वार्ड नंबर 5 भी ओपन और 11 भी...दिलचस्प होगा नगर निगम चुनाव
- भाजपा को गुटबाज़ी पड़ेगी भारी या कांग्रेस की कमजोरी करेगी संजीवनी का काम
- दो नेताओं की खींचतान में क्या किसी तीसरे को मिलेगा लाभ!
आखिरकार नगर निगम सोलन चुनाव का आरक्षण रोस्टर सोमवार को जारी हो गया। जारी रोस्टर में वार्ड नंबर 5 और 11 दोनों ही ओपन है। अब 17 में से हम इन दो वार्ड की बात क्यों कर रहे है, आपको ये बताते है। वार्ड नंबर 5 से पवन गुप्ता के चुनाव लड़ने के कयास लगाए जा रहे है, जबकि वार्ड नंबर 11 देवेंद्र ठाकुर का वार्ड है। यानी दोनों धुर विरोधी मैदान में अपने-अपने वार्ड से उतर सकते है। दोनों बेशक एक ही राजनैतिक दल यानी की भाजपा से है लेकिन दोनों के मतभेद जगजाहिर है। दोनों ही नेताओं को भाजपा समर्थित पार्षदों को बहुमत मिलने की स्थिति में मेयर पद का दावेदार माना जा रहा है, बशर्ते दोनों चुनावी समर में उतरे और जीते भी। यानी अगर भाजपा समर्थित पार्षद बहुमत में जीतकर आए तो 2015 से 2020 तक चली फिल्म का पार्ट 2 भी देखने को मिल सकता है। मतलब भाजपा में जो आपसी खींचतान, मतभेद, उठापटक और कुर्सी की लड़ाई वर्तमान कार्यकाल में देखने को मिली है, इसका सिलसिला आगे भी ज़ारी रह सकता है।
अब आपको थोड़ा फ़्लैश बैक में ले चलते है। दिसंबर 2015 में नगर परिषद् सोलन के चुनाव हुए। 15 वार्डों में से 10 में भाजपा समर्थित पार्षद जीते और अध्यक्ष पद मिला पवन गुप्ता को। पर गुप्ता को बतौर अध्यक्ष सिर्फ डेढ़ वर्ष सोलन की जनता की सेवा करने का सुख मिला। इसके बाद भाजपा समर्थित पार्षदों ने गुप्ता के खिलाफ मोर्चा खोला और तख्ता पलट दिया गया और अध्यक्ष बने देवेंद्र ठाकुर। तब से अब तक ठाकुर जमकर टीके हुए है।
माना जाता है की सोलन की राजनीति में भाजपा के फायर ब्रांड नेता डॉ राजीव बिंदल की जबरदस्त पकड़ है। पवन गुप्ता को उनका करीबी माना जाता है। पर जिस तरह से पवन गुप्ता का तख्ता पलटा गया था, उसके बाद से ही सवाल उठने लगे थे। तब देवेंद्र ठाकुर के साथ खुलकर कोई बड़ा चेहरा नहीं था, बावजूद इसके उन्होंने अध्यक्ष पद कब्जाया। पर अब सोलन में भाजपा का चहरा बन चुके डॉ राजेश कश्यप का साथ भी उन्हें प्राप्त है। साथ ही डॉ राजीव बिंदल के विरोधी और पूर्व मंत्री महेंद्र नाथ सोफत भी उनके साथ माने जाते है। यानी निचले स्तर पर जो लड़ाई और गुटबाज़ी पवन गुप्ता और देवेंद्र ठाकुर के बीच दिख रही है उसकी जड़ गहरी भी है और पुरानी भी। इन दोनों के साथ बड़े नामों की साख भी जुड़ी हुई है।
अब बात करते है भविष्य की सम्भावना के बारे में। बेशक चुनाव पार्टी सिंबल पर नहीं हो रहे पर अब सोलन नगर निगम है तो जाहिर है ये चुनाव प्रदेश सरकार और संगठन के लिए भी ये विशेष महत्व रखेगा। ऐसे में यदि भाजपा आपसी खींचतान के बावजूद, कमजोर विपक्ष की बदौलत किसी तरह मेयर बनाने की स्थिति में आ जाती है, तो संभवतः किसी नए चेहरे को मौका दिया जाए।
बहरहाल ये देखना दिलचस्प होगा कि मेयर पद पर और कौन से नेता दावा ठोकते है?
दो नेताओं की आपसी खींचतान में किसे हो सकता है फायदा?
क्या भाजपा की आपसी अंतरकलह का कांग्रेस को मिल सकता है लाभ?
क्या कमजोर संगठन के बावजूद भाजपा को टक्कर दे पाएगी कांग्रेस?
इन तमाम कयासों और समीकरणों में ही उलझा है सोलन नगर निगम का चुनाव।
