कैबिनेट में डिमोट हुए मार्कण्डेय को क्या जनता फिर करेगी प्रमोट !
जयराम कैबिनेट के मंत्री डॉ राम लाल मार्कण्डेय उन नेताओं में से एक है जिनका जयराम राज में डिमोशन हुआ है। दरअसल 2017 में सरकार गठन के बाद डॉ मार्कण्डेय के पास तकनीकी शिक्षा और जनजातीय विकास के साथ -साथ कृषि जैसा महत्वपूर्ण महकमा भी था, पर 2020 में हुए मंत्रिमंडल फेरबदल में उनका पोर्टफोलियो हल्का कर दिया गया। डॉ मार्कण्डेय जनजातीय जिला लाहौल स्पीति के वर्तमान में विधायक है और फिलवक्त बड़ा सवाल ये ही है कि क्या कैबिनेट में डिमोट हुए डॉ मार्कण्डेय को लाहौल स्पीति की जनता फिर प्रमोट करके विधानसभा भेजेगी ?
लाहाैल-स्पीति की ठंडी फिजाओं में हर पांच साल बाद सियासत गर्मा जाती है। इस जिला में विधानसभा की महज एक ही सीट है, जो हर पांच साल बाद सत्ता परिवर्तन की साक्षी रही है। जाे भी राजनीतिक दल सत्ता में आता है उसी दल काे यहां जीत मिलती रही है,1993 से ऐसा ही चला आ रहा है। लाहाैल-स्पीति विधानसभा सीट पर 1993 में कांग्रेस ने जीत दर्ज की और सरकार भी कांग्रेस की बनी। 1998 में जब पंडित सुखराम ने कांग्रेस से अलग होकर हिमाचल विकास कांग्रेस बनाई तो उनकी पार्टी से लड़े डॉ रामलाल मारकंडा यहाँ से जीते। इसके बाद 2003 में कांग्रेस और 2007 में भाजपा को यहाँ जीत मिली। 2012 के चुनाव में यहाँ कांग्रेस के रवि ठाकुर काे जीत मिली थी और प्रदेश में भी कांग्रेस की ही सरकार बनी। इसी तरह से 2017 के चुनाव में फिर भाजपा के डा.रामलाल मारकंडा काे जीत मिली और वो प्रदेश में जयराम सरकार के कैबिनेट मंत्री भी बने। फिलवक्त तकनीकी शिक्षा और जनजातीय विकास मंत्री डॉ. रामलाल मारकंडा ही यहाँ भाजपा के प्राइम फेस है, जबकि कांग्रेस में रवि ठाकुर के अतिरिक्त भी कई नए चेहरे उभर कर आये है।2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने लाहौल-स्पिति विधानसभा सीट से रवि ठाकुर को चुनाव मैदान में उतारा था। कांग्रेस के रवि ठाकुर को भाजपा के रामलाल मारकंडा ने 1478 मतों से हराया। इससे पहले 2012 के विधानसभा चुनाव में रवि ठाकुर ने डॉ रामलाल मार्कण्डेय को शिकस्त दी थी। पूर्व विधायक रवि ठाकुर के पिता निहाल चंद भी प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे चुके हैं। वहीं कैबिनेट मंत्री डॉ रामलाल मारकंडा लाहाैल-स्पीति से तीन बार चुनाव जीत चुके है। 1998 में वो हिमाचल विकास कांग्रेस के टिकट पर जीते, जबकि 2007 और 2017 में भाजपा टिकट पर। डा.रामलाल मारकंडा का राजनीतिक सफर एनएसयूआई यानी कांग्रेस के छात्र संगठन से शुरु हुआ था। वे हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में एनएसयूआई के छात्र नेता रह चुके हैं। धीरे-धीरे कांग्रेस में बात नहीं बनी ताे उन्हाेंने 1998 में हिमाचल विकास कांग्रेस से चुनाव लड़ा और जीत भी गए और भाजपा-हिविकां गठबंधन सरकार में मंत्री की कुर्सी भी मिली गई। उसके बाद जब हिमाचल विकास कांग्रेस में बिखराव शुरु हुआ ताे उन्हाेंने भाजपा का दामन थाम लिया।
लाहौल स्पीति में पिछड़ी है भाजपा :
पिछले साल लाहौल स्पीति में हुए पंचायत चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन फीका रहा था। हालाँकि जैसे -तैसे निर्दलियों की सहायता से पंचायत समिति में अल्पमत में होने के बाद भी भाजपा ने अध्यक्ष पद पर कब्जा जमा लिया। पर नतीजों के बाद मंत्री राम लाल मारकंडा पर सवाल जरूर उठे। इसके बाद मंडी संसदीय सीट पर हुए उपचुनाव में भी वे भाजपा को लीड नहीं दिलवा पाए थे। इसे भी मंत्री की बड़ी नाकामी के तौर पर देखा गया।
अटल टनल पर श्रेय की लड़ाई :
अटल टनल राेहतांग के निर्माण से लाहाैल-स्पीति का नाम टूरिज्म सेक्टर में चमक गया है। निसंदेह इससे क्षेत्र के विकास को गति मिलेगी। हालांकि राेहतांग टनल निर्माण का प्रस्ताव और शिलान्यास पूर्व की यूपीए सरकार के समय का था, लेकिन ये माेदी सरकार के समय में बन कर तैयार हुई। ऐसे में दोनों राजनैतिक दल इसका श्रेय ले रहे है। श्रेय की ये लड़ाई इस चुनाव में भी देखने को मिल रही है। हाल ही मैं अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने लाहौल में कहा था की कि रोहतांग टनल कांग्रेस की देन है। उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने पहली किस्त के तौर पर 1355 करोड़ रुपए इसके लिए जारी किए थे, न की वर्तमान प्रधानमंत्री ने। मनमोहन सरकार में कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा इसकी आधारशिला रखी गई थी। उन्होंने कहा था कि भाजपा की सरकार ने जहां रोहतांग टनल का नाम बदलकर अटल रोहतांग टनल किया वहीं, सरकार के नुमाइंदों ने कांग्रेस कार्यकाल में हुए टनल की शिलान्यास पट्टिका को भी हटा दिया है, जो शर्म की बात है।
