जम्हूरियत का तकाजा : जो आवाम को नामंजूर वो थोप नहीं सकते
लोकतंत्र और तानाशाही में ये ही फर्क है, लोकतंत्र में जनता की आवाज को लम्बे वक्त तक अनसुना नहीं किया जा सकता। 'वोट की चोट' के आगे बड़े -बड़े सियासतगर बैकफुट पर आ जाते है। तीन कृषि कानूनों को लेकर केंद्र की मोदी सरकार को भी अपने कदम पीछे हटाने पड़े। ये कानून किसान हित में थे या किसान विरोधी, ये विश्लेषण का विषय है और इस पर देश बंटा हुआ है, इसमें कोई संशय नहीं कि लाखों किसानों को ये कानून मंजूर नहीं थे। सही-गलत अपनी जगह लेकिन जो आवाम को मंजूर नहीं वो थोपा नहीं जा सकता, जम्हूरियत का तकाजा ये ही है। ये बात समझने में मोदी सरकार ने एक साल का वक्त लगाया। ये भुलाया नहीं जा सकता कि इस आंदोलन में करीब 700 किसानों की जान गई है। बहरहाल इन कानूनों का विरोध करने वाले ये ही कह रहे है कि देर आये दुरुस्त आये।
तीन कृषि कानूनों को लेकर मोदी सरकार पर न सिर्फ किसानों का दबाव था बल्कि पार्टी के भीतर भी इन्हें लेकर आवाज उठ रही थी। इन कानूनों की वजह से कहीं गठबंधन टूटे, तो कहीं कुछ चेहरे पार्टी का साथ छोड़ गए। विशेषकर पंजाब हरियाणा में तो कई स्थानों पर पार्टी के लोगों का जनता के बीच जाना भी मुश्किल हो गया था। इस पर हाल ही में हुए उपचुनावों में भी पार्टी को आशा अनुसार सफलता नहीं मिली थी। अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब , उत्तराखंड, गुजरात, हिमाचल प्रदेश सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होने है, जहाँ कृषि कानून की वजह से पार्टी की मुश्किलें बढ़ती दिख रही थी। फरवरी में उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने है, इनमें पंजाब के साथ -साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थिति ख़राब दिख रही थी, जिसके बाद सरकार को कृषि कानून वापस लेने पर विवश होना पड़ा। कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। जाहिर है सबसे ज़्यादा लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में अगर हवा बदल जाएं तो दिल्ली की डगर कठिन होते देर नहीं लगती है, ऐसे में भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व क़तई ख़तरा मोल नहीं लेना चाहता था। वहीं पंजाब में फायदे का तो पता नहीं लेकिन कम से कम पार्टी के लोग अब पूरे प्रदेश में जनता के बीच जाकर प्रचार तो कर सकेंगे।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में डगर कठिन !
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राज्य की करीब एक तिहाई सीटें आती है और यदि यहाँ जनता का साथ न मिले तो उत्तर प्रदेश जीतना मुश्किल है। इस क्षेत्र में जाट-सिख लामबंदी ने बीजेपी के लिए हालात बेहद कठिन कर दिए थे, विशेषकर लखीमपुरी खीरी में किसानों को गाड़ी से कुचले जाने के बाद। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे इस प्रकरण को लेकर जेल में है और निसंदेह इस घटना ने भाजपा के लिए आग में घी का काम किया। लोकदल और समाजवादी पार्टी के संभावित गठबंधन से हालात और भी मुश्किल होते दिख रहे है क्यों कि इस गठबंधन का प्रभाव प्रदेश के 26 जिलों की 136 सीटों पर होता दिख रहा है। वहीँ पूर्वी उत्तर प्रदेश में ओम प्रकाश राजभर पहले ही अलग होकर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर चुके हैं। इस पर एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर और ब्राह्मण समुदाय की तथाकथित नाराजगी को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता। बताया जा रहा है कि पार्टी के रणनीतिकारों ने इस जमीनी स्थिति से आलाकमान को अवगत करवाया और पार्टी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि कृषि कानूनों को वापस ले लेना चाहिए।
व्यापक विरोध ने 'मजबूत' को बनाया 'मजबूर'
तीनों नए कृषि कानूनों को 17 सितंबर 2020 को संसद से पास कराया गया था। इसके बाद से लगातार किसान संगठनों की तरफ से इन कानूनों को वापस लेने की मांग की जा रही थी। किसान संगठनों का तर्क था कि इस कानून के जरिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को खत्म कर देगी और उन्हें उद्योगपतियों के रहमोकरम पर छोड़ देगी। वहीँ, सरकार का तर्क था कि इन कानूनों के जरिए स्पर्धा बढ़ेगी, कृषि क्षेत्र में नए निवेश के अवसर पैदा होंगे और किसानों की आमदनी बढ़ेगी। इन्हें लेकर पुरे देश में लोगों की राय जुदा थी, एक तबका इन्हें किसान हित में मान रहा था तो एक वर्ग इन्हें किसान विरोधी। पर व्यापक विरोध के बावजूद सरकार इन्हें वापस लेने को तैयार नहीं थी। आखिरकार किसान हठ के आगे सरकार को झुकना पड़ा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन्हें वापस लेने का ऐलान किया और भारी मन से कहा कि वे किसानों को कृषि कानूनों के फायदे समझा नहीं पाएं। निसंदेह सरकार इन्हें किसानों की आर्थिकी मजबूत करने की दिशा में एक मजबूत कदम मान रही थी लेकिन जब विरोध का स्तर इतना व्यापक हो तो मजबूत सरकारें भी मजबूर हो ही जाती है। उम्मीद है कुछ वक्त बाद आवश्यक संशोधन के साथ सरकार किसानों को भरोसे में लेकर नए रूप में इन्हें लाएगी।
