तीन रिक्त मंत्री पदों में से कांगड़ा को दो की उम्मीद
हिमाचल प्रदेश की सियासत में जिला कांगड़ा का सियासी वजन सबसे ज्यादा है। शिमला की गद्दी का रास्ता कांगड़ा से होकर ही गुजरता है। जो राजनैतिक दल कांगड़ा फ़तेह करता है, सत्ता भी उसी को नसीब होती है। ये ही कारण है कि सरकार किसी की भी हो, कांगड़ा के मान-मनौव्वल और अधिमान का पूरा ख्याल रखा जाता है। इस बार भी कांग्रेस को जिला की 15 में से 10 सीटें मिली और सत्ता भी उसी को मिली। पर सरकार में कांगड़ा को अब तक वो अधिमान नहीं मिला, जिसकी अपेक्षा थी। मुख्यमंत्री सहित कुल 9 मंत्रियों में से अब तक कांगड़ा के खाते में सिर्फ एक मंत्रिपद आया है और वो है वरिष्ठ नेता और ज्वाली विधायक चौधरी चंद्र कुमार। हालांकि इसके अलावा कांगड़ा को आशीष बुटेल और किशोरी लाल के रूप में दो सीपीएस भी मिले है और युवा नेता रघुबीर बाली और गोकुल बुटेल को कैबिनेट रैंक दिए गए है। पर मंत्रीपद तो आखिर मंत्रिपद होता है और कांगड़ा को फिलवक्त नए मंत्रियों का इन्तजार है।
सुक्खू कैबिनेट में अभी तीन मंत्री पद रिक्त है और इन्हीं तीन पदों पर चाहवानों की निगाहें टिकी है। इस फेहरिस्त में कांगड़ा के कई चेहरे शामिल है। ज्वालामुखी से संजय रतन, धर्मशाला से सुधीर शर्मा ,जयसिंहपुर से यादविंदर गोमा ,फतेहपुर से भवानी पठानिया मंत्री पद के दावेदारों में शामिल है।
पहले बात उस चेहरे की करते है जो पहले विस्तार में ही मंत्रिपद की दौड़ में आगे माने जा रहे थे, लेकिन सियासत में कब समीकरण बदल जायें, कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसा ही कुछ अब तक होता दिखा है धर्मशाला से विधायक सुधीर शर्मा के साथ। वीरभद्र सरकार में सुधीर शर्मा को नंबर दो माना जाता था और कहते है तब सुधीर की रज़ा में ही वीरभद्र सिंह की रज़ा होती थी। फिर सियासी फिजा कुछ यूँ बदली कि 2017 में सुधीर विधानसभा भी नहीं पहुंच पाएं। 2019 के उपचुनाव से भी उन्होंने खुद को दूर कर लिया। इस बार सुधीर शर्मा जीतने में कामयाब ज़रूर रहे है लेकिन पहले मंत्रिमंडल विस्तार में सुधीर शर्मा को जगह नहीं मिली। अब दूसरे चरण में उनका नाम शामिल होता है या नहीं ये तो समय ही तय करेगा। पर निसंदेह उनका दावा कमतर बिलकुल नहीं है।
दूसरा नाम जो सबसे ज़्यादा चर्चा में है वो नाम है ज्वालामुखी से विधायक संजय रतन का। संजय रतन के राजनीतिक सफर की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई है। 2003 और 2007 में संजय रतन ने ज्वालामुखी विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। फिर 2012 में जब प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में आयी तो संजय रतन भी पहली दफा चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद 2017 में सत्ता परिवर्तन हुआ तो संजय रतन भी चुनाव हार गए। इस बार संजय रतन ने जीत हासिल की है और दूसरी बार विधायक बने है। संजय रतन ब्राह्मण चेहरा है और जिला काँगड़ा से है। ऐसे में क्षेत्रीय समीकरण बैठाने और जातीय संतुलन साधने के लिए संजय रतन का नाम भी मंत्रिपद की दौड़ में आगे माना जा रहा है।
यादविंदर गोमा भी मंत्रीपद की फेहरिस्त में शामिल माने जा रहे है। दरअसल यादविंदर गोमा एससी चेहरा है और जानकार मान रहे है कि एक मंत्री एससी कोटे से हो सकता है और दूसरा ब्राह्मण। ऐसे में जाहिर है जो एससी चेहरा चर्चा में है वो जयसिंहपुर से दूसरी बार विधायक बने यादविंदर गोमा हो सकते है। अब यदि ऐसा होता है तो संभव है कि गोमा कई वरिष्ठ नेताओं को पछाड़ कर मंत्री पद ले जाएं।
एक और नाम की चर्चा जरूरी है। कॉर्पोरेट करियर को अलविदा कहकर सियासी दंगल में उतरने वाले भवानी सिंह पठानिया का नाम भी मंत्रीपद के चेहरों में शामिल माना जा रहा है। दरअसल स्वर्गीय सुजान सिंह पठानिया के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके बेटे भवानी सिंह पठानिया ने जीत दर्ज कर प्रदेश की सियासत में एंट्री ली और इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में भी पूर्व में मंत्री रहे राकेश पठानिया को मात देकर भवानी विधानसभा पहुंचे। अब भवानी पठानिया को भी सुक्खू मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी इसको लेकर कयासों का सिलसिला जारी है। जानकार मानते है कि भवानी कई दिग्गजों को पछाड़ कर बाजी मार सकते है।
हर सरकार में मिलती है तवज्जो :
कांग्रेस को सत्ता की चाबी देने में जिला कांगड़ा का बड़ा योगदान रहा है। पिछली कई सरकारों की बात की जाए तो ज़िला काँगड़ा को हर बार तीन से चार मंत्री मिलते रहे है। पिछली जयराम सरकार में कांगड़ा को विधानसभा अध्यक्ष के अलावा तीन मंत्री पद मिले थे। इस बार भी सुक्खू कैबिनेट में कांगड़ा को लगभग तीन मंत्री मिलना के कयास लगाए जा रहे है। अब दूसरे कैबिनेट विस्तार का इन्तजार है।
कांगड़ा के लिए हुई कई घोषणाएं :
हाल ही में बजट सेशन के दौरान सुक्खू सरकार ने जिला काँगड़ा के लिए कई बड़ी घोषणाएं की है। जिला काँगड़ा को टूरिज्म कैपिटल बनाने के साथ-साथ अन्य कई बड़े फैसले लिए गए है। जाहिर है सुक्खू सरकार जिला काँगड़ा को तवज्जों देने की पूरजोर कोशिश कर रही है, लेकिन अब भी मंत्री पद को लेकर जिला काँगड़ा आस लगाए
बैठा है।
