हिमाचल में तैयार रेशम से बन रही बनारसी साड़ियां
हिमाचल में बन रहा रेशम भारतीय सभ्यता का प्रतीक माने जानी वाली सिल्क साड़ियों में इस्तेमाल हो रहा है। इतना ही नहीं हिमाचल में तैयार रेशम का इस्तेमाल पूरी दुनिया की महिलाओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनी बनारसी साड़ियों में भी हो रहा है। बीते कुछ समय में हिमाचल में सेरीकल्चर ( रेशम कीट पालन व निर्माण प्रक्रिया ) को लेकर रुझान बढ़ा है। राज्य के सैकड़ों परिवार इस कार्य से जुड़े हैं और इनमें लगभग 90 फीसदी महिलाएं हैं। प्रदेश के रेशम केंद्रों में रेशम के कीट से कोकून को तैयार कर यह महिलाएं प्रदेश में मौजूद रिलिंग यूनिट तक पहुंचाती हैं। उक्त यूनिटों में कोकून से धागा तैयार कर इसे अन्य प्रदेशों में भेजा जाता है। जबकि कई रेशम केंद्रों से कोकून को सीधे अन्य राज्यों में भी भेजा जा रहा है। सेरीकल्चर से प्रदेश के सैकड़ों परिवारों की आर्थिकी बदल गई है। प्रदेश में तैयार धागा लगभग एक हजार रुपये प्रति किलोग्राम तक की दर से अन्य राज्यों में बिक रहा है।रेशम आज दुनिया में बनने वाले सबसे मुलायम, चमकदार वस्त्रों में से एक है। आज के इस मशीनी युग में भी गुणवत्ता और श्रेष्ठता में रेशम का कोई मुकाबला नहीं है l पूरी तरह से प्राकृतिक यह कपड़ा सिल्क वर्म यानी की रेशम के कीड़ों द्वारा तैयार किया जाता है। वैश्विक बाजार में रेशम की बढ़ती मांग को देखते हुए इसमें रोजगार की काफी संभावना हैं। आज के फैशन युग में इसकी डिमांड लगातार बढ़ती जा रही है, ऐसे में यह व्यवसाय एक अच्छी आमदनी का स्त्रोत बनता जा रहा है। ऐसे में रेशम कीट पालन व्यवसाय को यदि और ऊंचे स्तर पर विकसित किया जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार व आमदनी के अवसर प्राप्त हो सकते है। गौरतलब है कि हिमाचल का कोकून सबसे बेहतर माना जाता है, जिससे बढ़िया रेशम का उत्पादन किया जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश भर में कुल 79 केंद्रों में रेशम कीट पालन हो रहा है तथा सिरमौर, कांगड़ा, बिलासपुर, ऊना, हमीरपुर के कांगू व नादौन में इस व्यवसाय से सैकड़ों परिवार जुड़े हैं। इसके साथ-साथ प्रदेश के ऊना, सिरमौर, बिलासपुर, कांगड़ा इत्यादि जिलों में रिलिंग यूनिट कार्य कर रहे हैं। रेशम पालक शहतूत के पत्तों से कीट के माध्यम से कोकून को रिलिंग यूनिट तक पहुंचाते हैं। इन इकाइयों में कोकून से धागा तैयार करके अन्य राज्यों में स्थापित सिल्क उद्योगों को भेजा जाता है। इन उद्योगों में सिल्क के विश्व स्तरीय परिधान तैयार किए जाते हैं।
ऐसे बनता है रेशम
रेशम के मादा कीट शहतूत की पत्तियों पर गुच्छों में लगभग 300 से 400 अंडे देती है। अंडा-बिछाने 1-24 घंटे में पूरा हो जाता है। अंडे देने के 3-4 दिन बाद मादा मर जाती है। अंडे से दिनों में लार्वा में बदल जाते हैं। लगभग 10 दिन के भीतर हर एक अंडा एक कीड़े को जन्म देता है जिसे लार्वे के नाम से भी जाना जाता है। इसके बाद, तीन से आठ दिनों तक यह रेशम का कीड़ा अपने मुंह से एक तरल प्रोटीन का स्त्राव करता है l वायु से संपर्क में आने पर यह तरल प्रोटीन कठोर होकर धागे का रूप ले लेता हैl इस प्रोटीन के फलस्वरूप कीड़े के चारों ओर एक गोला जैसा बन जाता है जिसे हम कोकून के नाम से जानते हैंl रेशम का कीड़ा कोकून का निर्माण अपने रहने के लिए करता है। रेशम प्राप्त करने के लिए इस गोले को गर्म पानी में डाल दिया जाता है l इससे रेशम का कीड़ा मर जाता है और उस गोले का उपयोग रेशम का धागा बनाने के लिए किया जाता है l एक गोले रेशम से 500 से 1300 मीटर लंबा रेशम का धागा प्राप्त होता है l
भारत में सिर्फ तीन बीज केंद्र, एक पालमपुर में
सेरीकल्चर को बढ़ावा देने के लिए भारत में ऐसे तीन ही केंद्र स्थापित है जहाँ से पूरे देश के किसानों को रेशम कीट के बीज मुहैया करवाए जाते है। इन तीन केंद्रों में उत्तराखंड का देहरादून, कर्नाटक का मैसूर व हिमाचल का पालमपुर शामिल हैं। रेशम कीट के बीज से लेकर प्रदेश में ऐसे कई स्थान है जहां रेशम कीट का उत्पादन भी किया जाता है। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर ,मंडी, हमीरपुर ,काँगड़ा, ऊना सिरमौर जिला में रेशम का उत्पादन किया जाता है। रेशम उत्पादन में जिला बिलासपुर के बाद मंडी जिला पुरे प्रदेश में दूसरे स्थान पर आता है।
बिलासपुर के करीब 3 हजार परिवार रेशम कीट पालन से जुड़े
कोरोना काल में प्रदेश में रेशम का 60 फीसदी उत्पादन बिलासपुर में ही हुआ। कोरोना काल में रेशम कीट पालन हजारों परिवारों की रोटी का सहारा बना। आपदा में जब कई युवाओं का रोजगार छिन गया तो यह व्यवसाय इनके काम आया। बिलासपुर जिले में तैयार हो रहा रेशम का धागा बाहरी राज्यों में भी निर्यात हो रहा है। दो रिलिंग यूनिटों में हर वर्ष करीब एक करोड़ रुपये का धागा रिलिंग कर बेंगलुरु, कोलकाता और मुंबई भेजा जा रहा है। जिला बिलासपुर के करीब 3 हजार परिवार रेशम कीट पालन से जुड़े हैं।
1287.51 बीघा में हो रही शहतूत की खेती
प्रदेश के 1287.51 बीघा में शहतूत की खेती की जाती है। प्रदेश में वर्ष 2021-22 के दौरान अब तक 2 लाख 23 हजार शहतूत के पौधे वितरित किए गए हैं और 238 मीट्रिक टन कोकून का उत्पादन किया गया।
79 कीट पालन केंद्र व 11 रिलिंग यूनिट
हिमाचल प्रदेश में वर्तमान में 11 रिलिंग यूनिट हैं। इन यूनिट्स में धागा तैयार किया जाता हैं। जिला बिलासपुर, ऊना, कांगड़ा व सिरमौर में ये सभी रिलिंग यूनिट स्थित है। जबकि सेरीकल्चर का अधिकांश कार्य जिला हमीरपुर में होता है। खासतौर से हमीरपुर के नादौन व कांगू में काफी परिवार रेशम कीट पालन से जुड़े है। प्रदेश में कुल 79 केंद्रों में रेशम कीट पालन हो रहा है।
शहतूत रोपण के कई फायदे
शहतूत रोपण से रेशम कीट पालन तो संभव है ही, ये पर्यावरण के लिए भी संजीवनी है। शहतूत रोपण द्वारा पशुओं के लिए अतिरिक्त चारा, इंधन व टोकरियां बनाने के लिए कच्चा माल भी प्राप्त होता है। इससे स्वंय सहायता समूह, महिला मण्डल व युवा क्लब सदस्य इस व्यवसाय को अपनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त गति पैदा कर सकते हैं।
नौणी विवि के नेरी कॉलेज में हो रहा शोध
डॉ यशवंत सिंह परमार वानिकी एवं डॉ यशवंत सिंह परमार बागवानी एवं वानिकी विवि द्वारा भी सेरीकल्चर को बढ़ावा देने के लिए आवशयक कदम उठाये जा रहे है। विवि के उप कुलपति डा.परविंदर कौशल ने बताया कि विवि के नेरी स्थित बागवानी एवं वानिकी कॉलेज में रेशम कीट पालन को लेकर शोध किया जा रहा है। साथ ही यहां सेरीकल्चर कोर्स भी शुरू किया गया है। प्रदेश में रेशम कीट पालन को बढ़ावा देने के लिए योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया जा रहा है। सेरीकल्चर को बढ़ावा देने के लिए विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम में भी तकनीकी जानकारी दी जा रही है। किसानों को बीमारी की रोकथाम के टिप्स व मलबरी प्लांटेशन पर व्यापक फोकस किया जा रहा है।
रेशम कीट पालन को प्रोत्साहित कर रही प्रदेश सरकार
प्रदेश के विभिन्न मण्डलों के अन्तर्गत रेशमकीट बुनाई बुनकरों को लाभान्वित करने के लिए रेशमकीट प्रदर्शनी एवं प्रशिक्षण केन्द्र, रेशमकीट सामुदायिक केन्द्र, कोकून विपणन केन्द्र और सिल्क वाॅर्म सीड उत्पादन केन्द्र आदि स्थापित किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में मण्डी जिला के बालीचैकी में 494 लाख रुपये की लागत से सेरी एंटरप्रिन्योरशिप डवेल्पमेंट एंड इनोवेशन सेंटर (एसईडीआईसी) भवन का निर्माण किया जा रहा है। इस भवन के निर्मित होने से प्रदेश के और अधिक रेशम बुनकरों को प्रशिक्षित करने की सुविधा प्राप्त होगी और रेशम से जुड़े उत्पाद निर्मित किए जाएंगे। मंडी जिला के थुनाग में 318 लाख रुपये की लागत से रेशम बीज उत्पादन केन्द्र के भवन का निर्माण किया जा रहा है। बीते दिनों उद्योग विभाग के रेशम अनुभाग के कार्यों की समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करते हुए उद्योग मंत्री बिक्रम सिंह ने कहा कि प्रदेश में रेशम कीट पालन के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी, जिससे रेशम कीट पालन किसानों को केंद्र और राज्य सरकार के रेशम उद्योग विकास के लिए आरम्भ की गई विभिन्न योजनाओं की जानकारी उपलब्ध होगी।
सरकार ! आखिर क्यों छीन लिया गया क्षेत्रीय रेशम अनुसंधान केंद्र ?
प्रदेश का पहला क्षेत्रीय रेशम अनुसंधान केंद्र घुमारवीं में प्रस्तावित था। प्रदेश में रेशम कीट पालन को बढ़ावा देने के लिए यह प्रोजेक्ट पूर्व सीपीएस एवं घुमारवीं विस क्षेत्र के पूर्व विधायक राजेश धर्माणी ने घुमारवीं के लिए स्वीकृत करवाया था। इस अनुसंधान केंद्र के माध्यम से रेशन कीट पालन पालकों को लाभ तय था। किन्तु सत्ता परिवर्तन हुआ और भाजपा के सत्ता में आते ही यह अनुुुसंधान केंद्र छीन लिया गया। अब यह केवल रिजनल एक्सटेंशन सेंटर बनकर रह गया है। पालमपुर के बाद दूसरा एक्सटेंशन सेंटर है। इसके अलावा जिला बिलासपुर के हटवाड़, ऊना व हमीरपुर के नादौन में कार्यरत रेशम अनुसंधान प्रसार केंद्र भी घुमारवीं व पालमपुर में मर्ज कर दिए गए हैं। बहरहाल, अब महज एक्सटेंशन सेंटरों के माध्यम से ही विभाग का लाभ मुहैया करवाया जा रहा है। जबकि रेशम कीट अनुसंधान केंद्र में इस व्यवसाय से जुड़े कई रिसर्च यहां पर होने थे जिसका लाभ प्रदेश के सैकड़ों रेशम कीट पालकों को मिलना तय था। उल्लेखनीय है कि पूर्व यूपीए सरकार के कार्यकाल में स्वीकृत क्षेत्रीय रेशम अनुसंधान केंद्र के लिए करीब 200 बीघा जमीन की आवश्यकता थी। इसके लिए करीब 400 करोड़ की राशि खर्च की जानी थी। वहीं, करीब 400 कर्मचारियों की तैनाती भी अनुसंधान केंद्र में होनी थी। लेकिन केंद्र सरकार इसके लिए जमीन ही नहीं मुहैया करवा पाई। हालांकि घुमारवीं विस क्षेत्र में जमीन नहीं मिलने के चलते इस अनुसंधान केंद्र के लिए बिलासपुर जिला के बरठीं के पास जमीन मुहैया करवाने का आग्रह भी केंद्र से किया गया था लेकिन फिर केंद्र सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। इसके चलते इस रेशम पालन अनुसंधान केंद्र का कद कम कर महज एक्सटेंशन सेंटर कर दिया गया है।
भाजपा ने छीना क्षेत्रीय रेशम अनुसंधान केंद्र : धर्माणी
क्षेत्रीय रेशम अनुसंधान केंद्र को मैंने अपने कार्यकाल में स्वीकृत प्रदान करवाई थी। बकायदा इसे शुरू भी किया गया लेकिन भाजपा की सरकार आते ही इसे बंद किया गया। ये विडम्बना का विषय है कि हिमाचल प्रदेश के लिए स्वीकृत पहले क्षेत्रीय रेशम अनुसंधान केंद्र को भाजपा सरकार निगल गई है। इस सेंटर से न केवल घुमारवीं क्षेत्र के बल्कि आसपास के कई किसान लाभान्वित हो रहे थे लेकिन भाजपा की डबल इंजन की सरकार के आते ही कीट पालकों के रोज़गार पर इन्होने संकट पैदा कर दिया। प्रदेश सरकार को सेंटर खोल कर लोगों को रोज़गार के अवसर मुहैया करवाने चहिये ताकि ग्रामीण आर्थिकी को सुदृढ़ किया जा सके लेकिन भाजपा को केवल राजनीति करनी आती है।
-राजेश धर्माणी, पूर्व विधायक घुमारवीं विधानसभा क्षेत्र
