कारगिल युद्ध के योद्धा ऑनरेरी कैप्टन शाम लाल शर्मा ने साझा की जंग की यादें
- 14 जे एंड के राइफल्स के जांबाजों ने अपनी जान की परवाह किए बिना मातृ भूमि की रक्षा हेतु नतमस्तक किया दुश्मन।
- कैप्टन शाम लाल ने कहा कि सभी योद्धाओं को मिले स्वतंत्रता सेनानियों के बराबर सम्मान।
भारत के हाथ 1947,1965 और 1971 में कड़ी हार और मुंह की खाने के बाद भी पाकिस्तान की नियत ठीक नहीं हुई और उसने एक बार फिर 1999 में कारगिल में अपनी किस्मत आजमाने की कोशिश की और फिर धूल चाटी।
कारगिल विजय दिवस 26 जुलाई को आने वाला है, पाकिस्तान की नापाक हरकत पर मुंह की खाने को मजबूर किए जाने वाले इस युद्ध में जीत पर हर हिन्दुस्तानी अपनी सेना पर गर्व महसूस करता है। कारगिल विजय दिवस पर कृतज्ञ राष्ट्र युद्ध में देश की आन बान और शान के लिए शहीद हुए सैकड़ों जवानों को श्रद्धा सुमन अर्पित कर उन्हें याद करेगा। इस युद्ध में कठिन पहाड़ी क्षेत्रों में अत्यन्त मुश्किल हालात के बावजूद भी जंग लड़ने वाले योद्धाओं ने शिमला जिला के घणाहट्टी क्षेत्र के गांव धामून के जांबाज़, सूबेदार मेजर (ऑनरेरी कैप्टन) शाम लाल शर्मा 14 जैक राइफलज, ने इस युद्ध की यादों को साँझा किया। उन्होंने बताया की कैसे भारत के सपूतों ने पाकिस्तान की सेना को मुंह तोड़ जवाब दिया और विजय हासिल की। वर्तमान में वेटरन इंडिया की शिमला इकाई के जिला अध्यक्ष शाम लाल शर्मा चाहते है कि इस युद्ध के हर योद्धा को स्वतंत्रता सेनानी जैसा मान सम्मान मिलना चाहिए। शाम लाल ने लिखा कि भारत के इतिहास में हमेशा गिने जाने वाले 1999 के भारत पाकिस्तान कारगिल युद्ध में पाकिस्तान ने एक बार फिर गुस्ताखी की जिसमें उसे भारतीय जवानों ने धूल चटाई। 1999 के मई के महीने में पाकिस्तान ने द्रास सेक्टर पर आर्टिलरी के गोले बरसाए। इसे दुश्मन कि हर साल की तरह से कायरता समझा गया।
कैप्टन शाम लाल जो युद्ध में स्वयं शमिल थे, ने एक एक घटना कों याद कर बताया। दुश्मन के नापाक इरादों का पता तब चला जब हमारा एक पट्रोल 03 मई 1999 को बटालिक में ऐम्बुश हुआ और 12/13 मई को लेफ़्टिनेंट सौरभ कालिया का पट्रोल बजरंग पोस्ट के पास ऐम्बुश हुआ। 15 /16 मई को इसी क्षेत्र में हमारे एक और पट्रोल को भी काफ़ी नुक़सान हुआ।
24 मई 1999 को ऑपरेशन विजय शुरू किया गया। पाकिस्तान की नापाक घुसपैठ को मश्को, द्रास, काक्सर और बटालिक के क्षेत्र में पाया गया। मश्को और द्रास में 8 माउंटेन डिविज़न को और बटालिक में 3 माउंटेन डिविज़न को दुश्मन को खदेड़ने का काम दिया गया। काक्सर क्षेत्र में केवल हमारी बटालियन 14 जम्मू और कश्मीर राइफ़ल्ज़, को नियुक्त किया गया ताकि हर हालात में पाकिस्तानी सेना को आगे न बढ़ने दिया जाए। कक्सर क्षेत्र से जोजिला - कारगिल सड़क हो कर निकलती है, इस लिए यह कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण था।
कैप्टन शाम लाल ने बताया कि उनकी अपनी 14 जम्मू और कश्मीर राइफ़ल् मई 1999 तक काश्मीर में आतंकवादियों का सफ़ाया करने में लगी थी और उसने घाटी के तराई वाले इलाक़े को आतंकवाद से मुक्त कर दिया था। 19 मई 1999 को उनकी पलटन को कक्सर भेजा गया। कक्सर में चोटियों की ऊँचाई 5000 मीटर से भी अधिक थी और पथरीले बंजर इलाके में पौधे न होने से सांस लेना मुश्किल था। उनकी पलटन प्वाइंट 5295 (बजरंग कॉम्प्लेक्स), 5400, 5300, 5270, 5605 और स्पर जंक्शन पर तेनात की गई थी। यहां चोटियों पर चढने उतरने के लिए रस्सों का प्रयोग किया। चोटियों को अब जिमी टाप, सचिन सैडल और बिष्ट टाप बोला जाता है। पलटन ने मोर्चा संभाला और हिम्मत और दिलेरी से दुशमन को आगे बढ़ने से रोका। शाम लाल ने बताया कि जब सीज़ फ़ायर की घोषणा की गई थी तो सबसे पहले पाकिस्तानी सेना को कक्सर से पीछे हटने को कहा गया। उनकी पलटन के 7 जवान दुश्मनों से लड़ते हुए इस युद्ध में शहीद हुए जबकि 41 घायल हुए थे।
भारतीय सेना तथा जे एंड के रेजिमेंट और 14 जे के राइफल्स के इतिहास में इस वीरता पूर्वक कार्य करने के लिए युगों - 2 तक याद किया जाएगा।
