मुश्किल में पड़ती दिख रही है सैजल की सियासी सल्तनत
विधानसभा चुनाव नजदीक है और सियासी हलचल तेज। कसौली निर्वाचन क्षेत्र में सियासी रस्साकशी शुरू हो चुकी है। यहां एक तरफ मिस्टर क्लीन इमेज वाले वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री डॉ राजीव सैजल के साथ भाजपा की पूरी टीम जीत का चौका लगाने के लिए मैदान में है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस जीत का सूखा खत्म करने की फिराक में। और इन दोनों का खेल बिगाड़ने की जुगत में मैदान में आम आदमी पार्टी की एंट्री भी हो चुकी है।
कसौली निर्वाचन क्षेत्र हिमाचल प्रदेश के ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में से है जो हमेशा आरक्षित रहे है। ऐसे में इस क्षेत्र के कई कद्दावर नेताओं की विधायक - मंत्री बनने की हसरत कभी पूरी नहीं हुई। कुछ की उम्र संगठन की सेवा में बीत गई, तो कुछ को सत्ता सुख के नाम पर बोर्ड - निगमों में एडजस्ट कर दिया गया। ऐसे भी माना जाता है कि सामान्य वर्ग से आने वाले कई नेताओं ने कई मौकों पर अपनी पार्टी प्रत्याशी की राह में ही कांटे डाले ताकि उनकी कुव्वत बनी रहे। यानि यहां की राजनीति बेहद दिलचस्प है।
कसौली निर्वाचन क्षेत्र लम्बे अरसे तक कांग्रेस का गढ़ रहा। 1982 से 2003 तक हुए 6 विधानसभा चुनावों में से पांच कांग्रेस ने जीते और पांचों बार प्रत्याशी थे रघुराज। सिर्फ 1990 की शांता लहर में एक मौका ऐसा आया जब रघुराज भाजपा के सत्यपाल कम्बोज से चुनाव हारे। 2003 में प्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार बनी और वीरभद्र सरकार में रघुराज मंत्री बने। मंत्री बनने के बाद कसौली के लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ी और शायद इसी का खामियाजा रघुराज को 2007 में उठाना पड़ा, जब वे चुनाव हार गए। तब जमीनी स्तर पर रघुराज के खिलाफ नाराजगी दिखी थी। उन्हें हराने वाले थे भाजपा के डॉ राजीव सैजल से। 36 साल के सैजल का ये पहला चुनाव था, पर कसौली की जनता ने रघुराज पर युवा सैजल को वरीयता दी और वे चुनाव जीत गए। तब पहला चुनाव जीतने वाले सैजल वर्तमान में प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री है। अब तक सैजल जीत की हैट्रिक लगा चुके है और अब जीत का चौका लगाने की तैयारी में है। हालांकि उनकी राह जरा भी आसान नहीं दिख रही। इसमें कोई संशय नहीं है कि मामूली अंतर से बीते दो चुनाव जीतने वाले सैजल को इस बार भी एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ेगा।
कोई गलती नहीं दोहराना चाहते सुल्तानपुरी :
लगातार तीन चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के लिए ये चुनाव काफी महत्वपूर्ण है और शायद यही कारण है कि विनोद सुल्तानपुरी अभी से प्रो एक्टिव दिख रहे है। सुल्तानपुरी बीते एक साल से जनता के बीच है भी और उनकी सुन भी रहे है। अगर परवाणु को छोड़ दिया जाए तो बीते साढ़े तीन साल में कांग्रेस हर जगह बैकफुट पर दिखी है। जाहिर है पिछले दो चुनाव में मामूली अंतर से हारने वाले सुल्तानपुरी इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। माना जाता है कि कांग्रेस का भीतरघात पिछले चुनावों में उन पर भारी पड़ा, पर अब सुल्तानपुरी सक्रिय भी है और निरंतर लोगों के बीच भी। वहीं ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि पार्टी अब पूरी तरह एकजुट हो लेकिन कांग्रेस में विनोद सुल्तानपुरी विरोधी खेमे का दमखम अब पहले से कुछ कम जरूर दिखता है। ये सुल्तानपुरी के लिए राहत की बात जरूर होगी। यहाँ ये बताना भी जरूरी है कि टिकट दावेदारों में भी विनोद सुल्तानपुरी के समकक्ष कोई मजबूत दावेदार नहीं दिखता। हालांकि अभी चुनाव में वक्त है लेकिन फिलहाल तो वे ही कांग्रेस के संभावित फेस दिख रहे है।
पिछले दो चुनाव हारते -हारते बचे है सैजल :
2007 में अपने पहले चुनाव में डॉ राजीव सैजल ने 6374 वोट से शानदार जीत दर्ज की थी। पर अगले दोनों चुनाव में डॉ राजीव सैजल बमुश्किल अपनी सीट बचा पाए। 2012 में वे महज 24 वोट से जीते तो 2017 में अंतर 442 वोट का रहा। इन दोनों ही मौकों पर कांग्रेस की अंतर्कलह उनके लिए संजीवनी सिद्ध हुई।
मंत्री बनकर हार गए थे रघुराज :
2003 में पहली बार कसौली का कोई नेता मंत्री बना था, वो थे स्व. रघुराज। पर 2007 में वे चुनाव हार गए। माना जाता है कि मंत्री बनने के बाद लोगों की रघुराज से अपेक्षाएं काफी बढ़ गई थी और जब वो उन पर खरे नहीं उतरे तो जनता ने नए और कम अनुभवी डॉ राजीव सैजल पर वोटों का प्यार बरसाया। जाहिर है अब डॉ सैजल से भी लोगों को खूब उम्मीद रही है। ऐसे में उनका कामकाज ही अगले चुनाव में जीत-हार तय करेगा। बहरहाल अभी वोटर खामोश है, लेकिन जैसे जैसे चुनाव नजदीक आएगा सम्भवतः सियासी हवा का पता भी चल जायेगा।
हरमेल धीमान ने दिया भाजपा को झटका :
सिर्फ कांग्रेस ही नहीं भाजपा के लिए कसौली में और भी कई चुनौतियां रहने वाली है। बीते दिनों कसौली भाजपा के वरिष्ठ नेता व भाजपा एससी मोर्चा के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष हरमेल धीमान ने भाजपा छोड़ आम आदमी पार्टी का दामन थाम लिया। वह पिछले चुनाव के दौरान टिकट की मांग कर रहे थे लेकिन टिकट राजीव सैजल को ही मिला। पिछली बार भी पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल के मनाने पर उन्होंने डॉक्टर राजीव सैजल के लिए चुनाव में काम किया था । परन्तु इस बार भी स्थिति कुछ वैसी ही देख कर हरमेल धीमान ने भाजपा से किनारा कर लिया। हरमेल धीमान खुद तो आप में गए ही लेकिन साथ ही वे भाजपा के पूर्व मंडल अध्यक्ष देवराज ठाकुर व मंडल के पूर्व उपाध्यक्ष व जिला परिषद सदस्य जगदीश पंवर समेत अन्य समर्थकों को भी आम आदमी पार्टी में ले गए। ज़ाहिर है इन निष्ठावान सिपाहियों की निष्ठा में परिवर्तन का नुक्सान भाजपा को भारी पड़ सकता है। बेशक भाजपा इसे खुले तौर पर नुक्सान न माने लेकिन हकीकत ये है कि ये चुनाव में बड़ा फैक्टर होगा।
