क्या फिर सियासी पैराशूट से लैंड होगा भाजपा उम्मीदवार !
बीते दस वर्षों में सोलन निर्वाचन क्षेत्र कांग्रेस और कर्नल डॉ धनीराम शांडिल का वो अभेद किला बन चुका है जिसे भेद पाने में भाजपा नाकामयाब रही है। दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद इस बार फिर पुरानी कहानी रिपीट न हो, इसके लिए भाजपाई रणनीति तैयार करने में जुटे है। पर मौजूदा हाल और हालात दोनों भाजपा के पक्ष में नहीं दिखते। दरअसल डॉ राजीव बिंदल के नाहन जाने के बाद से ही सोलन में भाजपा के पास वो दमदार चेहरा नहीं दिखता जो कर्नल की स्वच्छ और बेदाग़ छवि के कवच को भेदने का सामर्थ्य रखता हो। कोई सामना करने को खड़ा होता भी है तो कांग्रेसियों से पहले भाजपाई ही बंदोबस्त कर देते है। ये गुटबाजी ही सोलन भाजपा का असल मर्ज है। रही सही कमी भाजपा आलाकमान पूरी करता आ रहा है, कभी गलत टिकट देकर तो कभी एक गुट को साइडलाइन करके। अब विधानसभा चुनाव से पहले चंद महीनों में क्या भाजपा इस तस्वीर को बदलकर अपनी तकदीर बदल पायेगी, ये फिलवक्त बड़ा सवाल है।
सोलन भाजपा की वर्तमान सियासी तस्वीर को समझने के लिए शुरुआत करते है 2012 के विधानसभा चुनाव से। 2008 के परिसीमन के बाद सोलन सीट आरक्षित हो गई और जीत की हैट्रिक लगा चुके डॉ राजीव बिंदल नाहन का रुख कर गए। बिंदल के बाद उन्हीं के आशीर्वाद से टिकट मिला कुमारी शीला को। जबकि कांग्रेस ने पूर्व सांसद कर्नल धनीराम शांडिल को मैदान में उतारा। शांडिल के सामने कुमारी शीला टिक नहीं सकी और लम्बे समय बाद कांग्रेस की वापसी हुई। कांग्रेस की सरकार बनी और शांडिल मंत्री भी बन गए। उधर भाजपा में कुमारी शीला ही प्राइम फेस बनी रही। हालांकि कोशिश तरसेम भारती ने भी की, लेकिन बिंदल गुट ने उन्हें कभी स्थापित होने नहीं दिया। पर असली ट्विस्टआया 2017 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले। न कुमारी शीला को फिर मौका मिला और न तरसेम भारती के अरमान पूरे हुए, और टिकट ले गए पैराशूट से लैंड हुए डॉ राजेश कश्यप। यहां दिलचस्प बात ये है कि डॉ राजेश कश्यप को टिकट दिलवाने वाले थे डॉ राजीव बिंदल, और उनके टिकट का विरोध करने वाले भी उन्हीं के शागिर्द थे। भीतरखाते क्या हुआ ये तो चंद भाजपाई ही जानते होंगे लेकिन इसका नतीजा ये हुआ कि सत्ता विरोधी लहर के बावजूद कर्नल शांडिल फिर चुनाव जीत गए। उधर हार के बाद डॉ राजेश कश्यप मौके की नजाकत को समझते हुए डॉ बिंदल की सरपरस्ती से दूर हो गए और बिंदल विरोधी खेमे के सरदार बन गए। प्रदेश में जयराम राज आया तो बिंदल कमजोर हुए और सोलन में डॉ राजेश कश्यप मजबूत होते रहे। जयराम राज में डॉ राजेश कश्यप ही सोलन में प्राइम फेस रहे है। पर इन साढ़े चार सालों में भी डॉ कश्यप सबको साथ लाने में कामयाब नहीं दिखते और ये ही उनकी कमजोरी है। भाजपा दो गुटों में विभाजित है और इसका खामियाजा नगर निगम और जिला परिषद् चुनाव में भुगत चुकी है, बावजूद इसके भाजपा ने कोई सबक नहीं लिया। वर्तमान में एक तरफ डॉ राजेश कश्यप ताल थोक रहे है, तो दूसरी तरफ कभी तरसेम भारती की राह का रोड़ा बनने वाले ही उन्हें आगे बढ़ा रहे है ताकि कश्यप को रोका जा सके। यहां जिक्र कुमारी शीला का भी जरूरी है जो निरंतर ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय है, लेकिन फिलहाल अलग- थलग दिख रही है। हालांकि इसमें कोई संशय नहीं है कि पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं से जो जुड़ाव कुमारी शीला का दिखता है वैसा किसी अन्य नेता का नहीं है। ये तीन नेता फिलहाल प्रत्यक्ष तौर पर टिकट के दावेदार है।
इस बीच सुगबुगाहट है कि भाजपा से 2017 की तरह ही एक नए उम्मीदवार को मैदान में उतारा जा सकता है। सूत्रों की माने तो एक अधिकारी से चर्चा भी हो चुकी है और उक्त अधिकारी जल्द वीआरएस लेकर सियासत में एंट्री कर सकता है। मसला अटका है टिकट की गारंटी को लेकर। दरअसल डॉ राजेश कश्यप मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के करीबी माने जाते है और ऐसे में वो टिकट की दौड़ में आगे भी है। अब किसी नए चेहरे की एंट्री होती है या नहीं, इसके लिए फिलहाल थोड़ा इन्तजार करना होगा।
कांग्रेस में कर्नल के समकक्ष कोई नहीं :
कांग्रेस में कर्नल धनीराम शांडिल एकलौते दावेदार है। यूँ तो टिकट के अन्य चाहवान भी है लेकिन उनका कद कर्नल के समकक्ष नहीं दिखता। खास बात ये है कि दस साल विधायक रहने के बावजूद कर्नल की छवि बेदाग है। पिछली सरकार में मंत्री रहते हुए उन्होंने साढ़े चार सौ करोड़ से अधिक के विकास कार्य करवाएं तो मौजूदा कार्यकाल में भी अमूमन सभी क्षेत्रों में उनकी विधायक निधि पहुंची है। कहीं कम दिया तो कहीं ज्यादा, लेकिन कर्नल ने किसी को निराश नहीं किया। वहीं प्रदेश कांग्रेस में मुकेश अग्निहोत्री, सुखविंद्र सिंह सुक्खू और प्रतिभा सिंह के अलावा कर्नल शांडिल भी एक ऐसा चेहरा है जिन्हें भावी मुख्यमंत्री के तौर पर देखा जाता है। कर्नल पार्टी आलाकमान के नजदीकी है और जानकार मानते है कि यदि गुटबाजी के चलते किसी के नाम पर सहमति नहीं बनती तो कर्नल के सिर भी सीएम का ताज सज सकता है।
सरकार ने पैसा दिया, फिर भी मंद है विकास की रफ्तार :
सोलन में विकास की मंद रफ्तार भी भाजपा के गले की फांस है। बीते साढ़े चार साल में भाजपा सरकार पहले से निर्माणधीन शामती बाईपास का लोकार्पण तक नहीं कर पाई है। पिछले साल अप्रैल में मुख्यमंत्री ने ऐलान किया था कि शूलिनी मेले में वे शामती बाईपास का लोकार्पण करेंगे, अगला मेला भी निकल गया लेकिन लचर कार्यशैली के चलते मुख्यमंत्री को अब तक ये सौभाग्य नहीं मिल पाया। इसी तरह अप्रैल 2018 में हुए ट्रांसपोर्ट नगर के शिलान्यास की तो पट्टिका भी टूट गई है लेकिन सरकार से एक ईंट तक नहीं लगी। फूड प्रोसेसिंग प्लांट का वादा भी हवा हवाई है। सोलन के ओल्ड बस स्टैंड पर प्रस्तावित पार्किंग की दिशा में कुछ नहीं हुआ। पेयजल और बिजली आपूर्ति जैसी मूलभूत सुविधाओं से भी लोग त्रस्त है। करीब 15 करोड़ के परक्युलेशन वेल के बावजूद पेयजल समस्या का हल नहीं हुआ है। वहीँ ओवरलोड बिजली विभाग की मुख्य समस्या है जिसके आगे अधिकारी भी बेबस है। ऐसा नहीं है कि जयराम सरकार ने सोलन के विकास को पैसा नहीं दिया, दरअसल लचर कार्यशैली के चलते कोई भी कार्य समस्य पर नहीं होता। इसका बड़ा कारण कमजोर और विभाजित स्थानीय नेतृत्व और अधिकारीयों की मनमानी भी है। अफसरशाही की मनमानी और नेताओं की कमजोर पकड़ की झलक बीते दिनों हुए शूलिनी मेले में भी दिखी जहाँ अव्यवस्था हावी रही। कथेड़ में हॉस्पिटल का निर्माण इस सरकार की बड़ी उपलब्धि जरूर है लेकिन फंड आवंटित होने के बावजूद काम ने रफ्तार नहीं पकड़ी। वहीँ कोठो में इंडोर स्टेडियम जरूर अब बनकर तैयार है। माना जा रहा है कि जल्द मुख्यमंत्री सोलन का दौरा करेंगे जहाँ सैकड़ों करोड़ के लोकार्पण और शिलान्यास होंगे। लोकार्पण तो ठीक है, पर अंतिम वर्ष के शिलान्यासों का भाजपा को कितना चुनावी लाभ होगा, ये देखना रोचक होगा।
