<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
            <rss version="2.0" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/">
            <channel>
               <title>First Verdict Media - First Blessing</title>
               <link>https://www.firstverdict.com</link>
               <lastBuildDate><![CDATA[Fri, 01 May 2026 08:47:03 +0530]]></lastBuildDate>
            <language>en</language>	<image>
            	<title>First Verdict Media - First Blessing</title>
            	<url>https://www.firstverdict.com/resource/img/logo.png</url>
            	<link>https://www.firstverdict.com</link>
            	</image>
            <description>First Verdict Media provides the latest information from and in-depth coverage of India and the world. Find breaking news, India news, Himachal news, top stories, elections, politics, business, cricket, movies, lifestyle, health, videos, photos and more.</description>
            
           <item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/himachal/chaitranavratriwill-begintomorrowknowtheauspicioustimeforworshipandthemethodofkalashinstallation]]></guid>
                       <title><![CDATA[कल से शुरू होंगे चैत्र नवरात्रि, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और कलश स्थापना की विधि]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/himachal/chaitranavratriwill-begintomorrowknowtheauspicioustimeforworshipandthemethodofkalashinstallation]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 18 Mar 2026 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि की पूजा का खास महत्व होता है। यह मां दुर्गा की पूजा का बड़ा पर्व माना जाता है। शक्ति की आराधना का पर्व चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक मनाया जाएगा। इस साल नवरात्रि कई ज्योतिषीय संयोगों के कारण विशेष मानी जा रही है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार करीब 72 साल बाद ऐसा संयोग बन रहा है जब नवरात्रि की शुरुआत अमावस्या तिथि के प्रभाव में होगी और उसी दिन कलश स्थापना की जाएगी। चूंकि 19 मार्च को सूर्योदय अमावस्या में होगा, इसलिए उसी दिन से नवरात्रि की शुरुआत मानी जाएगी और कलश स्थापना भी उसी दिन की जाएगी। इस दौरान लोग घर में घटस्थापना के अलावा व्रत रखते हैं और मां दुर्गा की पूजा करते हैं। कई लोग इन नौ दिनों को साधना और आत्मशुद्धि का समय भी मानते हैं।

चैत्र नवरात्रि 2026 प्रतिपदा तिथि&nbsp;

हिंदू पंचांग के अनुसार, गुरुवार को कलश स्थापना के साथ नवरात्रि प्रारंभ हो जाएगी। ऐसे में 19 मार्च को कलश की स्थापना कर दुर्गा माता की पूजा आरंभ की जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र नवरात्रि का आरंभ चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होता है। इस बार प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6:52 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन सुबह 4:52 बजे तक रहेगी। इसी वजह से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से मानी जाएगी।

घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त

चैत्र नवरात्रि में घटस्थापना का विशेष महत्व होता है। इस दिन मां दुर्गा की पूजा के साथ कलश स्थापना की जाती है। 19 मार्च को सुबह 6:52 बजे से 7:43 बजे के बीच घटस्थापना करना शुभ रहेगा। यदि इस समय में स्थापना संभव न हो, तो अभिजीत मुहूर्त में भी यह कार्य किया जा सकता है।

अभिजीत मुहूर्त

दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे तक रहेगा। लेकिन मंदिरों और पंडालों में कलश स्थापना का सबसे उत्तम मुहूर्त अभिजीत होगा। इन्हीं शुभ मुहूर्त में विधि पूर्वक कलश स्थापना करने के पश्चात विधि-विधान से पूजा करना शुभ फलदायी रहेगा।

घटस्थापना की सामग्री&nbsp;

हल्दी, कुंकू, गुलाल, रांगोली, सिंदूर, कपूर, जनेऊ, धूपबत्ती, निरांजन, आम के पत्ते, पूजा के पान, हार-फूल, पंचामृत, गुड़ खोपरा, खारीक, बदाम, सुपारी, सिक्के, नारियल, पांच प्रकार के फल, चौकी पाट, कुश का आसन, नैवेद्य आदि।&nbsp;

कलश स्थापना की विधि

पूजा स्थल को साफ करें और चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माता दुर्गा की मूर्ति स्थापित करें। मिट्टी के पात्र (मिट्टी की बेदी) में पवित्र मिट्टी भरें और उसमें जौ बोएं। तांबे या मिट्टी के कलश पर कलावा बांधें और स्वास्तिक बनाएं। कलश को जल और गंगाजल से भरें। कलश में सुपारी, सिक्का, अक्षत (चावल), हल्दी की गांठ डालें। कलश के मुंह पर आम के 5-7 पत्ते लगाएं। नारियल को लाल चुनरी में लपेटकर कलावे से बांधें और कलश के ऊपर (अंकुरित भाग ऊपर रखते हुए) रखें। अब कलश को जौ वाले पात्र के बीच में स्थापित करें। दीपक जलाएं, माता दुर्गा का ध्यान करें और 9 दिनों के व्रत का संकल्प लें।&nbsp;

पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा

नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है, जिनमें पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा का विशेष महत्व होता है। माता शैलपुत्री का स्वरूप शांत, सरल, करुणामयी और सौम्य माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वे अपने भक्तों को संकटों से बचाती हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। इसलिए चैत्र नवरात्रि के पहले दिन विधि-विधान के साथ मां शैलपुत्री की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि की पूजा का खास महत्व होता है। यह मां दुर्गा की पूजा का बड़ा पर्व माना जाता है। शक्ति की आराधना का पर्व चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक मनाया जाएगा। इस साल नवरात्रि कई ज्योतिषीय संयोगों के कारण विशेष मानी जा रही है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार करीब 72 साल बाद ऐसा संयोग बन रहा है जब नवरात्रि की शुरुआत अमावस्या तिथि के प्रभाव में होगी और उसी दिन कलश स्थापना की जाएगी। चूंकि 19 मार्च को सूर्योदय अमावस्या में होगा, इसलिए उसी दिन से नवरात्रि की शुरुआत मानी जाएगी और कलश स्थापना भी उसी दिन की जाएगी। इस दौरान लोग घर में घटस्थापना के अलावा व्रत रखते हैं और मां दुर्गा की पूजा करते हैं। कई लोग इन नौ दिनों को साधना और आत्मशुद्धि का समय भी मानते हैं।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><strong><span style="font-size:18px;">चैत्र नवरात्रि 2026 प्रतिपदा तिथि&nbsp;</span></strong></em></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हिंदू पंचांग के अनुसार, गुरुवार को कलश स्थापना के साथ नवरात्रि प्रारंभ हो जाएगी। ऐसे में 19 मार्च को कलश की स्थापना कर दुर्गा माता की पूजा आरंभ की जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र नवरात्रि का आरंभ चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होता है। इस बार प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6:52 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन सुबह 4:52 बजे तक रहेगी। इसी वजह से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से मानी जाएगी।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><strong><span style="font-size:18px;">घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त</span></strong></em></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">चैत्र नवरात्रि में घटस्थापना का विशेष महत्व होता है। इस दिन मां दुर्गा की पूजा के साथ कलश स्थापना की जाती है। 19 मार्च को सुबह 6:52 बजे से 7:43 बजे के बीच घटस्थापना करना शुभ रहेगा। यदि इस समय में स्थापना संभव न हो, तो अभिजीत मुहूर्त में भी यह कार्य किया जा सकता है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><strong><span style="font-size:18px;">अभिजीत मुहूर्त</span></strong></em></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे तक रहेगा। लेकिन मंदिरों और पंडालों में कलश स्थापना का सबसे उत्तम मुहूर्त अभिजीत होगा। इन्हीं शुभ मुहूर्त में विधि पूर्वक कलश स्थापना करने के पश्चात विधि-विधान से पूजा करना शुभ फलदायी रहेगा।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><strong><span style="font-size:18px;">घटस्थापना की सामग्री&nbsp;</span></strong></em></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हल्दी, कुंकू, गुलाल, रांगोली, सिंदूर, कपूर, जनेऊ, धूपबत्ती, निरांजन, आम के पत्ते, पूजा के पान, हार-फूल, पंचामृत, गुड़ खोपरा, खारीक, बदाम, सुपारी, सिक्के, नारियल, पांच प्रकार के फल, चौकी पाट, कुश का आसन, नैवेद्य आदि।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><strong><span style="font-size:18px;">कलश स्थापना की विधि</span></strong></em></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">पूजा स्थल को साफ करें और चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माता दुर्गा की मूर्ति स्थापित करें। मिट्टी के पात्र (मिट्टी की बेदी) में पवित्र मिट्टी भरें और उसमें जौ बोएं। तांबे या मिट्टी के कलश पर कलावा बांधें और स्वास्तिक बनाएं। कलश को जल और गंगाजल से भरें। कलश में सुपारी, सिक्का, अक्षत (चावल), हल्दी की गांठ डालें। कलश के मुंह पर आम के 5-7 पत्ते लगाएं। नारियल को लाल चुनरी में लपेटकर कलावे से बांधें और कलश के ऊपर (अंकुरित भाग ऊपर रखते हुए) रखें। अब कलश को जौ वाले पात्र के बीच में स्थापित करें। दीपक जलाएं, माता दुर्गा का ध्यान करें और 9 दिनों के व्रत का संकल्प लें।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><strong><span style="font-size:18px;">पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा</span></strong></em></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है, जिनमें पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा का विशेष महत्व होता है। माता शैलपुत्री का स्वरूप शांत, सरल, करुणामयी और सौम्य माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वे अपने भक्तों को संकटों से बचाती हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। इसलिए चैत्र नवरात्रि के पहले दिन विधि-विधान के साथ मां शैलपुत्री की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है।</span></p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall42704.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Chaitra_Navratri_will begin_tomorrow_know_the_auspicious_time_for_worship_and_the_method_of_Kalash_installation]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/himachal/who-is-chalda-mahasu-why-do-thousands-of-devotees-join-his-pilgrimage]]></guid>
                       <title><![CDATA[कौन है चालदा महासू, क्यों उनकी प्रवास यात्रा में जुड़ते है हजारों श्रद्धालु ?]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/himachal/who-is-chalda-mahasu-why-do-thousands-of-devotees-join-his-pilgrimage]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 09 Dec 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड दोनों ही देवताओं की भूमि है जहाँ प्रत्येक पर्वत, प्रत्येक घाटी और प्रत्येक गाँव में देवताओं की समृद्ध परंपराएँ आज भी जीवंत हैं। बता दें कि पड़ोसी राज्य उत्तराखंड से श्री चालदा महासू सोमवार को हिमाचल प्रदेश के लिए रवाना हो चुके है। इतिहास में देवता पहली बार हिमाचल पहुंच रहे है। हिमालयी लोक संस्कृति में महासू देवता न्याय, आस्था और परंपरा के प्रतीक माने जाते हैं। चालदा महासू देवता जिन्हें न्याय का देवता कहा जाता है, जो एक स्थान पर स्थिर नहीं रहते है। वे भगवान शिव के अंश माने जाते है। चालदा महासू महाराज पालकी में बैठकर पूरे क्षेत्र का भ्रमण करते है, लोगों की समस्याएं सुनते है, न्याय करते है और अपराधियों को दंड देते है।&nbsp;

विशेषकर जौनसार बावर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और शिमला जिले में चालदा महाराज को लेकर लोगों में असीम आस्था है। चालदा महासू को छत्रधारी भी कहा जाता है। चालदा महासू की यात्रा जौनसार बावर, और सिरमौर में एक पर्व के जैसे मनाई जाती है। उनकी वार्षिक प्रवास यात्रा बरवांश कहलाती है जिसमें विशेष पूजा का आयोजन होता है। यात्रा में फाड़का (तांबे का बर्तन) छत्र और पालकी आगे चलती है जिसके पीछे भक्त चलते हैं।&nbsp;

कौन है चालदा महासू देवता:&nbsp;

चालदा महासू चार महासू भाइयों में सबसे छोटे भाई है अन्य तीन भाई बासिक महासू, पबासिक महासू, बूठिया महासू (बौठा महासू)&nbsp; भी भगवान शिव के ही रूप माने गए हैं। इनमें बासिक महासू सबसे बड़े हैं, जबकि बौठा महासू, पबासिक महासू दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। बौठा महासू का मंदिर हनोल में, बासिक महासू का मैंद्रथ में और पबासिक महासू का मंदिर बंगाण क्षेत्र के ठडियार व देवती-देववन में है। जबकि, चालदा महासू हमेशा जौनसार-बावर, बंगाण, फतह-पर्वत व हिमाचल क्षेत्र के प्रवास पर रहते हैं।&nbsp;

इनकी पालकी को क्षेत्रीय लोग पूजा-अर्चना के लिए नियमित अंतराल पर एक जगह से दूसरी जगह प्रवास पर ले जाते हैं। देवता के प्रवास पर रहने से कई क्षेत्रों में दशकों बाद चालदा महासू के दर्शन नसीब हो पाते हैं। कुछ इलाकों में तो देवता के दर्शन की चाह में पीढ़ियां गुजर जाती हैं। उत्तराखंड के उत्तरकाशी, संपूर्ण जौनसार-बावर क्षेत्र, रंवाई परगना के साथ साथ हिमाचल प्रदेश के सिरमौर, सोलन, शिमला, और जुब्बल तक महासू देवता को इष्ट देव (कुल देवता) के रूप में पूजा जाता है। इन क्षेत्रों में महासू देवता को न्याय के देवता और मंदिर को न्यायालय के रूप में मान्यता मिली हुई है।&nbsp;

कहां स्थित है चारों महासू का मुख्य मंदिर:&nbsp; &nbsp;

उत्तराखंड के हनोल में चारों महासू भाइयों का मुख्य मंदिर स्थित है। इस मंदिर में मुख्य रूप से बूठिया महासू (बौठा महासू) की पूजा होती है। मैंद्रथ नामक स्थान पर बासिक महासू की पूजा होती है। टोंस नदी के दायें तट पर बंगाण क्षेत्र में स्थित ठडियार (उत्तरकाशी) गांव में पबासिक महासू पूजे जाते हैं। सबसे छोटे भाई चालदा महासू भ्रमणप्रिय देवता हैं, जो कि 12 वर्ष तक उत्तरकाशी और 12 वर्ष तक देहरादून जिले में भ्रमण करते हैं। इनकी एक-एक वर्ष तक अलग-अलग स्थानों पर पूजा होती है, जिनमें हाजा, बिशोई, कोटी कनासर, मशक, उदपाल्टा, मौना आदि पूजा स्थल प्रमुख हैं। महासू के मुख्य धाम हनोल मंदिर में सुबह-शाम नौबत बजती है और दीया-बत्ती की जाती है।&nbsp;

कुछ सप्ताह पहले पहुंच जाता है बकरा:&nbsp;

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि चालदा महासू का बकरा कुछ सप्ताह पूर्व ही उस स्थान पर पहुंच जाता जाता है जिस स्थान पर महाराज की अगली देव यात्रा होती है। यह बकरा देवता की इच्छा और संकेत का प्रतीक होता है।&nbsp; हैरानी की बात यह है की ये बकरा बिना किसी मानवीय निर्देश के अपनी यात्रा पूरी करता है और सही स्थान पर पहुंच जाता है।&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड दोनों ही देवताओं की भूमि है जहाँ प्रत्येक पर्वत, प्रत्येक घाटी और प्रत्येक गाँव में देवताओं की समृद्ध परंपराएँ आज भी जीवंत हैं। बता दें कि पड़ोसी राज्य उत्तराखंड से श्री चालदा महासू सोमवार को हिमाचल प्रदेश के लिए रवाना हो चुके है। इतिहास में देवता पहली बार हिमाचल पहुंच रहे है। हिमालयी लोक संस्कृति में महासू देवता न्याय, आस्था और परंपरा के प्रतीक माने जाते हैं। चालदा महासू देवता जिन्हें न्याय का देवता कहा जाता है, जो एक स्थान पर स्थिर नहीं रहते है। वे भगवान शिव के अंश माने जाते है। चालदा महासू महाराज पालकी में बैठकर पूरे क्षेत्र का भ्रमण करते है, लोगों की समस्याएं सुनते है, न्याय करते है और अपराधियों को दंड देते है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">विशेषकर जौनसार बावर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और शिमला जिले में चालदा महाराज को लेकर लोगों में असीम आस्था है। चालदा महासू को छत्रधारी भी कहा जाता है। चालदा महासू की यात्रा जौनसार बावर, और सिरमौर में एक पर्व के जैसे मनाई जाती है। उनकी वार्षिक प्रवास यात्रा बरवांश कहलाती है जिसमें विशेष पूजा का आयोजन होता है। यात्रा में फाड़का (तांबे का बर्तन) छत्र और पालकी आगे चलती है जिसके पीछे भक्त चलते हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><strong><span style="font-size:18px;">कौन है चालदा महासू देवता:&nbsp;</span></strong></em></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">चालदा महासू चार महासू भाइयों में सबसे छोटे भाई है अन्य तीन भाई बासिक महासू, पबासिक महासू, बूठिया महासू (बौठा महासू)&nbsp; भी भगवान शिव के ही रूप माने गए हैं। इनमें बासिक महासू सबसे बड़े हैं, जबकि बौठा महासू, पबासिक महासू दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। बौठा महासू का मंदिर हनोल में, बासिक महासू का मैंद्रथ में और पबासिक महासू का मंदिर बंगाण क्षेत्र के ठडियार व देवती-देववन में है। जबकि, चालदा महासू हमेशा जौनसार-बावर, बंगाण, फतह-पर्वत व हिमाचल क्षेत्र के प्रवास पर रहते हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इनकी पालकी को क्षेत्रीय लोग पूजा-अर्चना के लिए नियमित अंतराल पर एक जगह से दूसरी जगह प्रवास पर ले जाते हैं। देवता के प्रवास पर रहने से कई क्षेत्रों में दशकों बाद चालदा महासू के दर्शन नसीब हो पाते हैं। कुछ इलाकों में तो देवता के दर्शन की चाह में पीढ़ियां गुजर जाती हैं। उत्तराखंड के उत्तरकाशी, संपूर्ण जौनसार-बावर क्षेत्र, रंवाई परगना के साथ साथ हिमाचल प्रदेश के सिरमौर, सोलन, शिमला, और जुब्बल तक महासू देवता को इष्ट देव (कुल देवता) के रूप में पूजा जाता है। इन क्षेत्रों में महासू देवता को न्याय के देवता और मंदिर को न्यायालय के रूप में मान्यता मिली हुई है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><strong><span style="font-size:18px;">कहां स्थित है चारों महासू का मुख्य मंदिर:&nbsp; &nbsp;</span></strong></em></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">उत्तराखंड के हनोल में चारों महासू भाइयों का मुख्य मंदिर स्थित है। इस मंदिर में मुख्य रूप से बूठिया महासू (बौठा महासू) की पूजा होती है। मैंद्रथ नामक स्थान पर बासिक महासू की पूजा होती है। टोंस नदी के दायें तट पर बंगाण क्षेत्र में स्थित ठडियार (उत्तरकाशी) गांव में पबासिक महासू पूजे जाते हैं। सबसे छोटे भाई चालदा महासू भ्रमणप्रिय देवता हैं, जो कि 12 वर्ष तक उत्तरकाशी और 12 वर्ष तक देहरादून जिले में भ्रमण करते हैं। इनकी एक-एक वर्ष तक अलग-अलग स्थानों पर पूजा होती है, जिनमें हाजा, बिशोई, कोटी कनासर, मशक, उदपाल्टा, मौना आदि पूजा स्थल प्रमुख हैं। महासू के मुख्य धाम हनोल मंदिर में सुबह-शाम नौबत बजती है और दीया-बत्ती की जाती है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><em><strong><span style="font-size:18px;">कुछ सप्ताह पहले पहुंच जाता है बकरा:&nbsp;</span></strong></em></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">प्राचीन मान्यताओं के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि चालदा महासू का बकरा कुछ सप्ताह पूर्व ही उस स्थान पर पहुंच जाता जाता है जिस स्थान पर महाराज की अगली देव यात्रा होती है। यह बकरा देवता की इच्छा और संकेत का प्रतीक होता है।&nbsp; हैरानी की बात यह है की ये बकरा बिना किसी मानवीय निर्देश के अपनी यात्रा पूरी करता है और सही स्थान पर पहुंच जाता है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall42112.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Who is Chalda Mahasu, why do thousands of devotees join his pilgrimage?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/a-festival-in-which-arghya-is-offered-even-to-the-setting-sun-know-why-chhath-festival-is-celebrated]]></guid>
                       <title><![CDATA[एक ऐसा पर्व जिसमें डूबते सूरज को भी अर्घ्य दिया जाता है अर्ध्य, जानिए छठ पर्व क्यों मनाया जाता है ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/a-festival-in-which-arghya-is-offered-even-to-the-setting-sun-know-why-chhath-festival-is-celebrated]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 27 Oct 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;


छठ पर्व दिवाली के छह दिन बाद कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाने की परंपरा है। यह महापर्व चार दिनों तक मनाया जाता है। पहला दिन नहाय-खाय, दूसरा दिन खरना, तीसरा दिन शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य तथा चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर यह त्योहार संपन्न होता है। छठ पर्व 25 अक्टूबर से ही शुरू हो चुका है और आज इसका तीसरा दिन है। बीते कल खरना से ही व्रत रखने वाले लोगों का 36 घंटों का निर्जला उपवास शुरू हो चुका है। कल सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर इस पर्व का समापन होगा। यह खासकर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तरप्रदेश तथा नेपाल के तराई क्षेत्र में मनाया जाने वाला पर्व है। विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय विदेशों में भी इसे मनाते हैं।&nbsp;&nbsp;

छठ पूजा में मूर्तिपूजा नहीं बल्कि सूर्य तथा जल की पूजा की जाती है यानि प्रकृति की पूजा। छठ को शुद्धता तथा पवित्रता का महापर्व कहा जाता है। क्यों कि इसमें शुद्धता का बहुत ही ज्यादा ख्याल रखा जाता है। इस पर्व में पूरी श्रद्धा से मिट्टी के नए चूल्हे पर आम की लकड़ियों से शुद्ध घी से मिटटी या पीतल के बर्तन में प्रसाद बनाया जाता है। इस व्रत में चार दिनों तक बहुत ही कठोर नियम का पालन करना पड़ता है। इस वजह से इसे भक्ति और कठोर तप अद्भुत संगम कहा गया है। छठ महापर्व में डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर उनके व छठी मां के प्रति और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। इस पूजा में डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देकर परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है। सूर्य देवता को जीवन, ऊर्जा तथा स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है और वहीं छठी मां को संतान की रक्षा का प्रतीक।

छठ पहला दिन
इस दिन व्रती सिर्फ एक समय ही शुद्ध शाकाहारी भोजन करते हैं। चावल, चना दाल एवं कद्दू की सब्जी का प्रसाद बनाया जाता है। छठ मां&nbsp; और सूर्यदेव को भोग लगाने के बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और इसके बाद परिवार के सदस्य इसे ग्रहण करते हैं।&nbsp;

दूसरा दिन खरना
खरना के दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं। सूर्यास्त के बाद दूध और गुड़ व चावल की खीर, रोटी तथा फल का प्रसाद छठी मां को अर्पित करते हैं। इसके बाद यह प्रसाद व्रतियों द्वारा ग्रहण किया जाता है। इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद से ही 36 घंटे का कठोर निर्जला उपवास शुरू हो जाता है।&nbsp;

तीसरा दिन&nbsp;
खरना के बाद से ही इस दिन भर निर्जला उपवास पर रहते हैं व्रती। सूर्य डूबने से पहले व्रती स्नान कर स्वच्छ बिल्कुल नए कपड़े पहनते हैं। इसके बाद बांस की सूप में घी से बना ठेकुआ, चावल और घी से बना लड्डू, नारियल, गन्ना समेत कई फल और साथ ही घी का दीपक इस सूप पर रखते हैं। फिर नदी किनारे घाट पर जाकर पानी में खड़े होकर हाथ में इस सूप को लेकर डूबता हुए सूर्य को देखते हुए परिक्रमा करते हुए आराधना करते हैं। व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर भगवान सूर्य व छठी मां का आभार व्यक्त करते हैं।&nbsp;

चौथा दिन&nbsp;
सुबह सूर्य देव के उगने से पहले व्रती स्नान कर फिर से बिल्कुल नए स्वच्छ कपड़े पहनते हैं। इसके बाद बांस की सूप में ठेकुआ, चावल और घी से बना लड्डू, नारियल, गन्ना समेत कई फल और साथ ही घी का दीपक इस सूप पर रखते हैं। फिर नदी किनारे घाट पर जाकर पानी में खड़े होकर हाथ में इस सूप को लेकर उगते हुए सूर्य को देखते हुए परिक्रमा करते हुए उपासना करते हैं। व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य देकर भगवान सूर्य व छठी मां का आभार व्यक्त करते हैं। खरना के बाद से ही करीब 36 घंटे तक निर्जला उपवास के बाद इस दिन इस पर्व का समापन हो जाता है।&nbsp;

&nbsp;

इसे मनाने के पीछे पौराणिक कथाएं&nbsp;&nbsp;

द्वापर युग में माना जाता है कि पांडव के कठिन वक्त में द्रौपदी ने छठ व्रत कर सूर्य देव से अपने परिवार के लिए प्रार्थना की थी। वहीं, दूसरी तरफ कर्ण रोज स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य देते थे और साथ ही सूर्य उपासना करने वाले इन्हें प्रथम साधक कहा जाता है। तब से इसे मनाया जाने लगा।&nbsp;

त्रेता युग में श्रीराम जब अयोध्या लौटे उसके बाद छठ व्रत शुरु हुई। रावण का वध करने पर माना जाता है कि श्रीराम को ब्रह्महत्या का पाप लग गया था। इससे मुक्ति पाने के लिए कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन श्रीराम व मां सीता ने छह दिनों तक सूर्य देव की पूजा की। तब से इसे छठ पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।

मार्कण्डेय पुराण के मुताबिक़, सृष्टि की रचना के वक्त देवी प्रकृति छह भागों में विभाजित हुए। छठा अंश सबसे बेहद शक्तिशाली माने गए, जिसे छठी मां कहा गया। इन्हें ब्रह्मा जी की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है।

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><br />
<span style="font-size:18px;">छठ पर्व दिवाली के छह दिन बाद कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाने की परंपरा है। यह महापर्व चार दिनों तक मनाया जाता है। पहला दिन नहाय-खाय, दूसरा दिन खरना, तीसरा दिन शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य तथा चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर यह त्योहार संपन्न होता है। छठ पर्व 25 अक्टूबर से ही शुरू हो चुका है और आज इसका तीसरा दिन है। बीते कल खरना से ही व्रत रखने वाले लोगों का 36 घंटों का निर्जला उपवास शुरू हो चुका है। कल सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर इस पर्व का समापन होगा। यह खासकर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तरप्रदेश तथा नेपाल के तराई क्षेत्र में मनाया जाने वाला पर्व है। विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय विदेशों में भी इसे मनाते हैं।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">छठ पूजा में मूर्तिपूजा नहीं बल्कि सूर्य तथा जल की पूजा की जाती है यानि प्रकृति की पूजा। छठ को शुद्धता तथा पवित्रता का महापर्व कहा जाता है। क्यों कि इसमें शुद्धता का बहुत ही ज्यादा ख्याल रखा जाता है। इस पर्व में पूरी श्रद्धा से मिट्टी के नए चूल्हे पर आम की लकड़ियों से शुद्ध घी से मिटटी या पीतल के बर्तन में प्रसाद बनाया जाता है। इस व्रत में चार दिनों तक बहुत ही कठोर नियम का पालन करना पड़ता है। इस वजह से इसे भक्ति और कठोर तप अद्भुत संगम कहा गया है। छठ महापर्व में डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर उनके व छठी मां के प्रति और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। इस पूजा में डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देकर परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है। सूर्य देवता को जीवन, ऊर्जा तथा स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है और वहीं छठी मां को संतान की रक्षा का प्रतीक।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>छठ पहला दिन</strong><br />
इस दिन व्रती सिर्फ एक समय ही शुद्ध शाकाहारी भोजन करते हैं। चावल, चना दाल एवं कद्दू की सब्जी का प्रसाद बनाया जाता है। छठ मां&nbsp; और सूर्यदेव को भोग लगाने के बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और इसके बाद परिवार के सदस्य इसे ग्रहण करते हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>दूसरा दिन खरना</strong><br />
खरना के दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं। सूर्यास्त के बाद दूध और गुड़ व चावल की खीर, रोटी तथा फल का प्रसाद छठी मां को अर्पित करते हैं। इसके बाद यह प्रसाद व्रतियों द्वारा ग्रहण किया जाता है। इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद से ही 36 घंटे का कठोर निर्जला उपवास शुरू हो जाता है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>तीसरा दिन&nbsp;</strong><br />
खरना के बाद से ही इस दिन भर निर्जला उपवास पर रहते हैं व्रती। सूर्य डूबने से पहले व्रती स्नान कर स्वच्छ बिल्कुल नए कपड़े पहनते हैं। इसके बाद बांस की सूप में घी से बना ठेकुआ, चावल और घी से बना लड्डू, नारियल, गन्ना समेत कई फल और साथ ही घी का दीपक इस सूप पर रखते हैं। फिर नदी किनारे घाट पर जाकर पानी में खड़े होकर हाथ में इस सूप को लेकर डूबता हुए सूर्य को देखते हुए परिक्रमा करते हुए आराधना करते हैं। व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर भगवान सूर्य व छठी मां का आभार व्यक्त करते हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>चौथा दिन</strong>&nbsp;<br />
सुबह सूर्य देव के उगने से पहले व्रती स्नान कर फिर से बिल्कुल नए स्वच्छ कपड़े पहनते हैं। इसके बाद बांस की सूप में ठेकुआ, चावल और घी से बना लड्डू, नारियल, गन्ना समेत कई फल और साथ ही घी का दीपक इस सूप पर रखते हैं। फिर नदी किनारे घाट पर जाकर पानी में खड़े होकर हाथ में इस सूप को लेकर उगते हुए सूर्य को देखते हुए परिक्रमा करते हुए उपासना करते हैं। व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य देकर भगवान सूर्य व छठी मां का आभार व्यक्त करते हैं। खरना के बाद से ही करीब 36 घंटे तक निर्जला उपवास के बाद इस दिन इस पर्व का समापन हो जाता है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>इसे मनाने के पीछे पौराणिक कथाएं&nbsp;&nbsp;</strong></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">द्वापर युग में माना जाता है कि पांडव के कठिन वक्त में द्रौपदी ने छठ व्रत कर सूर्य देव से अपने परिवार के लिए प्रार्थना की थी। वहीं, दूसरी तरफ कर्ण रोज स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य देते थे और साथ ही सूर्य उपासना करने वाले इन्हें प्रथम साधक कहा जाता है। तब से इसे मनाया जाने लगा।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">त्रेता युग में श्रीराम जब अयोध्या लौटे उसके बाद छठ व्रत शुरु हुई। रावण का वध करने पर माना जाता है कि श्रीराम को ब्रह्महत्या का पाप लग गया था। इससे मुक्ति पाने के लिए कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन श्रीराम व मां सीता ने छह दिनों तक सूर्य देव की पूजा की। तब से इसे छठ पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मार्कण्डेय पुराण के मुताबिक़, सृष्टि की रचना के वक्त देवी प्रकृति छह भागों में विभाजित हुए। छठा अंश सबसे बेहद शक्तिशाली माने गए, जिसे छठी मां कहा गया। इन्हें ब्रह्मा जी की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है।</span></p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41815.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[A festival in which Arghya is offered even to the setting sun, know why Chhath festival is celebrated.]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/even-today-is-amavasya-so-when-is-govardhan-puja-know-the-date-and-puja-time]]></guid>
                       <title><![CDATA[आज भी अमावस्या, तो गोवर्धन पूजा कब ? जानें डेट व पूजा मुहूर्त]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/even-today-is-amavasya-so-when-is-govardhan-puja-know-the-date-and-puja-time]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 21 Oct 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

गोवर्धन पूजा के दिन भगवान कृष्ण तथा गोवर्धन पर्वत की पूजा&nbsp;होती है। गोवर्धन पूजा कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को की जाती है। चूकि इस बार अमावस्या तिथि आज शाम 5 बजकर 54 मिनट तक है। इसके बाद ही शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि शुरु होगी। इसीलिए पंचांग के अनुसार, आज शाम 5 बजकर 54 मिनट तक अमावस्या तिथि के चलते गोवर्धन पूजा आज नहीं बल्कि कल 22 अक्टूबर को की जाएगी।&nbsp;&nbsp;

पूजा का शुभ मुहूर्त
पूजा का शुभ मुहूर्त दोपहर 03:13 बजे से शाम 05:49 बजे तक है। इस दिन स्वाति नक्षत्र के साथ प्रीति का भी संयोग रहेगा। इस दिन ग्रहों के राजा यानि सूर्य तुला राशि में रहेंगे और साथ ही यहां चंद्रमा भी गोचर करेंगे। इस वजह से यह समय पूजा के लिए बहुत ही शुभ रहेगा।

पूजा विधि
गोवर्धन पूजा पर भगवान कृष्ण तथा गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है। इस दिन सुबह उठकर घर को साफ कर लें। गाय के गोबर से गोवर्धन की आकृति बना कर, इसपर रोली व अक्षत रख लें। अब फूल, जल, घी, गुड़, दूध व खीर-पूरी का भोग लगाएं। इसके बाद वहां दीप जलाएं। अब गोवर्धन पर्वत के चारों ओर परिक्रमा करें और आखिर में आरती करें।&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">गोवर्धन पूजा के दिन भगवान कृष्ण तथा गोवर्धन पर्वत की पूजा&nbsp;होती</span><span style="font-size:18px;"> है। गोवर्धन पूजा कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को की जाती है। चूकि इस बार अमावस्या तिथि आज शाम 5 बजकर 54 मिनट तक है। इसके बाद ही शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि शुरु होगी। इसीलिए पंचांग के अनुसार, आज शाम 5 बजकर 54 मिनट तक अमावस्या तिथि के चलते गोवर्धन पूजा आज नहीं बल्कि कल 22 अक्टूबर को की जाएगी।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>पूजा का शुभ मुहूर्त</strong><br />
पूजा का शुभ मुहूर्त दोपहर 03:13 बजे से शाम 05:49 बजे तक है। इस दिन स्वाति नक्षत्र के साथ प्रीति का भी संयोग रहेगा। इस दिन ग्रहों के राजा यानि सूर्य तुला राशि में रहेंगे और साथ ही यहां चंद्रमा भी गोचर करेंगे। इस वजह से यह समय पूजा के लिए बहुत ही शुभ रहेगा।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>पूजा विधि</strong><br />
गोवर्धन पूजा पर भगवान कृष्ण तथा गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है। इस दिन सुबह उठकर घर को साफ कर लें। गाय के गोबर से गोवर्धन की आकृति बना कर, इसपर रोली व अक्षत रख लें। अब फूल, जल, घी, गुड़, दूध व खीर-पूरी का भोग लगाएं। इसके बाद वहां दीप जलाएं। अब गोवर्धन पर्वत के चारों ओर परिक्रमा करें और आखिर में आरती करें।&nbsp;</span></p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41767.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Even today is Amavasya, so when is Govardhan Puja? Know the date and puja time]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/why-is-diwali-celebrated-know-the-reason-behind-it]]></guid>
                       <title><![CDATA[क्यों मनाई जाती है दिवाली, जानिए इसके पीछे क्या है वजह ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/why-is-diwali-celebrated-know-the-reason-behind-it]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 17 Oct 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

देशभर में दीपावली को बड़े त्योहार के रूप में मनाया जाता है। इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना गया है। हर साल यह कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। इस बार दिवाली 20 अक्टूबर सोमवार को मनाई जाएगी। दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा का सबसे शुभ समय शाम 7:08 बजे से लेकर रात 8:18 बजे तक है।&nbsp;

इस दिन लोग लक्ष्मी-गणेश व कुबेर की पूजा करते हैं। इस त्योहार की शुरुआत धनतेरस से हो जाती है और भाई दूज के दिन यह समाप्त हो जाता है। लक्ष्मी-गणेश के आगमन के लिए लोग इस दिन अपने घरों को सजाते हैं और दीप प्रज्वलित कर खुशियां मनाते हैं। लोग इस पर्व पर उपहार स्वरूप एक दूसरे को मिठाईयां भी बांटतें हैं।&nbsp; &nbsp;

इस त्योहार को मनाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं
वाल्मीकि रामायण व रामचरितमानस के अनुसार, त्रेता में जब भगवान राम रावण का वध कर, चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके जब अयोध्या लौटे थे तब अयोध्या वासियों ने उनका स्वागत दीप प्रज्वलित कर किया था। माना जाता है कि तभी से बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में इसे मनाया जाने लगा।&nbsp;

दूसरी प्रचलित कथा यह है कि सतयुग में जब देवताओं ने दानवों के संग समुद्र मंथन किया, तब इससे अमृत कलश लिए भगवान धनवंतरि प्रकट हुए। जिस दिन भगवान धनवंतरि अमृत कलश लिए प्रकट हुए उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि थी। मान्यता है कि तभी से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस मनाने की परंपरा चल पड़ी।

इसी दिन सिखों के छठे गुरु हरगोबिंद साहिब जी ग्वालियर किले से अपने साथ 52 कैदियों को जहांगीर की कैद से छुड़वाया था। इसी के उपलक्ष्य में सिख समुदाय के लोग में इस दिन को बंदी छोड़ दिवस यानी आजादी के दिन के रूप में मनाते हैं।&nbsp;

जैन धर्म में दिवाली भगवान महावीर के मोक्ष प्राप्ति के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। जैन ग्रंथों के अनुसार, भगवान महावीर को इसी दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">देशभर में दीपावली को बड़े त्योहार के रूप में मनाया जाता है। इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना गया है। हर साल यह कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। इस बार दिवाली 20 अक्टूबर सोमवार को मनाई जाएगी। दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा का सबसे शुभ समय शाम 7:08 बजे से लेकर रात 8:18 बजे तक है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस दिन लोग लक्ष्मी-गणेश व कुबेर की पूजा करते हैं। इस त्योहार की शुरुआत धनतेरस से हो जाती है और भाई दूज के दिन यह समाप्त हो जाता है। लक्ष्मी-गणेश के आगमन के लिए लोग इस दिन अपने घरों को सजाते हैं और दीप प्रज्वलित कर खुशियां मनाते हैं। लोग इस पर्व पर उपहार स्वरूप एक दूसरे को मिठाईयां भी बांटतें हैं।&nbsp; &nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>इस त्योहार को मनाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं</strong><br />
वाल्मीकि रामायण व रामचरितमानस के अनुसार, त्रेता में जब भगवान राम रावण का वध कर, चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके जब अयोध्या लौटे थे तब अयोध्या वासियों ने उनका स्वागत दीप प्रज्वलित कर किया था। माना जाता है कि तभी से बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में इसे मनाया जाने लगा।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">दूसरी प्रचलित कथा यह है कि सतयुग में जब देवताओं ने दानवों के संग समुद्र मंथन किया, तब इससे अमृत कलश लिए भगवान धनवंतरि प्रकट हुए। जिस दिन भगवान धनवंतरि अमृत कलश लिए प्रकट हुए उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि थी। मान्यता है कि तभी से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस मनाने की परंपरा चल पड़ी।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इसी दिन सिखों के छठे गुरु हरगोबिंद साहिब जी ग्वालियर किले से अपने साथ 52 कैदियों को जहांगीर की कैद से छुड़वाया था। इसी के उपलक्ष्य में सिख समुदाय के लोग में इस दिन को बंदी छोड़ दिवस यानी आजादी के दिन के रूप में मनाते हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">जैन धर्म में दिवाली भगवान महावीर के मोक्ष प्राप्ति के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। जैन ग्रंथों के अनुसार, </span><span style="font-size: 18px; text-align: justify;">भगवान महावीर</span><span style="font-size:18px;"> को इसी दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41759.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Why is Diwali celebrated, know the reason behind it]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/do-not-do-these-things-by-mistake-on-diwali-on-the-day-of-kartik-amavasya]]></guid>
                       <title><![CDATA[कार्तिक अमावस्या के दिन दीपावली पर भूलकर न करें ये कार्य]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/do-not-do-these-things-by-mistake-on-diwali-on-the-day-of-kartik-amavasya]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 17 Oct 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

दीपावली हर साल कार्तिक अमावस्या को मनाने की परंपरा है। इस बार दिवाली 20 अक्टूबर सोमवार को मनाई जाएगी। दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा का सबसे शुभ समय शाम 7:08 बजे से लेकर रात 8:18 बजे तक है।&nbsp;

भारत को त्योहारों का देश माना जाता है। यहां हर साल कई त्योहार मनाए जाते हैं। देशभर में दीपावली बड़े त्योहार के रूप में मनाया जाता है। इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना गया है। इस दिन लोग लक्ष्मी-गणेश व कुबेर की पूजा करते हैं। इस त्योहार की शुरुआत धनतेरस से हो जाती है और भाई दूज के दिन यह समाप्त हो जाता है। लक्ष्मी-गणेश के आगमन के लिए लोग इस दिन अपने घरों को सजाते हैं और दीप प्रज्वलित कर खुशियां मनाते हैं। लोग इस पर्व पर उपहार स्वरूप एक दूसरे को मिठाईयां भी बांटतें हैं।&nbsp;

इस दिन ये कार्य बिल्कुल न करें
दीपावली अमावस्या के दिन कुछ चीजों को करने से मनाही होती है। माना जाता है कि अमावस्या पर नकारात्मक शक्तियां प्रबल रहती हैं। अमावस्या के दिन बाल काटना, नाखून काटना तथा गृह प्रवेश आदि नहीं करना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज व मांस-मदिरा आदि का भी सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन किसी भी सुनसान जगह जाने से भी बचना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि अमावस्या के दिन इन कार्यों को करने से जीवन में कई समस्याएं आ सकती हैं। दिवाली की देर रात तक घर का मुख्य दरवाजा खुला रखें, बंद न रखें। कहा जाता है कि दिवाली की रात में मां लक्ष्मी अपने भक्तों के घर आती हैं।&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">दीपावली हर साल कार्तिक अमावस्या को मनाने की परंपरा है। इस बार दिवाली 20 अक्टूबर सोमवार को मनाई जाएगी। दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा का सबसे शुभ समय शाम 7:08 बजे से लेकर रात 8:18 बजे तक है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">भारत को त्योहारों का देश माना जाता है। यहां हर साल कई त्योहार मनाए जाते हैं। देशभर में दीपावली बड़े त्योहार के रूप में मनाया जाता है। इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना गया है। इस दिन लोग लक्ष्मी-गणेश व कुबेर की पूजा करते हैं। इस त्योहार की शुरुआत धनतेरस से हो जाती है और भाई दूज के दिन यह समाप्त हो जाता है। लक्ष्मी-गणेश के आगमन के लिए लोग इस दिन अपने घरों को सजाते हैं और दीप प्रज्वलित कर खुशियां मनाते हैं। लोग इस पर्व पर उपहार स्वरूप एक दूसरे को मिठाईयां भी बांटतें हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>इस दिन ये कार्य बिल्कुल न करें</strong><br />
दीपावली अमावस्या के दिन कुछ चीजों को करने से मनाही होती है। माना जाता है कि अमावस्या पर नकारात्मक शक्तियां प्रबल रहती हैं। अमावस्या के दिन बाल काटना, नाखून काटना तथा गृह प्रवेश आदि नहीं करना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज व मांस-मदिरा आदि का भी सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन किसी भी सुनसान जगह जाने से भी बचना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि अमावस्या के दिन इन कार्यों को करने से जीवन में कई समस्याएं आ सकती हैं। दिवाली की देर रात तक घर का मुख्य दरवाजा खुला रखें, बंद न रखें। कहा जाता है कि दिवाली की रात में मां लक्ष्मी अपने भक्तों के घर आती हैं।&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41757.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Do not do these things by mistake on Diwali on the day of Kartik Amavasya]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/20th-or-21st-october-know-the-date-of-diwali-and-auspicious-time-of-worship]]></guid>
                       <title><![CDATA[20 या 21 अक्टूबर? जानिए दीपावली की तारीख व पूजा का शुभ मुहूर्त  ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/20th-or-21st-october-know-the-date-of-diwali-and-auspicious-time-of-worship]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 16 Oct 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

इस साल दिवाली 20 अक्टूबर सोमवार को मनाई जाएगी। दीपावली हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है जिसे पुरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना गया है। इस दिन लोग माता लक्ष्मी, भगवान गणेश व कुबेर की पूजा करते हैं। इससे घर परिवार में खुशहाली आती है और सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस दिन लोग अपने घरों में दीए जलाते हैं। मान्यता है कि रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान राम के अयोध्या लौटने पर पूरे गांव को दीपों से सजाया गया था। तब से इस दिन को अच्छाई की जीत तथा प्रकाश के उत्सव के रूप में मनाने की परंपरा है। इस त्योहार की शुरुआत धनतेरस से ही हो जाती है।

दिवाली&nbsp;&nbsp;
हर वर्ष दीपावली कार्तिक अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। इस बार अमावस्या तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 3:45 बजे से शुरू होकर 21 अक्टूबर को शाम 5:55 बजे समाप्त होगी। इसीलिए दिवाली 20 अक्टूबर सोमवार को मनाई जाएगी। 20 अक्टूबर को दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा का सबसे शुभ समय शाम 7:08 बजे से लेकर रात 8:18 बजे तक रहेगा।&nbsp; &nbsp;

छोटी दिवाली&nbsp;
19 अक्तूबर को छोटी दिवाली मनाई जाएगी। छोटी दिवाली पर शाम को घर के बाहर मुख्य द्वार पर यम देव के लिए चार मुखी दीपक जलाने की परंपरा है। माना जाता है कि इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।&nbsp;

इस बार की दिवाली बेहद खास
ज्योतिष के अनुसार, इस बार की दिवाली बहुत ही खास रहेगी। इस दिवाली पर 100 साल के बाद एक विशेष योग बनने जा रहा है जो कि बहुत ही दुर्लभ और शक्तिशाली होगा। इसकी वजह से 3 राशियां कर्क, वृश्चिक व तुला के जीवन में बहुत ही बड़े बदलाव होंगे। इस योग से जीवन में अपार धन, प्रतिष्ठा व सुख-समृद्धि की प्राप्ति होगी।

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस साल दिवाली 20 अक्टूबर सोमवार को मनाई जाएगी। दीपावली हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है जिसे पुरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना गया है। इस दिन लोग माता लक्ष्मी, भगवान गणेश व कुबेर की पूजा करते हैं। इससे घर परिवार में खुशहाली आती है और सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस दिन लोग अपने घरों में दीए जलाते हैं। मान्यता है कि रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान राम के अयोध्या लौटने पर पूरे गांव को दीपों से सजाया गया था। तब से इस दिन को अच्छाई की जीत तथा प्रकाश के उत्सव के रूप में मनाने की परंपरा है। इस त्योहार की शुरुआत धनतेरस से ही हो जाती है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>दिवाली&nbsp;&nbsp;</strong><br />
हर वर्ष दीपावली कार्तिक अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। इस बार अमावस्या तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 3:45 बजे से शुरू होकर 21 अक्टूबर को शाम 5:55 बजे समाप्त होगी। इसीलिए दिवाली 20 अक्टूबर सोमवार को मनाई जाएगी। 20 अक्टूबर को दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा का सबसे शुभ समय शाम 7:08 बजे से लेकर रात 8:18 बजे तक रहेगा।&nbsp; &nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>छोटी दिवाली&nbsp;</strong><br />
19 अक्तूबर को छोटी दिवाली मनाई जाएगी। छोटी दिवाली पर शाम को घर के बाहर मुख्य द्वार पर यम देव के लिए चार मुखी दीपक जलाने की परंपरा है। माना जाता है कि इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>इस बार की दिवाली बेहद खास</strong><br />
ज्योतिष के अनुसार, इस बार की दिवाली बहुत ही खास रहेगी। इस दिवाली पर 100 साल के बाद एक विशेष योग बनने जा रहा है जो कि बहुत ही दुर्लभ और शक्तिशाली होगा। इसकी वजह से 3 राशियां कर्क, वृश्चिक व तुला के जीवन में बहुत ही बड़े बदलाव होंगे। इस योग से जीवन में अपार धन, प्रतिष्ठा व सुख-समृद्धि की प्राप्ति होगी।</span></p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images241746.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[20th or 21st October? Know the date of Diwali and auspicious time of worship]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/national-news/this-diwali-a-rare-rajyoga-will-be-formed-after-100-years-the-luck-of-these-people-will-open]]></guid>
                       <title><![CDATA[इस दिवाली पर 100 साल बाद बनेगा दुर्लभ राजयोग, इन लोगों की खुलेगी किस्मत ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/national-news/this-diwali-a-rare-rajyoga-will-be-formed-after-100-years-the-luck-of-these-people-will-open]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 14 Oct 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

हर वर्ष दीपावली का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस बार दीपावली अमावस्या तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 3:45 बजे से शुरू होकर 21 अक्टूबर को शाम 5:55 बजे समाप्त होगी। इसीलिए दिवाली 20 अक्टूबर सोमवार को मनाया जायेगा। धनतेरस से ही इस त्योहार की शुरुआत हो जाती है। दीपावली हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है जिसे पुरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना गया है। 20 अक्टूबर को लक्ष्मी-गणेश पूजा का सबसे शुभ समय शाम 7:08 बजे से लेकर रात 8:18 बजे तक रहेगा।&nbsp;&nbsp;

ज्योतिष के अनुसार, इस बार की जो दिवाली का त्यौहार है वह बहुत ही खास रहेगा। इस दिवाली पर एक विशेष योग बनने जा रहा है जो कि बहुत ही दुर्लभ और शक्तिशाली माना जाता है। आपको बता दें कि यह योग 100 साल के बाद बनने जा रहा है। इस योग की वजह से 3 राशियों के जीवन में बहुत ही बड़े बदलाव होंगे। इस योग से जीवन में अपार धन, प्रतिष्ठा व सुख-समृद्धि आती है।&nbsp;

&nbsp;

दिवाली पर हंस महापुरुष राजयोग के बनने से इन राशियों को मिलेगा फायदा&nbsp;

1. कर्क
कर्क राशि वालों के लग्न भाव में हंस महापुरुष राजयोग बनने जा रहा है। यह योग करियर व आर्थिक रूप से बहुत ही शुभ रहेगा। रुके हुए काम भी पूर्ण होंगे। परिवार से मदद मिलेगा। मानसिक तनाव कम तथा सेहत में सुधार होगा।&nbsp;

2. वृश्चिक
वृश्चिक राशि वालों के नवम भाव में हंस महापुरुष राजयोग बनने वाला है। प्रतिष्ठा बढ़ेगी और आपके काम की सराहना होगी। शुभ समाचार प्राप्त होंगे। करियर में उन्नति होगी। धन लाभ के योग बनेंगें।&nbsp;

3. तुला
तुला राशि वालों के दशम भाव में हंस महापुरुष राजयोग बनने जा रहा है। यह योग तुला राशि वालों के लिए वरदान साबित होगा। करियर में उन्नति होगी और प्रमोशन या वेतन वृद्धि के संजोग बनेंगें। व्यापार करने वालो को भी होगा फायदा।

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हर वर्ष दीपावली का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस बार दीपावली अमावस्या तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 3:45 बजे से शुरू होकर 21 अक्टूबर को शाम 5:55 बजे समाप्त होगी। इसीलिए दिवाली 20 अक्टूबर सोमवार को मनाया जायेगा। धनतेरस से ही इस त्योहार की शुरुआत हो जाती है। दीपावली हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है जिसे पुरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना गया है। 20 अक्टूबर को लक्ष्मी-गणेश पूजा का सबसे शुभ समय शाम 7:08 बजे से लेकर रात 8:18 बजे तक रहेगा।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ज्योतिष के अनुसार, इस बार की जो दिवाली का त्यौहार है वह बहुत ही खास रहेगा। इस दिवाली पर एक विशेष योग बनने जा रहा है जो कि बहुत ही दुर्लभ और शक्तिशाली माना जाता है। आपको बता दें कि यह योग 100 साल के बाद बनने जा रहा है। इस योग की वजह से 3 राशियों के जीवन में बहुत ही बड़े बदलाव होंगे। इस योग से जीवन में अपार धन, प्रतिष्ठा व सुख-समृद्धि आती है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">दिवाली पर हंस महापुरुष राजयोग के बनने से इन राशियों को मिलेगा फायदा&nbsp;</span></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>1. कर्क</strong><br />
कर्क राशि वालों के लग्न भाव में हंस महापुरुष राजयोग बनने जा रहा है। यह योग करियर व आर्थिक रूप से बहुत ही शुभ रहेगा। रुके हुए काम भी पूर्ण होंगे। परिवार से मदद मिलेगा। मानसिक तनाव कम तथा सेहत में सुधार होगा।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>2. वृश्चिक</strong><br />
वृश्चिक राशि वालों के नवम भाव में हंस महापुरुष राजयोग बनने वाला है। प्रतिष्ठा बढ़ेगी और आपके काम की सराहना होगी। शुभ समाचार प्राप्त होंगे। करियर में उन्नति होगी। धन लाभ के योग बनेंगें।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>3. तुला</strong><br />
तुला राशि वालों के दशम भाव में हंस महापुरुष राजयोग बनने जा रहा है। यह योग तुला राशि वालों के लिए वरदान साबित होगा। करियर में उन्नति होगी और प्रमोशन या वेतन वृद्धि के संजोग बनेंगें। व्यापार करने वालो को भी होगा फायदा।</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41731.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[This Diwali, a rare Rajyoga will be formed after 100 years, the luck of these people will open.]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/when-is-dhanteras-18th-or-19th-october-know-the-date-and-auspicious-time-of-puja]]></guid>
                       <title><![CDATA[18 या 19 अक्टूबर, धनतेरस कब है? जानें पूजा की डेट व शुभ मुहूर्त ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/when-is-dhanteras-18th-or-19th-october-know-the-date-and-auspicious-time-of-puja]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Mon, 13 Oct 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाया जाता है। इस बार कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 18 अक्टूबर को दोपहर 12:20 बजे से होगी और 19 अक्टूबर को दोपहर 1:53 बजे तक रहेगी। इसीलिए इस वर्ष धनतेरस का पर्व 18 अक्टूबर को ही मनाया जाएगा। धनतेरस के दिन माँ लक्ष्मी, भगवान कुबेर व धनवंतरी जी की पूजा की जाती है। मान्यता यह है कि इनकी पूजा से घर परिवार में सुख-संपन्नता बनी रहती है और खुशहाली आती है। इस दिन नई वस्तुएं खरीदने की भी परंपरा है क्यों कि कहा जाता है इस अवसर पर नई वस्तुओं की खरीदारी करने से धन-दौलत में बढ़ोतरी होती है। इस दिन सोना-चांदी के अलावा बर्तन तथा झाडू आदि भी खरीदने की परंपरा है। धनतेरस के साथ ही दीपावली पर्व की भी शुरुआत हो जाती है।&nbsp;

पूजा का शुभ मुहूर्त
धनतेरस को शाम में माता लक्ष्मी, भगवान धनवंतरि और कुबेर की पूजा की जाती है। धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त 18 अक्टूबर को शाम 7:11 बजे से रात 9:22 बजे तक है।&nbsp;

कुछ चीजें भूलकर न खरीदें&nbsp;
मान्यता है कि इस दिन खरीदारी करने से धन-दौलत बढ़ता है पर कुछ चीजें ऐसी भी है जिसे भूलकर भी नहीं खरीदना चाहिए। जैसे कि&nbsp;लोहे की वस्तुएं न खरीदें। लोहे से बनी वस्तुएं खरीदना अशुभ माना जाता है। क्यों कि लोहा को शनि का कारक माना जाता है और यह अशुभ होता है। इस दिन को शीशे का सामान भी न खरीदें। शीशा को अस्थिरता का प्रतीक माना गया है। साथ ही इस शुभ दिन पर चाकू, कैंची, पिन, सुई या किसी भी तरह की नुकीली चीजें खरीदने से बचना चाहिए क्यों कि इसे अशुभ माना गया है।&nbsp;

क्यों मनाया जाता है&nbsp;
जब देवताओं तथा असुरों ने समुद्र मंथन किया, तब उस मंथन से बहुत सी कीमती चीजें निकली थीं और साथ ही माँ लक्ष्मी भी प्रकट हुईं थी। अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत के कलश लेकर प्रकट हुए। इस अमृत के लिए देवताओं-असुरों के बीच लंबा संघर्ष चला। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को ही भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर समुद्र में प्रकट हुए थे। तभी से इस तिथि को धनतेरस के रूप में मनाने और भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी व कुबेर देव की पूजा की जाने की परंपरा चली आ रही है।

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाया जाता है। इस बार कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 18 अक्टूबर को दोपहर 12:20 बजे से होगी और 19 अक्टूबर को दोपहर 1:53 बजे तक रहेगी। इसीलिए इस वर्ष धनतेरस का पर्व 18 अक्टूबर को ही मनाया जाएगा। धनतेरस के दिन माँ लक्ष्मी, भगवान कुबेर व धनवंतरी जी की पूजा की जाती है। मान्यता यह है कि इनकी पूजा से घर परिवार में सुख-संपन्नता बनी रहती है और खुशहाली आती है। इस दिन नई वस्तुएं खरीदने की भी परंपरा है क्यों कि कहा जाता है इस अवसर पर नई वस्तुओं की खरीदारी करने से धन-दौलत में बढ़ोतरी होती है। इस दिन सोना-चांदी के अलावा बर्तन तथा झाडू आदि भी खरीदने की परंपरा है। धनतेरस के साथ ही दीपावली पर्व की भी शुरुआत हो जाती है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>पूजा का शुभ मुहूर्त</strong><br />
धनतेरस को शाम में माता लक्ष्मी, भगवान धनवंतरि और कुबेर की पूजा की जाती है। धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त 18 अक्टूबर को शाम 7:11 बजे से रात 9:22 बजे तक है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>कुछ चीजें भूलकर न खरीदें&nbsp;</strong><br />
मान्यता है कि इस दिन खरीदारी करने से धन-दौलत बढ़ता है पर कुछ चीजें ऐसी भी है जिसे भूलकर भी नहीं खरीदना चाहिए। जैसे कि&nbsp;लोहे की वस्तुएं न खरीदें। लोहे से बनी वस्तुएं खरीदना अशुभ माना जाता है। क्यों कि लोहा को शनि का कारक माना जाता है और यह अशुभ होता है। इस दिन को शीशे का सामान भी न खरीदें। शीशा को अस्थिरता का प्रतीक माना गया है। साथ ही इस शुभ दिन पर चाकू, कैंची, पिन, सुई या किसी भी तरह की नुकीली चीजें खरीदने से बचना चाहिए क्यों कि इसे अशुभ माना गया है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>क्यों मनाया जाता है&nbsp;</strong><br />
जब देवताओं तथा असुरों ने समुद्र मंथन किया, तब उस मंथन से बहुत सी कीमती चीजें निकली थीं और साथ ही माँ लक्ष्मी भी प्रकट हुईं थी। अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत के कलश लेकर प्रकट हुए। इस अमृत के लिए देवताओं-असुरों के बीच लंबा संघर्ष चला। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को ही भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर समुद्र में प्रकट हुए थे। तभी से इस तिथि को धनतेरस के रूप में मनाने और भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी व कुबेर देव की पूजा की जाने की परंपरा चली आ रही है।</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41715.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[When is Dhanteras, 18th or 19th October? Know the date and auspicious time of puja]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/news/national-news/how-to-worship-maa-chandraghanta-on-the-third-day-of-shardiya-navratri-tomorrow-know-the-auspicious-time-and-enjoyment]]></guid>
                       <title><![CDATA[शारदीय नवरात्रि के कल तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा कैसे करें ? जानें शुभ मुहूर्त व भोग ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/news/national-news/how-to-worship-maa-chandraghanta-on-the-third-day-of-shardiya-navratri-tomorrow-know-the-auspicious-time-and-enjoyment]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 23 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

शारदीय नवरात्रि का तीसरा दिन कल बुधवार 24 सितंबर को है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। मां देवी के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित होता है और इसी वजह से मां देवी को चंद्रघंटा कहा जाता है। मां चंद्रघंटा का वाहन बाघ है। इसीलिए ये बाघ पर सवार होती हैं। देवी का यह जो रूप है वो शांति, साहस तथा कल्याण का प्रतीक है। माना जाता है कि ये हमेशा अपने भक्तों की रक्षा के लिये समर्पित रहती हैं। भक्तों कि रक्षा के लिए वे हाथों में त्रिशूल, गदा और तलवार धारण की होती हैं। मां चंद्रघंटा भक्तों को शांति और समृद्धि प्रदान करती हैं। परिवार में खुशियां आती हैं। इस दिन हरा, आसमानी तथा नारंगी रंग के कपड़े पहनना बहुत ही शुभ होता है।&nbsp;&nbsp;

शुभ मुहूर्त
24 सितंबर सुबह 4:35-5:23 बजे तक पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त,&nbsp; सुबह 9:11-10:57 बजे तक अमृत काल और इसके बाद दोपहर 2:14-3:02 बजे तक विजय मुहूर्त रहेगा।&nbsp;

मां चंद्रघंटा का भोग&nbsp;
माता चंद्रघंटा को गाय के दूध से बनी खीर का भोग लगाने से लोगों के सभी कष्टों दूर हो जाते हैं।&nbsp;

पूजा विधि&nbsp;
मां चंद्रघंटा को फूल, अक्षत, चंदन, सिंदूर अर्पण कर खीर का भोग लगाएं और कथा का पाठ करें। अंतिम में दीप जलाकर मंत्र का जप और आरती करें।

कथा&nbsp;
ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा ने चंद्रघंटा का रूप धारण कर दैत्यों के आंतक को समाप्त किया था। कहा जाता है जिस वक्त महिषासुर के आंतक से देवता परेशान हो रहे थे तो उस वक्त वे ब्रह्मा, विष्णु व महेश की शरण में चले गए। तब त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु व महेश के क्रोध से निकलने वाली&nbsp; ऊर्जा से मां चंद्रघंटा का रूप प्रकट हुआ था।&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शारदीय नवरात्रि का तीसरा दिन कल बुधवार 24 सितंबर को है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। मां देवी के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित होता है और इसी वजह से मां देवी को चंद्रघंटा कहा जाता है। मां चंद्रघंटा का वाहन बाघ है। इसीलिए ये बाघ पर सवार होती हैं। देवी का यह जो रूप है वो शांति, साहस तथा कल्याण का प्रतीक है। माना जाता है कि ये हमेशा अपने भक्तों की रक्षा के लिये समर्पित रहती हैं। भक्तों कि रक्षा के लिए वे हाथों में त्रिशूल, गदा और तलवार धारण की होती हैं। मां चंद्रघंटा भक्तों को शांति और समृद्धि प्रदान करती हैं। परिवार में खुशियां आती हैं। इस दिन हरा, आसमानी तथा नारंगी रंग के कपड़े पहनना बहुत ही शुभ होता है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>शुभ मुहूर्त</strong><br />
24 सितंबर सुबह 4:35-5:23 बजे तक पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त,&nbsp; सुबह 9:11-10:57 बजे तक अमृत काल और इसके बाद दोपहर 2:14-3:02 बजे तक विजय मुहूर्त रहेगा।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>मां चंद्रघंटा का भोग&nbsp;</strong><br />
माता चंद्रघंटा को गाय के दूध से बनी खीर का भोग लगाने से लोगों के सभी कष्टों दूर हो जाते हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>पूजा विधि&nbsp;</strong><br />
मां चंद्रघंटा को फूल, अक्षत, चंदन, सिंदूर अर्पण कर खीर का भोग लगाएं और कथा का पाठ करें। अंतिम में दीप जलाकर मंत्र का जप और आरती करें।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>कथा&nbsp;</strong><br />
ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा ने चंद्रघंटा का रूप धारण कर दैत्यों के आंतक को समाप्त किया था। कहा जाता है जिस वक्त महिषासुर के आंतक से देवता परेशान हो रहे थे तो उस वक्त वे ब्रह्मा, विष्णु व महेश की शरण में चले गए। तब त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु व महेश के क्रोध से निकलने वाली&nbsp; ऊर्जा से मां चंद्रघंटा का रूप प्रकट हुआ था।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41545.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[How to worship Maa Chandraghanta on the third day of Shardiya Navratri tomorrow? Know the auspicious time and enjoyment]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/religious/navratrithesacredstoryofchandraghantathethirdpowerofgoddessdurga]]></guid>
                       <title><![CDATA[नवरात्रि: मां दुर्गा की तीसरी शक्ति चंद्रघंटा की पावन कथा]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/religious/navratrithesacredstoryofchandraghantathethirdpowerofgoddessdurga]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 23 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[मां दुर्गा की तीसरी शक्ति हैं चंद्रघंटा,&nbsp;नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा-आराधना की जाती है। देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इसीलिए कहा जाता है कि हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधना करनी चाहिए। इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। इस देवी के दस हाथ हैं। वे खड्ग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं। सिंह पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध के लिए उद्धत रहने की है। इनके घंटे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस कांपते रहते हैं।&nbsp;

शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना करने का विधान है। मां दुर्गा का ये स्वरूप काफी मनमोहक माना जाता है। देवी भगवती पुराण के अनुसार, माता के गले में सफेद फूलों की माला सुशोभित है, साथ ही मां बाघ की सवारी करती हैं। चंद्रघंटा मां की 10 भुजाएं हैं, जिसमें वह कमल, धनुष, बाण, खड्ग, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा आदि शस्त्र हाथ में लिए हुए हैं। मां के सिर पर अर्ध चंद्र है। इस कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा गया। मां चंद्रघंटा की पूजा करने से व्यक्ति के अंदर का भय समाप्त हो जाता है। इसके साथ ही शत्रुओं के ऊपर विजय प्राप्त होती है। इस दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की विधिवत पूजा करने के साथ-साथ अंत में इस व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। इससे शुभ फलों की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं मां चंद्रघंटा की व्रत कथा&hellip;

प्रचलित कथा के अनुसार, माता दुर्गा ने मां चंद्रघंटा का अवतार तब लिया जब दैत्यों का आतंक बढ़ने लगा था। उस समय महिषासुर का देवताओं के साथ भयंकर युद्ध चल रहा था। महिषासुर का लक्ष्य देवराज इंद्र का सिंहासन प्राप्त करना था और वह स्वर्ग लोक पर राज करने की इच्छा से युद्ध कर रहा था। जब देवताओं को उसकी इस मंशा का ज्ञान हुआ, तो वे चिंतित हो गए और भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने देवताओं की व्यथा सुनकर क्रोध प्रकट किया, जिससे उनके मुख से ऊर्जा निकली। इस ऊर्जा से एक देवी प्रकट हुईं। भगवान शंकर ने उन्हें अपना त्रिशूल, भगवान विष्णु ने अपना चक्र, इंद्र ने घंटा, सूर्य ने तेज और तलवार तथा सिंह प्रदान किया। इसके पश्चात मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का वध कर देवताओं की रक्षा की।&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">मां दुर्गा की तीसरी शक्ति हैं चंद्रघंटा,&nbsp;नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा-आराधना की जाती है। देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इसीलिए कहा जाता है कि हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधना करनी चाहिए। इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। इस देवी के दस हाथ हैं। वे खड्ग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं। सिंह पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध के लिए उद्धत रहने की है। इनके घंटे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस कांपते रहते हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना करने का विधान है। मां दुर्गा का ये स्वरूप काफी मनमोहक माना जाता है। देवी भगवती पुराण के अनुसार, माता के गले में सफेद फूलों की माला सुशोभित है, साथ ही मां बाघ की सवारी करती हैं। चंद्रघंटा मां की 10 भुजाएं हैं, जिसमें वह कमल, धनुष, बाण, खड्ग, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा आदि शस्त्र हाथ में लिए हुए हैं। मां के सिर पर अर्ध चंद्र है। इस कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा गया। मां चंद्रघंटा की पूजा करने से व्यक्ति के अंदर का भय समाप्त हो जाता है। इसके साथ ही शत्रुओं के ऊपर विजय प्राप्त होती है। इस दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की विधिवत पूजा करने के साथ-साथ अंत में इस व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। इससे शुभ फलों की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं मां चंद्रघंटा की व्रत कथा&hellip;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">प्रचलित कथा के अनुसार, माता दुर्गा ने मां चंद्रघंटा का अवतार तब लिया जब दैत्यों का आतंक बढ़ने लगा था। उस समय महिषासुर का देवताओं के साथ भयंकर युद्ध चल रहा था। महिषासुर का लक्ष्य देवराज इंद्र का सिंहासन प्राप्त करना था और वह स्वर्ग लोक पर राज करने की इच्छा से युद्ध कर रहा था। जब देवताओं को उसकी इस मंशा का ज्ञान हुआ, तो वे चिंतित हो गए और भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने देवताओं की व्यथा सुनकर क्रोध प्रकट किया, जिससे उनके मुख से ऊर्जा निकली। इस ऊर्जा से एक देवी प्रकट हुईं। भगवान शंकर ने उन्हें अपना त्रिशूल, भगवान विष्णु ने अपना चक्र, इंद्र ने घंटा, सूर्य ने तेज और तलवार तथा सिंह प्रदान किया। इसके पश्चात मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का वध कर देवताओं की रक्षा की।&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41543.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Navratri_The_sacred_story_of_Chandraghanta_the_third_power_of_Goddess_Durga]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/last-solar-eclipse-today-know-what-time-it-will-start-what-will-be-the-impact-on-navratri-and-shraddha-activities]]></guid>
                       <title><![CDATA[आज अंतिम सूर्य ग्रहण, जानें कितने बजे शुरू होगा, नवरात्रि व श्राद्ध कार्य पर क्या असर होंगें ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/last-solar-eclipse-today-know-what-time-it-will-start-what-will-be-the-impact-on-navratri-and-shraddha-activities]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sun, 21 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

इस साल का दूसरा और अंतिम सूर्य ग्रहण आज रविवार को लगने जा रहा है। ग्रहण के दौरान कोई भी शुभ कार्य को करना मना होता है। सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है और हर साल लगता है। आपको बता दें कि इस दिन सर्वपितृ अमावस्या भी है। अमावस्या के दिन लोग स्नान-दान करते हैं और साथ ही अपने पितरों के लिए श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे पितृ दोष मिट जाता है और साथ ही जीवन में खुशियां बनी रहती है। लेकिन इस बार अमावस्या पर सूर्य ग्रहण लगने के कारण पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध किस तरह से किया जाएगा, इसके बारे में लोगों के मन में बहुत सी आशंकाएं है।

सूर्य ग्रहण का समय
भारत में सूर्य ग्रहण आज 21 सितंबर को रात 11 बजे शुरू होकर 22 सितंबर सुबह 3:23 बजे तक चलेगा। यह ग्रहण 4 घंटे 24 मिनट तक चलेगा।

इस सूर्य ग्रहण का सूतक काल क्या&nbsp;मान्य होगा&nbsp;
शास्त्रों के अनुसार सूर्य ग्रहण लगने से 12 घंटे पहले ही सूतक काल लग जाता है। शास्त्रों के अनुसार, सूतक काल के समय कोई भी मांगलिक शुभ कार्य नहीं किया जाता है। सूतक काल में मंदिरों के कपाट भी बंद कर दिया जाता है। लेकिन 21 सितंबर को लगने वाला सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखेगा। इस कारण से इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा।&nbsp;

नवरात्रि व श्राद्ध कार्य नहीं होंगे बाधित
ज्योतिष के मुताबिक, जिस जगह पर सूर्य ग्रहण दिखाई नहीं देता है, वहां पर सूतक की मान्यताएं जो है वह लागू नहीं होती हैं। देश के किसी भी हिस्से में सूर्य ग्रहण दिखाई नहीं देगा। इस कारण से सूर्य ग्रहण का असर भारत में नहीं होगा। इस वजह से नवरात्रि और श्राद्ध कार्य बिना किसी रुकावट के ही बेझिझक किए जा सकेंगें।&nbsp;&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस साल का दूसरा और अंतिम सूर्य ग्रहण आज रविवार को लगने जा रहा है। ग्रहण के दौरान कोई भी शुभ कार्य को करना मना होता है। सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है और हर साल लगता है। आपको बता दें कि इस दिन सर्वपितृ अमावस्या भी है। अमावस्या के दिन लोग स्नान-दान करते हैं और साथ ही अपने पितरों के लिए श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे पितृ दोष मिट जाता है और साथ ही जीवन में खुशियां बनी रहती है। लेकिन इस बार अमावस्या पर सूर्य ग्रहण लगने के कारण पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध किस तरह से किया जाएगा, इसके बारे में लोगों के मन में बहुत सी आशंकाएं है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>सूर्य ग्रहण का समय</strong><br />
भारत में सूर्य ग्रहण आज 21 सितंबर को रात 11 बजे शुरू होकर 22 सितंबर सुबह 3:23 बजे तक चलेगा। यह ग्रहण 4 घंटे 24 मिनट तक चलेगा।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>इस सूर्य ग्रहण का सूतक काल </strong></span><strong style="font-size: 18px; text-align: justify;">क्या&nbsp;</strong><span style="font-size:18px;"><strong>मान्य होगा&nbsp;</strong><br />
शास्त्रों के अनुसार सूर्य ग्रहण लगने से 12 घंटे पहले ही सूतक काल लग जाता है। शास्त्रों के अनुसार, सूतक काल के समय कोई भी मांगलिक शुभ कार्य नहीं किया जाता है। सूतक काल में मंदिरों के कपाट भी बंद कर दिया जाता है। लेकिन 21 सितंबर को लगने वाला सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखेगा। इस कारण से इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>नवरात्रि व श्राद्ध कार्य नहीं होंगे बाधित</strong><br />
ज्योतिष के मुताबिक, जिस जगह पर सूर्य ग्रहण दिखाई नहीं देता है, वहां पर सूतक की मान्यताएं जो है वह लागू नहीं होती हैं। देश के किसी भी हिस्से में सूर्य ग्रहण दिखाई नहीं देगा। इस कारण से सूर्य ग्रहण का असर भारत में नहीं होगा। इस वजह से नवरात्रि और श्राद्ध कार्य बिना किसी रुकावट के ही बेझिझक किए जा सकेंगें।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41519.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Last solar eclipse today, know what time it will start, what will be the impact on Navratri and Shraddha activities]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/why-is-barley-sown-on-the-first-day-of-shardiya-navratri-know-what-is-its-importance]]></guid>
                       <title><![CDATA[शारदीय नवरात्र के पहले दिन क्यों बोए जाते हैं जौ? जानिए इसके क्या है महत्व  ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/why-is-barley-sown-on-the-first-day-of-shardiya-navratri-know-what-is-its-importance]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 19 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

हर वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो जाती है। इस साल शारदीय नवरात्रि की शुरुआत सोमवार 22 सितंबर से होने वाली है और 2 अक्टूबर को विजयदशमी के दिन समाप्त होगी। नवरात्रि के दिनों में देवी दुर्गा की 9 रूपों की पूजा की जाती है। साथ ही अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन की भी परंपरा है। साथ ही शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन घटस्थापना भी की जाती है। घटस्थापना के समय जौ की सबसे पहले पूजा होती है और जौ को कलश में भी स्थापित किया जाता है। इस दौरान लोग मां दुर्गा का आशीर्वाद पाने के लिए व्रत रखते हैं। अंत में दशमी के दिन रावण दहन होता है।&nbsp;ऐसी मान्यता है कि नवरात्रि में जौ बोने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि तो आती ही है और साथ ही घर का भंडार भी हमेशा भरा रहता है।&nbsp;&nbsp;

&nbsp;

कलश स्थापना की शुभ मुहूर्त

नवरात्रि के पहले दिन ही कलश स्थापना की जाती है, जिसे घटस्थापना भी कहते हैं।&nbsp;

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त- 22 सितंबर 2025 को&nbsp; सुबह 6:09 बजे से 8:06 बजे तक है।&nbsp;

&nbsp;

नवरात्रि का महत्व&nbsp;

नवरात्रि का जो पर्व है वह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। मां दुर्गा ने महिषासुर राक्षस का वध करने के लिए 9 दिनों तक युद्ध किया था। महिषासुर का वध करके देवी ने धर्म की रक्षा की थी। इसीलिए नौ दिनों तक देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। नवरात्रि में व्रत और पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, यदि नवरात्र की प्रतिपदा सोमवार या रविवार को हो तो देवी दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं। देवी दुर्गा का हाथी पर सवार होकर आना बहुत ही शुभ माना जाता है।&nbsp;

&nbsp;

जौ बोने का महत्व&nbsp;

ऐसी मान्यता है कि जब पृथ्वी पर असुरों और दैत्यों का अत्याचार बढ़ने पर मां दुर्गा ने असुरों का संहार किया। इस दौरान पृथ्वी पर अकाल की जैसी स्थिति हो गई थी। तब उस दौरान सबसे पहले पृथ्वी पर जौ उगे थे। इसी वजह से सनातन में नवरात्र के समय जौ बोने को शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसे लेकर एक दूसरी मान्यता भी है। ऐसा कहा जाता है कि जब ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना की थी, तब सबसे पहले जौ उगी थी।&nbsp;

&nbsp;

ऐसा कहा जाता है कि यदि जौ का रंग सफेद या हरा हो जाए, इससे जीवन के सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं। वहीं यदि जौ अंकुरित हो जाए, तो&nbsp; इससे घर में खुशियों आती है।&nbsp; &nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">हर वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो जाती है। इस साल शारदीय नवरात्रि की शुरुआत सोमवार 22 सितंबर से होने वाली है और 2 अक्टूबर को विजयदशमी के दिन समाप्त होगी। नवरात्रि के दिनों में देवी दुर्गा की 9 रूपों की पूजा की जाती है। साथ ही अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन की भी परंपरा है। साथ ही शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन घटस्थापना भी की जाती है। घटस्थापना के समय जौ की सबसे पहले पूजा होती है और जौ को कलश में भी स्थापित किया जाता है। इस दौरान लोग मां दुर्गा का आशीर्वाद पाने के लिए व्रत रखते हैं। अंत में दशमी के दिन रावण दहन होता है।&nbsp;ऐसी मान्यता है कि नवरात्रि में जौ बोने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि तो आती ही है और साथ ही घर का भंडार भी हमेशा भरा रहता है।&nbsp;&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>कलश स्थापना की शुभ मुहूर्त</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नवरात्रि के पहले दिन ही कलश स्थापना की जाती है, जिसे घटस्थापना भी कहते हैं।&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त- 22 सितंबर 2025 को&nbsp; सुबह 6:09 बजे से 8:06 बजे तक है।&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>नवरात्रि का महत्व&nbsp;</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नवरात्रि का जो पर्व है वह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। मां दुर्गा ने महिषासुर राक्षस का वध करने के लिए 9 दिनों तक युद्ध किया था। महिषासुर का वध करके देवी ने धर्म की रक्षा की थी। इसीलिए नौ दिनों तक देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। नवरात्रि में व्रत और पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, यदि नवरात्र की प्रतिपदा सोमवार या रविवार को हो तो देवी दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं। देवी दुर्गा का हाथी पर सवार होकर आना बहुत ही शुभ माना जाता है।&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>जौ बोने का महत्व&nbsp;</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ऐसी मान्यता है कि जब पृथ्वी पर असुरों और दैत्यों का अत्याचार बढ़ने पर मां दुर्गा ने असुरों का संहार किया। इस दौरान पृथ्वी पर अकाल की जैसी स्थिति हो गई थी। तब उस दौरान सबसे पहले पृथ्वी पर जौ उगे थे। इसी वजह से सनातन में नवरात्र के समय जौ बोने को शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसे लेकर एक दूसरी मान्यता भी है। ऐसा कहा जाता है कि जब ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना की थी, तब सबसे पहले जौ उगी थी।&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ऐसा कहा जाता है कि यदि जौ का रंग सफेद या हरा हो जाए, इससे जीवन के सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं। वहीं यदि जौ अंकुरित हो जाए, तो&nbsp; इससे घर में खुशियों आती है।&nbsp; &nbsp;</span></div>

<div>&nbsp;</div>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41506.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Why is barley sown on the first day of Shardiya Navratri? Know what is its importance]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/national-news/the-last-solar-eclipse-will-take-place-on-september-21-will-the-eclipse-disrupt-navratri-and-shraddha-functions]]></guid>
                       <title><![CDATA[21 सितंबर को लगेगा अंतिम सूर्य ग्रहण, ग्रहण से नवरात्रि व श्राद्ध कार्य होंगे बाधित ? ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/national-news/the-last-solar-eclipse-will-take-place-on-september-21-will-the-eclipse-disrupt-navratri-and-shraddha-functions]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 19 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

इस साल का दूसरा व अंतिम सूर्य ग्रहण रविवार, 21 सितंबर को आश्विन अमावस्या के दिन लगने जा रहा है। इसे शुभ नहीं माना जाता है। सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है और यह हर वर्ष लगता है। आपको बता दें कि इस दिन सर्वपितृ अमावस्या भी है। अमावस्या के दिन लोग स्नान-दान करते हैं और साथ ही अपने पितरों के लिए श्राद्ध व तर्पण करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे पितृ दोष मिटता है और साथ ही जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। लेकिन इस बार अमावस्या पर सूर्य ग्रहण लगने के कारण पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध किस तरह से किया जाएगा, इसके बारे में लोगों के मन में बहुत सी दुविधा है।

&nbsp;

सूर्य ग्रहण का समय

भारत में 21 सितंबर को रात 11 बजे शुरू होकर 22 सितंबर सुबह 3:23 बजे समाप्त होगा। यह ग्रहण 4 घंटे 24 मिनट तक चलेगा।

&nbsp;

भारत में नहीं दिखेगा सूर्य ग्रहण

21 सितंबर को लगने वाला सूर्य ग्रहण इस बार भारत में नहीं दिखने वाला है। चूकि भारत में सूर्य ग्रहण नहीं दिखेगा, इस वजह से इसका सूतक काल भी भारत में मान्य नहीं होगा। शास्त्रों के अनुसार, सूर्य ग्रहण का जो सूतक काल है वो 12 घंटे पहले से लग जाता है।

&nbsp;

नवरात्रि व श्राद्ध कार्य नहीं होंगे बाधित

ज्योतिष के मुताबिक, जिस जगह पर सूर्य ग्रहण दिखाई देता है, वहीं पर सूतक की मान्यताएं जो है लागू होती हैं। देश के किसी भी हिस्से में सूर्य ग्रहण दिखाई नहीं देगा। इस कारण से सूर्य ग्रहण का असर भारत में नहीं होगा। इस वजह से नवरात्रि और श्राद्ध कार्य बिना किसी बाधा के ही बेझिझक किए जा सकते हैं।&nbsp;&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस साल का दूसरा व अंतिम सूर्य ग्रहण रविवार, 21 सितंबर को आश्विन अमावस्या के दिन लगने जा रहा है। इसे शुभ नहीं माना जाता है। सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है और यह हर वर्ष लगता है। आपको बता दें कि इस दिन सर्वपितृ अमावस्या भी है। अमावस्या के दिन लोग स्नान-दान करते हैं और साथ ही अपने पितरों के लिए श्राद्ध व तर्पण करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे पितृ दोष मिटता है और साथ ही जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। लेकिन इस बार अमावस्या पर सूर्य ग्रहण लगने के कारण पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध किस तरह से किया जाएगा, इसके बारे में लोगों के मन में बहुत सी दुविधा है।</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>सूर्य ग्रहण का समय</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">भारत में 21 सितंबर को रात 11 बजे शुरू होकर 22 सितंबर सुबह 3:23 बजे समाप्त होगा। यह ग्रहण 4 घंटे 24 मिनट तक चलेगा।</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>भारत में नहीं दिखेगा सूर्य ग्रहण</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">21 सितंबर को लगने वाला सूर्य ग्रहण इस बार भारत में नहीं दिखने वाला है। चूकि भारत में सूर्य ग्रहण नहीं दिखेगा, इस वजह से इसका सूतक काल भी भारत में मान्य नहीं होगा। शास्त्रों के अनुसार, सूर्य ग्रहण का जो सूतक काल है वो 12 घंटे पहले से लग जाता है।</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>नवरात्रि व श्राद्ध कार्य नहीं होंगे बाधित</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ज्योतिष के मुताबिक, जिस जगह पर सूर्य ग्रहण दिखाई देता है, वहीं पर सूतक की मान्यताएं जो है लागू होती हैं। देश के किसी भी हिस्से में सूर्य ग्रहण दिखाई नहीं देगा। इस कारण से सूर्य ग्रहण का असर भारत में नहीं होगा। इस वजह से नवरात्रि और श्राद्ध कार्य बिना किसी बाधा के ही बेझिझक किए जा सकते हैं।&nbsp;&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41501.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[The last solar eclipse will take place on September 21, will the eclipse disrupt Navratri and Shraddha functions?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/national-news/1st-or-2nd-october-when-is-dussehra-this-time-know-the-auspicious-time-and-date-of-ravana-dahan]]></guid>
                       <title><![CDATA[1 या 2 अक्टूूबर? इस बार दशहरा कब, जानें रावण दहन का शुभ मुहूर्त व डेट ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/national-news/1st-or-2nd-october-when-is-dussehra-this-time-know-the-auspicious-time-and-date-of-ravana-dahan]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 17 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

इस साल का दहशरा पर्व 2 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा। यह नवरात्रि के अंत में मनाया जाता है। यह भारत का बहुत बड़ा हिंदू त्योहार है और इसे अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान राम ने रावण का वध कर विजय हुए थे। चूकी इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत हुई थी इस वजह से विजयादशमी या दशहरा कहा जाता है। इस दिन लोग रावण पर भगवान राम की जीत का उत्सव मनाते हैं और साथ ही रावण के पुतले जलाकर रावण दहन के आयोजन बहुत ही धूम-धाम से मनाते हैं। इस दिन मेले व रामलीला का आयोजन भी किया जाता है। हालांकि इस त्योहार को मां दुर्गा द्वारा महिषासुर पर विजय का भी प्रतीक मना जाता है।

&nbsp;


&nbsp;

शुभ मुहूर्त

दशमी - 1 अक्टूबर शाम 7:01 बजे से 2 अक्टूबर शाम 7:10 बजे पर ख़त्म होगी।&nbsp;इस वजह से&nbsp;इस साल&nbsp;दहशरा पर्व 2 अक्टूबर को मनाया जाएगा।


&nbsp;

रावण दहन का समय

रावण दहन प्रदोष काल में होता है। सूर्यास्त शाम 6:06 बजे के बाद प्रदोष काल में रावण दहन होगा।&nbsp;

इस दिन रवि योग और सुकर्मा योग के साथ धृति योग भी बन रहे हैं। ये योग बहुत ही शुभ और मंगलकारी होते हैं।&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस साल का दहशरा पर्व 2 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा। यह नवरात्रि के अंत में मनाया जाता है। यह भारत का बहुत बड़ा हिंदू त्योहार है और इसे अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान राम ने रावण का वध कर विजय हुए थे। चूकी इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत हुई थी इस वजह से विजयादशमी या दशहरा कहा जाता है। इस दिन लोग रावण पर भगवान राम की जीत का उत्सव मनाते हैं और साथ ही रावण के पुतले जलाकर रावण दहन के आयोजन बहुत ही धूम-धाम से मनाते हैं। इस दिन मेले व रामलीला का आयोजन भी किया जाता है। हालांकि इस त्योहार को मां दुर्गा द्वारा महिषासुर पर विजय का भी प्रतीक मना जाता है।</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;">
<p>&nbsp;</p>

<div><span style="font-size:18px;"><strong>शुभ मुहूर्त</strong></span></div>

<div><span style="font-size:18px;">दशमी - 1 अक्टूबर शाम 7:01 बजे से 2 अक्टूबर शाम 7:10 बजे पर ख़त्म होगी।&nbsp;</span><span style="font-size: 18px; text-align: justify;">इस वजह से&nbsp;</span><span style="font-size:18px;">इस साल&nbsp;दहशरा पर्व 2 अक्टूबर को मनाया जाएगा</span><span style="font-size: 18px; text-align: justify;">।</span></div>
</div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>रावण दहन का समय</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">रावण दहन प्रदोष काल में होता है। सूर्यास्त शाम 6:06 बजे के बाद प्रदोष काल में रावण दहन होगा।&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस दिन रवि योग और सुकर्मा योग के साथ धृति योग भी बन रहे हैं। ये योग बहुत ही शुभ और मंगलकारी होते हैं।&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div>&nbsp;</div>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41498.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[1st or 2nd October? When is Dussehra this time, know the auspicious time and date of Ravana Dahan]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/news/national-news/21st-or-22nd-september-when-is-navratri-know-the-auspicious-time-and-method-of-worship]]></guid>
                       <title><![CDATA[21 या 22 सितंबर? कब है नवरात्रि, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/news/national-news/21st-or-22nd-september-when-is-navratri-know-the-auspicious-time-and-method-of-worship]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 16 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

इस साल शारदीय नवरात्रि की शुरुआत सोमवार 22 सितंबर से होने वाली है। 2 अक्टूबर को विजयदशमी के दिन समाप्त होगी। आपको बता दें कि हर वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो जाती है। सनातन में नवरात्रि पर्व का बहुत ज्यादा महत्व होता है। यह त्यौहार पुरे 9 दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान लोग मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखकर उपवास रखते हैं और साथ ही कलश की स्थापना भी करते हैं।&nbsp;

नवरात्रि के 9 दिनों में देवी दुर्गा की 9 स्वरूपों की&nbsp;पूजा की जाती है। साथ ही अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन की भी परंपरा है। दशमी के दिन रावण दहन होता है। ऐसी मान्यता है कि इन 9 दिनों में यानि नवरात्रि में देवी दुर्गा की पूजा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।&nbsp;

कलश स्थापना की शुभ मुहूर्त
नवरात्रि के पहले दिन ही कलश स्थापना की जाती है, जिसे घटस्थापना भी कहते हैं। कलश स्थापना शुभ समय में ही करना चाहिए।&nbsp;
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त- 22 सितंबर 2025 को&nbsp; सुबह 6:09 बजे से 8:06 बजे तक है।&nbsp;

कलश स्थापना की पूजा विधि&nbsp;
सुबह स्नान कर घर को साफ़ सुथरा कर लें। साथ ही हो सके तो गंगाजल से पूजन स्थल को साफ़ करें। इसके बाद पूजा के कलश को ठीक से साफ करके उसमें जल भर लें। इसके बाद इस कलश में सुपारी, सिक्का, अक्षत, और फूल डाल दीजिए। मिट्टी के एक बर्तन में जौ रखें और अब&nbsp; इसके ऊपर जल भरा हुआ कलश स्थापित कर दें। कलश पर रोली व अक्षत लगाएं और अब इसके चारो ओर मौली बांध दें। अब कलश पर सुपारी, सिक्का व आम के भी पत्ते रखें। अंत में कलश के ऊपर एक नारियल रखकर लाल कपड़े से लपेट दें और फिर इसे मौली से बांध दीजिए।&nbsp;&nbsp;

अब कलश के पास में देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें। अब जल, पुष्प चढ़ाकर और दीप जलाकर पूजा शुरू कर दें। सबसे अंत में दुर्गा सप्तशती या देवी कवच का पाठ करें।&nbsp;

नवरात्रि का महत्व&nbsp;
नवरात्रि का जो पर्व है वह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। मां दुर्गा ने महिषासुर राक्षस का वध करने के लिए 9 दिनों तक युद्ध किया था। महिषासुर का वध करके देवी ने धर्म की रक्षा की थी। इसीलिए नौ दिनों तक देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। नवरात्रि में व्रत और पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, यदि नवरात्र की प्रतिपदा सोमवार या रविवार को हो तो देवी दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं। देवी दुर्गा का हाथी पर सवार होकर आना बहुत ही शुभ माना जाता है।&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस साल शारदीय नवरात्रि की शुरुआत सोमवार 22 सितंबर से होने वाली है। 2 अक्टूबर को विजयदशमी के दिन समाप्त होगी</span><span style="font-size:18px;">। आपको बता दें कि हर वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो जाती है। सनातन में नवरात्रि पर्व का बहुत ज्यादा महत्व होता है। यह त्यौहार पुरे 9 दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान लोग मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखकर उपवास रखते हैं और साथ ही कलश की स्थापना भी करते हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">नवरात्रि के 9 दिनों में देवी दुर्गा की 9 स्वरूपों </span><span style="font-size: 18px; text-align: justify;">की&nbsp;</span><span style="font-size:18px;">पूजा की जाती है। साथ ही अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन की भी परंपरा है। दशमी के दिन रावण दहन होता है। ऐसी मान्यता है कि इन 9 दिनों में यानि नवरात्रि में देवी दुर्गा की पूजा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>कलश स्थापना की शुभ मुहूर्त</strong><br />
नवरात्रि के पहले दिन ही कलश स्थापना की जाती है, जिसे घटस्थापना भी कहते हैं। कलश स्थापना शुभ समय में ही करना चाहिए।&nbsp;<br />
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त- 22 सितंबर 2025 को&nbsp; सुबह 6:09 बजे से 8:06 बजे तक है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>कलश स्थापना की पूजा विधि&nbsp;</strong><br />
सुबह स्नान कर घर को साफ़ सुथरा कर लें। साथ ही हो सके तो गंगाजल से पूजन स्थल को साफ़ करें। इसके बाद पूजा के कलश को ठीक से साफ करके उसमें जल भर लें। इसके बाद इस कलश में सुपारी, सिक्का, अक्षत, और फूल डाल दीजिए। मिट्टी के एक बर्तन में जौ रखें और अब&nbsp; इसके ऊपर जल भरा हुआ कलश स्थापित कर दें। कलश पर रोली व अक्षत लगाएं और अब इसके चारो ओर मौली बांध दें। अब कलश पर सुपारी, सिक्का व आम के भी पत्ते रखें। अंत में कलश के ऊपर एक नारियल रखकर लाल कपड़े से लपेट दें और फिर इसे मौली से बांध दीजिए।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">अब कलश के पास में देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें। अब जल, पुष्प चढ़ाकर और दीप जलाकर पूजा शुरू कर दें। सबसे अंत में दुर्गा सप्तशती या देवी कवच का पाठ करें।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>नवरात्रि का महत्व&nbsp;</strong><br />
नवरात्रि का जो पर्व है वह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। मां दुर्गा ने महिषासुर राक्षस का वध करने के लिए 9 दिनों तक युद्ध किया था। महिषासुर का वध करके देवी ने धर्म की रक्षा की थी। इसीलिए नौ दिनों तक देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। नवरात्रि में व्रत और पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, यदि नवरात्र की प्रतिपदा सोमवार या रविवार को हो तो देवी दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं। देवी दुर्गा का हाथी पर सवार होकर आना बहुत ही शुभ माना जाता है।&nbsp;</span></p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41483.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[21st or 22nd September? When is Navratri, know the auspicious time and method of worship]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/20th-or-21st-september-when-is-sarvapitri-amavasya-know-the-date-and-auspicious-time]]></guid>
                       <title><![CDATA[20 या 21 सितंबर? सर्वपितृ अमावस्या कब, जानें डेट व शुभ मुहूर्त ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/20th-or-21st-september-when-is-sarvapitri-amavasya-know-the-date-and-auspicious-time]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 11 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

&nbsp;

पितृ पक्ष के अंतिम दिन को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक, आश्विन माह की अमावस्या इस बार 21 सितंबर को 12:16 am बजे शुरू होगी और 22 सितंबर को 1:23 am बजे ख़त्म होगी। इस वजह से इस साल सर्वपितृ अमावस्या 21 सितंबर को ही मनाई जाएगी। सर्वपितृ अमावस्या के बारें में ऐसा माना जाता है कि इस दिन किए गए कार्य से सबसे अधिक फल मिलता है। इसी वजह से इस दिन को विशेष श्रद्धा से मनाया जाता है।&nbsp;

इस साल पितृपक्ष 7-21 सितंबर तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध के 2 तरह के होते हैं। पहला श्राद्ध वो जो हर वर्ष व्यक्ति की मृत्यु कि तिथि पर किया जाता है और दूसरा वो जो पितृ पक्ष में किया जाता है।

&nbsp;

यह दिन उन लोगों के लिए ज्यादा ही महत्वपूर्ण होता है, जो किसी वजह से अपने पूर्वजों का श्राद्ध या तर्पण नहीं कर सके हैं।&nbsp;वे अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या पर तर्पण करते हैं।&nbsp;मान्यता है कि इस समय पितर धरती पर आते हैं। इसीलिए इस दिन पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा है। शास्त्रों के अनुसार इन कार्यों के करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है, पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है और परिवार में सुख -समृद्धि बनी रहती है। वैसे इस दिन लोग स्नान-दान करते हैं और पितरों के लिए ब्राह्मणों को भोजन भी कराते हैं।&nbsp;

सर्व पितृ अमावस्या पर किनका श्राद्ध&nbsp;
पितृ पक्ष के दौरान अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि पर ही तर्पण होता है। लेकिन जिनकों पितरों के मृत्यु तिथि का पता नहीं हो तब वे अंतिम दिन सर्व पितृ अमावस्या पर तर्पण करते हैं।

पितृ दोष से मुक्ति के लिए सर्वपितृ अमावस्या का उपाय
ऐसी मान्यता है कि पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए सर्वपितृ अमावस्या पर दान जरूर करना चाहिए और साथ ही ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

तर्पण और पिंडदान के शुभ मुहूर्त
कुतुप मुहूर्त-&nbsp; सुबह 11:50 am बजे से दोपहर 12:38 pm बजे तक
रौहिण मुहूर्त- दोपहर 12:38 pm बजे से 1:27 pm बजे तक

इस दिन करें ये शुभ कार्य
सुबह सबेरे स्नान करके पितरों की शांति के लिए प्रार्थना करें
विधि विधान से पिंडदान और तर्पण करें
गाय, कुत्ते, कौवे और देवताओं के लिए भोजन जरूर निकालें
ब्राह्मणों को भोजन कराएं&nbsp;

महत्वपूर्ण क्यों&nbsp;
शास्त्रों के अनुसार इस दिन किए गए श्राद्ध से सभी पितरों की आत्मा तृप्त हो जाती है और उन्हें मोक्ष भी मिल जाता है। इसी वजह से इसे &ldquo;सर्वपितृ अमावस्या&rdquo; कहा गया है।&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">पितृ पक्ष के अंतिम दिन को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक, आश्विन माह की अमावस्या इस बार 21 सितंबर को 12:16 am बजे शुरू होगी और 22 सितंबर को 1:23 am बजे ख़त्म होगी। इस वजह से इस साल सर्वपितृ अमावस्या 21 सितंबर को ही मनाई जाएगी। सर्वपितृ अमावस्या के बारें में ऐसा माना जाता है कि इस दिन किए गए कार्य से सबसे अधिक फल मिलता है। इसी वजह से इस दिन को विशेष श्रद्धा से मनाया जाता है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस साल पितृपक्ष 7-21 सितंबर तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध के 2 तरह के होते हैं। पहला श्राद्ध वो जो हर वर्ष व्यक्ति की मृत्यु कि तिथि पर किया जाता है और दूसरा वो जो पितृ पक्ष में किया जाता है।</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">यह दिन उन लोगों के लिए ज्यादा ही महत्वपूर्ण होता है, जो किसी वजह से अपने पूर्वजों का श्राद्ध या तर्पण नहीं कर सके हैं।&nbsp;वे अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या पर तर्पण करते हैं।&nbsp;मान्यता है कि इस समय पितर धरती पर आते हैं। इसीलिए इस दिन पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा है। शास्त्रों के अनुसार इन कार्यों के करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है, पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है और परिवार में सुख -समृद्धि बनी रहती है। वैसे इस दिन लोग स्नान-दान करते हैं और पितरों के लिए ब्राह्मणों को भोजन भी कराते हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>सर्व पितृ अमावस्या पर किनका श्राद्ध&nbsp;</strong><br />
पितृ पक्ष के दौरान अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि पर ही तर्पण होता है। लेकिन जिनकों पितरों के मृत्यु तिथि का पता नहीं हो तब वे अंतिम दिन सर्व पितृ अमावस्या पर तर्पण करते हैं।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">पितृ दोष से मुक्ति के लिए सर्वपितृ अमावस्या का उपाय<br />
ऐसी मान्यता है कि पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए सर्वपितृ अमावस्या पर दान जरूर करना चाहिए और साथ ही ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>तर्पण और पिंडदान के शुभ मुहूर्त</strong><br />
कुतुप मुहूर्त-&nbsp; सुबह 11:50 am बजे से दोपहर 12:38 pm बजे तक<br />
रौहिण मुहूर्त- दोपहर 12:38 pm बजे से 1:27 pm बजे तक</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>इस दिन करें ये शुभ कार्य</strong><br />
सुबह सबेरे स्नान करके पितरों की शांति के लिए प्रार्थना करें<br />
विधि विधान से पिंडदान और तर्पण करें<br />
गाय, कुत्ते, कौवे और देवताओं के लिए भोजन जरूर निकालें<br />
ब्राह्मणों को भोजन कराएं&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>महत्वपूर्ण क्यों&nbsp;</strong><br />
शास्त्रों के अनुसार इस दिन किए गए श्राद्ध से सभी पितरों की आत्मा तृप्त हो जाती है और उन्हें मोक्ष भी मिल जाता है। इसी वजह से इसे &ldquo;सर्वपितृ अमावस्या&rdquo; कहा गया है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41434.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[20th or 21st September? When is Sarvapitri Amavasya, know the date and auspicious time]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/apart-from-ujjain-temple-the-doors-of-these-big-temples-also-open-during-lunar-eclipse]]></guid>
                       <title><![CDATA[चंद्र ग्रहण में उज्जैन मंदिर के अलावा इन बड़े मंदिरों के भी खुले होते हैं कपाट ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/apart-from-ujjain-temple-the-doors-of-these-big-temples-also-open-during-lunar-eclipse]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sun, 07 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

चंद्र ग्रहण आज 7 सितंबर रात 9.58 बजे शुरू होने वाला है और रात 1.26 बजे समाप्त होगा। चंद्र ग्रहण का सूतक काल 9 घंटे पहले ही दोपहर 12.57 बजे शुरू हो गया है। आज पूर्ण चंद्र ग्रहण लगेगा, जो कुंभ राशि और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में लगेगा। आपको बता दें कि चंद्र ग्रहण के समय सभी मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। सूतक काल लगते ही मंदिरों को बंद कर दिया जाता है और ग्रहण समाप्त होते ही भगवान के दर्शन की अनुमति दे दी जाती है। लेकिन आपको बता दें कि देश में कई ऐसे प्रसिद्ध मंदिर हैं, जो ग्रहण के समय भी खुले होते हैं। साथ ही वहां नियमित रूप भगवान के दर्शन भी किये जाते हैं। इसीलिए आज 7 सितंबर को चंद्रग्रहण के समय भी इन मंदिरों में दर्शन किये जाते रहेगें।&nbsp;

&nbsp;

उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर

ग्रहण के समय भी उज्जैन का महाकाल मंदिर खुला होता है। इस दौरान भी महाकाल के दर्शन किये जा सकते हैं। ग्रहण के समय पूजा और आरती के समय में ही केवल बदलाव किये जाते हैं। इसकी सूचना पहले ही दे दी जाती है।&nbsp;

&nbsp;


&nbsp;

बिहार के गयाजी का विष्णुपद मंदिर

गयाजी में विष्णुपद मंदिर भी चंद्र ग्रहण के समय पर खुला रहता है। ग्रहण के समय यहां पिंडदान करने को शुभ कार्य माना जाता है।


&nbsp;

बीकानेर का लक्ष्मीनाथ मंदिर

राजस्थान के बीकानेर में स्थति लक्ष्मीनाथ मंदिर के भी&nbsp;कपाट&nbsp; चंद्र ग्रहण के दौरान बंद नहीं होते हैं।&nbsp;

&nbsp;

केरल का श्री कृष्ण मंदिर

केरल के कोट्टायम स्थित थिरुवरप्पु श्री कृष्ण मंदिर के भी&nbsp;कपाट चंद्र ग्रहण के समय पर खुला रहता है।&nbsp;चंद्र ग्रहण के समय पर&nbsp;भी&nbsp;भगवान के दर्शन भी किये जाते हैं&nbsp;।

&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">चंद्र ग्रहण आज 7 सितंबर रात 9.58 बजे शुरू होने वाला है और रात 1.26 बजे समाप्त होगा। चंद्र ग्रहण का सूतक काल 9 घंटे पहले ही दोपहर 12.57 बजे शुरू हो गया है। आज पूर्ण चंद्र ग्रहण लगेगा, जो कुंभ राशि और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में लगेगा। आपको बता दें कि चंद्र ग्रहण के समय सभी मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। सूतक काल लगते ही मंदिरों को बंद कर दिया जाता है और ग्रहण समाप्त होते ही भगवान के दर्शन की अनुमति दे दी जाती है। लेकिन आपको बता दें कि देश में कई ऐसे प्रसिद्ध मंदिर हैं, जो ग्रहण के समय भी खुले होते हैं। साथ ही वहां नियमित रूप भगवान के दर्शन भी किये जाते हैं। इसीलिए आज 7 सितंबर को चंद्रग्रहण के समय भी इन मंदिरों में दर्शन किये जाते रहेगें।&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">ग्रहण के समय भी उज्जैन का महाकाल मंदिर खुला होता है। इस दौरान भी महाकाल के दर्शन किये जा सकते हैं। ग्रहण के समय पूजा और आरती के समय में ही केवल बदलाव किये जाते हैं। इसकी सूचना पहले ही दे दी जाती है।&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>बिहार के गयाजी का विष्णुपद मंदिर</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">गयाजी में विष्णुपद मंदिर भी चंद्र ग्रहण के समय पर खुला रहता है। ग्रहण के समय यहां पिंडदान करने को शुभ कार्य माना जाता है।</span></div>
</div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>बीकानेर का लक्ष्मीनाथ मंदिर</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">राजस्थान के बीकानेर में स्थति लक्ष्मीनाथ मंदिर के <span style="text-align: justify;">भी&nbsp;</span>कपाट&nbsp; चंद्र ग्रहण के दौरान बंद नहीं होते हैं।&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>केरल का श्री कृष्ण मंदिर</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">केरल के कोट्टायम स्थित थिरुवरप्पु श्री कृष्ण मंदिर के <span style="text-align: justify;">भी&nbsp;</span>कपाट <span style="text-align: justify;">चंद्र ग्रहण के समय पर खुला रहता है</span>।&nbsp;<span style="text-align: justify;">चंद्र ग्रहण के समय पर&nbsp;भी&nbsp;भगवान के दर्शन भी किये जाते हैं&nbsp;।</span></span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div>&nbsp;</div>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41409.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[ Apart from Ujjain temple, the doors of these big temples also open during lunar eclipse.]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/lunar-eclipse-will-take-place-in-the-country-today-sutak-period-will-start-after-some-time]]></guid>
                       <title><![CDATA[देश में आज लगेगा चंद्र ग्रहण, थोड़ी देर में शुरू होगा सूतक काल]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/lunar-eclipse-will-take-place-in-the-country-today-sutak-period-will-start-after-some-time]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sun, 07 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

चंद्र ग्रहण आज 7 सितंबर रात 9.58 बजे शुरू होने वाला है और रात 1.26 बजे समाप्त हो जायेगा। आपको बता दें कि चंद्र ग्रहण का सूतक काल 9 घंटे पहले ही अभी दोपहर 12.57 बजे शुरू हो जाएगा। आज पूर्ण चंद्र ग्रहण लगेगा, जो कुंभ राशि और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में लगेगा। इस साल 2025 का यह दूसरा आखिरी चंद्र ग्रहण है, जो आज 7 सितंबर को लगने वाला है। सबसे ख़ास बात यह है इस चंद्र ग्रहण की कि ये पितृपक्ष के दिन ही शुरू हो रहा है,जो कि एक बहुत ही दुर्लभ संयोग है।&nbsp;

ग्रहण काल में भूल से भी न करें यह काम&nbsp;
सनातन में ग्रहण काल के समय सोना, खाना और पीना नहीं करना चाहिए। खाने की चीजों में तुलसी डाल कर रखना चाहिए। इससे खाना अशुद्ध या विषाक्त नहीं होता है, ऐसा माना जाता है।&nbsp;

122 साल बाद चंद्र ग्रहण पर पितृ पक्ष का संयोग
आज इस साल का अंतिम चंद्र ग्रहण लगने वाला है और आज से ही पितृ पक्ष भी शुरू है। ज्योतिषियों के अनुसार, चंद्र ग्रहण पर पितृ पक्ष का यह&nbsp; संयोग पूरे 122 साल बाद बना है। वहीं, चंद्र ग्रहण का सूतक काल शुरू होने से पहले श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और पवित्र नदियों में स्नान करने जैसे सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरा कर लें।&nbsp;

आज रात लगने वाले चंद्र ग्रहण का सूतक काल अभी दोपहर 12.57 बजे शुरू होने जा रहा है। आपको बता दें कि सूतक में मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे। ग्रहण समाप्त होने तक कोई धार्मिक कार्य नहीं होगा। इसलिए जो भी पूजा अर्चना है और पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध, पिंडदान वो पहले ही कर लेनी चाहिए।&nbsp;&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;

ये भी पढ़ें&nbsp;

लगेगा सदी का सबसे दुर्लभ चंद्र ग्रहण, 100 साल बाद ऐसा संयोग, भूलकर भी ये न करें

7 या 8 सितम्बर, जानें कब से शुरू होगा पितृपक्ष

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">चंद्र ग्रहण आज 7 सितंबर रात 9.58 बजे शुरू होने वाला है और रात 1.26 बजे समाप्त हो जायेगा। आपको बता दें कि चंद्र ग्रहण का सूतक काल 9 घंटे पहले ही अभी दोपहर 12.57 बजे शुरू हो जाएगा। आज पूर्ण चंद्र ग्रहण लगेगा, जो कुंभ राशि और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में लगेगा। इस साल 2025 का यह दूसरा आखिरी चंद्र ग्रहण है, जो आज 7 सितंबर को लगने वाला है। सबसे ख़ास बात यह है इस चंद्र ग्रहण की कि ये पितृपक्ष के दिन ही शुरू हो रहा है,जो कि एक बहुत ही दुर्लभ संयोग है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>ग्रहण काल में भूल से भी न करें यह काम&nbsp;</strong><br />
सनातन में ग्रहण काल के समय सोना, खाना और पीना नहीं करना चाहिए। खाने की चीजों में तुलसी डाल कर रखना चाहिए। इससे खाना अशुद्ध या विषाक्त नहीं होता है, ऐसा माना जाता है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>122 साल बाद चंद्र ग्रहण पर पितृ पक्ष का संयोग</strong><br />
आज इस साल का अंतिम चंद्र ग्रहण लगने वाला है और आज से ही पितृ पक्ष भी शुरू है। ज्योतिषियों के अनुसार, चंद्र ग्रहण पर पितृ पक्ष का यह&nbsp; संयोग पूरे 122 साल बाद बना है। वहीं, चंद्र ग्रहण का सूतक काल शुरू होने से पहले श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और पवित्र नदियों में स्नान करने जैसे सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरा कर लें।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">आज रात लगने वाले चंद्र ग्रहण का सूतक काल अभी दोपहर 12.57 बजे शुरू होने जा रहा है। आपको बता दें कि सूतक में मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे। ग्रहण समाप्त होने तक कोई धार्मिक कार्य नहीं होगा। इसलिए जो भी पूजा अर्चना है और पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध, पिंडदान वो पहले ही कर लेनी चाहिए।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p>&nbsp;</p>

<p>&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;">ये भी पढ़ें&nbsp;</span></strong></p>

<p><strong><a href="https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/the-rarest-lunar-eclipse-of-the-century-will-happen-such-a-coincidence-will-happen-after-100-years-do-not-do-this-even-by-mistake"><span style="color:#FF0000;"><span style="font-size:18px;">लगेगा सदी का सबसे दुर्लभ चंद्र ग्रहण, 100 साल बाद ऐसा संयोग, भूलकर भी ये न करें</span></span></a></strong></p>

<p style="text-align: justify;"><a href="https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/7th-or-8th-september-know-when-pitru-paksha-will-start"><span style="color:#FF0000;"><span style="font-size:18px;"><strong>7 या 8 सितम्बर, जानें कब से शुरू होगा पितृपक्ष</strong></span></span></a></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41407.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Lunar eclipse will take place in the country today, Sutak period will start after some time]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/7th-or-8th-september-know-when-pitru-paksha-will-start]]></guid>
                       <title><![CDATA[7 या 8 सितम्बर, जानें कब से शुरू होगा पितृपक्ष ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/7th-or-8th-september-know-when-pitru-paksha-will-start]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Fri, 05 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

इस वर्ष पितृपक्ष 7 सितंबर से 21 सितंबर 2025 तक रहेगा। पितृपक्ष में पितरों को श्रद्धांजलि देने और उनकी आत्मा की शांति के लिए विशेष पूजा, श्राद्ध अनुष्ठान व तर्पण किये जाते हैं। ताकि पितरों को मुक्ति मिल सके। इस दौरान ब्राह्मणों को भोजन कराने की भी परंपरा है। यह पितृ भोजन कहलाता है। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से पूर्वज तृप्त होते हैं और अपने वंशजों आशीर्वाद देते हैं और साथ ही कुल की उन्नति होती है। इस कर्म को अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान माना जाता है।

पितृपक्ष का पहला श्राद्ध - 08 सितंबर 2025 को है, द्वितीया श्राद्ध - 09 सितंबर 2025, तृतीया श्राद्ध - 10 सितंबर, चतुर्थी श्राद्ध - 10 सितंबर, पंचमी श्राद्ध - 12 सितंबर, षष्ठी श्राद्ध - 12 सितंबर, सप्तमी श्राद्ध - 13 सितंबर, अष्टमी श्राद्ध - 14 सितंबर, नवमी श्राद्ध - 15 सितंबर, दशमी श्राद्ध - 16 सितंबर, एकादशी श्राद्ध - 17 सितंबर 2025 को है।&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस वर्ष पितृपक्ष 7 सितंबर से 21 सितंबर 2025 तक रहेगा। पितृपक्ष में पितरों को श्रद्धांजलि देने और उनकी आत्मा की शांति के लिए विशेष पूजा, श्राद्ध अनुष्ठान व तर्पण किये जाते हैं। ताकि पितरों को मुक्ति मिल सके। इस दौरान ब्राह्मणों को भोजन कराने की भी परंपरा है। यह पितृ भोजन कहलाता है। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से पूर्वज तृप्त होते हैं और अपने वंशजों आशीर्वाद देते हैं और साथ ही कुल की उन्नति होती है। इस कर्म को अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान माना जाता है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">पितृपक्ष का पहला श्राद्ध - 08 सितंबर 2025 को है, द्वितीया श्राद्ध - 09 सितंबर 2025, तृतीया श्राद्ध - 10 सितंबर, चतुर्थी श्राद्ध - 10 सितंबर, पंचमी श्राद्ध - 12 सितंबर, षष्ठी श्राद्ध - 12 सितंबर, सप्तमी श्राद्ध - 13 सितंबर, अष्टमी श्राद्ध - 14 सितंबर, नवमी श्राद्ध - 15 सितंबर, दशमी श्राद्ध - 16 सितंबर, एकादशी श्राद्ध - 17 सितंबर 2025 को है।&nbsp;</span></p>

<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41401.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[ 7th or 8th September, know when Pitru Paksha will start]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/the-rarest-lunar-eclipse-of-the-century-will-happen-such-a-coincidence-will-happen-after-100-years-do-not-do-this-even-by-mistake]]></guid>
                       <title><![CDATA[लगेगा सदी का सबसे दुर्लभ चंद्र ग्रहण, 100 साल बाद ऐसा संयोग, भूलकर भी ये न करें]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/the-rarest-lunar-eclipse-of-the-century-will-happen-such-a-coincidence-will-happen-after-100-years-do-not-do-this-even-by-mistake]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 02 Sep 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[इस वर्ष का दूसरा पूर्ण चंद्र ग्रहण रविवार, 7 सितंबर को लगने वाला है। यह ग्रहण पितृपक्ष के दौरान पड़ने वाला है इस वजह से इस ग्रहण को बहुत शक्तिशाली बताया जा रहा है। इस ग्रहण की सबसे खास बात यह है कि ऐसा संयोग 100 साल में 1 बार ही होता है। विज्ञानं के अनुसार जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आती है तब चंद्र ग्रहण लगता है। इसमें सूर्य की रोशनी चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाती है। ग्रहण के समय चंद्रमा&nbsp; लाल जैसा दिखता है जिसे ब्लड मून कहा जाता है।&nbsp;

शास्त्रों के अनुसार चंद्र ग्रहण का महत्व
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, जब ग्रहण लगता है तो उस समय कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। इस दौरान मंदिरों के कपाट को भी बंद रखा जाता है। जब ग्रहण समाप्त हो जाता है तब मंदिर की शुद्धि कर विशेष पूजा की जाती है। शास्त्रों में ऐसा ज़िक्र है कि ग्रहण के वक्त नकारात्मक ऊर्जा ज्यादा सक्रिय हो रहती है और इसी वजह से लोग इस वक्त पर भगवान का ध्यान और प्रार्थना करते हैं।&nbsp;

ग्रहण का समय&nbsp;
आपको बता दें कि ग्रहण शुरू होने से करीब 9 घंटे पहले&nbsp; सूतक काल लग जाता है। 7 सितंबर को रात 9:58 बजे से 8 सितंबर 1:26 बजे तक ग्रहण काल चलेगा। वहीं रात 11:00 बजे से 12:22 बजे के बीच ब्लड मून का समय रहेगा।&nbsp;

ग्रहण के समय भोजन न करें&nbsp;
शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि ग्रहण के समय सूक्ष्म जीवाणु अधिक सक्रिय हो जाते हैं और इससे भोजन अशुद्ध यानि विषाक्त हो जाता है। इसलिए इस ग्रहण के समय कुछ भी खाने से बचना चाहिए। साथ ही अगर भोजन पक चुका है और ग्रहण लग गया है तो पके हुए भोजन में तुलसी पत्ते को डालकर भोजन को सुरक्षित रखा जाता है, सनातन में ऐसी परंपरा है।

गर्भवती महिलाओं को विशेष ध्यान देना चाहिए&nbsp;
ग्रहण के समय गर्भवती महिलाओं को घर के भीतर ही रहना चाहिए और चंद्र ग्रहण को बिकुल नहीं देखना चाहिए। इस समय कोई भी नूकीली चीजें जैसे कि कैंची व चाकू आदि का इस्तेमाल न करें। इस समय सोना भी नहीं चाहिए। ऐसी मांन्यताएँ हैं कि अगर गर्भवती महिलाएं इन चीजों का विशेष ध्यान नहीं रखती हैं तो इसका सीधा प्रभाव होने वाले बच्चे पर पड़ता है।

ग्रहण खत्म होने के बाद ये करें
घर और कपड़ों की साफ़ सफाई कर लेना चाहिए। उसके बाद गंगाजल मिले पानी से नहाकर साफ कपड़े पहन लेना चाहिए। साथ ही भगवान को भी याद करें।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p>इस वर्ष का दूसरा पूर्ण चंद्र ग्रहण रविवार, 7 सितंबर को लगने वाला है। यह ग्रहण पितृपक्ष के दौरान पड़ने वाला है इस वजह से इस ग्रहण को बहुत शक्तिशाली बताया जा रहा है। इस ग्रहण की सबसे खास बात यह है कि ऐसा संयोग 100 साल में 1 बार ही होता है। विज्ञानं के अनुसार जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आती है तब चंद्र ग्रहण लगता है। इसमें सूर्य की रोशनी चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाती है। ग्रहण के समय चंद्रमा&nbsp; लाल जैसा दिखता है जिसे ब्लड मून कहा जाता है।&nbsp;</p>

<p><strong>शास्त्रों के अनुसार चंद्र ग्रहण का महत्व</strong><br />
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, जब ग्रहण लगता है तो उस समय कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। इस दौरान मंदिरों के कपाट को भी बंद रखा जाता है। जब ग्रहण समाप्त हो जाता है तब मंदिर की शुद्धि कर विशेष पूजा की जाती है। शास्त्रों में ऐसा ज़िक्र है कि ग्रहण के वक्त नकारात्मक ऊर्जा ज्यादा सक्रिय हो रहती है और इसी वजह से लोग इस वक्त पर भगवान का ध्यान और प्रार्थना करते हैं।&nbsp;</p>

<p><strong>ग्रहण का समय&nbsp;</strong><br />
आपको बता दें कि ग्रहण शुरू होने से करीब 9 घंटे पहले&nbsp; सूतक काल लग जाता है। 7 सितंबर को रात 9:58 बजे से 8 सितंबर 1:26 बजे तक ग्रहण काल चलेगा। वहीं रात 11:00 बजे से 12:22 बजे के बीच ब्लड मून का समय रहेगा।&nbsp;</p>

<p><strong>ग्रहण के समय भोजन न करें&nbsp;</strong><br />
शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि ग्रहण के समय सूक्ष्म जीवाणु अधिक सक्रिय हो जाते हैं और इससे भोजन अशुद्ध यानि विषाक्त हो जाता है। इसलिए इस ग्रहण के समय कुछ भी खाने से बचना चाहिए। साथ ही अगर भोजन पक चुका है और ग्रहण लग गया है तो पके हुए भोजन में तुलसी पत्ते को डालकर भोजन को सुरक्षित रखा जाता है, सनातन में ऐसी परंपरा है।</p>

<p><strong>गर्भवती महिलाओं को विशेष ध्यान देना चाहिए&nbsp;</strong><br />
ग्रहण के समय गर्भवती महिलाओं को घर के भीतर ही रहना चाहिए और चंद्र ग्रहण को बिकुल नहीं देखना चाहिए। इस समय कोई भी नूकीली चीजें जैसे कि कैंची व चाकू आदि का इस्तेमाल न करें। इस समय सोना भी नहीं चाहिए। ऐसी मांन्यताएँ हैं कि अगर गर्भवती महिलाएं इन चीजों का विशेष ध्यान नहीं रखती हैं तो इसका सीधा प्रभाव होने वाले बच्चे पर पड़ता है।</p>

<p><strong>ग्रहण खत्म होने के बाद ये करें</strong><br />
घर और कपड़ों की साफ़ सफाई कर लेना चाहिए। उसके बाद गंगाजल मिले पानी से नहाकर साफ कपड़े पहन लेना चाहिए। साथ ही भगवान को भी याद करें।</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41373.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[The rarest lunar eclipse of the century will happen, such a coincidence will happen after 100 years, do not do this even by mistake]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/why-is-ganesh-utsav-celebrated-only-for-10-days-know-the-reason]]></guid>
                       <title><![CDATA[10 दिनों तक ही क्यों मनाया जाता है गणेश उत्सव, जानिए वजह  ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/why-is-ganesh-utsav-celebrated-only-for-10-days-know-the-reason]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Thu, 28 Aug 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

गणेश चतुर्थी हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है जो चतुर्थी भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर, अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। यह पर्व 10 दिनों तक मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों, दुकानों आदि में गणपति जी (बप्पा) की प्रतिमा स्थापित करते हैं और उनकी पूजा अर्चना करते हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन बप्पा का विसर्जन कर दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार 10 दिनों तक पूजा करना सबसे ज्यादा शुभ माना जाता है। इस साल गणेश चतुर्थी&nbsp; 27 अगस्त से शुरू हो चुका है और 6 सितंबर को समाप्त हो जायेगा।

&nbsp;

यह उत्सव 10 दिनों तक ही क्यों मनाया जाता है

गणेश चतुर्थी पर्व 10 दिनों तक चलता है और इसके पीछे एक पौराणिक कथा है जो महाभारत से जुड़ी है। इसके अनुसार, वेदव्यास जी ने जब भगवान गणेश से महाभारत ग्रंथ लिखने का आग्रह किया तो गणेश जी ने एक शर्त रखी कि वे इसे लिखने के दौरान एक बार भी नहीं रुकेंगे। यदि रुके, तब वे लिखना बंद कर देंगे। वेदव्यास सहमत हो गए और गणेश जी लगातार बिना रुके 10 दिनों तक महाभारत लिखते रहे। तभी से गणेश चतुर्थी उत्सव को 10 दिनों तक मनाए जानें की परंपरा बनीं हुई है।&nbsp;

&nbsp;

विसर्जन का&nbsp;संदेश

गणपति जी की प्रतिमा का विसर्जन जीवन की नश्वरता और प्रकृति से एकात्मता का संदेश देता है। मिट्टी की बनी गणेश मूर्ति का जल में विलीन हो जाना यह दिखाता है कि सभी लोग प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं और एक दिन वापस प्रकृति में ही विलीन हो जाना है। यह भाव लोगों को विनम्र बनाता है और अहंकार से परे होकर जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">गणेश चतुर्थी हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है जो चतुर्थी भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर, अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। यह पर्व 10 दिनों तक मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों, दुकानों आदि में गणपति जी (बप्पा) की प्रतिमा स्थापित करते हैं और उनकी पूजा अर्चना करते हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन बप्पा का विसर्जन कर दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार 10 दिनों तक पूजा करना सबसे ज्यादा शुभ माना जाता है। इस साल गणेश चतुर्थी&nbsp; 27 अगस्त से शुरू हो चुका है और 6 सितंबर को समाप्त हो जायेगा।</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>यह उत्सव 10 दिनों तक ही क्यों मनाया जाता है</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">गणेश चतुर्थी पर्व 10 दिनों तक चलता है और इसके पीछे एक पौराणिक कथा है जो महाभारत से जुड़ी है। इसके अनुसार, वेदव्यास जी ने जब भगवान गणेश से महाभारत ग्रंथ लिखने का आग्रह किया तो गणेश जी ने एक शर्त रखी कि वे इसे लिखने के दौरान एक बार भी नहीं रुकेंगे। यदि रुके, तब वे लिखना बंद कर देंगे। वेदव्यास सहमत हो गए और गणेश जी लगातार बिना रुके 10 दिनों तक महाभारत लिखते रहे। तभी से गणेश चतुर्थी उत्सव को 10 दिनों तक मनाए जानें की परंपरा बनीं हुई है।&nbsp;</span></div>

<div style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>विसर्जन का&nbsp;संदेश</strong></span></div>

<div style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">गणपति जी की प्रतिमा का विसर्जन जीवन की नश्वरता और प्रकृति से एकात्मता का संदेश देता है। मिट्टी की बनी गणेश मूर्ति का जल में विलीन हो जाना यह दिखाता है कि सभी लोग प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं और एक दिन वापस प्रकृति में ही विलीन हो जाना है। यह भाव लोगों को विनम्र बनाता है और अहंकार से परे होकर जीवन जीने की प्रेरणा देता है।</span></div>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41317.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Why is Ganesh Utsav celebrated only for 10 days, know the reason]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/lifestyle/astrology/first-blessing/news/national-news/do-not-see-the-moon-even-by-mistake-on-ganesh-chaturthi-what-will-happen-if-you-see-it]]></guid>
                       <title><![CDATA[गणेश चतुर्थी पर गलती से भी चांद ना देखें, देख लिया तो क्या होगा? ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/lifestyle/astrology/first-blessing/news/national-news/do-not-see-the-moon-even-by-mistake-on-ganesh-chaturthi-what-will-happen-if-you-see-it]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Wed, 27 Aug 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;

इस साल गणेश चतुर्थी आज बुधवार, 27 अगस्त को मनाई जा रही है। इस दिन लोग अपने घरों में गणपत्ति बप्पा लायेंगें और उनकी उपासना करेंगें। यह उत्सव 10 दिनों तक चलता है और यह 27 अगस्त से शुरू होकर 6 सितंबर, 2025 तक रहेगा। गणेश चतुर्थी 26 अगस्त को दोपहर 1:54 बजे शुरू और 27 अगस्त को दोपहर 3:44 बजे समाप्त हो जाएगी। पंचांग के मुताबिक, गणेश जी की पूजा के लिए शुभ समय आज सुबह 11:05 बजे से लेकर दोपहर 1:40 बजे तक है।&nbsp;

चंद्रमा के दर्शन क्यों हैं वर्जित&nbsp;
गणेश चतुर्थी के दिन चांद देखना बिलकुल मना है। आपको बता दें कि ऐसा पौराणिक कथाओं में बताया गया है। एक बार चंद्रमा ने भगवान गणेश के पेट और सूंड का मजाक उड़ाया था, जिसकी वजह से भगवान गणेश को गुस्सा आया और चंद्र देव को श्राप दिया कि जो कोई भी गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा को देखेगा, उसे मिथ्या दोष (झूठा आरोप) का सामना करना पड़ेगा और साथ ही कलंकित भी होना पड़ेगा।&nbsp;

लोक कथाओं के मुताबिक, यह प्रथा को भगवान कृष्ण से भी जुड़ी हुई है, जिन पर मणि चोरी करने का गलत आरोप लगा था। नारद मुनि ने कहा था कि कृष्ण जी ने गलती से गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा को देख लिया था। इसके बाद उन पर यह झूठा आरोप लग गया था। इसलिए झूठे आरोपों से बचने के लिए लोग इस दिन चंद्रमा को देखने से बचते हैं।&nbsp;

कब ना देखें चंद्रमा
26 अगस्त को दोपहर 1:54 बजे से रात 8:29 बजे तक और 27 अगस्त को सुबह 9:28 बजे से रात 8:57 बजे तक चंद्रमा को ना देखें। इस समय के दौरान चंद्रमा को देखने से बचना चाहिए।&nbsp;

चतुर्थी पर चंद्रमा को देख लेने पर ये करें उपाय&nbsp;
अगर अनजाने में चंद्रमा को देख भी लिया, तो लोक कथाओं के अनुसार पारंपरिक उपाय के तौर पर यदि स्यमंतक मणि की कहानी सुन लिया जाए या पढ़ लिया जाए तो इसके गलत प्रभाव से बचा जा सकता है।&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस साल गणेश चतुर्थी आज बुधवार, 27 अगस्त को मनाई जा रही है। इस दिन लोग अपने घरों में गणपत्ति बप्पा लायेंगें और उनकी उपासना करेंगें। यह उत्सव 10 दिनों तक चलता है और यह 27 अगस्त से शुरू होकर 6 सितंबर, 2025 तक रहेगा। गणेश चतुर्थी 26 अगस्त को दोपहर 1:54 बजे शुरू और 27 अगस्त को दोपहर 3:44 बजे समाप्त हो जाएगी। पंचांग के मुताबिक, गणेश जी की पूजा के लिए शुभ समय आज सुबह 11:05 बजे से लेकर दोपहर 1:40 बजे तक है।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>चंद्रमा के दर्शन क्यों हैं वर्जित</strong>&nbsp;<br />
गणेश चतुर्थी के दिन चांद देखना बिलकुल मना है। आपको बता दें कि ऐसा पौराणिक कथाओं में बताया गया है। एक बार चंद्रमा ने भगवान गणेश के पेट और सूंड का मजाक उड़ाया था, जिसकी वजह से भगवान गणेश को गुस्सा आया और चंद्र देव को श्राप दिया कि जो कोई भी गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा को देखेगा, उसे मिथ्या दोष (झूठा आरोप) का सामना करना पड़ेगा और साथ ही कलंकित भी होना पड़ेगा।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">लोक कथाओं के मुताबिक, यह प्रथा को भगवान कृष्ण से भी जुड़ी हुई है, जिन पर मणि चोरी करने का गलत आरोप लगा था। नारद मुनि ने कहा था कि कृष्ण जी ने गलती से गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा को देख लिया था। इसके बाद उन पर यह झूठा आरोप लग गया था। इसलिए झूठे आरोपों से बचने के लिए लोग इस दिन चंद्रमा को देखने से बचते हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>कब ना देखें चंद्रमा</strong><br />
26 अगस्त को दोपहर 1:54 बजे से रात 8:29 बजे तक और 27 अगस्त को सुबह 9:28 बजे से रात 8:57 बजे तक चंद्रमा को ना देखें। इस समय के दौरान चंद्रमा को देखने से बचना चाहिए।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>चतुर्थी पर चंद्रमा को देख लेने पर ये करें उपाय&nbsp;</strong><br />
अगर अनजाने में चंद्रमा को देख भी लिया, तो लोक कथाओं के अनुसार पारंपरिक उपाय के तौर पर यदि स्यमंतक मणि की कहानी सुन लिया जाए या पढ़ लिया जाए तो इसके गलत प्रभाव से बचा जा सकता है।&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41305.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Do not see the moon even by mistake on Ganesh Chaturthi, what will happen if you see it?]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/national-news/religious/ganesh-chaturthi-2025-know-the-auspicious-time-for-establishment-and-worship]]></guid>
                       <title><![CDATA[गणेश चतुर्थी 2025, जानें स्थापना और पूजा का शुभ मुहूर्त]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/national-news/religious/ganesh-chaturthi-2025-know-the-auspicious-time-for-establishment-and-worship]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 26 Aug 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[इस वर्ष गणेश चतुर्थी 27 अगस्त को मनाई जाएगी। वहीं अनंत चतुर्दशी वाले दिन गणेश जी का विसर्जन होगा। यह पर्व पूरे भारत वर्ष में बड़े ही उत्साह और धूम धाम से मनाया जाता है। आपको बता दें कि भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर गणेश जी का जन्म हुआ था। इसीलिए भगवान गणेश के जन्म दिन को ही गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी को एक उत्सव के रूप में 10 दिनों तक मनाया जाता है जो गणेश चतुर्थी से प्रारम्भ होकर अनंत चतुर्दशी के दिन ख़त्म होता है। इस चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा पुरे विधि-विधान से की जाती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। इसीलिए मध्याह्न काल को भगवान गणेश की पूजा के लिए उत्तम समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने घरों, दुकानों और मंदिरों में बप्पा को (गणपति जी कि प्रतिमा) अपने घर लाते हैं और 10 दिनों तक इनकी पूजा करते हैं और अनंत चतुर्दशी के दिन बप्पा को विदा कर देते हैं।

स्थापना शुभ मुहूर्त
ज्योतिषियों के अनुसार भगवान गणेश की मूर्ति स्थापना के लिए 27 अगस्त को सुबह 11:05 am से लेकर दोपहर 1:40 pm तक का शुभ मुहूर्त रहेगा।&nbsp;

पूजा का शुभ मुहूर्त
27 अगस्त को सुबह 11:05 am से लेकर दोपहर 1:40 pm तक का शुभ मुहूर्त रहेगा। इस बार भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी की शुरुआत 26 अगस्त को दोपहर 1:54 pm पर और इसका समापन 27 अगस्त की दोपहर 3:44 pm पर हो रहा है। इसीलिए इस बार गणेश चतुर्थी 27 अगस्त को मनाई जाएगी। 27 अगस्त को सूर्योदय से पहले स्नान करके गणेश जी का व्रत रखें ।&nbsp;

चतुर्थी पर कई दुर्लभ संयोग&nbsp;
इस वर्ष गणेश चतुर्थी पर प्रीति, सर्वार्थ सिद्धि और रवि के साथ इंद्र-ब्रह्म योग का संयोग भी बना रहेगा। वहीं कर्क में बुध और शुक्र के होने से लक्ष्मी नारायण योग भी रहेगा और साथ ही बुधवार का महासंयोग तिथि की महत्ता को भी कई गुना बढ़ा रहा है।

पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान करके पूजा स्थल की साफ सफाई करलें। उसके बाद गणेश जी की विधि विधान के साथ पूजा करें।&nbsp; पूजा के लिए शुभ मुहूर्त के समय ईशान कोण में चौकी को स्थापित करके पीला या लाल रंग का कपड़ा चौकी पर बिछा दें और फिर भगवान गणेश को चौकी पर स्थापित कर दें। अब रोज गणेश जी की उपासना करें। अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान गणेश को विदा कर दें।&nbsp;

गणेश चतुर्थी भोग
लड्डू और मोदक - पुराणों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि गणेश जी को लड्डू और मोदक बहुत ही पसंद होते हैं। इसीलिए आप बेसन या बूंदी से बने लड्डू या मोदक का भी भोग लगा सकते हैं।

गणेश चतुर्थी का महत्व
गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा करने से घर परिवार में सुख-समृद्धि आती है और सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है। ऐसी मान्यता है कि गणेश जी हमारे सभी विघ्नों को हर लेते हैं और इस तरह सभी बिगड़े काम भी बनने लगते हैं।&nbsp;

&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">इस वर्ष गणेश चतुर्थी 27 अगस्त को मनाई जाएगी। वहीं अनंत चतुर्दशी वाले दिन गणेश जी का विसर्जन होगा। यह पर्व पूरे भारत वर्ष में बड़े ही उत्साह और धूम धाम से मनाया जाता है। आपको बता दें कि भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर गणेश जी का जन्म हुआ था। इसीलिए भगवान गणेश के जन्म दिन को ही गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी को एक उत्सव के रूप में 10 दिनों तक मनाया जाता है जो गणेश चतुर्थी से प्रारम्भ होकर अनंत चतुर्दशी के दिन ख़त्म होता है। इस चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा पुरे विधि-विधान से की जाती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। इसीलिए मध्याह्न काल को भगवान गणेश की पूजा के लिए उत्तम समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने घरों, दुकानों और मंदिरों में बप्पा को (गणपति जी कि प्रतिमा) अपने घर लाते हैं और 10 दिनों तक इनकी पूजा करते हैं और अनंत चतुर्दशी के दिन बप्पा को विदा कर देते हैं।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>स्थापना शुभ मुहूर्त</strong><br />
ज्योतिषियों के अनुसार भगवान गणेश की मूर्ति स्थापना के लिए 27 अगस्त को सुबह 11:05 am से लेकर दोपहर 1:40 pm तक का शुभ मुहूर्त रहेगा।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>पूजा का शुभ मुहूर्त</strong><br />
27 अगस्त को सुबह 11:05 am से लेकर दोपहर 1:40 pm तक का शुभ मुहूर्त रहेगा। इस बार भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी की शुरुआत 26 अगस्त को दोपहर 1:54 pm पर और इसका समापन 27 अगस्त की दोपहर 3:44 pm पर हो रहा है। इसीलिए इस बार गणेश चतुर्थी 27 अगस्त को मनाई जाएगी। 27 अगस्त को सूर्योदय से पहले स्नान करके गणेश जी का व्रत रखें ।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>चतुर्थी पर कई दुर्लभ संयोग&nbsp;</strong><br />
इस वर्ष गणेश चतुर्थी पर प्रीति, सर्वार्थ सिद्धि और रवि के साथ इंद्र-ब्रह्म योग का संयोग भी बना रहेगा। वहीं कर्क में बुध और शुक्र के होने से लक्ष्मी नारायण योग भी रहेगा और साथ ही बुधवार का महासंयोग तिथि की महत्ता को भी कई गुना बढ़ा रहा है।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>पूजा विधि</strong><br />
सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान करके पूजा स्थल की साफ सफाई करलें। उसके बाद गणेश जी की विधि विधान के साथ पूजा करें।&nbsp; पूजा के लिए शुभ मुहूर्त के समय ईशान कोण में चौकी को स्थापित करके पीला या लाल रंग का कपड़ा चौकी पर बिछा दें और फिर भगवान गणेश को चौकी पर स्थापित कर दें। अब रोज गणेश जी की उपासना करें। अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान गणेश को विदा कर दें।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>गणेश चतुर्थी भोग</strong><br />
लड्डू और मोदक - पुराणों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि गणेश जी को लड्डू और मोदक बहुत ही पसंद होते हैं। इसीलिए आप बेसन या बूंदी से बने लड्डू या मोदक का भी भोग लगा सकते हैं।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>गणेश चतुर्थी का महत्व</strong><br />
गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा करने से घर परिवार में सुख-समृद्धि आती है और सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है। ऐसी मान्यता है कि गणेश जी हमारे सभी विघ्नों को हर लेते हैं और इस तरह सभी बिगड़े काम भी बनने लगते हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41297.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[Ganesh Chaturthi 2025, know the auspicious time for establishment and worship]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/15th-or-16th-august-know-which-day-is-janmashtami-and-auspicious-time-for-puja]]></guid>
                       <title><![CDATA[15 या 16 अगस्त, जानें किस दिन है जन्माष्टमी और पूजा का शुभ मुहूर्त ]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/astrology/first-blessing/news/15th-or-16th-august-know-which-day-is-janmashtami-and-auspicious-time-for-puja]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 12 Aug 2025 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[देश में हर जगह जन्माष्टमी को बड़े ही हर्षोउल्लाष के साथ मनाया जाता है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में रात 12 बजे हुआ था। इस दिन को भगवान कृष्ण के बाल्यावस्था को याद और उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन लोग पूरी भक्ति से व्रत रख कर भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं और साथ ही इस दिन झांकियां, भजन-कीर्तन और रासलीला भी प्रस्तुत की जाती हैं।&nbsp;

जन्माष्टमी की तारीख को लेकर लोगों में भ्रम
माना जाता है कि श्री हरि के 8वें अवतार श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में होने के कारण जन्माष्टमी का यह त्यौहार अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग पर मनाया जाता है। इस साल अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का जो संयोग है वो दो अलग-अलग दिनों में पड़ रहा है, जिसके चलते इसबार दो दिन जन्माष्टमी मनाई जाएगी। इसीलिए इस बार जन्माष्टमी को लेकर लोगों में काफी भ्रम हो रहा है कि किस दिन को जन्माष्टमी मनाया जाए ।&nbsp;

शुभ मुहूर्त
पंचांग के मुताबिक, कृष्ण जन्माष्टमी 15 अगस्त अष्टमी को रात 11 बजकर 49 मिनट पर शुरू होगी वहीं इसका समापन 16 अगस्त रात 9 बजकर 34 मिनट पर होगा।&nbsp;

पूजा विधि
इस दिन भक्त पूरी श्रद्धा से भगवान श्री कृष्ण की पूजा करते हैं। व्रत के दौरान कोई भी अनाज ग्रहन नहीं किया जाता है। पारण के समय साधारणतः फल या सिंघाड़े के आटे से बने पकवान खाए जाने की परंपरा है।&nbsp;&nbsp;

एक सुंदर सी पालने को सजाकर उसमें बाल गोपाल को विराजमान करें। दूध, दही, घी, शहद, और गंगाजल को मिलाकर पंचामृत बनायें और उससे बाल गोपाल को स्नान कराएं। इसके बाद नए वस्त्र पहनाकर उनका शृंगार करें। फल, मिठाई, खीर, माखन-मिश्री और पंचामृत से भोग लगाएं। मंत्रों का जाप करते हुए विधि-विधान से उनकी पूजा करें और आरती कर पूजा का समापन करें। मध्यरात्रि पूजा और आरती करने के बाद प्रसाद ग्रहन करके व्रत खोल लें। इस पर्व पर ज्यादा से ज्यादा दान-पुण्य भी करें।

जन्माष्टमी का महत्व&nbsp;
जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का ही केवल त्यौहार नहीं है, बल्कि यह उनके द्वारा दिए गए उपदेशों को याद करने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का भी है। द्वापर युग में जब भगवान कृष्ण ने अवतार लिया, तब उन्होंने&nbsp; धर्म की स्थापना की। उनके द्वारा अर्जुन को महाभारत के युद्धभूमि में सुनाए गए गीता के उपदेश, आज भी उतना ही प्रासंगिक हैं जितना तब था।

गीता का मूल संदेश&nbsp;
श्रीमद्भगवद्गीता में जीवन के हर कठिनाईयों और परेशानियों से निपटने का मार्गदर्शन दिया गया है। यदि गीता के संदेशों को जीवन में उतार लिया जाए, तो हम किसी भी प्रकार की कठिनाई, निराशा और असफलता से प्रभावित नहीं होंगे। गीता में बताया गया है कि हमें सिर्फ अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए और फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। इससे हम चिंता मुक्त बने रहेगें।&nbsp;&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">देश में हर जगह जन्माष्टमी को बड़े ही हर्षोउल्लाष के साथ मनाया जाता है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में रात 12 बजे हुआ था। इस दिन को भगवान कृष्ण के बाल्यावस्था को याद और उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन लोग पूरी भक्ति से व्रत रख कर भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं और साथ ही इस दिन झांकियां, भजन-कीर्तन और रासलीला भी प्रस्तुत की जाती हैं।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>जन्माष्टमी की तारीख को लेकर लोगों में भ्रम</strong><br />
माना जाता है कि श्री हरि के 8वें अवतार श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में होने के कारण जन्माष्टमी का यह त्यौहार अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग पर मनाया जाता है। इस साल अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का जो संयोग है वो दो अलग-अलग दिनों में पड़ रहा है, जिसके चलते इसबार दो दिन जन्माष्टमी मनाई जाएगी। इसीलिए इस बार जन्माष्टमी को लेकर लोगों में काफी भ्रम हो रहा है कि किस दिन को जन्माष्टमी मनाया जाए ।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>शुभ मुहूर्त</strong><br />
पंचांग के मुताबिक, कृष्ण जन्माष्टमी 15 अगस्त अष्टमी को रात 11 बजकर 49 मिनट पर शुरू होगी वहीं इसका समापन 16 अगस्त रात 9 बजकर 34 मिनट पर होगा।&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>पूजा विधि</strong><br />
इस दिन भक्त पूरी श्रद्धा से भगवान श्री कृष्ण की पूजा करते हैं। व्रत के दौरान कोई भी अनाज ग्रहन नहीं किया जाता है। पारण के समय साधारणतः फल या सिंघाड़े के आटे से बने पकवान खाए जाने की परंपरा है।&nbsp;&nbsp;</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;">एक सुंदर सी पालने को सजाकर उसमें बाल गोपाल को विराजमान करें। दूध, दही, घी, शहद, और गंगाजल को मिलाकर पंचामृत बनायें और उससे बाल गोपाल को स्नान कराएं। इसके बाद नए वस्त्र पहनाकर उनका शृंगार करें। फल, मिठाई, खीर, माखन-मिश्री और पंचामृत से भोग लगाएं। मंत्रों का जाप करते हुए विधि-विधान से उनकी पूजा करें और आरती कर पूजा का समापन करें। मध्यरात्रि पूजा और आरती करने के बाद प्रसाद ग्रहन करके व्रत खोल लें। इस पर्व पर ज्यादा से ज्यादा दान-पुण्य भी करें।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>जन्माष्टमी का महत्व</strong>&nbsp;<br />
जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का ही केवल त्यौहार नहीं है, बल्कि यह उनके द्वारा दिए गए उपदेशों को याद करने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का भी है। द्वापर युग में जब भगवान कृष्ण ने अवतार लिया, तब उन्होंने&nbsp; धर्म की स्थापना की। उनके द्वारा अर्जुन को महाभारत के युद्धभूमि में सुनाए गए गीता के उपदेश, आज भी उतना ही प्रासंगिक हैं जितना तब था।</span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong>गीता का मूल संदेश&nbsp;</strong><br />
श्रीमद्भगवद्गीता में जीवन के हर कठिनाईयों और परेशानियों से निपटने का मार्गदर्शन दिया गया है। यदि गीता के संदेशों को जीवन में उतार लिया जाए, तो हम किसी भी प्रकार की कठिनाई, निराशा और असफलता से प्रभावित नहीं होंगे। गीता में बताया गया है कि हमें सिर्फ अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए और फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। इससे हम चिंता मुक्त बने रहेगें।&nbsp;&nbsp;</span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall41166.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[15th or 16th August, know which day is Janmashtami and auspicious time for Puja]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/neem-karori-baba]]></guid>
                       <title><![CDATA[स्टीव जॉब्स से विराट कोहली तक, नीम करोली बाबा के आश्रम में सब नतमस्तक]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/neem-karori-baba]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sun, 07 Jan 2024 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;





	नीम करोली बाबा के आश्रम में स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग को मिली आध्यात्मिक शान्ति


भारत में कई ऐसे पावन तीर्थ हैं, जहां पर श्रद्धा एवं भक्ति के साथ जाने मात्र से व्यक्ति के समस्त मनोरथ पूरे हो जाते हैं। ऐसा ही एक पावन तीर्थ देवभूमि उत्तराखंड की वादियों में है, जिसे लोग &#39;कैंची धाम&#39; के नाम से जानते हैं। कैंची धाम के नीब करौरी बाबा (नीम करौली) की ख्याति विश्वभर में है। नैनीताल से लगभग 65 किलोमीटर दूर कैंची धाम को लेकर मान्यता है कि यहां आने वाला व्यक्ति कभी भी खाली हाथ वापस नहीं लौटता। यहां पर हर मन्नत पूर्णतया फलदायी होती है। यही कारण है कि देश-विदेश से हज़ारों लोग यहां हनुमान जी का आशीर्वाद लेने आते हैं। बाबा के भक्तों में एक आम आदमी से लेकर अरबपति-खरबपति तक शामिल हैं। बाबा के इस पावन धाम में होने वाले नित-नये चमत्कारों को सुनकर दुनिया के कोने-कोने से लोग यहां पर खिंचे चले आते हैं। बाबा के भक्त और जाने-माने लेखक रिचर्ड अल्बर्ट ने मिरेकल आफ लव नाम से बाबा पर पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक में बाबा नीब करौरी के चमत्कारों का विस्तार से वर्णन है। इनके अलावा हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया राबर्ट्स, एप्पल के फाउंडर स्टीव जाब्स और फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग जैसी बड़ी विदेशी हस्तियां बाबा के भक्त हैं। &nbsp;कुछ माह पूर्व स्टार क्रिकेटर विराट कोहली और उनकी पत्नी और अभिनेत्री अनुष्का शर्मा के यहां पहुंचते ही इस धाम को देखने और बाबा के दर्शन करने वालों की होड़ सी लग गई।

1964 में बाबा ने की थी आश्रम की स्थापना&nbsp;
नीम करोली बाबा या नीब करोली बाबा की गणना बीसवीं शताब्दी के सबसे महान संतों में की जाती है। इनका जन्म स्थान ग्राम अकबरपुर जिला फ़िरोज़ाबाद उत्तर प्रदेश में हुआ था। कैंची, नैनीताल, भुवाली से 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बाबा नीब करौरी ने इस आश्रम की स्थापना 1964 में की थी। बाबा नीम करौरी 1961 में पहली बार यहां आए और उन्होंने अपने पुराने मित्र पूर्णानंद जी के साथ मिल कर यहां आश्रम बनाने का विचार किया। इस धाम को कैंची मंदिर, नीम करौली धाम और नीम करौली आश्रम के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड में हिमालय की तलहटी में बसा एक छोटा सा आश्रम है नीम करोली बाबा आश्रम। मंदिर के आंगन और चारों ओर से साफ सुथरे कमरों में रसीली हरियाली के साथ, आश्रम एक शांत और एकांत विश्राम के लिए एकदम सही जगह प्रस्तुत करता है। यहाँ कोई टेलीफोन लाइनें नहीं हैं, इसलिए किसी को बाहरी दुनिया से परेशान नहीं किया जा सकता है।&nbsp;श्री हनुमान जी के अवतार माने जाने वाले नीम करोरी बाबा के इस पावन धाम पर पूरे साल श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन हर साल 15 जून को यहां पर एक विशाल मेले व भंडारे का आयोजन होता है। यहां इस दिन इस पावन धाम में स्थापना दिवस मनाया जाता है।

कई चमत्कारों के किस्से सुन खींचे आते है भक्त&nbsp;
मान्यता है कि बाबा नीम करौरी को हनुमान जी की उपासना से अनेक चामत्कारिक सिद्धियां प्राप्त थीं। लोग उन्हें हनुमान जी का अवतार भी मानते हैं। हालांकि वह आडंबरों से दूर रहते थे। न तो उनके माथे पर तिलक होता था और न ही गले में कंठी माला। एक आम आदमी की तरह जीवन जीने वाले बाबा अपना पैर किसी को नहीं छूने देते थे। यदि कोई छूने की कोशिश करता तो वह उसे श्री हनुमान जी के पैर छूने को कहते थे। बाबा नीब करौरी के इस पावन धाम को लेकर तमाम तरह के चमत्कार जुड़े हैं। जनश्रुतियों के अनुसार, एक बार भंडारे के दौरान कैंची धाम में घी की कमी पड़ गई थी। बाबा जी के आदेश पर नीचे बहती नदी से कनस्तर में जल भरकर लाया गया। उसे प्रसाद बनाने हेतु जब उपयोग में लाया गया तो वह जल घी में बदल गया। ऐसे ही एक बार बाबा नीब करौरी महाराज ने अपने भक्त को गर्मी की तपती धूप में बचाने के लिए उसे बादल की छतरी बनाकर, उसे उसकी मंजिल तक पहुंचवाया। ऐसे न जाने कितने किस्से बाबा और उनके पावन धाम से जुड़े हुए हैं, जिन्हें सुनकर लोग यहां पर खिंचे चले आते हैं।

बाबा के दुनियाभर में 108 आश्रम&nbsp;
बाबा नीब करौरी को कैंची धाम बहुत प्रिय था। अक्सर गर्मियों में वे यहीं आकर रहते थे। बाबा के भक्तों ने इस स्थान पर हनुमान का भव्य मन्दिर बनवाया। उस मन्दिर में हनुमान की मूर्ति के साथ-साथ अन्य देवताओं की मूर्तियाँ भी हैं। यहां बाबा नीब करौरी की भी एक भव्य मूर्ति स्थापित की गयी है। बाबा नीब करौरी महाराज के देश-दुनिया में 108 आश्रम हैं। इन आश्रमों में सबसे बड़ा कैंची धाम तथा अमेरिका के न्यू मैक्सिको सिटी स्थित टाउस आश्रम है।

स्टीव जॉब्स को आश्रम से मिला एप्पल के लोगो का आईडिया !
भारत की धरती सदा से ही अध्यात्म के खोजियों को अपनी ओर खींचती रही है। दुनिया की कई बड़ी हस्तियों में भारत भूमि पर ही अपना सच्चा आध्यात्मिक गुरु पाया है। एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स 1974 से 1976 के बीच भारत भ्रमण पर निकले। वह पर्यटन के मकसद से भारत नहीं आए थे, बल्कि आध्यात्मिक खोज में यहां आए थे। उन्हें एक सच्चे गुरु की तलाश थी।स्टीव पहले हरिद्वार पहुंचे और इसके बाद वह कैंची धाम तक पहुंच गए। यहां पहुंचकर उन्हें पता लगा कि बाबा समाधि ले चुके हैं। कहते है कि स्टीव को एप्पल के लोगो का आइडिया बाबा के आश्रम से ही मिला था। नीम करौली बाबा को कथित तौर पर सेब बहुत पसंद थे और यही वजह थी कि स्टीव ने अपनी कंपनी के लोगों के लिए कटे हुए एप्पल को चुना। हालांकि इस कहानी की सत्यता के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है।

जुकरबर्ग को मिली आध्यात्मिक शांति, शीर्ष पर पहुंचा फेसबुक&nbsp;
बाबा से जुड़ा एक किस्सा फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने 27 सितंबर 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बताया था, तब पीएम मोदी फेसबुक के मुख्यालय में गए थे। इस दौरान जुकरबर्ग ने पीएम को भारत भ्रमण की बात बताई। उन्होंने कहा कि जब वे इस संशय में थे कि फेसबुक को बेचा जाए या नहीं, तब एप्पल के फाउंडर स्टीव जॉब्स ने इन्हें भारत में नीम करोली बाबा के स्थान पर &nbsp;जाने की सलाह दी थी। जुकरबर्ग ने बताया था कि वे एक महीना भारत में रहे। इस दौरान वह नीम करोली बाबा के मंदिर में भी गए थे। जुकरबर्ग आए तो यहां एक दिन के लिए थे, लेकिन मौसम खराब हो जाने के कारण वह यहां दो दिन रुके थे। जुकरबर्ग मानते हैं कि भारत में मिली अध्यात्मिक शांति के बाद उन्हें फेसबुक को नए मुकाम पर ले जाने की ऊर्जा मिली।

बाबा की तस्वीर को देख जूलिया ने अपनाया हिन्दू धर्म&nbsp;
हॉलिवुड की मशहूर अदाकारा जूलिया रॉबर्ट्स ने 2009 में हिंदू धर्म अपना लिया था। वह फिल्म &lsquo;ईट, प्रे, लव&rsquo; की शूटिंग के लिए भारत आईं थीं। जूलिया रॉबर्ट्स ने एक इंटरव्यू में यह खुलासा किया था कि वह नीम करौली बाबा की तस्वीर से इतना प्रभावित हुई थीं कि उन्होंने हिन्दू धर्म अपनाने का फैसला कर डाला। जूलिया इन दिनों हिन्दू धर्म का पालन कर रही हैं।

&nbsp;


&nbsp;


]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<div class="gmail_attr" dir="ltr" style="text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div dir="ltr">
<div class="gmail_quote">
<div dir="ltr">
<ul>
	<li style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">नीम करोली बाबा के आश्रम में स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग को मिली आध्यात्मिक शान्ति</span></strong></span></li>
</ul>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">भारत में कई ऐसे पावन तीर्थ हैं, जहां पर श्रद्धा एवं भक्ति के साथ जाने मात्र से व्यक्ति के समस्त मनोरथ पूरे हो जाते हैं। ऐसा ही एक पावन तीर्थ देवभूमि उत्तराखंड की वादियों में है, जिसे लोग &#39;कैंची धाम&#39; के नाम से जानते हैं। कैंची धाम के नीब करौरी बाबा (नीम करौली) की ख्याति विश्वभर में है। नैनीताल से लगभग 65 किलोमीटर दूर कैंची धाम को लेकर मान्यता है कि यहां आने वाला व्यक्ति कभी भी खाली हाथ वापस नहीं लौटता। यहां पर हर मन्नत पूर्णतया फलदायी होती है। यही कारण है कि देश-विदेश से हज़ारों लोग यहां हनुमान जी का आशीर्वाद लेने आते हैं। बाबा के भक्तों में एक आम आदमी से लेकर अरबपति-खरबपति तक शामिल हैं। बाबा के इस पावन धाम में होने वाले नित-नये चमत्कारों को सुनकर दुनिया के कोने-कोने से लोग यहां पर खिंचे चले आते हैं। बाबा के भक्त और जाने-माने लेखक रिचर्ड अल्बर्ट ने मिरेकल आफ लव नाम से बाबा पर पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक में बाबा नीब करौरी के चमत्कारों का विस्तार से वर्णन है। इनके अलावा हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया राबर्ट्स, एप्पल के फाउंडर स्टीव जाब्स और फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग जैसी बड़ी विदेशी हस्तियां बाबा के भक्त हैं। &nbsp;कुछ माह पूर्व स्टार क्रिकेटर विराट कोहली और उनकी पत्नी और अभिनेत्री अनुष्का शर्मा के यहां पहुंचते ही इस धाम को देखने और बाबा के दर्शन करने वालों की होड़ सी लग गई।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color:#800000;"><strong><span style="font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">1964 में बाबा ने की थी आश्रम की स्थापना&nbsp;</span></strong></span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">नीम करोली बाबा या नीब करोली बाबा की गणना बीसवीं शताब्दी के सबसे महान संतों में की जाती है। इनका जन्म स्थान ग्राम अकबरपुर जिला फ़िरोज़ाबाद उत्तर प्रदेश में हुआ था। कैंची, नैनीताल, भुवाली से 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बाबा नीब करौरी ने इस आश्रम की स्थापना 1964 में की थी। बाबा नीम करौरी 1961 में पहली बार यहां आए और उन्होंने अपने पुराने मित्र पूर्णानंद जी के साथ मिल कर यहां आश्रम बनाने का विचार किया। इस धाम को कैंची मंदिर, नीम करौली धाम और नीम करौली आश्रम के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड में हिमालय की तलहटी में बसा एक छोटा सा आश्रम है नीम करोली बाबा आश्रम। मंदिर के आंगन और चारों ओर से साफ सुथरे कमरों में रसीली हरियाली के साथ, आश्रम एक शांत और एकांत विश्राम के लिए एकदम सही जगह प्रस्तुत करता है। यहाँ कोई टेलीफोन लाइनें नहीं हैं, इसलिए किसी को बाहरी दुनिया से परेशान नहीं किया जा सकता है।&nbsp;</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">श्री हनुमान जी के अवतार माने जाने वाले नीम करोरी बाबा के इस पावन धाम पर पूरे साल श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन हर साल 15 जून को यहां पर एक विशाल मेले व भंडारे का आयोजन होता है। यहां इस दिन इस पावन धाम में स्थापना दिवस मनाया जाता है।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color:#800000;"><strong><span style="font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">कई चमत्कारों के किस्से सुन खींचे आते है भक्त&nbsp;</span></strong></span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">मान्यता है कि बाबा नीम करौरी को हनुमान जी की उपासना से अनेक चामत्कारिक सिद्धियां प्राप्त थीं। लोग उन्हें हनुमान जी का अवतार भी मानते हैं। हालांकि वह आडंबरों से दूर रहते थे। न तो उनके माथे पर तिलक होता था और न ही गले में कंठी माला। एक आम आदमी की तरह जीवन जीने वाले बाबा अपना पैर किसी को नहीं छूने देते थे। यदि कोई छूने की कोशिश करता तो वह उसे श्री हनुमान जी के पैर छूने को कहते थे। बाबा नीब करौरी के इस पावन धाम को लेकर तमाम तरह के चमत्कार जुड़े हैं। जनश्रुतियों के अनुसार, एक बार भंडारे के दौरान कैंची धाम में घी की कमी पड़ गई थी। बाबा जी के आदेश पर नीचे बहती नदी से कनस्तर में जल भरकर लाया गया। उसे प्रसाद बनाने हेतु जब उपयोग में लाया गया तो वह जल घी में बदल गया। ऐसे ही एक बार बाबा नीब करौरी महाराज ने अपने भक्त को गर्मी की तपती धूप में बचाने के लिए उसे बादल की छतरी बनाकर, उसे उसकी मंजिल तक पहुंचवाया। ऐसे न जाने कितने किस्से बाबा और उनके पावन धाम से जुड़े हुए हैं, जिन्हें सुनकर लोग यहां पर खिंचे चले आते हैं।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color:#800000;"><strong><span style="font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">बाबा के दुनियाभर में 108 आश्रम&nbsp;</span></strong></span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">बाबा नीब करौरी को कैंची धाम बहुत प्रिय था। अक्सर गर्मियों में वे यहीं आकर रहते थे। बाबा के भक्तों ने इस स्थान पर हनुमान का भव्य मन्दिर बनवाया। उस मन्दिर में हनुमान की मूर्ति के साथ-साथ अन्य देवताओं की मूर्तियाँ भी हैं। यहां बाबा नीब करौरी की भी एक भव्य मूर्ति स्थापित की गयी है। बाबा नीब करौरी महाराज के देश-दुनिया में 108 आश्रम हैं। इन आश्रमों में सबसे बड़ा कैंची धाम तथा अमेरिका के न्यू मैक्सिको सिटी स्थित टाउस आश्रम है।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color:#800000;"><strong><span style="font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">स्टीव जॉब्स को आश्रम से मिला एप्पल के लोगो का आईडिया !</span></strong></span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">भारत की धरती सदा से ही अध्यात्म के खोजियों को अपनी ओर खींचती रही है। दुनिया की कई बड़ी हस्तियों में भारत भूमि पर ही अपना सच्चा आध्यात्मिक गुरु पाया है। एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स 1974 से 1976 के बीच भारत भ्रमण पर निकले। वह पर्यटन के मकसद से भारत नहीं आए थे, बल्कि आध्यात्मिक खोज में यहां आए थे। उन्हें एक सच्चे गुरु की तलाश थी।स्टीव पहले हरिद्वार पहुंचे और इसके बाद वह कैंची धाम तक पहुंच गए। यहां पहुंचकर उन्हें पता लगा कि बाबा समाधि ले चुके हैं। कहते है कि स्टीव को एप्पल के लोगो का आइडिया बाबा के आश्रम से ही मिला था। नीम करौली बाबा को कथित तौर पर सेब बहुत पसंद थे और यही वजह थी कि स्टीव ने अपनी कंपनी के लोगों के लिए कटे हुए एप्पल को चुना। हालांकि इस कहानी की सत्यता के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<strong><span style="color:#800000;"><span style="font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">जुकरबर्ग को मिली आध्यात्मिक शांति, शीर्ष पर पहुंचा फेसबुक&nbsp;</span></span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">बाबा से जुड़ा एक किस्सा फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने 27 सितंबर 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बताया था, तब पीएम मोदी फेसबुक के मुख्यालय में गए थे। इस दौरान जुकरबर्ग ने पीएम को भारत भ्रमण की बात बताई। उन्होंने कहा कि जब वे इस संशय में थे कि फेसबुक को बेचा जाए या नहीं, तब एप्पल के फाउंडर स्टीव जॉब्स ने इन्हें भारत में नीम करोली बाबा के स्थान पर &nbsp;जाने की सलाह दी थी। जुकरबर्ग ने बताया था कि वे एक महीना भारत में रहे। इस दौरान वह नीम करोली बाबा के मंदिर में भी गए थे। जुकरबर्ग आए तो यहां एक दिन के लिए थे, लेकिन मौसम खराब हो जाने के कारण वह यहां दो दिन रुके थे। जुकरबर्ग मानते हैं कि भारत में मिली अध्यात्मिक शांति के बाद उन्हें फेसबुक को नए मुकाम पर ले जाने की ऊर्जा मिली।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color:#800000;"><strong><span style="font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">बाबा की तस्वीर को देख जूलिया ने अपनाया हिन्दू धर्म&nbsp;</span></strong></span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">हॉलिवुड की मशहूर अदाकारा जूलिया रॉबर्ट्स ने 2009 में हिंदू धर्म अपना लिया था। वह फिल्म &lsquo;ईट, प्रे, लव&rsquo; की शूटिंग के लिए भारत आईं थीं। जूलिया रॉबर्ट्स ने एक इंटरव्यू में यह खुलासा किया था कि वह नीम करौली बाबा की तस्वीर से इतना प्रभावित हुई थीं कि उन्होंने हिन्दू धर्म अपनाने का फैसला कर डाला। जूलिया इन दिनों हिन्दू धर्म का पालन कर रही हैं।</span></span></p>

<div class="yj6qo" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255); text-align: justify;">&nbsp;</div>
</div>

<div>&nbsp;</div>
</div>
</div>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall34426.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[NEEM-KARORI-BABA]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/sudama-temple-in-porbandar]]></guid>
                       <title><![CDATA[पोरबंदर में है सुदामा को समर्पित दुनिया का एकमात्र मंदिर]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/sudama-temple-in-porbandar]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 25 Nov 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
&nbsp; &nbsp; गुजरात के पोरबंदर में भगवान श्री कृष्ण के मित्र सुदामा को समर्पित दुनिया का एक मात्र मंदिर है। सुदामा ने आजीवन दरिद्रता में सात्विक जीवन जीया और ईश्वर से अखंड मित्रता भी निभाई। पोरबंदर सुदामा का जन्म स्थान है। &nbsp;वहां सोमाशर्मा नामक भृगुवंशी के घर सुदामा का जन्म हुआ था। कहते है &nbsp;सुदामा के पिता ने उन्हें बचपन में मध्य प्रदेश के उज्जैन में सांदीपनि ऋषि के आश्रम में पढ़ने के लिए भेज दिया था। भगवान कृष्ण और अपने बड़े भाई बलराम भी गोकुल से मध्य प्रदेश के उज्जैन में सांदीपनि आश्रम में पढ़ने के लिए आए थे। आश्रम में ही कृष्ण और सुदामा एक दूसरे से पहली बार मिले और दोनों में जल्द ही गहरी मित्रता हो गई। हालांकि, आश्रम की शिक्षा पूरी होने के बाद श्रीकृष्ण&nbsp;और सुदामा दोनों अपने-अपने घर चले गए।

&nbsp; &nbsp;शिक्षा पूरी होने के बाद सुदामा ने कई सालों के बाद शादी कर ली और अपना जीवनयापन करने लगे। उनका जीवन दरिद्रता में कट रहा था, जबकि श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बन गए थे। तब सुदामा की पत्नी ने आग्रह किया कि आप अपने मित्र श्रीकृष्ण के पास जाएं और मदद मांगें, लेकिन सुदामा ने कहा कि, मैं कृष्ण के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहता। तब उनकी पत्नी ने श्रीकृष्ण को भेंट देने के लिए चावल दिया। जब सुदामा द्वारका पहुंचे, तो उनका नाम सुनते ही श्रीकृष्ण उनका स्वागत करने के लिए महल के बाहर तक दौड़े चले आए और उन्हें गले से लगा लिया।
&nbsp; सुदामा को शर्म आ रही थी कि एक राजा को चावल कैसे भेंट दूं। वह चावल को श्रीकृष्ण से छिपाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कृष्ण ने सुदामा से चावल छीनकर उसे खाने लगे. इसके साथ ही श्रीकृष्ण ने अपनी मित्रता निभाते हुए सुदामा की गरीबी को दूर किया और झोपड़ी को महल में बदल दिया।
&nbsp; &nbsp;सुदामा मंदिर पोरबंदर शहर के केंद्र में 1902 से 1907 के बीच बनाया गया। कहा जाता है कि 13वीं शताब्दी में यहां सुदामा का एक छोटा मंदिर था। फिर वर्ष 1903 में पोरबंदर के महाराजा भावसिंहजी ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और छोटे मंदिर के स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान सौराष्ट्र ड्रामा कंपनी ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था। यहां आने वाले तीर्थयात्री &nbsp;सुदामा मंदिर जाने पर अपने कपड़ों पर ठप्पा लगाते है, क्योंकि यह कहा जाता है कि कोई भी तीर्थयात्रा सुदामापुरी जाने पर ही यात्रा पूरी होती है।
&nbsp; &nbsp; &nbsp;सुदामा मंदिर के बीच में सुदामा की एक मनमोहक मूर्ति है, जिसके दाहिनी ओर उनकी धर्मपत्नी सुशीलाजी की मूर्ति है और बाईं ओर राधा-कृष्ण की मूर्ति है। परंपरा के अनुसार, हर वर्ष सुदामा अन्नकूट उत्सव को नए साल के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। साथ ही अखातीज के दिन सुदामा मंदिर में एक भव्य उत्सव मनाया जाता है जिसमें हजारों भक्त शामिल होते हैं।




पोरबंदर का दूसरा नाम सुदामापुरी है
सुदामा का द्वारका में आगमन और अस्मावती तट पर बसे इस छोटे से शहर में एक समृद्ध &lsquo;सुदामापुरी&rsquo; बनी रही। हालांकि, इस जगह का पहला लिखित प्रमाण पोरबंदर के पास घुमली के एक दान पत्र में है, जो एक हजार साल पुराना है। पोरबंदर के मानसरोवर कुंड के शिलालेख में भी इसके बारे में साक्ष्य मिला है।
&nbsp;


&nbsp;

&nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; &nbsp; गुजरात के पोरबंदर में भगवान श्री कृष्ण के मित्र सुदामा को समर्पित दुनिया का एक मात्र मंदिर है। सुदामा ने आजीवन दरिद्रता में सात्विक जीवन जीया और ईश्वर से अखंड मित्रता भी निभाई। पोरबंदर सुदामा का जन्म स्थान है। &nbsp;वहां सोमाशर्मा नामक भृगुवंशी के घर सुदामा का जन्म हुआ था। कहते है &nbsp;सुदामा के पिता ने उन्हें बचपन में मध्य प्रदेश के उज्जैन में सांदीपनि ऋषि के आश्रम में पढ़ने के लिए भेज दिया था। भगवान कृष्ण और अपने बड़े भाई बलराम भी गोकुल से मध्य प्रदेश के उज्जैन में सांदीपनि आश्रम में पढ़ने के लिए आए थे। आश्रम में ही कृष्ण और सुदामा एक दूसरे से पहली बार मिले और दोनों में जल्द ही गहरी मित्रता हो गई। हालांकि, आश्रम की शिक्षा पूरी होने के बाद श्रीकृष्ण&nbsp;और सुदामा दोनों अपने-अपने घर चले गए।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; &nbsp;शिक्षा पूरी होने के बाद सुदामा ने कई सालों के बाद शादी कर ली और अपना जीवनयापन करने लगे। उनका जीवन दरिद्रता में कट रहा था, जबकि श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बन गए थे। तब सुदामा की पत्नी ने आग्रह किया कि आप अपने मित्र श्रीकृष्ण के पास जाएं और मदद मांगें, लेकिन सुदामा ने कहा कि, मैं कृष्ण के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहता। तब उनकी पत्नी ने श्रीकृष्ण को भेंट देने के लिए चावल दिया। जब सुदामा द्वारका पहुंचे, तो उनका नाम सुनते ही श्रीकृष्ण उनका स्वागत करने के लिए महल के बाहर तक दौड़े चले आए और उन्हें गले से लगा लिया।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; सुदामा को शर्म आ रही थी कि एक राजा को चावल कैसे भेंट दूं। वह चावल को श्रीकृष्ण से छिपाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कृष्ण ने सुदामा से चावल छीनकर उसे खाने लगे. इसके साथ ही श्रीकृष्ण ने अपनी मित्रता निभाते हुए सुदामा की गरीबी को दूर किया और झोपड़ी को महल में बदल दिया।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; &nbsp;सुदामा मंदिर पोरबंदर शहर के केंद्र में 1902 से 1907 के बीच बनाया गया। कहा जाता है कि 13वीं शताब्दी में यहां सुदामा का एक छोटा मंदिर था। फिर वर्ष 1903 में पोरबंदर के महाराजा भावसिंहजी ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और छोटे मंदिर के स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान सौराष्ट्र ड्रामा कंपनी ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था। यहां आने वाले तीर्थयात्री &nbsp;सुदामा मंदिर जाने पर अपने कपड़ों पर ठप्पा लगाते है, क्योंकि यह कहा जाता है कि कोई भी तीर्थयात्रा सुदामापुरी जाने पर ही यात्रा पूरी होती है।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; &nbsp; &nbsp;सुदामा मंदिर के बीच में सुदामा की एक मनमोहक मूर्ति है, जिसके दाहिनी ओर उनकी धर्मपत्नी सुशीलाजी की मूर्ति है और बाईं ओर राधा-कृष्ण की मूर्ति है। परंपरा के अनुसार, हर वर्ष सुदामा अन्नकूट उत्सव को नए साल के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। साथ ही अखातीज के दिन सुदामा मंदिर में एक भव्य उत्सव मनाया जाता है जिसमें हजारों भक्त शामिल होते हैं।</span></span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="font-size:18px;"><strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">पोरबंदर का दूसरा नाम सुदामापुरी है</span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">सुदामा का द्वारका में आगमन और अस्मावती तट पर बसे इस छोटे से शहर में एक समृद्ध &lsquo;सुदामापुरी&rsquo; बनी रही। हालांकि, इस जगह का पहला लिखित प्रमाण पोरबंदर के पास घुमली के एक दान पत्र में है, जो एक हजार साल पुराना है। पोरबंदर के मानसरोवर कुंड के शिलालेख में भी इसके बारे में साक्ष्य मिला है।</span></span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
&nbsp;</p>
</blockquote>

<div class="yj6qo" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255); text-align: justify;">&nbsp;</div>

<div>&nbsp;</div>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall33565.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[SUDAMA-TEMPLE-IN-PORBANDAR]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/nakodar-darbaar]]></guid>
                       <title><![CDATA[ न-को-दर ...मतलब ऐसा दरबार कहीं नहीं]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/nakodar-darbaar]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 25 Nov 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
	हर मजहब के लिए पूजनीय है बाबा मुराद शाह का सूफियाना दरबार
	मन्नत पूरी होने पर बैंड-बाजों के साथ आते हैं श्रद्धालु



&nbsp;न-को-दर ..मतलब ऐसा दरबार कहीं नहीं है। नकोदर में एक ऐसा सूफियाना दरबार है, जहां पर हर मजहब के लोग भरपूर आस्था से सिर झुकाते है। डेरा बाबा मुराद शाह के दर पर दुनिया भर से लोग नतमस्तक होने के लिए आते है। हिंदू, मुस्लिम, सिख; तमाम धर्मों के लोग यहां बाबा के सामने नतमस्तक होते है। लोग मन्नतें मांगते है और पूरी होने पर बैंड-बाजों के साथ माथा टेकने के लिए आते है। हर साल यहाँ दो दिवसीय मेला सजाया जाता है।
&nbsp;बाबा मुराद शाह को लेकर जो कथा प्रचलित &nbsp;है उसके &nbsp;मुताबिक आजादी से पहले फकीर बाबा शेरे शाह पाकिस्तान से पंजाब के नकोदर आकर रहने लगे। नकोदर की धरती पर ही उन्होंने इबादत करनी शुरू कर दी। बाबा शेरे शाह हमेशा एकान्त स्थान पर रहते थे और नहीं चाहते थे कि लोग उनके पास आये ताकि उनकी प्रार्थना में कोई विघ्न न पड़े। वह प्रार्थनाओं में रहते थे और वारिस शाह द्वारा लिखित पुस्तक &quot;हीर&quot; पढ़ते थे। नकोदर में ही जैलदारों का परिवार रहता था, जिन्होंने उनकी खूब सेवा की। &nbsp;प्रसन्न होकर उन्होंने अध्यात्मिकता को समर्पित बेटे के जन्म लेने का वरदान दिया। इसके बाद परिवार में एक बच्चे ने जन्म लिया, जिसका नाम विद्या सागर रखा गया जो आगे चलकर बाबा मुराद शाह जी के नाम से जाने गए। बाबा मुराद शाह बाबा शेरे शाह के शिष्य बने और &nbsp;उन्होंने 24 साल की उम्र में फकीरी को चुना । भारत के विभाजन के दौरान बाबा शेरे शाह पाकिस्तान चले गये और बाबा मुराद शाह को दरबार की देखभाल करने और सूफीवाद का संदेश फैलाते रहने का आशीर्वाद दिया।
&nbsp;बाबा मुराद शाह के इस दुनिया से चले जाने के बाद साईं गुलाम शाह जिन्हें साईं लाडी शाह के नाम से भी जाना जाता है, दरबार के प्रमुख बने। साईं जी दरबार की देखभाल करते रहे और दरबार का निर्माण करते रहे। साईं जी बाबा मुराद शाह की याद में एक वार्षिक उर्स मेले का आयोजन करते थे, जिसमें वे कव्वाल और सूफी पंजाबी गायकों को प्रदर्शन के लिए आमंत्रित करते थे। क़रामत अली कव्वाल समूह ने अक्सर प्रदर्शन किया और आज भी करते हैं। साईं जी की पसंदीदा कव्वालियों में से एक थी &#39;मेरे लिखले गुलामा विच ना&#39; जिसे साईं जी हर महफिल में जरूर सुनते थे। साई लाडी शाह भी पहली मई 2008 को गुरुवार को इस दुनिया से चले गए।

प्रसिद्द गायक गुरदास मान साईं जी के शिष्य बन गए और साईं जी गुरदास मान से बहुत प्यार करते थे। 2006 में, साईं ने एक कव्वाली महफ़िल के दौरान अपनी पगड़ी उतार दी थी और गुरदास मान के सिर पर रख दी। साईं लाडी शाह के इस दुनिया से चले जाने के बाद, गुरदास मान अब साईं लाडी शाह और बाबा मुराद शाह की याद में मेलों का नेतृत्व करते हैं। बाबा मुराद शाह का दरबार सभी धर्मों के लिए पूजनीय है। यहां पर होने वाले दो दिवसीय मेले में देश भर से लोग शामिल होते है।

&nbsp; &nbsp;
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<ul>
	<li style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">हर मजहब के लिए पूजनीय है बाबा मुराद शाह का सूफियाना दरबार</span></span></strong></li>
	<li style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">मन्नत पूरी होने पर बैंड-बाजों के साथ आते हैं श्रद्धालु</span></strong></span></li>
</ul>

<p style="text-align: justify;"><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;न-को-दर ..मतलब ऐसा दरबार कहीं नहीं है। नकोदर में एक ऐसा सूफियाना दरबार है, जहां पर हर मजहब के लोग भरपूर आस्था से सिर झुकाते है। डेरा बाबा मुराद शाह के दर पर दुनिया भर से लोग नतमस्तक होने के लिए आते है। हिंदू, मुस्लिम, सिख; तमाम धर्मों के लोग यहां बाबा के सामने नतमस्तक होते है। लोग मन्नतें मांगते है और पूरी होने पर बैंड-बाजों के साथ माथा टेकने के लिए आते है। हर साल यहाँ दो दिवसीय मेला सजाया जाता है।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;बाबा मुराद शाह को लेकर जो कथा प्रचलित &nbsp;है उसके &nbsp;मुताबिक आजादी से पहले फकीर बाबा शेरे शाह पाकिस्तान से पंजाब के नकोदर आकर रहने लगे। नकोदर की धरती पर ही उन्होंने इबादत करनी शुरू कर दी। बाबा शेरे शाह हमेशा एकान्त स्थान पर रहते थे और नहीं चाहते थे कि लोग उनके पास आये ताकि उनकी प्रार्थना में कोई विघ्न न पड़े। वह प्रार्थनाओं में रहते थे और वारिस शाह द्वारा लिखित पुस्तक &quot;हीर&quot; पढ़ते थे। नकोदर में ही जैलदारों का परिवार रहता था, जिन्होंने उनकी खूब सेवा की। &nbsp;प्रसन्न होकर उन्होंने अध्यात्मिकता को समर्पित बेटे के जन्म लेने का वरदान दिया। इसके बाद परिवार में एक बच्चे ने जन्म लिया, जिसका नाम विद्या सागर रखा गया जो आगे चलकर बाबा मुराद शाह जी के नाम से जाने गए। बाबा मुराद शाह बाबा शेरे शाह के शिष्य बने और &nbsp;उन्होंने 24 साल की उम्र में फकीरी को चुना । भारत के विभाजन के दौरान बाबा शेरे शाह पाकिस्तान चले गये और बाबा मुराद शाह को दरबार की देखभाल करने और सूफीवाद का संदेश फैलाते रहने का आशीर्वाद दिया।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;बाबा मुराद शाह के इस दुनिया से चले जाने के बाद साईं गुलाम शाह जिन्हें साईं लाडी शाह के नाम से भी जाना जाता है, दरबार के प्रमुख बने। साईं जी दरबार की देखभाल करते रहे और दरबार का निर्माण करते रहे। साईं जी बाबा मुराद शाह की याद में एक वार्षिक उर्स मेले का आयोजन करते थे, जिसमें वे कव्वाल और सूफी पंजाबी गायकों को प्रदर्शन के लिए आमंत्रित करते थे। क़रामत अली कव्वाल समूह ने अक्सर प्रदर्शन किया और आज भी करते हैं। साईं जी की पसंदीदा कव्वालियों में से एक थी &#39;मेरे लिखले गुलामा विच ना&#39; जिसे साईं जी हर महफिल में जरूर सुनते थे। साई लाडी शाह भी पहली मई 2008 को गुरुवार को इस दुनिया से चले गए।</span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif;">प्रसिद्द गायक गुरदास मान साईं जी के शिष्य बन गए और साईं जी गुरदास मान से बहुत प्यार करते थे। 2006 में, साईं ने एक कव्वाली महफ़िल के दौरान अपनी पगड़ी उतार दी थी और गुरदास मान के सिर पर रख दी। साईं लाडी शाह के इस दुनिया से चले जाने के बाद, गुरदास मान अब साईं लाडी शाह और बाबा मुराद शाह की याद में मेलों का नेतृत्व करते हैं। बाबा मुराद शाह का दरबार सभी धर्मों के लिए पूजनीय है। यहां पर होने वाले दो दिवसीय मेले में देश भर से लोग शामिल होते है।</span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; &nbsp;</span></span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images233564.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[NAKODAR-DARBAAR]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/ramdevra-jaisalmer]]></guid>
                       <title><![CDATA[ हिन्दू-मुस्लिम दोनों के पूज्य हैं रामसा पीर]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/ramdevra-jaisalmer]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Sat, 25 Nov 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[&nbsp;


	हिन्दुओं के लिए &#39;बाबा रामदेव&#39;, मुस्लिम समाज में &#39;रामसा पीर&#39; कहलाएं



&nbsp; &nbsp;हिंदुस्तान में अनेक ऐसे महापुरूष हुए, जिन्होंने मानव देह धारण कर अपने कर्म और तप से लोक जीवन को आलोकित किया, जन साधारण को धर्म का मार्ग दिखाया है। उनके चरित्र और कर्म के चलते उन्हें आम जनमानस में लोक देवता की पदवी मिली और वे जन&minus;जन में पूजे जाने लगे। ऐसे ही लोकदेवताओं में शुमार है बाबा रामदेव, जिनका मंदिर राजस्थान के जैसलमेर जिले के रामदेवरा में है। ये स्थान धार्मिक सद्भावना की जीती जागती मिसाल है। ये हिन्दू समाज में वे &quot;बाबा रामदेव&quot; एवं मुस्लिम समाज में &quot;रामसा पीर&quot; के नाम से पूजनीय हैं।

&nbsp; &nbsp;रामदेव जी के जन्म स्थान को लेकर मतभेद है, परन्तु इसमें सब एक मत है कि उनका समाधी स्थल रामदेवरा ही है। यहां वे मूर्ति स्वरूप में पूजे जाते हैं। कहते है रामदेवरा में उन्होंने जीवित समाधी ली थी और यहीं पर उनका भव्य मंदिर बना हुआ है। पूर्व में समाधी छोटे छतरीनुमा मंदिर में बनी थी। फिर वर्ष 1912 में बीकानेर के तत्कालीन शासक महाराजा गंगासिंह ने छतरी के चारों तरफ बड़े मंदिर का निर्माण कराया, जिसने शनः&minus;शनः भव्य मंदिर का रूप ले लिया। बताया जाता है कि उस समय मंदिर के निर्माण में 57 हजार रूपये की लागत आई थी। बाबा की समाधि के सामने पूर्वी कोने में अखण्ड ज्योति प्रज्जवलित रहती है। दर्शन द्वार पर लोहे का चैनल गेट लगाया गया है। दर्शनार्थी अपनी मनौती पूर्ण करने के लिए कपड़ा, मौली, नारियल आदि बांधते हैं तथा मनौती पूर्ण होने पर खोल देते हैं।

&nbsp; &nbsp; &nbsp; यह मंदिर हिन्दुओं एवं मुसलमानों दोनों की आस्था का प्रबल केन्द्र है। मंदिर में बाबा रामदेव की मूर्ति के साथ&minus;साथ एक मजार भी बनी है। समाधि स्थल के पास ही रामदेवजी की परम भक्त शिष्या डाली बाई की समाधि और कंगन हैं। डाली बाई का कंगन पत्थर से बना है और इसके प्रति धर्मालुओं में गहरी आस्था है। मान्यता के अनुसार इस कंगन के अन्दर से होकर निकलने पर सभी प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। मंदिर आने वाले लोग इस कंगन के अन्दर से निकलने पर ही अपनी यात्रा पूर्ण मानते हैं।

&nbsp; मंदिर के समीप ही स्वयं रामदेव जी द्वारा खुदवाई गई परचा बावड़ी अपनी स्थापत्य कला में बेजोड़ है। इस बावड़ी का निर्माण फाल्गुन सुदी तृतीया विक्रम संवत् 1897 को पूर्ण हुआ। बावड़ी का जल शुद्ध व मीठा है। बावड़ी का निर्माण रामदेव जी के कहने पर बणिया बोयता ने करवाया था। बावड़ी पर लगे चार शिलालेखों से पता चलता है कि घामट गांव के पालीवाल ब्राह्मणों ने इसका पुनर्निर्माण कराया था। इस बावड़ी का जल रामदेवजी का अभिषेक करने के काम में लाया जाता है।

गांव के निवासियों को जल का अभाव न रहे इसलिए रामदेव जी ने मंदिर के पीछे विक्रम संवत् 1439 में रामसरोवर तालाब खुदवाया था। यह तालाब 150 एकड़ क्षेत्र में फैला है तथा इसकी गहराई 25 फीट है। तालाब के पश्चिमी छोर पर अद्भुत आश्रम तथा पाल के उत्तरी सिरे पर रामदेवजी की जीवित समाधी है। इसी क्षेत्र में डाली बाई की जीवित समाधी भी है।

&nbsp; &nbsp;रामदेवरा मंदिर से 2 किलोमीटर दूर पूर्व में निर्मित रूणीचा कुंआ (राणीसा का कुंआ) और एक छोटा रामदेव मंदिर भी दर्शनीय है। बताया जाता है कि रानी नेतलदे को प्यास लगने पर रामदेव जी ने भाले की नोक से इस जगह पाताल तोड़ कर पानी निकाला था और तब ही से यह स्थल &quot;राणीसा का कुंआ&quot; के नाम से जाना गया।

&nbsp; &nbsp; बाबा रामदेव के पिता अजमल जी किसी समय दिल्ली के सम्राट रहे एवं अनंगपाल तंवर के वंशज थे। बाद में वे आकर पश्चिमी राजस्थान में निवास करने लगे। अजमल जी द्वारिकाधीश के अनन्य भक्त थे। मान्यता है कि भगवान कृष्ण की कृपा से बाबा रामदेव का जन्म हुआ। बाबा रामदेव के लोक गीतों और कथाओं में भैरव राक्षस का वध, घोड़े की सवारी, लक्खी बनजारे का परचा, पांचों पीर का परचा, नेतलदे की अपंगता दूर करने आदि के उल्लेख बखूबी पाये जाते हैं। उनके घोड़े की श्रद्धा से पूजा की जाती है।


रामदेवजी ने तत्कालीन समाज में व्याप्त छूआछूत, जात&minus;पांत का भेदभाव दूर करने तथा नारी व दलित उत्थान के लिए प्रयास किये। अमर कोट के राजा दलपत सोढा की अपंग कन्या नेतलदे को पत्नी स्वीकार कर समाज के समक्ष आदर्श प्रस्तुत किया। दलितों को आत्मनिर्भर बनने और सम्मान के साथ जीने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने पाखण्ड व आडम्बर का विरोध किया। साथ ही सगुन&minus;निर्गुण, अद्वैत, वेदान्त, भक्ति, ज्ञान योग, कर्मयोग जैसे विषयों की सहज व सरल व्याख्या की। आज भी बाबा की वाणी को &quot;हरजस&quot; के रूप में गाया जाता है।



पीरो के पीर रामसा पीर&nbsp;
बाबा रामदेव जी के 24 परचों में पंच पीपली भी प्रसिद्ध स्थल है। इस सम्बंध में प्रचलित कथानक के अनुसार, रामदेव जी की परीक्षा के लिए मक्का&minus;मदीना से पांच पीर रामदेवरा आये और उनके अतिथि बने। भोजन के समय पीरों ने कहा कि वे स्वयं के कटोरे में ही भोजन करते हैं। रामदेव ने वहीं बैठे&minus;बैठे अपनी दाई भुजा को इतना लम्बा फैलाया कि मदीना से उनके कटोरे वहीं मंगवा दिये। पीरों ने उनका चमत्कार देखकर उन्हें अपना गुरु (पीर) माना और यहीं से रामदेव जी का नाम रामसा पीर पड़ा और बाबा को &quot;पीरो के पीर रामसा पीर&quot; की उपाधी भी प्रदान की गई। इस घटना से मुसलमान इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भी इनकी पूजा करनी शुरू कर दी। रामदेवरा से पूर्व की ओर 10 किलोमीटर एकां गांव के पास छोटी सी नाडी के पाल पर घटित इस घटना के दौरान पीरों ने भी परचे स्वरूप पांच पीपली लगाई थी, जो आज भी मौजूद हैं।

दो बार होता है मेले का आयोजन&nbsp;
&quot;म्हारो हेलो सुनो जी रामा पीर&quot;.....जैसे भजनों पर झूमते-नाचते हुए श्रद्धालु रामदेवरा पहुचते हैं। जैसलमेर में &nbsp;पोकरण से क़रीब 12 किलोमीटर दूर रामदेवरा में बाबा रामदेव का स्थान है जिन्हें कृष्ण भगवान का अवतार माना जाता है। उनकी अवतरण तिथि भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष द्वितीया को है और तब रामदेवरा मेला शुरू होता है। यह मेला एक महीने से अधिक चलता है। साल में दो बार रामदेवरा में भव्य मेलों का आयोजन किया जाता है। शुक्ल पक्ष में तथा भादवा और माघ में दूज से लेकर दशमी तक मेला भरता है। भादवा के महिने में राजस्थान के किसी सड़क मार्ग पर निकल जाएं, सफेद रंग की या पचरंगी ध्वजा को हाथ में लेकर सैंकड़ों जत्थे रामदेवरा की ओर जाते नजर आते हैं। इन जत्थों में सभी आयु वर्ग के नौजवान, बुजुर्ग, स्त्री&minus;पुरूष और बच्चे पूरे उत्साह से बिना थके अनवरत चलते रहते हैं। यह जत्थे मीलों लम्बी यात्रा कर बाबा के दरबार में हाजरी लगाते हैं। साथ लेकर गये ध्वजाओं को मुख्य मंदिर में चढ़ा देते हैं। भादवा के मेले में महाप्रसाद बनाया जाता है। यहां आने वालों के लिए बड़ी संख्या में धर्मशालाएं और विश्राम स्थल बनाये गये हैं। सरकार की ओर से मेले में व्यापक प्रबंध किये जाते है। रात्रि को जागरणों के दौरान रामदेवजी के भोपे रामदेवजी की थांवला एवं फड़ बांचते हैं।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>

<ul>
	<li style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">हिन्दुओं के लिए &#39;बाबा रामदेव&#39;, मुस्लिम समाज में &#39;रामसा पीर&#39; कहलाएं</span></span></strong></li>
</ul>

<p style="text-align: justify;"><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; &nbsp;हिंदुस्तान में अनेक ऐसे महापुरूष हुए, जिन्होंने मानव देह धारण कर अपने कर्म और तप से लोक जीवन को आलोकित किया, जन साधारण को धर्म का मार्ग दिखाया है। उनके चरित्र और कर्म के चलते उन्हें आम जनमानस में लोक देवता की पदवी मिली और वे जन&minus;जन में पूजे जाने लगे। ऐसे ही लोकदेवताओं में शुमार है बाबा रामदेव, जिनका मंदिर राजस्थान के जैसलमेर जिले के रामदेवरा में है। ये स्थान धार्मिक सद्भावना की जीती जागती मिसाल है। ये हिन्दू समाज में वे &quot;बाबा रामदेव&quot; एवं मुस्लिम समाज में &quot;रामसा पीर&quot; के नाम से पूजनीय हैं।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; &nbsp;रामदेव जी के जन्म स्थान को लेकर मतभेद है, परन्तु इसमें सब एक मत है कि उनका समाधी स्थल रामदेवरा ही है। यहां वे मूर्ति स्वरूप में पूजे जाते हैं। कहते है रामदेवरा में उन्होंने जीवित समाधी ली थी और यहीं पर उनका भव्य मंदिर बना हुआ है। पूर्व में समाधी छोटे छतरीनुमा मंदिर में बनी थी। फिर वर्ष 1912 में बीकानेर के तत्कालीन शासक महाराजा गंगासिंह ने छतरी के चारों तरफ बड़े मंदिर का निर्माण कराया, जिसने शनः&minus;शनः भव्य मंदिर का रूप ले लिया। बताया जाता है कि उस समय मंदिर के निर्माण में 57 हजार रूपये की लागत आई थी। बाबा की समाधि के सामने पूर्वी कोने में अखण्ड ज्योति प्रज्जवलित रहती है। दर्शन द्वार पर लोहे का चैनल गेट लगाया गया है। दर्शनार्थी अपनी मनौती पूर्ण करने के लिए कपड़ा, मौली, नारियल आदि बांधते हैं तथा मनौती पूर्ण होने पर खोल देते हैं।</span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; &nbsp; &nbsp; यह मंदिर हिन्दुओं एवं मुसलमानों दोनों की आस्था का प्रबल केन्द्र है। मंदिर में बाबा रामदेव की मूर्ति के साथ&minus;साथ एक मजार भी बनी है। समाधि स्थल के पास ही रामदेवजी की परम भक्त शिष्या डाली बाई की समाधि और कंगन हैं। डाली बाई का कंगन पत्थर से बना है और इसके प्रति धर्मालुओं में गहरी आस्था है। मान्यता के अनुसार इस कंगन के अन्दर से होकर निकलने पर सभी प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। मंदिर आने वाले लोग इस कंगन के अन्दर से निकलने पर ही अपनी यात्रा पूर्ण मानते हैं।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; मंदिर के समीप ही स्वयं रामदेव जी द्वारा खुदवाई गई परचा बावड़ी अपनी स्थापत्य कला में बेजोड़ है। इस बावड़ी का निर्माण फाल्गुन सुदी तृतीया विक्रम संवत् 1897 को पूर्ण हुआ। बावड़ी का जल शुद्ध व मीठा है। बावड़ी का निर्माण रामदेव जी के कहने पर बणिया बोयता ने करवाया था। बावड़ी पर लगे चार शिलालेखों से पता चलता है कि घामट गांव के पालीवाल ब्राह्मणों ने इसका पुनर्निर्माण कराया था। इस बावड़ी का जल रामदेवजी का अभिषेक करने के काम में लाया जाता है।</span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">गांव के निवासियों को जल का अभाव न रहे इसलिए रामदेव जी ने मंदिर के पीछे विक्रम संवत् 1439 में रामसरोवर तालाब खुदवाया था। यह तालाब 150 एकड़ क्षेत्र में फैला है तथा इसकी गहराई 25 फीट है। तालाब के पश्चिमी छोर पर अद्भुत आश्रम तथा पाल के उत्तरी सिरे पर रामदेवजी की जीवित समाधी है। इसी क्षेत्र में डाली बाई की जीवित समाधी भी है।</span></span></p>

<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; &nbsp;रामदेवरा मंदिर से 2 किलोमीटर दूर पूर्व में निर्मित रूणीचा कुंआ (राणीसा का कुंआ) और एक छोटा रामदेव मंदिर भी दर्शनीय है। बताया जाता है कि रानी नेतलदे को प्यास लगने पर रामदेव जी ने भाले की नोक से इस जगह पाताल तोड़ कर पानी निकाला था और तब ही से यह स्थल &quot;राणीसा का कुंआ&quot; के नाम से जाना गया।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp; &nbsp; बाबा रामदेव के पिता अजमल जी किसी समय दिल्ली के सम्राट रहे एवं अनंगपाल तंवर के वंशज थे। बाद में वे आकर पश्चिमी राजस्थान में निवास करने लगे। अजमल जी द्वारिकाधीश के अनन्य भक्त थे। मान्यता है कि भगवान कृष्ण की कृपा से बाबा रामदेव का जन्म हुआ। बाबा रामदेव के लोक गीतों और कथाओं में भैरव राक्षस का वध, घोड़े की सवारी, लक्खी बनजारे का परचा, पांचों पीर का परचा, नेतलदे की अपंगता दूर करने आदि के उल्लेख बखूबी पाये जाते हैं। उनके घोड़े की श्रद्धा से पूजा की जाती है।</span></span></p>

<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">रामदेवजी ने तत्कालीन समाज में व्याप्त छूआछूत, जात&minus;पांत का भेदभाव दूर करने तथा नारी व दलित उत्थान के लिए प्रयास किये। अमर कोट के राजा दलपत सोढा की अपंग कन्या नेतलदे को पत्नी स्वीकार कर समाज के समक्ष आदर्श प्रस्तुत किया। दलितों को आत्मनिर्भर बनने और सम्मान के साथ जीने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने पाखण्ड व आडम्बर का विरोध किया। साथ ही सगुन&minus;निर्गुण, अद्वैत, वेदान्त, भक्ति, ज्ञान योग, कर्मयोग जैसे विषयों की सहज व सरल व्याख्या की। आज भी बाबा की वाणी को &quot;हरजस&quot; के रूप में गाया जाता है।</span></span></p>
</blockquote>

<p style="text-align: justify;"><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="font-size:18px;"><strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">पीरो के पीर रामसा पीर&nbsp;</span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">बाबा रामदेव जी के 24 परचों में पंच पीपली भी प्रसिद्ध स्थल है। इस सम्बंध में प्रचलित कथानक के अनुसार, रामदेव जी की परीक्षा के लिए मक्का&minus;मदीना से पांच पीर रामदेवरा आये और उनके अतिथि बने। भोजन के समय पीरों ने कहा कि वे स्वयं के कटोरे में ही भोजन करते हैं। रामदेव ने वहीं बैठे&minus;बैठे अपनी दाई भुजा को इतना लम्बा फैलाया कि मदीना से उनके कटोरे वहीं मंगवा दिये। पीरों ने उनका चमत्कार देखकर उन्हें अपना गुरु (पीर) माना और यहीं से रामदेव जी का नाम रामसा पीर पड़ा और बाबा को &quot;पीरो के पीर रामसा पीर&quot; की उपाधी भी प्रदान की गई। इस घटना से मुसलमान इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भी इनकी पूजा करनी शुरू कर दी। रामदेवरा से पूर्व की ओर 10 किलोमीटर एकां गांव के पास छोटी सी नाडी के पाल पर घटित इस घटना के दौरान पीरों ने भी परचे स्वरूप पांच पीपली लगाई थी, जो आज भी मौजूद हैं।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">दो बार होता है मेले का आयोजन&nbsp;</span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&quot;म्हारो हेलो सुनो जी रामा पीर&quot;.....जैसे भजनों पर झूमते-नाचते हुए श्रद्धालु रामदेवरा पहुचते हैं। जैसलमेर में &nbsp;पोकरण से क़रीब 12 किलोमीटर दूर रामदेवरा में बाबा रामदेव का स्थान है जिन्हें कृष्ण भगवान का अवतार माना जाता है। उनकी अवतरण तिथि भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष द्वितीया को है और तब रामदेवरा मेला शुरू होता है। यह मेला एक महीने से अधिक चलता है। साल में दो बार रामदेवरा में भव्य मेलों का आयोजन किया जाता है। शुक्ल पक्ष में तथा भादवा और माघ में दूज से लेकर दशमी तक मेला भरता है। भादवा के महिने में राजस्थान के किसी सड़क मार्ग पर निकल जाएं, सफेद रंग की या पचरंगी ध्वजा को हाथ में लेकर सैंकड़ों जत्थे रामदेवरा की ओर जाते नजर आते हैं। इन जत्थों में सभी आयु वर्ग के नौजवान, बुजुर्ग, स्त्री&minus;पुरूष और बच्चे पूरे उत्साह से बिना थके अनवरत चलते रहते हैं। यह जत्थे मीलों लम्बी यात्रा कर बाबा के दरबार में हाजरी लगाते हैं। साथ लेकर गये ध्वजाओं को मुख्य मंदिर में चढ़ा देते हैं। भादवा के मेले में महाप्रसाद बनाया जाता है। यहां आने वालों के लिए बड़ी संख्या में धर्मशालाएं और विश्राम स्थल बनाये गये हैं। सरकार की ओर से मेले में व्यापक प्रबंध किये जाते है। रात्रि को जागरणों के दौरान रामदेवजी के भोपे रामदेवजी की थांवला एवं फड़ बांचते हैं।</span></span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/imagesmall33563.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[RAMDEVRA-JAISALMER]]></media:description>
                </media:content>   
                </item><item>
                       <guid isPermaLink="true"><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/ashthvinayak-temples]]></guid>
                       <title><![CDATA[अष्‍टविनायक : जहाँ स्‍वयं प्रकट हुए श्री गणेश]]></title>
                       <link><![CDATA[https://www.firstverdict.com/first-blessing/ashthvinayak-temples]]></link>
                       <pubDate><![CDATA[Tue, 19 Sep 2023 00:00:00 +0530]]></pubDate>
                       <description><![CDATA[
हिन्दू धर्म में भगवान श्री गणेश को प्रथम पूज्य माना जाता है। &nbsp;श्री गणेश आदि सनातन धर्म के प्रमुख आदिपंच देवों में भी शामिल हैं। देश के प्रमुख गणेश मंदिरों में अष्ठविनायक&nbsp;का विशिष्ट स्थान है। दरअसल पुणे के विभिन्&zwj;न इलाकों में श्री गणेश के आठ मंदिर हैं, इन्&zwj;हें अष्&zwj;टविनायक&nbsp;कहा जाता है। इन मंदिरों को स्&zwj;वयंभू मंदिर भी कहा जाता है। स्&zwj;वयंभू का अर्थ है कि यहां भगवान स्&zwj;वयं प्रकट हुए थे यानि किसी ने उनकी प्रतिमा बना कर स्&zwj;थापित नहीं की थी। इन मंदिरों का जिक्र विभिन्&zwj;न पुराणों जैसे गणेश और मुद्गल पुराण में भी किया गया है। इन मंदिरों की दर्शन यात्रा को अष्&zwj;टविनायक&nbsp;तीर्थ यात्रा भी कहा जाता है।

अष्ठविनायक&nbsp;मंदिर के संबंध में मान्यता है कि तीर्थ गणेश के ये आठ पवित्र मंदिर स्वयं उत्पन्न और जागृत हैं। &nbsp;पुराणों व धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि भगवान ब्रह्माजी ने भविष्यवाणी की थी कि हर युग में श्रीगणेश विभिन्न रूपों मे अवतरित होंगे। सतयुग में&nbsp;विनायक, त्रेता युग में मयूरेश्वर, द्वापर युग में गजानन व धूम्रकेतु नाम से कलयुग के अवतार लेंगे। भगवान गणेश के आठों शक्तिपीठ महाराष्ट्र में ही हैं। इन आठ पवित्र तीर्थ में 6 पुणे में हैं और 2 रायगढ़ जिले में हैं। सबसे पहले मोरेगांव के मोरेश्वर की यात्रा करनी चाहिए और उसके बाद क्रम में सिद्धटेक, पाली, महाड, थियूर, लेनानडरी, ओजर, रांजणगांव और उसके बाद फिर से मोरेगांव&nbsp;अष्टविनायक&nbsp;मंदिर में यात्रा समाप्त करनी चाहिए। पूरी यात्रा 654 किलोमीटर की होती है।


1.मयूरेश्वर या मोरेश्वर मंदिर
मयूरेश्वर&nbsp;विनायक&nbsp;का मंदिर पुणे के मोरगांव क्षेत्र में है। इस मंदिर में चार द्वार =हैं जिन्&zwj;हें सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग चारों युग का प्रतीक माना जाता हैं। यहां भगवान गणेश जी की मूर्ती बैठी मुद्रा में है और उसकी सूंड बाई है तथा उनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं। यहां नंदी की भी मूर्ती है। कहते हैं कि इसी स्&zwj;थान पर गणेश जी ने सिंधुरासुर नाम के राक्षस का वध मोर पर सवार होकर उससे युद्ध करते हुए किया था।

2. सिद्धिविनायक&nbsp;मंदिर
सिद्धिविनायक&nbsp;मंदिर करजत तहसील, अहमदनगर में है। ये मंदिर पुणे से करीब 200 किमी दूर भीम नदी पर स्&zwj;थित है। यह मंदिर करीब 200 साल पुराना बताया जाता हैऔर एक पहाड़ की चोटी पर सिद्धिविनायक&nbsp;मंदिर बना हुआ है। इसका मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर है। इस मंदिर की परिक्रमा करने के लिए पहाड़ की यात्रा करनी होती है। सिद्धिविनायक&nbsp;मंदिर में गणेशजी की मूर्ति 3 फीट ऊंची और ढाई फीट चौड़ी है। यहां गणेश जी की सूंड सीधे हाथ की ओर है।

3. बल्लालेश्वर मंदिर
पाली गांव, रायगढ़ स्थित इस मंदिर का नाम गणेश जी के भक्&zwj;त बल्&zwj;लाल के नाम पर रखा गया है। बल्&zwj;लाल की कथा के बारे में कहते हैं कि इस परम भक्&zwj;त को उसके परिवार ने गणेश जी की भक्&zwj;ति के चलते उनकी मूर्ती सहित जंगल में फेंक दिया था, पर &nbsp;उसने केवल गणपति का स्&zwj;मरण करते हुए समय बिता दिया था। प्रसन्&zwj;न होकर भगवान श्री गणेश जी ने उसे इस स्&zwj;थान पर दर्शन दिया और कालानंतर में बललाल के नाम पर उनका ये मंदिर बना।

4.वरद&nbsp;विनायक&nbsp;मंदिर
रायगढ़ के कोल्हापुर में वरदविनायक&nbsp;मंदिर। एक मान्यता के अनुसार वरदविनायक&nbsp;भक्तों की सभी कामनों को पूरा होने का वरदान देते हैं। एक कथा ये भी है कि इस मंदिर में नंददीप नाम का दीपक है जो कई वर्षों से लगातार जल रहा है।

5. चिंतामणी मंदिर
&nbsp;भीम, मुला और मुथा नदियों के संगम पर स्&zwj;थित थेऊर गांव में स्थित है चिंतामणी मंदिर। ऐसी मान्&zwj;यता है कि विचलित मन के साथ इस मंदिर में जाने वालों की सारी परेशानियां दूर हो कर उन्&zwj;हें शांति मिल जाती है। इस मंदिर से भी जुड़ी एक कथा है कि स्वयं भगवान ब्रह्मा ने अपने विचलित मन को शांत करने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी।

6. गिरिजात्मज&nbsp;अष्टविनायक&nbsp;मंदिर
लेण्याद्री गांव में गिरिजात्मज&nbsp;अष्टविनायक&nbsp;मंदिर स्थित है, जिसका अर्थ है गिरिजा के आत्&zwj;मज यानी माता पार्वती के पुत्र अर्थात गणेश। पुणे-नासिक राजमार्ग पर पुणे से करीब 90 किलोमीटर स्थित ये मंदिर लेण्याद्री पहाड़ पर बौद्ध गुफाओं के स्थान पर बनाया गया है। इस पहाड़ पर 18 बौद्ध गुफाएं हैं जिसमें से 8वीं गुफा में गिरजात्मज&nbsp;विनायक&nbsp;मंदिर है। इन गुफाओं को गणेश गुफा भी कहा जाता है।

7. विघ्नेश्वर&nbsp;अष्टविनायक&nbsp;मंदिर
पुणे के ओझर जिले के जूनर क्षेत्र में यह मंदिर स्थित है।एक किंवदंती के अनुसार विघनासुर नाम का असुर जब संतों को प्रताणित कर रहा था, तब भगवान गणेश ने इसी स्&zwj;थान पर उसका वध किया था। तभी से यह मंदिर विघ्नेश्वर, विघ्नहर्ता और विघ्नहार के रूप में जाना जाता है।

8. महागणपति मंदिर
महागणपति मंदिर राजणगांव में स्&zwj;थित है। इस मंदिर को 9-10वीं सदी के बीच का माना जाता है। पूर्व दिशा की ओर मंदिर का बहुत विशाल और सुन्दर प्रवेश द्वार है। यहां गणपति की मूर्ति को माहोतक नाम से भी जाना जाता है। एक मान्यता के अनुसार विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा करने के लिए इस मंदिर की मूल मूर्ति को तहखाने में छिपा दिया गया है।
]]></description>
                       <content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="font-size:18px;"><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">हिन्दू धर्म में भगवान श्री गणेश को प्रथम पूज्य माना जाता है। &nbsp;श्री गणेश आदि सनातन धर्म के प्रमुख आदिपंच देवों में भी शामिल हैं। देश के प्रमुख गणेश मंदिरों में अष्ठ</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;का विशिष्ट स्थान है। दरअसल पुणे के विभिन्&zwj;न इलाकों में श्री गणेश के आठ मंदिर हैं, इन्&zwj;हें अष्&zwj;ट</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;कहा जाता है। इन मंदिरों को स्&zwj;वयंभू मंदिर भी कहा जाता है। स्&zwj;वयंभू का अर्थ है कि यहां भगवान स्&zwj;वयं प्रकट हुए थे यानि किसी ने उनकी प्रतिमा बना कर स्&zwj;थापित नहीं की थी। इन मंदिरों का जिक्र विभिन्&zwj;न पुराणों जैसे गणेश और मुद्गल पुराण में भी किया गया है। इन मंदिरों की दर्शन यात्रा को अष्&zwj;ट</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;तीर्थ यात्रा भी कहा जाता है।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">अष्ठ</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर के संबंध में मान्यता है कि तीर्थ गणेश के ये आठ पवित्र मंदिर स्वयं उत्पन्न और जागृत हैं। &nbsp;पुराणों व धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि भगवान ब्रह्माजी ने भविष्यवाणी की थी कि हर युग में श्रीगणेश विभिन्न रूपों मे अवतरित होंगे। सतयुग में&nbsp;</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">, त्रेता युग में मयूरेश्वर, द्वापर युग में गजानन व धूम्रकेतु नाम से कलयुग के अवतार लेंगे। भगवान गणेश के आठों शक्तिपीठ महाराष्ट्र में ही हैं। इन आठ पवित्र तीर्थ में 6 पुणे में हैं और 2 रायगढ़ जिले में हैं। सबसे पहले मोरेगांव के मोरेश्वर की यात्रा करनी चाहिए और उसके बाद क्रम में सिद्धटेक, पाली, महाड, थियूर, लेनानडरी, ओजर, रांजणगांव और उसके बाद फिर से मोरेगांव&nbsp;</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">अष्ट</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर में यात्रा समाप्त करनी चाहिए। पूरी यात्रा 654 किलोमीटर की होती है।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">1.मयूरेश्वर या मोरेश्वर मंदिर</span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">मयूरेश्वर&nbsp;</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;का मंदिर पुणे के मोरगांव क्षेत्र में है। इस मंदिर में चार द्वार =हैं जिन्&zwj;हें सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग चारों युग का प्रतीक माना जाता हैं। यहां भगवान गणेश जी की मूर्ती बैठी मुद्रा में है और उसकी सूंड बाई है तथा उनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं। यहां नंदी की भी मूर्ती है। कहते हैं कि इसी स्&zwj;थान पर गणेश जी ने सिंधुरासुर नाम के राक्षस का वध मोर पर सवार होकर उससे युद्ध करते हुए किया था।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">2. सिद्धि</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर</span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">सिद्धि</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर करजत तहसील, अहमदनगर में है। ये मंदिर पुणे से करीब 200 किमी दूर भीम नदी पर स्&zwj;थित है। यह मंदिर करीब 200 साल पुराना बताया जाता हैऔर एक पहाड़ की चोटी पर सिद्धि</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर बना हुआ है। इसका मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर है। इस मंदिर की परिक्रमा करने के लिए पहाड़ की यात्रा करनी होती है। सिद्धि</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर में गणेशजी की मूर्ति 3 फीट ऊंची और ढाई फीट चौड़ी है। यहां गणेश जी की सूंड सीधे हाथ की ओर है।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">3. बल्लालेश्वर मंदिर</span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">पाली गांव, रायगढ़ स्थित इस मंदिर का नाम गणेश जी के भक्&zwj;त बल्&zwj;लाल के नाम पर रखा गया है। बल्&zwj;लाल की कथा के बारे में कहते हैं कि इस परम भक्&zwj;त को उसके परिवार ने गणेश जी की भक्&zwj;ति के चलते उनकी मूर्ती सहित जंगल में फेंक दिया था, पर &nbsp;उसने केवल गणपति का स्&zwj;मरण करते हुए समय बिता दिया था। प्रसन्&zwj;न होकर भगवान श्री गणेश जी ने उसे इस स्&zwj;थान पर दर्शन दिया और कालानंतर में बललाल के नाम पर उनका ये मंदिर बना।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">4.वरद&nbsp;</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर</span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">रायगढ़ के कोल्हापुर में वरद</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर। एक मान्यता के अनुसार वरद</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;भक्तों की सभी कामनों को पूरा होने का वरदान देते हैं। एक कथा ये भी है कि इस मंदिर में नंददीप नाम का दीपक है जो कई वर्षों से लगातार जल रहा है।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">5. चिंतामणी मंदिर</span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;भीम, मुला और मुथा नदियों के संगम पर स्&zwj;थित थेऊर गांव में स्थित है चिंतामणी मंदिर। ऐसी मान्&zwj;यता है कि विचलित मन के साथ इस मंदिर में जाने वालों की सारी परेशानियां दूर हो कर उन्&zwj;हें शांति मिल जाती है। इस मंदिर से भी जुड़ी एक कथा है कि स्वयं भगवान ब्रह्मा ने अपने विचलित मन को शांत करने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">6. गिरिजात्मज&nbsp;</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">अष्ट</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर</span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">लेण्याद्री गांव में गिरिजात्मज&nbsp;</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">अष्ट</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर स्थित है, जिसका अर्थ है गिरिजा के आत्&zwj;मज यानी माता पार्वती के पुत्र अर्थात गणेश। पुणे-नासिक राजमार्ग पर पुणे से करीब 90 किलोमीटर स्थित ये मंदिर लेण्याद्री पहाड़ पर बौद्ध गुफाओं के स्थान पर बनाया गया है। इस पहाड़ पर 18 बौद्ध गुफाएं हैं जिसमें से 8वीं गुफा में गिरजात्मज&nbsp;</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर है। इन गुफाओं को गणेश गुफा भी कहा जाता है।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">7. विघ्नेश्वर&nbsp;</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">अष्ट</span><span class="il" style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">विनायक</span><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">&nbsp;मंदिर</span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">पुणे के ओझर जिले के जूनर क्षेत्र में यह मंदिर स्थित है।एक किंवदंती के अनुसार विघनासुर नाम का असुर जब संतों को प्रताणित कर रहा था, तब भगवान गणेश ने इसी स्&zwj;थान पर उसका वध किया था। तभी से यह मंदिर विघ्नेश्वर, विघ्नहर्ता और विघ्नहार के रूप में जाना जाता है।</span><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<strong><span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">8. महागणपति मंदिर</span></strong><br style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; background-color: rgb(255, 255, 255);" />
<span style="color: rgb(34, 34, 34); font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; background-color: rgb(255, 255, 255);">महागणपति मंदिर राजणगांव में स्&zwj;थित है। इस मंदिर को 9-10वीं सदी के बीच का माना जाता है। पूर्व दिशा की ओर मंदिर का बहुत विशाल और सुन्दर प्रवेश द्वार है। यहां गणपति की मूर्ति को माहोतक नाम से भी जाना जाता है। एक मान्यता के अनुसार विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा करने के लिए इस मंदिर की मूल मूर्ति को तहखाने में छिपा दिया गया है।</span></span></p>
]]></content:encoded>
                <media:content url="https://www.firstverdict.com/resource/images/news/images232138.jpg" type="image/jpeg" expression="full" width="299" height="242">
                <media:description type="plain"><![CDATA[ashthvinayak-temples]]></media:description>
                </media:content>   
                </item></channel>
            </rss>