बंदरों पर लगाम की फंडिंग बंद, बढ़ सकता है आबादी का खतरा
हिमाचल प्रदेश: प्रदेश में बंदरों की बढ़ती समस्या पर नियंत्रण के लिए चलाया जा रहा नसबंदी अभियान अब फंडिंग की चुनौती से जूझ रहा है। वन विभाग के अनुसार, पहले बंदरों की नसबंदी के लिए CAMPA से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब विभाग को इस अभियान को जारी रखने के लिए वैकल्पिक फंडिंग की तलाश करनी पड़ रही है।
नसबंदी अभियान बंद होने या इसकी रफ्तार कम होने से भविष्य में बंदरों की आबादी को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि बंदरों की संख्या तुरंत बढ़ जाएगी। इसका असर नसबंदी की गति, प्रजनन दर और अन्य आबादी नियंत्रण उपायों पर निर्भर करेगा।
हिमाचल में वर्ष 2007 से बंदर नसबंदी कार्यक्रम चलाया जा रहा है। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक अब तक करीब 1.86 लाख बंदरों की नसबंदी की जा चुकी है। इसके चलते प्रदेश में रीसस मकाक की आबादी में लंबे समय में गिरावट दर्ज की गई है। 2004 में अनुमानित आबादी करीब 3.17 लाख थी, जो 2020 में घटकर 1.36 लाख रह गई।
हाल के वर्षों में अभियान की रफ्तार जरूर प्रभावित हुई है। 2024-25 में 8,800 बंदरों की नसबंदी का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन केवल 2,284 बंदरों की नसबंदी हो सकी। इसके पीछे फंडिंग के साथ-साथ बंदरों को पकड़ने और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी दिक्कतें भी सामने आई हैं।
फिलहाल वन एवं वन्यजीव विभाग ने प्रदेश के सभी सात नसबंदी केंद्रों को चालू रखने का फैसला किया है। इन केंद्रों के जरिए बंदरों की आबादी को नियंत्रित करने और मानव-बंदर संघर्ष को कम करने की कोशिश जारी रखने की बात कही गई है।
विभाग के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इन केंद्रों और नसबंदी अभियान के लिए लगातार फंडिंग, स्टाफ और तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराना है। 2024 में बंदरों की आबादी का नया सर्वे भी कराया गया था, जिसके आंकड़ों का इस्तेमाल आगे की रणनीति तय करने में किया जाएगा।
