करसोग में दिखाई दिए विलुप्त होते पुराने अनाजों के बीज
एक समय था जब हमारे देश में अनाज की कमी हो गई थी। उस समय सरकार ने अपने देशी बीजों को विकसित करने की बजाए विदेशी हाइब्रिड बीजों को तवज्जो दी गई। बाहर से जो बीज आए उनके लिए भरी मात्रा में रासायनिक खाद और दवाइयों का इस्तेमाल भी किया गया। अत्यधिक पानी का दोहन किया गया। इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि हमारे देश की मिट्टी बर्बाद हो गई, इंसानों में कई किस्म की बीमारियों को बढ़ावा मिला। इन सब बुरे परिणाम को ठीक करने की कोशिश के तहत पर्वतीय टिकाऊ खेती अभियान हिमाचल प्रदेश द्वारा पूरे हिमाचल प्रदेश में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। महिला मंडलों के साथ मिलकर पुराने अनाजों को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जा रही है। इसको लेकर बीते दिन करसोग के राम मंदिर में मिलेट्स फेस्टिवल का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में कोदरा, कौनी, बिथु, नंगा जौ, काली गेंहू, जवार, कोदो, चीना, लाल मक्की आदि दिखाई गई। इनकी खासियत ये है कि ये अनाज सौ सालों तक भी खराब नही होते। मिलिटस फेस्टिवल के दौरान विभिन्न अनाजों का का हलवा, खीर, चाय, रोटी आदि बनाकर खिलाई गई। खिलाने के लिए पत्तों से बने दौनों का इस्तेमाल किया गया। कार्यक्रम के संचालक लोक कृषि नेकराम शर्मा ने कहा कि हमारे ऋषि मुनियों ने बहुत तपस्या के साथ हमारे लिए कृषि बीजों को विकसित किया था लेकिन नकदी फसलों के लालच में हमने नए बीज अपना कर बीमारियों को न्यौता दिया है। उपमंडल अधिकारी सनी शर्मा ने पुराने बीजों के दर्शन करते हुए कहा कि करसोग में जितने किसान इस तरह के अनाज की खेती कर रहे हैं इसका अध्यन करना चाहिए। इसकी बिक्री के लिए करसोग में एक जैविक कृषि उत्पादों के लिए बाजार बनाया जाएगा। इस के लिए सारे विभागों से बात कर युद्धस्तर पर जगह देखी जायेगी। जैविक खेती करने वाले किसानों के साथ मिलकर जल्द ही कृषि विभाग द्वारा फरामार प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन बनाया जाएगा।
