बिजली बिल में 'मिल्क' और 'फ्यूल' सेस की जबरन वसूली के खिलाफ देश की सबसे बड़ी उपभोक्ता अदालत में केस दर्ज
हिमाचल प्रदेश के लाखों बिजली उपभोक्ताओं पर हर महीने थोपे जा रहे "मिल्क सेस" (दूध उपकर) और "फ्यूल सेस" (ईंधन उपकर) के खिलाफ अब देश की सबसे बड़ी उपभोक्ता अदालत में कानूनी जंग छिड़ गई है। ज्वालामुखी के मुखर उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ता अभिषेक पाधा ने प्रदेश सरकार की इस मनमानी और अवैध वसूली को नई दिल्ली स्थित केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) के मुख्य आयुक्त के समक्ष चुनौती देते हुए एक औपचारिक शिकायत दर्ज करा दी है। याचिका में साफ तौर पर हिमाचल प्रदेश सरकार और राज्य विद्युत बोर्ड (HPSEBL) को कटघरे में खड़ा करते हुए इस पूरी वसूली को उपभोक्ता कानून के तहत एक गंभीर वित्तीय धोखाधड़ी और 'डार्क पैटर्न' (ब्लैकमेलिंग और जबरन वसूली का छुपा हुआ तरीका) करार दिया गया है।
शिकायतकर्ता अभिषेक पाधा ने कानूनी तथ्यों के साथ यह मुद्दा उठाया है कि जब एक आम नागरिक बिजली का कनेक्शन लेता है, तो उसका विद्युत बोर्ड के साथ सीधा समझौता सिर्फ और सिर्फ उसके द्वारा खर्च की गई बिजली की यूनिट्स (kWh) और तयशुदा रेगुलेटरी चार्जेस चुकाने का होता है। बिजली के इस मीटर बिल का दूध (मिल्क सेस) या सरकार की अन्य सामाजिक कल्याण योजनाओं से कोई लेना-देना नहीं हो सकता। सरकार अपनी राजनीतिक योजनाओं का वित्तीय बोझ चुपके से बिजली बिलों के रास्ते जनता की जेब पर डाल रही है, जो पूरी तरह गैर-कानूनी है। सबसे गंभीर बात यह है कि यदि कोई जागरूक उपभोक्ता इस फालतू टैक्स को देने से मना करे और सिर्फ अपनी जलाई हुई बिजली का बिल भरना चाहे, तो बिजली बोर्ड उसका कनेक्शन काटने की धमकी देता है। आवश्यक बिजली सेवा को काटने का यह डर दिखाकर जनता से पैसे ऐंठना सीधे तौर पर ब्लैकमेलिंग और उपभोक्ता अधिकारों का खुला हनन है।
दिल्ली की इस केंद्रीय अदालत (CCPA) में दायर याचिका में केंद्र सरकार के 'डार्क पैटर्न प्रिवेंशन गाइडलाइंस, 2023' का हवाला दिया गया है, जिसके तहत मूल सेवा की आड़ में पीछे से कोई अन्य हिडन चार्ज (छुपा हुआ खर्च) जोड़ना कानूनन अपराध है। अभिषेक पाधा ने अदालत से मांग की है कि हिमाचल के उपभोक्ताओं के बिलों से इन दोनों सेस को तुरंत हटाया जाए और बिजली बोर्ड को केवल वास्तविक खपत के आधार पर पारदर्शी बिल बनाने के निर्देश दिए जाएं। इसके अलावा, याचिका में सरकार द्वारा अब तक इस मद में जनता की जेब से वसूले गए करोड़ों रुपयों की उच्च स्तरीय जांच करवाने और वह सारा पैसा उपभोक्ताओं को भविष्य के बिलों में वापस (रिफंड) करने की भी जोरदार गुहार लगाई गई है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत से यह भी अंतरिम राहत मांगी गई है कि जब तक इस केस का अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक सेस न चुकाने पर किसी भी उपभोक्ता का बिजली कनेक्शन काटने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।
