शिमला : किसान संघर्ष समिति की बैठक का हुआ आयोजन, इन मुद्दों पर हुई चर्चा
शिमला के गुम्मा, कोटखाई में मंगलवार को किसान संघर्ष समिति की बैठक सुशील चौहान की अध्यक्षता में आयोजित की गई। बैठक में किसान संघर्ष समिति के महासचिव संजय चौहान व समिति के अन्य सदस्य भी उपस्थित रहे। संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा कृषि कानूनों को रदद् करने व सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित कर इसको कानूनी रूप देने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन का समर्थन देने के बारे में चर्चा की गयी। बैठक में कहा गया कि किसानो के मुद्दों पर किसान सभा व अन्य संगठनों के द्वारा 9 अगस्त को देशव्यापी आंदोलन किया जा रहा है। किसान संघर्ष समिति भी इसमे भाग लेगी तथा कोटखाई व अन्य स्थानों पर भी प्रदर्शन किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री को किसान मांगों को लेकर ज्ञापन दिया जाएगा। बैठक में भाग लेते हुए सदस्यों ने बागवानों को आ रही समस्याओं पर चर्चा की तथा ओलावृष्टि, सूखे व अन्य प्राकृतिक आपदाओं से किसानों व बागवानों को हुई भारी क्षति पर चिंता जाहिर की गई। उनके द्वारा सरकार से मांग की गई कि जिन किसानों व बागवानों की फसलों को प्राकृतिक आपदा से नुकसान हुआ है सरकार उनको उचित मुआवजा प्रदान करे तथा किसानों व बागवानों द्वारा लिए गए कर्ज की वसूली पर रोक लगाए।
बैठक में सदस्यों ने सेब व अन्य फलों तथा सब्जियों में इस्तेमाल किये जाने वाले पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में की गई भारी वृद्धि को तुरन्त वापिस लेने का आग्रह सरकार से किया। इस वर्ष सेब की पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले एक कार्टन बॉक्स की कीमत में 12 से 15 रुपए तक की वृद्धि की गई है और एक ट्रे के बंडल में 100 रुपये प्रति बंडल की वृद्धि की गई है। यह वृद्धि 30 प्रतिशत के वृद्धि है। इसी के साथ माल भाड़े की दरों में भी 20 से 30 प्रतिशत की वृद्धि की गई जबकि सेब व अन्य फलों की कीमत में गत वर्ष की तुलना में 25 प्रतिशत तक कि कमी दर्ज की गई है। इससे बागवानों पर और अधिक बोझ पड़ रहा है जबकि उनकी आय में कमी आ रही है।
बैठक में प्रदेश की विभिन्न मंडियों में गैर कानूनी तरीके से किसानों व बागवानों से की जा रही वसूली पर भी चर्चा की गई। उन्होंने कहा की बागवानों से लोडिंग, अनलोडिंग, बैंक चार्जिस, स्टेशनरी, छूट आदि के नाम पर 50 से 70 रुपए तक प्रति पेटी अधिक वसूली कर मंडियों में बागवानों से करोड़ों रुपए की लूट की जा रही है। यह बिल्कुल गैरकानूनी है तथा इस पर एपीएमसी, मार्केटिंग बोर्ड व सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। बैठक में निर्णय लिया गया कि यदि सरकार समय पर किसानों व बागवानों की इन जायज़ मांगों को हल नहीं करती तो किसानों के अन्य संगठनों के साथ मिलकर किसान संघर्ष समिति आंदोलन करने के लिए मजबूर होगी।
