बिहार चुनाव 2025: क्या जनसुराज वाकई राजनीति का चेहरा बदल पाएगी?
बिहार विधानसभा चुनाव की सरगर्मी अब बढ़ने लगी है और चुनावी समीकरण दिन प्रति दिन आकार ले रहे है। माना जा रहा है कि बिहार का चुनाव इस बार कई मायनों में बहुत अलग होने जा रहा है। बीजेपी ने फ़िलहाल राज्य में नीतीश की जनता दल यूनाइटेड के नेतृत्व में चुनाव लड़ना स्वीकार कर लिया है। वहीं तेजस्वी यादव उनके विरोधी दल के नेता के रूप में मुखर रहेंगे। मगर इनके अलावा नज़रें उस पार्टी पर अधिक रहेंगी जो लगातार बिहार की राजनीति को बदलने का दावा कर रही है। ये पार्टी है पूर्व में अन्य दलों को चुनाव लड़वाने के बाद खुद राजनीति का स्वाद लेने मैदान में उतरे प्रशांत किशोर की नवगठित पार्टी ........जनसुराज।
प्रशांत किशोर, जो अब तक चुनावी रणनीतिकार के रूप में कांग्रेस, भाजपा, टीएमसी जैसी बड़ी पार्टियों के लिए रणनीति बनाते रहे, अब खुद बिहार की राजनीति में एक वैकल्पिक ताकत बनने का दावा कर रहे हैं। जनसुराज को लेकर वे लगातार यह कहते आए हैं कि बिहार की राजनीति को विचार, नीति और पारदर्शिता पर आधारित बनाया जाएगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या जनसुराज वास्तव में बिहार की राजनीति में कोई ठोस बदलाव ला पाएगी या यह सिर्फ एक और प्रयोग बनकर रह जाएगी?
जनसुराज ने 2024 में चार विधानसभा उपचुनावों, इमामगंज, बेलागंज, टरारी और रामगढ़ .. में अपने उम्मीदवार उतारे। हालांकि, पार्टी एक भी सीट जीत नहीं पाई। इन उपचुनावों में जनसुराज का औसत वोट शेयर लगभग 10% रहा। इमामगंज सीट पर पार्टी के उम्मीदवार को करीब 37,000 वोट मिले, जो एक शुरुआती प्रयास के लिहाज से कम नहीं कहा जा सकता। हालांकि इस प्रदर्शन से पार्टी को "वोट कटवा" करार दिया गया, क्योंकि कुछ सीटों पर उसने आरजेडी गठबंधन के वोटों में सेंध लगाई।
जनसुराज ना एनडीए का हिस्सा है, ना ही इंडिया गठबंधन का। पार्टी ने स्पष्ट रूप से एलान किया है कि वह 243 में से सभी विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। यह अपने आप में एक साहसिक निर्णय है, खासकर तब, जब पार्टी का संगठनात्मक ढांचा पारंपरिक दलों की तुलना में अभी भी कमजोर है।
बता दें कि बिहार में पार्टी ने चुनावी ज़मीन तैयार करने के लिए एक बड़ा जनसंपर्क अभियान चलाया था । प्रशांत किशोर ने पूरे बिहार में 3,500 किलोमीटर की पदयात्रा पूरी की, जिसमें उन्होंने गांवों और छोटे कस्बों में जाकर सीधे लोगों से संवाद किया। इस पदयात्रा के ज़रिए पार्टी ने ‘जनसुनवाई’ और ‘नीतिगत संवाद’ पर ज़ोर दिया। अप्रैल 2025 में पटना के गांधी मैदान में पार्टी ने एक बड़ी रैली की, जिसे ‘बिहार बदलाव रैली’ नाम दिया गया। इस दौरान जनसुराज ने अपने 10 साल के विज़न डॉक्युमेंट का ऐलान किया और राज्य के विकास के लिए रोडमैप पेश किया।
लेकिन जनसुराज को लेकर आलोचनाएं भी कम नहीं हैं। पार्टी के कई प्रत्याशियों पर अपराधिक पृष्ठभूमि या कम शैक्षणिक योग्यता के आरोप लगे हैं, जिससे पार्टी के “साफ-सुथरी राजनीति” के दावे पर सवाल उठे हैं। इसके अलावा, बूथ स्तर पर पार्टी की पकड़ अभी काफी सीमित है और बड़े दलों के मुकाबले जनसुराज का संसाधन तंत्र भी कमज़ोर दिखता है।
बावजूद इसके, यह कहना गलत नहीं होगा कि जनसुराज ने बिहार में एक नई राजनीतिक चर्चा शुरू की है। लोगों के बीच यह विचार बनने लगा है कि पारंपरिक जातीय समीकरणों और गठबंधन राजनीति से हटकर कोई तीसरी ताक़त भी उभर सकती है। हालांकि, मौजूदा आंकड़ों और हालिया उपचुनाव नतीजों के आधार पर देखें तो जनसुराज का प्रदर्शन प्रभावशाली भले ही न हो, लेकिन प्रतीकात्मक जरूर है।
अंततः, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जनसुराज के लिए सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता और उपस्थिति दर्ज कराने की परीक्षा होगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह नई पार्टी जनता की उम्मीदों पर कितनी खरी उतरती है ......और क्या यह बदलाव सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेगा, या वाकई सियासत की ज़मीन पर कुछ नया अंकुरित होगा।
