आज के दिन हज़ारों लोगों ने देखे थे अपने आशियाने उजड़ते हुए
- 59 वर्ष पहले 9 अगस्त को जलमग्न हुआ था पुराना बिलासपुर शहर
- 12 हज़ार परिवारों ने गंवाए थे अपने आशियाने
कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ता है। बिलासपुर का वो शहर जो अपनी अनूठी संस्कृति के कारण पहचाना जाता था, 9 अगस्त 1961 को गोबिन्द सागर झील में विलुप्त हो गया था। आज भी बिलासपुर के लोग वो दिन भूले नहीं हैं जब भाखड़ा बांध के निर्माण के लिए ऐतिहासिक बिलासपुर को झील में डूबना पड़ा। नए बिलासपुर शहर में वो पुरानी वाली बात अब नज़र नहीं आती।
पुराने ऐतिहासिक शहर के 9 अगस्त 1961 को जल समाधि लेने के बाद झील किनारे नए शहर का निर्माण किया गया था। लंबा समय बीतने के बाद आज भी भाखड़ा विस्थापित अपने झील में समाए उजड़े हुए आशियानों को याद कर सिहर उठते हैं। जलमग्र होने से बिलासपुर के 354 गांव, 12 हजार परिवार और 52 हजार लोग उजड़े थे।
कहलूर रियासत के राजा दीपचंद ने इस शहर को अपनी राजधानी के रूप में बसाया था। उन्होने सांडू के मैदान में अपने महल बनावाए थे और शहर बसाया था। 10 दिसंबर, 1961 को भाखड़ा बांध के उद्घाटन अवसर पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भाषण देते हुए इस बांध को भारत का आधुनिक मंदिर कहा था। उन्होंने कहा था कि इससे हमारे देश में खुशहाली आएगी। नेहरू का सपना सच हुआ। भाखड़ा बांध बनने से सचमुच देश में खुशहाली आई। गोबिंदसागर झील में भारी मात्रा में मछली का उत्पादन होना शुरू हो गया। इस बांध से बिजली बनाई जाती है, जिससे हिमाचल प्रदेश निरंतर विकास कर रहा है।
बिजली भी मिली मछुआरे भी संपन्न हुए लेकिन
बिजली भी मिली मछुआरों की तकदीर भी बदल गई लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। भाखड़ा बांध के निर्माण के लिए ऐतिहासिक बिलासपुर को झील में डूबना पड़ा। विकास के लिए विनाश को भी झेलना पड़ा। बिलासपुर की गौरवमयी संस्कृति भी गोबिंदसागर झील में डूब गई।
झील में डूबे उस शहर की संस्कृति भी एक और विशेष झलक यह थी कि सावन के महीने में घर-घर छोटे-छोटे बच्चों को झूलने के लिए पींग किसी पीपल या आम के पेड़ की टहनी में डाल दी जाती थी। बड़ी आयु के लोग इस परंपरा को अच्छी तरह निभाते थे। इसे 'पींगां दा महीना' कहा जाता था। रक्षाबंधन से कोई बीस दिन पहले घर-घर मशीन से सेंवियां तैयार की जाती थी। यदि मुहल्ले में किसी के पास मशीन होती तो बारी बारी सब के घर सेंवियां बनाने के लिए जाती थी। यह सब कुछ उसी दिन समाप्त हो गया था जब पुराना बिलासपुर शहर गोबिंदसागर झील में डूबा था। साठ साल के ऊपर वालों को आज भी पुरानी यादें ताजा करते हुए सुना जा सकता है।
वास्तव में एक शहर का विशाल जलाशय में डूबना मात्र मिट्टी, गारे, ईंट पत्थर के घरों का डूबना नही होता है। उस शहर का डूबना एक संस्कृति का डूबना था। गोबिंदसागर झील में कहलूर रियासत का, रंगमहल व नया महल ही नही डूबे बल्कि उनसे भी पुराने महल, शिखर शैली के 99 मंदिर, स्कूल कालेज, दंडयूरी, बांदलिंया, गोहर बाजार, गोपाल जी का मंदिर और साथ में कचहरी परिसर भी डूबा।
नौ अगस्त 1961 को पहली बार भाखड़ा बांध का जलस्तर बढ़ा तो बिलासपुर शहर डूबता चला गया। दिवंगत विधायक व शायर पंडित दीनानाथ ने उस समय का चित्र अपने शब्दों से खींचते हुए लिखा था-
थी छाई बरसात की स्याह घटा, पपीहा था मलहार गाने लगा, सच उस झील में डूबे शहर की हर बात निराली थी।
हर वीरवार को खाखी शाह की मजार पर हिंदू मुसलमान इकट्ठे होकर वहां मीठा चूरमा चढ़ाते और एक-दूसरे को बांटते थे। वहीं खाखी शाह परिसर में शायरों की महफिलें सजती थीं। गजलों, कव्वालियों और ठुमरियों के दौर चलते थे। उस शहर की अजब संस्कृति थी।
अब नए बिलासपुर शहर में वह बात ही नहीं रही है। नया बिलासपुर नए रूप में हमारे सामने आया है लेकिन पुराने बिलासपुर की कसक आज भी लोगों के दिलों में है और हमेशा कायम रहेगी।
