•   Wednesday Dec 07
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Kangra: Fatehpur's vote counting will be completed in twelve rounds
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कांगड़ा : बारह राउंड में पूरी होगी फतेहपुर की मतगणना

फतेहपुर निर्वाचन अधिकारी (एसडीएम) विश्रुत भारती  की अध्यक्षता में वज़ीर राम सिंह राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, देहरी में मतगणना कार्य की अंतिम तैयारियों को लेकर समीक्षा बैठक आयोजित की गई। इस दौरान सहायक निर्वाचन अधिकारी (तहसीलदार) हंस राज रावत, निर्वाचन कानूनगो राजेश कुमार सहित अन्य अधिकारी व कर्मी उपस्थित रहे। उन्होंने बताया कि विधानसभा निर्वाचन-2022 के लिए 8 दिसम्बर को देहरी कॉलेज में सम्पन्न होने वाली मतगणना के लिए प्रशासन ने सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली है। उन्होंने बताया कि विधानसभा क्षेत्र के लिए कुल बारह राउंड में मतगणना की प्रक्रिया पूरी होगी। 12 नवंबर को 112 मतदान केंद्रों पर सम्पन्न हुए मतदान में ईवीएम में दर्ज 62852 मतों की प्रत्येक राउंड की गणना के लिए 10 टेबल लगाए गए है। इसके अतिरिक्त डाक मत पत्रों (पोस्टल बैलेट) की गिनती के लिए चार अलग टेबल लगाए गए है। विश्रुत भारती ने बताया कि ईवीएम के लिए स्थापित प्रत्येक टेबल पर एक-एक माईक्रो ऑब्जर्वर, मतगणना पर्यवेक्षक और मतगणना सहायक नियुक्त किये गए है। वहीं पोस्टल की गिनती के लिए स्थापित प्रत्येक टेबल में एक-एक माईक्रो ऑब्जर्वर और मतगणना पर्यवेक्षक तथा दो मतगणना सहायक  तैनात रहेंगे। उन्होंने बताया कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार का एक एजेंट भी प्रत्येक मतगणना टेबल पर मौजूद रहेगा। उन्होंने बताया कि प्रत्याशी के आधिकारिक काउंटिंग एजेंट तथा मतगणना कार्य के लिए नियुक्त किसी भी अधिकारी और कर्मचारी को रिटर्निंग अधिकारी द्वारा जारी प्रदत पहचान पत्र के विना मतगणना केंद्र में प्रवेश नहीं मिलेगा। विश्रुत भारती ने बताया कि मतगणना केंद्र पर मोबाईल फोन ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। उन्होंने बताया कि प्रेस प्रतिनिधियों की सुविधा के लिए मतगणना केंद्र परिसर में मीडिया सेंटर की स्थापना की गई है। इसके अतिरिक्त उनके बैठने एवम रुझानों बारे समय-समय पर जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए भी विशेष व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।  

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प्रदेश ही नहीं देश के सियासी पटल पर भी दमदार है अनुराग

  केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर निसंदेह हिमाचल का वो चेहरा है जिसे देश-विदेश में भी लोग न सिर्फ पहचानते है, बल्कि पसंद भी करते है। वर्तमान में मोदी सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा युवा एवं खेल मंत्रालय का भार संभाल रहे 48 वर्षीय अनुराग ठाकुर  हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से चौथी बार सांसद है। 2019 में जब मोदी सरकार दूसरी बार सत्ता में लौटी तो अनुराग ठाकुर को वित्त राज्य मंत्री बनाया गया था। फिर जुलाई 2021 में उनका कद बढ़ा और वे केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बन गए। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर में जन्में और पले बढ़े अनुराग ठाकुर के पिता प्रो. प्रेम कुमार धूमल दो बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे है। पर इसका मतलब ये नहीं है कि अनुराग आसानी से सियासत में स्थापित हो गए। उन्होंने एक आम कार्यकर्ता की तरह वर्षों संगठन में काम किया और हर मौके पर खुद को साबित भी किया। 2010 में वे भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और लगातार तीन टर्म तक इस पद पर रहे। संभवतः वे भाजयुमो में अब तक के सबसे लोकप्रिय अध्यक्ष रहे है। क्रिकेट की सियासत में भी अनुराग ठाकुर की खासी दिलचस्पी रही है। साल 2000 में अनुराग हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बने और चार बार इस पद पर रहे। प्रदेश में धर्मशाला स्टेडियम उन्हीं की देन है। इसी बीच मई 2016  में अनुराग ठाकुर बीसीसीआई के प्रेजिडेंट भी बने लेकिन लोढ़ा कमिटी की  सिफारिशों पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद उन्हें ये पद छोड़ना पड़ा। बहरहाल भाजपा समर्थकों का एक बड़ा तबका ये चाहता है कि अनुराग प्रदेश की कमान संभाले। उधर बार-बार अनुराग ठाकुर दोहराते रहे है कि वे केंद्र में खुश है और फिलवक्त प्रदेश की सियासत में एंट्री का उनका कोई इरादा नहीं है। पर हिमाचल की सियासत से अनुराग को अलग नहीं रखा जा सकता। वैसे भी जानकार मान रहे है कि आठ दिसंबर को रिवाज नहीं बदला तो भाजपा में बहुत कुछ बदलना है। ऐसे में मुमकिन है कि 2027 आते-आते समीरपुर से शिमला का सियासी मार्ग फिर प्रशस्त हो जाएँ। पर अनुराग ठाकुर केंद्र की राजनीति का भी बड़ा नाम है। वर्तमान में कैबिनेट मंत्री है। अनुराग पार्टी के उन चुनिंदा चेहरों में से एक है जो अक्सर कैमरे के आगे आकर सरकार की बात रखते है। अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश के उन गिने चुने नेताओं में से है जिनकी पहचान देश के हर कोने में है। ऐसे में अगर अनुराग केंद्र में भी जमे रहते है तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनमें सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की क्षमता है।   

A Himachali is handling the command of the world's biggest party
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एक हिमाचली संभाल रहा है दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की कमान

भारतीय जनता पार्टी दुनिया का सबसे बड़ा राजनैतिक दल हैं और इस पार्टी की कमान भी एक हिमाचली नेता के हाथ में हैं। केंद्रीय मंत्री रहे जगत प्रकाश नड्डा वर्तमान में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उनका जन्म बिहार में हुआ और  प्रारंभिक शिक्षा भी, पर जड़े हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर से जुड़ी है। उनका राजनैतिक सफर भी हिमाचल प्रदेश से ही परवान चढ़ा। भाजपा के कद्दावर नेताओं में गिने जाने वाले नड्डा का ने अपने सियासी सफर की शुरूआत साल 1975 में जेपी आंदोलन से की थी। देश के सबसे बड़े आंदोलनों में गिने जाने वाले इस आंदोलन में नड्डा भी शामिल हुए थे। इस आंदोलन में हिस्सा लेने के बाद जेपी नड्डा बिहार की भाजपा की स्टूडेंट विंग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हो गए थे। जेपी नड्डा ने 1977 में अपने कॉलेज में छात्रसंघ का चुनाव लड़ा था और जीत दर्ज कर वो पटना यूनिवर्सिटी के सचिव बन गए। फिर पटना यूनिवर्सिटी से स्नातक होने के बाद नड्डा ने हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई शुरू कर दी। इस दौरान उन्होंने हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में भी छात्रसंघ का चुनाव लड़ा और उसमें जीत दर्ज की। भाजपा द्वारा नड्डा को वर्ष 1991 में अखिल भारतीय जनता युवा मोर्चा का राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया गया था। इसके बाद आया वर्ष 1993, जब जेपी नड्डा ने हिमाचल प्रदेश विधानसभा की बिलासपुर सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद उन्हें राज्य विधानसभा में विपक्ष का नेता चुना गया था। नड्डा ने वर्ष 1998 और साल 2007 में इस सीट से फिर जीत दर्ज की। इस दौरान उन्हें प्रदेश कैबिनेट में भी जगह दी गई। उन्हें वर्ष 1998 में हिमाचल प्रदेश का स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया और वर्ष 2007 में वो वन पर्यावरण और संसदीय मामलों के मंत्री रहे। अपने राजनीतिक करियर में नड्डा जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, केरल, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के प्रभारी भी रहे है। साल 2012 में पार्टी ने उन्हें हिमाचल प्रदेश की तरफ से राज्यसभा में भेजा था। इसके बाद भाजपा में नड्डा का कद लगातार बढ़ता चला गया। वे मोदी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी रहे। फिर 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें पार्टी का कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। इसके बाद 20 जनवरी 2020 को उन्हें भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया। आगामी 20 जनवरी को उनका कार्यकाल पूरा हो रहा है लेकिन माना जा रहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव तक वे ही पार्टी के अध्यक्ष बने रह सकते है।

Women have also shown strength in the politics of Himachal
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हिमाचल की सियासत में महिलाओं ने भी दिखाया है दमखम

प्रदेश की सियासत में नारी शक्ति का असर कभी फीका नहीं रहा। हालाँकि हिमाचल के सियासी क्षितिज पर बेहद कम महिलाएं अब तक अपना नाम चमकाने में कामयाब रही और शायद इसका बड़ा कारण ये है कि प्रदेश के प्रमुख राजनैतिक दलों ने कभी महिलाओं पर ज्यादा भरोसा जताया ही नहीं। पर कई चेहरे ऐसे है जिनके बगैर हिमाचल की सियासी कहानी अधूरी हैं। कई महिलाएं न सिर्फ विधानसभा में जनता की आवाज बनी, बल्कि मंत्री भी रही। देश की प्रथम स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर भी हिमाचल प्रदेश से ही सांसद थी। वहीं प्रदेश की सियासत में एक मौका ऐसा भी आया जब वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्या स्टोक्स मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गई। दरअसल वर्ष 2003 में हिमाचल की सत्ता में कांग्रेस की वापसी हुई थी। 1998 के विधानसभा चुनाव में पंडित सुखराम की हिमाचल विकास कांग्रेस ने वीरभद्र सिंह के मिशन रिपीट के अरमान पर पानी फेर दिया था, फिर जब 2003 में मुख्यमंत्री चुनने की बारी आई तो ठियोग विधायक और कांग्रेस की तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष विद्या स्टोक्स से वीरभद्र सिंह को चुनौती मिली। प्रदेश में माहौल बना की शायद मैडम स्टोक्स सोनिया गांधी से अपनी नज़दीकी के बूते सीएम बनने में कामयाब हो जाए। बताया जाता है कि तब मैडम स्टोक्स ने दिल्ली दरबार में विधायकों के समर्थन का दावा भी पेश कर दिया था। विद्या दिल्ली में थी और वीरभद्र सिंह ने शिमला में अपना तिलिस्म साबित कर दिया। दरअसल तभी शिमला में वीरभद्र सिंह ने मीडिया के सामने अपने 22 विधायकों की परेड करा कर अपनी ताकत और कुव्वत का अहसास आलाकमान को करवा दिया। इसके बाद जो परेड में शामिल नहीं हुए उनमें से भी अधिकांश होलीलॉज दरबार में पहुंच गए। सो वीरभद्र सिंह पांचवी बार मुख्यमंत्री बन गए और प्रदेश को महिला सीएम मिलने का इंतज़ार खत्म नहीं हो सका। इस बार हुए चुनाव में अगर प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनती है तो दो महिलाएं सीएम पद की दौड़ में है। पहली है प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह और दूसरा नाम है वरिष्ठ कांग्रेस नेता आशा कुमारी का। बहरहाल महिला सीएम का इन्तजार इस बार भी खत्म होगा या नहीं, ये तो आगामी कुछ दिनों में ही पता चलेगा।   आठ बार विधायक बनी विद्या स्ट्रोक्स वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्या स्टोक्स कांग्रेस से आठ बार विधायक चुनी गई। उनका रिकॉर्ड  कोई दूसरी महिला नेता नहीं तोड़ पाई है। स्ट्रोक्स पहली बार 1974 में विधायक बनी थी। वह विधानसभा की अध्यक्ष भी रही है और नेता विपक्ष भी बनी। स्ट्रोक्स 1974, 1982, 1985, 1990,1998, 2003, 2007 व 2012 में विधायक रही। 1998 में जीती थी सबसे अधिक 6 महिलाएं हिमाचल प्रदेश के इतिहास पर नज़र डाले तो 1998 के विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक 6 महिलाओं ने जीत दर्ज की। इस चुनाव में कांग्रेस की विप्लव ठाकुर, मेजर कृष्णा मोहिनी, विद्या स्ट्रोक्स, आशा कुमारी और भाजपा की उर्मिल ठाकुर और सरवीण चौधरी ने जीत दर्ज की। हालांकि बाद में भाजपा नेता महेंद्र नाथ सोफत की याचिका पर सोलन का चुनाव सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द घोषित कर दिया गया जहाँ से पहले मेजर कृष्णा मोहिनी को विजेता घोषित किया गया था। वहीं 1998 में परागपुर में हुए उप चुनाव में निर्मला देवी ने जीत दर्ज की।   सरला शर्मा से सरवीण चौधरी तक प्रदेश में 1972 में पहली बार सरला शर्मा मंत्री बनी। फिर 1977 में श्यामा शर्मा मंत्री रही। उसके बाद आशा कुमारी, विप्लव ठाकुर, चंद्रेश कुमारी, विद्या स्टोक्स मंत्री रही। वहीं जयराम सरकार में  सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री सरवीण चौधरी इससे पहले धूमल सरकार में भी मंत्री रह चुकी है। सिर्फ तीन महिलाएं पहुंची लोकसभा लोकसभा की बात करें तो वर्ष 1952 में राजकुमारी अमृत कौर प्रदेश की पहली महिला सांसद बनी। इसके बाद चंद्रेश कुमारी वर्ष 1984 में कांगड़ा से सांसद चुनी गई। वहीं प्रतिभा सिंह मंडी सीट से तीसरी बार लोकसभा सांसद है। वे वर्ष 2004 और 2013 के उप चुनाव में भी विजेता रही थी।   1956 में लीला देवी बनी थी राज्यसभा सांसद अपर हाउस राज्यसभा की बात करें तो आज तक हिमाचल प्रदेश की कुल 7 महिलाएं राज्यसभा में पहुँच सकी है। सबसे पहले वर्ष 1956 में कांग्रेस नेता लीला देवी राज्यसभा के लिए चुनी गई। इसके बाद 1968 में सत्यावती डांग, 1980 में उषा मल्होत्रा, 1996 में चंद्रेश कुमारी, 2006 व 2014 में विप्लव ठाकुर को कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा भेजा। वहीं भाजपा से 2010 में बिमला कश्यप व 2020 में वर्तमान राज्यसभा सांसद इंदु गोस्वामी राज्यसभा पहुंची।

If the throne turns, on whose head will the crown adorn?
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तख्त पलटा तो ताज किसके सिर सजेगा ?

हिमाचल प्रदेश में अगली सरकार चुनने के लिए 12 नवंबर को मतदान हो चुका है। आठ दिसंबर को नतीजा भी सामने होगा और तब तक दोनों ही मुख्य राजनीतिक दल अपनी जीत का दावा कर रहे है। भाजपा रिवाज बदलने की बात दोहरा रही है, तो कांग्रेस तख़्त और ताज बदलने की। रिवाज बदला तो ये तय है कि अगले मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ही होंगे, पर सवाल ये है कि यदि तख्त पलटा तो मुख्यमंत्री का ताज किसके सिर होगा ? मतदान के बाद कांग्रेस के तमाम बड़े नेता दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता वापसी का दावा कर रहे है। इस दावे के पीछे कई कारण है, मसलन माना जा रहा है कि पुरानी पेंशन और महंगाई जैसे मुद्दे कांग्रेस के पक्ष में गए है। इसके अलावा पार्टी का टिकट आवंटन भी बेहतर दिखा है और सीमित बगावत भी कांग्रेस के दावे को और बल दे रही है। ऐसे में कोई बड़ा उलटफेर नहीं हुआ तो कांग्रेस के सत्ता वापसी के दावे में दम दिख रहा है। बहरहाल, सवाल ये ही है कि अगर प्रदेश में तख्त पलटा तो ताज किसके सिर सजेगा ?   1985 से लेकर 2017 तक हुए आठ विधानसभा चुनावों में वीरभद्र सिंह ही कांग्रेस का मुख्य चेहरा रहे। हालांकि उनके रहते भी कांग्रेस में सीएम पद को लेकर कई मर्तबा संशय रहा है, लेकिन हर बार वीरभद्र इस दौड़ में इक्कीस रहे। 1993 में पंडित सुखराम, 2003  में विद्या स्टोक्स और 2012 में ठाकुर कौल सिंह के अरमानों पर वीरभद्र सिंह ने पानी फेरा। अब वीरभद्र सिंह नहीं रहे है और इस बार यदि कांग्रेस सत्ता में लौटी तो किसके अरमान पूरे होते है और किसके अरमानों पर पानी फिरता है, ये देखना रोचक होगा। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस में कई चेहरे ऐसे है जिनका नाम भावी सीएम को तौर पर चर्चा में है। कई नेताओं के समर्थक मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें प्रोजेक्ट कर रहे है, तो कई नेता वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर अपना दावा आगे रख रहे है। जबकि कई मुख्य दावेदार अब तक बिलकुल शांत है और संभवतः आंकड़ों को अपने पक्ष में करने में जुटे है। दरअसल, बाजी वहीं मारेगा जिसके पास आलाकमान के आशीर्वाद के साथ समर्थक विधायकों का संख्याबल भी होगा। ऐसे में कांग्रेस की सत्ता वापसी हुई तो मुख्यमंत्री पद के लिए रोचक मुकाबला देखने को मिल सकता है। पार्टी में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की बात करें तो प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह, चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू, नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री, वरिष्ठ नेता कौल सिंह ठाकुर, रामलाल ठाकुर और आशा कुमारी वो प्रमुख नाम है जिनके समर्थक खुलकर उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहे है। इनके अलावा एक और नाम समर्थकों द्वारा जमकर प्रोजेक्ट किया जा रहा है, वो है युवा नेता विक्रमादित्य सिंह। हालांकि ये वर्तमान स्थिति में व्यवहारिक नहीं लगता, पर इससे विक्रमादित्य की लोकप्रियता का अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है। इनके अलावा आलाकमान के अपनी नजदीकी के बूते कर्नल धनीराम शांडिल भी रेस में बताये जा रहे है। समर्थक हर्षवर्धन चौहान और चौधरी चंद्र कुमार के नाम को भी आगे कर रहे है। यहां जिक्र सबका जरूरी है क्यों कि ये वो ही कांग्रेस है जिसने वरिष्ठ नेताओं को किनारे कर, तमाम कयासों को गलत साबित करते हुए  पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया था।     प्रतिभा सिंह : विस चुनाव नहीं लड़ा, पर दावा कम नहीं हिमाचल प्रदेश को कभी महिला मुख्यमंत्री नहीं मिली है। अब तक 6 पुरुषों को ही मुख्यमंत्री बनने का गौरव मिला है। ऐसे में इस बार सुगबुगाहट है कि क्या प्रदेश को पहली महिला मुख्यमंत्री मिलेगी ? ऐसे में निसंदेह प्रतिभा सिंह एक बेहद मजबूत दावेदार है। पार्टी आलाकमान को भी वीरभद्र सिंह के नाम के असर का बखूबी अंदाजा  है और उपचुनाव के नतीजों में इसका असर भी दिख चुका है। इस बार भी चुनाव सामग्री में जिस तरह स्व वीरभद्र सिंह के नाम का इस्तेमाल किया गया है वो 'वीरभद्र ब्रांड' में आलाकमान के भरोसे को दर्शाता है। वहीं मंडी संसदीय उपचुनाव जीतकर प्रतिभा सिंह भी अपनी काबिलियत सिद्ध कर चुकी है। इसके बाद उन्हें प्रदेश संगठन की कमान भी दी गई। हालांकि प्रतिभा सिंह ने खुद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा है, बावजूद इसके बतौर मुख्यमंत्री  प्रतिभा सिंह का दावा कम नहीं है। वैसे अब तक न तो प्रतिभा सिंह ने खुलकर सीएम पद के लिए अपनी दावेदारी आगे रखी है और न ही खुलकर इंकार किया है। वे 'वेट एंड वॉच' की नीति पर आगे बढ़ रही है। हालांकि होलीलॉज कैंप के कुछ नेता जरूर उनकी दावेदारी जताते रहे है। बहरहाल प्रतिभा सिंह मुख्यमंत्री बने या न बने लेकिन होलीलॉज के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता।       सुखविंद्र सिंह सुक्खू : दावे को कमतर आंकना भूल सुखविंद्र सिंह सुक्खू वो नेता है जो अपनी शर्तों पर सियासत करते आएं है। जो नेता वीरभद्र सिंह से टकराते हुए खुद की सियासी जमीन तैयार कर ले, उसके दावे  को कमतर आंकना किसी के लिए भी बड़ी भूल सिद्ध हो सकता है। सुक्खू कांग्रेस प्रचार समिति के अध्यक्ष भी है और अगर पार्टी सत्ता में लौटी तो श्रेय उनको भी जायेगा। आलाकमान से उनकी नजदीकी भी जगजागीर है। सीएम बनने के सवाल पर सुखविंद्र सिंह सुक्खू एक मंजे हुए नेता की तरह जवाब देते आ रहे है। मतदान से पहले वे एक ही बात दोहरा रहे थे, कि पहले विधायक बनना होगा। अब मतदान के बाद सुक्खू साफ़ कह रह है कि चुने हुए विधायक सीएम तय करेंगे। दरअसल सुक्खू के जिन समर्थकों को इस बार टिकट मिला है, माना जा रहा उनमें से अधिकांश अपनी-अपनी सीटों पर अच्छा कर रहे है। इसके अलावा ये ही मुमकिन है कि होलीलॉज कैंप के बाहर के कई अन्य नेता भी खुद का दावा कमजोर पड़ने पर अपने समर्थकों सहित सुक्खू का साथ दे सकते है। यानी सुक्खू संख्याबल के मामले में भी कम नहीं माने जा सकते। ठाकुर कौल सिंह: वरिष्ठता और अनुभव की बिसात पर दावा करीब पांच दशक लम्बे अपने राजनीतिक सफर में कौल सिंह ठाकुर ने पंचायत समिति से लेकर कैबिनेट मंत्री तक का फासला तय किया है। वे प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे है और कांग्रेस ने निष्ठावान सिपाही है। जानकार मानते है कि अगर मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में सहमति नहीं बनती है तो कौल सिंह ठाकुर वो नाम है जिसपर वरिष्ठता का हवाला देकर सहमति बनाई जा सकती है। होलीलॉज से भी कौल सिंह ठाकुर के सम्बन्ध अब बेहतर दिख रहे है, ऐसे में उन्हें इसका लाभ मिल सकता है। हालांकि कुछ लोग मानते है कि ठाकुर कौल सिंह की राह में जी 23 गुट को उनका समर्थन आड़े आ सकता है। पर इससे वे पहले ही मुकर चुके है। यहां एक फैक्टर और काम कर सकता है, वो होगा जिला मंडी में कांग्रेस का प्रदर्शन। दरअसल 2017  के चुनाव में मंडी में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था। ऐसे में अगर इस बार कांग्रेस अच्छा करती है तो ठाकुर कौल सिंह इसका क्रेडिट लेने में पीछे नहीं हटेंगे।   मुकेश अग्निहोत्री : ये भी पकड़ सकते है ओकओवर का रास्ता नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री कांग्रेस के तेज तर्रार नेताओं में से हैं, जो 5 साल भाजपा सरकार को विधानसभा के भीतर से लेकर बाहर तक घेरते रहे हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई तो बड़ा सवाल था कि आखिर सदन में कांग्रेस की अगुवाई कौन करेगा ?  निगाहें उम्रदराज वीरभद्र सिंह पर थी और उन्होंने अपना भरोसा जताया मुकेश अग्निहोत्री पर। सदन में मुकेश अग्निहोत्री ने दमदार तरीके से न सिर्फ कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया बल्कि हर मुमकिन मौके पर जयराम सरकार को भी जमकर घेरा। अब यदि कांग्रेस सत्ता में वापसी करती है तो सीएम पद के दावेदारों में मुकेश अग्निहोत्री भी शामिल है। अग्निहोत्री होलीलॉज कैंप के माने जाते है और वीरभद्र सिंह के बाद होलीलॉज निष्ठावान विधायकों के लिए खासी अहमियत रखते है। ऐसे में माहिर मानते है  कि होलीलॉज और मुकेश के बीच सीएम को लेकर एक राय दिख सकती है, चेहरा चाहे कोई भी हो। आशा कुमारी : ये रानी भी है सीएम पद की दौड़ में डलहौजी सीट से फिर एक बार किस्मत आजमा रही आशा कुमारी भी सीएम पद की दौड़ में है। आशा कुमारी दो बार प्रदेश में मंत्री रही है। केंद्र में भी उनका अच्छा रसूख है।  वे पंजाब की प्रभारी भी रह चुकी है और पार्टी आलाकमान के नजदीक मानी जाती है। अब आशा कुमारी न सिर्फ सातवीं बार विधायक बनने के पथ पर है, बल्कि प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनने की स्थिति में सीएम पद की दावेदार भी है। अलबत्ता आशा कुमारी ने अपनी दावेदारी को लेकर कभी कुछ नहीं कहा है लेकिन समर्थक उन्हें भी बतौर भावी सीएम प्रोजेक्ट कर रहे है। आशा भी मुकेश अग्निहोत्री की तरह होलीलॉज की करीबी रही है और वीभद्र सिंह के निधन के बाद बदले समीकरणों में दमदार दिख रही है। ये दिग्गज भी है दौड़ में पांच बार के विधायक राम लाल ठाकुर भी सीएम पद के दावेदारों में शुमार है। उन्हें 10 जनपथ का करीबी भी माना जाता है। अपने जमाने के जाने माने कबड्डी खिलाड़ी रहे राम लाल ठाकुर सियासी मैदान के भी मंजे हुए खिलाड़ी है। इस बार रामलाल ठाकुर चुनाव जीते तो छठी बार विधायक बनेंगे। वहीं दो बार सांसद रहने वाले कर्नल धनीराम शांडिल इस बार सोलन सीट से हैट्रिक लगाने के इरादे से मैदान में है। कर्नल भी गाँधी परिवार के करीबी है। हिमाचल में एससी समुदाय से कोई नेता कभी मुख्यमंत्री नहीं बना, ऐसे में कर्नल एक विकल्प हो सकते है। एक अन्य दावेदार हर्षवर्धन चौहान भी माने जा रहे है। हर्षवर्धन के खाते में शिलाई से पांच जीत दर्ज है और इस बार वे भी छठी जीत के इरादे से चुनावी मैदान में उतरे है। उनके पिता गुमान सिंह चौहान भी शिलाई से चार बार विधायक रहे है। इस बार हाटी फैक्टर के बावजूद अगर हर्षवर्धन चौहान जीत जाते है, तो जाहिर है उनका दावा भी मजबूत होगा।

Dhumal is also a professor of politics
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सियासत के भी प्रोफेसर है धूमल

कॉलेज में छात्रों को पढ़ाते-पढ़ाते न जाने कब सियासत ने प्रोफेसर साहब को अपनी तरफ खींच लिया। एक दिन पंजाब में अपनी नौकरी छोड़ी और अपने प्रदेश हिमाचल वापस लौट आएं। शुरुआत की भाजपा के एक आम कार्यकर्त्ता के तौर पर, और देखते ही देखते प्रदेश में सत्ता के शीर्ष तक पहुंच गए। हिमाचल प्रदेश की सियासत में प्रो प्रेमकुमार धूमल किसी  परिचय के मोहताज नहीं है। वे पहले ऐसे गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री है जिन्होंने पूरे पांच साल सरकार चलाई, वो भी दो बार। वे इकलौते ऐसे नेता है जिन्होंने पांच साल हिमाचल प्रदेश में गठबंधन सरकार चलाकर दिखाई। इसलिए उन्हें सियासत का प्रोफेसर भी कहा जाता है। करीब दो दशक तक हिमाचल में भाजपा का सर्वमान्य चेहरा रहे प्रो धूमल बेशक इस बार चुनावी मैदान में नहीं उतरे है, पर अब भी उनका सियासी रसूख बरकरार है। बढ़ती उम्र का कुछ असर सेहत पर भी दिखता है, पर ताव और तेवर, दोनों कायम है। आज भी हिमाचल भाजपा में प्रो प्रेमकुमार धूमल की लोकप्रियता, उनकी कार्यशैली और उनकी जमीनी पकड़ का कोई विकल्प नहीं दिखता। दरअसल विकल्प हो भी नहीं सकता, धूमल तो आखिर कोई और हो भी नहीं सकता।   1990 में प्रचंड बहुमत के साथ प्रदेश की सत्ता में लौटी भाजपा के सितारे 1993 के विधानसभा  चुनाव के बाद गर्दिश में थे। तब दो बार मुख्यमंत्री रहे शांता कुमार सहित पार्टी के बड़े - बड़े दिग्गज चुनाव हार गए थे और भाजपा महज आठ सीटों पर सिमट कर रह गई थी। चुनाव के बाद पार्टी के एक और दिग्गज नेता जगदेव चंद का निधन हो गया और विधायकों की संख्या रह गई सात। तब हालात ऐसे बने कि पहली बार विधानसभा में पहुंचे जगत प्रकाश नड्डा को विपक्ष का नेता बनाया गया। इस पर वीरभद्र सिंह फिर मुख्यमंत्री बन चुके थे और प्रदेश में कांग्रेस का प्रभाव फिर तेजी से बढ़ रह था। इस हार के बाद पहली बार प्रदेश में शांता कुमार के खिलाफ भाजपा के भीतर से आवाज उठने लगी थी।   1998 का चुनाव आते -आते भाजपा में बहुत कुछ बदल चुका था और प्रदेश के समीकरण भी। नरेंद्र मोदी प्रदेश के प्रभारी थे, जो इस बात को समझ चुके थे कि 'नो वर्क नो पे' वाले सीएम रहे शांता कुमार के नाम पर फिर चुनाव लड़ना और जीतना बेहद मुश्किल है। पर मोदी के दिमाग में सत्ता वापसी का सारा प्लान मानो फिट था और इस प्लान का केंद्र थे प्रो प्रेम कुमार धूमल। दरअसल प्रो प्रेम कुमार धूमल तब मोदी के करीबी हो गए और प्रदेश की राजनीति में भी उनका ठीक ठाक कद था। मोदी को भी उनकी क्षमता का अहसास हो चुका था। सो, मोदी ने पार्टी आलाकमान को मनाया और चुनाव से पहले ही धूमल को सीएम फेस घोषित कर दिया। पार्टी का दांव ठीक पड़ा और भाजपा सत्ता में लौटी। पर सरकार बनाना इतना आसान नहीं था।   1998 में प्रदेश की  तीन सीटों पर भारी बर्फबारी के कारण पहले चरण में चुनाव नहीं हुए थे। 65 में से कांग्रेस 31 सीटों पर जीती थी और बीजेपी 29। जबकि भाजपा के एक बागी रमेश धवाला निर्दलीय चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। पंडित सुखराम की नई पार्टी हिमाचल विकास कांग्रेस के पास भी चार विधायक थे। वहीं नतीजों के बाद बीजेपी के एक विधायक का हार्ट अटैक से निधन हो गया था। ऐसे में किसी दल के पास बहुमत का आंकड़ा नहीं था। उधर, पंडित सुखराम के समर्थन से भाजपा 33 का आंकड़ा तो छू रही थी लेकिन एक विधायक के निधन ने उसका खेल बिगाड़ दिया था। सो सारी गणित आकर टिकी निर्दलीय रमेश धवाला पर। धवाला ने बीजेपी को समर्थन देने के लिए शर्त रख दी कि प्रेम कुमार धूमल के बदले शांता कुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाएं। पर भाजपा इसके लिए तैयार नहीं थी। फिर काफी सियासी उथल पुथल हुई और आखिरकार प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। ये प्रदेश की पहली ऐसी गठबंधन सरकार थी जो पूरे पांच साल चली।   इसके बाद हुए तीन सीटों के चुनाव और एक उपचुनाव में से तीन पर भाजपा जीती और एक पर हिमाचल विकास कांग्रेस। यानी निर्दलीय पर से तो  निर्भरता खत्म हो गई थी पर पंडित सुखराम जैसे मंजे हुए नेता के साथ पांच साल गठबंधन सरकार चलाना आसान नहीं था। इसके बदले सुखराम के पांचो विधायकों को मंत्री बनाना पड़ा। भाजपा के कई नेता, खासतौर से शांता गुट के कई नेता अब भी इसे गलत करार देते है। इसके बाद से करीब दो दशक तक हिमाचल प्रदेश में प्रो प्रेम कुमार धूमल ही सर्वमान्य नेता रहे। 2003 के विधानसभा चुनाव में प्रो धूमल एक बार फिर भाजपा के सीएम फेस थे लेकिन भाजपा सत्ता में वापसी नहीं कर पाई। इसके बाद उनके नेतृत्व में 2007 का चुनाव लड़ा गया जिसमें भाजपा ने फिर सत्ता कब्जाई और धूमल दूसरी बार सीएम बने। दूसरी बार वे एक जनवरी 2008 से 25 दिसंबर 2012 तक हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। 2017 में भाजपा को जिताया पर खुद चुनाव हार गए धूमल हिमाचल प्रदेश में 2017 विधानसभा चुनाव का प्रचार चरम पर था। कांग्रेस मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही थी, पर भाजपा ने चुनाव से दस दिन पहले तक सीएम फेस घोषित नहीं किया था। भाजपा की सारी राजनीति धूमल बनाम नड्डा के नाम के कयासों के इर्द गिर्द घूम रही थी। इसका असर भी दिख रह था। भाजपा का कंफ्यूज कार्यकर्ता वीरभद्र के आगे कुछ हल्का दिख रहा था। 9 नवंबर को वोटिंग होनी थी और 30 अक्टूबर तक भाजपा ने सीएम फेस की घोषणा नहीं की थी। कांग्रेस भी भाजपा को बिना दूल्हे की बारात कहकर खूब चुटकी ले रही थी। माना जाता है कि तब प्रो प्रेम कुमार धूमल भाजपा आलाकमान की एकमात्र पसंद नहीं थे, लेकिन वीरभद्र की कांग्रेस को टक्कर देने वाला कोई और दिख भी नहीं रहा था। सो, सारे गुणा भाग करके आखिरकार 30 अक्टूबर को पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सिरमौर के पच्छाद में हुई रैली के दौरान प्रो प्रेम कुमार धूमल को सीएम फेस घोषित कर दिया। धूमल के नाम की घोषणा होते ही मानो भाजपा में जान सी आ गई, देखते-देखते समीकरण बदले और भाजपा ने बेहद मजबूती से चुनाव लड़ा। 18 दिसंबर को जब नतीजे आये तो भाजपा ने 44 सीटों पर जीत दर्ज कर सत्ता में शानदार वापसी की। पर इन 44 सीटों में सुजानपुर की सीट नहीं थी, इन 44 सीटों में प्रो प्रेम कुमार धूमल की सीट नहीं थी। भाजपा तो जीत गई थी, पर भाजपा को जिताने वाले धूमल खुद चुनाव हार बैठे। अगले मुख्यमंत्री बने जयराम ठाकुर। इसके बाद हिमाचल भाजपा की सियासत ठीक उसी तरह बदलना शुरू हुई जैसे 1998 के बाद होता दिखा था।   इस बार नहीं है चुनावी मैदान में भले ही धूमल साल 2017 का चुनाव हार गए थे  मगर उनके समर्थकों को आस थी की इस बार धूमल दोबारा चुनाव लड़ेंगे और प्रदेश में अगर भाजपा की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री भी होंगे। लेकिन चुनाव से पहले दिल्ली में हुई भाजपा प्रदेश चुनाव समिति की बैठक  के बाद सियासी गलियारों में चर्चा आम हुई कि प्रो धूमल चुनाव नहीं लड़ रहे है। अगले दिन इसका औपचारिक ऐलान भी हो गया। ये प्रदेश के हज़ारों धूमल निष्ठावान कार्यकर्ताओं के लिए झटका था। बाद में कहा गया कि धूमल साहब खुद चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे और पहले ही ऐसा मन बना चुके थे। साल 2022  का चुनाव वो चुनाव है जिसमें कई दशकों बाद न धूमल मैदान में है और न वीरभद्र सिंह। माहिर मानते है कि प्रो धूमल का चुनाव न लड़ना इस चुनाव का टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है और नतीजों के बाद इस पर मुहर लग सकती है। दरअसल धूमल ऐसे नेता है जिनका प्रभाव प्रदेश की सभी 68 सीटों पर है और अगर वे चुनाव लड़ते तो समर्थकों में आस रहती। उनके मैदान में न होने से उनके समर्थक निश्चित तौर पर निराश जरूर हुए है। बने सड़कों वाले मुख्यमंत्री जब प्रो धूमल पहली बार सीएम बने तो केंद्र में एनडीए की सरकार थी और प्रधानमंत्री थे अटल बिहारी वाजपेयी। उस दौर में देशभर में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के माध्यम से सड़कों का जाल बिछाया गया था और हिमाचल भी इससे अछूता नहीं रहा। पहाड़ी राज्य होने के चलते हिमाचल में ये ये कार्य आसान नहीं था लेकिन धूमल सरकार ने इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी। इसलिए धूमल सड़क वाले मुख्यमंत्री के तौर पर भी जाने जाते है। दोनों बेटों ने चमकाया नाम प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल के दो बेटे है। केंद्र सरकार में खेल, युवा मामलों, सूचना और प्रसारण मंत्री और हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद अनुराग ठाकुर धूमल के बड़े बेटे है और बीसीसीआई के कोषाध्यक्ष अरुण धूमल के छोटे बेटे है। अनुराग ठाकुर के रूप में धूमल के निष्ठावान भविष्य का मुख्यमंत्री भी देखते है। हालांकि अनुराग का कद केंद्र की सियासत में भी तेजी से बढ़ा रहा है और क्या वे प्रदेश की सियासत में लौटेंगे, ये देखना रोचक होगा।   कॉलेज में प्रवक्ता थे, नौकरी छोड़ चुनी राजनीति प्रेम कुमार धूमल का जन्म 10 अप्रैल 1944 को हमीरपुर जिले के समीरपुर गांव में हुआ। इनकी प्रारंभिक शिक्षा मिडिल स्कूल भगवाड़ा में हुई और मैट्रिक हमीरपुर के डीएवी हाई स्कूल टौणी देवी से। 1970 में इन्होंने दोआबा कॉलेज जालंधर में एमए इंग्लिश में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। इसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी के जालंधर स्थित कॉलेज में प्रवक्ता के रूप में कार्य किया और बाद दोआबा कॉलेज जालंधर चले गए। नौकरी करते हुए उन्होंने एलएलबी भी की। इसी के साथ धूमल कई सामजिक संगठनों के साथ भी जुड़े रहे। राजनीति में प्रो धूमल का कद रातों रात नहीं बढ़ा था और यूँ ही कोई धूमल बन भी नहीं सकता। सियासत में आने के लिए धूमल ने प्रोफेसर की नौकरी छोड़ी और शुरुआत की भाजपा के युवा संगठन से। 1980-82 में धूमल भाजयुमो के प्रदेश सचिव रहे। पर चर्चा में आये 1989 में जब उन्होंने हमीरपुर संसदीय सीट पर हुए उपचुनाव में जीत दर्ज की और लोकसभा पहुँच गए। इससे पहले 1984 का चुनाव वे हार चुके थे। इसके बाद 1993-98 में वो हिमाचल प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष रहे। इस बीच 1996 के लोकसभा चुनाव में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

Jairam Thakur : NOT AN ACCIDENTAL CHIEF MINISTER
In Politics

जयराम ठाकुर : NOT AN ACCIDENTAL CHIEF MINISTER

कोई उन्हें 'एक्सीडेंटल चीफ मिनिस्टर' मानता है, तो कोई कमजोर मुख्यमंत्री, लेकिन जयराम ठाकुर को लेकर एक बात सब मानते है, वो है उनकी मेहनत और सरलता जिसकी बदौलत छात्र राजनीति के नारे लगाते -लगाते जयराम हिमाचल प्रदेश की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे है। 2017 में जब भाजपा के सीएम फेस प्रो प्रेम कुमार धूमल चुनाव हार गए तो सबसे बड़ा सवाल ये ही था कि अब मुख्यमंत्री कौन होगा ? सवाल था कि क्या पार्टी धूमल को ही मौका देगी, या कोई और मुख्यमंत्री होगा। भाजपा में कई चाहवान थे और जयराम ठाकुर के अलावा जगत प्रकाश नड्डा, महेंद्र सिंह ठाकुर, सुरेश भारद्वाज, डॉ राजीव बिंदल के नाम को लेकर भी चर्चा थी। उधर धूमल गुट के कई निष्ठावान विधायक उनके लिए अपनी सीट छोड़ने की पेशकश कर चुके थे। जीत कर आएं 44 विधायकों में से आधे से अधिक धूमल के साथ बताये जा रहे थे। फिर तमाम चिंतन -मंथन के बाद आलाकमान ने जयराम ठाकुर के नाम की घोषणा की। ऐसा नहीं है कि जयराम सिर्फ इसलिए सीएम बने क्यों कि धूमल चुनाव हार गए थे। सीएम पद के तो कई दावेदार थे, जयराम ही क्यों ? जयराम ठाकुर के राजनीतिक सफर पर निगाह डालें तो इसका जवाब भी मिल जाता है। एक समय में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के पिता बढ़ई का काम किया करते थे। आर्थिक स्थिति माली थी लेकिन उन्होंने जयराम ठाकुर की शिक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी। जयराम ठाकुर ने मंडी से बीए पास किया और मास्टर्स की पढ़ाई के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी का रुख किया। इसी दौरान वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हो गए। इस तरह छात्र राजनीति से उनका राजनीतिक सफर शुरु हो चुका था। जयराम ठाकुर वर्ष 1986 में एबीवीपी के संयुक्त प्रदेश सचिव बने। वर्ष 1989 से 93 तक जम्मू-कश्मीर में संगठन में कार्य किया। वर्ष 1993 से 1995 तक वह भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के प्रदेश सचिव व प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। अपने कामकाज से वे संघ के भी करीबी हो गए। वर्ष 1998 में वह पहली बार चच्योट से विधायक चुने गए। वर्ष 2000 से 2003  तक वह जिला मंडी भाजपा अध्यक्ष रहे और 2003 से २००५ तक भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे। इसके बाद 2003 तथा 2007 में चच्योट विधानसभा सीट से लगातार जीत हासिल करते रहे। वर्ष 2007 में उन्होंने भाजपा के अध्यक्ष के तौर पर चुनावों में जीत दर्ज न करने का मिथक को तोड़ते हुए लगातार तीसरी जीत हासिल की और धूमल सरकार में पंचायती राज मंत्री बने। परिसीमन के बाद उन्होंने 2012 में सिराज से चुनाव लड़ा और जीते और ये सिलसिला 2017 में भी जारी रहा। हिमाचल प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में जयराम ठाकुर को उनके अच्छे प्रदर्शन का इनाम मिला। उन्होंने खुद की विधानसभा सीट पर तो शानदार जीत दर्ज की ही, जिला  मंडी के अंतर्गत आने वाली 10 विधानसभा सीटों में से बीजेपी को 9 सीटें मिली। इस बढ़िया प्रदर्शन का श्रेय भी जयराम ठाकुर को दिया गया। इसी वजह से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद जयराम ठाकुर की चुनौतियां कम नहीं रही। उन्होंने धूमल का स्थान लिया था तो स्वाभाविक है चुनौतियां कम होनी भी नहीं थी। पर आहिस्ता -आहिस्ता जयराम ठाकुर रंग में आते गए और खुद को साबित भी किया। माहिर उनकी ताजपोशी के बाद से ही मानते रहे कि पार्टी के भीतर उनकी मुखालफत जैसी स्थिति बन सकती है, पर ऐसा एक भी मौका नहीं आया। इस बीच भाजपा पार्टी ने पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में क्लीन स्वीप किया और फिर धर्मशाला और पच्छाद का उपचुनाव भी जीता। स्थानीय निकाय चुनाव में भी पार्टी का पलड़ा भारी रहा। पर 2021 में पार्टी सिंबल पर हुए चार नगर निगम चुनाव में से दो में भाजपा को हार मिली। फिर 2021 के अंत में हुए मंडी संसदीय उपचुनाव और तीन विधानसभा उपचुनाव में भी पार्टी हारी और जयराम की मुश्किलों में इजाफा होना शुरू हुआ। इसके बाद तो कयास लगने लगे कि आलाकमान सीएम फेस भी बदल सकता है। पर जयराम ने इसका जवाब ये कहकर दिया कि 'मैं हूँ और मैं ही रहूँगा। हुआ भी ऐसा ही। न सिर्फ जयराम ठाकुर की कुर्सी तब बची रही बल्कि आलाकमान ने उनके चेहरे पर ही हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया। अब इस बार जयराम ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का रिवाज बदलने का नारा दिया है। अगर जयराम ठाकुर रिवाज बदल देते है तो वे वीरभद्र सिंह के बाद ऐसा करने वाले पहले मुख्यमंत्री होंगे।     कॉलेज के टी स्टॉल पर बैठकर बनाते थे  रणनीति हिमाचल के सीएम बने जयराम ठाकुर की सादगी के किस्से आज भी वल्लभ कॉलेज मंडी के गलियारों में गूंजते हैं, खासकर कैंटीन में। यह कैंटीन कॉलेज के बिलकुल साथ सटा मामू टी-स्टाल था। यहां एबीवीपी का छात्र नेता होते हुए दिन भर साथियों के साथ जयराम ठाकुर सियासी चर्चा करते थे। उनकी सादगी और ईमानदारी का हर कोई प्रशंसक था। वे जब जरूरत पड़े तो मामू टी स्टाल का गल्ला संभालने से भी पीछे नहीं रहते। जब मुख्यमंत्री पद के लिए जयराम के नाम पर मुहर लगी तो पूरे मंडी में माहौल उत्सव सा था। मुख्यमंत्री बनने के बाद जयराम ठाकुर मामू टी स्टाल गए और उनका आशीर्वाद लिया।   पहली बार चुनाव लड़ने को नहीं थे पैसे जयराम ठाकुर समृद्ध आर्थिक पृष्ठभूमि से नहीं थे। 1993 में जयराम ठाकुर ने प्रदेश की चुनावी राजनीति में एंट्री हुई। उन्हें चच्योट विधानसभा से टिकट दिया गया। वही भारतीय जनता पार्टी के टिकट मिलने से जयराम ठाकुर तो खुश थे, लेकिन परिवार में पिता और मां नाराज थी। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इस वजह से पिता नहीं चाहते थे कि वह चुनाव लड़े, फिर भी जयराम ठाकुर ने हिम्मत नहीं हारी और चुनावी मैदान में उतरे।  इस चुनाव में हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। जयराम ठाकुर ने चुनाव में 1998 में जीत का स्वाद चखा। उन्हें इसी विधानसभा सीट से फिर टिकट मिला जिसमें वह जीत दर्ज की। संघ प्रचारकों के सम्मेलन में मिले दो दिल हिमाचल के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का निजी जीवन खुली किताब है, लेकिन उनकी पत्नी डॉ. साधना और उनके मिलने की कहानी दिलचस्प है। जयराम ठाकुर और उनकी पत्नी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से गहरा नाता रहा है। डॉ साधना मूल रूप से कर्नाटक की रहने वाली हैं, लेकिन बाद में वह कनार्टक से जयपुर शिफ्ट हो गई थी। जयराम ठाकुर का ससुराल जयपुर के झोटवाड़ा में है। नब्बे के दशक में जम्मू में आयोजित संघ प्रचारकों के सम्मेलन में जयराम की मुलाकात राजस्थान की प्रचारक डॉ. साधना से हुई। यहीं पर जयराम ठाकुर की उनकी पत्नी से जान-पहचान बनी और बाद में दोनों ने शादी करने का फैसला किया और 1995 में दोनों की शादी हुई। डा. साधना पेशे से डॉक्टर हैं और अपने पति की कामयाबी में इनका भी अहम योगदान है। डा. साधना ने घर को तो बखूबी संभाला ही, साथ में अपनी पति के हर कार्य में उनका साथ दिया और हर समय एक मजबूत ढाल की तरह उनके साथ खड़ी रही। हालांकि जब जयराम ठाकुर की शादी हुई उस वक्त जय राम ठाकुर पहला चुनाव हारे हुए थे और राजनीति में अभी उनकी नई-नई पहचान ही बन रही थी। साधना ठाकुर के पिता श्रीनाथ राव भी आरएसएस नेता रहे हैं।   कर्मचारियों के विरोध का करना पड़ा सामना   बतौर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने अपने कार्यकाल में हर वर्ग का ख्याल रखा, लेकिन कर्मचारियों का विरोध भी उन्हें खूब सहना पड़ा। 2017 में जब भाजपा की सरकार बनी तो कर्मचारियों को उम्मीद थी की पुरानी पेंशन बहाली के लिए प्रदेश सरकार कुछ कदम उठाएगी। परन्तु सत्ता में आने के बाद जब कोई बदलाव होता नहीं दिखा तो शुरुआत हुई उस संघर्ष की जो आगे चल कर प्रदेश के कर्मचारियों सबसे बड़े आंदोलन में तब्दील हो गया। पुरानी पेंशन को लेकर ये आंदोलन रातों रात खड़ा नहीं हुआ। पहले कई बार पेन डाउन स्ट्राइक हुई और फिर कर्मचारी सड़क पर उतर आएं। मामला विधानसभा घेराव तक पहुंच गया। कभी भारी संख्या में कर्मचारी धर्मशाला पहुंचे तो कभी शिमला, पेंशन व्रत हुए, पेंशन संकल्प रैली हुई, पेंशन अधिकार रैली हुई। कर्मचारियों के इन प्रदर्शनों में उमड़ा जनसैलाब स्पष्ट संकेत देता रहा था कि कर्मचारी मानने को तैयार नहीं थे। मगर सरकार हर बार आर्थिक परिस्थितियों का हवाला देती रही। कर्मचारियों का ये संघर्ष बहुत कम समय में एक आंदोलन में बदल गया। कर्मचारी संगठनों ने खूब हल्ला बोला और सीएम जयराम ठाकुर के लिए " जोइया मामा शुनदा नहीं"  के नारे तक लगे। सरकार द्वारा 2009 की अधिसूचना लागू कर प्रदेश के कर्मचारियों को मनाने का भी प्रयास भी हुआ, मगर कर्मचारी पुरानी पेंशन बहाली की मांग पर अड़े रहे। पुरानी पेंशन बहाली को लेकर इस चुनाव में कर्मचारियों ने 'वोट फॉर ओपीएस' अभियान चलाया, जो भाजपा के जी का जंजाल बनता दिख रहा है। अफसरशाही पर पकड़ को लेकर उठते रहे सवाल जयराम ठाकुर पर अफसरशाही पर पकड़ को लेकर अक्सर सवाल उठे है। विरोधी इसे लेकर जयराम ठाकुर को कमजोर मुख्यमंत्री साबित करने में जुटे रहे। दरसअल अपने इस कार्यकाल में जयराम सरकार ने कई मर्तबा अपने फैसले बदले। इसके अलावा कई क्षेत्रों में मंत्रियों की  बैठकों में अधिकारीयों की अनुपस्थिति चर्चा में रही, तो कभी किसी मीटिंग में अधिकारी और मंत्री के बीच खींचतान की ख़बरें बाहर आई। पर जयराम ठाकुर ने कई मौकों पर अफसरशाही पर पकड़ को लेकर अपना पक्ष रखा। वे कहते रहे है कि लताड़ लगाकर काम करवाना उनका तरीका नहीं है, प्यार से भी काम होता है।

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प्रदेश ही नहीं देश के सियासी पटल पर भी दमदार है अनुराग

In Politics

  केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर निसंदेह हिमाचल का वो चेहरा है जिसे देश-विदेश में भी लोग न सिर्फ पहचानते है, बल्कि पसंद भी करते है। वर्तमान में मोदी सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा युवा एवं खेल मंत्रालय का भार संभाल रहे 48 वर्षीय अनुराग ठाकुर  हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से चौथी बार सांसद है। 2019 में जब मोदी सरकार दूसरी बार सत्ता में लौटी तो अनुराग ठाकुर को वित्त राज्य मंत्री बनाया गया था। फिर जुलाई 2021 में उनका कद बढ़ा और वे केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बन गए। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर में जन्में और पले बढ़े अनुराग ठाकुर के पिता प्रो. प्रेम कुमार धूमल दो बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे है। पर इसका मतलब ये नहीं है कि अनुराग आसानी से सियासत में स्थापित हो गए। उन्होंने एक आम कार्यकर्ता की तरह वर्षों संगठन में काम किया और हर मौके पर खुद को साबित भी किया। 2010 में वे भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और लगातार तीन टर्म तक इस पद पर रहे। संभवतः वे भाजयुमो में अब तक के सबसे लोकप्रिय अध्यक्ष रहे है। क्रिकेट की सियासत में भी अनुराग ठाकुर की खासी दिलचस्पी रही है। साल 2000 में अनुराग हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बने और चार बार इस पद पर रहे। प्रदेश में धर्मशाला स्टेडियम उन्हीं की देन है। इसी बीच मई 2016  में अनुराग ठाकुर बीसीसीआई के प्रेजिडेंट भी बने लेकिन लोढ़ा कमिटी की  सिफारिशों पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद उन्हें ये पद छोड़ना पड़ा। बहरहाल भाजपा समर्थकों का एक बड़ा तबका ये चाहता है कि अनुराग प्रदेश की कमान संभाले। उधर बार-बार अनुराग ठाकुर दोहराते रहे है कि वे केंद्र में खुश है और फिलवक्त प्रदेश की सियासत में एंट्री का उनका कोई इरादा नहीं है। पर हिमाचल की सियासत से अनुराग को अलग नहीं रखा जा सकता। वैसे भी जानकार मान रहे है कि आठ दिसंबर को रिवाज नहीं बदला तो भाजपा में बहुत कुछ बदलना है। ऐसे में मुमकिन है कि 2027 आते-आते समीरपुर से शिमला का सियासी मार्ग फिर प्रशस्त हो जाएँ। पर अनुराग ठाकुर केंद्र की राजनीति का भी बड़ा नाम है। वर्तमान में कैबिनेट मंत्री है। अनुराग पार्टी के उन चुनिंदा चेहरों में से एक है जो अक्सर कैमरे के आगे आकर सरकार की बात रखते है। अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश के उन गिने चुने नेताओं में से है जिनकी पहचान देश के हर कोने में है। ऐसे में अगर अनुराग केंद्र में भी जमे रहते है तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनमें सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की क्षमता है।   

हिमाचल: भारत के सबसे लंबे रूट दिल्ली-लेह पर बस सेवा बहाल

In Travel
 Himachal: Bus service restored on India's longest route Delhi-Leh

हिमाचल प्रदेश में लाहौल और स्पीति जिले के केलांग से लद्दाख के लेह तक बस सेवा बहाल हो गई है। यह बस सेवा लगभग आठ महीने बाद बहाल हुई है। केलांग उपमंडल अधिकारी प्रिया नागटा ने रविवार को बस को लेह के लिए रवाना किया। पिछले साल एक जुलाई को बस सेवा बहाल हुई थी और 15 सितंबर को स्थगित कर दी गई थी। इसके साथ ही भरत के सबसे लम्बे रुट लंबे दिल्ली-लेह पर भी बस सेवा बेहाल होने की बात सामने आई हैं। बता दें की केलांग से लेह की दूरी 365 किलोमीटर है। लेह से दिल्ली की दूरी 1026 किलोमीटर है। इसके लिए यात्रियों को 1,740 रुपये तक का किराया देना होगा।

बांका हिमाचल : बागवानी है प्रदेश की आर्थिकी की रीढ़

In Rural
Banka Himachal: Horticulture is the backbone of the state's economy

हिमाचली सेब दुनिया भर में अपने स्वाद के लिए प्रसिद्ध है, पर अब हिमाचल प्रदेश न सिर्फ सेब उत्पादक प्रदेश के तौर पर जाना जाता है अपितु हिमाचल हिंदुस्तान का फ्रूट बास्केट बन गया है। हिमाचल प्रदेश में बागवानी क्षेत्र आय के स्तोत्र उत्पन्न कर न सिर्फ लोगों की आर्थिकी सुदृढ़ करने में सहायक सिद्ध हो रहा है बल्कि प्रदेश की प्रगति में भी इसका बड़ा हाथ है। हिमाचल में करीब ढाई लाख हेक्टेयर भूमि पर 25 से भी अधिक किस्म के फलों का उत्पादन होता है। इसमें आधी भूमि पर तो अकेले सेब का उत्पादन होता है। इसके अतिरिक्त चेरी, स्ट्रॉबेरी, आम, किन्नू, माल्टा, कीवी, अखरोट, बादाम, अनार, अमरूद, आडू, खुमानी, लीची, नाशपाती का उत्पादन भी होता है। अब तो प्रदेश के ऊना में ड्रैगन फ्रूट को भी सफल तौर पर उगाया जाने लगा है। हॉर्टिकल्चर प्रदेश की आर्थिकी की रीढ़ है और चार लाख से अधिक लोग इससे जुड़े हैं। गत चार साल में प्रदेश में 31.40 लाख मीट्रिक टन फल उत्पादन हुआ है। इस अवधि में बागवानी क्षेत्र की वार्षिक आय औसतन 4,575 करोड़ रही। बागवानी के ज़रिये नौ लाख लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है। हिमाचल की जलवायु और उपजाऊ ज़मीन के कारण यहां पैदा होने वाले फल यहां के लोगो के लिए वरदान है।   ईरान और तुर्की का सेब चुनौती हिमाचल की खुशहाली की तकदीर कहे जाने वाली सेब बागबानी वैश्विक प्रतिस्पर्धा से कदमताल नहीं कर पा रही है। सेब पैदावार से लेकर बाजार पहुँचने तक की हर प्रक्रिया अव्यवस्थित है और इसमें व्यापक सुधार की दरकार है। कभी मौसम की मार सेब की गुणवत्ता पर असर डालती है, तो कभी निजी कंपनियों द्वारा दिए जा रहे कम दाम। इस पर कम दामों पर आयात हो रहे सेब से भी बाजार के सेंटीमेंट बिगड़ रहे है।          हिमाचल की करीब साढ़े चार हजार करोड़ रुपये की सेब की आर्थिकी के लिए ईरान और तुर्की का सेब चुनौती बन गया है। बाजार में इस बार ईरान का सेब हिमाचली सेब को पछाड़ रहा है। ईरान का सेब रंग और स्वाद में श्रीनगर और किन्नौर की सेब की बराबरी करता है। बागवानों के अनुसार भारत में अफगानिस्तान के रास्ते ईरान और तुर्की से सेब का अनियंत्रित और अनियमित आयात होता आ रहा है जो परेशानी का कारण है। बागवान चाहते है कि ईरान और तुर्की से सेब आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगे।         अफगानिस्तान साफ्टा (SAFTA) दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र का हिस्सा है और यहां से सेब के आयात पर कोई शुल्क नहीं लगता है। ईरान इस समझौते का हिस्सा नहीं है और माना जा रहा है कि इसलिए ईरान अपना सेब अफगानिस्तान से पाकिस्तान के रास्ते अटारी बॉर्डर से भारत भेजता हैं। ऐसा हो रहा है तो एक कंटेनर पर आठ लाख के करीब आयात शुल्क की चोरी हो रही है। इसके कारण ईरान का सेब सस्ता बिकता है। यदि ये सेब ईरान के रास्ते आए तो इसमें पंद्रह प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी और 35 प्रतिशत सेस लगेगा। लॉन्ग टर्म प्लानिंग की दरकार :  सेब के दामों पर नियंत्रण के लिए एक लॉन्ग टर्म प्लानिंग की जरुरत है। फूड प्रोसेसिंग  यूनिट्स और सीए स्टोर्स की उपलब्धता के साथ ही सेब की प्रोडक्शन में गुणवत्ता का ध्यान रखने की ज़रूरत है। जानकार मानते है कि तीन क्षेत्रों में ध्यान देने की ज़रूरत है। पहला है सेब की प्रोडक्शन, दूसरा है सप्लाई चेन और तीसरा है मार्केटिंग। इन तीनों में ही बहुत सी खामियां है जिन्हें दुरुस्त किया जाना चाहिए। चिलगोजा : किन्नौर के लोगों के लिए वरदान है ये सूखा मेवा जनजातीय क्षेत्र किन्नौर बेहतरीन गुणवत्ता वाले सेब उत्पादक के तौर पर जाना जाता हैं, लेकिन ये ही किन्नौर उत्कृष्ट गुणवत्ता का एक मेवा भी उत्पादित करता है, जिसे चिलगोजा के नाम से जाना जाता है। चिलगोजा भारत के उत्तर में हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में 1800-3350 मीटर की ऊंचाई वाले इलाके में फैले जंगलों में चीड़ के पेड़ पर लगता है। पर्सियन में चिलगोजा का अर्थ होता है 40 गिरी वाला शंकु के आकार का फल। चिलगोजा को अंग्रेजी में पाइन नट कहा जाता है। किन्नौर तथा उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में विवाह के अवसर पर मेहमानों को सूखे मेवे की जो मालाएं पहनाई जाती हैं, उसमें अखरोट और चूली के साथ चिलगोजे की गिरी भी पिरोई जाती है। चिलगोजा स्थानीय आबादी के लिए नकदी फसलों में से एक है, क्योंकि बाजार में यह काफी ऊंचे दाम पर बिकता है। चिलगोजा के पेड़ों के फलदार होने में 15 से 25 वर्ष का समय लगता है और इसके फल को परिपक्व होने में करीब 18-24 महीने लगते हैं। पीच वैली को एक नियोजित योजना की दरकार जिला सिरमौर का राजगढ़ व आसपास लगता क्षेत्र पीच वैली के नाम से जाना जाता है। राजगढ़ क्षेत्र में फागू, भणत, हालोनी ब्रिज, बठाऊधार और शावगा आदि क्षेत्रों में आडू की खासी पैदावार होती है। इस क्षेत्र में आडू की कई किस्में उगाई जा रही है, जिनकी खासी डिमांड है। पहले यह आडू एनसीआर मार्किट में खूब धूम मचा रहा था, मगर बीते कुछ वक्त में इसके रेट कम हुए है। लिहाजा उत्पादकों का भी इससे कुछ मोह भंग हुआ है। इस पर कृषि रोगों ने भी इसके उत्पादन को प्रभावित किया है। बहरहाल, पीच वैली को एक विशेष योजना की दरकार है जिससे आडू उत्पादन का बीता हुआ सुनहरा वक्त फिर लौट आएं। हिमाचल में सेब का विकल्प बन रही चेरी, इस साल मिल रहे दोगुने दाम हिमाचल में सेब के अतिरिक्त चेरी भी बागवानों के लिए एक अहम नकदी फसल बनती जा रही है। बागवानों के सेब के बगीचों में पिछले कुछ सालों से चेरी की भी बड़ी पैदावार होने लगी है। एक तरफ जहां सेब की फसल लेने में बागवानों को साल भर कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती है, वहीं दूसरी तरफ कम मेहनत वाली चेरी की फसल अब बागवानों के लिए वरदान साबित हो रही है। हिमाचल प्रदेश में करीब 400 हेक्टेयर भूमि में चेरी का उत्पादन किया जाता है। राज्य में सेब बगीचों के साथ ही चेरी के पौधे भी लगाए जाते हैं लेकिन चेरी 15 मार्च के बाद तैयार होती है और सिर्फ एक माह तक चेरी का सीजन चलता है।    हिमाचल में चेरी की प्रमुख किस्में रेड हार्ट, ब्लैक हार्ट, विंग, वैन, स्टैना, नेपोलियन, ब्लैक रिपब्लिकन हैं। स्टैना परागण किस्म है और इसके बिना चेरी की अच्छी पैदावार नहीं ली जा सकती। चेरी के अच्छे रूट स्टॉक नहीं हैं। अगर चेरी के रूट स्टॉक अच्छे हो तो फसल और बेहतर हो सकती है। प्रदेश में चेरी की सबसे अधिक पैदावार शिमला जिले के ननखड़ी, कोटगढ़ और नारकंडा क्षेत्रों में होती है।     इस बार भी हिमाचल की रसीली चेरी ने बाजार में दस्तक दे दी है। इस साल चेरी का सीजन करीब 10 दिन पहले शुरू हो गया है। समय से पहले तापमान बढ़ना इसका कारण बताया जा रहा है। सीजन की शुरुआत में ही बागवानों को 300 रुपये प्रति किलो तक रेट मिल रहे हैं, जो पिछले साल के मुकाबले दोगुने हैं। ढली मंडी में चेरी 200 से 300 रुपये प्रति किलो के रेट पर बिकी। पिछले साल एक मई को चेरी बाजार में पहुंची थी और कीमत अधिकतम 150 रुपये थी। सीजन की शुरुआत में चेरी लोकल मार्केट में ही खप रही है। आने वाले दिनों में शिमला से चेरी बंगलूरू, महाराष्ट्र और गुजरात तक भेजी जाएगी। आम की बंपर फसल हिमाचल प्रदेश में इस बार आम की फसल बंपर होने की उम्मीद है। आम के पेड़ों पर आया फूल इसी ओर इशारा कर रहा है कि इस बार बागवानों को आम की फसल मालामाल करने वाली है। हालांकि, अभी भी मौसम पर काफी कुछ निर्भर करेगा। गौरतलब है कि वर्ष 2021 में आम की फसल का ऑफ़ सीज़न रहा था। इस बार सीजन के ऑन होने की संभावनाएं पहले ही जता दी गई थी। नूरपुर, इंदौरा, ऊना व हिमाचल के अन्य निचले क्षेत्रों में आम की दशहरी, आम्रपाली, रामकेला, लंगडा चौंसा, तोता, अल्फेंजो, ग्रीन, फजली आदि किस्में पाई जाती है। जिनमें मुख्य दशहरी अगेती किस्म है। इसकी जून के मध्य माह में फसल तैयार हो जाती है।

सोलन : (IGNOU) में जनवरी सत्र 2023 के लिए पुनः पंजीकरण शुरू

In Education First
Re-registration for January session 2023 started in Solan (IGNOU)

(IGNOU) में जनवरी सत्र 2023 के लिए पंजीकरण शुरू हो गया है। सोलन राजकीय महाविद्यालय के इग्नू केंद्र के समन्वयक डॉ राजेंद्र कश्यप ने बताया की (IGNOU) में जनवरी सत्र 2023 के लिए पुनः पंजीकरण शुरू कर दिया है। यह पंजीकरण ऑनलाइन माध्यम से किया जा सकता है। जो भी शिक्षार्थी जनवरी 2022 सत्र में दाखिला ले चुके है वह अपना पुनः पंजीकरण 31 दिसंबर से पहले करवाले। साथ ही समन्वयक डॉ राजेंद्र कश्यप ने बताया कि इग्नू की दिसंबर 2022  में होने वाली परीक्षा से संबंधित  असाइनमेंट जमा करने की अंतिम तिथि 30 नवंबर 2022 है। जो भी छात्र इग्नू की दिसंबर 2022 की परीक्षा के लिए अपना परीक्षा फॉर्म नहीं भर पाए है वह भी विलंब शुल्क Rs1100/- के साथ ऑनलाइन माध्यम से परीक्षा फॉर्म भर सकते है और अधिक जानकारी के लिए छात्र इग्नू केंद्र राजकीय महाविद्यालय से संपर्क कर सकते है। 

मिलर के तूफानी शतक पर फिरा पानी, टीम इंडिया ने जीता दूसरा टी20

In Sports
Miller's stormy century turned water, Team India won the second T20

गुवाहटी में खेले गए दूसरे टी20 में टीम इंडिया ने दक्षिण अफ्रीका को 16 रनों से हरा दिया। इसके साथ ही टीम इंडिया ने तीन मैचों की इस सीरीज में 2-0 की अजेय बढ़त भी बना ली है। घर पर खेलते हुए टीम इंडिया पहली बार दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टी20 सीरीज जीती है। टीम इंडिया ने पहले खेलने के बाद 20 ओवर में 3 विकेट पर 237 रन बनाए थे। इसके जवाब में दक्षिण अफ्रीका की टीम डेविड मिलर के तूफानी शतक की बदौलत निर्धारित ओवरों में 221 रन ही बना सकी।  238 रनों का लक्ष्य का पीछा करने उतरी साउथ अफ्रीकी टीम की शुरूआत बेहद खराब रही और टीम ने सिर्फ एक रन के स्कोर पर 2 बल्लेबाज आउट हो गए। टीम को पहला झटका कप्तान बवुमा के रूप में तो दूसरा झटका राइली रूसो के रूप में लगा। अफ्रीका के इन दोनों बल्लेबाजों को अर्शदीप सिंह ने पवेलियन भेजा। इसके बाद अफ्रीकी पारी को मार्करम और डिकॉक ने संभाला और टीम का स्कोर 40 के बार ले गए हालांकि अच्छी बल्लेबाजी कर रहे मार्करम 33 के स्कोर पर अक्षर पटेल के गेंद पर बोल्ड हो गए।  मार्करम के आउट होने के बाद डेविड मिलर और डिकॉक ने पारी को संभाला और अफ्रीका के किसी और विकेट को नहीं गिरने दिया। अफ्रीकी टीम के ओर से आज डेविड मिलर ने 47 गेदों पर सात छक्के और आठ चौकों की मदद से 106 रनों की शतकीय पारी खेली। वहीं उनके अलावा क्विंटन डिकॉक ने 48 गेंदों पर चार छक्के और तीन चौकों की मदद से 69 रनों की अर्धशतकीय पारी खेली। हालांकि इन दोनों की पारियां भी अफ्रीकी टीम को जीत नहीं दिला सकीं और भारत इस मैच को 16 रनों से जीत गया।  टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी भारतीय टीम ने 20 ओवर में 3 विकेट पर 237 रन बनाए थे। पहले बल्लेबाजी करने उतरी भारतीय टीम की शुरूआत शानदार रही। भारतीय कप्तान रोहित शर्मा और केएल राहुल ने पहले विकेट के लिए 9.5 ओवर में 96 रन जोड़े. रोहित शर्मा 37 गेंदों पर 43 रन बनाए, जबकि केएल राहुल ने 28 गेंदों पर 57 रनों का योगदान दिया। इन दोनों के आउट होने के बाद बल्लेबाजी करने उतरे विराट कोहली और सूर्यकुमार यादव ने तूफानी अंदाज में बल्लेबाजी की।  सूर्यकुमार यादव ने 22 गेंदों पर 61 रनों की ताबड़तोड़ पारी खेली। उन्होंने अपनी इस पारी के दौरान 5 छक्के और 5 चौके जड़े। इसके अलावा विराट कोहली ने 28 गेंदों पर नाबाद 49 रन बनाए। भारत के ओर से इन बल्लेबाजों की शानदार बल्लेबाजी के बदौलत 237 रनों का बड़ा स्कोर बनाने में कामयाब हो सकी। हालांकि साउथ अफ्रीकी टीम इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई और 221 रन बनाकर 16 रनों से यह मुकाबला हार गई। 

'पोन्नियिन सेलवन 1' ने बॉक्स ऑफिस पर कमाई के तोड़े सारे रिकॉर्ड, दो दिन में की इतनी कमाई

In Entertainment
'Ponniyin Selvan 1' broke all the records of earning at the box office, earned so much in two days

मणिरत्नम द्वारा निर्देशित तमिल ऐतिहासिक महाकाव्य 'पोन्नियिन सेलवन 1' ने बॉक्स ऑफिस पर कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। फिल्म ने रिलीज के अपने दो ही दिन में 150 करोड़ के आंकड़े  को पार कर लिया है। फिल्म 30 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी और इसे विश्व स्तर पर तमिल, तेलुगु, हिंदी, कन्नड़ और मलयालम में रिलीज़ किया गया है। फिल्म ने रिलीज के अपने पहले दिन वर्ल्ड वाइड 80 करोड़ रुपए की शानदार कमाई की। वहीं, फिल्म ने रिलीज के अपने दूसरे दिन में थोड़ी गिरावट के साथ करीब 70 करोड़ रुपए की कमाई की है। फिल्म निर्माताओं ने 1 अक्टूबर को आधिकारिक घोषणा की कि फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी शुरुआत के साथ 80 रुपये कमाए हैं। अब, दो दिनों में फिल्म ने दुनिया भर में 150 करोड़ रुपये की कमाई की है। उम्मीद की जा रही है कि फिल्म सिनेमाघरों में बहुत अच्छी चलेगी क्योंकि फिल्म के प्रति दर्शकों की प्रतिक्रिया काफी पॉजिटिव सामने आ रही है। 'पोन्नियिन सेलवन' उन तमिल फिल्मों में से एक है, जिसने इस साल बड़े पैमाने पर ओपनिंग हासिल की है। 

कांगड़ा : बारह राउंड में पूरी होगी फतेहपुर की मतगणना

In News
Kangra: Fatehpur's vote counting will be completed in twelve rounds

फतेहपुर निर्वाचन अधिकारी (एसडीएम) विश्रुत भारती  की अध्यक्षता में वज़ीर राम सिंह राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, देहरी में मतगणना कार्य की अंतिम तैयारियों को लेकर समीक्षा बैठक आयोजित की गई। इस दौरान सहायक निर्वाचन अधिकारी (तहसीलदार) हंस राज रावत, निर्वाचन कानूनगो राजेश कुमार सहित अन्य अधिकारी व कर्मी उपस्थित रहे। उन्होंने बताया कि विधानसभा निर्वाचन-2022 के लिए 8 दिसम्बर को देहरी कॉलेज में सम्पन्न होने वाली मतगणना के लिए प्रशासन ने सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली है। उन्होंने बताया कि विधानसभा क्षेत्र के लिए कुल बारह राउंड में मतगणना की प्रक्रिया पूरी होगी। 12 नवंबर को 112 मतदान केंद्रों पर सम्पन्न हुए मतदान में ईवीएम में दर्ज 62852 मतों की प्रत्येक राउंड की गणना के लिए 10 टेबल लगाए गए है। इसके अतिरिक्त डाक मत पत्रों (पोस्टल बैलेट) की गिनती के लिए चार अलग टेबल लगाए गए है। विश्रुत भारती ने बताया कि ईवीएम के लिए स्थापित प्रत्येक टेबल पर एक-एक माईक्रो ऑब्जर्वर, मतगणना पर्यवेक्षक और मतगणना सहायक नियुक्त किये गए है। वहीं पोस्टल की गिनती के लिए स्थापित प्रत्येक टेबल में एक-एक माईक्रो ऑब्जर्वर और मतगणना पर्यवेक्षक तथा दो मतगणना सहायक  तैनात रहेंगे। उन्होंने बताया कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार का एक एजेंट भी प्रत्येक मतगणना टेबल पर मौजूद रहेगा। उन्होंने बताया कि प्रत्याशी के आधिकारिक काउंटिंग एजेंट तथा मतगणना कार्य के लिए नियुक्त किसी भी अधिकारी और कर्मचारी को रिटर्निंग अधिकारी द्वारा जारी प्रदत पहचान पत्र के विना मतगणना केंद्र में प्रवेश नहीं मिलेगा। विश्रुत भारती ने बताया कि मतगणना केंद्र पर मोबाईल फोन ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। उन्होंने बताया कि प्रेस प्रतिनिधियों की सुविधा के लिए मतगणना केंद्र परिसर में मीडिया सेंटर की स्थापना की गई है। इसके अतिरिक्त उनके बैठने एवम रुझानों बारे समय-समय पर जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए भी विशेष व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।  

चीन में लगातार बढ़ रहे कोरोना केस, पिछले कल 40,000 नए मामले आए सामने

In National News
Corona cases are increasing continuously in China, 40,000 new cases came to the fore yesterday

चीन में लगातार बढ़ रहे कोरोना के मामलों और फैलाव को रोकने के लिए चीन में लागू प्रतिबंधों के खिलाफ प्रदर्शन तेज हो गया है। इस बीच चीन में संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहे है। सोमवार को करीब 40,000 मामले सामने आए। ड्रैगन के देश चीन के लोगों ने उन पर जबरन थोपे गए लॉकडाउन का विरोध करने के लिए अनोखा तरीका अपनाया है। चीन की जनता हाथों में ए-4 साइज के सफेद पेपर लेकर सड़कों पर उतर आई है। ये सफेद पेपर महज पेपर नहीं है ये बोलने की आजादी पर लगाम लगाने के प्रतिरोध का प्रतीक है। इसमें बगैर कुछ कहे जनता साफ तौर पर सरकार को अपना विरोध जता रही है और वो सब कह रही है जो वो कह नहीं सकती है। कुछ लोग इस तरह के विरोध को सफेद पेपर क्रांति का नाम दे रहे है। एक ऐसे देश में जहां खुले विरोध के लिए अधिकारियों की सहनशीलता बेहद कम है। वहां कोविड प्रतिबंधों के खिलाफ प्रदर्शनकारी के क्रिएटिव तरीकों का ईजाद किया जाना अपने आप में अनोखा प्रयोग है।

Sri Lanka Crisis: श्रीलंका में इमरजेंसी का एलान, राष्ट्रपति गोटाबाया देश छोड़कर भागे, रानिल विक्रमसिंघे कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त

In International News
Sri Lanka Crisis news update 13 july 2022

श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया के बुधवार तड़के देश छोड़ने कर मालदीव जाने के बाद इमरजेंसी का एलान किया गया है। राष्ट्रपति गोटाबाया के देश से भागने की खबर के बाद लोगों का हिंसक प्रदर्शन जारी है। बिगड़े हालात को काबू में करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले दागने पड़े। प्रदर्शनकारियों ने सेना की गाड़ी को भी रोक दिया है। जबकि, दूसरी तरफ गोटबाया राजपक्षे को आज श्रीलंका के राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देना था। लेकिन उनके इस कदम की वजह से वहां की जनता में भारी गुस्सा दिख रहा है। वहीं श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के देश से भागने के बाद प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त किया गया है। बता दें श्रीलंका के पास सबसे जरूरी वस्तुओं के आयात के लिए भी विदेशी मुद्रा समाप्त हो गई है, जिससे उसके 22 मिलियन लोगों के लिए गंभीर कठिनाइयां पैदा हो गई हैं। देश अप्रैल में अपने 51 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज के भुगतान में चूक गया और संभावित राहत के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ बातचीत कर रहा है। 

राम रहीम पर हरियाणा सरकार फिर मेहरबान, पैरोल पर आया बाहर

In Breaking
ram rahim out on payroll haryana govt kind off blessed him

-21 दिन की पैरोल के दौरान दी गई थी जेड प्लस सिक्योरिटी -जानिए राम रहीम को क्यों हुई थी सजा ? डेरा सच्चा सौदा के संचालक राम रहीम पर हरियाणा सरकार एक बार फिर मेहरबान हुई है। राम रहीम को एक महीने की पैरोल दी गई है, इससे पहले फरवरी के पहले सप्ताह में गुरमीत राम रहीम को 21 दिन की पैरोल दी गई थी, बता दें कि अपने आश्रम में दो महिला अनुयायियों से बलात्कार के मामले में गुरमीत राम रहीम उम्रकैद की सजा काट रहा है।  डेरा सच्चा सौदा के संचालक राम रहीम पर हरियाणा सरकार एक बार फिर मेहरबान हुई है. राम रहीम को एक महीने की पैरोल दी गई है, शुक्रवार सुबह करीब साढ़े पांच बजे सुरक्षा के बीच राम रहीम जेल से बाहर आया। सूत्रों के मुताबिक, जेल से बाहर आने के बाद राम रहीम बागपत स्थित अपने आश्रम में गया है, बता दें कि दो साध्वियों के साथ रेप और दो हत्याओं का दोषी राम रहीम रोहतक की सुनारिया जेल में सजा काट रहा है। इससे पहले इसी साल 7 फरवरी को गुरमीत राम रहीम को 21 दिन की पैरोल दी गई थी, 28 फरवरी को पैरोल अवधि समाप्त होने के बाद राम रहीम को सुनारिया जेल लाया गया था। पिछले साल भी डेरा प्रमुख को अपनी बीमार माँ से मिलने के लिए सुबह से शाम तक का आपातकालीन पेरोल दी गयी थी।  फरवरी में राम रहीम की 21 दिन की पैरोल मंजूर की थी, इस दौरान सरकार ने राम रहीम की जान का खतरा बताते हुए उन्हें जेड प्लस की सुरक्षा भी मुहैया करवाई थी, फरलो के दौरान राम रहीम ज्यादातर समय अपने गुरुग्राम स्थित आश्रम में ही रहा था। सरकार ने सुरक्षा का आधार एडीजीपी की रिपोर्ट को बनाया था, सरकार ने कहा था कि खालिस्तान समर्थक डेरा प्रमुख को नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसलिए उन्हें सख्त सिक्योरिटी दी जा रही है।  राम रहीम सिरसा स्थित अपने आश्रम में दो महिला अनुयायियों से बलात्कार के मामले में 20 साल की कैद की सजा काट रहा है, राम रहीम को पंचकूला की एक विशेष सीबीआई अदालत ने अगस्त 2017 में मामले में दोषी करार दिया था, इसके अलावा गुरमीत राम रहीम को पूर्व डेरा प्रबंधक रंजीत सिंह की हत्या के मामले में भी कोर्ट ने उम्र कैद की सजा सुनाई थी। 

आम ओ ख़ास के शायर बशीर बद्र के 20 बेहतरीन शेर

In Kavya Rath
आम ओ ख़ास के शायर बशीर बद्र के 20 बेहतरीन शेर

बशीर बद्र शायरी के उन पैमानों को उजागर करते हैं जहां आसान शब्दों में गहरी बात कह दी जाती है। ऐसे शायर ही लोगों के दिलों तक का सफ़र कर पाते हैं। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि बशीर बद्र भी लोगों के शायर हैं जिन्हें आम से ख़ास तक हर कोई पसंद करता है। इनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर है। भोपाल से ताल्लुकात रखने वाले बशीर बद्र का जन्म कानपुर में हुआ था। न जाने कितनी बार अपनी बात कहने के लिए बशीर साहब को संसद में भी पढ़ा जा चुका है। आइए पढ़ते हैं बशीर साहब के लिखे ऐसे ही कुछ ख़ास शेर    दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिन्दा न हों हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा शौहरत की बुलन्दी भी पल भर का तमाशा है जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला  उसे किसी की मुहब्बत का एतिबार नहीं उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है गुलाबों की तरह शबनम में अपना दिल भिगोते हैं मुहब्बत करने वाले ख़ूबसूरत लोग होते हैं चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं से ज़मीं ग़ज़ल के शेर कहां रोज़-रोज़ होते हैं अबके आंसू आंखों से दिल में उतरे रुख़ बदला दरिया ने कैसा बहने का ज़हीन सांप सदा आस्तीन में रहते हैं ज़बां से कहते हैं दिल से मुआफ़ करते नहीं  सात सन्दूकों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें आज इन्सां को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत खुले से लॉन में सब लोग बैठें चाय पियें दुआ करो कि ख़ुदा हमको आदमी कर दे लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुशबू अज़ान दे जी चाहता है मैं तेरी आवाज़ चूम लूं इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरी लोग तुझको मेरा महबूब समझते होंगे  मुझको शाम बता देती है तुम कैसे कपड़े पहने हो इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे ऐसे मिलो कि अपना समझता रहे सदा जिस शख़्स से तुम्हारा दिली इख़्तिलाफ़ है सच सियासत से अदालत तक बहुत मसरूफ़ है झूट बोलो, झूट में अब भी मोहब्बत है बहुत किताबें, रिसाले न अख़़बार पढना मगर दिल को हर रात इक बार पढ़ना मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत संवरती है मैं दुश्मनों का बड़ा एहतेराम करता हूं       

बेरोजगार युवाओं के लिए सुनहरा मौका...

In Job
Golden opportunity for unemployed youth...

हिमाचल के बेरोजगार युवाओं के लिए नौकरी पाने का सुनहरा मौका मिलने जा रहा है. हिमाचल सिलेक्शन एसोसिएशन लिमिटेड  शिमला ने विभिन्न श्रेणियों के (634) पदों को भरने के लिए ऑनलाइन माध्यम द्वारा आवेदन पत्र आमंत्रित किए गए हैं. आवेदन करने की अंतिम तिथि 12 जुलाई 2022 निर्धारित की गई है. एसोसिएशन के एचआर  निदेशक अश्वनी कुमार ने जानकारी देते हुए बताया, कि इसमें ब्रांच सेल्स ऑफिसर (18), बैंक कैश हैंडलिंग एग्जीक्यूटिव (19), एडमिनिस्ट्रेशन एग्जीक्यूटिव (20) , कस्टमर सपोर्ट रिप्रेजेंटेटिव (15), बैंक कैश कस्टोडियन (17), बैक एंड एग्जीक्यूटिव (12), रिलेशनशिप मैनेजर (50), सुरक्षा गार्ड (59), डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर (17), फॉर्म सेल्स एग्जीक्यूटिव (73),अकाउंटेंट फीमेल (22), वेल्डर (29), फिटर (32), टर्नर (39),इलेक्ट्रिशियन (35),  कस्टमर सर्विस एग्जीक्यूटिव (20), बैंक  लोनिंग एजेंट (19),  ऑफिस क्लर्क (18), कार्यालय सहायक (22), स्टाफ नर्स एएनएम,जीएनएम (26), सिक्योरिटी सुपरवाइजर (16),  एरिया मैनेजर (13) , बैंक एमआई रिकवरी एग्जीक्यूटिव (16), ड्राइवर (10), पीएन कम हेल्पर (17) पदों को भरने के लिए अधिसूचना जारी की गई है. इन पदों के लिए आयु सीमा 18 वर्ष से लेकर 45 वर्ष तक निश्चित की गई है. उम्मीदवार यहां करें, आवेदन :- प्रदेश के इच्छुक महिला व पुरुष उम्मीदवार आवेदन करने के लिए  एसोसिएशन के व्हाट्सएप नंबर 62304-06027  पर अपना बायोडाटा  साधारण फोन नंबर सहित, आधार कार्ड, पुलिस चरित्र प्रमाण पत्र लेटेस्ट, पैन कार्ड, हिमाचली बोनाफाइड, रोजगार कार्यालय पंजीकरण प्रमाण पत्र ,एवं शैक्षणिक योग्यता के मूल प्रमाण पत्रों की छाया प्रति स्कैनड पीडीएफ (PDF) बनाकर  निर्धारित तिथि  12 जुलाई 2022 तक अपना आवेदन भेज सकते हैं. एसोसिएशन द्वारा उम्मीदवारों  की चयन प्रक्रिया  छटनी परीक्षा/  लिखित परीक्षा (140) क्रमांक एवं इंटरव्यू (30) क्रमांक द्वारा ही किया  जाएगा. लिखित परीक्षा में  हिमाचल सामान्य ज्ञान, एवरीडे साइंस, कंप्यूटर न्यूमेरिकल एटीट्यूट, गणित, जनरल इंग्लिश, जनरल हिंदी ,समाजशास्त्र विषय से संबंधित ऑब्जेक्टिव टाइप (140) MCQ प्रश्न पूछे जाएंगे. संगठन द्वारा शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की लिखित परीक्षा 30 जुलाई 2022 को उम्मीदवारों के व्हाट्सएप नंबर पर ऑनलाइन ही ली जाएगी. उम्मीदवार पदनाम एवं शैक्षणिक योग्यता की  महत्वपूर्ण जानकारी एसोसिएशन की अधिकारिक वेबसाइट www.hpussa.in  पर देख सकते हैं.  यह  सभी पद हिमाचल प्रदेश के लिए ही आरक्षित किए गए हैं. एसोसिएशन द्वारा लिखित परीक्षा का परिणाम 28 अगस्त 2022 को घोषित किया जाएगा. लिखित परीक्षा के लिए शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों को आवेदन शुल्क  सभी श्रेणियों  के वर्गों की कैटेगरी  जनरल ,एससी, एसटी, ओबीसी, फ्रीडम फाइटर, एपीएल, बीपीएल, फिजिकली डिसेबिलिटी, स्वतंत्रता सेनानी को (1770) रुपए आवेदन शुल्क जमा/चुकता करना होगा, जो कि  नॉन रिफंडेबल रहेगा. यह सभी पद (2) वर्ष के लिए (कॉन्ट्रैक्ट) अनुबंध आधार पर भरे जाएंगे, जिन्हें बाद में रेगुलर किया जाएगा.  असफल उम्मीदवारों को  भी एसोसिएशन द्वारा (F.S.E) के पद पर तैनात किया जाएगा. एसोसिएशन द्वारा चयनित उम्मीदवारों का मासिक वेतनमान ग्रेड-पे 10,500/- से लेकर 32,810/- तक सीटीसी  ग्रेड-पे दिया जाएगा. इसके अलावा प्रोविडेंट फंड ,जनरल प्रोविडेंट फंड, मेडिकल इंश्योरेंस, ओवरटाइम, प्रमोशन ,इंसेंटिव, बोनस की सुविधा भी मिलेगी. यह सभी पद (एमएनसी) मल्टीनेशनल कंपनियों , हॉस्पिटल,  मेडिकल कॉलेज, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक , इंडस बैंक, एक्सिस बैंक, टेक महिंद्रा, रिलायंस बीपीओ कॉल सेंटर, चेकमेट, एचडीबी फाइनेंस, सतलुज मोटर्स,  सिग्मा,गोदरेज, कैडबरी ,डावर इंडिया, मणिपुरम फाइनेंस, एलआईसी कॉरपोरेशन,   सेक्टरों में भरे जाएंगे. इच्छुक उम्मीदवार अधिकतर जानकारी के लिए कार्यालय के  दूरभाष नंबर 01907292034 एवं प्लेसमेंट अधिकारियों  (एचआर) के मोबाइल नंबर 94181-39918, 62305-90985 ,94184-17434 पर संपर्क कर सकते हैं. नोट:( यह विज्ञापन सामग्री है)

हिमाचली लोक संस्कृति के ध्वजवाहक थे लायक राम रफीक

In Banka Himachal
 Ram Rafiq was the flag bearer of Himachali folk culture

पहाड़ी लोक संस्कृति के नायक लायक राम रफ़ीक़ वो शक्सियत है जिन्होंने अपने जीवन का अंतिम दशक खुद तो अंधेरे में बिताया, मगर वो पहाड़ी गायकी को वो पहचान दे गए जो आज भी रोशन है। हिमाचल में पहाड़ी नाटियों का दौर बदलने वाले रफ़ीक़ एक ऐसे गीतकार थे जिन्होंने अपने जीवन में करीब 2500 से अधिक पहाड़ी गीत लिखकर इतिहास रचा। हिमाचल में शायद ही ऐसा कोई गायक होगा, जिसने पारंपरिक गीतों के पीछे छिपे इतिहास के जन्मदाता लायक राम रफीक के गानों को न गाया हो। आज भी रफीक के लिखे गानों को गुनगुनाया जाता है, गाया जाता है। उनके लिखे अमर गीत अब भी महफिलें लूटते है। प्रदेश का ऐसा शायद ही कोई क्षेत्र हो जहां शादी के डी जे या स्कूलों के सांस्कृतिक या अन्य आयोजनों में रफ़ीक के गीतों ने रंग न जमाया हो। नीलिमा बड़ी बांकी भाई नीलिमा नीलिमा.., होबे लालिए हो जैसे गीत हो या मां पर लिखा मार्मिक गीत 'सुपने दी मिले बोलो आमिएं तू मेरिए बेगे बुरो लागो तेरो आज, जिऊंदिए बोले थी तू झालो आगे रोएला बातो सच्ची निकली से आज' ...  रफीक कई कालजयी गीत लिख गए। रफीक आकाशवाणी शिमला से गायक और अपने गीतों की अनेक लाजवाब धुनों के रचयिता भी रहे।      अपना पूरा जीवन पहाड़ी संगीत पर न्योछावर करने वाले लायक राम रफीक का अंतिम समय बेहद दुखद व कठिनाओं से भरा रहा। ग्लूकोमा ने उनकी आंखों की रोशनी चुरा ली थी। उन्हें अपना अंतिम समय अँधेरे में बिताना पड़ा, मगर ये अंधापन भी उन्हें अपने आजीवन जुनून का पीछा करने से नहीं रोक सका - अंतिम सांस तक वो पहाड़ी गीत लिखते रहे। रफ़ीक़ शिमला में ठियोग के पास एक छोटे से गाँव (नालेहा) में रहा करते थे। कृषि परिवार में जन्मे और स्थानीय स्कूल में पढ़े लिखे। एक पुराने साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि वे मीट्रिक की परीक्षा भी पास नहीं कर पाए थे, स्कूल की किताबों में उनका मन ही नहीं लगता था। पर ठियोग की लाइब्रेरी में रखी साहित्यिक किताबों से मजबूत रिश्ता था। रफ़ीक़ पूरा दिन उस लाइब्रेरी में बैठ उर्दू और हिंदी की कविताओं से भरी किताबें पढ़ते रहते। इन्हीं कविताओं को पढ़ रफ़ीक़ को पहाड़ी बोली में कविताएं लिखने की प्रेरणा मिली और बस तभी से रफ़ीक़ ने अपने ख्यालों को शब्दों के ज़रिये गीत माला में पिरोना शुरू कर दिया।       हजारों लोकप्रिय गीतों के गीतकार लायक राम रफ़ीक उपेक्षा का शिकार रहे है। उनके गीतों को आवाज देकर न जाने कितने गायकों ने शोहरत कमाई और रफीक के हिस्से आई सिर्फ उपेक्षा। ये बेहद विडम्बना का विषय है कि रफीक के अनेक लोकप्रिय गीतों के विवरण में उनका नाम तक दर्ज नहीं है। न सिर्फ रफीक साहब बल्कि पहाड़ी संगीत जगत में गीतकार सबसे अधिक उपेक्षित वर्ग है। एसडी कश्यप को देते थे इंडस्ट्री में लाने का श्रेय : रफीक ने 78 साल की उम्र में अपनी आखिरी सांस लेने से पहले तक लगभग 2,500 गीत लिखे थे। रफ़ीक़ ने न सिर्फ नाटियों (लोक गीतों) की लोकप्रियता को बढ़ाने का कार्य किया बल्कि उन्हें व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक बनाने के लिए भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। रफीक के हिमाचल म्यूजिक इंडस्ट्री में आने से पहले,  संगीत निर्देशक एसडी कश्यप ने मंडी में हिमाचल प्रदेश का पहला स्टूडियो ( साउंड एंड साउंड स्टूडियो खोला था )। रफीक अक्सर इंटरव्यूज में ये कहा करते थे की उन्हें रचनाकार बनाने में एसडी कश्यप का बड़ा हाथ था। वे ही उन्हें इस इंडस्ट्री में लेकर आए थे। वे ठियोग से मंडी जा उन्हीं के स्टूडियो में अपने गाने रिकॉर्ड करवाया करते। रफ़ीक़ ने एक लम्बे अर्से तक आकाशवाणी में बतौर गायक भी कार्य किया।   रफीक के लिखे गीत सबको समझ आये:    हिमाचली नाटियों में वास्तविक प्रेम कहानियां, बहादुरी और अच्छे कामों की यादें संजोई जाती है। उस दौर में पहाड़ी नाटियों से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या थी भाषा। दरअसल हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में  हर 10-15 मील के बाद भाषा बदल जाती है। इसलिए, किसी विशेष क्षेत्र की भाषा में बनाए गए और गाए गए पारंपरिक गीतों को अन्य क्षेत्रों में उतना सराहा और समझा नहीं जाता था। इस दुविधा को दूर करने में रफीक का बड़ा हाथ रहा। वो ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर लिखते की हर किसी को वो समझ आ जाए। पारंपरिक नाटियों से हटकर, उन्होंने रोमांटिक गीतों को अपनी खूबी बना लिया और उन्हें एक सरल भाषा में लिखा। हर कोई उनके लिखे गाने समझने व गुनगुना लगा। ऊपरी शिमला क्षेत्र के विभिन्न क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाओं पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। इसने उन्हें नाटियों के लिए एक बड़ा दर्शक वर्ग बनाने में मदद की, जिससे यह शैली व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक हो गई। उन लिखे गीतों को गाना हर नए पुराने सिंगर की डिमांड बन गई। गीत लिखने और बनाने के अपार प्रेम ने उन्हें पहाड़ी गीतों का सबसे उम्दा लेखक बना दिया।

चिंतपूर्णी में फिर बलबीर या इस बार बबलू ?

In kaun banega vidhayak
Balbir again in Chintpurni or Bablu this time?

हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद 18 अक्टूबर को कांग्रेस ने 46 प्रत्याशियों की अपनी पहली लिस्ट जारी कर दी थी। पर इस सूची में चिंतपूर्णी सीट शामिल नहीं थी। बावजूद इसके अगले दिन शाम को चिंतपूर्णी से टिकट के दावेदार सुदर्शन सिंह बबलू ने समर्थकों सहित पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया। पत्रकार वार्ता में बबलू ने आंसू भी बहाएं और कांग्रेस पर आरोप भी लगाएं। पर इसके बाद जब पार्टी प्रत्याशियों की लिस्ट आई तो चिंतपूर्णी से टिकट वरिष्ठ नेता कुलदीप कुमार को नहीं बल्कि उन्हीं बबलू को मिला जो पार्टी छोड़कर जा रहे थे। फिर जैसा अपेक्षित था, टिकट न मिलने से कुलदीप कुमार खफा हुए और शुरुआत में बगावती तेवर भी दिखाएँ, लेकिन बाद में कांग्रेस यहाँ बगावत साधने में कामयाब रही। बहरहाल टिकट वितरण तक दिखी सियासी उठापठक के बाद चिंतपूर्णी में कांग्रेस के सुदर्शन बबलू ने  दमदार तरीके से चुनाव लड़ा है और पार्टी यहाँ जीत का दावा भी कर रही है। उधर भाजपा ने एक बार फिर सीटिंग विधायक बलबीर सिंह को यहाँ मैदान में उतारा है। चिंतपूर्णी में सिटींग विधायक को लेकर थोड़ी नाराजगी भी दिखती रही है। ऐसे में जाहिर है यहाँ एंटी इंकम्बैंसी का खामियाज़ा भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। इसके अलावा ओपीएस और महंगाई जैसे चुनावी मुद्दे भी भाजपा को भारी पड़ सकते है। बावजूद इसके बलबीर सिंह का दावा यहाँ कमतर नहीं माना जा सकता। इतिहास पर निगाह डाले तो चिंतपूर्णी विधानसभा सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। यहाँ भाजपा को केवल 3 दफा ही जीत हासिल हुई है। 1967 में यहां से कांग्रेस के चौधरी हरिराम ने जीत दर्ज की थी, जबकि 1972 में कांग्रेस के ओंकार चंद यहां से विजयी रहे थे। फिर 1977 में जनता पार्टी की लहर में हंसराज अकरोट यहाँ से जीते। 1980 में हंसराज अकरोट ने कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़कर यहाँ दूसरी बार जीत दर्ज की। 1985 में कांग्रेस लहर में गणेश दत्त भरवाल ने यहां जीत का परचम लहराया था। 1990 में यहाँ भाजपा यहाँ पहली बार जीती और सुषमा शर्मा विधानसभा पहुंची। 1993 में आजाद प्रत्याशी हरिदत्त यहा विजयी रहे, 1998 में भाजपा के प्रवीण शर्मा ने जीत दर्ज की थी। 2003 में राकेश कालिया ने भाजपा के प्रवीण शर्मा को 11 हजार से अधिक मतों से हरा कर ये सीट फिर कांग्रेस के नाम की। 2007 में कालिया ने लगातार दूसरी बार यहां जीत दर्ज की। फिर 2008 के परिसीमन के बाद  यह क्षेत्र अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हो गया, जिसके बाद गगरेट से चुनाव लड़ते आ रहे कुलदीप कुमार ने इस क्षेत्र से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ा। तब नजदीकी मुकाबले में उन्होंने भाजपा के बलबीर चौधरी को 438 मतों से हराया। जबकि 2017 में भाजपा के बलबीर चौधरी ने कांग्रेस के कुलदीप कुमार को 8579 मतों से पराजित किया और करीब दो दशक बाद ये सीट भाजपा की झोली में डाली। अब फिर भाजपा से बलबीर चौधरी मैदान में है, तो कांग्रेस ने यहाँ से सुदर्शन बबलू को मैदान में उतारा है। मौजूदा चुनाव में चिंतपूर्णी की गिनती प्रदेश की उन सीटों में है जहाँ बेहद काम अंतर से जीत-हार का फैसला हो सकता है। पर यदि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के लिए वोट डला है, तो जाहिर है यहाँ भी कांग्रेस का पलड़ा कुछ भारी हो सकता है। 

प्रदेश ही नहीं देश के सियासी पटल पर भी दमदार है अनुराग

In chunav 2022

  केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर निसंदेह हिमाचल का वो चेहरा है जिसे देश-विदेश में भी लोग न सिर्फ पहचानते है, बल्कि पसंद भी करते है। वर्तमान में मोदी सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा युवा एवं खेल मंत्रालय का भार संभाल रहे 48 वर्षीय अनुराग ठाकुर  हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से चौथी बार सांसद है। 2019 में जब मोदी सरकार दूसरी बार सत्ता में लौटी तो अनुराग ठाकुर को वित्त राज्य मंत्री बनाया गया था। फिर जुलाई 2021 में उनका कद बढ़ा और वे केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बन गए। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर में जन्में और पले बढ़े अनुराग ठाकुर के पिता प्रो. प्रेम कुमार धूमल दो बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे है। पर इसका मतलब ये नहीं है कि अनुराग आसानी से सियासत में स्थापित हो गए। उन्होंने एक आम कार्यकर्ता की तरह वर्षों संगठन में काम किया और हर मौके पर खुद को साबित भी किया। 2010 में वे भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और लगातार तीन टर्म तक इस पद पर रहे। संभवतः वे भाजयुमो में अब तक के सबसे लोकप्रिय अध्यक्ष रहे है। क्रिकेट की सियासत में भी अनुराग ठाकुर की खासी दिलचस्पी रही है। साल 2000 में अनुराग हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बने और चार बार इस पद पर रहे। प्रदेश में धर्मशाला स्टेडियम उन्हीं की देन है। इसी बीच मई 2016  में अनुराग ठाकुर बीसीसीआई के प्रेजिडेंट भी बने लेकिन लोढ़ा कमिटी की  सिफारिशों पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद उन्हें ये पद छोड़ना पड़ा। बहरहाल भाजपा समर्थकों का एक बड़ा तबका ये चाहता है कि अनुराग प्रदेश की कमान संभाले। उधर बार-बार अनुराग ठाकुर दोहराते रहे है कि वे केंद्र में खुश है और फिलवक्त प्रदेश की सियासत में एंट्री का उनका कोई इरादा नहीं है। पर हिमाचल की सियासत से अनुराग को अलग नहीं रखा जा सकता। वैसे भी जानकार मान रहे है कि आठ दिसंबर को रिवाज नहीं बदला तो भाजपा में बहुत कुछ बदलना है। ऐसे में मुमकिन है कि 2027 आते-आते समीरपुर से शिमला का सियासी मार्ग फिर प्रशस्त हो जाएँ। पर अनुराग ठाकुर केंद्र की राजनीति का भी बड़ा नाम है। वर्तमान में कैबिनेट मंत्री है। अनुराग पार्टी के उन चुनिंदा चेहरों में से एक है जो अक्सर कैमरे के आगे आकर सरकार की बात रखते है। अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश के उन गिने चुने नेताओं में से है जिनकी पहचान देश के हर कोने में है। ऐसे में अगर अनुराग केंद्र में भी जमे रहते है तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनमें सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की क्षमता है।   

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