सभी वॉर में शामिल योद्धाओं को, मिलना चाहिए स्वतंत्रता सेनानियों के बराबर सम्मान : कप्तान शामलाल शर्मा
पाकिस्तान पाकिस्तान तेरा चप्पा चप्पा, मिल जाएगा अब हिंदुस्तान।
कहां गए वो नवाज़ शरीफ जिस पर था तुझ को अभिमान।
परवेज़ मुशर्रफ़ तो गीदड़ निकला कारगिल युद्ध 1999 में बचा कर निकला अपनी जान ,
इमरान खान और शी जिनपिंग चाइना (करोना) भी अब नहीं बचेगा चाहे जोडे हाथ और पकड़े कान।
शहीदों की याद में, हर वर्ष लगेंगे मेले यही हमारा निशान होगा।
आज से ठीक 21 साल पहले 1999 में कारगिल युद्ध हुआ था, युद्ध की आंखो देखी रोंगटे खड़े करने वाली, एक कारगिल वॉर योद्धा, वेटरन कप्तान शामलाल शर्मा की कलम से इस युद्ध की सच्ची कहानी।
मेरे प्यारे वेटरन इंडिया के सभी सदस्यों एवम् समस्त महान देश भक्तों, ज्ञात रहे हम कल भी नहीं हारे है और चीनियों और पाकिस्तानियों तुम भी जरा सुन लो हम रिटायर हुए तो क्या, हथियार चलाना जानते है। हम भी बहादुरी में कम नहीं वतन के लिए जाए, जान तो भी गम नहीं।
देश भर के सैनिकों व शहीदों की बलिदान कि काथाओं का विश्व भर में पता है। दुश्मन के नापाक इरादों को धूल चटाई थी। दुनिया का इतिहास गवाह है, सन 1999 में जब एक भयंकर, हिंदुस्तान व पाकिस्तान का युद्ध हुआ था; 18000 फीट से भी अधिक अति ऊंचाई वाली बर्फ से लदी हुई हिमालय पर्वत की पहाड़ियों पर दोनों देशों की सेनाएं आमने सामने खूब लड़ी थी। दोनों देशों की सहमति के कारण अपनी अपनी पोस्ट पर तैनात दोनों देशों की सेनाएं 6 महीनों के लिए पीछे हट जाया करती थी। लेकिन प्रति वर्ष की भांति 1999 में, उस समय कुछ भी ऐसा नहीं हुआ। जिस समय, हमारे देश के प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेई की ओर से दोनों देशों के बीच अमन शांति की कोशिश चल रही थी, दोनों देशों के मध्य ट्रेन व बस सेवाएं बहाल कर दी गई थी, उधर नवाज़ शरीफ़ की सरकार में जनरल परवेज़ मुशर्रफ, धोखेबाज, हमारी भूमि को हड़पने की चाल चल रहा था। वह अपनी सेनाओं को घुसपैठियों के साथ धोका करके, हमारी भारतीय सेना कि पोस्टों पर बैठ
कर चुका था। हमारा ही राशन पानी जो भी पोस्टों में पहले बचा हुआ रखा रहता था खा रहा था।
समय अनुसार जैसे ही हमारी पहली टुकड़ी कप्तान सौरभ कालिया के साथ अपनी पोस्ट पर पहुंची दुश्मनों द्वारा उनको किस कमीनी बर्बरता से भारतीय सैनिकों को स्ता स्ता कर के मारा गया था यह पूरी दुनिया जानती है। विश्व भर में इस बर्बरता का विरोध हुआ था जिसके उपरांत, मई 1999 से जुलाई 1999 तक कारगिल युद्ध हुआ था जिसमें भारतीय सेना ने दुश्मनों के असंख्य, घुसपैठिए और सैनिकों को मौत के घाट उतारा था और अनगिनत घायल किए थे। इस युद्ध की यादगार में देश भर में 27 जुलाई को हर वर्ष कारगिल विजय दिवस देश भर में मनाया जाता है शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करके वीरांगनाओं, युद्ध में घायल, भाग लेने वाले सैनिकों, को जगह जगह पर सनम्मनित किया जाता है।
हालांकि इस भयंकर युद्ध में हमारी भारतीय सेना के 545 बहादुर ऑफिसर्स व जांबाज़ जवानों को कारगिल युद्ध में वीर गति प्राप्त हुई थी और असंख्य घायल भी हुए थे। भारतीय सेना मुख्यालय के अधीन आर्मी ग्रुप इन्सुरेन्स फंड बसंत विहार स्थित नई दिल्ली में, उस समय के मैनेजिंग डायरेक्टर स्वर्गीय ऑनरेरी लेफ्टिनेंट जनरल के.चंद्रशेखरन, अति विशिष्ट सेवा मैडल एवम् प्रिंसिपल डायरेक्टर व डायरेक्टर एडमिनिस्ट्रेशन स्टाफ ब्रिगेडियर जागीर सिंह कंवर साहब ने एक नए अतिरिक्त कारगिल युद्ध क्लेम सैल का संगठन करके, दिन रात भर प्रयत्न करके युद्ध में हुए शहीदों की वीरांगनाओं एवम् उनके आश्रितों, तथा घायल सैनिकों के लिए एजी.आई.एफ फंड का पैसा शीघ्र अति शीघ्र देने हेतू सबके रिकॉर्ड ऑफिस की सहायता से और सभी सहायक एजेंसीज से मिलकर इन्सुरेंस अनुदान राशि को उनके घर घर तक पहुंचाया, जिस का उदाहरण भारत वर्ष के इतिहास में इस संकट की घडी में अविस्मरणीय कार्य माना गया और देश भर और दुनिया भर में इसकी सराहना की गई थी।
इस भयंकर युद्ध में शामिल हमारी जम्मू और कश्मीर राइफल्स की फीयूर्स फोटींथ एक प्पियुर डोगरा बटालियन लड़ रही थी, जिसमें मैं भी शामिल रहा था। इस यूनिट में पहाड़ी इलाकों के रहने वाले पहाडियों डोगरा लोगों को पहाड़ पर चढ़ने उतरने की आजनम प्रैक्टिस होती है। उस समय यह यूनिट जे एंड के में ही किसी जगह, काउंटर इंसर्जनसी ऑपरेशन रक्षक के अधीन, कमान अधिकारी कर्नल दिनेश कुमार नंदा साहब के नेतृत्व में शानदार कार्य कर रही थी व घुसपैठियों को मारने का कार्य कर थी जिसमें यूनिट ने खूब नाम कमा रखा था जिसके शौर्य की कथाओं को रेजिमेंट के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया है।
इससे पूर्व 1971 के पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में खालद्दा सेक्टर दुश्मनों मार मार कर खदेड़ा था और चने चबाए थे, तथा जे एंड के काउंटर इंसुर्जनेसी ऑपरेशन का अनुभव होने के नाते बिना किसी समय दिए हुए, फायर्से फोर्टीन्थ बटालियन को काकसर, टोटोलिंग, बजरंग जैसी पोस्टों पर 18000 फीट ऊंचाई पर दुश्मनों को रोकने झोंकने, पीछे खदेड़ने का काम मिला। इस दुनिया के अति दुर्गम इलाकों में पलटन को दुश्मन के साथ लगातार लगाव रखने का कार्य दिया गया जिसमें पलटन को दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों से गुजरते हुए ऐसे स्थानों पर जाना था कि जहां पर कोई सैनिक टुकड़ी पहले कभी नहीं पहुंची थी। साथ ही साथ दुश्मन के नापाक इरादों को असफल करना था। जहां पहुंचने के लिए चट्टानी पहाड़ियों पर चढ़ने वाले उपकरणों का अत्याधिक इस्तेमाल करना पड़ा। इन चोटियों पर क्रमशः अल्फा, ब्रावो चार्ली, डेल्टा कम्पनियों को प्वाइंट 4890 एवम् 5000, प्वाइंट 5299,प्वाइंट 5300,5270 कांप्लेक्स पर एक इंडिपेंडेंट इन्फैंट्री ब्रिगेड के अन्तर्गत कार्य सौंपा गया था। यहां पर चढ़ने व उतरने के रोप यानि रस्सों के द्वारा चढ़ा उतरा जाता है, साथ में अपना वैपन एम्युनिशन क्लॉथिंग दवाईयां राशन बी व घायल बीमार आदि को भी पलटन को ही इस दुर्गम स्तिथि में लाना लेे जाना होता था।
दूसरी पहाड़ियों पर दुश्मन पहले ही तैनात था। उनकी आर्टिलरी से लगातार फायर मीडियम तथा छोटे हथियारों एल एम जी एवम, ग्रेनेड इत्यादि की फायरिंग चलती थी। इधर भारतीय सेना का भी मुकाबले में बोफोर्स गन, मीडियम व छोटे तथा आधुनिक हत्यारों द्वारा एल एम जी, स्पिनर राइफल्स व ग्रेनेड आदि से फियर्से फोर्टीनथ के बहादुर जवान जिनका युद्ध का वार कराई (दुर्गे माता की जय) बोल कर धावा बोलते थे जिससे पहाड़ भी गूंज रहे थे यूनिट के जवान दुश्मनों पर टूट चुके थे तरह से उन्हें मार मार कर घायल कर पीछे हटाया जा रहा था, दुश्मन का मनोबल टूट चुका था और ज्ञात रहे की यूनिट लगातार उसी दुर्गम स्तिथि में सीज़ फायर जब तक घोषित नहीं हुआ तेनात रखी गई थी।
कमान अधिकारी द्वारा बटालियन के वार इंस्ट्रक्शन एस ओ पी के मुताबिक यूनिट का हर ऑफिसर्स, जेसी ओज, अन्य पद अपनी अपनी ड्यूटी से निपूणतः निभा रहा था। यूनिट ने रेजिमेंट से भी अतिरिक्त, कुछ चुनिंदा ऑफिसर्स, जेसीओ तथा जवानों को अटैच कर दिया था । बटालियन का मनोबल दूर्गा माता की कृपा से बहुत ऊंचा रहा। दुश्मनों से लोहा लेते वक्त उनकी जान माल की भारी क्षति हुई। उनके आर्म्स, एम्युनिशन, क्लॉथिंग आदि असंख्य चीज़े प्राप्त की। उनकी डैड बॉडीज़ को उनके हवाले, सीज़ फायर के उपरांत दिया गया जो शायद पाकिस्तानियों ने उन्हें वहीं दफन कर दिया था। फायर्से फोर्टीन्थ बटालियन के भी कुछ सैनिक शहीद हो चुके थे, काफ़ी ऑफिसर्स, जेसी ओज, अन्य रैंक्स घायल भी हो चुके थे। मुझे भी यूनिट हेड क्लर्क होने के नाते इन जगहों जगहों पर कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ। बटालियन का संकल्प, हिमालय जितना ही ऊंचा है और भारत माता की रक्षा हेतु सर्वस्व त्याग करना रहा है।
जम्मू और कश्मीर राइफल्स रेजिमेंट एवम् उनकी बटालियनों द्वारा युद्ध संबंधी किए हुए कार्यों, के शौर्य की कथाएं, वीरता का इतिहास रेजिमेंटल हिस्टरी और नेशनल वार मेमोरियल में हमेशा अमर रहेगी। भारतीय इतिहास में स्वर्णीय अक्षरों में लिखा जाएगा।
इसके साथ ही हम सभी पूर्व सैनिक योद्धा वेटरन इंडिया ऑर्गनाइजेशन के माध्यम से भी अनुरोध करते हैं कि सभी वार वॉरियर्स को स्वतंत्रता सेनानी के बराबर सम्मान मिलना चाहिए और इसके गुहार भारतीय संसद भवन तक पहुंचनी चाहिए।
पलटन का ऑपरेशन रक्षक और ऑपरेशन विजय के लिए हुए कार्य की भिन्न भिन्न जगहों का एक चित्र भी दर्शाया जा रहा है ।
जय हिन्द। जय भारतीय सेना।
