सुध लो सरकार, सितम अब ये महंगाई करे
'तीन चौथाई से ज़ाइद हैं जो आबादी में, उन के ही वास्ते हर भूक है महँगाई है'... उबाल खाती महंगाई के इस दौर में मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली के ये शेर आम आदमी की व्यथा है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान केंद्र सरकार द्वारा डीजल-पेट्रोल व रसोई गैस के साथ ही अन्य आवश्यक जीवनोपयोगी वस्तुओं के कसकर बांध कर रखे गए दाम अब आम जनता की जेब ढीली करने के लिए खुले छोड़ दिए गए हैं। गैराज से लेकर रसोई तक, रोजमर्रा की जरुरत का हर सामान महंगा होता जा रहा है। कभी पेट्रोल डीज़ल, कभी रसोई गैस तो कभी खाद्य सामग्री की बढ़े दाम आम आदमी का बीपी बढ़ा रहे है। रोटी- कपड़ा- मकान सब महंगा है, नहीं बढ़ रही तो बस आम आदमी की आमदनी।
उधर सरकार फिर वहीँ पुराना तर्क रटने व दोहराने में लगी है कि इनमें कम से कम डीजल-पेट्रोल व रसोई गैस की मूल्यवृद्धि में अब उसकी कोई भूमिका ही नहीं है, क्योंकि उनके निर्धारण का अधिकार तेल कंपनियों के पास है। साथ ही सरकार वैश्विक हालात को महंगाई का कारण बता रही है। वहीं विपक्ष द्वारा महंगाई को मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही। पक्ष - विपक्ष के बीच तर्क- वितर्क जारी है और आम आदमी राहत के इंतज़ार में अपनी जेब खाली होती देखता जा रहा है। देश में दूध व खाद्य तेल वगैरह के दाम पांच राज्यों में मतदान के फौरन बाद ही बढ़ गए थे। अब सब्जियां भी महंगी हो रही है और रूस-यूक्रेन युद्ध से पैदा हुए संकट के बहाने डीजल-पेट्रोल व रसोई गैस के दाम भी बेतहाशा बढ़ा दिए गए हैं। घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दामों में एक झटके में 50 रुपए की बढ़ोतरी कर दी गई है, जिसके बाद कई शहरों में उसकी कीमत एक हजार के आसपास या पार पहुंच गई है। जबकि कमर्शियल एलपीजी गैस के दाम में 250 रुपये की बढ़ोत्तरी की गई है। इसी तरह पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी का जो सिलसिला चुनावी गहमागहमी वाले 137 दिनों के बाद शुरू हुआ है, इस बात की पूरी आशंका है कि वह इस साल के अंत में प्रस्तावित अगले विधानसभा चुनावों तक जारी रहे। बहरहाल, पिछले कुछ समय से रोजमर्रा की जरूरतों के सामान की कीमतें आम लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं। ऐसे में सरकार की कोशिश यह होनी चाहिए थी कि वह लोगों को महंगाई से राहत दिलाने के लिए ऐसे उपाय निकाले, ताकि आम आबादी के बीच आय और खर्च को लेकर संतुलन बना रहे।
कांग्रेस का नारा, 'चुनाव खत्म लूट चालू' ..
'चुनाव खत्म लूट चालू' ..कांग्रेस इन दिनों इसी नारे को भुनाने की पूरी कोशिश कर रही है। कांग्रेस द्वारा देशव्यापी ‘महंगाई मुक्त भारत’ अभियान शुरू किया गया है। पुरे देश में धरने प्रदर्शन किये जा रहे है, सरकार को नाकामियों का एहसास दिलवाने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस के बड़े -बड़े नेता भी सड़कों पर उतर आए है। कोंग्रेसियों द्वारा ज़ोर तो पूरा लगाया जा रहा मगर देश की प्रबुद्ध जनता इस अभियान पर विभिन्न विचार रखती है। कुछ लोग इस अभियान को कांग्रेस की विफलता को सफलता में बदलने की नाकाम कोशिश बता रहा है, तो कुछ को ये मौजूदगी बरकरार रखने की कोशिश दिखाई देती है।
इसलिए खौल रहे खाद्य तेलों के दाम :
भारत दुनिया में खाद्य तेल का सबसे बड़ा आयातक है। आंकड़ों की बात करें तो भारत खाद्य तेलों की अपनी कुल खपत का लगभग 56 फीसदी हिस्सा विदेशों से मंगाता है। इसमें सोयाबीन के तेल से लेकर सूरजमुखी और पाम ऑयल जैसे तमाम खाद्य तेल शामिल हैं जिन्हें इंडोनेशिया से लेकर मलेशिया, रूस, यूक्रेन समेत दक्षिण अमेरिका के अर्जेंटीना जैसे देशों से आयात किया जाता है। खाद्य तेलों की कीमतें बढ़ने का एक बड़ा कारण दुनिया में बढ़ते बायोडीज़ल के उपयोग को भी माना जाता है। कई देशों में बी 15, कई में बी 20 और बी 30 बायोडीज़ल का इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में खाद्य तेल की मांग बढ़ती जा रही है जबकि उत्पादन इस रफ़्तार से नहीं बढ़ रहा है। वहीं रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध की वजह से भारतीय व्यापारियों ने बेहद ऊंची कीमतों पर रूसी निर्यातकों से सूरजमुखी का तेल ख़रीदने के लिए करार किया है जो की दाम बढ़ने के कई कारणों में से एक है।
पेट्रोल - डीजल दाम : दिख रहा रूस- यूक्रेन युद्ध का असर
देश में पेट्रोल और डीज़ल के दामों में भी आग लगी हुई है। दरससल दुनिया में सऊदी अरब, रूस और अमेरिका में तेल का सबसे ज्यादा उत्पादन होता है। यूरोप के अधिकतर देशों को तेल भी रूस से ही मिलता है। सऊदी अरब के बाद रूस विश्व में कच्चा तेल निर्यात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। अब भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी तेल विश्व के दूसरे देशों से आयात करता है। इसमें भारत अधिकतर तेल खाड़ी देशों से और कुछ तेल अमेरिका से लेता है। रूस से भारत अपनी जरूरत का एक प्रतिशत से भी कम तेल आयात करता है। इस बीच अब रूस- यूक्रेन युद्ध में दोनों देशों के एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें प्रभावित हो रही हैं। साथ ही यूक्रेन पर आक्रमण के बाद यूरोपीय संघ ने रूस से तेल और गैस के आयात की मात्रा में कमी करने का फैसला लिया है। तो दूसरी ओर ब्रिटेन और अमेरिका ने भी रूस से तेल और गैस लेने पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है।
