लगातार लग रहे भूकंप के झटकों से घबराया हिमाचल
हिमाचल प्रदेश के अधिकतर जिलों में हाल ही में भूकंप के तेज झटके महसूस किए गए थे। इस भूकंप के बाद से हिमाचल के लोग घबराए हुए है। इस भूकंप से किसी तरह का जानी नुकसान तो नहीं हुआ मगर प्रदेश की जनता दहशत में ज़रूर है। जानकारी के अनुसार इस भूकंप का केंद्र अफगानिस्तान के हिंदू कुश क्षेत्र में जमीन के अंदर 156 किलोमीटर की गहराई पर था और इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 6.6 रही। भूकंप के झटके पूरे उत्तर भारत में महसूस किए गए मगर हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य के लिए इस तीव्रता का भूकंप कहीं न कहीं चिंता का विषय है। इस भूकंप से हिमाचल के लोगों की आँखों के आगे 1905 की तबाही का मंजर आ गया। 4 अप्रैल 1905 में जब कांगड़ा की धरती पर यह भयावह दृश्य हुआ था, तो हिमाचल दहल उठा था।
1905 में 4 अप्रैल की सुबह भूकंप ने ऐसी तबाही बरपाई थी कि चारों ओर सिर्फ तबाही के निशान दिख रहे थे। कांगड़ा से लेकर लाहौर तक आई इस त्रासदी में 28 हजार लोगों की जान चली गई थी। सुबह छह बजकर 19 मिनट पर दो मिनट के लिए ऐसी हलचल हुई की लाखों परिवार बेघर हो गए और हजारों लोग इमारतों के नीचे दफन। रिक्टर पैमाने पर इस भूकंप की तीव्रता 7.8 मापी गई थी। भूकंप के बाद कांगड़ा का ये भयावह दृश्य आज भी जिला कांगड़ा के लोगों के मन में भय बनाए हुए है। 1905 में आए भूकंप से कांगड़ा के ज्यादातर ऐतिहासिक भवन नष्ट हो गए थे। सभी बाजार पूरी तरह से तबाह हो चुके थे। कांगड़ा किला, कांगड़ा मंदिर, सिद्धनाथ मंदिर पूरी तरह से नष्ट हो गए थे। बैजनाथ मंदिर को आंशिक नुकसान पहुंचा था।
अब फिर लगातार आ रहे भूकंप ने हिमाचल प्रदेश की चिंता बढ़ा दी है। दरअसल हिमाचल प्रदेश भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील पांचवें जोन में आता है। हिमाचल में 2022 में 50 से अधिक छोटे बड़े भूकंप आ चुके हैं। पहाड़ी राज्य होने के कारण बड़ा भूकंप हिमाचल के लिए विनाशकारी सिद्ध होगा। भारतीय मानक ब्यूरो ने देश को पांच अलग-अलग भूकंप जोन में बांटा हुआ है। पांचवें जोन में आने वाले इलाकों को सबसे ज्यादा खतरनाक और सक्रिय माना जाता है। इस जोन में आने वाले राज्यों में ज्यादा तबाही की आशंका रहती है। इसी तरह पांचवे से पहले जोन की ओर चलने पर जोखिम कम होता चला जाता है। सबसे खतरनाक यानी पांचवे जोन में जम्मू और कश्मीर का हिस्सा (कश्मीर घाटी), हिमाचल का पश्चिमी हिस्सा, गुजरात का कच्छ, उत्तराखंड का पूर्वी इलाका, उत्तरी बिहार का इलाका, भारत के सभी पूर्वोत्तर राज्य, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं। यानी अगर हिमाचल में भूकंप आता है तो नुक्सान ज़्यादा होगा।
हिमाचल में चंबा-कांगड़ा और किन्नौर सहित शिमला जिला में अपेक्षाकृत अधिक भूकंप आते हैं। यह देखने में आया है कि एक दशक में बड़ी तीव्रता का कोई भूचाल नहीं आया है। परंतु हिमाचल को हमेशा सतर्क रहने की जरूरत है। विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी से चुके है कि शिमला और अन्य पर्यटक स्थल जैसे मैक्लॉडगंज, कसौली, मनाली, पालमपुर, मंडी, सोलन और हिमाचल प्रदेश में कहीं भी इमारतें तीव्रता वाले भूकंप का सामना नहीं कर सकते हैं और ताश के पत्तों की तरह ढह सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता और सतर्कता से भूकंप के दौरान नुकसान को न्यूनतम किया जा सकता है। अधिक खतरे वाले इलाकों में भूकंप रोधी मकान बनाने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। साथ ही नियमित अंतराल पर सरकारी और स्वयंसेवी संस्थाओं को स्कूलों व पंचायतों में जागरूकता शिविर आयोजित किए जाने चाहिए। राज्य सरकार के अधिकारियों के अनुसार सभी जिलों को समय-समय पर मॉक ड्रिल आयोजित करने के निर्देश हैं। कई स्वयं सेवी संस्थाएं निजी तौर पर जागरूकता शिविर आयोजित करती हैं, जिन्हें सरकार हर संभव सहायता प्रदान करती है।
'भूकंपरोधी बनाए जायेंगे नए भवन'
हिमाचल प्रदेश सरकार भी प्रदेश में भूकंप को लेकर अलर्ट है। हिमाचल प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने कहा है कि वे इस बारे में पहले भी विभाग के साथ बैठक कर चुके हैं। इस बारे में विभाग को सख्त निर्देश दिए गए हैं। लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने कहा कि विभाग को निर्देश दिए गए हैं कि प्रदेश भर में जो नए भवन बनाए जा रहे हैं, उन्हें भूकंपरोधी बनाया जाए। साथ ही भवन बनाने में एडवांस तकनीक का इस्तेमाल किया जाए, ताकि भूकंप के वक्त नुकसान को कम से कम किया जा सके। उन्होंने कहा कि विभाग के अधिकारियों को इस बारे में स्टडी करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि आपातकालीन स्थिति में सरकार-प्रशासन पूरी तरह तैयार रहे।
झटकों के बाद नगर निगम शिमला सतर्क :
हिमाचल प्रदेश में आए भूकंप के झटकों के बाद नगर निगम शिमला भी सतर्क हो गया है। निगम ने शहर की कई भवनों को खाली करने के नोटिस जारी किए हैं, जो डेंजर जोन में हैं। दरअसल भूंकप के लिहाज से शिमला शहर बहुत संवेदनशील है। अधिकतर इमारतें भूकंप रोधी नहीं हैं। अगर कोई बड़ा भूकंप आता है तो जान-माल की भारी क्षति होगी। शिमला के 2 सिंकिंग जोन में रिज, ग्रैंड होटल, लक्कड़ बाजार, सेंट्रल स्कूल, ऑकलैंड नर्सरी स्कूल, धोबीघाट, कृष्णानगर और होटल क्लार्क्स के आसपास के इलाके शामिल हैं, जहां पर कोई नई बिल्डिंग बनाना खुद विनाश को न्योता देना है। शिमला ड्राफ्ट डेवलपमेंट प्लान में स्पष्ट रूप से पर्यावरण और प्राकृतिक खतरे पर अध्याय 12 के तहत पेज 156 पर उल्लेख किया गया है कि शिमला में भीषण भूकंप की स्थिति में 39 प्रतिशत इमारतें गिर सकती हैं। इसमें लोगों को नुकसान होने की संख्या भी 20,446 आंकी गई है। 25,000 की आबादी के लिए बने शिमला शहर में अब 2.3 लाख लोगों के रहने का अनुमान है। इमारतों को बनाने के लिए 70 डिग्री तक की ढलानों पर अनुमति दी गई है। शिमला भूकंपीय क्षेत्र-4 में आता है। भूकंप के सबसे खतरनाक जोन में होने के बाद भी यहां लापरवाही जारी है। स्थिति को ध्यान में रखते हुए, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 2017 में शिमला के मुख्य और हरित क्षेत्रों में बिल्डिंग बनाने समेत सभी निर्माण पर प्रतिबंध लगाया था।
मैक्लॉडगंज भी खतरे की जद में
धर्मशाला के उपनगरों में स्थित मैक्लॉडगंज में तेजी से बढ़ते अवैध निर्माण से तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के आवास पर खतरा मंडरा रहा है। विशेषज्ञों को डर है कि एक उच्च तीव्रता वाला भूकंप मैक्लोडगंज को मलबे के ढेर में बदल सकता है। कांगड़ा जिले के मैक्लॉडगंज में लगभग 16 हजार निर्वासित तिब्बती रहते हैं और इतनी ही संख्या भारतीयों की भी है।
कैसे आता है भूकंप?
भूकंप के आने की मुख्य वजह धरती के अंदर प्लेटों का टकरना है। धरती के भीतर सात प्लेट्स होती हैं जो लगातार घूमती रहती हैं। जब ये प्लेटें किसी जगह पर आपस में टकराती हैं, तो वहां फॉल्ट लाइन जोन बन जाता है और सतह के कोने मुड़ जाते हैं। सतह के कोने मुड़ने की वजह से वहां दबाव बनता है और प्लेट्स टूटने लगती हैं। इन प्लेट्स के टूटने से अंदर की एनर्जी बाहर आने का रास्ता खोजती है, जिसकी वजह से धरती हिलती है और हम इसे भूकंप मानते हैं।
भूकंप की तीव्रता
रिक्टर स्केल क्या होता है
अमेरिकी भूवैज्ञानिक चार्ल्स एफ रिक्टर ने सन 1935 में एक ऐसे उपकरण का इजाद किया, जो पृथ्वी की सतह पर उठने वाली भूकंपीय तरंगों के वेग को माप सकता था। इस उपकरण के जरिए भूकंपीय तरंगों को आंकड़ों में परिवर्तित किया जा सकता है। रिक्टर स्केल आमतौर पर लॉगरिथम के अनुसार कार्य करता है। इसके अनुसार एक संपूर्ण अंक अपने मूल अर्थ के 10 गुना अर्थ में व्यक्त होता है। रिक्टर स्केल में 10 अधिकतम वेग को दर्शाता है।
भूकंप की तीव्रता और अवधि का पता लगाने के लिए सिस्मोग्राफ का इस्तेमाल किया जाता है। इस यंत्र के जरिए धरती में होने वाली हलचल का ग्राफ बनाया जाता है, जिसे सिस्मोग्राम कहते हैं। इसके आधार पर गणितीय पैमाना (रिक्टर पैमाना) के जरिए भूकंप की तरंगों की तीव्रता, भूकंप का केंद्र और इससे निकलने वाली ऊर्जा का पता लगाया जाता है।
-रिक्टर स्केल पर 2.0 से कम तीव्रता वाले भूकंप को माइक्रो कैटेगरी में रखा जाता है और यह भूकंप महसूस नहीं किए जाते। रिक्टर स्केल पर माइक्रो कैटेगरी के 8,000 भूकंप दुनियाभर में रोजाना दर्ज किए जाते हैं।
-इसी तरह 2.0 से 2.9 तीव्रता वाले भूकंप को माइनर कैटेगरी में रखा जाता है। ऐसे 1,000 भूकंप प्रतिदिन आते हैं इसे भी सामान्य तौर पर हम महसूस नहीं करते।
-वेरी लाइट कैटेगरी के भूकंप 3.0 से 3.9 तीव्रता वाले होते हैं, जो एक साल में 49,000 बार दर्ज किए जाते हैं। इन्हें महसूस तो किया जाता है लेकिन शायद ही इनसे कोई नुकसान पहुंचता है।
-लाइट कैटेगरी के भूकंप 4.0 से 4.9 तीव्रता वाले होते हैं जो पूरी दुनिया में एक साल में करीब 6,200 बार रिक्टर स्केल पर दर्ज किए जाते हैं। इन झटकों को महसूस किया जाता है और इनसे घर के सामान हिलते नजर आते हैं। हालांकि इनसे न के बराबर ही नुकसान होता है।
छह फरवरी को भूकंप ने मचाई थी तबाही
बीती छह फरवरी को तुर्किये और पड़ोसी सीरिया में भूकंप के शक्तिशाली झटके महसूस किए गए थे। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 7.8 मापी गई थी। इसके एक-दो दिन बाद भी कई बार भूकंप के हल्के झटके महसूस किए गए थे। शक्तिशाली भूकंप से मरने वालों की संख्या 40 हज़ार से ज्यादा है।
