हिमाचल की इस जेल में एक दिन ठहरे थे महात्मा गाँधी, आज भी दिखता है अंग्रेज़ों की क्रूरता का प्रमाण
हिमाचल प्रदेश अपनी खूबसूरती और मनमोहक दृश्यों के लिए पुरे विश्व में विख्यात है l ख़ूबसूरत वादियों और घाटियों के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश को रहस्यों का प्रदेश भी माना जाता है। ऐसे ही रोमांचक इतिहास और रहस्यों से परिपूर्ण एक शहर हिमाचल के सोलन जिलें में भी है। सोलन से 11 किमी दूर, समुद्र तल से 5,600 मीटर से अधिक दूरी पर स्थित, दगशाई एक ऐसा शहर है जो आज भी अपने अचंभित कर देने वाले इतिहास और कहानियों के लिए जाना जाता है। दगशाई भारत का एक बहुत पुराना छावनी शहर है ।
शहर को कैसे मिला ये नाम
इस शहर के नाम में ही एक अलग कहानी छिपी है , कहते है कि अतीत में ये शहर मुग़ल शासकों की छावनी भी था और मुग़ल शासक इस क्षेत्र में अपराधियों को मृत्युदंड के लिए भेजते थे। दंड के साथ साथ राज्य से गद्दारी करने वाले लोगों को गर्म लोहे से जला कर उनके शरीर पर दाग (निशान) दिया जाता था जिसे "दाग-ए-शाही" कहा जाता था और इसी कारण से शहर को इसका नाम "दाग-ए-शाही" मिला । समय के साथ नाम का उच्चारण दगशाई में बदल गया। बाद में, ब्रिटिश शासकों ने इसे एक सेना छावनी में बदल दिया।
वो जेल जहाँ ठहरे थे महात्मा गाँधी
अंडमान द्वीप समूह भारत में सबसे लोकप्रिय सेलुलर जेल हो सकता है, लेकिन दगशाई में भी एक ऐसा ही सेलुलर जेल स्थित है जो खुद में अंग्रेज़ों के अत्याचार का दर्दनाक इतिहास समेटे है। इस जेल का हर कोना अंग्रेज़ों की क्रूरता को बयां करता है।
दगशाई जेल का निर्माण 1849 में 72,873 रुपये की लागत से किया गया था। इसमें 54 कोठरियां हैं। 54 कोठरियों में से 16 एकान्त कारावास के लिए थीं। इन जेल कोठरियों में कोई वेंटिलेशन नहीं था और प्राकृतिक प्रकाश तक कोई पहुंच नहीं थी। ये गंभीर अनुशासनहीनता के दोषी कैदियों के लिए थे, जिन्हें कठोर सजा दी जाती थी। यहां दी जाने वाली सज़ा काला पानी की सज़ा से कम नहीं थी। इस विशेष सेल में दो दरवाजे हैं जो मुश्किल से तीन फीट अलग हैं। इस छोटी जेल में कैदी केवल खड़े हो सकते थे। ये बेहत दर्दनाक सज़ा हुआ करती थी और घंटो तक कैदी सिर्फ खड़ा ही रह सकता था। जेल में बनी कालकोठरियां आज भी भयावह हैं। यहां पर अंधकूप अंधेरा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता था कि अंग्रेजों के समय में इस जेल में किस कदर कैदियों को यातनाएं दी जाती थीं। यहां कैदियों को ऐसी-ऐसी यातनाएं दी जाती थीं, जिनके बारे में सुन कर ही रूह कांप जाती है।
इस जेल के पहले महत्वपूर्ण निवासी 1857 में आए थे। ये नसीरी रेजिमेंट के गोरखा सैनिक थे जिन्होंने विद्रोह के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था। उन्हें दगशाई जेल में कैद किया गया था। ये व्ही जेल है जहां 1920 में, कनॉट रेंजरों की पहली बटालियन के आयरिश कैथोलिक सैनिकों को लाया गया था। वो आयरिश सैनिक जिन्होंने अपने अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह किया था । विद्रोहियों को उनके नेता, जेम्स डेली सहित, डगशाई जेल में लाया गया था।
2 नवंबर, 1920 की सुबह, 22 वर्षीय निजी जेम्स डेली को जेल यार्ड में ले जाया गया और फायरिंग दस्ते द्वारा उनकी हत्या कर दी गयी।
अपने देश के लिए मरने के अलावा, डेली ने सैन्य अपराध के लिए मारे जाने वाले ब्रिटिश सेना के अंतिम सदस्य बनकर इतिहास भी बनाया।
1970 तक उन्हें दगशाई कब्रिस्तान में दफनाया गया, जब उनके अवशेषों को आयरलैंड वापस ले जाया गया और पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।
आयरिश सैनिको के सहानुभूति ही देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को दगशाई खींच लायी । गांधी आयरिश नेता ईमोन डे वलेरा के मित्र और प्रशंसक थे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आयरिश संघर्ष से प्रेरणा ली। नैतिक समर्थन प्रदान करने और आयरिश के प्रति अपनी एकजुटता दिखाने के लिए, गांधीजी ने स्वेच्छा से जेल में एक रात बिताई। महात्मा गांधी जिस कक्ष में ठहरे थे उसकी दीवार पर चरखा चलाते हुए उनकी एक बड़ी सी तस्वीर लगाई गई है।
कहा तो ये भी जाता है की महात्मा गाँधी के कातिल नाथू राम गोडसे ने भी कुछ समय दगशाई जेल में बिताया था, हालाँकि वो ब्रिटिश रिकार्ड्स कुछ धुंधले है तो स्पष्ट नहीं कहा जा सकता।
