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हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की करसोग घाटी को देवभूमि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यहां स्थित ममलेश्वर महादेव मंदिर न केवल करसोग की पहचान है, बल्कि पूरे हिमाचल प्रदेश के सबसे प्राचीन शिव मंदिरों में से एक माना जाता है। सदियों पुराना यह मंदिर अपनी ऐतिहासिक विरासत, पौराणिक मान्यताओं और अनूठी विशेषताओं के कारण श्रद्धालुओं तथा शोधकर्ताओं के लिए समान रूप से आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। करसोग नगर के मध्य स्थित ममलेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास हजारों वर्षों पुराना माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं और लोककथाओं के अनुसार इसका संबंध सीधे महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय के लिए करसोग घाटी में रुके थे। इसी अवधि में उन्होंने यहां भगवान शिव की आराधना की और मंदिर की स्थापना की। यद्यपि इस संबंध में ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं, लेकिन स्थानीय समाज में यह विश्वास पीढ़ियों से चला आ रहा है। मंदिर का नाम "ममलेश्वर" भी अपने आप में विशेष महत्व रखता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार भगवान शिव यहां "ममलेश्वर महादेव" के रूप में विराजमान हैं और क्षेत्र के लोगों की रक्षा करते हैं। सदियों से यह मंदिर करसोग क्षेत्र के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र रहा है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है यहां स्थित अखंड ज्योति और अखंड धूना। मान्यता है कि यह पवित्र अग्नि सदियों से निरंतर जल रही है। श्रद्धालु इसे भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक मानते हैं। मंदिर में आने वाले भक्त इस धूने के दर्शन को अत्यंत शुभ मानते हैं। ममलेश्वर मंदिर की एक और अनूठी पहचान यहां सुरक्षित रखा गया विशाल गेहूं का दाना है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह दाना महाभारत काल का है और सामान्य गेहूं के दाने से कई गुना बड़ा है। इसे प्राचीन काल की समृद्धि और उस युग की विशिष्टता का प्रतीक माना जाता है। यह धरोहर वर्षों से श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। मंदिर परिसर में रखा गया विशाल ढोल भी लोगों के लिए विशेष आकर्षण का विषय है। लोकमान्यताओं के अनुसार इसका संबंध भीमसेन से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि पांडवों के करसोग प्रवास के दौरान इसका उपयोग किया जाता था। यद्यपि इसकी ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय संस्कृति में इसका विशेष स्थान है। ममलेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा राक्षस वध की है। लोककथाओं के अनुसार प्राचीन काल में करसोग क्षेत्र में एक भयानक राक्षस का आतंक था, जो प्रतिदिन गांव से एक व्यक्ति की बलि मांगता था। जब एक निर्धन परिवार के इकलौते पुत्र की बारी आई, तब भीमसेन ने स्वयं उसकी रक्षा का निर्णय लिया। कहा जाता है कि भीम ने राक्षस का वध कर क्षेत्र को उसके आतंक से मुक्त कराया। इस घटना के बाद लोगों की भगवान शिव और पांडवों के प्रति श्रद्धा और अधिक बढ़ गई। मंदिर की स्थापत्य कला भी इसकी विशेष पहचान है। पारंपरिक पहाड़ी शैली में निर्मित यह मंदिर पत्थर और लकड़ी की उत्कृष्ट कारीगरी का उदाहरण प्रस्तुत करता है। मंदिर की नक्काशी, प्राचीन शिखर और पारंपरिक निर्माण शैली हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है। समय-समय पर मंदिर का संरक्षण और जीर्णोद्धार किया गया, लेकिन इसकी मूल संरचना आज भी प्राचीन परंपराओं की झलक देती है। मंदिर परिसर में स्थापित पंचमुखी शिवलिंग और अन्य प्राचीन मूर्तियां भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखती हैं। यहां प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती है और वर्षभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। विशेष रूप से महाशिवरात्रि, सावन मास और अन्य शिव पर्वों पर मंदिर में भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ममलेश्वर महादेव मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह करसोग की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का भी केंद्र है। स्थानीय लोग किसी भी शुभ कार्य, विवाह, गृह प्रवेश या नए व्यवसाय की शुरुआत से पहले भगवान ममलेश्वर का आशीर्वाद लेना शुभ मानते हैं। मंदिर आज भी क्षेत्र के लोगों की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है। करसोग की शांत वादियों के बीच स्थित ममलेश्वर महादेव मंदिर इतिहास, पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। महाभारत काल से जुड़ी लोकमान्यताएं, अखंड धूना, विशाल गेहूं का दाना, भीम का ढोल और भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा इस मंदिर को हिमाचल प्रदेश के सबसे विशिष्ट धार्मिक स्थलों में शामिल करती हैं। यही कारण है कि सदियों बाद भी ममलेश्वर महादेव मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है और आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रहा है।
हिमाचल प्रदेश की देवभूमि में अनेक ऐसे देवस्थल हैं, जिनका महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्थानीय इतिहास, संस्कृति और लोकविश्वास का भी अभिन्न हिस्सा हैं। मंडी जिले की करसोग घाटी में स्थित देवता श्री मूल माँहूनाग जी का मंदिर भी ऐसा ही एक पवित्र स्थल है, जो सदियों से लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। करसोग की बखारी कोठी में समुद्र तल से लगभग 6200 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य, लोक परंपराओं और देव संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। मूल माँहूनाग जी को महाभारत के महान योद्धा और दानवीर सूर्यपुत्र कर्ण का अवतार माना जाता है। स्थानीय लोकमान्यताओं के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद कर्ण ने लोककल्याण के लिए देव रूप धारण किया और हिमालय की इन पर्वत श्रृंखलाओं को अपना निवास बनाया। समय के साथ वे माँहूनाग देवता के रूप में पूजे जाने लगे। आज भी करसोग क्षेत्र में कर्ण और माँहूनाग को एक ही दिव्य शक्ति का स्वरूप माना जाता है। यही कारण है कि देवता को दान, धर्म, पराक्रम और न्याय का प्रतीक माना जाता है। मूल माँहूनाग जी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोककथाओं में सुकेत रियासत के राजा श्याम सेन की कथा प्रमुख है। कहा जाता है कि मुगल शासनकाल में राजा श्याम सेन को बंदी बना लिया गया था। संकट की इस घड़ी में राजा ने माँहूनाग देवता का स्मरण किया। लोकविश्वास के अनुसार देव कृपा से राजा को मुक्ति मिली और वे सकुशल अपने राज्य लौट सके। इस घटना के बाद सुकेत राजपरिवार की माँहूनाग देवता के प्रति आस्था और अधिक गहरी हो गई तथा देवता को रियासत का रक्षक माना जाने लगा। मंदिर की एक विशेष पहचान यहां स्थित पवित्र धूना भी है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यह धूना सदियों से निरंतर प्रज्वलित है और कभी पूर्ण रूप से शांत नहीं हुआ। श्रद्धालु इसे देव कृपा और दिव्य शक्ति का प्रतीक मानते हैं। मंदिर परिसर में पहुंचने वाले भक्त इस धूने के दर्शन कर विशेष आध्यात्मिक अनुभूति का अनुभव करते हैं। माँहूनाग देवता की महिमा केवल करसोग तक सीमित नहीं है। सुंदरनगर क्षेत्र में भी देवता की विशेष मान्यता है और वहां स्थित मंदिर स्थानीय श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। समय-समय पर आयोजित देव यात्राएं और धार्मिक आयोजन इस आस्था को और अधिक सशक्त बनाते हैं। देवता की पालकी जब विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण करती है, तो बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचते हैं। मूल माँहूनाग जी का जिला स्तरीय मेला करसोग की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मेला प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास की एक से पांच प्रविष्टि तक आयोजित किया जाता है। मेले की शुरुआत देवता जी की भव्य जलेब से होती है, जिसमें ढोल, नगाड़े, रणसिंघा और करनाल की गूंज के बीच देवता की शोभायात्रा निकाली जाती है। हजारों श्रद्धालु इस अवसर पर करसोग पहुंचते हैं और देवता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह आयोजन केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि हिमाचली लोक संस्कृति, पारंपरिक नृत्य, लोकसंगीत और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। स्थानीय समाज में माँहूनाग देवता को न्यायप्रिय देवता के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त है। लोगों का विश्वास है कि यदि किसी व्यक्ति को कहीं न्याय नहीं मिलता, तो वह देवता के दरबार में अपनी प्रार्थना रख सकता है। इसी विश्वास को दर्शाती एक प्रसिद्ध स्थानीय कहावत आज भी सुनने को मिलती है— "सीने गोष्ठुए आग"। इसका अर्थ है कि माँहूनाग देवता सब कुछ देखते और सुनते हैं। न्याय भले देर से मिले, लेकिन सत्य और निष्पक्षता के साथ अवश्य मिलता है। ग्रामीण जीवन में भी देवता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। किसान खेतों में बीज बोने से पहले देवता का आशीर्वाद लेते हैं। विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यवसाय या अन्य शुभ कार्यों से पूर्व भी देवता की अनुमति और कृपा को आवश्यक माना जाता है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, "देवता बिना इजाजत कुछ नहीं और देवता की मर्जी से सब संभव है।" यह कथन आज भी क्षेत्र की गहरी धार्मिक आस्था को दर्शाता है। माँहूनाग देवता से जुड़ा एक और रोचक पक्ष उनकी समृद्ध देव परंपरा है। लोकमान्यताओं के अनुसार श्रद्धालु वर्षों से सोना, चांदी और अन्य मूल्यवान वस्तुएं देवता को अर्पित करते रहे हैं। यही कारण है कि माँहूनाग देवता को हिमाचल प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित और समृद्ध देवस्थलों में गिना जाता है। कुछ लोग उन्हें प्रतीकात्मक रूप से "देवताओं का बैंकर" भी कहते हैं, हालांकि यह लोक परंपरा और जनविश्वास का हिस्सा है। आज मूल माँहूनाग मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हिमाचल की जीवंत देव संस्कृति, लोक इतिहास और सामाजिक मूल्यों का प्रतीक बन चुका है। दानवीर कर्ण की परंपरा से जुड़ी यह आस्था लोगों को सत्य, न्याय, परोपकार और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। करसोग की शांत वादियों में स्थित यह देवस्थल आज भी हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है और उन्हें अपनी संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक विरासत से जोड़ता है। मूल माँहूनाग जी की यह गाथा केवल एक मंदिर की कहानी नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश की उस अनूठी देव संस्कृति की कहानी है, जो सदियों से लोगों के जीवन, विश्वास और सामाजिक व्यवस्था का आधार बनी हुई है।
दिनांक 17.06.2026 को पुलिस थाना चिरगांव की टीम को गश्त के दौरान चमराड़ा क्षेत्र में अवैध अफीम की खेती किए जाने संबंधी गोपनीय सूचना प्राप्त हुई। सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने स्थानीय स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति में तलाशी अभियान चलाया। तलाशी के दौरान सेब के पौधों के बीच अवैध रूप से उगाए गए 1,570 अफीम के पौधे (पॉड सहित) बरामद किए गए। बरामद पौधों में से कुछ पौधों को नमूने के रूप में कब्जे में लेकर सील किया गया, जबकि शेष पौधों को नियमानुसार मौके पर ही नष्ट कर दिया गया। इस संबंध में अभियोग संख्या 56/2026, दिनांक 17.06.2026, अधीन धारा 18 एनडीपीएस अधिनियम, पुलिस थाना चिरगांव, जिला शिमला में मामला दर्ज किया गया है। उक्त मामले की जांच के दौरान पुलिस टीम को चमराड़ा क्षेत्र में अवैध अफीम की खेती किए जाने संबंधी एक अन्य गोपनीय सूचना प्राप्त हुई। सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने पुनः स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति में तलाशी अभियान चलाया। तलाशी के दौरान सेब के बगीचे में खसरा नंबर 702 की भूमि पर अवैध रूप से उगाए गए 2,021 अफीम के पौधे (पॉड सहित) बरामद किए गए। बरामद पौधों में से कुछ पौधों को नमूने के रूप में कब्जे में लेकर सील किया गया, जबकि शेष पौधों को नियमानुसार मौके पर ही नष्ट कर दिया गया। इस संबंध में अभियोग संख्या 57/2026, दिनांक 17.06.2026, अधीन धारा 18 एनडीपीएस अधिनियम, पुलिस थाना चिरगांव, जिला शिमला में मामला दर्ज किया गया है। दोनों मामलों में कुल 3,591 अफीम के पौधे बरामद किए गए हैं। आरोपियों के विरुद्ध नियमानुसार कानूनी कार्यवाही अमल में लाई जा रही है तथा मामलों की आगामी जांच पुलिस थाना चिरगांव द्वारा की जा रही है।
साल 1991 में देश एक ऐसे आर्थिक मोड़ पर खड़ा था, जहां आगे का रास्ता धुंधला दिखाई दे रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म होने की कगार पर था। हालात इतने गंभीर थे कि भारत के पास केवल कुछ सप्ताह तक आयात करने लायक विदेशी मुद्रा बची थी। महंगाई बढ़ रही थी, सरकारी खजाने पर दबाव था और अर्थव्यवस्था की रफ्तार थम सी गई थी। देश संकट में था और सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल था- क्या भारत इस आर्थिक तूफान से निकल पाएगा? इसी बीच आम चुनावों के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री राजिव गाँधी की हत्या ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। चुनावों के बाद कांग्रेस सरकार बनी और पी वी नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री पद संभाला। प्रधानमंत्री बनते ही उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने की थी। नरसिम्हा राव जानते थे कि इस संकट से निपटने के लिए केवल राजनीतिक अनुभव पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जिसकी पहचान एक विश्वसनीय अर्थशास्त्री और प्रशासक के रूप में हो। उनकी नजर डॉ. मनमोहन सिंह पर गई, जो उस समय सक्रिय राजनीति में नहीं थे, लेकिन देश के सबसे सम्मानित अर्थशास्त्रियों में गिने जाते थे। वे मुख्य आर्थिक सलाहकार, वित्त सचिव, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर और प्लानिंग कमिशन के उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके थे। कहा जाता है कि नरसिम्हा राव ने स्वयं मनमोहन सिंह को बुलाकर देश की गंभीर आर्थिक स्थिति से अवगत कराया और वित्त मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया। देशहित को सर्वोपरि मानते हुए मनमोहन सिंह ने यह जिम्मेदारी स्वीकार की और 21 जून 1991 को पहली बार भारत के वित्त मंत्री बने। इसके बाद शुरू हुई भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े बदलाव की कहानी। जुलाई 1991 में संसद में बजट पेश करते हुए डॉ. मनमोहन सिंह ने एक नए आर्थिक युग की शुरुआत की। उन्होंने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति को आगे बढ़ाने का ऐलान किया। यह केवल आर्थिक सुधार नहीं था, बल्कि भारत की आर्थिक सोच में एक बड़ा बदलाव था। उस समय उद्योग शुरू करने के लिए सरकारी मंजूरियों का लंबा सिलसिला था, जिसे आमतौर पर "लाइसेंस राज" कहा जाता था। नई नीति के तहत इन प्रतिबंधों में ढील दी गई, उद्योगों को अधिक स्वतंत्रता दी गई और सरकारी नियंत्रण कम किए गए। लेकिन कहानी इतनी आसान नहीं थी। सुधारों का विरोध केवल विपक्ष से ही नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल के भीतर भी हो रहा था। कई नेताओं को डर था कि विदेशी कंपनियों के आने से भारतीय उद्योग प्रभावित होंगे। ऐसे माहौल में नरसिम्हा राव ने राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने विरोध के बीच सुधारों को आगे बढ़ाया और सरकार तथा संसद में आवश्यक समर्थन सुनिश्चित किया। विशेषज्ञ अक्सर कहते हैं कि यदि मनमोहन सिंह 1991 के आर्थिक सुधारों के वास्तुकार थे, तो नरसिम्हा राव उनके सबसे बड़े राजनीतिक संरक्षक थे। एक ने आर्थिक खाका तैयार किया, तो दूसरे ने उसे जमीन पर उतारने का रास्ता बनाया। इन्हीं सुधारों का सबसे बड़ा असर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर पड़। 1991 से पहले भारत में विदेशी निवेशकों के लिए कारोबार करना आसान नहीं था। कई क्षेत्रों में प्रतिबंध थे और अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया जटिल थी। उदारीकरण के बाद सरकार ने नियमों को सरल बनाया और कई क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए खोल दिया। धीरे-धीरे दुनिया की बड़ी कंपनियों ने भारत की ओर रुख करना शुरू किया। विदेशी निवेश के साथ नई तकनीक, आधुनिक प्रबंधन प्रणाली और वैश्विक बाजारों तक पहुंच भी भारत आई। ऑटोमोबाइल, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग और विनिर्माण क्षेत्रों में बड़े बदलाव दिखाई देने लगे। नई फैक्ट्रियां खुलीं, रोजगार के अवसर बढ़े और भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के अनुरूप खुद को विकसित करने का मौका मिला। भारत का आईटी क्षेत्र वैश्विक पहचान बनाने लगा और सेवा क्षेत्र तेजी से विस्तार करने लगा। हालांकि इस बदलाव के साथ बहस भी चलती रही। कुछ विशेषज्ञों ने आर्थिक असमानता, छोटे उद्योगों पर दबाव और क्षेत्रीय विषमताओं जैसे मुद्दे उठाए। लेकिन अधिकांश अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि 1991 के सुधार नहीं हुए होते, तो भारत की आर्थिक प्रगति की गति कहीं धीमी होती। आज, तीन दशक से अधिक समय बाद जब भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है और वैश्विक निवेशकों की पसंदीदा मंजिलों में शामिल है, तब 1991 की वह कहानी फिर याद आती है। यह केवल आर्थिक सुधारों की कहानी नहीं है। यह उस समय की कहानी है जब एक गंभीर संकट ने बदलाव की जरूरत पैदा की, बदलाव ने उदारीकरण को जन्म दिया, उदारीकरण ने FDI का रास्ता खोला और FDI ने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई पहचान दिलाई और इस पूरी कहानी के केंद्र में दो नाम हमेशा याद किए जाते है- पी.वी. नरसिम्हा राव, जिन्होंने राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई, और डॉ. मनमोहन सिंह, जिन्हें संकट की घड़ी में वित्त मंत्री बनाकर देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की जिम्मेदारी सौंपी गई। भारत की आधुनिक आर्थिक यात्रा का यह अध्याय आज भी इस बात का उदाहरण माना जाता है कि कभी-कभी सबसे बड़े संकट ही सबसे बड़े बदलावों की शुरुआत बन जाते हैं।
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में आने वाले पर्यटकों और स्थानीय लोगों को जल्द ही दुनिया के सात अजूबों की झलक एक ही स्थान पर देखने को मिलेगी। नगर निगम शिमला शहर के प्रमुख पर्यटन स्थलों रिज मैदान और मालरोड पर विश्व के सात प्रसिद्ध अजूबों की प्रतिकृतियां स्थापित करने जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य शहर की पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देना और लोगों को आकर्षक सेल्फी पॉइंट उपलब्ध कराना है। नगर निगम के अनुसार इन अजूबों की प्रतिकृतियां दिल्ली स्थित एक कंपनी द्वारा तैयार की जा रही हैं। निर्माण कार्य अंतिम चरण में है और जल्द ही इन्हें शिमला लाया जाएगा। निगम प्रशासन ने इन्हें स्थापित करने के लिए रिज मैदान और मालरोड पर उपयुक्त स्थान भी चिन्हित कर लिए हैं। रानी झांसी पार्क और रोटरी टाउनहॉल के समीप इन संरचनाओं के लिए विशेष रैंप और मजबूत नींव तैयार की जा रही है। नगर निगम के महापौर सुरेंद्र चौहान ने बताया कि इसी महीने के भीतर दुनिया के सातों अजूबों को स्थापित करने की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। उन्होंने कहा कि यह पहल शिमला की पर्यटन पहचान को और मजबूत करेगी तथा पर्यटकों के लिए नया आकर्षण केंद्र बनेगी। इससे स्थानीय कारोबारियों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है। इस बीच महापौर ने मंगलवार को छोटा शिमला बाजार का दौरा कर स्थानीय व्यापारियों की समस्याएं भी सुनीं। कारोबारियों ने मंदिर के समीप स्थित बंद नाली से फैल रही बदबू की शिकायत की। शिकायत मिलने के तुरंत बाद महापौर ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए और टैंकर मंगवाकर नाली की सफाई करवाई, जिससे स्थानीय लोगों को राहत मिली। शिमला में प्रस्तावित यह नई परियोजना शहर के पर्यटन ढांचे को और आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET में कथित पेपर लीक और प्रश्नपत्रों के अवैध प्रसार को लेकर एक महत्वपूर्ण मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि टेलीग्राम जैसे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल परीक्षा से जुड़े गोपनीय दस्तावेजों और प्रश्नपत्रों को साझा करने के लिए किया जा रहा है, जिससे परीक्षा की निष्पक्षता और पारदर्शिता प्रभावित हो रही है। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि परीक्षा संबंधी संवेदनशील सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए टेलीग्राम पर प्रतिबंध लगाने या उसके संचालन पर कड़े नियंत्रण संबंधी निर्देश जारी किए जाएं। मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका पर त्वरित सुनवाई के लिए सहमति जताई है और बुधवार को इस पर सुनवाई होने की संभावना है। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोपों ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। हाईकोर्ट का फैसला न केवल NEET बल्कि भविष्य में होने वाली अन्य राष्ट्रीय परीक्षाओं के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शिक्षा जगत, अभ्यर्थियों और अभिभावकों की नजरें अब अदालत की सुनवाई और संभावित निर्देशों पर टिकी हैं।
UGC NET 2026: एडमिट कार्ड जारी, 22 से 30 जून तक होगी परीक्षा; यहां जानें डाउनलोड करने की पूरी प्रक्रिया
नई दिल्ली: राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) ने यूजीसी नेट (UGC NET) जून 2026 सत्र की परीक्षा के लिए प्रवेश पत्र (Admit Card) जारी कर दिए हैं। परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थी आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर अपना एडमिट कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं। यूजीसी नेट परीक्षा 22 जून से 30 जून 2026 तक देशभर के विभिन्न परीक्षा केंद्रों पर आयोजित की जाएगी। एनटीए द्वारा जारी सूचना के अनुसार, उम्मीदवार अपने आवेदन संख्या (Application Number) और जन्म तिथि (Date of Birth) की मदद से लॉगिन कर एडमिट कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं। परीक्षा केंद्र पर प्रवेश पत्र के साथ एक वैध फोटो पहचान पत्र (ID Proof) ले जाना अनिवार्य होगा। यूजीसी नेट परीक्षा देशभर के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF), असिस्टेंट प्रोफेसर पद तथा पीएचडी प्रवेश पात्रता निर्धारित करने के लिए आयोजित की जाती है। इस बार भी लाखों उम्मीदवार परीक्षा में शामिल होंगे। अभ्यर्थियों को सलाह दी गई है कि वे एडमिट कार्ड में दर्ज सभी जानकारियों जैसे नाम, फोटो, हस्ताक्षर, परीक्षा तिथि, समय और परीक्षा केंद्र का पता ध्यानपूर्वक जांच लें। किसी भी प्रकार की त्रुटि मिलने पर तुरंत एनटीए हेल्पलाइन या आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से संपर्क करें। ऐसे डाउनलोड करें एडमिट कार्ड: यूजीसी नेट की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं। “UGC NET June 2026 Admit Card” लिंक पर क्लिक करें। आवेदन संख्या और जन्म तिथि दर्ज करें। लॉगिन करते ही एडमिट कार्ड स्क्रीन पर दिखाई देगा। इसे डाउनलोड कर प्रिंट निकाल लें। परीक्षा से संबंधित नवीनतम जानकारी और दिशा-निर्देशों के लिए उम्मीदवारों को नियमित रूप से एनटीए की आधिकारिक वेबसाइट पर नजर बनाए रखने की सलाह दी गई है।
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