करसोग : रासायनिक खादों के दामों में बढ़ोतरी से नाराज किसान और बागवान
भारत के पांचवे प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती के मौके पर हर साल यह खास दिन मनाया जाता है। चौधरी चरण सिंह ने अपने कार्यकाल में कृषि क्षेत्र के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। साथ ही किसानों का जीवन अच्छा हो इसके लिए नीतियों की शुरुआत की गई थी। भारत सरकार 2001 से हर साल 23 दिसंबर को किसान दिवस मनाती है आ रही है।
देश के वर्तमान प्रधानमंत्री ने भी किसानों के हितों में बहुत सारे वादे किये थे। लेकिन एक साल के अंदर रासायनिक खादों के दामों में 40 प्रतिशत तक हुई बढ़ोतरी ने एक तरफ 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने के लक्ष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं वहीं किसानों की चिंता को भी बढ़ा दिया है। हिमाचल प्रदेश में गेहूं, नकदी फसलों और सेब के बगीचों में किसानों द्वारा पोटास और 12-32-16 का इस्तेमाल किया जाता है। खादों की कमी और रेट में बढ़ोतरी चुनावी साल में सत्ताधारी पार्टी के लिए भी चुनौती खड़ी कर सकती है।
नए दाम के अनुसार 12:32:16 खाद 285 रुपये तक महंगी मिलेगी। यानी जीएसटी के साथ 1470 रुपये प्रति बोरी मिलेगी। पहले इसका दाम 1185 रुपये प्रति बोरी था। 15:15:15 खाद भी 170 रुपये महंगी मिलेगी। यह खाद 1350 रुपये में जीएसटी के साथ मिलेगी। इसका पुराना दाम 1180 रुपये था। म्यूरेट ऑफ पोटाश के दाम में भी 190 रुपये का उछाल आया है। 850 रुपये में मिलने वाली इस खाद के लिए अब 1040 रुपये चुकाने होंगे।
किसान एक मात्र ऐसा व्यापारी है जो अपने माल की कीमत खुद तय नहीं करता। कोई दूसरा व्यक्ति उसके माल की कीमत तय करता है। लेकिन फसल तैयार करने के लिए उसे जिन उपकरणों व खादों की जरूरत पड़ती है उसके लिए किसान को हर तरह की कीमत चुकानी पड़ती है। बावजूद इसके हाल ही में हुई खादों के दाम में वृद्धि ने किसानों की कमर तोड़ दी है। एक तरफ तो 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने की बात कही जाती है तो वहीं दूसरी तरफ खादों व कीटनाशकों के दामों में बेलगाम वृद्धि ने किसानों की हालात बदतर कर दी है। पोटाश सेब की बागवानी में महत्वपूर्ण उर्वरक है। इसकी कीमतों में वृद्धि किसानों की जेब पर तगड़ा प्रभाव डालेगी। दूसरी तरफ मौसम की मार से प्रभावित किसानों को राहत नहीं मिल पा रही है। लगातार उर्वरकों की खप्त हिमाचल में बढ़ती जा रही है। 1985-86 उर्वरकों की खप्त 23,664 थी जो 2018-19 में बढ़कर 57,560 हो गई थी।
करसोग के समाज सेवी बंसी लाल कौंडल कहते हैं कि एक तरफ सरकार खादों और किटनाशको के रेट बढ़ाती है दूसरी तरफ फसलों के उचित मूल्य भी नहीं देती। हिमाचल में सरकार द्वारा सेब का क्रय मूल्य 9.5 पैसे है जब कि कश्मीर में यह 24 रुपये तक है। सेब के सीजन में सेब की जो दुर्गती हुई थी वह सभी को पता है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2019 में कश्मीर के सेब का सरकार ने डिलिशियस ए ग्रेड सेब का समर्थन मूल्य 48 से 52 रुपये प्रति किलो, बी ग्रेड के सेब के लिए 32 से 36 रुपये व सी ग्रेड सेब के लिए 15.75 से 18 रुपये किलो दिया था। अगर सरकार किसानों की अनदेखी करेगी तो 2022 के चुनाव में इसके नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहे।
वहीं भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव और बागवान श्याम सिंह चौहान कहते हैं कि करसोग में कई टन उर्वरकों की खप्त होती है। बढ़े हुए दामों के हिसाब से किसानों को पिछले साल की तुलना में लाखों रुपये अधिक चुकाने होंगे। सरकार ने किसानों की आय को दोगुना करने का वादा किया था लेकिन सरकार खुद किसानों की जेब खाली करने पर तुली हुई है। फसलों पर लागत इतनी बढ़ गई है कि खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गई है और प्रदेश का नौजवान इस से दूर होता जा रहा है। अगर सरकार को आय दोगुनी करनी है तो इसके लिए ठोस नीतियां बनानी पड़ेंगी और खाद व कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों पर तुरंत लगाम लगानी होगी ।
