जयपुर फुट : वो आविष्कार जिसने संवार दी लाखों जिंदगियां
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कई हादसे इंसान को अपाहिज बना देते है। जिंदगी की कीमत मरीज के किसी अंग को, खासतौर से पैर या हाथ काटकर चुकानी पड़ती है। ऐसे में मरीज़ को पूरी जिंदगी बोझ बन जाती है। ऐसे ही मरीजों की जिंदगी को सबल करने का काम किया है 'जयपुर फुट' ने। जयपुर फुट रबर से बना कृत्रिम पैर है जो ऐसे व्यक्तियों के लिये उपयुक्त है जिनका पैर कहीं घुटने के नीचे से क्षतिग्रस्त या कटा हुआ हो। डॉ प्रमोद करण सेठी के मार्गदर्शन में श्री रामचंद्र शर्मा द्वारा वर्ष 1969 में इसका विकास किया गया था। ये जयपुर फुट लाखों ऐसे लोगों की जिंदगी बदल चुका है जो किसी हादसे में अपना पांव गवां बैठे हो।
जयपुर फुट का आविष्कार करने वाले डॉ प्रमोद करण सेठी भारत के बेस्ट सर्जनों में से एक थे और उनका बनाया ये जयपुर फुट कई निराश लोगों की जिंदगी में खुशियां भर गया। डॉ सेठी सर्जन थे और वो जो काम करते थे उसमें कई मरीजों के अंग खासतौर पर पैर या हाथ किसी न किसी कारण से काटने पड़ते थे। इससे निजी तौर पर उन्हें काफी पीड़ा होती थी। डॉ सेठी ने इन लोगों की मदद के लिए एक स्थानीय अनुभवी कारीगर रामचंद्र की सहायता से एक बेहद पुरानी तकनीक के सहारे तैयार किया ‘जयपुर फुट’। इस सफलता के बाद डॉ. प्रमोद करण सेठी को ‘द मास्टर क्राफ्ट्समैन ऑफ़ सर्जरी’ कहा जाने लगा।
डॉ पी.के सेठी का जन्म 1927 में हुआ था। उनके पिता डॉक्टर एन. के. सेठी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर हुआ करते थे। आगरा के सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज से पी.के सेठी अपनी एमबीबीएस की डिग्री ली और इसके बाद उसी कॉलेज से डॉ. डी.जी.एन. व्यास की देखरेख ने एम.एस. किया। आर्थोपेडिक्स उनका स्पेशलाइज सब्जेक्ट था। अपनी पढ़ाई के बाद डॉक्टर सेठी ने एक सर्जन के रूप में साल 1954 में जयपुर के जाने माने सवाई मानसिंह अस्पताल में अपनी सेवा शुरू की। डॉ. पीके सेठी के ऑर्थोपेडिक सर्जन बनने का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है। कहते हैं इंडियन मेडिकल काउंसिल की एक टीम सवाई मान सिंह हॉस्पिटल में इंस्पेक्शन के लिए आनी थी और अस्पताल मैनेजमेंट को ऑर्थोपेडिक सर्जन की सख्त जरूरत थी। इसके चलते डॉ. पीके सेठी को ऑर्थोपेडिक सर्जन के हेड ऑफ डिपार्टमेंट के तौर पर काम करने के लिए कहा गया। डॉ. सेठी ने पदभार संभाला और अपने काम में फिजियोथेरेपी का सहारा लेने लगे। कई मरीज ऐसे होते थे जो एक्सीडेंट या गैंग्रीन आदि की वजह से अपने अंग खो दिया करते थे और यहीं से डॉ. सेठी का दिमाग नकली पैर बनाने की ओर गया। दिलचस्प बात ये है कि इस काम में उनका सहयोगी बने रामचंद्र शर्मा, जो बढ़ई थे। रामचंद्र शर्मा पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन बेहद कुशल थे और उनकी कुशलता और डॉ पीके सेठी के दिमाग के सामंजस्य से ही जयपुर फुट की कल्पना साकार हो पाई।
जयपुर फुट के आविष्कार की कहानी बेहद दिलचस्प है। कहते है एक बार डॉ. पीके सेठी के सहयोगी रामचंद्र शर्मा साइकिल से अस्पताल जा रहे थे और रास्ते में उनकी साइकिल पंक्चर हो गई। पंक्चर ठीक कराने वो एक दुकान पर पहुंचे और जब दुकानदार पंचर बना रहा था तो रामचंद्र की नजर टायर पर पड़ी। उनके मन में एक विचार आया और अस्पताल से डॉ. पीके सेठी को लेकर वापस पंक्चर की दुकान पर पहुंचे। डॉ. सेठी ने अपना दिमाग लगाना शुरू किया और थोड़ी देर में ही वे एक मरीज को भी वहां ले आए और उसकी नाप का टायर कटवाया। डॉ. सेठी के दिमाग और रामचंद्र की कारीगरी के बूते टायर से आर्टिफिशियल पैर बनाया गया। धीरे - धीरे इसी में निरंतर सुधार किया गया और वर्ष 1969 में जयपुर फुट की कल्पना साकार हुई।
रबड़ और लकड़ी के इस्तेमाल से बनता है जयपुर फुट :
जयपुर फुट बनाने में रबड़ और लकड़ी का इस्तेमाल होता है। इसको दुनिया में सबसे सस्ता और बेहतरीन प्रोस्थेटिक लिंब माना जाता है। इससे कई लोगों को एक नई जिंदगी मिली है। कारगिल युद्ध में घायल हुए जवानों से लेकर खेतों में काम करने वाले किसानों तक को इसका लाभ मिला है क्यों कि यह पहनने में जितना आसान है उतना ही सस्ता भी। प्रसिद्ध नृत्यांगना व एक्ट्रेस सुधा चंद्रन अपनी एक पैर खोने के बाद भी ‘जयपुर फुट के कारण ही डांस कर पाती हैं। इंटरनेशनल रेड क्रॉस सोसाइटी ने अफगानिस्तान में और भारत में कारगिल वार के दौरान अपने सैनिकों को ऐसे ही आर्टिफिशियल लिंब मुहैया कराए थे।
टाइम ने लिखा था '28 डॉलर का पैर' :
प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन ने साल 2000 में जयपुर फुट पर '28 डॉलर का पैर’ नाम से प्रिंट स्टोरी की थी। टाइम ने लिखा था कि दुनिया भर के जंग के मैदानों, मसलन अफगानिस्तान और रवांडा के लोगों ने चाहे न्यूयॉर्क- पेरिस का नाम न सुना हो, लेकिन वो जयपुर का नाम जानते हैं। ये शहर अपने आर्टिफिशियल पैर के लिए दुनिया भर में फेमस है। टाइम ने जयपुर फुट की मोबिलिटी और इसके हल्केपन पर विस्तार से लिखा था। टाइम ने लिखा था कि जयपुर फुट पहनकर न सिर्फ दौड़ सकते हैं बल्कि पेड़ पर भी चढ़ सकते हैं। अमेरिका में इस तरह का प्रोडक्ट बनाने में हजारों डॉलर लग सकते हैं, मगर भारत में इसकी लागत केवल 28 डॉलर है। वर्तमान में भी जयपुर फुट की लागत करीब 40 डॉलर के आसपास है।
दुनिया ने देखा सुधा चंद्रन का कमाल :
बॉलीवुड अभिनेत्री और जानी मानी डांसर सुधा चंद्रन ने एक हादसे में अपना पैर गंवा दिया था। इस हादसे के बाद सुधा ने जयपुर फुट का इस्तेमाल किया। सुधा ने न सिर्फ फिल्मों में वापसी की बल्कि बतौर डांसर भी मंच पर लौटी। उनके जीवन पर फिल्म ‘नाचे मयूरी’ बनी हैं जिसमें उन्होंने खुद काम किया है। आज भी सुधा अपने उसी प्लास्टिक के पैर के साथ डांस करके बड़े-बड़े सूरमाओं को मात दे रही हैं।
साइकिल चलाना भी संभव :
लागत कम रखने के लिए जयपुर फुट रबर और लकड़ी से बना है। यह समग्र कार्बन फाइबर वेरिएंट जितना टिकाऊ नहीं है, लेकिन फिर भी यह बहुत अच्छा है। जयपुर फुट आमतौर पर लगभग तीन साल तक रहता है। उसके बाद आपको एक नया फिट करवाना होगा। जयपुर फुट का उपयोग करने वाले लोग दौड़ सकते हैं, नृत्य कर सकते हैं, पेड़ों पर चढ़ सकते हैं, साइकिल चला सकते हैं और अन्य अधिकांश गतिविधियां कर सकते हैं।
- दुनिया में सबसे ज्यादा लोगों को उनके पैरों के सहारे दोबारा चलने के काबिल बनाने के लिए डॉ. पीके सेठी का नाम गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है।
- 1981 में डॉ. पीके सेठी को पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
- डॉ. पीके सेठी को साल 1981 में कम्युनिटी लीडरशिप के लिए रेमन मैग्सेसे अवार्ड मिला
- साल 2008 की 6 जनवरी को 80 साल की उम्र में उनका देहांत हुआ।
- जयपुर में आज उनके काम को भगवान महावीर विकलांग सेवा समिति आगे बढ़ा रही है। ये समिति दिव्यांगों को निशुल्क जयपुर फुट मुहैया करवाती है। भगवान महावीर विकलांग सेवा समिति की स्थापना देवेंद्र राज मेहता ने 1975 में की थी।
- अभिनेत्री सुधा चंद्रन ने जयपुर फुट के साथ अपनी तेलुगु फिल्म मयूरी (1981) में नृत्य किया था। यह फिल्म नाचे मयूरी (1984) शीर्षक के साथ हिंदी में बनाई गई थी। इस फिल्म ने जयपुर फुट को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- जयपुर फुट वाटरप्रूफ है और यह जूते के साथ या बिना पहना जा सकता है।
- जयपुर फुट का सामान्य जीवनकाल लगभग 3 वर्ष है।
- जयपुर फुट हल्का है। आम तौर पर एक कृत्रिम अंग का कुल वजन 1.3 किलोग्राम और 1.5 किलोग्राम के बीच होता है। ये व्यक्ति के आकार और कद काठी पर निर्भर करता है।
ऐसे प्राप्त करें जयपुर फुट :
भगवान महावीर विकलांग सेवा समिति में सबसे पहले आपको अपना पंजीकरण कराना होता है। इसके बाद विशेषज्ञ विकलांगता की सीमा का आकलन करते हैं। इसके बाद तय किया जाता है कि किस प्रकार का ऑर्थोसिस मरीज के लिए सबसे उपयुक्त होगा। ढलाई ऑर्थोसिस के लिए स्टांप भाग बनाने के लिए, रोगी के पैर से प्लास्टर ऑफ पेरिस कास्ट बनाया जाता है। फिटिंग और ट्रायल जब पूरा प्रोस्थेटिक लेग तैयार हो जाता है, तो इसे मरीज के पैर में लगाया जाता है। फिर मरीज नए पैर की कोशिश करता है। यदि रोगी को नए बने जयपुर फुट के साथ चलने में किसी भी परेशानी का सामना करना पड़ता है, तो समायोजन वहां और उसके बाद किया जाता है। यह सब मुफ़्त है। भगवान महावीर विकलांग सेवा समिति निसंदेह मानवता की सेवा में अपना बेहतरीन योगदान दे रही है।
वेबसाइट – https://www.jaipurfoot.org
पता : महावीर सेवा समिति जयपुर – भगवान महावीर विकास सहयोग समिति
13 ए, गुरुनानक पथ मुख्य मालवीय नगर जयपुर 302017
राजस्थान, भारत
दूरभाष: 91-0141-2520485 / 2522406/2523103/4001519
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लैंडलाइन – 0712- 2544342
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