•   Thursday May 19
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 Laptop allocation will happen in June
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जून में होगा लैपटॉप आवंटन

केंद्र सरकार के आठ वर्ष के कार्यकाल पुरे होने पर 31 मई को राष्ट्रीय कार्य्रक्रम शिमला में होने जा रहा हैं , जिसके चलते लैपटॉप  आवंटन जून के पहले सप्ताह तक स्थगित कर दिया हैं। स्कूल - कॉलेज में पढ़ने वाले मेधावियों को पहली बार आधुनिक तकनीक वाले 41 ,550 रुपए की कीमत वाले लैपटॉप लगभग प्रदेश के 20 हज़ार मेधावियों को दिए जायेगे। प्रदेश सरकार ने डैल कंपनी के लैपटॉप देने का फैसला लिया है। कोरोना के चलते बीते दो वर्षों से सरकार द्वारा  मेधावियों को लैपटॉप नहीं दिए गए थे। शैक्षणिक सत्र 2018-19 और 2019-20 के 20 हजार मेधावियों को लैपटॉप दिए जाने हैं। मेरिट सूची में शामिल दसवीं और बारहवीं कक्षा के 18,019 और कॉलेजों के 1,828 मेधावियों को लैपटॉप दिए जाने है। 

Karsog: Sadhana of conflict is the mantra of victory of Congress
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करसोग : अंतर्कलह साधना ही कांग्रेस की जीत का मंत्र

राज सोनी। फर्स्ट वर्डिक्ट करसोग की जनता के लिए पार्टी का चिन्ह बाद में, अपनी पसंद पहले आती है। बीते 12 विधानसभा चुनाव के नतीजों पर नज़र डाले तो यहाँ तीन बार निर्दलीय उम्मीदवार जीते है। भाजपा के गठन से पहले यहाँ 1977 में जनता पार्टी जीती, तो 1998 में पंडित सुखराम की हिमाचल विकास कांग्रेस को भी करसोग का प्यार मिला। वर्तमान में यहाँ भाजपा का कब्ज़ा है और कांग्रेस भी मैदान में डटी दिख रही है। यक़ीनन यहाँ आगामी चुनाव बेहद रोचक होने वाला है। पहले बात कांग्रेस की करें तो पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अंतर्कलह को साधना है। क्षेत्र में मनसा राम के बेटे महेश राज अभी से टिकट की कतार में है तो दूसरी ओर पूर्व में दो बार विधायक रहे मस्त राम तथा काफी समय से कांग्रेस पार्टी में कार्य कर रहे जगत राम, अधिवक्ता रमेश कुमार, निर्मला चौहान, हिरदाराम तथा उत्तम चंद चौहान भी ग्राउंड में डटे हुए है। अतीत में झांके तो 1993 व 2003 में कांग्रेस ने मस्त राम को मैदान में उतारा था, और दोनों बार मस्त राम ने करसोग सीट कांग्रेस की झोली में डाली। 2017 के चुनाव में मस्त राम पार्टी से टिकट की मांग कर रहे थे लेकिन तब कांग्रेस ने मनसा राम को मैदान में उतारा। टिकट बंटवारे को लेकर मस्त राम ने कांग्रेस पार्टी से नाता तोड़ा और निर्दलीय मैदान में उतरे। इसका लाभ भाजपा को हुआ और ये सीट भाजपा की झोली में गई। उधर, भाजपा की बात करें तो वर्तमान में हीरा लाल विधायक है। वर्ष 2007 में उन्होंने ही मनसा राम के विजयरथ पर लगाम लगाई थी, लेकिन जनता ने अगले चुनाव में फिर से मनसा राम को कमान सौंप दी। 2017 में भाजपा ने हीरा लाल को दोबारा से मौका दिया था और तब कांग्रेस की बगावत के चलते वे जीत दर्ज करने में कामयाब रहे। मनसा राम का रहा है दबदबा करसोग की सियासत में मनसा राम का दबदबा रहा है। मनसा राम कुल 9 बार चुनावी संग्राम में उतरे और पांच बार करसोग से विधायक बने जिसमें 4 बार कैबिनेट मंत्री तथा एक बार सीपीएस रहे। पिछले कई चुनावों के नतीजों पर नज़र डाले तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि करसोग की जनता ने पार्टी चिन्ह के बिना भी मनसा राम पर अपना प्यार बरसाया है। 1967 में मनसा राम ने बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीता भी। दूसरी बार 1972 में कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़े और जीते लेकिन 1977 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। मनसा राम ने 1982 में फिर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीते। इसके बाद 1998 में हिमाचल विकास कांग्रेस और 2012 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर मनसा राम इस क्षेत्र से विधायक बने। अब उनके पुत्र भी कांग्रेस से टिकट मांग रहे है। अब आने वाले विधानसभा चुनावों में देखना यह होगा की जनता किसको चुनेगी और किसके भाग्य का सितारा चमकेगा।  

 'Major' - 'Only' :- Sarveen Major's Role Minor in Shahpur
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‘मेजर’ –‘केवल’:- सरवीन शाहपुर में मेजर का रोल माइनर

अरविंद शर्मा। फर्स्ट वर्डिक्ट  शाहपुर विधान सभा क्षेत्र, नाम इतना शाही है कि जुबाँ पर आते ही इसके  शाही होने का आभास होता है! सियासत में शाहपुर के हिस्से जो शाही नाम आते हैं वह भी काफ़ी शाही रसूख़ रखते हैं, कांग्रेस से पहले एक नाम ‘चलता’ था मेजर विजय सिंह मनकोटिया तो भाजपा की तरफ़ से सरवीन चौधरी का नाम सामने आता है, मेजर का पॉलिटिकल करेक्टर ऐसा रहा है कि जनता दल के बाद जब उनका नाम बहुजन समाज पार्टी की कसौटी पर कसा था तो जनता को इसमें खोट ही नज़र आया बस कांग्रेस के टिकट की कसौटी पर मेजर खरा सोना साबित हुए थे, कांग्रेस छोड़ने के बाद जब भी मेजर ने कोई पारी खेली तो वह सरवीन की तेज़ गेंदों पर अपनी विकेट को उखड़ते देखने पर मजबूर हो गए, यहाँ इन दोनो के बाद तीसरा नाम आता है कांग्रेस के केवल पठानिया का, मेजर के कांग्रेस से बाहर होने के बाद केवल कांग्रेस के ‘हाथ’ पर भाग्य आज़माते हुए बीते नौ वर्षों से अपनी ही क़िस्मत से लड़ रहे हैं, सियासी तौर पर अगर शाहपुर की कुर्सी के ग्रह-गोचर देखे जाएँ तो  यूँ कहना ग़लत ना होगा कि मेजर मनकोटिया -केवल पठानिया दोनो एक दूसरे की सियासी  कुंडलियों  में साढ़सत्ती लिए बैठे हैं जो कि हर बार पिछले कई वर्षों से  सरवीन के लिए शाहपुर के सिहाँसन का योग बनाते आए है। हर बार एक दूसरे के लिए धूमकेतु सिद्ध होते आए मेजर और केवल सरवीन के लिए कुर्सी -सेतु साबित हुए हैं, इस  फेर में  केवल एक बार अपनी ज़मानत ज़ब्त करवा बैठे तो फिर दोबारा हार के हार पहनने को मजबूर हो गए, अगर सियासतन शाहपुर की  फ़िज़ाओं  की स्वरलहरियों की बात की जाए तो सरवीन के सुरमई सियासी संगीत की बीण पर कांग्रेस के हालात साँप की तरह नाचते नज़र आए हैं और जिनकी फुँकार ने कांग्रेस को ही फूँका है !  मेजर शांत नहीं हुए और  केवल से भिड़ते रहे नतीजा यह हुआ ना मेजर ख़ुद जीत पाए ना केवल को जीतने दिया, एक बार मेजर जब बसपा की टिकेट पर धर्मशाला भी  शिफ़्ट हुए तो अपनी जगह अपने अनन्य भक्त ओंकार राणा को केवल के सामने छोड़ गए, मेजर ख़ुद तो धर्मशाला से हार गए मगर शाहपुर में ओंकार राणा दूसरे नम्बर पर रहे! शाहपुर में कांग्रेस मत-भिक्षुओं के रोल में जितनी ख़ाली कटोरा लेकर घूमती है, भाजपा अकेले अपने कटोरे को शाहपुर में भारी रूप से भरने में कामयाब रहती है, अगर सामान्य लहजे में कहें तो शाहपुर में कांग्रेस की साँझी हार में भाजपा अपनी अकेली जीत सुनिशिच्त करती आ रही है जबकि यह भी हक़ीक़त है की इतने बड़े-बड़े नामों के बावजूद शाहपुर का वजूद बहुत छोटा बन के रह जाता है, विकास के नाम पर शाहपुर को वही मिलता आ रहा है जो साथ लगते विधान सभा क्षेत्रों से बचा-खुचा रह जाता है,  शाहपुर के रहनुमाओं के बिना किसी संघर्ष के चलते  किराए की कोख में पल रहे कुपोषित केंद्रीय विश्वविद्यालय के अस्थाई कैंपस जिसे ना जाने कब  कौन छीन ले जाए के अलावा  शाहपुर की झोली में  कोई सौग़ात नहीं नज़र आती , सड़कों के नाम पर  जर्जर रास्तों से रोज़ गुज़रने वाले बोह -दरिणी -कनोल -सल्ली -नोहली -करेरी-घेरा -चमियारा के बाशिंदे अभी तक सही सड़कों जैसी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे हैं ! ज़्यादा चर्चा में ना जाया जाए तो वर्षों से तीन की तिकड़ी के तिकड़मों में पिसती और मूलभूत सुविधाओं तक से वंचित शाहपुर की जनता इस बार  आने वाले चुनावों में क्या हेर-फेर करती है ! ख़ैर ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा ! लेकिन इस बार मेजर और केवल का हाथ बँटाते हुए आम आदमी पार्टी भी कहीं सरवीन के सियासी हालात फिर से बेहतरीन ना कर दे !  

Indian Postal Department is making bright future of daughters with Sukanya Samridhi Yojana: Superintendent Post Office
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भारतीय डाक विभाग सुकन्या समृधि योजना से कर रहा बेटियों का भविष्य उज्ज्वल : अधीक्षक डाकघर

फर्स्ट वर्डिक्ट । धर्मशाला भारत सरकार द्वारा बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के अंतर्गत वर्ष 2015 से बेटियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए सुकन्या समृधि योजना की शुरुआत की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आरंभ की गई। इस योजना का मुख्य लक्ष्य बेटियों के अभिवावकों को बेटियों के उज्ज्वल व सुरक्षित भविष्य के लिए उच्चतर ब्याज दर के साथ-साथ एक लोकप्रिय निवेश विकल्प उपलब्ध करवाना है। सुरेन्द्र पाल शर्मा अधीक्षक डाकघर धर्मशाला द्वारा सुकन्या समृधि योजना के बारे में अधिक जानकारी देते हुए बताया गया कि इस योजना के माध्यम से लाभार्थी द्वारा निवेश करके एकमुश्त राशि बेटी की शिक्षा या फिर शादी के लिए प्राप्त की जा सकती है। इस योजना के अंतर्गत लाभ प्राप्त करने के लिए बेटी की 10 वर्ष की आयु होने से पहले अकाउंट खुलवाना होगा। इस अकाउंट में निवेश की न्यूनतम सीमा 250 रुपए है तथा अधिकतम सीमा 1.5 लाख रुपए हैं। यह निवेश बेटी की उच्च शिक्षा या फिर शादी के लिए किया जा सकता है। इस योजना के माध्यम से सरकार द्वारा निवेश पर वर्तमान में 7.6 प्रतिशत की दर से ब्याज प्रदान किया जा रहा है। इसके अलावा इस योजना के अंतर्गत निवेश करने पर टैक्स में छूट भी प्रदान की जाती है। इस योजना को बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ स्कीम के अंतर्गत लांच किया गया है। इस योजना के अंतर्गत अकाउंट किसी भी डाकघर की शाखा में खुलवाया जा सकता है। सुकन्या समृद्धि खाते का संचालन बेटी की आयु 21 वर्ष की होने या फिर 18 वर्ष की आयु के बाद शादी होने तक किया जा सकता है। बेटी की उच्च शिक्षा के लिए 18 वर्ष की आयु के बाद 50 प्रतिशत की रकम की निकासी की जा सकती है। इस योजना में डाकघर द्वारा डिजिटल माध्यम से रकम जमा करवाने की भी सुविधा दी जा रही है। सुरेन्द्र पाल शर्मा द्वारा बताया गया कि इस योजना के आरम्भ से अब तक धर्मशाला डाक मण्डल में लगभग 49876 खाते खोले जा चुके हैं। सुकन्या समृद्धि योजना के अंतर्गत एक बेटी के लिए केवल एक ही खाता खुलवाया जा सकता है तथा खाता खुलवा आते समय बेटी का जन्म प्रमाण पत्र पोस्ट ऑफिस में जमा करना होगा। इसी के साथ साथ अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज जैसे कि पहचान पत्र तथा पते का प्रमाण भी जमा करना होगा।  

MoU signed for 490 MW Arun-4 hydroelectric project in Nepal
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नेपाल में 490 मेगावाट अरुण- 4 जलविद्युत परियोजना के लिए एमओयू साइन

फर्स्ट वर्डिक्ट।  शि‍मला नेपाल में 490 मेगावाट अरुण-4 जलविद्युत परियोजना के विकास के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तथा नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की गरिमामयी उपस्थिति में लुंबिनी में हस्ताक्षरित हुआ है। इस ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन पर नंद लाल शर्मा, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, एसजेवीएन तथा कुलमन घीसिंग, प्रबंध निदेशक, नेपाल विद्युत प्राधिकरण (एनईए) ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर बोलते हुए नंद लाल शर्मा ने कहा कि 490 मेगावाट, अरुण-4 जल विद्युत परियोजना एसजेवीएन और नेपाल विद्युत प्राधिकरण (एनईए) द्वारा संयुक्त उद्यम (जेवी) के रूप में विकसित की जाएगी और इस संयुक्त उद्यम में, एसजेवीएन की बहुमत हिस्सेदारी होगी। अरुण-3 एचईपी के अपस्ट्रीम में इस परियोजना का निर्माण इस संयुक्त उद्यम द्वारा किया जाएगा, जिसके पूरा होने पर प्रति वर्ष लगभग 2100 मिलियन यूनिट ऊर्जा का उत्पादन होगा। नेपाल के संखुवासभा जिला प्रांत-1 में स्थित इस परियोजना की अनुमानित विकास लागत 4900 करोड़ है।  नंद लाल शर्मा ने आगे इस बात पर जोर देते हुए कहा कि इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर, बिजली क्षेत्र में भारत-नेपाल संयुक्त विजन को प्राप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा। उन्हाेंने अवगत कराया कि यह एसजेवीएन द्वारा नेपाल में निर्मित होने वाली तीसरी मेगा परियोजना होगी। इसके अलावा पहले से निर्माणाधीन 900 मेगावाट अरुण-3 और 669 मेगावाट लोअर अरुण की परियोजना सर्वेक्षण और जांच के चरण में है। इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के साथ, एसजेवीएन के पास अब नेपाल में कुल 2059 मेगावाट की तीन परियोजनाएं हैं। शर्मा ने 2030 तक नेपाल में 5000 मेगावाट की परियोजनाओं को लक्षित करने संबंधी एसजेवीएन के अपने संकल्प को दोहराया। एकीकृत नदी बेसिन विकास दृष्टिकोण की मौ‍लिक अवधारणा नंद लाल शर्मा की है, जिसकी वकालत वह लंबे समय से करते आए हैं। नंद लाल शर्मा ने लंबे समय से विभिन्न राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपने इस दृष्टिकोण का पालन करने पर जोर दिया था। परिणामस्वरूप नेपाल में भी जलविद्युत परियोजनाओं के आबंटन के दौरान एक डेवलपर को, एकल नदी बेसिन में आबंटित किया गया। यह दृष्टिकोण जनशक्ति, बुनियादी ढांचे और वित्तीय संसाधनों के इष्टतम उपयोग को सक्षम बनाता है। उन्होंने संतोष व्यक्त किया कि इस नवीन अवधारणा को नेपाल सरकार के साथ-साथ भारत में भी हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश की राज्य सरकारों द्वारा स्वीकार किया गया है। शर्मा ने आगे कहा कि नेपाल में एसजेवीएन द्वारा विकसित की जा रही परियोजनाओं से समग्र विकास होगा और भारत और नेपाल में पारस्परिक आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि इन परियोजना गतिविधियों से संबंधित ढांचागत विकास क्षेत्र का समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास भी सुनिश्चित होगा। नेपाल में इन तीन जलविद्युत परियोजनाओं के अलावा, एसजेवीएन बिजली की निकासी के लिए 217 किमी 400 केवी के संबद्ध पारेषण प्रणाली का निर्माण भी कर रहा है।  नंद लाल शर्मा ने कहा कि लगभग 31500 मेगावाट के कुल पोर्टफोलियो के साथ, एसजेवीएन के पास अब संचालन और विकास के विभिन्न चरणों के तहत 30 गीगावाट से अधिक क्षमता की विद्युत परियोजनाएं हैं। नई परियोजनाओं के क्षेत्र में ये वर्तमान अतिरिक्त एडिशन ही कंपनी को वर्ष 2023 तक 5000 मेगावाट, 2030 तक 25000 मेगावाट और वर्ष 2040 तक 50000 मेगावाट की स्थापित क्षमता को साकार करने की दिशा में ले जा रहा है। नंद लाल शर्मा ने एसजेवीएन पर अपना विश्वास व्यक्त करने और अरुण-4 एचईपी के विकास कर्त्ता पर विचार करने के लिए दोनों राष्ट्रों के प्रधानमंत्रियों, विद्युत मंत्रालय और विदेश मंत्रालय, नेपाल में भारतीय दूतावास के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।  

Those who lose successive elections in BJP have a difficult chance again
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भाजपा में लगातार चुनाव हारने वालों को फिर मौका मुश्किल

सुनैना कश्यप. फर्स्ट वर्डिक्ट रतन पाल, तेजवंत नेगी, बलदेव शर्मा, बलदेव ठाकुर जैसे नेताओं की डगर होगी मुश्किल पार्टी विद डिफरेंस भाजपा मिशन रिपीट के लिए कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। संगठन, संसाधन और संतुलन के साथ -साथ पार्टी ये भी सुनिश्चित करना चाहती है कि उपचुनाव की तर्ज पर विधानसभा चुनाव में कोई रणनीतिक चूक न हो। ऐसे में माना जा रहा है कि आगामी चुनाव में पार्टी कई निर्वाचन क्षेत्रों में चेहरे बदलने वाली है। इसके लिए बाकायदा ग्राउंड फीडबैक लिया जाएगा, जिसका आधार न सिर्फ इंटरनल सर्वे होगा बल्कि बाहरी एजेंसियों से भी सर्वे करवाया जा सकता है। वहीँ लगातार दो या अधिक चुनाव हारने वाले नेताओं के टिकट भी आगामी विधानसभा चुनाव में कटना तय माना जा रहा है। प्रदेश में ऐसे 6 निर्वाचन क्षेत्र है जहाँ पार्टी टिकट पर एक ही उम्मीदवार लगातार दो चुनाव हार चूका है। इनमें अर्की से रतन सिंह पाल, बड़सर से बलदेव शर्मा, हरोली से प्रो राम कुमार, रामपुर से प्रेम सिंह धरैक और किन्नौर से तेजवंत नेगी लगातार दो चुनाव हार चुके है। वहीँ ठियोग से पार्टी सिंबल पर दो चुनाव हारने वाले राकेश वर्मा का स्वर्गवास हो चूका है। अर्की से रत्न सिंह पाल 2017 का विधानसभा चुनाव और 2021 में हुआ उपचुनाव हार चुके है तो अन्य सभी नेता 2012 व 2017 का विधानसभा चुनाव हार चुके है। फतेहपुर निर्वाचन क्षेत्र से बलदेव ठाकुर भी लगातार तीन चुनाव हार चुके है, किन्तु 2017 में वे बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव हारे थे जबकि 2012 और 2021 का उपचुनाव पार्टी सिंबल पर हारे है। जाहिर है इन सभी उम्मीदवारों का दावा टिकट के लिए कमजोर जरूर हुआ है। हालांकि स्थिति -परिस्थिति के लिहाज से इनमें से एकाध अपवाद जरूर हो सकते है।    क्षेत्रवार बात करें तो रामपुर और हरोली में भाजपा की बनिस्पत कांग्रेस बेहद मजबूत है, इस बार से इंकार नहीं किया जा सकता। इन दोनों सीटों पर टिकट बदले या न बदले, नतीजा बदलना बेहद मुश्किल है। वहीँ ठियोग में भी कांग्रेस - सीपीआईएम का मैच अगर फिक्स सा होता है तो भाजपा के लिए उम्मीद कम ही होगी। सही मायनों में अगर त्रिकोणीय मुकाबला हुआ तो ही भाजपा इस सीट पर बेहतर कर पायेगी। पर अन्य चार सीटें ऐसी है जहाँ भाजपा दमखम से लड़े और कोई रणनीतिक चुन न हो तो जीत की सम्भावना भी प्रबल होगी। बड़सर में भी दो चुनाव हारने के बाद बलदेव शर्मा की राह मुश्किल हो सकती है। हालांकि यहां बलदेव में समकक्ष कोई अन्य चेहरा अब भी नहीं दिखता। बलदेव के पक्ष में एक बात और जा सकती है, 2012 में जहाँ वे करीब ढाई हज़ार के अंतर से हारे थे तो 2017 में ये अंतर करीब 400 वोट का था। पर एक खेमा चाहता है कि इस बार यहाँ से पार्टी नए चेहरे को मौका दें।    अर्की की बात करें तो रतन सिंह पाल के अतिरिक्त पूर्व विधायक गोविंद राम शर्मा भी दावेदारों की फेहरिस्त में है। यहाँ पार्टी किसी नए उम्मीदवार को भी मैदान में उतार सकती है। बीते दिनों ही पार्टी ने प्रतिभा कंवर को प्रदेश भाजपा महिला मोर्चा का प्रवक्ता नियुक्त किया है। प्रतिभा भी सक्रीय है और टिकट की दावेदार है। वहीँ एक अन्य पत्रकार का नाम भी टिकट की रेस में है, जिनकी क्षेत्र में अच्छी पकड़ है। वहीँ फतेहपुर में जानकार मान कर चल रहे है की इस बार फिर पार्टी कृपाल परमार को मौका दे सकती है। लगातार तीन चुनाव हार चुके  बलदेव को एक और मौका मिलना मुश्किल है।     वहीँ जनजातीय जिला किन्नौर में ठाकुर सेन नेगी के बाद तेजवंत नेगी ही भाजपा का चेहरा रहे है। पर पिछले दो चुनाव हार चुके तेजवंत की राह इस बार मुश्किल होगी। बीते कुछ वक्त में पार्टी में सूरत नेगी के बढ़ते कद ने तेजवंत का तेज जरूर कुछ कम किया है। टिकट के लिए भी सूरत का दावा मजबूत है। यहाँ भाजपा के लिए उम्मीदवार का चयन बड़ी चुनौती है।      

Chanakya of Himachal's politics gone
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चले गए हिमाचल की सियासत के चाणक्य

फर्स्ट वर्डिक्ट. मंडी हिमाचल की सियासत के चाणक्य पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री पंडित सुखराम अब नहीं रहे। हिमाचल प्रदेश उनके जाने से गमगीन है। पंडित सुखराम का इस दुनिया से रुक्सत होना हिमाचल के सियासत के एक अध्याय का खत्म होना है। पंडित जी सिर्फ सियासत के चाणक्य ही नहीं बल्कि किंग मेकर भी कहलाए जाते थे। वो पंडित सुखराम ही थे जिनकी बदौलत 1998 में वीरभद्र दूसरी बार सरकार रिपीट करने में असफल हुए और प्रो प्रेम कुमार धूमल पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। पंडित सुखराम प्रदेश के वो एकमात्र नेता थे जिन्होंने अपने दम पर प्रदेश में तीसरी पार्टी बनाकर भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े राजनैतिक दलों को दिन में तारे दिखाए। बतौर केंद्रीय मंत्री पंडित सुखराम ने जो काम हिमाचल के विकास या खास तौर पर मंडी के लिए किये, उन्हें भुलाया नहीं जा सकता।पंडित सुखराम का जन्म 27 जुलाई 1927 को हिमाचल के कोटली गांव में रहने वाले एक गरीब परिवार में हुआ था। पंडित जी ने दिल्ली लॉ स्कूल से वकालत की और फिर अपने करियर की शुरूआत बतौर सरकारी कर्मचारी की। उन्होंने 1953 में नगर पालिका मंडी में बतौर सचिव अपनी सेवाएं दी। इसके बाद 1962 में मंडी सदर से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीते। 1967 में इन्हें कांग्रेस पार्टी का टिकट मिला और फिर से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद पंडित सुखराम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पंडित सुखराम के परिवार ने मंडी सदर विधानसभा क्षेत्र से 13 बार चुनाव लड़ा और हर बार जीत हासिल की।   केंद्र की सियासत में भी था रसूख : केंद्र की सियासत में भी पंडित सुखराम बड़ा नाम थे। सांसद रहते उन्होंने केंद्र में विभिन्न मंत्रालयों का कार्यभार संभाल। 1984 में सुखराम ने कांग्रेस पार्टी के टिकट पर पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और प्रचंड जीत के साथ संसद पहुंचे। 1989 के लोकसभा चुनावों में उन्हें भाजपा के महेश्वर सिंह से हार का सामना करना पड़ा। 1991 के लोकसभा चुनावों में सुखराम ने महेश्वर सिंह को हराकर फिर से संसद में कदम रखा। 1996 में सुखराम फिर से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। उन्होंने खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया। सुखराम पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में टेलीकॉम मिनिस्टर भी रहे। उन्हें भारत में संचार क्रांति का जनक भी कहा जाता है। वीरभद्र सिंह के मिशन रिपीट पर फेरा था पानी : 1998 के विधानसभा चुनाव में पंडित सुखराम ने कांग्रेस से अलग होकर हिमाचल विकास कांग्रेस बनाई जिसने वीरभद्र सिंह के मिशन रिपीट के अरमान पर पानी फेर दिया था। पंडित सुखराम के पांच विधायक जीतकर आये थे। भाजपा और कांग्रेस को 31-31 सीटें मिली, लेकिन सुखराम की हिविकां ने प्रो धूमल को समर्थन देकर वीरभद्र के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सरकार बनाने से रोक दिया। तब कांटे के मुकाबले में 23 सीटें ऐसी थी जहाँ जीत - हार का अंतर दो हज़ार वोट से कम था। इनमें से 14 सीटें कांग्रेस हारी थी और तीन सीटों पर तो उसे हिमाचल विकास कांग्रेस से सीधे मात दी थी। इसके अलावा कई सीटें ऐसी थी जहाँ कांग्रेस की हार का अंतर बेशक दो हज़ार वोट से अधिक था, लेकिन पार्टी का खेल हिमाचल विकास कांग्रेस ने ही बिगाड़ा था। 2017 में दिया कांग्रेस को झटका :  पंडित सुखराम ने 2003 में अपना आखिरी विधानसभा का चुनाव लड़ा और फिर 2007 में सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। 2012 में उनके बेटे अनिल शर्मा ने सदर से चुनाव लड़ा और सरकार में मंत्री बने। इसके बाद से सुखराम परिवार वर्ष 2017 तक कांग्रेस में रहा। पर पंडित जी चुनाव से पूर्व सपरिवार भाजपा में शामिल हो गए। माना जाता है कि उनके इस सियासी पैंतरे ने ऐसी हवा बिगाड़ी कि कांग्रेस का जिला मंडी में खाता भी नहीं खुला। 2019  में हुई कांग्रेस में वापसी : पंडित सुखराम का अपने पोते आश्रय शर्मा को सियासत में स्थापित होते देखना चाहते थे। कई मौकों पर खुद पंडितजी ने इसका जिक्र भी किया। पोते को सांसद बनाने की चाहत में ही पंडित जी 2019 में वापस कांग्रेस में आएं। आश्रय को टिकट भी मिला लेकिन जीत नहीं मिल सकी। बहरहाल पंडित जी दुनिया से रुक्सत कर चुके है। पंडित सुखराम ने एक लम्बी उम्र काटी, सत्ता सुख भोगा, विवादों में भी रहे, पर 95 साल की उम्र तक भी उनका सियासी रसूख ऐसा था कि उन्हें हल्के में लेने की भूल कोई नहीं कर सकता था। इसलिए पंडित सुखराम हिमाचल की सियासत के चाणक्य कहलाएं। मंडी तो पंडित सुखराम की ही थी ! 'मंडी हमारी है और हमारी ही रहेगी ' सियासत में अक्सर नेता इस तरह के बयान देते है। मंडी को लेकर तरह -तरह के दावे होते है। पर अगर कोई ऐसा है जिसे सही मायने में मंडी ने बाहें फैलाकर स्वीकार किया तो वो थे पंडित सुखराम। कुल 13 मर्तबा मंडी सदर हलके से पंडित जी या उनके पुत्र अनिल शर्मा विधायक बने, पार्टी चाहे कोई भी रही हो। पंडित जी सियासत में किसी भी मुकाम पर रहे हो, किसी भी ओहदे पर रहे हो लेकिन उन्होंने मंडी का विशेष ख्याल रखा। आज भी मंडी के सेरी मंच पर जाकर पता लगता है कि किसी सोच के साथ उस शहर को विकसित किया गया है, वो भी उस दौर में। इसीलिए मंडी के लोग पंडित जी को विकास का मसीहा मानते है। कोई किसी भी राजनैतिक विचारधारा का क्यों न हो, दबी जुबान में ही सही लेकिन ये जरूर स्वीकार करता है कि मंडी के विकास में पंडित सुखराम का योगदान अमिट है। नब्बे के दशक में पंडित सुखराम केंद्र में दूरसंचार मंत्री थे और उस दौर में बड़े शहरों में भी टेलीफोन का कनेक्शन लेने के लिए महीनों -सालों इंतजार करना पड़ता था। पर पंडित जी के राज में मंडी में टेलीफोन की घंटी खूब बजी। जिसने चाहा उसे कनेक्शन मिला, मंडी वालों के लिए विभाग का सिर्फ एक ही नियम था,वो था जल्द से जल्द कनेक्शन देना। केंद्रीय मंत्री रहते हुए भी पंडित सुखराम लोगों की पहुंच में थे, बिल्कुल सरल और जमीन से जुड़े हुए। छोटी -छोटी समस्याएं लेकर भी लोग पंडित जी के पास पहुंच जाते और हर छोटी समस्या को भी पंडित सुखराम पूरी तल्लीनता से सुनते और हरसंभव हल करते। सिंबल कोई भी रहा पर मंडी वालों ने दिया साथ : इसे मंडी वालों का पंडित सुखराम के प्रति स्नेह ही कहेंगे कि उन्होंने या उनके पुत्र अनिल शर्मा ने चाहे किसी भी सिंबल पर चुनाव क्यों न लड़ा हो, मंडी वालों ने हमेशा साथ दिया। पहली बार बतौर निर्दलीय चुनाव जीतने वाले पंडित सुखराम लम्बे वक्त तक कांग्रेस में रहे और हमेशा विधानसभा चुनाव जीते। इसके बाद जब 1998 में उन्होंने हिमाचल विकास कांग्रेस बनाई तो भी मंडी ने उनका साथ दिया।  2017 में जब पंडित जी और उनका परिवार भाजपाई हो गए तो भी मंडी वालों का साथ उन्हें मिला। और मुख्यमंत्री बनते -बनते रह गए पंडित सुखराम सर्वविदित है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री पंडित सुखराम की तमन्ना थी कि वे बतौर मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश की भागदौड़ संभाले। पर वीरभद्र सिंह के होते ऐसा हो न सका। कई ऐसे मौके आए जब पंडित सुखराम मुख्यमंत्री बनते -बनते रह गए। पहला मौका आया साल 1983 में। तत्कालीन मुख्यमंत्री ठाकुर रामलाल का नाम टिम्बर घोटाले में आया तो पार्टी आलाकमान ने उनसे इस्तीफा ले लिया। नए मुख्यमंत्री के नाम को लेकर कयास लग रहे थे और इनमें से एक प्रमुख नाम था पंडित सुखराम का जो ठाकुर रामलाल की कैबिनेट में मंत्री भी थे। पर इंदिरा गांधी का आशीर्वाद मिला वीरभद्र सिंह को जो उस वक्त केंद्र में सियासत कर रहे थे। इस तरह वीरभद्र सिंह पहली बार मुख्यमंत्री बने और पंडित सुखराम मुख्यमंत्री बनते -बनते रह गए1990 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ होने के बाद वीरभद्र सिंह के नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे थे। 1993 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल की लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी। कहते ही तब 20 से अधिक विधायक पंडित सुखराम के पक्ष में थे लेकिन जिला मंडी के ही कुछ नेता उनकी राह का रोड़ा बने और तीसरी बार वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री बने। इस तरह दूसरी बार पंडित जी मुख्यमंत्री बनते -बनते रह गए। वीरभद्र के मिशन रिपीट पर फेरा पानी 1998 के विधानसभा चुनाव से पहले पंडित सुखराम ने अपनी अलग पार्टी बना ली थी, नाम था हिमाचल विकास कांग्रेस। विधानसभा चुनाव में पंडित जी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरे लेकिन उनके खाते में पांच सीटें ही आई। ऐसे में पंडित जी का मुख्यमंत्री बनने का सपना तो पूरा नहीं हुआ लेकिन जिस कदर उन्होंने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई जिससे वीरभद्र सिंह भी मुख्यमंत्री नहीं बन सके। पंडित जी ने भाजपा के साथ गठबंधन सरकार बनाई और ये पहला मौका था जब कोई गठबंधन सरकार पांच साल चली भी। इसके बाद ही उन्हें हिमाचल की सियासत का चाणक्य कहा जाने लगा। वो स्कैंडल जिसने बदल कर रख दी पंडित सुखराम की सियासत तारिख थी 8 अगस्त 1996 । पंडित सुखराम का नाम टेलीकॉम घोटाले में सामने आया था। सीबीआई ने सुखराम, रुनु घोष और हैदराबाद स्थित एडवांस रेडियो फॉर्म कंपनी के मालिक पर केस दर्ज कर लिया था। 16 अगस्त को सीबीआई की एक टीम उनके दिल्ली के सफदरजंग स्थित आवास पर पहुंची और छापेमारी की। 80 के दशक में बोफोर्स घोटाले की वजह सत्ता खोने वाली कांग्रेस 90 के दशक में संचार घोटाले की वजह से फिर विवादों से घिर गई। नरसिम्हा राव सरकार में सुखराम के संचार मंत्री रहते हुए ये घोटाला हुआ। इस घोटाले ने न सिर्फ कांग्रेस की सरकार को हिला दिया बल्कि पंडित सुखराम को मंत्री और कांग्रेस पार्टी का साथ दोनों ही खोने पड़े। ये घोटाला पंडित सुखराम के जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनकर रह गया। इस 5 करोड़ 91 लाख के घोटाले की वजह से विपक्षी भाजपा ने तब 1996 में 10 दिनों तक संसद नहीं चलने दी थी। उस वक्त पंडित सुखराम के घर से 2.45 करोड़ रुपये बरामद हुए थे। इसके अलावा सीबीआई की एक टीम ने सुखराम के हिमाचल के मंडी स्थित बंगले पर भी छापेमारी की थी। टीम को वहां से 1.16 करोड़ रुपये मिले थे।  पैसे दो संदूकों और 22 सूटकेस में रखे थे, जिनमें से अधिकांश सूटकेस पूजा वाले घर में रखे हुए थे।सीबीआई की जांच में पता चला था  कि केंद्रीय मंत्री पंडित सुखराम ने पद का इस्तेमाल करते हुए हैदराबाद की एक निजी फर्म को ठेका दिया और बदले में तीन लाख रुपये की रिश्वत ली। सुनवाई के दौरान सुखराम ने अदालत में दलील दी कि उनके आवास से बरामद रुपए कांग्रेस पार्टी के हैं। उन्होंने दावा किया कि ये पैसा जम्मू-कश्मीर में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी फंड के रूप में इस्तेमाल करने के लिए भेजा गया। हालांकि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने सीबीआइ की पूछताछ में बरामद राशि के पार्टी फंड होने से इनकार कर दिया था ।  

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करसोग : अंतर्कलह साधना ही कांग्रेस की जीत का मंत्र

In Politics
Karsog: Sadhana of conflict is the mantra of victory of Congress

राज सोनी। फर्स्ट वर्डिक्ट करसोग की जनता के लिए पार्टी का चिन्ह बाद में, अपनी पसंद पहले आती है। बीते 12 विधानसभा चुनाव के नतीजों पर नज़र डाले तो यहाँ तीन बार निर्दलीय उम्मीदवार जीते है। भाजपा के गठन से पहले यहाँ 1977 में जनता पार्टी जीती, तो 1998 में पंडित सुखराम की हिमाचल विकास कांग्रेस को भी करसोग का प्यार मिला। वर्तमान में यहाँ भाजपा का कब्ज़ा है और कांग्रेस भी मैदान में डटी दिख रही है। यक़ीनन यहाँ आगामी चुनाव बेहद रोचक होने वाला है। पहले बात कांग्रेस की करें तो पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अंतर्कलह को साधना है। क्षेत्र में मनसा राम के बेटे महेश राज अभी से टिकट की कतार में है तो दूसरी ओर पूर्व में दो बार विधायक रहे मस्त राम तथा काफी समय से कांग्रेस पार्टी में कार्य कर रहे जगत राम, अधिवक्ता रमेश कुमार, निर्मला चौहान, हिरदाराम तथा उत्तम चंद चौहान भी ग्राउंड में डटे हुए है। अतीत में झांके तो 1993 व 2003 में कांग्रेस ने मस्त राम को मैदान में उतारा था, और दोनों बार मस्त राम ने करसोग सीट कांग्रेस की झोली में डाली। 2017 के चुनाव में मस्त राम पार्टी से टिकट की मांग कर रहे थे लेकिन तब कांग्रेस ने मनसा राम को मैदान में उतारा। टिकट बंटवारे को लेकर मस्त राम ने कांग्रेस पार्टी से नाता तोड़ा और निर्दलीय मैदान में उतरे। इसका लाभ भाजपा को हुआ और ये सीट भाजपा की झोली में गई। उधर, भाजपा की बात करें तो वर्तमान में हीरा लाल विधायक है। वर्ष 2007 में उन्होंने ही मनसा राम के विजयरथ पर लगाम लगाई थी, लेकिन जनता ने अगले चुनाव में फिर से मनसा राम को कमान सौंप दी। 2017 में भाजपा ने हीरा लाल को दोबारा से मौका दिया था और तब कांग्रेस की बगावत के चलते वे जीत दर्ज करने में कामयाब रहे। मनसा राम का रहा है दबदबा करसोग की सियासत में मनसा राम का दबदबा रहा है। मनसा राम कुल 9 बार चुनावी संग्राम में उतरे और पांच बार करसोग से विधायक बने जिसमें 4 बार कैबिनेट मंत्री तथा एक बार सीपीएस रहे। पिछले कई चुनावों के नतीजों पर नज़र डाले तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि करसोग की जनता ने पार्टी चिन्ह के बिना भी मनसा राम पर अपना प्यार बरसाया है। 1967 में मनसा राम ने बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीता भी। दूसरी बार 1972 में कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़े और जीते लेकिन 1977 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। मनसा राम ने 1982 में फिर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीते। इसके बाद 1998 में हिमाचल विकास कांग्रेस और 2012 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर मनसा राम इस क्षेत्र से विधायक बने। अब उनके पुत्र भी कांग्रेस से टिकट मांग रहे है। अब आने वाले विधानसभा चुनावों में देखना यह होगा की जनता किसको चुनेगी और किसके भाग्य का सितारा चमकेगा।  

हिमाचल के अस्पतालों में फ्री होंगे 233 टेस्ट

In Health
233 tests will be free in Himachal hospitals

हिमाचल प्रदेश के सरकारी अस्पताल परिसरों में स्थापित निजी लैबों में 233 टेस्ट निशुल्क होंगे। स्वास्थ्य विभाग की ओर से पुणे की कंपनी को टेंडर देने के बाद एग्रीमेंट साइन कर लिया गया है। करार के मुताबिक कंपनी को डेढ़ माह बाद सेवाएं देनी शुरू करनी होगी, वहीं तीन माह के भीतर अस्पतालों में अपना आधारभूत ढांचा विकसित करना होगा। प्रदेश के छह मेडिकल कॉलेजों, जोनल अस्पतालों, सिविल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में लैब स्थापित हैं। इनमें सरकारी रेट पर हर तरह के टेस्ट होते हैं। स्वास्थ्य विभाग की अपनी लैब भी हैं। इनमें 12 बजे तक टेस्ट होते हैं। उसके बाद इनकी जांच की जाती है। ऐसे में लोग निजी लैब में टेस्ट करवाते हैं। पहले अस्पतालों में 11 तरह की श्रेणियों में आने वाले मरीजों को ही यह सुविधा मिलती थी, लेकिन अब सभी मरीजों को निशुल्क टेस्ट सुविधा का लाभ मिलेगा। इसमें अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन भी शामिल हैं। स्वास्थ्य सचिव अमिताभ अवस्थी ने बताया कि निशुल्क टेस्ट की संख्या बढ़ाने से लोगों को काफी राहत मिलेगी। स्वास्थ्य विभाग के उपनिदेशक रमेश चंद ने कहा कि एग्रीमेंट साइन कर लिया गया है। नई कंपनी सरकार को 41 फ ीसदी तक टेस्ट में छूट देगी। मरीजों के टेस्ट की यह राशि सरकार वहन करेगी। मरीजों से टेस्ट से पैसे नहीं लिए जाएंगे।    

हिमाचल प्रदेश : हिमाचल के 153 प्राइमरी स्कूलों में एक भी विद्यार्थी ने नहीं लिया दाखिला

In Education First
 Himachal Pradesh: Not a single student took admission in 153 primary schools of Himachal

शैक्षणिक सत्र 2022-23 के दौरान प्रदेश के किसी भी विद्यार्थी ने 153 प्राइमरी स्कूलों में दाखिले नहीं लिए हैं।प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय ने इन स्कूलों में एक भी दाखिला नहीं होने से जिला शिक्षा अधिकारियों से कारण पूछे हैं। जिला शिमला में सबसे अधिक 39, कांगड़ा में 30 और मंडी जिला में ऐसे 26 स्कूल हैं। दस विद्यार्थियों की संख्या वाले 2100, 6 से 9 बच्चों वाले 1274 और 5 बच्चों वाले 673 स्कूल हैं। जिलों  की इस रिपोर्ट के आधार पर इन स्कूलों के भविष्य सम्बंधी कार्यों के लिए प्रस्ताव रखा जायेगा। इसके आलावा शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर निदेशालय को समय-समय पर भेजे गए प्रस्तावों की जानकारी भी जिला अधिकारियों से मांगी गई है।

थॉमस कप जीतकर भारत ने रचा नया इतिहास

In Sports
 India created new history by winning the Thomas Cup

थॉमस कप के फाइनल में भारतीय बैडमिंटन टीम ने इंडोनेशिया को 3-0 से हराय । भारत ने थॉमस कप के फाइनल में 14 बार के चैंपियन इंडोनेशिया को हराकर इतिहास में अपना नाम दर्ज कर दिया हैं। भारत इस ख़िताब को जीतने वाला छठा देश बन गया हैं। भारत ने इस ख़िताब को 73 वर्षों में पहली बार जीता हैं। बता दें की फाइनल के पहले मैच में लक्ष्‍य सेन ने जीत दिलाकर टीम को 1-0 से बढ़त दिलाई। लक्ष्‍य ने एंथोनी सिनिसुका को 8- 21, 21- 17, 21- 16 से मात दी।   सेमीफइनल में असफल रहने वाले लक्ष्‍य सेन ने फाइनल में अपने खेल प्रदर्शन से मैच को अपने नाम कर दिया।  गेम बुरी तरह से गंवाने के बाद उन्‍होंने दूसरे गेम में वापसी की और एंथोनी पर दबाव बनाना शुरू किया। उन्‍होंने अगले दोनों गेम शानदार अंदाज में जीते। भारत के इस सफर को सात्विक साईराज और चिराग शेट्टी की जोड़ी ने भी बरकरार रख।  भारतीय जोड़ी ने 18-21, 23-21, 21-19 से दूसरा मुकाबला जीतकर भारत को 2-0 से बढ़त दिला दी।

बांका हिमाचल : बॉलीवुड में जगमगाते सितारे

In Entertainment
shining stars in bollywood

बॉलीवुड में जगमगाते सितारे बॉलीवुड और हिमाचल का पुराना नाता है। बड़े - बड़े अभिनेता हिमाचल की हसीं वादियों में अपनी फिल्म की शूटिंग के लिए तो आते ही है मगर ऐसे कई लोग है जो हिमाचल के छोटे- छोटे शहरों से निकल कर मुंबई गए और बॉलीवुड के बड़े सितारे बन गए। दिग्गज बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर, कंगना रनौत, प्रीति ज़िंटा, टिस्का चोपड़ा और यामी गौतम जैसे बॉलीवुड के कई बड़े सितारे हिमाचल से सम्बन्ध रखते है। हिमाचल के छोटे शहरों से होने के बावजूद बी टाउन में अपनी धाक बना कर इन सभी सितारों ने हिमाचल का नाम रोशन किया है।   अनुपम खेर बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता अनुपम खेर का जन्म शिमला में हुआ था। इनके पिता पुष्कर नाथ एक कश्मीरी पंडित थे, वे पेशे से क्लर्क थे। अनुपम ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1982 में 'आगमन' नामक फिल्म से की थी, लेकिन 1984 में आई 'सारांश' उनकी पहली हिट फिल्म मानी जाती है। इन्होंने स्पेशल 26, द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर, ए वेडनसडे, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे, कुछ कुछ होता है, हम, और कश्मीर फाइल्स सहित कई शानदार फिल्में दी है। प्रीति जिंटा लाखो दिलों की धड़कन डिंपल गर्ल यानि प्रीति जिंटा हिंदी सिनेमा की जानी-मानी अभिनेत्रियों में से एक हैं। हिमाचल प्रदेश के शिमला में जन्मी एक्ट्रेस हिन्दी, तेलगू, पंजाबी व अंग्रेजी फिल्मों में कार्य कर चुकी है। शुरुआत में प्रीति ने मॉडलिंग में अपनी किस्मत आजमाई। फिल्म 'दिल से' में प्रीती सहायक अभिनेत्री के तौर पर नजर आयीं थी। उनकी बतौर मुख्य नायिका फिल्म 'सोल्जर' थी। कंगना रनौत कंगना रनौत ने बॉलीवुड में लंबे संघर्ष के बाद कामयाबी हासिल की है। हिमाचल के भाम्बला में जन्मी कंगना के करियर की शुरुआत मॉडलिंग और थियेटर से हुई थी। उनके फिल्मी करियर की शुरूआत फिल्‍म 'गैंगस्‍टर' से हुई। इस फिल्‍म के लिए उन्‍हें फिल्‍मफेयर का सर्वश्रेष्ठ नवोदित अभिनेत्री का पुरस्‍कार मिला। उन्होंने 'वो लम्‍हें', 'लाइफ इन अ मेट्रो', 'फैशन', 'थलाईवी', 'तन्नू वेड्स मन्नू' और 'क्वीन' जैसी फिल्मों में उन्होंने जबरदस्त अदाकारी की है।   टिस्का चोपड़ा टिस्का चोपड़ा बॉलीवुड में अपने दमदार अभिनय के लिए जानी जाती हैं। 'तारे जमीन पर', 'दिल तो बच्चा है जी' और 'अंकुर अरोड़ा मर्डर केस' जैसी फिल्मों में नजर आ चुकीं अदाकारा टिस्का चोपड़ा का जन्म हिमाचल प्रदेश के कसौली में हुआ। उन्होंने अपने कॅरियर की शुरुआत अजय देवगन के साथ 'प्लेटफॉर्म' (1993) नामक फिल्म से की थी। टिस्का ने टेलीविजन पर कई शार्ट फिल्मों और सीरियल में काम किया है। यामी गौतम : यामी गौतम हिमाचल के बिलासपुर में पैदा हुई थी। बाद में परिवार के साथ चंडीगढ़ चली आईं।  पिता मुकेश गौतम पंजाबी फिल्मों के डायरेक्टर थे। उनकी बड़ी बहन सुरीली भी पंजाबी फिल्मों की एक्ट्रेस बन गईं। ऐसे में जो यामी बचपन से आईएएस बनना चाहती थी, वो भी इस फिल्मी माहौल से बच नहीं पाईं और मुंबई चली आई। दो टीवी सीरियल में काम मिला- ‘चांद के पार चलो’ और ‘ये प्यार ना होगा कम’। कुछ साउथ की फिल्में भी मिल गईं। हिंदी फिल्म में यामी पहली बार आयुष्मान खुराना के साथ फिल्म ‘विकी डोनर’ में नजर आई थीं। यहां से उनकी किस्मत चमकी। इसके बाद उन्हें 'बदलापुर', 'काबिल', 'सरकार 3', 'एक्शन जैक्सन', 'उरी' और 'बाला' जैसी कई फिल्मों में काम करने का मौका मिला। रुबीना दिलैक :  बिग बॉस 14 की विजेता रह चुकीं रुबीना दिलैक हिमाचल के शिमला के चौपाल से संबंध रखती हैं। रुबीना आईएएस बनना चाहती थीं, लेकिन मन में एक्टिंग का कीड़ा भी घुसा हुआ था। चंडीगढ़ में एक ऑडिशन दिया तो उनको जीटीवी के सीरियल ‘छोटी बहू’ में रोल मिल गया।  यहीं से उनका ठिकाना मुंबई का ग्लैमर जगत बना।  वह ‘सास बिना ससुराल’, जीटीवी का ‘पुर्नविवाह- एक नई उम्मीद’, ‘देवों के देव महादेव’ जैसे तमाम सीरियल में काम कर चुकी हैं। उन्होंने टीवी शो ‘शक्ति –अस्तित्व के अहसास की’ में सौम्या सिंह नाम की एक ट्रांसजेंडर का किरदार भी निभाया है। रुबीना ‘बिग बॉस 14’ भी जीत चुकी है।   सेलिना जेटली: सेलिना जेटली 2001 की फेमिना मिस इंडिया का ताज अपने नाम कर चुकीं हैं। फेमिना मिस इंडिया का ताज जितने के बाद सेलिना ने हिंदी सिनेमा में अपना कदम रखा। सेलिना जेटली भी हिमाचल के शिमला से संबंध रखती है। उन्होंने साल 2003 में फिल्म जानशीन से फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था।  इस फिल्म में उनके अपोजिट फरदीन खान नजर आये थे। प्रिया राजवंश प्रिया राजवंश का नाम देव आनंद के भाई चेतन आनंद से जुड़ा था। चेतन अपनी पत्नी उमा से रिश्ते बिगड़ने के बाद उनसे अलग हो गए थे। फिर चेतन की जिंदगी में आईं प्रिया राजवंश। प्रिया का असली नाम था वेरा सुंदर सिंह। वह शिमला में पली बढ़ी थीं, लेकिन एक्टिंग की ट्रेनिंग उन्होंने लंदन में ली थी, उनके बोलचाल में अंग्रेजी का असर था। जब किसी ने चेतन को प्रिया की फोटो भेजी, तो उन्होंने फौरन उन्हें अपनी नई फिल्म ‘हकीकत’ के लिए साइन कर लिया।  फिल्म ‘हकीकत’ आज भी बॉलीवुड की सबसे बेहतरीन वॉर फिल्मों में शुमार होती है।  इसके बाद चेतन और प्रिया एक-दूसरे के करीब होते चले गए, जबकि उनकी उम्र में 16 साल का अंतर था। प्रेम चोपड़ा प्रेम चोपड़ा यूं तो लाहौर में पैदा हुए थे, लेकिन बंटवारे के बाद शिमला चले आए और फिर यहीं के होकर रह गए।  तब प्रेम के पिता उनको डॉक्टर या आईएएस बनाने का सपना मन में पाले हुए थे। वो एक आईसीएस (जो अब आईएएस होता है) ऑफिसर के बेटे थे। प्रेम के 5 भाई थे और एक छोटी बहन। उन्होंने कॉलेज के थिएटर ग्रुप में एक्टिंग करनी शुरू की थी। पिता ने समझाया कि इस क्षेत्र में काफी अस्थिरता है, पर वो नहीं माने। तब पिता ने कहा कि तुम किसी दूसरी नौकरी के साथ एक्टिंग कर सकते हो। वह मुंबई आ गए। टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में उनकी नौकरी लग गई। वहां वह बंगाल, बिहार, उड़ीसा में अखबार के सर्कुलेशन का काम देखते थे। काम से फुरसत मिलने पर वह अपना पोर्टफोलियो लेकर स्टूडियो के चक्कर काटते और रोल देने की गुजारिश करते। मोहित चौहान मोहित चौहान हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के नाहन में पैदा हुए थे। दिल्ली में पढ़ाई करने के बाद वह वापस हिमाचल चले आए। यह शानदार गायक दरअसल एक्टर बनना चाहते था। वह शौकिया तौर पर गाते-बजाते थे।  मोहित अपने कॉलेज के दिनों में ही गिटार, हार्मोनिका और बांसुरी बजाने में दक्ष हो गए थे। एक्टर तो नहीं बन पाए, पर वह सिल्क रूट बैंड से जा जुड़े। मोहित को फिल्मों में गाने का पहला मौका 2002 में आई संजय दत्त की फिल्म ‘रोड’ में मिला था।  वह ‘रंग दे बसंती’ के गाने ‘खून चला..’ ने घर-घर लोकप्रिय हो गए थे।  सबको लगा कि इस आवाज में दम है। करीना-शाहिद की फिल्म ‘जब वी मेट’ के गाने ‘तुम से ही..’ से वह छा गए।  2010 में आई फिल्म ‘दिल्ली 6’ के गाने ‘मसक्कली’ के लिए उन्हें पहली बार फिल्म फेयर के लिए बेस्ट मेल सिंगर का अवॉर्ड मिला था। वहीँ फिल्म रॉकस्टार के गांव ने उन्हें बुलंदी पर पहुंचा दिया।                 ReplyForward

जून में होगा लैपटॉप आवंटन

In News
 Laptop allocation will happen in June

केंद्र सरकार के आठ वर्ष के कार्यकाल पुरे होने पर 31 मई को राष्ट्रीय कार्य्रक्रम शिमला में होने जा रहा हैं , जिसके चलते लैपटॉप  आवंटन जून के पहले सप्ताह तक स्थगित कर दिया हैं। स्कूल - कॉलेज में पढ़ने वाले मेधावियों को पहली बार आधुनिक तकनीक वाले 41 ,550 रुपए की कीमत वाले लैपटॉप लगभग प्रदेश के 20 हज़ार मेधावियों को दिए जायेगे। प्रदेश सरकार ने डैल कंपनी के लैपटॉप देने का फैसला लिया है। कोरोना के चलते बीते दो वर्षों से सरकार द्वारा  मेधावियों को लैपटॉप नहीं दिए गए थे। शैक्षणिक सत्र 2018-19 और 2019-20 के 20 हजार मेधावियों को लैपटॉप दिए जाने हैं। मेरिट सूची में शामिल दसवीं और बारहवीं कक्षा के 18,019 और कॉलेजों के 1,828 मेधावियों को लैपटॉप दिए जाने है। 

नेपाल में 490 मेगावाट अरुण- 4 जलविद्युत परियोजना के लिए एमओयू साइन

In National News
MoU signed for 490 MW Arun-4 hydroelectric project in Nepal

फर्स्ट वर्डिक्ट।  शि‍मला नेपाल में 490 मेगावाट अरुण-4 जलविद्युत परियोजना के विकास के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तथा नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की गरिमामयी उपस्थिति में लुंबिनी में हस्ताक्षरित हुआ है। इस ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन पर नंद लाल शर्मा, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, एसजेवीएन तथा कुलमन घीसिंग, प्रबंध निदेशक, नेपाल विद्युत प्राधिकरण (एनईए) ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर बोलते हुए नंद लाल शर्मा ने कहा कि 490 मेगावाट, अरुण-4 जल विद्युत परियोजना एसजेवीएन और नेपाल विद्युत प्राधिकरण (एनईए) द्वारा संयुक्त उद्यम (जेवी) के रूप में विकसित की जाएगी और इस संयुक्त उद्यम में, एसजेवीएन की बहुमत हिस्सेदारी होगी। अरुण-3 एचईपी के अपस्ट्रीम में इस परियोजना का निर्माण इस संयुक्त उद्यम द्वारा किया जाएगा, जिसके पूरा होने पर प्रति वर्ष लगभग 2100 मिलियन यूनिट ऊर्जा का उत्पादन होगा। नेपाल के संखुवासभा जिला प्रांत-1 में स्थित इस परियोजना की अनुमानित विकास लागत 4900 करोड़ है।  नंद लाल शर्मा ने आगे इस बात पर जोर देते हुए कहा कि इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर, बिजली क्षेत्र में भारत-नेपाल संयुक्त विजन को प्राप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा। उन्हाेंने अवगत कराया कि यह एसजेवीएन द्वारा नेपाल में निर्मित होने वाली तीसरी मेगा परियोजना होगी। इसके अलावा पहले से निर्माणाधीन 900 मेगावाट अरुण-3 और 669 मेगावाट लोअर अरुण की परियोजना सर्वेक्षण और जांच के चरण में है। इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के साथ, एसजेवीएन के पास अब नेपाल में कुल 2059 मेगावाट की तीन परियोजनाएं हैं। शर्मा ने 2030 तक नेपाल में 5000 मेगावाट की परियोजनाओं को लक्षित करने संबंधी एसजेवीएन के अपने संकल्प को दोहराया। एकीकृत नदी बेसिन विकास दृष्टिकोण की मौ‍लिक अवधारणा नंद लाल शर्मा की है, जिसकी वकालत वह लंबे समय से करते आए हैं। नंद लाल शर्मा ने लंबे समय से विभिन्न राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपने इस दृष्टिकोण का पालन करने पर जोर दिया था। परिणामस्वरूप नेपाल में भी जलविद्युत परियोजनाओं के आबंटन के दौरान एक डेवलपर को, एकल नदी बेसिन में आबंटित किया गया। यह दृष्टिकोण जनशक्ति, बुनियादी ढांचे और वित्तीय संसाधनों के इष्टतम उपयोग को सक्षम बनाता है। उन्होंने संतोष व्यक्त किया कि इस नवीन अवधारणा को नेपाल सरकार के साथ-साथ भारत में भी हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश की राज्य सरकारों द्वारा स्वीकार किया गया है। शर्मा ने आगे कहा कि नेपाल में एसजेवीएन द्वारा विकसित की जा रही परियोजनाओं से समग्र विकास होगा और भारत और नेपाल में पारस्परिक आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि इन परियोजना गतिविधियों से संबंधित ढांचागत विकास क्षेत्र का समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास भी सुनिश्चित होगा। नेपाल में इन तीन जलविद्युत परियोजनाओं के अलावा, एसजेवीएन बिजली की निकासी के लिए 217 किमी 400 केवी के संबद्ध पारेषण प्रणाली का निर्माण भी कर रहा है।  नंद लाल शर्मा ने कहा कि लगभग 31500 मेगावाट के कुल पोर्टफोलियो के साथ, एसजेवीएन के पास अब संचालन और विकास के विभिन्न चरणों के तहत 30 गीगावाट से अधिक क्षमता की विद्युत परियोजनाएं हैं। नई परियोजनाओं के क्षेत्र में ये वर्तमान अतिरिक्त एडिशन ही कंपनी को वर्ष 2023 तक 5000 मेगावाट, 2030 तक 25000 मेगावाट और वर्ष 2040 तक 50000 मेगावाट की स्थापित क्षमता को साकार करने की दिशा में ले जा रहा है। नंद लाल शर्मा ने एसजेवीएन पर अपना विश्वास व्यक्त करने और अरुण-4 एचईपी के विकास कर्त्ता पर विचार करने के लिए दोनों राष्ट्रों के प्रधानमंत्रियों, विद्युत मंत्रालय और विदेश मंत्रालय, नेपाल में भारतीय दूतावास के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।  

ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर एंड्रयू साइमंड्स का कार हादसे में निधन,खेल जगत में शोक की लहर।

In International News
Australian cricketer Andrew Symonds died in a car accident, a wave of mourning in the sports world.

ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर एंड्रयू साइमंड्स का कार हादसे में निधन हो चूका है। वॉर्न के बाद दुनिया ने एक और दिग्गज क्रिकेटर खो दिया है। जानकारी के अनुसार ऑस्ट्रेलिया के पूर्व क्रिकेटर एंड्रयू साइमंड्स का शनिवार रात सड़क हादसे में निधन हो गया है। ऑस्ट्रेलियाई पुलिस के मुताबिक साइमंड्स कार में अकेले थे, जब शनिवार देर रात टाउन्सविले में उनकी कार सड़क से उतरी, तो हादसे के बाद उन्हें नजदीकी अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन उनकी स्थिति काफी नाजुक थी, डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। बता दें कि हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट ने महान स्पिनर शेन वॉर्न को भी खोया था।   स्थानीय पुलिस के अनुसार, शुरुआती जानकारी से संकेत मिलता है कि रात 11 बजे के बाद एलिस रिवर ब्रिज के पास हर्वे रेंज रोड पर साइमंड्स की कार चल रही थी। सड़क से हटने के बाद कार अनबैलेंस हुई और हादसा हुआ। इमरजेंसी सेवाओं ने 46 वर्षीय साइमंड्स को बचाने का प्रयास किया, लेकिन उनको काफी ज्यादा चोट आए थे जिसके कारण उनका निधन हो गया।       

आम ओ ख़ास के शायर बशीर बद्र के 20 बेहतरीन शेर

In Kavya Rath
आम ओ ख़ास के शायर बशीर बद्र के 20 बेहतरीन शेर

बशीर बद्र शायरी के उन पैमानों को उजागर करते हैं जहां आसान शब्दों में गहरी बात कह दी जाती है। ऐसे शायर ही लोगों के दिलों तक का सफ़र कर पाते हैं। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि बशीर बद्र भी लोगों के शायर हैं जिन्हें आम से ख़ास तक हर कोई पसंद करता है। इनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर है। भोपाल से ताल्लुकात रखने वाले बशीर बद्र का जन्म कानपुर में हुआ था। न जाने कितनी बार अपनी बात कहने के लिए बशीर साहब को संसद में भी पढ़ा जा चुका है। आइए पढ़ते हैं बशीर साहब के लिखे ऐसे ही कुछ ख़ास शेर    दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिन्दा न हों हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा शौहरत की बुलन्दी भी पल भर का तमाशा है जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला  उसे किसी की मुहब्बत का एतिबार नहीं उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है गुलाबों की तरह शबनम में अपना दिल भिगोते हैं मुहब्बत करने वाले ख़ूबसूरत लोग होते हैं चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं से ज़मीं ग़ज़ल के शेर कहां रोज़-रोज़ होते हैं अबके आंसू आंखों से दिल में उतरे रुख़ बदला दरिया ने कैसा बहने का ज़हीन सांप सदा आस्तीन में रहते हैं ज़बां से कहते हैं दिल से मुआफ़ करते नहीं  सात सन्दूकों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें आज इन्सां को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत खुले से लॉन में सब लोग बैठें चाय पियें दुआ करो कि ख़ुदा हमको आदमी कर दे लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुशबू अज़ान दे जी चाहता है मैं तेरी आवाज़ चूम लूं इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरी लोग तुझको मेरा महबूब समझते होंगे  मुझको शाम बता देती है तुम कैसे कपड़े पहने हो इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे ऐसे मिलो कि अपना समझता रहे सदा जिस शख़्स से तुम्हारा दिली इख़्तिलाफ़ है सच सियासत से अदालत तक बहुत मसरूफ़ है झूट बोलो, झूट में अब भी मोहब्बत है बहुत किताबें, रिसाले न अख़़बार पढना मगर दिल को हर रात इक बार पढ़ना मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत संवरती है मैं दुश्मनों का बड़ा एहतेराम करता हूं       

SBI Recruitment 2022: एसबीआई में नौकरी का मौका, एससीओ के पदों पर भर्ती में करें आवेदन

In Job
SBI Recruitment 2022

बैंक भर्ती की राह देख रहे उम्मीदवारों के लिए खुशखबरी है। देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई में नौकरियां निकलीं हैं। ये नौकरियां स्पेशलिस्ट ऑफिसर कैडर की हैं। एसबीआई ने विभिन्न विषयों में आठ विशेषज्ञ संवर्ग अधिकारी पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है। भारतीय स्टेट बैंक की भर्ती नियमित और अनुबंध के आधार पर हो रही है। इसमें आवेदन करने के इच्छुक उम्मीदवार अंतिम तिथि 28 अप्रैल तक अप्लाई कर सकते हैं। इच्छुक उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट sbi.co.in के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं।   एसबीआई एससीओ भर्ती की महत्वपूर्ण तिथियां ऑनलाइन आवेदन जमा करने की प्रारंभिक तिथि : 08 अप्रैल, 2022 ऑनलाइन आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि : 28 अप्रैल, 2022 शुल्क भुगतान की अंतिम तिथि : 28 अप्रैल, 2022     एसबीआई एससीओ भर्ती में आवेदन कैसे करें इच्छुक उम्मीदवार एसबीआई की आधिकारिक वेबसाइट sbi.co.in के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। एसबीआई एससीओ भर्ती 2022 चयन प्रक्रिया शॉर्टलिस्टिंग और साक्षात्कार पर आधारित होगी।  एसबीआई एससीओ भर्ती आवेदन शुल्क परीक्षा शुल्क का भुगतान डेबिट कार्ड / क्रेडिट कार्ड / इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से करें। जनरल/ ईडब्ल्यूएस और ओबीसी के लिए : 750/- एससी/ एसटी/ पीडब्ल्यूडी के लिए : कोई शुल्क नहीं   एसबीआई एससीओ भर्ती पदों का विवरण पद : वरिष्ठ कार्यकारी (अर्थशास्त्री) रिक्ति की संख्या : 02 पद : एडवाइजर (फ्रॉड रिस्क) रिक्ति की संख्या : 04 पद : मैनेजर (परफोर्मेंस प्लानिंग एंड रिव्यू) रिक्ति की संख्या : 02    

हिमाचली लोक संस्कृति के ध्वजवाहक थे लायक राम रफीक

In Banka Himachal
 Ram Rafiq was the flag bearer of Himachali folk culture

पहाड़ी लोक संस्कृति के नायक लायक राम रफ़ीक़ वो शक्सियत है जिन्होंने अपने जीवन का अंतिम दशक खुद तो अंधेरे में बिताया, मगर वो पहाड़ी गायकी को वो पहचान दे गए जो आज भी रोशन है। हिमाचल में पहाड़ी नाटियों का दौर बदलने वाले रफ़ीक़ एक ऐसे गीतकार थे जिन्होंने अपने जीवन में करीब 2500 से अधिक पहाड़ी गीत लिखकर इतिहास रचा। हिमाचल में शायद ही ऐसा कोई गायक होगा, जिसने पारंपरिक गीतों के पीछे छिपे इतिहास के जन्मदाता लायक राम रफीक के गानों को न गाया हो। आज भी रफीक के लिखे गानों को गुनगुनाया जाता है, गाया जाता है। उनके लिखे अमर गीत अब भी महफिलें लूटते है। प्रदेश का ऐसा शायद ही कोई क्षेत्र हो जहां शादी के डी जे या स्कूलों के सांस्कृतिक या अन्य आयोजनों में रफ़ीक के गीतों ने रंग न जमाया हो। नीलिमा बड़ी बांकी भाई नीलिमा नीलिमा.., होबे लालिए हो जैसे गीत हो या मां पर लिखा मार्मिक गीत 'सुपने दी मिले बोलो आमिएं तू मेरिए बेगे बुरो लागो तेरो आज, जिऊंदिए बोले थी तू झालो आगे रोएला बातो सच्ची निकली से आज' ...  रफीक कई कालजयी गीत लिख गए। रफीक आकाशवाणी शिमला से गायक और अपने गीतों की अनेक लाजवाब धुनों के रचयिता भी रहे।      अपना पूरा जीवन पहाड़ी संगीत पर न्योछावर करने वाले लायक राम रफीक का अंतिम समय बेहद दुखद व कठिनाओं से भरा रहा। ग्लूकोमा ने उनकी आंखों की रोशनी चुरा ली थी। उन्हें अपना अंतिम समय अँधेरे में बिताना पड़ा, मगर ये अंधापन भी उन्हें अपने आजीवन जुनून का पीछा करने से नहीं रोक सका - अंतिम सांस तक वो पहाड़ी गीत लिखते रहे। रफ़ीक़ शिमला में ठियोग के पास एक छोटे से गाँव (नालेहा) में रहा करते थे। कृषि परिवार में जन्मे और स्थानीय स्कूल में पढ़े लिखे। एक पुराने साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि वे मीट्रिक की परीक्षा भी पास नहीं कर पाए थे, स्कूल की किताबों में उनका मन ही नहीं लगता था। पर ठियोग की लाइब्रेरी में रखी साहित्यिक किताबों से मजबूत रिश्ता था। रफ़ीक़ पूरा दिन उस लाइब्रेरी में बैठ उर्दू और हिंदी की कविताओं से भरी किताबें पढ़ते रहते। इन्हीं कविताओं को पढ़ रफ़ीक़ को पहाड़ी बोली में कविताएं लिखने की प्रेरणा मिली और बस तभी से रफ़ीक़ ने अपने ख्यालों को शब्दों के ज़रिये गीत माला में पिरोना शुरू कर दिया।       हजारों लोकप्रिय गीतों के गीतकार लायक राम रफ़ीक उपेक्षा का शिकार रहे है। उनके गीतों को आवाज देकर न जाने कितने गायकों ने शोहरत कमाई और रफीक के हिस्से आई सिर्फ उपेक्षा। ये बेहद विडम्बना का विषय है कि रफीक के अनेक लोकप्रिय गीतों के विवरण में उनका नाम तक दर्ज नहीं है। न सिर्फ रफीक साहब बल्कि पहाड़ी संगीत जगत में गीतकार सबसे अधिक उपेक्षित वर्ग है। एसडी कश्यप को देते थे इंडस्ट्री में लाने का श्रेय : रफीक ने 78 साल की उम्र में अपनी आखिरी सांस लेने से पहले तक लगभग 2,500 गीत लिखे थे। रफ़ीक़ ने न सिर्फ नाटियों (लोक गीतों) की लोकप्रियता को बढ़ाने का कार्य किया बल्कि उन्हें व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक बनाने के लिए भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। रफीक के हिमाचल म्यूजिक इंडस्ट्री में आने से पहले,  संगीत निर्देशक एसडी कश्यप ने मंडी में हिमाचल प्रदेश का पहला स्टूडियो ( साउंड एंड साउंड स्टूडियो खोला था )। रफीक अक्सर इंटरव्यूज में ये कहा करते थे की उन्हें रचनाकार बनाने में एसडी कश्यप का बड़ा हाथ था। वे ही उन्हें इस इंडस्ट्री में लेकर आए थे। वे ठियोग से मंडी जा उन्हीं के स्टूडियो में अपने गाने रिकॉर्ड करवाया करते। रफ़ीक़ ने एक लम्बे अर्से तक आकाशवाणी में बतौर गायक भी कार्य किया।   रफीक के लिखे गीत सबको समझ आये:    हिमाचली नाटियों में वास्तविक प्रेम कहानियां, बहादुरी और अच्छे कामों की यादें संजोई जाती है। उस दौर में पहाड़ी नाटियों से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या थी भाषा। दरअसल हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में  हर 10-15 मील के बाद भाषा बदल जाती है। इसलिए, किसी विशेष क्षेत्र की भाषा में बनाए गए और गाए गए पारंपरिक गीतों को अन्य क्षेत्रों में उतना सराहा और समझा नहीं जाता था। इस दुविधा को दूर करने में रफीक का बड़ा हाथ रहा। वो ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर लिखते की हर किसी को वो समझ आ जाए। पारंपरिक नाटियों से हटकर, उन्होंने रोमांटिक गीतों को अपनी खूबी बना लिया और उन्हें एक सरल भाषा में लिखा। हर कोई उनके लिखे गाने समझने व गुनगुना लगा। ऊपरी शिमला क्षेत्र के विभिन्न क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाओं पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। इसने उन्हें नाटियों के लिए एक बड़ा दर्शक वर्ग बनाने में मदद की, जिससे यह शैली व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक हो गई। उन लिखे गीतों को गाना हर नए पुराने सिंगर की डिमांड बन गई। गीत लिखने और बनाने के अपार प्रेम ने उन्हें पहाड़ी गीतों का सबसे उम्दा लेखक बना दिया।

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