एक था राजा
इतिहास के प्रोफेसर बनना चाहते थे और खुद इतिहास बना गए। 9 बार विधायक रहे और 5 बार सांसद। 6 दफे सूबे के मुख्यमंत्री रहे और तीन मर्तबा केंद्रीय मंत्री। यूं तो वे एक रियासत के राजा थे लेकिन कहलाएं हिमाचल की सियासत के राजा, जन-जन के दिलों के राजा। अपने ही नहीं विरोधी भी उनकी सियासी सूझबूझ और सियासी अदाओं के कायल रहे। वीरभद्र सिंह का जीवन राजनीति का वो महाग्रंथ है जिसके बगैर हिमाचल की सियासत की हर कहानी अधूरी है। 'न भूतो न भविष्यति', न वीरभद्र सिंह जैसा कोई था और न ही होगा।
बेमिसाल : 6 दशक तक बोली तूती
करीब 6 दशक के राजनीतिक जीवन में राजा वीरभद्र सिंह की जमकर तूती बोली। उनका राजनीति में आने का किस्सा भी बेहद दिलचस्प है। एक दिन उन्हें देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का फ़ोन आया और उन्हें चुनाव लड़ने को कहा। 1962 में महज 28 साल की उम्र में राजा वीरभद्र सिंह सांसद बन गए और लोकतांत्रिक राजनीति में अंगद के समान पांव जमा लिए।
रिकॉर्ड : 1985 में करवाई सत्ता रिपीट
वर्ष 1983 में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे ठाकुर रामलाल। तब वीरभद्र केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार में मंत्री थे। तभी लकड़ी घोटाले के आरोप के चलते ठाकुर रामलाल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और पार्टी हाईकमान ने भरोसा जताया वीरभद्र सिंह पर। इसके बाद से हिमाचल प्रदेश की सियासत वीरभद्र सिंह के इर्द गिर्द घूमती रही। हिमाचल में हर पांच वर्ष में सत्ता परिवर्तन का रिवाज है। आखिरी बार सत्ता रिपीट 1985 में हुई और ऐसा करने वाले थे राजा वीरभद्र सिंह।
ताकत : कई नेताओं के अरमान कुचले अपनी सियासी पारी में वीरभद्र सिंह न सिर्फ दूसरे राजनीतिक दलों से लोहा लिया बल्कि पार्टी के भीतर भी अपना तिलिस्म बरकरार रखा। वो उन अपवादों में शामिल है जिन्होंने आलाकमान की हां में हां नहीं मिलाई बल्कि जिनकी ताकत के आगे कई मौकों पर आलाकमान भी झुका। वीरभद्र की सियासी महारथ के आगे कई दिग्गज नेताओं का सीएम बनने का अरमान आजीवन अधूरा रहा जिनमें राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले पंडित सुखराम और विद्या स्टोक्स भी शामिल है। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले भी वीरभद्र सिंह ने केंद्र से वापस प्रदेश की सियासत का रुख किया और न सिर्फ भाजपा की बाजी पलट दी अपितु पार्टी के भीतर भी कई नेताओं के अरमान कुचल दिए।
सर्वमान्य : चार निर्वाचन क्षेत्रों से जीते
हिमाचल की सियासत में यदि कोई ऐसा नेता है जिसका वर्चस्व पुरे प्रदेश में दिखा तो वे थे वीरभद्र सिंह। उनकी जमीनी पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे चार निर्वाचन क्षेत्रों से विधायक रहे। जुब्बल -कोटखाई से उनकी शुरुआत हुई, फिर रोहड़ू को अपना गढ़ बनाया, तदोपरांत शिमला ग्रामीण से जीतकर विधानसभा पहुंचे और अपने अंतिम चुनाव में अर्की से जीतकर अपनी लोकप्रियता का लोहा मनवाया। हिमाचल में उन जैसा सर्वमान्य नेता निसंदेह कोई नहीं हुआ।
पकड़ : न नौकरशाही न मंत्री, सिर्फ वीरभद्र
वीरभद्र सिंह उन मुख्यमंत्रियों में शुमार रहे जिनकी नौकरशाही पर जबरदस्त पकड़ रही। ऐसे दर्जनों उदहारण है जब वीरभद्र सिंह ने जनता के सामने अधिकारीयों की क्लास लगा दी। वीरभद्र सिंह नौकरशाही की तरह ही वीरभद्र सिंह अपनी कैबिनेट पर भी पूरी पकड़ रखते थे। मंत्री कोई भी हो, वीरभद्र सिंह की हर विभाग पर पूरी नजर और पकड़ रहती थी।
फाइटर : सदा अविचलित रहे वीरभद्र
वीरभद्र सिंह ने मुख्यमंत्री रहते अपने पिछले शासनकाल में ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग की जांच भी झेली। एक वक्त लगा कि उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है पर वीरभद्र सिंह तो सबसे बड़े फाइटर थे। वे कभी अपने राजनीतिक लक्ष्य से विचलित नहीं हुए। तमाम जांचों को उन्होंने राजनीतिक रंजिश करार दिया और जमकर डटे रहे। एक मामले में तो सीबीआई ने जब रेड की तो उनकी बेटी अपराजिता सिंह की शादी थी। वीरभद्र सिंह ने सीबीआई की टीम को चाबी पकड़ा दी और कहा कि वे खाना खाकर ही जाएं।
