सुल्तानपुरी को पटकनी देने को विरोधी खेमे का नया पैंतरा
चुनाव नजदीक है और कसौली निर्वाचन क्षेत्र में फिर पुरानी कहानी दोहराने की तैयारी चल रही है। बीते दो चुनाव के नतीजों पर नजर डाले तो कांग्रेस का हाल एक कहावत से समझा जा सकता है, 'हाथ को आया पर मुँह न लगा'। दोनों मौकों पर कांग्रेस जीतते -जीतते हार गई और दोनों ही बार कारण रहा गुटबाजी और भीतरघात। इन दोनों ही मौकों पर प्रत्याशी थे विनोद सुल्तानपुरी। अब फिर चुनाव से पहले कांग्रेस का एक खेमा सुल्तानपुरी को पटकनी देने की तैयारी कर चूका है। हालांकि विनोद निरंतर सक्रिय भी है और अब उनकी पकड़ भी पहले से ज्यादा मजबूत दिखती है, पर विरोधी भी इस बार नए पैंतरे को आजमाते दिख रहे है। कोशिश है कि टिकट वितरण के स्तर पर ही सुल्तानपुरी को पटकनी दे दी जाएं। इसके लिए बकायदा चेहरा तैयार कर लिया गया है। एक अधिकारी वीआरएस के लिए आवेदन कर चुके है और जुलाई के दूसरे सप्ताह में सेवानिवृत होने जा रहे है। माना जा रहा है कि कांग्रेस का एक धड़ा इन्हीं के नाम को आगे बढ़ाएगा। सुलतानपुरी दो मौकों पर चूक चुके है, इस तथ्य को आलाकमान के समक्ष रखा जायेगा और प्रयास रहेगा कि उन्हें टिकट के स्तर पर ही सेटल कर दिया जाएं।
उधर विनोद सुल्तानपुरी भी तैयार है। पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए विनोद इस बार कोई चूक नहीं करना चाहते। जाहिर है विनोद का इरादा चुनाव लड़ने का है और वो पीछे हटने के मूड में नहीं है। दिल्ली दरबार में उनकी सीधी पहुंच है सो टिकट पर उनकी दावेदारी फिलहाल इक्कीस है। माहिर भी ये ही मानते है कि विरोधियों के तमाम प्रयासों के बावजूद विनोद फिर टिकट लाने में कामयाब होंगे, फिलहाल तो स्थिति कुछ ऐसी ही है।
असल सवाल ये है कि क्या तमाम अंतर्कलह और संभावित भीतरघात के बावजूद विनोद चुनाव जीत पाएंगे, या इस बार फिर इसका लाभ डॉ राजीव सैजल को होगा।
तो फिर कमल खिलाएंगे सैजल :
2012 में सुल्तानपुरी महज 24 वोट से हारे तो 2017 में अंतर 442 वोट का रहा। इन दोनों ही मौकों पर कांग्रेस की अंतर्कलह डॉ राजीव सैजल के लिए संजीवनी सिद्ध हुई। अब डॉ सैजल तीन बार से विधायक है और प्रदेश में भी भाजपा सरकार है, ऐसे में सत्ता विरोधी लहर से उन्हें खतरा हो सकता है। पर यदि कांग्रेस एकजुट नहीं रहती है तो सैजल फिर कमल खिलाने में कामयाब होते दिख रहे है।
