क्या मध्य प्रदेश से प्रेरित है हिमाचल में सवर्ण समाज का हल्ला बोल
प्रदेश में सवर्ण आयोग के गठन को लेकर एक बड़ा तबका लामबंद है। हाल ही में हुए उपचुनाव में सवर्ण समाज ने नोटा दबाने की अपील की थी और इसका असर भी दिखा था। अब सवर्ण आयोग के गठन को लेकर विधानसभा का घेराव हुआ और सरकार झुक गई। विधानसभा चुनाव को एक साल से भी कम का वक्त रह गया है और ऐसे में ये आंदोलन लगातार प्रखर होता दिख रहा था। देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा के संयुक्त तत्वावधान में चल रहा ये आंदोलन सियासत के लिहाज से भी बेहद असरदार दिखा। ऐसा ही एक आंदोलन 2018 के विधानसभा चुनाव से पूर्व मध्य प्रदेश में भी देखने को मिला था। हालांकि दोनों में पूरी तरह समानता नहीं है, दोनों प्रदेशों के सियासी समीकरण भी इतर है, फिर भी जो कुछ हिमाचल में चल रहा है उसे बेहतर तरीके से समझने के लिए मध्य प्रदेश में सवर्ण समाज के आंदोलन पर नज़र डालना जरूरी है।गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में भी सवर्ण आयोग के गठन की मांग लगातार उठ रही थी और इसी वर्ष 26 जनवरी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सवर्ण आयोग के गठन का एलान किया था। बहरहाल 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले जो कुछ मध्य प्रदेश में हुआ वो जरूर सियासतगरों के जहन में होगा। हिमाचल में सवर्ण आयोग गठन के लिए जारी आंदोलन मध्य प्रदेश के आंदोलन से प्रेरित बताया जा रहा है। खासतौर से उपचुनाव में जिस तरह नोटा को लेकर मुहीम छेड़ी गई थी उसके बाद से ही जानकार इस आंदोलन को हल्का लेने की भूल नहीं कर रहे। बेशक सवर्ण आयोग गठन का सरकार ने ऐलान कर दिया हो लेकिन जानकार मानते है कि सियासी पिक्चर अभी बाकी है।
वर्ष 2018 में एससी/एसटी संशोधन विधेयक संसद से पारित हुआ और सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश निरस्त कर दिया गया जहां उसने इस कानून के तहत बिना जांच गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। देशभर में सवर्ण समाज में इसे लेकर रोष था, पर इसका ज्यादा प्रभाव दिखा मध्य प्रदेश में। दिसंबर 2018 में ही मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी होने थे सो जाहिर है चुनावी बेला में असर भी ज्यादा दिखा। सामान्य पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था (सपाक्स) के बैनर तले मध्य प्रदेश में तब शिवराज सरकार को विरोध का सामना करना पड़ा। विरोध कांग्रेस का भी हुआ, पर सत्ता पर भाजपा काबिज थी तो नुक्सान भी उसका ही ज्यादा माना गया। यूँ तो तब मध्य प्रदेश के साथ-साथ उससे जुड़े राज्यों छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव थे लेकिन विधेयक के खिलाफ जो माहौल मध्य प्रदेश में था वो अन्य राज्यों में नहीं दिखा। दरअसल मध्य प्रदेश में इसकी पटकथा लगभग वर्ष 2016 में ही लिखी जा चुकी थी जब शिवराज सिंह ने पदोन्नति में आरक्षण के मसले पर एक मंच से कहा था, ‘मेरे जिंदा रहते कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता।’ शिवराज के इस बयान ने न सिर्फ सवर्ण वर्ग को नाराज किया बल्कि ओबीसी और अल्पसंख्यक भी उनके खिलाफ खड़े हो गए। नतीजतन तीनों वर्ग के कर्मचारियों ने मिलकर सपाक्स का गठन किया और शिवराज सरकार का विरोध शुरू कर दिया। देखते-देखते ये संगठन इतना मजबूत हो गया कि विधानसभा चुनाव में हर सियासतगार की नज़र इस पर टिक गई। ख़ास बात ये है कि पहले सपाक्स केवल पदोन्नति में आरक्षण के खिलाफ था, पर समय के साथ उसके एजेंडे में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का मुद्दा भी जुड़ गया। ऐसे में जब वर्ष 2018 में एससी/एसटी संशोधन विधेयक के विरोध की बारी आई तो सपाक्स भी समर्थन में उतर आया।
सपाक्स ने लड़ा था चुनाव, क्या हिमाचल में भी ऐसा होगा
सपाक्स के विरोध की बिसात पर मध्य प्रदेश में पर्दे के पीछे से सियासी दल भी अपनी-अपनी जमीन तैयार कर रहे थे। रोचक बात ये है कि इस मुद्दे को आधार बनाकर चुनाव मैदान में उतरी सपाक्स पार्टी कोई चमत्कार नहीं दिखा सकी थी। पार्टी ने 109 विधानसभा सीटों से प्रत्याशी उतारे थे, वे जीतना तो दूर वोट भी नहीं काट सके। इनमें से अधिकांश की जमानत जब्त हुई थी और पार्टी को प्रदेश में महज (0.4 फीसदी) वोट मिले थे। खैर विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता में लौटी, पर सवाल ये है कि क्या सपाक्स के विरोध का फायदा कांग्रेस को हुआ था या भाजपा को, या ये कोई असर नहीं दिखा सकी। प्रत्यक्ष तौर पर मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में आरक्षण का मुद्दा बेअसर साबित हुआ था और जनता ने इस मुद्दे पर हुई राजनीति को नकार दिया था। पर जो माहौल सपाक्स ने बनाया था उससे शिवराज सरकार के खिलाफ बन रही एंटी इंकम्बेंसी लहर को निसंदेह मजबूती मिली, यानी मान सकते है कि तब फायदा कांग्रेस को हुआ। वहीं हिमाचल प्रदेश की बात करें तो देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा अब तक खुद को मुख्यधारा की राजनीति से दूर बताते रहे है। ये संगठन दोनों ही मुख्य राजनैतिक दलों के खिलाफ खुलकर बोलते है। सिर्फ विक्रमादित्य सिंह को लेकर ही इनका सॉफ्ट कार्नर दिखता है। अलबत्ता सवर्ण आयोग के गठन को हिमाचल सरकार ने मंजूरी दे दी है लेकिन माहिर मानते है कि चुनावी साल में सवर्ण समाज के नाम पर सियासत होना तय है। माना जा रहा है कि ये संगठन खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे, क्यों कि मध्यप्रदेश में सपाक्स के साथ जो हुआ वो इनके जहन में जरूर होगा। दूसरा सिर्फ सवर्ण समाज की बात करके व्यापक तौर पर मुख्यधारा की सियासत प्रायोगिक नहीं है।
मध्य प्रदेश में भी नोटा था असरदार
मध्य प्रदेश की 22 सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा नोटा दबाया गया था और इनमें से अधिकांश भाजपा हारी थी। सवर्ण समाज का वोट भाजपा के साथ माना जाता है और यदि ये नोटा सवर्ण समाज का था तो निसंदेह इसमें भाजपा का ही घाटा रहा। वहीँ ये भी समझा जा सकता है कि हिमाचल प्रदेश में बीते दिनों हुए उपचुनाव में जिस तरह नोटा को लेकर अभियान चलाया गया उसके पीछे मध्य प्रदेश से लिया गया सबक है। यदि सवर्ण आयोग के गठन के लेकर ये आंदोलन ज़ारी रहा तो संभवतः आगामी विधानसभा चुनाव में भी नोटा के इस्तेमाल को ही हथियार बनाया जा सकता है।
