चीड़ की पत्तियों से बनेगा इथनॉल
भविष्य में चीड़ की पेड़ों से गिरी हुई पत्तियाँ परेशानी नहीं बनेगी बल्कि इसे ईंधन बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। डॉ यशवंत सिंह परमार औदयानिकी एवं वानिकी विश्वविद्याल, नौणी के बेसिक साइन्स विभाग के वैज्ञानिक पिछले करीब दो वर्षों से इस विषय पर अनुसंधान कर रहे है। अब तक गन्ना व चावल से इथनॉल तैयार होता है। विश्वविद्यालय के विज्ञानियों का कहना है कि इस तकनीक को भविष्य में पराली पर भी इस्तेमाल किया जाएगा। इस तकनीक के विकसित होने से एथनाल बनाने के लिए खाद्य पदार्थों पर निर्भरता कम हो जाएगी। विवि के पीआरओ सुचेत अत्री ने बताया कि वर्तमान में एथानॉल गन्ना, चावल आदि जैसे खाद्य प्रदार्थों से बनाया जाता है। जबकि इस परियोजना में जैविक अपशिष्ट का इस्तेमाल कर इथनॉल बनाने पर महत्वपूर्व कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस परियोजना में अब तक इस अप्रयुक्त वन अपशिष्ट से ईंधन ग्रेड इथेनॉल का उत्पादन करने के लिए एक नई तकनीक विकसित करने का काम पूरा किया जा चुका है।
यह है इथनोल बनाने की प्रक्रिया
इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से विशेष माइक्रोब का इस्तेमाल कर प्रतिरोधी पत्तियों को घोल दिया जाता है और इसका किण्वन(जैव-रासायनिक क्रिया) का मानकीकरण कर इथेनॉल में बदल दिया जाता है। भारत सरकार की वर्ष 2025 तक वाहनों को चलाने के लिए पेट्रोल में 20% इथेनॉल का सम्मिश्रण पर स्विच करने के लक्ष्य से इस परियोजना को आने वाले भविष्य में अधिक मांग वाली नवीन प्रौद्योगिकी के रूप में देखा जाएगा। हिमाचल सरकार ने भी अभी हाल ही में एक इथनॉल प्लांट लगाने का निर्णय लिया है। विवि के इस अनुसंधान से चीड़ की पत्तियों का पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन का मार्ग मिलेगा और यह न केवल इस जैविक अपशिष्ट के उचित निपटान में मदद करेगा बल्कि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी योगदान देगा क्योंकि एथानॉल बनाने के लिए खाद्य पदार्थों पर निर्भरता कम हो जाएगी। कोविड -19 महामारी के कारण इस परियोजना की प्रगति पर असर पड़ा है। बावजूद इसके जीबीपंत राष्ट्रीय संस्थान के निदेशक द्वारा इस प्रोजेक्ट में किए जा रहे कार्य की सराहना की गई है। परियोजना के अंतिम वर्ष में इस नवीन प्रौद्योगिकी को सफलतापूर्वक उद्योग में स्थानांतरित करने के लिए वित्त पोषण एजेंसी के साथ प्रौद्योगिकी के सत्यापन पर कार्य किया जाएगा।
दो चरण की है प्रक्रिया
इस माध्यम से एथनाल प्राप्त करने के लिए दो चरणों की प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। पहले चरण में पत्तियों को सूक्ष्मजीवों की मदद से तोड़कर सेल्यूलोज (कार्बोहाइड्रेट) अलग किया जाता है और शुगर की फार्म में लाया जाता है। दूसरे चरण में शुगर से इथनॉल बनाया जाता है। यह इथेनाल वैसा ही होगा जैसा चावल व गन्ने से तैयार किया जाता है। विश्वविद्यालय के निदेशक, अनुसंधान डा. रविंद्र शर्मा ने बताया कि आने वाले वर्षों में इथनॉल का ईंधन के तौर पर उपयोग महत्वपूर्ण होता जाएगा। यह प्रदूषण कम करने मे भी सहायक होगा।
प्रदूषण नियंत्रण में सहायक है इथनॉल
इथनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है। इथनॉल के इस्तेमाल से वाहन से कार्बन मोनोआक्साइड उत्सर्जन 35 फीसद कम होता है। यह सल्फर डाइआक्साइड को भी कम करता है। इसमें 35 फीसद आक्सीजन होती है और इससे नाइट्रोजन आक्साइड उत्सर्जन में कमी आती है। इथनॉल को पेट्रोल में मिलाकर गाडिय़ों में ईंधन की तरह प्रयोग किया जा सकता है।
इथेनॉल के लिए तीन प्लांट मंजूर
बाईट कुछ माह पूर्व केंद्र सरकार की तरफ से हिमाचल प्रदेश के लिए इथेनॉल के 3 प्लांट मंजूर हुए हैं। इससे प्रदेश में 600 करोड़ रुपए का निवेश होगा। इसके लिए केंद्र सरकार की तरफ से हिमाचल प्रदेश की 3 कंपनियों को शॉर्ट लिस्ट किया है। इस प्लांट को लगाए जाने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से नई गाइडलाइन जारी की गई है। इसके तहत कंपनी को 5 फीसदी का शेयर ही लगाना होगा, जबकि शेष 95 फीसदी की फंडिंग बैंक से लिए जाने वाले ऋण से होगी। केंद्र सरकार की ओर से देश के 4 राज्यों के लिए इस तरह के पलांट मंजूर किए गए हैं, जिनमें से हिमाचल भी शामिल है। हिमाचल प्रदेश में 2 प्लांट कांगड़ा जबकि 1 प्लांट सोलन जिले में स्थापित किया जाएगा। इसमें से पहले प्लांट की क्षमता 1250 किलोलीटर, दूसरे की 150 किलोलीटर और तीसरे की क्षमता 200 किलोलीटर प्रतिदिन होगी। इससे प्रदेश में युवाओं को सीधे तौर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे।
सुलगते जंगलों से मिली शोध की प्रेरणा
विश्वविद्यालय के बेसिक साइंस विभाग की अध्यक्ष डा. निवेदिता शर्मा इस परियोजना की मुख्य अन्वेषक हैं। अनुसंधान कार्य में रिसर्च एसोसिएट डा. निशा शर्मा ने भी साथ दिया। डा. निवेदिता ने बताया कि वह दो साल से इस पर शोध कर रही हैं। वनों की आग की घटनाओं से चिंतित होकर उन्हेंं शोध की प्रेरणा मिली, क्योंकि वनों की आग का एक बड़ा कारण नीचे गिरी चीड़ की पत्तियां भी हैं। उनका कहना है कि वह पेट्रोलियम पदार्थों के दोहन विषय पर भी कई कार्यशालाओं में भाग ले चुकी हैं, वहां से भी काफी प्रेरणा मिली।
