बिना चुनाव लड़े बने सीएम, फिर हार गए उप चुनाव
पिछले दिनों हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस प्रचंड बहुमत के साथ तीसरी बार सत्ता में आई लेकिन खुद सीएम ममता बनर्जी नंदीग्राम सीट से चुनाव हार गई। कांटे की टक्कर के बाद ममता बनर्जी बीजेपी प्रत्याशी सुवेंदु अधिकारी से 1736 वोटों से हार गई। बावजूद इसके ममता ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि कोई मुख्यमंत्री पहली बार चुनाव हारा हो और कोई हारा हुआ नेता पहली बार मुख्यमंत्री बना हो। यही नहीं बिना चुनाव लड़े ही मुख्यमंत्री बनने की परम्परा भी नई नहीं हैं। दरअसल संविधान में ऐसा प्रावधान है। ऐसी स्थिति में उक्त नेता को 6 माह में चुनाव जीतकर आना होता है। ममता बनर्जी भी अब भवानीपुर सीट से उपचुनाव के रास्ते विधानसभा पहुंचने की तैयारी में है। पर अगर ममता बनर्जी उप चुनाव हार जाए तो ? क्या कोई नेता मुख्यमंत्री बनने के बाद उपचुनाव भी हार सकता है ? खेर, मुमकिन नहीं लगता कि ममता बनर्जी के मामले में तो ऐसा चमत्कार होगा पर देश के राजनीतिक इतिहास पर गौर करें तो दो मुख्यमंत्रियों के साथ ऐसा हो चुका है।
खुद पीएम इंदिरा उतरी उपचुनाव प्रचार में और त्रिभुवन हार गए
मुख्यमंत्री के उप चुनाव हारने का सिलसिला उत्तर प्रदेश में त्रिभुवन नारायण सिंह के साथ शुरू हुआ। त्रिभुवन नारायण सिंह बिना चुनाव लड़े 10 अक्टूबर 1970 को संयुक्त विधायक दल का नेता चुने गए और मुख्यमंत्री बने। मगर संविधान के अनुच्छे 164(4) की बाध्यताओं के चलते जब मार्च 1971 में गोरखपुर जिले के मनीराम विधानसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़े तो हार गये। दरअसल, 1969 में जब कांग्रेस में विभाजन हुआ तो उत्तर प्रदेश के कमलापति त्रिपाठी ग्रुप ने इंदिरा गुट को समर्थन दिया। दूसरे बड़े नेता रघुनाथ सिंह सिंडिकेट ग्रुप में शामिल हुए जिनमें चंद्रभानु गुप्ता त्रिभुवन नारायण सिंह भी शामिल थे। जैसे-तैसे चंद्रभानु गुप्ता मुख्यमंत्री बन गए लेकिन फरवरी 1970 में चंद्रभानु गुप्ता को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना। तब इंदिरा समर्थित कांग्रेस ने चौधरी चरण सिंह को समर्थन दे दिया और चौधरी चरण सिंह सीएम बन गए। पर सितंबर आते-आते कांग्रेस ने चरण सिंह को समर्थन देना बंद कर दिया जिसके बाद उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया। पर इसके बाद एक बार फिर सिंडिकेट ग्रुप ने जोड़ तोड़ कर अक्टूबर 1970 में त्रिभुवन नारायण सिंह को सीएम बना दिया। किन्तु इंदिरा को ये अखर रहा था।
मुख्यमंत्री बने त्रिभुवन नारायण सिंह विधायक नहीं थे सो उन्हें 6 माह में उपचुनाव जीतना जरूरी था। उन्होंने उप चुनाव के लिए सीट चुनी गोरखपुर की मणिराम सीट। मणिराम से 1962, 1967 और 1969 में हिंदू महासभा के महंत अवैद्यनाथ विधायक चुने गये थे, पर जब अवैद्यनाथ लोकसभा के लिए चुन लिये गये तो उन्होंने यह सीट छोड़ दी। उप-चुनाव में उन्होंने त्रिभुवन सिंह को अपना समर्थन दिया। इसके अलावा मुख्यमंत्री को त्रिभुवन नारायण सिंह को कई दलों का समर्थन हासिल था। उन्होंने ऐलान भी कर दिया कि वे उपचुनाव में खुद प्रचार नहीं करेंगे, यानी जीत को लेकर वे पूरी तरह आश्वस्त थे। पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नजर में त्रिभुवन नारायण सिंह खटक रहे थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस उप चुनाव में खुद प्रचार किया। रामकृष्ण द्विवेदी को इंदिरा ने प्रत्याशी बनाया और बनारस गोलीकांड की बिसात पर ऐसा सियासी चक्रव्यूह रचा कि त्रिभुवन नारायण सिंह चुनाव हार गये।
सीएम शीबू सोरेन चुनाव हारे और राष्ट्रपति शासन लग गया
त्रिभुवन नारायण के बाद उपचुनाव हारने वाले दूसरे मुख्यमंत्री बने झारखंड मुक्ति मोर्चा के शीबू सोरेन। शीबू सोरेन मुख्यमंत्री रहते हुए 29 दिसंबर 2008 को झारखंड विधानसभा की तमार सीट पर हुए उप चुनाव में झारखंड पार्टी के राजा पीटर से 9,062 मतों से हार गए। वे कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे।तब चुनाव हारने के बाद वह अपना कार्यकाल 6 माह बढ़ाने के लिए पुनर्नियुक्ति चाहते थे ताकि चुनाव जीतने का एक मौका और मिल जाए, लेकिन सहयोगी दल कांग्रेस सहमत नहीं हुई और सोरेन को इस्तीफा देना पड़ा। उनके इस्तीफे के बाद झारखण्ड में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।
