सामाजिक दूरी का पालन करते हुए किया सांकेतिक धरना प्रदर्शन
22 मई 2020 को अंबुजा सीमेंट वर्कर्स यूनियन दाड़लाघाट(सम्बंधित सीटू) ने प्रदेश व केन्द्र सरकारों द्वारा श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी परिवर्तनों के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन में उचित सामाजिक दूरी का पालन करतें हूऐ भाग लिया।
देश का मजदूर वर्ग कोरोना महामारी के कारण भारी मुसीबत में है। इसी दौरान 14 करोड़ लोगों की नौकरी चली गई है। कारखानों में मजदूरों की छंटनी हो रही है। मजदूरों को पूंजीपतियों द्वारा मार्च और अप्रैल का वेतन तक नहीं दिया गया है। लाखों मजदूर मजबूरी में बच्चों को कंधों पर उठाकर तपती धूप में, नंगे पांव, भूखे प्यासे अपने घर जाने के लिए पैदल चलने पर मजबूर कर दिए गए हैं। स्थिति इतनी भयंकर है कि कई गर्भवती महिलायें प्रसव पीड़ा से कराहते हुए सड़कों पर ही बच्चों को जन्म दे रही हैं। प्रवासी मजदूर भूख से तड़प रहे हैं और सरकारें कुम्भकर्ण की नींद सोई हुई हैं। वे पूंजीपतियों के साथ मिलकर श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी बदलाव को अमलीजामा पहना रही हैं। लाचार मजदूरों पर सरकार द्वारा पूंजीपतियों के साथ मिलकर यह हमला किया जा रहा है। इन हमलों में श्रम कानूनों में 8 घंटे के बजाय 12 घंटे काम लेना, मनरेगा मजदूरों को काम न देना, जब चाहे छंटनी कर देना व ई.पी.एफ. सुविधा छीनना आदि शामिल है।
कोरोना महामारी के कारण प्रदेश की तमाम जनता एक तरफ महामारी के गम्भीर खतरे से त्रस्त है वहीं दूसरी ओर इस महामारी से उत्पन्न आर्थिक व सामाजिक संकट ने जनता का सुख चैन छीन लिया है। लोग आर्थिक व सामाजिक रूप से भारी दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। इस से सबसे बुरी तरह से मजदूर वर्ग प्रभावित व पीड़ित हुआ है। इसके फलस्वरूप लागू हुए लॉक डाउन व कर्फ्यू से भारी संख्या में मजदूरों की छंटनी हो गयी है। उद्योगों में कार्यरत मजदूरों के बड़े हिस्से को मार्च-अप्रैल 2020 के वेतन का भुगतान नहीं किया गया है। असंगठित क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले श्रमिक वर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा इस महामारी से आर्थिक तौर पर बुरी तरह प्रभावित हुआ है। मजदूर वर्ग पर आई इस विपदा के दौर में उसे
आर्थिक-सामाजिक मदद की दरकार थी। उसे प्रदेश सरकार की सहानुभूति की ज़रूरत थी ताकि वह इस संकट काल से बाहर निकल कर अपना गुज़र बसर कर पाता। परन्तु अफसोस कि उसे सहानुभूति व आर्थिक मदद के बजाए और विपदाओं में धकेला जा रहा है। हिमाचल प्रदेश व केंद्र सरकार द्वारा श्रम कानूनों में संशोधन व परिवर्तन की प्रक्रिया इसी कड़ी का एक हिस्सा है। प्रदेश सरकार ने देश की मान्यता प्राप्त ट्रेड यूनियनों से इन श्रम कानूनों के संशोधन के संदर्भ में बात तक करना जरूरी नहीं समझा। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह सब कुछ पूंजीपतियों,कारखानेदारों व उद्योगपतियों के मुनाफों को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। पूंजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए मजदूरों द्वारा पिछले सौ वर्षों में हासिल किए गए अधिकारों को छीना जा रहा है।
कामकाजी जनता के बहुतायत को देश में पिछले 59 दिनों की तालाबंदी की प्रक्रिया में नौकरियों की बंदी, वेतन की हानि, निवास से बेदखली आदि अमानवीय कष्टों में झोंक दिया गया है। इन लोगों को मुनाफे के भूखे नियोक्ता वर्ग द्वारा भूखी अस्तित्व विहीन वस्तुओं में घटाकर रख दिया गया है। इस पर वर्तमान सरकार ने, इन कामकाजी लोगों को वास्तव में गुलामी के स्तर पर लाने के लिए, इन पर अपने फनों और पंजों के साथ हमला कर दिया है।
केंद्र सरकार ने इस क्रूर कवायद को शुरू करने के लिए अपनी आज्ञाकारी राज्य सरकारों को खुला छोड़ देने की रणनीति बनाई है। भाजपा नेतृत्व की गुजरात सरकार ने अगुआई करते हुए एकतरफा रूप से फैक्टरी एक्ट के अनुसार वैध मुआवजे के बगैर दैनिक कामकाज का समय 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया। हरियाणा और मध्य प्रदेश की सरकारों ने भी इसी ओर कदम बढ़ाए हैं। इसके बाद पंजाब और राजस्थान में राज्य सरकारों की ओर से भी इसी तरह दैनिक कामकाज का समय 12 घंटे तक बढ़ाने की अधिसूचना जारी करने की सूचना मिली है, जो जाहिर है कि कॉर्पोरेट वर्ग के निर्देशों पर है। अब महाराष्ट्र व त्रिपुरा की सरकारें भी कथित तौर पर उसी दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
इस दिशा में सबसे नए हैं उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के अधिक आक्रामक कदम, जो अपने कॉर्पोरेट आकाओं के हुक्म पर लगभग सभी श्रम कानूनों के दायरे से कॉर्पोरेट नियोक्ताओं को दायित्वों से मुक्त करने के लिए लाए गए हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने 1000 दिन, यानी तीन साल के लिए फैक्ट्री अधिनियम, मध्य प्रदेश औद्योगिक संबंध अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम, ठेका श्रम अधिनियम आदि जैसे विभिन्न श्रम कानूनों के तहत नियोक्ताओं को उनके मूल दायित्वों से मुक्त करने के लिए प्रशासनिक आदेश/अध्यादेश के जरिये परिवर्तन के निर्णय की घोषणा की है। इसके चलते नियोक्ताओं को "अपनी सुविधानुसार" श्रमिकों को काम पर रखने या निकाल बाहर करने(लगाओ व भगाओ-हायर एंड फायर) के लिए सशक्त बनाया गया है; और उक्त अवधि के दौरान प्रतिष्ठानों में श्रम विभाग का हस्तक्षेप नहीं होगा। इतना ही नहीं, नियोक्ताओं को मध्य प्रदेश श्रम कल्याण बोर्ड को प्रति श्रमिक 80 / - रुपये के भुगतान से भी छूट दी गई है।
इसी प्रकार उत्तर प्रदेश सरकार ने 6 मई 2020 को आयोजित अपनी मंत्रिमंडल की बैठक में राज्य के सभी प्रतिष्ठानों को तीन साल की अवधि के लिए सभी श्रम कानूनों से छूट देने का फैसला किया है, जिसे अध्यादेश के माध्यम से अधिसूचित किया जाएगा।
यह भी जानकारी है कि त्रिपुरा में भाजपा सरकार ने दैनिक कामकाज के समय को 12 घंटे तक बढ़ाने का प्रस्ताव किया है और साथ ही 300 कर्मचारियों तक को रोजगार देने वाले सभी प्रतिष्ठानों में नियोक्ताओं की सुविधा के अनुसार श्रमिकों को काम पर रखने और निकालने (लगाओ व भगाओ-हायर एंड फायर) की अनुमति दी है।
यह आशंका है,कि अधिकांश अन्य राज्य सरकारें, विशेष रूप से वे जो भाजपा और उसके सहयोगियों द्वारा शासित हैं, विकास के नाम पर दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा करने और अपनी अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार की संदिग्ध दलील पर राज्य में निवेश आकर्षित करने के लिए इसी रास्ते का अनुसरण करेंगे। वास्तव में, कामकाजी जनता पर यह अमानवीय अपराध किया जा रहा है। पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों के शोषण को तेज करने की इस कड़ी में अब हिमाचल प्रदेश भी जुड़ गया है जहाँ की सरकार ने 21 अप्रैल 2020 की अधिसूचना के ज़रिए कारखाना अधिनियम के तहत काम के घण्टों को आठ से बारह करने पर मुहर लगा दी है। इस सरकार ने 13 मई 2020 की कैबिनेट बैठक में कारखाना, ठेका मजदूरी व औद्योगिक विवाद अधिनियम में मजदूर विरोधी संशोधन किए
1. हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, पंजाब व त्रिपुरा जैसे राज्यों में श्रम कानूनों में किए गए अथवा प्रस्तावित मजदूर विरोधी संशोधनों को तुरन्त वापिस लिया जाए।
2. फैक्टरी एक्ट, कॉन्ट्रैक्ट लेबर एक्ट, इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट में बदलाव व 8 घण्टे की डयूटी को 12 घण्टे करने का निर्णय मजदूरों के अधिकारों पर कठोर प्रहार है। प्रदेश सरकार ने 21 अप्रैल 2020 को अधिसूचना जारी करके कारखाना अधिनियम(फैक्ट्रीज एक्ट)1948 की धारा 51, धारा 54, धारा 55 व धारा 56 में बदलाव करके साप्ताहिक व दैनिक काम के घण्टों, विश्राम की अवधि व स्प्रैड आवर्ज़ में बदलाव कर दिया है। काम के घण्टों की अवधि को आठ से बढ़ाकर बारह घण्टे कर दिया है। इस से न केवल मजदूरों की छंटनी होगी अपितु कार्यरत मजदूरों की बंधुआ मजदूरों जैसी स्थिति हो जाएगी इसलिए इस निर्णय को वापिस लिया जाए।
3. सरकार ने 13 मई 2020 को हुई कैबिनेट की बैठक में संविदा श्रमिक अधिनियम(कॉन्ट्रैक्ट लेबर एक्ट) 1970 की धारा 1(4)में संशोधन कर दिया है। इस तरह कॉन्ट्रैक्ट लेबर एक्ट में श्रम क़ानूनों को लागू करने के लिए किसी भी स्थापना में बीस ठेका मजदूरों की शर्त को बढ़ाकर तीस कर दिया है। इस तरह ठेका कर्मियों की भारी संख्या को श्रम कानून के दायरे से बाहर कर दिया है।
4. इसी केबिनेट बैठक में कारखाना अधिनियम(फैक्ट्रीज़ एक्ट) 1948 की धारा 2(m)(i), 2(m)(ii), 65(3)(iv) व 85(1)(i) में मजदूर विरोधी परिवर्तन किये गए हैं तथा कारखाना की परिभाषा को पूरी तरह बदल कर रख दिया गया है। इसके अनुसार ऊर्जा संचालित कारखाना की सीमा को दस से बढ़ाकर बीस मजदूर व बगैर ऊर्जा के संचालित कारखाना की सीमा को बीस से बढ़ाकर चालीस मजदूर करके मज़दूरों की भारी संख्या को कारखाना अधिनियम के दायरे से बाहर कर दिया गया है। इसी अधिनियम की धारा 65(3) में संशोधन करके ओवरटाइम कार्य के घण्टों को 75 से बढ़ाकर 115 कर दिया गया है। इस अधिनियम में धारा 106(b) जोड़ कर उद्योगपतियों को कानून की अवहेलना पर दी जाने वाली सज़ा व कठोर कार्रवाई में बिना शर्त छूट दी गयी है। ये निर्णय मजदूर विरोधी हैं। कारखाना अधिनियम में बदलाव व श्रम कानूनों के निलंबन से मजदूर एम्प्लॉईज़ कंपनसेशन एक्ट 1923, वेतन भुगतान अधिनियम 1936, इंडस्ट्रियल एम्प्लॉयमेंट(स्टैंडिंग ऑर्डरज़) एक्ट 1946,फैक्ट्रीज एक्ट 1948, न्यूनतम वेतन कानून 1948, ईएसआई एक्ट 1948,ईपीएफ एक्ट 1952, मेटरनिटी बेनेफिट एक्ट 1961, बोनस एक्ट 1965, इकुअल रयुमनरेशन एक्ट 1976, इंटर स्टेट माइग्रेंट वर्कमैन एक्ट 1979 आदि चौदह तरह के श्रम कानूनों के दायरे से मजदूर बाहर हो जाएंगे।
5. प्रदेश सरकार ने कैबिनेट बैठक में औद्योगिक विवाद अधिनियम(इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट) 1947 की धारा 22(1),25(F)(b) व 25(K) में बदलाव के लिए उचित कदम उठाने की सिफारिश की बात की है। यह पूर्णतः मजदूर विरोधी है। सरकार के इन कदमों ने मजदूरों पर कई प्रकार के हमलों का दरवाजा खोल दिया है। धारा 22(1) में बदलाव से मजदूरों के हड़ताल करने के अधिकार पर कटौती होगी। धारा 25(F)(b) में बदलाव से छंटनी व छंटनी भत्ता की पक्रिया पूरी तरह उद्योगपतियों के पक्ष में हो जाएगी। धारा 25(K) में बदलाव से छंटनी,ले ऑफ व तालाबंदी के विशेष प्रावधानों के लिए मजदूरों की संख्या को एक सौ से बढ़ाकर तीन सौ करने की सिफारिश की गई है जिस से प्रदेश के दो-तिहाई उद्योगों के हज़ारों मजदूरों को भारी नुकसान होगा।
6. केंद्र सरकार ने ईपीएफ हिस्सेदारी को 12 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत करने की घोषणा की है। यह कदम मजदूर विरोधी है व लंबे समय के लिए उद्योगतियों को फायदा पहुंचाने वाला है।
आशा है कि प्रदेश व केन्द्र सरकार सभी मजदूर विरोधी संशोधनों को अविलम्ब रद्द करेंगे। सीटू मजदूर ने इस संदर्भ में उचित सकारात्मक पहलकदमी की उम्मीद की हैं
