करसाेग : पांगणा में धूमधाम से मनाया दुर्गा अष्टमी में आयोजित होने वाला आठी मेला
राज सोनी । करसोग
ऐतिहासिक नगरी पांगणा की पुरातन संस्कृति की पहचान लिए दुर्गाष्टमी पर आयोजित होने वाला 'आठी मेला' धूम-धाम से संपन्न हो गया। पांगणा में लाहौल मेले के बाद यह दूसरा मेला है। इस मेले में सुकेत अधिष्ठात्री राज-राजेश्वरी महामाया पांगणा और छण्डयारा महामाया के देव रथो ने ढाढी बाजगियो तथा हार के जातरूओ सहित भाग लिया। आठी मेले का मुख्य आकर्षण छण्डयारा से लगभग छह किलोमीटर दूरी पर स्थित पांगणा तक की रथ शोभायात्रा तथा महामाया मंदिर से दोनों देवियो की मेला स्थल देहरी तक की ढोल-नगारो संग निकलने वाली शोभायात्रा है। इस अवसर पर पांगणा ही नहीं अपितु पूरे सुकेत क्षेत्र, जिला, प्रदेश व देश की समृद्धि और सुख शांति के लिए प्राचीन परंपरा के अनुसार नारियल की बलि दी गई। पुरातत्व संरक्षण के लिए पुरातत्व चेतना संघ मण्डी द्वारा स्वर्गीय चन्द्रमणी कश्यप पुरातत्व राज्य पुरस्कार से सम्मानित डाक्टर जगदीश शर्मा, महामाया मंदिर समिति के अध्यक्ष कुशल महाजन महासचिव अनुपम गुप्ता का कहना है कि शारदीय नवरात्र की अष्टमी पर सुकेत की आदि राजधानी पांगणा के देहरी मंदिर में सात्विक विधान से महामाया पांगणा की पूजा संपन्न हुई।
दुर्गाष्टमी के अवसर पर कभी पांगणा के पश्चिम में देहरी नामक स्थान पर भैंसे की बलि देने की परम्परा थी, लेकिन लगभग डेढ़ दशक से भैसे की बलि बंद है। देहरी मे कोलकाता (कालकूट) से यहां प्रतिष्ठित महाकाली रूपा महामाया का मंदिर है। सुकेत रियासत के राजवंश के 52 चंद्रवंशी शासक देहरी वाली कलकत्ता काली के उपासक रहे है। इतिहासकार, साहित्यकार व सुकेत संस्कृति-साहित्य और जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डॉ. हिमेंद्र बाली 'हिम' का कहना है कि स्थानीय उपलब्ध लिखित साहित्य के अनुसार देहरी के समीपस्थ ढुंगरू गांव में लगभग 1500 वर्ष पूर्व साईबेरिया की बर्बर 'डुंगर' जाति रहती थी। इस जाति की बर्बरता से जब लोग त्रस्त हुए, तो उसी काल में बंगाल का राजकुमार बीरो हिमालय में अपने लिए नए राज्य की खोज में यहां पहुंचा। उत्पीड़ित लोगों के आग्रह पर राजकुमार ने बर्बर डुंगर जाति के नाश के लिये अपनी इष्ट देवी कालकूट की महाकाली का आह्वान किया।
इनका कहना है कि 'आठी उत्सव' हमारी पुरातन संस्कृति व सामुदायिक सहयोग की पहचान है।खुशहाली की किरणें फैलाते ऐसे-ऐसे उत्सवों का संरक्षण करना ही हमारी पहचान है। पांगणा की कला-संस्कृति के वैभव, लोक उत्सव, लोक गीत, लोक गाथाओं और लोकोत्सवों को बचाने के लिए सरकार व कला संस्कृति व भाषा विभाग को भी प्रयास करने चाहिए।देहरी का मंदिर भारतीय कला की धरोहर माना जाता है। यहा पर सूर्य देव की ईरानी कला से प्रभावित मूर्ति तथा वरुणदेव की मूर्ति भी प्रकट हुई है। यह मंदिर आज जर्जर हालत में है। प्रदेश सरकार, पुरातत्व विभाग तथा पर्यटन विभाग यदि भारतीय संस्कृति की इस धरोहर को संरक्षित करें, तो यह पर्यटकों, पुरातत्व प्रेमियों तथ शोद्धार्थियों की पहली पसंद बन सकता है। सूर्यास्त के साथ ही देवी के दोनों रथों ने भावपूर्ण अंतिम मिलन कर अपने साजिंदाे, कारदारों सहित विदाई लेकर अपनी-अपनी देव कोठियो को प्रस्थान कर दिया।
