सामूहिक छायाचित्र माशा अल्लाह, बाकी रब जाने
सुखविंदर सिंह सुक्खू भी आएं, ठाकुर कौल सिंह भी आएं, रामलाल ठाकुर भी आएं और कांग्रेस के अधिकांश विधायक, पूर्व विधायक, पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता भी इस सियासी भोज में शामिल हुए। इस भोज की मेजबानी की थी हॉलीलॉज ने, वही हॉलीलॉज जो कई दशकों से प्रदेश की सियासत की धुरी बना रहा है। इस भोज का औपचारिक कारण था उपचुनाव में कांग्रेस को मिली शानदार जीत। पर सियासी चश्मे से देखे तो कांग्रेस के दिग्गजों ने एकसाथ आकर शक्ति प्रदर्शन किया और ये सन्देश दिया कि पार्टी एकजुट है। जिनकी हॉलीलॉज आने की उम्मीद थी वो तो आएं ही, पर जिनके आने की उम्मीद नहीं थी उन्होंने भी महफ़िल की शोभा बढ़ाई। कई नेताओं ने हॉलीलॉज में खींचा गया सामूहिक छायाचित्र साझा किया जिसमें दिग्गजों के चेहरों पर उपचुनाव में मिली जीत की ख़ुशी भी दिख रही है और 2022 में सत्ता वापसी की आस भी। एकजुटता की इस तस्वीर ने पार्टी के निष्ठावानों और समर्थकों का खून बढ़ा दिया होगा, लेकिन इन्हें जहन में रखना होगा कि तस्वीरें अक्सर झूठ भी बोलती है, खासतौर से सियासत में। यहाँ दिखता कुछ है और होता कुछ है।
वीरभद्र सिंह के जाने के बाद कांग्रेस में मुख्य चेहरे की जंग सी छिड़ी हुई है। 2022 में कांग्रेस का सीएम फेस कौन होगा, ये सबसे बड़ा सवाल है। इस जंग के बीच ये एकजुटता कब तक बरकरार रहती है, ये भी बड़ा सवाल है। जितनी तेजी से हिमाचल कांग्रेस की सियासत दिन प्रतिदिन बदल रही है उसके बाद कुछ भी कहना जल्दबाजी है। इसमें कोई संशय नहीं है कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन के बाद कांग्रेस में कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं दिख रहा। कई चाहवान है और समर्थक अपने-अपने नेता को अभी से भावी मुख्यमंत्री करार दे रहे है। दिलचस्प बात ये है कि सत्ता मिलने की स्तिथि में कांग्रेस के कई कद्दावर नेता तो सीएम बनने की आस में है ही, दूसरी पंक्ति के नेता भी ख्वाब संजोय बैठे है। गनीमत बस ये है कि पार्टी के अध्यक्ष कुलदीप राठौर का झुकाव किसी गुट विशेष की तरफ नहीं दिखता या यूँ कहे कि वे खुद किसी गुट की अगुवाई नहीं करते, अन्यथा पार्टी को तस्वीर में एकजुट रखना भी आसां नहीं होता।
मंडी लोकसभा चुनाव जीतने के बाद प्रतिभा सिंह तीसरी बार सांसद बनी है। इस जीत के बाद प्रदेश की राजनीति में उनका कद निसंदेह बढ़ा है। ये जीत इसलिए भी बड़ी है क्यों कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 4 - 0 से परास्त हुई थी। ऐसे में हॉलीलॉज के निष्ठावान अभी से उनकी मुख्यमंत्री पद को लेकर दावेदारी जता रहे है। वहीँ उनके पुत्र विक्रमादित्य सिंह की बात करें तो वीरभद्र सिंह के निधन के बाद खुद को साबित करने में अब तक न तो वे कहीं चूके और न ही उन्होंने वीरभद्र समर्थकों को निराश किया है। यानी सीएम पद पर हॉलीलॉज का दावा कमतर नहीं होगा। एक और महिला चेहरा ऐसा है जिन्हें उनके समर्थक बतौर मुख्यमंत्री पेश कर रहे है और ये है आशा कुमारी। प्रदेश को अब तक महिला मुख्यमंत्री नहीं मिली है। ऐसे में अब इन दोनों नेताओं के बढ़ते कद ने प्रदेश में पनपती पहली महिला मुख्यमंत्री की उम्मीद को और भी तेज़ कर दिया है।
2022 में सत्ता वापसी की सूरत में सीएम पद पर ठाकुर कौल सिंह का दावा भी तय होगा। कौल सिंह 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले भी सीएम पद के दावेदार थे, हालांकि तब वीरभद्र सिंह ने प्रदेश की सियासत में वापसी कर उनके अरमानो पर पानी फेर दिया था। कौल सिंह की जमीनी पकड़ पर कोई संशय नहीं है और मंडी उपचुनाव में जिस तरह वे प्रतिभा सिंह के साथ दिखे है ऐसे में कुछ नए सियासी समीकरण भी बनते दिखे है। मुकेश अग्निहोत्री और कर्नल धनीराम शांडिल के नाम भी दावेदारों की फेहरिस्त में होना तय सा है। पर एक नाम और है जिस पर सबकी निगाहें रहने वाली है, वो है पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविंद्र सुक्खू। निसंदेह सुक्खू के साथ जमीनी कार्यकर्त्ता भी है और उनकी अपनी एक लॉबी भी। सम्भवतः आगामी कुछ वक्त में कांग्रेस में कई आंतरिक गठबंधन बनते बिगड़ते दिख सकते है।
हॉलीलॉज को अनदेखा कैसे करें
सांसद प्रतिभा सिंह के निमंत्रण पर हॉलीलॉज में तमाम दिग्गजों के पहुँचने से एक बात और स्पष्ट हो गई कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन के बाद भी हॉलीलॉज का सियासी तिलिस्म बरकरार है। वीरभद्र सिंह परिवार के निष्ठावान नेताओं के साथ - साथ वो चेहरे भी इस भोज को अस्वीकार नहीं कर पाएं जो विरोधी माने जाते रहे है। कारण साफ़ है, मंडी लोकसभा उपचुनाव की जीत ने ये साबित कर दिया है कि जनता के बीच इस परिवार की स्वीकार्यता में कोई कमी नहीं है। अलबत्ता मतभेद रहे लेकिन राजनीति का तकाजा ये ही है कि वर्तमान परिवेश में हॉलीलॉज को अनदेखा नहीं किया जा सकता। जायज है कि यहाँ खींचवाएं गए सामूहिक छायाचित्र को एक औपचारिकता माने और मोटे तौर पर इस भोज को कांग्रेस का सामूहिक भोज ही करार दिया जाएं। पर 2022 में भी हॉलीलॉज का जादू चला और वीरभद्र कैंप के समर्थक अच्छी तादाद में विधानसभा पहुंचे तो सीएम शायद हॉलीलॉज से न हो लेकिन हॉलीलॉज की पसंद का ख्याल रखना जरूरी होगा।
अब बदलनी होगी रणनीति
कांग्रेस के कई नेता प्रदेश अध्यक्ष पद पर नजरें टिकाएं हुए थे और इसी कोशिश में थे की किसी तरह संगठन की सरदारी मिल जाएं। अध्यक्ष की कुर्सी से मुख्यमंत्री की कुर्सी का फासला तो कुछ कम हो ही सकता है, साथ ही टिकट आवंटन में निर्णायक भूमिका मिल सकती है। पर उपचुनाव में पार्टी के शानदार प्रदर्शन के बाद बदलाव की अटकलों पर विराम तो लगा ही है, संभवतः कई नेताओं के अरमान भी कुचले गए है। अब बदलाव की सम्भावना नहीं लग रही और ऐसे में इन नेताओं को अपनी रणनीति बदलने की जरुरत होगी। वहीँ कुलदीप राठौर का अध्यक्ष बने रहना पार्टी के लिए लाभदायक हो सकता है क्यों कि वे मोटे तौर पर गुटबाजी से दूर है।
पहले खुद जीतना होगा
कांग्रेस के कई दिग्गजों के सामने पहले खुद जीतने की चुनौती होगी। कौल सिंह ठाकुर और सुधीर शर्मा जैसे नेता खुद पिछले चुनाव नहीं जीत पाएं थे तो कई नेता जैसे -तैसे बस जीते ही थे। सुखविंदर सिंह सुक्खू भी 2012 में खुद चुनाव हार चुके है, अन्य कई नेताओं का चुनावी इतिहास भी कुछ ऐसा ही है।
