किन्नौर : दोनों तरफ बराबर लगी है गुटबाजी और अंतर्कलह की आग
पहाड़ी जिले किन्नौर में सियासी ताप हमेशा हाई रहता है। यूँ तो इस जिले में सिर्फ एक विधानसभा सीट है, लेकिन बावजूद इसके ये हमेशा चर्चा में रहा है। हल्के सियासी वजन वाले इस जिला में गुटबाजी हमेशा भारी रही है। गुटबाजी और अंतर्कलह की ये आग किसी एक दल में नहीं, अपितु दोनों तरफ बराबर लगी है। इस बार भी विधानसभा चुनाव से पहले ही दोनों ओर से अंतर्कलह से रुझान आने शुरू हो गए है।
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के तेजवंत सिंह नेगी काे कांग्रेस के जगत सिंह नेगी से पराजित हाेना पड़ा। अब प्रदेश में एक बार फिर विधानसभा चुनाव की हलचल शुरू हो चुकी है और जिला किन्नौर में भी सियासत परवान पर है। बीते दो चुनाव में यहाँ कांग्रेस विजयी हुई है और दोनों मर्तबा जगत सिंह नेगी ही कांग्रेस का चेहरा रहे है। अब जगत सिंह नेगी और कांग्रेस दोनों की निगाहें हैट्रिक पर है, तो वहीं भाजपा वापसी के लिए जद्दोजेहद कर रही है। दोनों ही राजनीतिक दल किन्नौर की एकमात्र विधानसभा सीट पर अपना कब्ज़ा जमाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे है। चुनावी रैलियां, प्रचार, प्रसार, जन सम्पर्क अभियान, किसी में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही। पर दोनों ही राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच चल रहे आपसी मतभेद और मनभेद अब बंद कमरों से निकलकर सार्वजानिक मंच तक पहुँच चुके है। ज़ाहिर है किन्नौर में जीत का मंत्र सिर्फ और सिर्फ आपसी अंतर्कलह को साधना ही होगा। जिसने भी अंतर्कलह को साध लिया उसकी नैया पार समझो।
जगत सिंह का टिकट लगभग तय, अंतर्कलह से पार पाना चुनौती
कांग्रेस के दिग्गज लगातार दोहरा रहे है कि कांग्रेस में न टिकट को लेकर कलह है और न मुख्यमंत्री की कुर्सी का मोह, बस फिक्र है कि पहले सत्ता का वनवास खत्म हो। हाथ का निशान सबसे ऊपर होगा और सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ा जायेगा। मगर जनता के सामने एकजुटता के कसीदे पढ़ने वाली कांग्रेस की असल स्थिति क्या है, इसकी झलकी हाल ही में किन्नौर में ही देखने को मिली थी। बीते दिनों प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह जब किन्नौर पहुंची तो स्थानीय विधायक और युवा कांग्रेस के समर्थक उनके सामने ही आपस में लड़ पड़े। लड़ाई इतनी ज्यादा बढ़ गई पुलिस को बीच में दखल देना पड़ा। किन्नौर विधायक जगत सिंह नेगी ने मंच से अपने संबोधन में यूथ कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष निगम भंडारी और यूथ किन्नौर कांग्रेस को जमकर खरी खोटी सुनाई, उन्हें भाजपा की 'बी' टीम तक कह दिया, उन्हें फर्जीवाड़े का अध्यक्ष बताया। दरअसल जगत सिंह होलीलॉज के करीबी है, तो निगम भंडारी सुक्खू गुट के। निगम भंडारी की बढ़ती सक्रियता जगत सिंह नेगी और उनके समर्थकों को खूब खटक रही है। जगत सिंह का मानना है कि निगम और उनके समर्थक कांग्रेस के होने के बावजूद भी उनके खिलाफ काम करते रहे है। बेहद कम समय में निगम भंडारी एक प्रभावशाली युवा नेता के तौर पर उभरे है और पार्टी का एक तबका चाहता है कि निगम ही आगामी चुनाव में पार्टी प्रत्याशी हो। हालाँकि निगम भंडारी किन्नौर में जगत सिंह नेगी सा रुतबा रखते हो, ऐसा बिलकुल नहीं कहा जा सकता। पर उनकी मौजूदगी को नकारा भी नहीं जा सकता। जाहिर है ये दो गुटों का ये मनभेद कांग्रेस की राह मुश्किल कर सकता है। जहाँ तक टिकट का सवाल है तो जगत सिंह नेगी को कोई चुनौती मिलती नहीं दिखती। साथ ही होलीलॉज से उनकी करीबी भी उनके और कांग्रेस टिकट के बीच की दूरी को कम कर देती है।
सूरत में ही दिख रही भावी प्रत्याशी की 'सूरत', क्या फीका पड़ेगा तेजवंत का 'तेज' !
किन्नौर में भाजपा की स्थिति भी कांग्रेस से इतर नहीं है। यहां भी टिकट को लेकर दो मज़बूत दावेदार मैदान में है। एक पूर्व विधायक तेजवंत सिंह नेगी और दूसरे है सूरत नेगी। 2017 के चुनाव में भी किन्नौर सीट से ये दाे नेता ही टिकट के चाहवान थे। सूरत नेगी ने पिछले चुनाव में टिकट के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन पार्टी हाईकमान ने पूर्व विधायक तेजवंत नेगी पर ही भराेसा जताया। पर सूरत का टिकट कटने के बाद तेजवंत नेगी को हार का मुंह देखना पड़ा। बताया जाता है कि भाजपा में गुटबाजी नहीं हाेती ताे शायद तेजवंत सिंह नेगी इस वक्त विधायक होते। मगर 2017 के बाद से तेजवंत के लिए सियासी समीकरण बदल गए है दरअसल 2017 में विधानसभा में चुनाव लड़ने के बाद तेजवंत सिंह नेगी काे जयराम सरकार ने साइडलाइन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सीएम का फेस बदलने के साथ -साथ किन्नौर भाजपा का फेस भी बदल गया है। जब भाजपा सत्ता में आई ताे तेजवंत समर्थकों को काफी उम्मीदें थी कि बाेर्ड या किसी निगम में उन्हें अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद मिलेगा, मगर उन्हें मायूस होना पड़ा। दरअसल तेजवंत नेगी पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल समर्थक हैं, जबकि सूरत नेगी को जयराम समर्थक माना जाता है। इसी वजह से ही सूरत नेगी काे वन विकास निगम में उपाध्यक्ष की कुर्सी मिली और तेजवंत की झोली खाली रही। अब भी तेजवंत को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी जा रही। इस बार भी तेजवंत और सूरत दोनों ही टिकट की दावेदारी पेश कर चुके है, मगर सियासी माहिर मानते है कि इस बार भाजपा दो बार हार चुके तेजवंत को नहीं बल्कि सूरत नेगी को प्रत्याशी बना सकती है। ऐसे में जाहिर है कि मिशन -2022 से पहले भी भाजपा की गुटबाजी समाप्त होती नजर नहीं आ रही है।
सिर्फ ठाकुर सेन नेगी लगा सके है हैट्रिक :
किन्नौर के चुनावी इतिहास पर नज़र डाले तो अब तक सिर्फ ठाकुर सेन नेगी ही जीत की हैट्रिक लगा सके है। ठाकुर सेन नेगी 1967 से 1982 तक लगातार चार चुनाव जीते। दिलचस्प बात ये है कि वे तीन बार निर्दलीय और एक बार लोकराज पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते। फिर वे भाजपा में शामिल हो गए और एक बार 1990 में भाजपा टिकट से भी जीतने में कामयाब हुए। ठाकुर सेन नेगी के अलावा जगत सिंह नेगी ही इकलौते ऐसे नेता है जिन्होंने लगातार दो चुनाव जीते हो। पर क्या जगत सिंह नेगी हैट्रिक लगा पाएंगे या क्लीन बोल्ड होंगे, ये देखना रोचक होगा।
