐसे में कैबिनेट में कुल चार नए चेहरे दिख सकते है, जिनमें मुख्य तौर पर शिमला संसदीय हलके से संजय अवस्थी, मंडी संसदीय क्षेत्र से सूंदर सिंह ठाकुर या अनुराधा राणा और कांगड़ा संसदीय हलके से आशीष बुटेल, संजय रतन और भवानी पठानिया के नामों की चर्चा है।

&nbsp; &nbsp; बात अस्सी पार कर चुके दोनों मंत्रियों की करें तो कर्नल धनीराम शांडिल एससी समुदाय से आते है और और हिमाचल कांग्रेस का सबसे बड़ा एससी चेहरा है। साथ ही दस जनपथ का हाथ भी उनके सर पर है। ऐसे में उन्हें ड्राप करना आसान नहीं होगा। इसी तरह चौधरी चंद्र कुमार सबसे बड़ा ओबीसी चेहरा है। हालाँकि कई मुद्दों पर उनका मुखर होना और पुत्र नीरज भारती की सरेआम नाराजगी के बाद कुछ भी मुमकिन है। बहरहाल ये महज कयास है, और सियासत में कुछ भी मुमकिन है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp;इस बीच चर्चा ये भी है की कुछ मंत्रियों के पोर्टफोलियो बदले जा सकते है। विशेषकर एससी समुदाय से आने वाले दूसरे मंत्री है यादविंद्र गोमा के पास कोई वजनदार महकमा नहीं है। माहिर मान रहे है कि कैबिनेट विस्तार के बाद गोमा के पोर्टफोलियो का वजन बढ़ सकता है।&nbsp;&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<ul>
	<li style="text-align: justify;"><strong><em><span style="font-size:18px;">अटकलें जारी, पर आसान नहीं सबसे बड़े एससी और ओबीसी चेहरे को ड्राप करना&nbsp;</span></em></strong></li>
	<li style="text-align: justify;"><strong><em><span style="font-size:18px;">मुमकिन है तीन मंत्री ड्राप हो, कैबिनेट में दिखे चार नए चेहरे</span></em></strong></li>
	<li style="text-align: justify;"><strong><em><span style="font-size:18px;">क्या अवस्थी की होगी कैबिनेट में एंट्री ?</span></em></strong></li>
	<li style="text-align: justify;"><strong><em><span style="font-size:18px;">बुटेल, भवानी और संजय रतन भी कैबिनेट की कतार में</span></em></strong></li>
	<li style="text-align: justify;"><strong><em><span style="font-size:18px;">बढ़ सकता है गोमा के पोर्टफोलियो का वजन</span></em></strong></li>
</ul>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; क्या सुक्खू कैबिनेट से 80 पार वाले नेता बाहर होंगे, इसे&nbsp; लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। दरअसल सरकार बने करीब 28 महीने बीत जाने के बाद भी कैबिनेट में एक स्थान खाली है। इस बीच चर्चा है कि अब विस्तार के साथ -साथ कैबिनेट में फेरबदल भी होगा। कुछ मंत्री ड्राप हो सकते है और नए चेहरों की एंट्री होगी। साथ ही मौजूदा कुछ मंत्रियों के पोर्टफोलियो भी बदले जा सकते है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; बीते दिनों गुजरात में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में पार्टी ने नए और युवा चेहरों को तरजीह दी है। इसके बाद से ही कयास है कि हिमाचल कैबिनेट में भी इसका असर दिखेगा। 80 पार कर चुके दो मंत्री, कर्नल धनीराम शांडिल और चौधरी चंद्र कुमार को कैबिनेट से ड्राप कर नए चेहरों को जगह दी जा सकती है। हालांकि ये मजह कयास है, लेकिन इस सम्भावना को माहिर ख़ारिज नहीं कर रहे। साथ ही चर्चा है कि क्षेत्रीय संतुलन सुनिश्चित करने के लिए जिला शिमला से एक मंत्री भी ड्राप हो सकते है। ऐसे में कैबिनेट में कुल चार नए चेहरे दिख सकते है, जिनमें मुख्य तौर पर शिमला संसदीय हलके से संजय अवस्थी, मंडी संसदीय क्षेत्र से सूंदर सिंह ठाकुर या अनुराधा राणा और कांगड़ा संसदीय हलके से आशीष बुटेल, संजय रतन और भवानी पठानिया के नामों की चर्चा है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp; बात अस्सी पार कर चुके दोनों मंत्रियों की करें तो कर्नल धनीराम शांडिल एससी समुदाय से आते है और और हिमाचल कांग्रेस का सबसे बड़ा एससी चेहरा है। साथ ही दस जनपथ का हाथ भी उनके सर पर है। ऐसे में उन्हें ड्राप करना आसान नहीं होगा। इसी तरह चौधरी चंद्र कुमार सबसे बड़ा ओबीसी चेहरा है। हालाँकि कई मुद्दों पर उनका मुखर होना और पुत्र नीरज भारती की सरेआम नाराजगी के बाद कुछ भी मुमकिन है। बहरहाल ये महज कयास है, और सियासत में कुछ भी मुमकिन है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp;इस बीच चर्चा ये भी है की कुछ मंत्रियों के पोर्टफोलियो बदले जा सकते है। विशेषकर एससी समुदाय से आने वाले दूसरे मंत्री है यादविंद्र गोमा के पास कोई वजनदार महकमा नहीं है। माहिर मान रहे है कि कैबिनेट विस्तार के बाद गोमा के पोर्टफोलियो का वजन बढ़ सकता है।&nbsp;&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40085.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[SPECULATIONS-HIGH-ON-CABINET-EXIT-OF-VETERAN-MINISTERS]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/minister-anirudh-singh-reached-una-by-helicopter-to-meet-mukesh-did-he-come-as-cm-sukhus-emissary]]></guid>
                       <title><![CDATA[हेलीकॉप्टर से मुकेश से मिलने ऊना पहुंचे मंत्री अनिरुद्ध सिंह, क्या CM सूक्खू के दूत बनकर आये थे?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/minister-anirudh-singh-reached-una-by-helicopter-to-meet-mukesh-did-he-come-as-cm-sukhus-emissary]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 18 Apr 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
या कुछ और मसला, चर्चाओं का बाजार गर्म
1 घंटे तक गुलमोहर में दोनों नेताओं में हुई बंद कमरे में वार्ता&nbsp;
आखिर क्यों निजी हेलीकॉप्टर लेकर मुकेश के पास पहुंचे अनिरुद्ध सिंह, अहम सवाल&nbsp;


&nbsp; हिमाचल प्रदेश की राजनीति में लगातार ऐसे घटनाक्रम हो रहे हैं जो चर्चाओं के बाजार को गर्म करते हैं ।वीरवार को ऊना में ऐसा ही राजनीतिक घटनाक्रम हुआ जिसकी और बरबस सबका ध्यान गया। राजनीतिक रूप से इस घटनाक्रम को कई नजरिए से देखा जा रहा है। हिमाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री जब ऊना में सोनिया गांधी व राहुल गांधी के समर्थन में हो रही रैली को संबोधित कर रहे थे, तब इस समय निजी हेलीकॉप्टर में विशेष रूप से ग्रामीण विकास मंत्री अनिरुद्ध सिंह ऊना पहुंचे। क्या मुख्यमंत्री के संदेश वाहक या दूत बनकर आये थे अनिरुद्ध, या कोई और अहम मसला है ? फिलहाल अटकलों का बाजार गर्म है।&nbsp;

&nbsp; मंत्री अनिरुद्ध सिंह के हेलीकॉप्टर की लैंडिंग पुलिस लाइन जलेडा में करवाई गई और फिर मंत्री को होटल गुलमोहर तक लाया गया। करीब एक घंटे तक गुलमोहर में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री व ग्रामीण विकास मंत्री अनिरुद्ध सिंह के बीच वार्तालाप हुआ। यह गुप्त वार्तालाप बंद कमरे में हुआ। दोनों नेताओं के बीच क्या बात हुई यह तो पता नहीं, लेकिन कयास&nbsp; इस बात को लेकर लगाए जा रहे हैं कि आखिर ऐसी क्या इमरजेंसी थी कि अनिरुद्ध सिंह को हेलीकॉप्टर में ऊना पहुंचकर उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री से मुलाकात करनी पड़ी। क्या राजनीतिक मायने इस मुलाकात के हैं ? चर्चा होना लाजमी है कि आखिर हेलीकॉप्टर में ऊना पहुंचकर ऐसी क्या जरूरी मुलाकात हुई है। दोनों नेताओं के करीबियों से जब बात की गई तो उन्होंने कहा कि ये एक सामान्य मुलाकात थी। हालांकि दोनों ही नेताओं से इस मुलाकात को लेकर कोई बात नहीं हो पाई।&nbsp;
&nbsp; &nbsp;बहरहाल कयासों का बाजार गर्म है। माना जा रहा है कि कुछ तो कांग्रेस व सरकार की राजनीति में पक रहा है जिसके चलते यह मुलाकात हुई है और इसके परिणाम आने वाले दिनों में देखे जा सकते हैं। क्या ये सरकार व संगठन में बदलाव का संकेत है, ये सवाल बना हुआ है।&nbsp;

(ममता भनोट&nbsp;)
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote style="box-sizing: border-box; padding-top: 10px; padding-right: 20px; padding-bottom: 10px; margin: 0px 0px 20px; font-size: 21px; border-left-color: rgb(209, 124, 120); font-family: Pacifico, cursive; color: rgb(34, 34, 34); font-style: normal;">
<p style="box-sizing: border-box; margin: 0px; line-height: 27px; font-size: 18px !important; color: rgb(0, 0, 0) !important;"><span style="font-size:18px;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: 700;">या कुछ और मसला, चर्चाओं का बाजार गर्म<br style="box-sizing: border-box;" />
1 घंटे तक गुलमोहर में दोनों नेताओं में हुई बंद कमरे में वार्ता&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
आखिर क्यों निजी हेलीकॉप्टर लेकर मुकेश के पास पहुंचे अनिरुद्ध सिंह, अहम सवाल&nbsp;</span></span></p>
</blockquote>

<p 18px="" alegreya="" font-size:="" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; color: rgb(0, 0, 0); font-family: "><span style="font-size:18px;"><span style="box-sizing: border-box;">&nbsp; हिमाचल प्रदेश की राजनीति में लगातार ऐसे घटनाक्रम हो रहे हैं जो चर्चाओं के बाजार को गर्म करते हैं ।वीरवार को ऊना में ऐसा ही राजनीतिक घटनाक्रम हुआ जिसकी और बरबस सबका ध्यान गया। राजनीतिक रूप से इस घटनाक्रम को कई नजरिए से देखा जा रहा है। हिमाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री जब ऊना में सोनिया गांधी व राहुल गांधी के समर्थन में हो रही रैली को संबोधित कर रहे थे, तब इस समय निजी हेलीकॉप्टर में विशेष रूप से ग्रामीण विकास मंत्री अनिरुद्ध सिंह ऊना पहुंचे। क्या मुख्यमंत्री के संदेश वाहक या दूत बनकर आये थे अनिरुद्ध, या कोई और अहम मसला है ? फिलहाल अटकलों का बाजार गर्म है।&nbsp;</span></span></p>

<p 18px="" alegreya="" font-size:="" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; color: rgb(0, 0, 0); font-family: "><span style="font-size:18px;"><span style="box-sizing: border-box;">&nbsp; मंत्री अनिरुद्ध सिंह के हेलीकॉप्टर की लैंडिंग पुलिस लाइन जलेडा में करवाई गई और फिर मंत्री को होटल गुलमोहर तक लाया गया। करीब एक घंटे तक गुलमोहर में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री व ग्रामीण विकास मंत्री अनिरुद्ध सिंह के बीच वार्तालाप हुआ। यह गुप्त वार्तालाप बंद कमरे में हुआ। दोनों नेताओं के बीच क्या बात हुई यह तो पता नहीं, लेकिन कयास&nbsp; इस बात को लेकर लगाए जा रहे हैं कि आखिर ऐसी क्या इमरजेंसी थी कि अनिरुद्ध सिंह को हेलीकॉप्टर में ऊना पहुंचकर उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री से मुलाकात करनी पड़ी। क्या राजनीतिक मायने इस मुलाकात के हैं ? चर्चा होना लाजमी है कि आखिर हेलीकॉप्टर में ऊना पहुंचकर ऐसी क्या जरूरी मुलाकात हुई है। दोनों नेताओं के करीबियों से जब बात की गई तो उन्होंने कहा कि ये एक सामान्य मुलाकात थी। हालांकि दोनों ही नेताओं से इस मुलाकात को लेकर कोई बात नहीं हो पाई।&nbsp;<br style="box-sizing: border-box;" />
&nbsp; &nbsp;बहरहाल कयासों का बाजार गर्म है। माना जा रहा है कि कुछ तो कांग्रेस व सरकार की राजनीति में पक रहा है जिसके चलते यह मुलाकात हुई है और इसके परिणाम आने वाले दिनों में देखे जा सकते हैं। क्या ये सरकार व संगठन में बदलाव का संकेत है, ये सवाल बना हुआ है।&nbsp;</span></span></p>

<p 18px="" alegreya="" font-size:="" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; line-height: 27px; color: rgb(0, 0, 0); font-family: "><span style="font-size:18px;"><span background-color:="" font-size:="" style="box-sizing: border-box; color: rgb(51, 51, 51);" text-align:="" trebuchet="">(ममता भनोट&nbsp;</span>)</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40051.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Minister- Anirudh- Singh -reached -Una- by- helicopter -to -meet- Mukesh-, did -he -come- as- CM -Sukhus- emissary?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/himachal-bjp-issued-show-cause-notice-to-dhwala]]></guid>
                       <title><![CDATA[जन्मदिन पर पार्टी का तोहफा ...ध्वाला को कारण बताओ नोटिस !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/himachal-bjp-issued-show-cause-notice-to-dhwala]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 14 Apr 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[

देहरा में भाजपा के डिसिप्लिन के दावों का खूब उड़ा है मखौल, आख़िरकार जागी पार्टी&nbsp;
न एक्शन न संवाद : ध्वाला प्रकरण में क्यों बस देखता रहा प्रदेश नेतृत्व !
लगातार उठ रहे सवालों के बाद आखिरकार जारी किया&nbsp; &#39;कारण बताओ नोटिस&#39;
ध्वाला बोले, सोच-समझकर दिया जाएगा जवाब


&nbsp; लगातार प्रदेश भाजपा आलाकमान की आँख की किरकिरी बने पूर्व मंत्री रमेश चंद ध्वाला को आखिरकार पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है। 12 अप्रैल को ध्वाला अपने समर्थकों के साथ 74 वां जन्म दिवस मना रहे थे, इसी बीच उन्हें &lsquo;कारण बताओ नोटिस&rsquo; मिला है। पार्टी उनसे कई सवालों के जवाब मांगे हैं। आपको बता दें रमेश चंद ध्वाला लगातार हिमाचल भाजपा नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। ध्वाला ने खुद को असली भाजपा घोषित किया है। इतना ही नहीं देहरा में अपनी अलग कार्यकारिणी भी बना दी। कई महीनो से ध्वाला निरंतर हमलावर है , किन्तु पार्टी ने कोई डिसिप्लिनरी एक्शन नहीं लिया। ऐसे में भाजपा के डिसिप्लिन के दावों का भी मखौल उड़ रहा था। पर अब आखिरकार पार्टी ने उन्हें कारण बताओ नोटिस तो थमा ही दिया है।&nbsp; &nbsp;

&nbsp; &nbsp;इस बारे में रमेश चंद ध्वाला ने कहा की पिछले अढ़ाई साल में उन्हें कोई चिट्ठी नहीं आई, न ही किसी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया गया। पर अब जन्म दिवस पर बधाई की जगह कारण बताओ नोटिस भेजा गया है जिसका वह सोच समझकर जवाब देंगे।&nbsp;

आपको बता दें कि देहरा उपचुनाव में टिकट न मिलने के बाद से ही रमेश चंद ध्वाला ने पार्टी के विरुद्ध मोर्चा खोला हुआ है। आयातित नौ नेताओं को वे खुलकर नौ ग्रह बोलते रहे है और लगातार निष्ठावान कार्यकर्तों की अनदेखी के आरोप लगा रहे है। हालांकि उनके शिकवे-शिकायत पार्टी से नहीं है बल्कि हिमाचल भाजपा के शीर्ष नेताओं से है। इस बीच पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का समर्थन भी एक किस्म से ध्वाला को मिलता दिखा है।&nbsp;

&nbsp; इन सबके बीच निगाह होशियार सिंह पर भी रहने वाली है, जो निर्दलीय विधायक रहते इस्तीफा देकर भाजपा में आये। पहले होशियार सिंह को इस्तीफा देने की होशयारी महंगी पड़ी और फिर ध्वाला के लगातार हमलावर होने के बावजूद पार्टी का कोई एक्शन न लेना, बड़ा सवाल खड़े करता है। हालांकि अब कारण बताओ नोटिस जारी होने के बाद उनके समर्थकों को उम्मीद है की पार्टी खुलकर अपना स्टैंड क्लियर करेगी। हालांकि माहिर अब भी मान रहे है कि भाजपा में ध्वाला के भविष्य को लेकर अब भी कुछ कहना जल्दबाजी होगा। संभव है कि अगर प्रदेश अध्यक्ष बदला जाता है तो सुलह का रास्ता भी निकल आएं।&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br />
<strong><span style="font-size:18px;">देहरा में भाजपा के डिसिप्लिन के दावों का खूब उड़ा है मखौल, आख़िरकार जागी पार्टी&nbsp;<br />
न एक्शन न संवाद : ध्वाला प्रकरण में क्यों बस देखता रहा प्रदेश नेतृत्व !<br />
लगातार उठ रहे सवालों के बाद आखिरकार जारी किया&nbsp; &#39;कारण बताओ नोटिस&#39;<br />
ध्वाला बोले, सोच-समझकर दिया जाएगा जवाब</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; लगातार प्रदेश भाजपा आलाकमान की आँख की किरकिरी बने पूर्व मंत्री रमेश चंद ध्वाला को आखिरकार पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है। 12 अप्रैल को ध्वाला अपने समर्थकों के साथ 74 वां जन्म दिवस मना रहे थे, इसी बीच उन्हें &lsquo;कारण बताओ नोटिस&rsquo; मिला है। पार्टी उनसे कई सवालों के जवाब मांगे हैं। आपको बता दें रमेश चंद ध्वाला लगातार हिमाचल भाजपा नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। ध्वाला ने खुद को असली भाजपा घोषित किया है। इतना ही नहीं देहरा में अपनी अलग कार्यकारिणी भी बना दी। कई महीनो से ध्वाला निरंतर हमलावर है , किन्तु पार्टी ने कोई डिसिप्लिनरी एक्शन नहीं लिया। ऐसे में भाजपा के डिसिप्लिन के दावों का भी मखौल उड़ रहा था। पर अब आखिरकार पार्टी ने उन्हें कारण बताओ नोटिस तो थमा ही दिया है।&nbsp; &nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;इस बारे में रमेश चंद ध्वाला ने कहा की पिछले अढ़ाई साल में उन्हें कोई चिट्ठी नहीं आई, न ही किसी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया गया। पर अब जन्म दिवस पर बधाई की जगह कारण बताओ नोटिस भेजा गया है जिसका वह सोच समझकर जवाब देंगे।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">आपको बता दें कि देहरा उपचुनाव में टिकट न मिलने के बाद से ही रमेश चंद ध्वाला ने पार्टी के विरुद्ध मोर्चा खोला हुआ है। आयातित नौ नेताओं को वे खुलकर नौ ग्रह बोलते रहे है और लगातार निष्ठावान कार्यकर्तों की अनदेखी के आरोप लगा रहे है। हालांकि उनके शिकवे-शिकायत पार्टी से नहीं है बल्कि हिमाचल भाजपा के शीर्ष नेताओं से है। इस बीच पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का समर्थन भी एक किस्म से ध्वाला को मिलता दिखा है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; इन सबके बीच निगाह होशियार सिंह पर भी रहने वाली है, जो निर्दलीय विधायक रहते इस्तीफा देकर भाजपा में आये। पहले होशियार सिंह को इस्तीफा देने की होशयारी महंगी पड़ी और फिर ध्वाला के लगातार हमलावर होने के बावजूद पार्टी का कोई एक्शन न लेना, बड़ा सवाल खड़े करता है। हालांकि अब कारण बताओ नोटिस जारी होने के बाद उनके समर्थकों को उम्मीद है की पार्टी खुलकर अपना स्टैंड क्लियर करेगी। हालांकि माहिर अब भी मान रहे है कि भाजपा में ध्वाला के भविष्य को लेकर अब भी कुछ कहना जल्दबाजी होगा। संभव है कि अगर प्रदेश अध्यक्ष बदला जाता है तो सुलह का रास्ता भी निकल आएं।&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall40015.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[HIMACHAL-BJP-ISSUED-SHOW-CAUSE-NOTICE-TO-DHWALA]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/instead-of-respect-congress-workers-are-receiving-summons-once-again-kuldeep-rathore-holds-a-mirror-to-the-government]]></guid>
                       <title><![CDATA['सम्मान की जगह कांग्रेस कार्यकर्ताओं को मिल रहे समन'......कुलदीप राठौर ने फिर सरकार को दिखाया आइना !]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/instead-of-respect-congress-workers-are-receiving-summons-once-again-kuldeep-rathore-holds-a-mirror-to-the-government]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 05 Apr 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&quot;मुकेश जी, हमारे कार्यकर्ताओं का भी कुछ ख्याल रखिए... इन्हें आज भी समन भेजे जा रहे हैं।&quot;
&nbsp;ये गुज़ारिश की है कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और मौजूदा विधायक कुलदीप सिंह राठौर ने&mdash;खुले मंच से, सबके सामने। कांग्रेस एकत्र तो खड़गे पर अनुराग ठाकुर के ब्यान की निंदा करने को लेकर हुई थी मगर इसी बहाने कांग्रेस के कार्यर्ताओं का असल दर्द भी सामने आ ही गया। वही दर्द जो कांग्रेस कार्यकर्ता पार्टी के सत्ता में आने से लेकर अब तक झेल रहे है, वही दर्द जिसका ज़िक्र प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह और अन्य वरिष्ठ नेता बार बार कर चुके है और व्ही दर्द जिससे सत्तासीन कांग्रेस नेताओं को बहुत फर्क पड़ता नहीं दीखता। ये टीस&nbsp;कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता और विधायक कुलदीप राठौर एक बार फिर सबके सामने ले आए। कुलदीप राठौर ने बिना लाग-लपेट कह दिया&mdash; कांग्रेस की असली ताक़त ये कार्यकर्ता हैं। सरकार बनाने में इन्हीं की मेहनत है। मगर आज भी इन्हें समन आ रहे हैं। इनकी भी सुनवाई होनी चाहिए। राठौर ने, एक तरह से, पार्टी को आईना दिखा दिया है। सत्ता में आने के बाद से ही इस सरकार पर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के आरोप लगते रहे हैं। एक ख़ास गुट को छोड़ दें, तो बाकी कार्यकर्ताओं में असंतोष खुलकर दिखता है। जिन्होंने विपक्ष में रहते पार्टी का झंडा उठाया, संघर्ष किया&mdash;आज वही कार्यकर्ता खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं। न बोर्ड-निगमों में एडजस्टमेंट हुए, न राजनीतिक नियुक्तियाँ मिलीं, और तो और, छोटे-छोटे काम भी नहीं हो रहे। अब तो राठौर ने खुद कह दिया&mdash;&quot;बीजेपी राज में कार्यकर्ताओं पर जो मामले दर्ज हुए थे, वो तक वापस नहीं लिए जा रहे।&quot; सवाल बड़ा है&mdash;जब जमीनी कार्यकर्ता ही निराश होंगे, तो संगठन कैसे मज़बूत होगा?&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p data-end="493" data-start="293" style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&quot;मुकेश जी, हमारे कार्यकर्ताओं का भी कुछ ख्याल रखिए... इन्हें आज भी समन भेजे जा रहे हैं।&quot;<br data-end="384" data-start="381" />
&nbsp;ये गुज़ारिश की है कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और मौजूदा विधायक कुलदीप सिंह राठौर ने&mdash;खुले मंच से, सबके सामने। कांग्रेस एकत्र तो खड़गे पर अनुराग ठाकुर के ब्यान की निंदा करने को लेकर हुई थी मगर इसी बहाने कांग्रेस के कार्यर्ताओं का असल दर्द भी सामने आ ही गया। वही दर्द जो कांग्रेस कार्यकर्ता पार्टी के सत्ता में आने से लेकर अब तक झेल रहे है, वही दर्द जिसका ज़िक्र प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह और अन्य वरिष्ठ नेता बार बार कर चुके है और व्ही दर्द जिससे सत्तासीन कांग्रेस नेताओं को बहुत फर्क पड़ता नहीं दीखता। ये टीस&nbsp;कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता और विधायक कुलदीप राठौर एक बार फिर सबके सामने ले आए। कुलदीप राठौर ने बिना लाग-लपेट कह दिया&mdash; कांग्रेस की असली ताक़त ये कार्यकर्ता हैं। सरकार बनाने में इन्हीं की मेहनत है। मगर आज भी इन्हें समन आ रहे हैं। इनकी भी सुनवाई होनी चाहिए। राठौर ने, एक तरह से, पार्टी को आईना दिखा दिया है। सत्ता में आने के बाद से ही इस सरकार पर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के आरोप लगते रहे हैं। एक ख़ास गुट को छोड़ दें, तो बाकी कार्यकर्ताओं में असंतोष खुलकर दिखता है। जिन्होंने विपक्ष में रहते पार्टी का झंडा उठाया, संघर्ष किया&mdash;आज वही कार्यकर्ता खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं। न बोर्ड-निगमों में एडजस्टमेंट हुए, न राजनीतिक नियुक्तियाँ मिलीं, और तो और, छोटे-छोटे काम भी नहीं हो रहे। अब तो राठौर ने खुद कह दिया&mdash;&quot;बीजेपी राज में कार्यकर्ताओं पर जो मामले दर्ज हुए थे, वो तक वापस नहीं लिए जा रहे।&quot; सवाल बड़ा है&mdash;जब जमीनी कार्यकर्ता ही निराश होंगे, तो संगठन कैसे मज़बूत होगा?&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
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                <media:description type="plain"><![CDATA[Instead of Respect, Congress Workers Are Receiving Summons... Once Again, Kuldeep Rathore Holds a Mirror to the Government]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/neeraj-bharti-unhappy-with-his-own-party-government]]></guid>
                       <title><![CDATA[पिता सरकार में मंत्री, पुत्र खफा -खफा ...अब आगे क्या ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/politics/siyasatnama/neeraj-bharti-unhappy-with-his-own-party-government]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 27 Feb 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चा के बीच चौधरी चंद्र कुमार भी दिखा चुके है पार्टी को आईना !

नीरज भारती की लम्बे वक्त बाद टूटी चुप्पी, अपनी ही सरकार से खफा !


काफी वक्त चुप्पी&nbsp; साधने के बाद बीते दिनों पूर्व सीपीएस नीरज भारती फिर बोले है और अपनी ही सरकार के खिलाफ बोले है। उसी सरकार के खिलाफ जिसमें उनके पिता चौधरी खुद मंत्री है। हालाँकि माहिर मान रहे है कि असल खबर ये नहीं है कि नीरज फिर बोले, या कितना और क्या-क्या बोले है । खबर दरअसल ये है कि उनसे पहले चौधरी चंद्र कुमार खुद बोले और अब उनके बेटे नीरज बोल रहे है। अब जब पिता-पुत्र दोनों कांग्रेस के हालातों पर टिपण्णी कर रहे है, तो ज़ाहिर है की इसके सियासी मायने भी गहरे हैं।

&nbsp; देखा जाए तो मंत्री चौधरी चंद्र कुमार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता है, उन्होंने पूरी जिंदगी कांग्रेस में खपाई है और बीते दिनों पार्टी की स्थिति को लेकर छलका उनका दर्द भी समझा जा सकता है। वहीँ उनके पुत्र भी अपनी ही पार्टी की सरकार से खफा है। एक मलाल ये है कि अपनी ही सरकार में कार्यकर्ताओं के काम नहीं हो रहे और दूसरा ये की मंत्री की बिना कंसेंट के उनके ही क्षेत्र में तबादले हो रहे है। वैसे इन दोनों ने जो भी कहा है वो निसंदेह कांग्रेस की वास्विकता है, पर वास्विकता तो ये भी है कि आईना दिखाने वाले कांग्रेस को रास कम ही आते है।&nbsp;

&nbsp; &nbsp;बहरहाल मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चा के बीच पिता -पुत्र की ये नसीहत और नाराजगी क्या रंग लाएगी, ये देखना रोचक होगा। खासतौर से सरकार के दो मंत्री अस्सी पार है जिनमें से एक चंद्र कुमार भी है। हालांकि चौधरी चंद्र कुमार कांग्रेस का सबसे बड़ा ओबीसी चेहरा है, पर ये नए दौर की सियासत है, न जाने कब, क्या हो जाए।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चा के बीच चौधरी चंद्र कुमार भी दिखा चुके है पार्टी को आईना !</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">नीरज भारती की लम्बे वक्त बाद टूटी चुप्पी, अपनी ही सरकार से खफा !</span></strong></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">काफी वक्त चुप्पी&nbsp; साधने के बाद बीते दिनों पूर्व सीपीएस नीरज भारती फिर बोले है और अपनी ही सरकार के खिलाफ बोले है। उसी सरकार के खिलाफ जिसमें उनके पिता चौधरी खुद मंत्री है। हालाँकि माहिर मान रहे है कि असल खबर ये नहीं है कि नीरज फिर बोले, या कितना और क्या-क्या बोले है । खबर दरअसल ये है कि उनसे पहले चौधरी चंद्र कुमार खुद बोले और अब उनके बेटे नीरज बोल रहे है। अब जब पिता-पुत्र दोनों कांग्रेस के हालातों पर टिपण्णी कर रहे है, तो ज़ाहिर है की इसके सियासी मायने भी गहरे हैं।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; देखा जाए तो मंत्री चौधरी चंद्र कुमार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता है, उन्होंने पूरी जिंदगी कांग्रेस में खपाई है और बीते दिनों पार्टी की स्थिति को लेकर छलका उनका दर्द भी समझा जा सकता है। वहीँ उनके पुत्र भी अपनी ही पार्टी की सरकार से खफा है। एक मलाल ये है कि अपनी ही सरकार में कार्यकर्ताओं के काम नहीं हो रहे और दूसरा ये की मंत्री की बिना कंसेंट के उनके ही क्षेत्र में तबादले हो रहे है। वैसे इन दोनों ने जो भी कहा है वो निसंदेह कांग्रेस की वास्विकता है, पर वास्विकता तो ये भी है कि आईना दिखाने वाले कांग्रेस को रास कम ही आते है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">&nbsp; &nbsp;बहरहाल मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चा के बीच पिता -पुत्र की ये नसीहत और नाराजगी क्या रंग लाएगी, ये देखना रोचक होगा। खासतौर से सरकार के दो मंत्री अस्सी पार है जिनमें से एक चंद्र कुमार भी है। हालांकि चौधरी चंद्र कुमार कांग्रेस का सबसे बड़ा ओबीसी चेहरा है, पर ये नए दौर की सियासत है, न जाने कब, क्या हो जाए।</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall39588.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[neeraj-bharti-unhappy-with-his-own-party-government]]></media:description>
                </media:content>   
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