भोरंज अपवाद, बाकि हारते आ रहे है दिवंगतों के पुत्र
इतिहास गवाह है कि हिमाचल में किसी विधायक के निधन के बाद जब भी उनके परिवार के सदस्य काे टिकट मिला ताे अधिकांश मौकों पर हार ही मिली। बीते तीन दशकों में हुए उप चुनाव पर नजर डाले तो सिर्फ 2017 के उप चुनाव में भोरंज सीट से आईडी धीमान के बेटे को जीत नसीब हुई, अन्य मौकों पर दिवंगत विधायकों के पुत्र जीत दर्ज नहीं कर पाए। अब फिर हिमाचल प्रदेश में मंडी संसदीय क्षेत्र और दो विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होने हैं। इसके लिए दाेनाें प्रमुख राजनीतिक दलों ने तैयारियां भी शुरू कर दी है। अब बस चुनाव आयोग से घोषणा का इंतजार है। अब तक हिमाचल में हुए उपचुनाव पर गौर करें ताे पहाड़ के लोग भी मौके को देखते हुए व्यक्ति विशेष को भूलकर नए सिरे से इबारत लिखने में विश्वास रखते हैं। यही कारण है कि जगदेव चंद हों या संतराम, इनके निधन के बाद उपचुनाव में जनता सहानुभूति में नहीं बही। स्व. जगदेव चंद भाजपा के नामी नेताओं में पहचान रखते थे, मगर उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके बेटे नरेंद्र ठाकुर चुनाव हार गए। उस समय अनीता वर्मा ने कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ा और जीती थीं। इसी तरह प. संतराम कांग्रेस के एक ऐसे नेता थे जिन्हें बैजनाथ की जनता कभी नहीं बूल सकती। वर्ष 1998 में संतराम के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके बेटे सुधीर शर्मा को पराजय का मुंह देखना पड़ा था। तब जनता ने दूलो राम को जितवाकर विधानसभा भेजा था। वर्ष 2011 में नालागढ़ सीट से हरिनारायण सिंह सैणी के निधन के बाद उनकी पत्नी गुरनाम कौर भी चुनाव हारी। इसी तरह सिरमौर जिला के रेणुका विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस नेता डा. प्रेम सिंह के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके पुत्र विनय कुमार को हार का मुंह देखना पड़ा था। यहां से प्रशासनिक सेवा की नौकरी छोड़कर हिरदा राम भाजपा टिकट पर विधायक चुने गए थे। इनके अतिरिक्त भी कई ऐसे उदहारण है जहाँ उपचुनाव में जनता ने दिवंगत विधायक के परिवार से ज्यादा सहानुभूति नहीं दिखाई।
उपचुनाव में भी होगी विरासत की सियासत
मंडी लोकसभा उपचुनाव के लिए जहां स्व रामस्वरूप शर्मा के पुत्र शांति स्वरुप टिकट की दौड़ में है, तो वहीँ जुब्बल कोटखाई विधानसभा उप चुनाव के लिए स्व नरेंद्र बरागटा के पुत्र चेतन बरागटा टिकट के प्रबल दावेदार है। इसी तरह फतेहपुर में कांग्रेस भी सुजान सिंह पठानिया के पुत्र भवानी पठानिया को टिकट दे सकती है। भवानी का टिकट भी जानकार पक्का मान रहे है। यानी आगामी तीनों उपचुनाव में दिवंगत नेताओं के पुत्र टिकट के दावेदार है, विशेषकर दोनों विधानसभा उप चुनाव में सहानुभूति फैक्टर को जहन में रखते हुए पार्टियां विरासत की सियासत को तवज्जो दे सकती है। अब यदि दिवंगत नेताओं के इन पुत्रों को टिकट मिला तो क्या जनता की वोट रुपी सहानुभूति भी इन्हें मिलेगी, यह देखना रोचक होगा।
उपचुनाव: जयराम राज में भाजपा अपराजित
किसी विधायक के निधन के अतिरिक्त ज्यादातर किसी मौजूदा विधायक के सांसद बनने की स्थिति में हिमाचल में उपचुनाव होते आये है।1993 से 2017 तक हिमाचल की सत्ता बारी- बारी वीरभद्र सिंह और प्रेम कुमार धूमल के पास ही रही। पर सत्ता में रहते हुए लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में इन दोनों दिग्गजों का प्रदर्शन कुछ ख़ास नहीं रहा। मसलन वर्ष 2004 में वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री थे और लोकसभा चुनाव मैदान में तत्कालीन वन मंत्री प्रो. चंद्र कुमार को उतारा गया। उनकी जगह गुलेर सीट से चंद्र कुमार के पुत्र नीरज भारती ने चुनाव लड़ा और पराजय का मुंह देखना पड़ा था। वहीँ 2009 में जब राजन सुशांत लोकसभा पहुचं गए तो फतेहपुर उप चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा को हार का मुँह देखना पड़ा। इसी तरह वर्ष 2014 में कांग्रेस सत्ता में थी और निर्दलीय चुनाव जीतकर आए राजेंद्र राणा ने विधायक पद छोड़कर कांग्रेस टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा। बाद में हुए उपचुनाव में सुजानपुर से उनकी पत्नी अनीता राणा को कांग्रेस ने टिकट दिया। सुजानपुर की जनता ने अनीता राणा को पराजित करने के साथ हमीरपुर सीट से राजेंद्र राणा को भी हरा दिया। वहीं वर्तमान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की बात करें तो इनके कार्यकाल में 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद दो उपचुनाव हुए। तब पच्छाद विधायक सुरेश कश्यप और धर्मशाला विधायक किशन कपूर लोकसभा पहुंचे थे। इसके बाद हुए उपचुनाव में दोनों सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की।
