जो कोई भी सच्चे मन से माँ महालक्ष्मी से मांगता है मन्नत, वह जरूर होती है पूरी
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर शक्तिपीठों में से एक है जिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से यहां आकर मां महालक्ष्मी से मन्नत मांगता है वह जरूर पूरी होती है। यह माना जाता है कि यहां महालक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ निवास करती हैं। मान्यता है कि मंदिर का निर्माण 700 ईसवीं में कन्नड़ के चालुक्य साम्राज्य के समय में किया गया था।
-2 हजार साल पुराना है महालक्ष्मी मंदिर
कोल्हापुर का इतिहास धर्म से जुड़ा हुआ है और इसी वजह से ये जगह धर्म की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। मंदिर के बाहर लगे शिलालेख से पता चलता है कि यह 2 हजार साल पुराना है। शालिवाहन घराने के राजा कर्णदेव ने इसका निर्माण करवाया था, जिसके बाद धीरे-धीरे मंदिर के अहाते में 30-35 मंदिर और निर्मित किए गए। 27 हजार वर्ग फीट में फैला यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में शुमार है। आदि शंकराचार्य ने महालक्ष्मी की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की थी। मंदिर में काले पत्थर का एक मंच है जिस पर महालक्ष्मी जी की चार हाथों वाली काले पत्थर से बनी प्रतिमा है। देवी चारों हाथों में अमूल्य वस्तुएं धारण किये हुए हैं। उनके सिर पर गहनों से सजा मुकुट है जिसका वजन चालीस किलोग्राम बताया जाता है। इस मुकुट में भगवान विष्णु के शेषनाग नागिन का चित्र भी है। साथ ही मंदिर की दीवार में श्री यंत्र को पत्थर पर खोदकर बनाया गया है।
- महालक्ष्मी मंदिर से जुड़ी है ये पौराणिक कथा
भारत में सभी मंदिरों को लेकर कई पौराणिक कथाएं जुड़ी है। महालक्ष्मी मंदिर को लेकर ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर में मां लक्ष्मी विराजती हैं। कोल्हापुर की देवी लक्ष्मी को महाराष्ट्र की देवी माना जाता है। इस मंदिर को लेकर एक प्रचिलित कथा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, जब महर्षि भृगु भगवान विष्णु से मिलने पहुंचे तो उनकी परीक्षा लेने के लिए महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु की छाती पर दाहिने पैर से वार कर दिया, ऋषि भृगु तो बनावटी क्रोध से भरे थे जैसे ही उन्होंने विष्णु जी पर वार किया वे फ़ौरन उठकर खड़े हो गए और भृगु से पूछने लगे कि कहीं उन्हें चोट तो नहीं लगी क्योंकि विष्णु जी का सीना कठोर है और भृगु के पैर बहुत ही कोमल। यह सब देखने के बाद माता लक्ष्मी बहुत रुष्ट हो गई और वह बैकुंठ धाम छोड़कर कोल्हापुर में आ बसी। कोल्हापुर में केशी नाम का एक राक्षस था जिसके बेटे का नाम कोल्हासुर था। उस राक्षस ने कोल्हापुर के लोगों और देवताओं को बहुत परेशान कर रखा था। वह कोल्हापुर की नदी के सारे पानी को पी जाता था। जब माता लक्ष्मी को उस असुर पर गुस्सा आया तो उन्होंने उस असुर के प्राण ले लिए। मरने से पहले कोल्हासुर ने मां से एक वरदान मांगा कि इस क्षेत्र को कोल्हापुर के नाम से जाना जाएं। तभी से इस स्थान का नाम कोल्हासुर के नाम पर पड़ा।
- ऐसी है देवी की प्रतिमा
महालक्ष्मी की दो फीट नौ इंच ऊंची मूर्ति यहां स्थापित है। मूर्ति में महालक्ष्मी की 4 भुजाएं हैं। इनमें महालक्ष्मी मेतलवार, गदा, ढाल आदि शस्त्र हैं। मस्तक पर शिवलिंग, नाग और पीछे शेर है। घर्षण की वजह से नुकसान न हो इसलिए चार साल पहले औरंगाबाद के पुरातत्व विभाग ने मूर्ति पर रासायनिक प्रक्रिया की है। इससे पहले 1955 में भी यह रासायनिक लेप लगाया गया था। बताया जाता है कि महालक्ष्मी की पालकी सोने की है और इसमें 26 किलो सोना लगा है।
- हर वर्ष मनाया जाता है किरणोत्सव का त्योहार
मान्यता है कि खुद माता लक्ष्मी और नारायण इस स्थान पर वास करते है। यहां मांगी जाने वाली हर मनोकामना पूर्ण होती है। कहा जाता है कि प्रलय की रात के बाद भी माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु इस स्थान को नहीं छोड़ेंगे। हर साल कोल्हापुर के इस महालक्ष्मी मंदिर में किरणोत्सव का त्योहार मनाया जाता है। माना जाता है कि मंदिर में माता लक्ष्मी की मूर्ति के प्रत्येक हिस्से की सूर्य की किरणें अलग-अलग दिन दर्शन करती हैं। मंदिर की पश्चिमी दीवार पर एक खिड़की है जिसमें से सूर्य की रोशनी आती है और माता की मूर्ति को स्पर्श करती है। रथ सप्तमी के दिन सूर्य देव माता लक्ष्मी के चरण छूते हैं। यह त्यौहार हर वर्ष 9-12 और जनवरी 31 से 3 फरवरी तक मनाया जाता है।
-दीपावली की महाआरती में मांगी हर मुराद होती हैं पूरी
कहा जाता है कि एक बार तिरुपति यानी भगवान विष्णु से रूठ कर उनकी पत्नी कोल्हापुर आ गई थी । इस वजह से दीपावली के दिन आज भी तिरुपति देवस्थान से आया शालू उन्हें पहनाया जाता है। यह भी कहा जाता है कि किसी की भी तिरुपति यात्रा तब तक पूरी नहीं मानी जाती जब तक वह यहां आकर महालक्ष्मी का पूजा अर्चना ना कर ले। यहां महालक्ष्मी को करवीर निवासी अंबाबाई के नाम से भी पुकारा जाता है। कहा जाता है कि दीपावली की रात को होने वाली महाआरती में श्रद्धालु यहां जो भी मुरादे मांगते हैं वह जरूर पूरी होती हैं।
-पश्चिम दिशा की तरफ है माता लक्ष्मी का चेहरा
पुराणों के अनुसार शक्ति पीठों में मां शक्ति उपस्थित होकर भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं। माना जाता है कि इस मंदिर में जो भक्त इच्छा लेकर आता है वो पूर्ण हो जाती है। इस मंदिर को अम्बा माता का मंदिर के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि माता लक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ इस मंदिर में निवास करती हैं। इस मंदिर कि ख़ास बात ये है कि अधिकतर मंदिरों में देवी-देवता पूर्व या उत्तर दिशा की ओर देख रहे होते हैं लेकिन इस मंदिर में माता लक्ष्मी का चेहरा पश्चिम दिशा की तरफ है।
- मंदिर में बनाये गए है कुल पांच शिखर
महालक्ष्मी मंदिर का शिखर हल्के पीले रंग का है और इसकी किनारियाँ केसरिया है। शिखर शुण्डाकार की है। यहाँ कुल 5 शिखर बनाये गए हैं। मध्य शिखर कूर्म मंडप के ऊपर स्थापित है। इसके चारों ओर, चार दिशाओं में स्थित अन्य चार शिखर हैं जो क्रमशः महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती एवं गणपति मंदिरों के ऊपर स्थित हैं। यहाँ की अधिष्ठात्री देवी, महालक्ष्मी मंदिर के ऊपर स्थापित शिखर सबसे ऊंचा है।
- गर्भगृह के समक्ष स्थापित है दो मंडप
गर्भगृह के समक्ष दो मंडप हैं। एक है दर्शन मंडप जहां से महालक्ष्मी के दर्शन किये जाते हैं। दूसरा है अष्टकोणीय रंगमंडप जिसे कूर्म मंडप कहा जाता है ऐसा इसलिए क्योंकि मध्य शिला एक कछुए के आकार में उत्कीर्णित है। इसे शंख तीर्थ मंडप भी कहते हैं क्योंकि यहाँ खड़े होकर पुजारीजी शंख द्वारा पवित्र तीर्थ जल भक्तों पर छिड़कते हैं।
- मातुलिंग नामक शिवलिंग है स्थापित
महालक्ष्मी मंदिर के गर्भगृह के ठीक ऊपर एक गुफा बनी है जिसके अंदर गणेश एवं नंदी के साथ मातुलिंग नामक शिवलिंग स्थापित है। यह एक गुफा मंदिर की तरह है। मातुलिंग मंदिर को प्रातःकालीन आरती के पश्चात कुछ क्षणों के लिए खोलते हैं। यह मातुलिंग महालक्ष्मी के शीर्ष पर उत्कीर्णित लिंग का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि महालक्ष्मी के शीर्ष पर उत्कीर्णित लिंग भक्तगण देख नहीं पाते।
- दाहिनी ओर महाकाली और बाईं ओर महासरस्वती का मंदिर है स्थापित
महालक्ष्मी की प्रतिमा के दाहिनी ओर एक छोटा सा मंदिर है जो देवी महाकाली को समर्पित है। वहीं बाईं ओर महासरस्वती को समर्पित एक और छोटा सा मंदिर है। ये तीन देवियाँ मिलकर शक्ति की उच्चतम त्रिमूर्ति की रचना करते हैं जो रजस, तमस एवं सत्व, इन तीन गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये तीनों प्रतिमाएं मुख्य मंदिर में हैं। दुर्गा सप्तशती के अनुसार महाकाली एवं महासरस्वती की उत्पत्ति महालक्ष्मी से ही हुई है। गर्भगृह के समक्ष एक छोटा गणेश मंदिर भी है। मंदिर में महालक्ष्मी के अलावा नवग्रहों, दुर्गा माता, सूर्य नारायण, भगवान शिव, भगवान विष्णु, विट्ठल रखमाई, तुलजा भवानी आदि देवी देवताओं की मूर्तियां भी हैं। मंदिर परिसर में स्थित मणिकर्णिका कुंड के तट पर विश्वेश्वर महादेव मंदिर की भी काफी प्रसिद्धि है।
- नवरात्रि के नौ दिवस उत्सवों से होते हैं परिपूर्ण
नवरात्रि यहाँ का सर्वाधिक लोकप्रिय उत्सव है। शरद नवरात्रि के नौ दिवस उत्सवों से परिपूर्ण होते हैं। देवी की दैनिक अलंकार सज्जा अत्यंत भव्य होती है। नवरात्रि की प्रत्येक संध्या को उनकी पालकी निकली जाती है।नवरात्रि के पांचवें दिन, देवी यहाँ से 5 की.मी. दूर स्थित त्र्यम्बुली बाई मंदिर में भेंट करती है। भगिनी से भेंट करने का यह उनका वार्षिक नियम है। मार्ग में वे शाहू मिल में अल्प विश्राम करती है जहां उनकी पूजा की जाती है। छत्रपति , कोल्हापुर के स्थानीय राजा, देवी के लिए बलि चढ़ाते हैं। यहां वे देवी के रूप में एक कन्या के समक्ष तलवार से एक कद्दू को काटकर प्रतीकात्मक बलि चढ़ाते हैं। अष्टमी के दिन देवी को एक तोप की सलामी दी जाती है। इस प्रथा का आरम्भ छत्रपति शिवाजी की पुत्रवधू रानी ताराबाई ने किया था। सलामी के पश्चात देवी पालकी में बैठकर नगर का भ्रमण करती है। भक्तगण उन्हें पान-सुपारी, साड़ी, पुष्प एवं अन्य पूजा सामग्री अर्पण करते हैं।
- कई दशकों पहले महिलाओं को मंदिर जाने कि नहीं थी इजाजत
मंदिर में पहले सिर्फ पुरुषों को ही जाने की इजाजत थी लेकिन काफी संघर्ष के बाद आखिरकार इसमें महिलाओं को भी जाने की इजाजत मिली। पहले तो मंदिर के पुजारी इसके विरोध में थे लेकिन महिलाओं के बढ़ते विरोध और राज्य सरकार के दखल के बाद महिलाओं ने गर्भगृह में प्रवेश कर महालक्ष्मी की पूजा कर महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया।
- अकूत खजाने के मिलने से चर्चा में रहा था मंदिर
महालक्ष्मी मंदिर कुछ समय पहले काफी चर्चा में भी रहा है और कारण था यहां अकूत खजाने का मिलना। तब 900 साल पुराने इस मंदिर में सोने के बेशुमार गहने निकले जिनकी कीमत का आंकलन दो सप्ताह तक चला। इसके बाद सारे खजाने का बीमा कराया गया है। इस बेशकीमती मंदिर की सुरक्षा बेहद कड़ी रहती है और पूरा परिसर सीसीटीवी कैमरों के नजर में रहता है। माना जाता है कि मंदिर में जो अकूत खजाना मिला है उसे चढ़ाने वालों में कोंकण के राजाओं, चालुक्य राजाओं, आदिल शाह, शिवाजी और उनकी मां जीजाबाई शामिल हैं।
