रणसिंघा, काष्ठ कला और हस्तनिर्मित गलीचे को मिला जीआई टैग, हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय पहचान
शिमला। हिमाचल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक शिल्प को बड़ी पहचान मिली है। राज्य के तीन प्रमुख पारंपरिक उत्पादों—रणसिंघा, काष्ठ कला और हस्तनिर्मित गलीचे को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है। यह उपलब्धि नाबार्ड और स्थानीय कारीगरों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है, जिससे हिमाचल के इन विशिष्ट उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक मान्यता प्राप्त हुई है।
जीआई टैग मिलने के साथ ही इन उत्पादों की विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण मिलेगा और इनके नाम व स्वरूप की नकल पर रोक लगेगी। इससे प्रदेश के हजारों कारीगरों, शिल्पकारों और उत्पादक समूहों को आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है। साथ ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इन उत्पादों की अलग पहचान बनेगी, जिससे उनकी मांग और बाजार मूल्य में वृद्धि हो सकती है।
रणसिंघा हिमाचल की लोक एवं धार्मिक परंपराओं से जुड़ा महत्वपूर्ण वाद्य यंत्र है, जबकि काष्ठ कला राज्य के मंदिरों और पारंपरिक स्थापत्य की अनूठी पहचान मानी जाती है। वहीं हस्तनिर्मित गलीचे ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन हैं। जीआई टैग से इन पारंपरिक कलाओं और उत्पादों के संरक्षण तथा संवर्धन को नई गति मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मान्यता से न केवल स्थानीय शिल्प को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि युवाओं को भी पारंपरिक हस्तकलाओं से जोड़ने में मदद मिलेगी। इससे हिमाचल की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखने के साथ-साथ प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
