हिमाचल प्रदेश में हाशिये पर चल रही पारम्परिक लाल चावल की फसल अब फिर से लहलहाने लगी है। जिस मर चुके लाल चावल की खेती के बारे में सोचना भी मुश्किल था, आज वो लहलहा रही है। विलुप्त हो रही लाल चावल की पारंपरिक खेती की तरफ एक बार फिर किसानों का रुझान बढ़ने लगा है। लाल चावल का उत्पादन सबसे ज़्यादा पहाड़ी क्षेत्रों पर होता है। जून-जुलाई माह में लगाई गई यह फसल अक्टूबर-नवंबर माह में तैयार हो जाती है। लाल चावल की फसल में विशेष पोषाहार तथा औषधीय तत्व हैं जिसके कारण इसकी अधिक मांग रहती है। माना जाता है कि मानव जाति की ओर से अपनी उत्पत्ति के आरंभिक काल के दौरान खाद्यान्न के रूप में उपयोग की जाने वाली लाल चावल की फसल लगभग 10 हजार वर्ष पुरानी आंकी जाती है। पर हरित क्रांति के दौर में किसानों ने नकदी और ज्यादा उत्पादन वाली फसलों की प्रजातियों को अपनाने से सदियों से उगाई जाने वाली पारंपरिक फसलें हाशिए पर चली गई। जनवितरण प्रणाली से अनाज के वितरण के कारण किसानों ने इन फसलों से किनारा कर लिया। अब स्वास्थ्य के प्रति संजीदगी, पर्यावरण परिवर्तन तथा जलवायु परिवर्तन की वजह से किसानों ने लाल चावल की फसल को फिर से उगाना शुरू कर दिया है। सुगंधित लाल चावल की फसल में विशेष पोषाहार तथा औषधीय तत्व हैं। इन्हें परंपरागत रूप में ब्लड प्रेशर, कब्ज, ल्यूकोरिया जैसे रोगों के उपचार में प्रयोग किया जा रहा है। इस समय लाल चावल की खेती पानी की बहुतायत वाले चिड़गांव, रोहड़ू, रामपुर, कुल्लू घाटी, सिरमौर तथा कांगड़ा जिला के ऊपरी क्षेत्रों में की जा रही है। राज्य में लोकप्रिय लाल चावल की किस्मों में रोहड़ू में छोहारटू, चंबा में सुकारा तियान, कांगड़ा में लाल झिन्नी तथा कुल्लू में जतू और मटाली किस्में किसानों द्वारा उगाई जाती हैं। किसानों की आर्थिकी को मजबूत करने में भी लाल चावल की खेती महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। प्रदेश में लाल चावल लगभग 200 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है, यानी आम चावल से कई गुना अधिक दर पर। जाहिर है ऐसे में यदि इसकी खेती का दायरा बढ़े तो ये किसानो की आर्थिकी में बड़ा बदलाव ला सकता है।
लाल नहीं, भूरे रंग का होता है चावल
इस चावल का असली रंग लाल नहीं, बल्कि भूरा होता है लेकिन फिर भी आम तौर पर इसे लाल चावल के नाम से ही जाना जाता है। सफेद चावल को पॉलिशिंग और रिफाइंड जैसे कई प्रोसेस से गुजरना पड़ता है लेकिन लाल चावल को रिफाइंड नहीं किया जाता। सिर्फ धान का छिलका हटाने के बाद पकाने के लिए यूज किया जाता है। हालांकि यह सफेद चावलों के मुकाबले पकने में ज्यादा समय लेते हैं लेकिन सेहत के लिहाज से यह काफी फायदेमंद है। दिखने में यह काफी हद तक ब्राउन राइस की तरह ही होते हैं।
लाल चावल की किस्में
हिमाचल प्रदेश के कई खजानों में से एक लाल चावल की कई प्रकार की किस्में हैं। इनमें शिमला जिले के छोहार्टू, चंबा जिले से सुकारा, झिंजन और कराड , कुल्लू जिले के जट्टू, देवल और मटली और कांगड़ा जिले के देसी धान, कालीझिनी,अछू और बेगमी को राज्य के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग ऊंचाई पर उगाया जाता है। लाल चावल की ये किस्में इंडिका और जपोनिका दोनों उप-प्रजातियों से संबंधित हैं। लाल चावल हिमाचल प्रदेश में सभी धार्मिक समारोहों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सेहत के लिए रामबाण है लाल चावल
जो लोग अपनी सेहत को लेकर हमेशा अलर्ट रहते हैं वे अपने खानपान में हर चीज काफी सोच समझकर शामिल करते हैं। अगर हम चावल की बात करें तो बाजार में आजकल कई तरह की चावल की किस्में मौजूद हैं और अब लोग सामान्य चावल की बजाय लाल चावल खाना ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि विशेषज्ञों का मानना है कि लाल चावल में ज्यादा फाइबर और पोषक तत्व होते हैं। लाल चावल वजन घटाने से लेकर दिल को स्वस्थ रखने और डायबिटीज रोगियों के लिए फायदेमंद माना जाता है।
डायबिटीज में लाभकारी
फाइबर, प्रोटीन से भरपूर लाल चावल को टाइप-2 डायबिटीज मरीजों के लिए फायदेमंद है। इससे खून में ग्लूकोज की मात्रा नियंत्रित रहती है और ब्लड शुगर भी नहीं बढ़ता।
कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल
लाल चावल में कोलेस्ट्रॉल ना के बराबर होती है। साथ ही इससे शरीर में गुड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ती है, जिससे कोलेस्ट्रॉल लेवल सही रहता है और दिल की बीमारियों का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। साथ ही यह ब्लड प्रेशर को कम करके हार्ट अटैक का रिस्क घटाते हैं।
कैंसर से बचाव
शोध के मुताबिक, इससे एमिनोब्यूटिरिक नामक तत्व होता है, जो शरीर में कैंसर सेल्स को बढ़ने से रोकता है। इससे कैंसर का रिस्क काफी हद तक कम हो जाता है।
मजबूत हड्डियां
हड्डियों के लिए भी लाल चावल काफी अच्छे होते हैं। इसमें मैग्नीशियम होता है, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करता है। इसके अलावा इसमें मैग्निशियम और कैल्शियम भी भरपूर होता है, जो दांतों को मजबूत करने में मददगार है।
वजन घटाने में कारगर
लाल चावल भूख को कंट्रोल करते हैं, जिससे आप ओवरईटिंग करने से बच जाते हैं। साथ ही इससे मेटाबॉलिज्म बढ़ता है, जिससे वजन घटाने में काफी मदद मिलती है। वहीं, इसमें कैलोरी और फैट की मात्रा भी कम होती है।
आंत से जुड़ी बीमारी
जिन लोगों को आंत से जुड़ी कोई दिक्कत है उनके लिए भी लाल चावल का सेवन फायदेमंद साबित हो सकता है।
नींद ना आना
नींद ना आने की शिकायत और तनाव की शिकायत रहती है तो इसे अपनी डाइट में जरूर शामिल करें। इसमें कुछ ऐसे एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो तनाव और अनिद्रा की समस्या को दूर करते हैं।
एलर्जी से राहत
इसमें एंथोसायनिन यौगिक, एंटीऑक्सीडेंट, आयरन, मैंगनीज और फ्लेवोनोइड्स होता है। इससे ना शरीर में फ्री रेडिकल्स कम होता है, जिससे इंफ्लामेशन, एलर्जी की समस्या से राहत मिलती है।
अस्थमा के लिए बेस्ट डाइट
इसमें मैग्नीशियम होता है, जो शरीर के अंदर ऑक्सीजन के स्तर को बढ़ाती है। साथ ही यह श्वसन प्रणाली के लिए अच्छा है। ऐसे में अस्थमा मरीज डॉक्टर से सलाह लेकर इसे अपनी डाइट का हिस्सा जरूर बनाएं।
पाचन में मदद करता है
लाल चावल फाइबर का एक अच्छा स्रोत है और इस प्रकार कई पाचन क्रियाओं का इलाज करने में मदद करता है। घुलनशील और अघुलनशील फाइबर से भरपूर, लाल चावल शरीर से विषाक्त पदार्थों को आसानी से निकाल सकता है।
15 फार्मों में होगा बीज तैयार : वीरेंद्र कँवर
कृषि मंत्री वीरेंद्र कंवर का कहना है कि प्रदेश में लाल चावल लगभग 200 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है जोकि सफेद चावल के मुकाबले पांच गुना ऊंची दर है। राज्य में इस समय लगभग 4122 किसान परिवार लाल चावल की खेती करते हैं। आगामी पांच सालों में लगभग 10 हजार किसानों को चावल की खेती के अंतर्गत कवर करने का लक्ष्य है। कृषि मंत्री वीरेंद्र कंवर का कहना है कि लाल चावल के साथ-साथ विभाग ने कुल्थ, राजमा व माह की दाल के उत्पादन को बढ़ाने के मद्देनजर 15 फार्मों में इसका बीज तैयार कर किसानों को देने की योजना बनाई है। वीरेंद्र कंवर का कहना है कि विभाग ने 15 फॉर्मों में लाल चावल के साथ प्रदेश की पारंपरिक दालों के बीजों का उत्पादन कर किसानों को देने की योजना बनाई गई है।
रंग लाएं कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के प्रयास
कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के कुलपति प्रो. एचके चौधरी का कहना है कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने लाल चावल उगाने वाले किसानों को पारंपरिक लाल चावल किस्म ,छोहार्टू, को पौधा किस्मों और किसान अधिकार प्राधिकरण के संरक्षण के साथ पंजीकृत करने में मार्गदर्शन किया है। आठ साल पहले ये पहल शुरू हुई थी, पिछले एक वर्ष में विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किसानों को संरक्षण, विकास, लोकप्रिय बनाने और लाल चावल के आगे प्रसार के नए प्रयासों के साथ इस मामले को फिर से आगे बढ़ाने में मदद की, जिसके परिणामस्वरूप राज्य का नाम रोशन हुआ। लाल धान की किस्मों के संरक्षण और विकास में उनके योगदान के लिए किसानों को दिया जाने वाला यह भारत का सर्वोच्च पुरस्कार है। प्रोफेसर चौधरी ने कहा कि शिमला जिले के रोहड़ू उपमंडल के छोहरा घाटी के पेजा, मसली, जंगला, दाबोली, कलोटी जैसे विभिन्न गांवों में लगभग 1000 हेक्टेयर क्षेत्र में लाल चावल की खेती की जा रही है। इसकी खेती पब्बर नदी के दोनों किनारों पर की जाती है, जिसे 1300 मीटर से 2100 मीटर तक खेती के लिए अनुकूलित किया जाता है और इसे जपोनिका लाल चावल के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाता है।
छौहारा क्षेत्र के किसानों को मिला भारत का सर्वोच्च पुरस्कार
रोहडू के छौहारा क्षेत्र के लाल चावल की खेती करने वाले किसानों को प्रतिष्ठित प्लांट जीनोम सेवियर अवार्ड से नवाज़ा गया है। लाल धान की किस्मों के संरक्षण और विकास में उनके योगदान के लिए किसानों को दिया जाने वाला यह भारत का सर्वोच्च पुरस्कार है। छौहारा क्षेत्र के लाल चावल न केवल अपने विशिष्ट स्वाद के लिए विख्यात है बल्कि इसमें मौजूद मिनरल्स व औषधीय गुणों के लिए सदियों से जाना जाता है। आमतौर पर बाजार में इसकी कीमत 200 से 300 रुपए प्रति किलो तक रहती है। रोहड़ू उपमंडल के छौहारा घाटी के पेजा, मसली, जंगला, दाबोली, कलोटी जैसे विभिन्न गांवों में लगभग 1000 हेक्टेयर क्षेत्र में लाल चावल की खेती की जाती है। इसकी खेती पब्बर नदी के दोनों किनारों पर की जाती है, जिसे 1300 मीटर से 2100 मीटर तक खेती के लिए अनुकूलित किया जाता है और इसे जपोनिका लाल चावल के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाता है।