शिमला : रोजगार एवं स्वावलंबन पर संघ की सुखद पहल
फर्स्ट वर्डिक्ट। शिमला
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने कर्णावती के अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की 11-13 मार्च 2022 की बैठक में देश में एक ऐसा आर्थिक मॉडल विकसित करने हेतु आग्रह किया हैै, जिसके अंतर्गत मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ-साथ रोजगार के अधिक अवसर निर्मित हो सके, जिससे कुटीर एवं लघु उद्योगों का ग्रामीण क्षेत्राें में विस्तार किया जा सके। संघ के ये स्वावलंबी एवं आत्मनिर्भर अर्थतंत्र के ये विचार, दर्शन, कार्यक्रम एवं इतिहास प्रारंभ से ही सशक्त एवं सुदृढ़ राष्ट्र-निर्माण का आधार रहे हैं। संघ का भारत की आजादी एवं इसके नवनिर्माण में अभूतपूर्व योगदान रहा है और अब भारत को समग्र दृष्टि से विकसित करने के लिए संघ प्रयासरत है, जो एक सुखद आश्चर्य का विषय है, जिस पर समग्र राष्ट्र को बिना किसी आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह के आगे बढ़ना चाहिए।
संघ का स्पष्ट मतव्य है कि मानव केंद्रित, पर्यावरण के अनुकूल, श्रम प्रधान तथा विकेंद्रीकरण एवं लाभांश का न्यायसंगत वितरण करने वाले भारतीय आर्थिक मॉडल को विकसित किया जाना चाहिए, ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सूक्ष्म उद्योग, लघु उद्योग और कृषि आधारित उद्योगों को विकसित करते हुए भारत की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर एवं स्वावलंबी बनाया जा सके। ग्रामीण रोजगार, असंगठित क्षेत्र एवं महिलाओं के रोजगार और अर्थव्यवस्था में उनकी समग्र भागीदारी जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा देना संघ के इस आर्थिक सोच का उद्देश्य है। संघ चाहता है कि देश की सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप नई तकनीकी तथा कौशल विकास को अंगीकार करके आर्थिक क्षेत्र में नए उजाले किए जाएं।
संघ का नया आर्थिक मॉडल माध्यम है एक सशक्त भारत के निर्माण को प्रभावी प्रस्तुति देने का। यह एक दस्तक है, एक आह्वान है, जिससे न केवल सशक्त भारत का निर्माण होगा, बल्कि इस अनूठे काम में लगे संघ और उसके आर्थिक मॉडल से भारत के असंख्य युवाओं की आर्थिक समस्याओं एवं बेरोजगारी की समस्या से मुक्ति मिल सकेगी। बदलती आर्थिक तथा तकनीकी परिदृश्य की वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए भी हम सभी को मिलकर सामाजिक स्तर पर नवोन्मेषी पद्धतियां ढूंढने की आवश्यकता है। भारत को सशक्त राष्ट्र बनाने, भारतीय संस्कृति को समृद्ध एवं शक्तिशाली बनाने के लक्ष्य के साथ 27 सितंबर 1925 को विजयदशमी के दिन संघ की स्थापना की गई थी। 2025 में यह संगठन 100 साल का हो जाएगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक विचारधारा है, एक संस्कृति है, एक आंदाेलन है, एक मिशन है। इसलिए उसके बेरोजगारी दूर करने एवं स्वावलंबन के नवीन उद्घोष का राष्ट्र निर्माण में अपूर्व योगदान हो सकता है। बात केवल आजादी में योगदान की ही नहीं है, बल्कि भारत को सशक्त एवं स्वावलंबन बनाने की भी है। 1925 से 1940 तक स्वतंत्रता आंदोलन का सहयोग करते हुए डॉ. हेडगेवार ने स्वयंसेवक बनाने पर ध्यान दिया, उनका मानना था कि स्वयंसेवक आजादी के सिपाही के रूप में खड़े होंगे और वे हुए भी। 1940 तक संघ का सांगठनिक आधार देश भर में काफी व्यापक हो चुका था, जिसे उनके बाद गुरुजी गोलवलकर ने वैचारिक सुदृढ़ता प्रदान की।
संघ ने अपने प्रस्ताव में भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करते हुए समग्र विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु नागरिकों से रोजगार सृजन के भारत केंद्रित मॉडल पर काम करने का आह्वान भी किया है। साथ ही समाज के सभी घटकों का भी आह्वान किया है कि विविध प्रकार के कार्य के अवसरों को बढ़ाते हुए हमारे शाश्वत मूल्यों पर आधारित एक स्वस्थ कार्य-संस्कृति को प्रस्थापित करें, जिससे भारत वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर पुनः अपना उचित स्थान अंकित कर सके। कोरोना महामारी में संघ सहित विभिन्न स्वयंसेवी, समाजसेवी, धार्मिक, औद्योगिक एवं आर्थिक संगठनों ने समाज के गरीब एवं जरूरतमंद वर्ग की मदद करने में आपस में मिलकर कार्य किया था। उसी प्रकार अब भारत को स्वावलंबी बनाने के लिए भी इन सभी संगठनों को आगे आकर रोजगार के नए-नए अवसर उपलब्ध कराने की अपेक्षा संघ द्वारा की जा रही है। देश में रोजगार सृजन के अनेक सफल उदाहरण उपलब्ध हैं। इसी बात को राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने बड़े सरल शब्दों में कहा था-स्वावलंब की एक झलक पर, न्यौछावर कुबेर का कोष। यदि सुखमय जीवन के इस सहज मार्ग को सब लोग अपनाते हैं तो सामाजिक जनजीवन स्नेह, सौहार्द और समरसता से चल पाता है, अन्यथा बिना प्रयास, श्रम और साधना के अनर्जित सुख प्राप्त करने की या दूसरों की कमाई पर जीने या दूसरों की संपत्ति हड़प कर आसुरी आनंद पाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।
