जनता के दिलों में बस्ते है वीरभद्र सिंह
छह बार हिमाचल के मुख्यमंत्री पद की कमान संभालने वाले वीरभद्र सिंह इन दिनों स्वास्थ्य के मोर्चे पर कठिन समय से जूझ रहे है। शिमला के आईजीएमसी अस्पताल में दाखिल पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के स्वस्थ होने की कामना पूरा हिमाचल कर रहा है। बुशहर रियासत के अंतिम राजा और हिमाचल के 6 बार मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह एक ऐसे नेता है जिन्हें समूचे हिमाचल का प्यार मिला है। उनकी सेहत को लेकर सोशल मीडिया पर कुछ भ्रामक खबरें आई तो पूरे प्रदेश में उनके समर्थक विचलित हो उठे। इस हफ्ते वीरभद्र सिंह का 87वां जन्मदिन है। आपको बताते है उनके जुड़े कुछ रोचक किस्से...
इतिहास पढ़ाना चाहते थे, इतिहास बना दिया
शिमला का बिशप कॉटन स्कूल हिमाचल का ही नहीं अपितु देश के प्रतिष्ठित स्कूलों में शुमार है। स्कूल के दाखिला रजिस्टर में नंबर 5359 के आगे नाम लिखा है वीरभद्र सिंह। उस दौर में जब रामपुर- बुशहर रियासत के राजकुमार वीरभद्र ने बिशप कॉटन स्कूल में दाखिला लिया था तो किसी ने नहीं सोचा होगा कि स्कूल का नाम उस शख्सियत से जुड़ने जा रहा है जो आगे चलकर 6 बार हिमाचल का सीएम बनेगा। स्कूल पास आउट करने के बाद वीरभद्र ने दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में हिस्ट्री होनोर्स में बीए और एमए की। हसरत थी हिस्ट्री का प्रोफेसर बन छात्रों को पढ़ाने की। पर देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था। जो वीरभद्र छात्रों को इतिहास पढ़ाना चाहते थे, उन्होंने खुद इतिहास बना दिया। सबसे अधिक समय तक हिमाचल का सीएम रहना का रिकॉर्ड वीरभद्र सिंह के ही नाम है। वे करीब 22 वर्ष और कुल 6 बार हिमाचल के सीएम रहे है।
श्री कृष्ण परिवार की 122 वीं पीढ़ी होने का दावा
वीरभद्र सिंह का परिवार बागवान श्री कृष्ण के वंशज होने का दावा करता है। दरअसल,रामपुर बुशहर रियासत में एक स्थान आता है सराहन। राज परिवार का दावा है कि ये सराहन पहले सोनीपुर के नाम से जाना जाता था और भगवान् श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न की रियासत का हिस्सा था।
पत्नी व पुत्र भी राजनीति में सक्रिय
वीरभद्र सिंह का विवाह दो बार हुआ। 20 साल की उम्र में जुब्बल की राजकुमारी रतन कुमारी से उनकी पहली शादी हुई। किन्तु कुछ वर्षों बाद ही रतन कुमारी का देहांत हो गया। इसके बाद 1985 में उन्होंने प्रतिभा सिंह से शादी की। प्रतिभा सिंह भी मंडी से सांसद रह चुकी है। वीरभद्र और प्रतिभा के पुत्र विक्रमादित्य सिंह भी वर्तमान में शिमला ग्रामीण से विधायक है।
राजनीति से संन्यास की खबर से मच गई थी हलचल
बीते दिनों सामने आए वीरभद्र सिंह के चुनावी राजनीति से संन्यास के बयान मात्र से कांग्रेस में खलबली मच गई थी। ऐसा हो भी क्यों न बेशक उम्र 87 वर्ष हो लेकिन अब भी कांग्रेस वीरभद्र सिंह के दायरे में ही है। न कोई विकल्प दीखता है और न ही किसी अन्य नेता में इतनी कुव्वत दिखती है कि कांग्रेस को एकजुट रखकर सत्ता वापसी करवा सके। ये सन्देश वीरभद्र गुट के बड़े नेता पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के कई ख्याली रामों को दे चुके है। निसंदेह अब वीरभद्र सिंह न तो पहले की तरह सक्रीय है और न ही उनकी सेहत साथ है। 2022 चुनाव में उनकी उम्र 88 पार होगी पर अब भी वीरभद्र सिंह का नाम ही कांग्रेस के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है इसमें कोई संशय नहीं। अगर कांग्रेस में कोई ऐसा नेता है जिसका जनाधार सभी 12 जिलों में है तो वे वीरभद्र सिंह ही है। ऐसे में माइनस वीरभद्र सिंह कांग्रेस से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद फिलहाल बेमानी सी है।
किस्सा : जिंदगी और मौत के बीच के वो 50 कदम
" साहब रहने दो गांव का दौरा...पेड़ से पांव फिसला तो नीचे पानी का बहाव पता नहीं कहां से कहां पहुंचा दे। पदम तू रहने दे, मैं खुद चला जाऊंगा। कहकर साहब ने पेड़ पर पांव रख दिया तो मेरी हवाइयां उड़ने लग गईं कि अगर थोड़ा सा भी बैलेंस बिगड़ा तो उफनती वास्पा नदी सीधे करछम बांध में फेंकेगी। " पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से जुड़ा ये किस्सा सांझा किया है उनके मुख्य सिक्योरिटी गार्ड पद्म ठाकुर ने। पदम बताते हैं कि किन्नौर में आई बाढ़ से बहुत से पुल बह गए, जिससे कई गांव शेष दुनिया से कट गए थे। प्रशासन उन पीड़ितों तक पहुंचने में असफल था इसलिए राहत पहुंचाने का कोई रास्ता नहीं था। पर मख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने उस तरफ जाने की जिद्द पकड़ ली। पदम कहते है "राजा साहब को कौन समझाता कि पार गांवों तक पहुंचने के लिए उफनती नदी कैसे पार करनी है ? प्रशासन के हाथ पांव फूल गए पर वीरभद्र सिंह शिमला से उन गांवों का दौरा करने निकल पड़े।" पदम बताते है कि आनन फानन में मीटिंग बुलाई गई कि राजा साहब को कैसे रोका जाए। अंत में यह फैसला हुआ कि नदी के इस तरफ ही कोई जनसभा करवा दी जाए। पर पेच वहीं फंसा था कि वीरभद्र सिंह न माने तो ? लेकिन सभी अधिकारी इस बात से सहमत थे कि जब आगे जाने का रास्ता नहीं मिलेगा तो वे खुद मान जाएंगे। वीरभद्र सिंह का काफिला जा पहुंचा। आगे कुछ किलोमीटर पैदल चलने के बाद उन्हें बताया गया कि यहां पुल बह गया है आगे नहीं जाया जा सकता। इस पर वीरभद्र सिंह ने कुछ स्थानीय लोगों से पूछ लिया कि फिर वहां से लोग कैसे आ जा रहे हैं। तब उन्हें बताया गया कि एक देवदार के पेड़ को नदी के आर पार डाला गया है और उसी पर चल कर कुछ लोग नदी पार कर रहे हैं। सुनते ही वीरभद्र सिंह ने उस तरफ चलने का इशारा किया। वो जगह ऊंचाई पर थी।उन्होंने ने हाथ मे लकड़ी का डंडा पकड़ा, चढ़ गए सारी चढ़ाई और पहुंच गए उफनती नदी के छोर पर। पदम बताते है " बड़ा ही डरावना दृश्य था। नीचे तेज़ बहती नदी और ऊपर देवदार के कटे पेड़ का जुगाड़ू पुल। कुछ लोग उस पार से पेड़ से होकर इस पार आ गए, तो राजा साहब ने जिद्द पकड़ ली की पार जाना है तो जाना है। मैंने समझाया कि साहब यह बड़ा खतरनाक होगा, तो साहब बिफर गए और मुझे डांट कर हाथ छुड़ाकर पेड़ पर पांव रख दिया। सभी हाथ जोड़कर विनती करने लग गए कि यह जान हथेली पर रखने वाली बात होगी, पर वे नहीं माने।" पदम के अनुसार फिर एक रस्सी आर पार फेंकी गई जिसके सहारे पार जाना था। पानी की आवाज़ इतनी खतरनाक थी कि कलेजा बाहर आ रहा था। वीरभद्र सिंह ने उन्हें पीछे धकेला ओर चल पड़े। एक एक कदम जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष था। पर बिना डर भय के वे कदम बढ़ाते जा रहे थे और पदम के दिल की धड़कनें नीचे बहते पानी से भी तेज थी। सांसें फूली हुई थी और किसी की हिम्मत नहीं हुई कि पीछे चलें। पदम कहते है "वो पचास कदम मुझे जिंदगी में कभी नहीं भूलेंगे। एक - एक कदम मौत की तरफ बढ़ रहा था। पर साहब को पता नहीं क्या हो गया था। ऐसे चल रहे थे जैसे वो यहां हर घंटे आर पार जाते हों। पार गांवों के लोग सांस रोके हम एकटक नदी पार करते देख रहे थे और राजा साहब जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे।पुल पार करते ही राजा साहब लोगों से मिले और प्रदेश के मुखिया को इन विषम परस्थितियों में अपने बीच पाकर हर चेहरा अपना दुख दर्द भूल गया पर मुझे फ़िक्र वापस जाने की थी।"
