बगैर वीरभद्र: धुंधलाई आस, निष्ठावान कार्यकर्ता निराश
वीरभद्र सिंह, वो वटवृक्ष जिनकी छाया में हिमाचल कांग्रेस का सूर्य सदा उदयमान रहा। वो राजा जिसके सियासी कौशल के आगे बड़े -बड़े नतमस्तक हुए। अर्से से हिमाचल में कांग्रेस का मतलब वीरभद्र सिंह ही रहा है। 1982 में वीरभद्र सिंह ने पहली बार सत्ता संभाली थी और 2012 में छठी बार सीएम पद की शपथ ली। 2017 तक वीरभद्र सिंह सीएम रहे और इस दरमियान कई नेताओं का वक्त आया और चला गया, पर वीरभद्र सिंह का तो मानो दौर चल रहा था। जब तक आखिरी सांस ली हिमाचल कांग्रेस में वीरभद्र का ही दबदबा रहा। अलबत्ता जब वे अस्तपाल में मौत से संघर्ष करते रहे तब भी उनका होना मात्र ही निष्ठावान कोंग्रेसियों को ऊर्जा देता रहा, सत्ता वापसी की आस देता रहा। बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस के लिए बीते कुछ वक्त में कुछ भी बेहतर नहीं हुआ, वोट बैंक खिसकता रहा, साधनों की कमी आड़े आती रही और नेतृत्व पर सवाल उठते रहे, बावजूद इसके पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता आशावान रहे कि वीरभद्र सिंह चुस्त - दुरुस्त रहेंगे और 2022 में वापस सत्ता में लौटेंगे। पर राजा वीरभद्र सिंह के जाने से आस भी धुंधला गई और निराशा भी हावी दिखने लगी है।
वीरभद्र सिंह युग के अवसान के साथ ही हिमाचल कांग्रेस के भविष्य पर सवाल उठने शुरू हो गए है। माइनस वीरभद्र सिंह अब भी कांग्रेस सरकार की कल्पना गले से नहीं उतर रही। बेशक उनके रहते भी गुटबाजी थी लेकिन वे थे तो कुछ भी मुमकिन था। वीरभद्र सिंह का रुतबा इतना ऊंचा रहा है कि पार्टी के बड़े नेता भी मुखर होकर उनका विरोध नहीं कर पाए। वे सर्वमान्य नेता बने रहे, अपनों के लिए भी और विरोधियों के लिए भी। अब जब वीरभद्र नहीं रहे तो कांग्रेस में चेहरे की जंग तय है। सबसे बड़ा संकट तो पार्टी को एक जुट रखना होगा। होने को तो दर्जनों कद्दावर नेता है लेकिन ऐसा कोई नहीं जिसका कद वीरभद्र समान विराट हो। पर सबसे दिलचस्प बात है कि ये सभी सीएम बनने के इच्छुक दिखते है। यानी वीरभद्र जैसी काबिलियत किसी ने साबित नहीं की पर उनका स्थान सबको चाहिए।
कांग्रेस के सत्ता विरह को साढ़े तीन साल हो चुके है, इस दौरान अधिकांश वक्त वीरभद्र अस्वस्थ रहे, फिर भी पार्टी उनका विकल्प नहीं तैयार कर सकी। नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ऊना तक सिमित हैं, अन्य जिलों में उनका प्रभाव न के बराबर है। कौल सिंह ठाकुर, जीएस बाली, सुधीर शर्मा जैसे नेता पिछला चुनाव हारने के बाद मानो सुनियोजित तरीके से हाशिए पर धकेल दिए गए हो। आनंद शर्मा विवादित बयान के बाद कांग्रेस हाईकमान में अपना रसूख खो चुके हैं। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में भी अब उनका पहले जैसा दखल नहीं है। वहीं संगठन का होना न होना एक ही बात हैं। प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर पूरी तरह बेअसर दिख रहे है। हालांकि उनकी तरफ से कोशिश कभी बंद नहीं हुई। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू भी हाशिए पर ही है। आशा कुमारी और कर्नल धनीराम शांडिल जैसे वरिष्ठ नेता भी अब तक ज्यादा आक्रामक नहीं दिखे। ऐसे में पार्टी का आम कार्यकर्ता अब किससे आस करें ?
फीका संगठन, कैसे मिलेगा सत्ता का स्वाद
वीरभद्र सिंह के निधन के बाद प्रदेश कांग्रेस में व्यापक फेरबदल की सुगबुगाहट तेज हो गई है। माना जा रहा है की जल्द प्रदेश संगठन में बदलाव मुमकिन है। माहिर मानते है कि अगर वक्त रहते संगठन का मेक ओवर नहीं हुआ तो 2022 में सत्ता वापसी बेहद मुश्किल होने वाली है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रदेश कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व बेहद फीका दिख रहा है, अगर 2022 में पार्टी सत्ता का स्वाद चखना चाहती है तो संगठन में आक्रामकता और सुनियोजित रणनीति का तड़का जरूरी है।
उपचुनाव पहली चुनौती
प्रदेश कांग्रेस के लिए अब उप चुनाव सबसे पहली चुनौती होंगे। मंडी संसदीय उप चुनाव के साथ फतेहपुर, जुब्बल कोटखाई और अब अर्की विधानसभा में भी उपचुनाव होने हैं। ये उपचुनाव कांग्रेस के लिए अग्नि परीक्षा से कम नहीं होंगे। कांग्रेस पार्टी की दशा और दिशा इन चुनाव से स्पष्ट होगी। वीरभद्र के निष्ठावानों की नजर प्रतिभा सिंह की तरफ ज़रूर होंगी मगर पार्टी में उभरते भावी मुख्यमंत्री और उनकी हद से ज़्यादा बढ़ती महत्वकांक्षाएं पार्टी को किस दिशा में ले जाती हैं, ये तो समय ही बताएगा।
