असरदार' धूमल और 'वजनदार' अनुराग, मिशन रिपीट के लिए है जरूरी
'कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है' 2017 में प्रो प्रेम कुमार धूमल की हार ने हिमाचल भाजपा की तस्वीर तो बदली ही, कई नेताओं की तकदीर भी बदल कर रख दी। एकाध अपवाद छोड़ दें तो धूमल निष्ठावान जयराम राज में हाशिए पर है। कुछ निष्ठा बदल चुके है तो कुछ हालात से समझौता करते दिख रहे है। हालांकि प्रो साहब के सियासी रसूख में कोई कमी नहीं दिखती। समीरपुर में अरदास लेकर पहुंचे लोगों का हुजूम बयां करता है कि अलबत्ता सीएम न सही पर प्रोफेसर अब भी भाजपा की सियासत के हेडमास्टर जरूर है। इस पर उनके सुपुत्र और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का बढ़ता कद भी निष्ठावानों को ठंडक देता है। पर जो सुकून प्रदेश की सत्ता में है वो भला और कहाँ ?
प्रो धूमल वो शख्स है जिनकी पकड़ प्रदेश के हर हलके में है। अब भी धूमल हमीरपुर से निकलकर कहीं और जाते है तो एक अदद मुलाकात के लिए उमड़ी भीड़ ये साबित करने के लिए काफी है कि उनका अब भी कोई सानी नहीं है। पर माहिर मानते है कि बेटे अनुराग की ऊँची सियासी उड़ान ने धूमल साहब को अब जमीन पर ही रहने को मजबूर कर दिया है। यानी अब प्रोफेसर की मुख्यधारा की राजनीति से विदाई तय है। अब वर्तमान भी अनुराग है और भविष्य भी अनुराग।
उधर विरोधी खेमे ने उपेक्षा का दंश झेल रही धूमल ब्रिग्रेड को पूरी तरह सेटल करने की तैयारी कर ली है। जहाँ -जहाँ धूमल के निष्ठावान ताकतवर है, वहां - वहां समानांतर गुट तैयार है। माहिरों के अनुसार योजना ये है कि टिकट वितरण के स्तर पर ही इन्हें दौड़ से बाहर कर दिया जाएं। मसलन रविंद्र रवि, तेजवंत नेगी, ठाकुर गुलाब सिंह सहित कई नेताओं का टिकट काटने की बिसात तैयार है। धूमल गुट के कई नेताओं को तो बोर्ड निगमों तक में एडजस्ट नहीं किया गया है। पर प्रश्न ये ही है कि क्या ऐसा करके मिशन रिपीट मुमकिन हो पायेगा ? ईमानदारी से कहे तो शायद नहीं। बेशक धूमल गुट कुछ कमजोर हुआ है लेकिन इतना भी नहीं कि उसे दरकिनार कर चुनाव जीता जा सके।
वहीँ उपेक्षित धूमल निष्ठावान इसी उम्मीद में है कि धूमल न सही अनुराग ही प्रदेश में लौट आएं। ऐसे में सवाल ये है कि क्या ऐसा होना मुमकिन है ? माहिर मानते है कि ऐसा हो सकता है। दरअसल हिमाचल विधानसभा चुनाव जीतना जितना भाजपा के लिए जरूरी है उतना ही जगत प्रकाश नड्डा के लिए भी। राष्ट्रीय अध्यक्ष के गृह राज्य में पार्टी हारी तो सवाल उठना लाज़मी होगा, ऐसे में हमेशा जयराम ठाकुर की ढाल बनने वाले नड्डा क्या अनुराग पर भी मेहरबान हो सकते है, ये ही यक्ष प्रश्न है। जानकार मान रहे है कि यदि चुनाव से पहले भाजपा को मिशन रिपीट खतरे में दिखा तो पार्टी 'असम फार्मूला' के साथ मैदान में उतर सकती है, यानी बिना सीएम फेस। इस फॉर्मूले से जाहिर है दोनों गुटों को सीएम पद की आस रहेगी और भीतरघात और अंतर्कलह को कम किया जा सकेगा। और नतीजे अगर पार्टी के पक्ष में आएं तो बदलाव भी मुमकिन होगा।
हिमाचल की सियासत में प्रो प्रेम कुमार धूमल निसंदेह असरदार है और अनुराग ठाकुर का सियासी वजन लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में बाप -बेटे की ये जोड़ी भाजपा के मिशन रिपीट के लिए बेहद अहम है। चुनाव से पहले अभी हिमाचल भाजपा की सियासत में कई उतार चढ़ाव आने बाकी है। अपने हर निर्णय से चौकाने वाले पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी न जाने हिमाचल में कौन सा दांव खेल दे।
