सत्ता विरह झेल रही कांग्रेस में पद और कद की जंग शुरू हो चुकी है। अलबत्ता, अभी विधानसभा चुनाव में एक वर्ष का वक्त शेष है लेकिन किसके हाथ में क्या है और कितना है, इसका गुणा-भाग पार्टी की अंदरूनी राजनीति के लिहाज से बेहद जरूरी है। सो चाहवान हिसाब-किताब भी बराबर रख रहे है और जरूरत के लिहाज से शक्ति की नुमाईश भी हो रही है। इस बीच भाजपा सरकार की टांग खिंचाई भी बदस्तूर जारी है। बुजुर्ग पार्टी में नया अपडेट ये है कि नेताओं को आजकल दिल्ली खूब भा रही है। दिल्ली में लगातार मुलाकातों का सिलसिला चला हुआ है, और माहिर इन मुलाकातों में संभावित सियासी मुक्का-लातों को अभी से देखने लगे है। दरअसल पार्टी का एक तबका प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन चाह रहा है। इसलिए आलाकमान के दरबार में हाज़री भर दरख्वास्त के साथ-साथ सियासी बल भी दिखाया जा रहा है, ताकि आलाकमान संतुलन सुनिश्चित करें। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू के समर्थक अभी से उन्हें बतौर भावी मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर आगे बढ़ रहे है। पार्टी के 22 विधायकों में से अगर सुक्खू समर्थकों की तादाद देखी जाए तो भी सुक्खू को दरकिनार करना पार्टी के लिए आसान नहीं है। उपचुनाव में जीत कर आए तीन विधायकों में से भी दो सुक्खू गुट के है। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि सुक्खू की जमीनी संगठन पर अच्छी पकड़ है और वो उन गिने चुने नेताओं में से है जिनके समर्थक अमूमन प्रदेश के हर निर्वाचन क्षेत्र में है। ऐसे में जाहिर है सुक्खू को न तो नज़रअंदाज किया जा सकता है और न ही चुनावी बेला में उन्हें किसी महत्वपूर्ण पद से वंचित रखा जाना आसान है। समर्थक प्रदेश अध्यक्ष पद या नेता प्रतिपक्ष के पद पर उनकी तैनाती चाहते है, लेकिन मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर की अगुवाई में पार्टी के अच्छे प्रदर्शन के बाद राठौर को हटाना न तो आसान है और न ही जायज। दूसरा होली लॉज से दूरी सुखविंदर सिंह सुक्खू के लिए हमेशा चुनौती रही है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह उन्हें ख़ास पसंद नहीं करते थे और माना जाता है ये ही सुक्खू के अपदस्थ होने का मुख्य कारण भी रहा। अब वीरभद्र सिंह के निधन के बाद समीकरण कुछ बदले जरूर है, लेकिन ये जहन में रखना होगा कि होली लॉज का जलवा भी बरकरार है। राठौर के अलावा नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री को भी पद से हटाना तर्कसंगत नहीं लगता। अग्निहोत्री भी उन नेताओं में से है जिन्हें सत्ता वापसी की स्थिति में मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जा रहा है। बतौर नेता प्रतिपक्ष अग्निहोत्री खुद को साबित करने में सफल रहे है। सरकार को कब, कहाँ और कितना घेरना है, ये भी अग्निहोत्री बखूबी जानते है। अग्निहोत्री की राह इसलिए भी आसान रही है क्यूंकि उन्हें होलीलॉज का आशीर्वाद मिलता रहा है। संभवतः आगे भी होली लॉज का समर्थन उनके साथ ही रहे। ऐसी स्थिति में उन्हें उनके पद से हटाने का फैसला कांग्रेस लेगी, ऐसा नहीं लगता। किसी गुट में नहीं, इसीलिए राठौर मजबूत कांग्रेस हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर के नेतृत्व में चार उपचुनाव जीती है। इससे पूर्व भले ही राठौर के नेतृत्व पर सवाल खड़े होते रहे हो, मगर उपचुनाव के बाद उनके निष्पक्ष स्वभाव और काम करने के तरीके की खूब तारीफ हुई है। राठौर एक ऐसे नेता है जो किसी गुट विशेष के करीबी नहीं माने जाते और ये ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। राठौर को हटाकर यदि किसी गुट विशेष के हाथ में संगठन की कमान जाती है तो जाहिर है असंतोष बढ़ सकता है। पर ये भी जहन में रखना होगा कि उपचुनाव में वीरभद्र सिंह के लिए उमड़ी सहानुभूति लहर और बढ़ती महंगाई कांग्रेस को मिली जीत के बड़े कारण थे। रही-सही कसर भाजपा की अंतर्कलह और भीतरघात ने पूरी कर दी। सो इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि जमीनी स्तर पर पार्टी के संगठन को धार देने की सख्त जरूरत है। होलीलॉज का भी दावा कयास थे की पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन के बाद होली लॉज का तिलिस्म ध्वस्त हो जाएगा। वीरभद्र परिवार के वर्चस्व पर एक बड़ा और गहरा संकट खड़ा हो जाएगा, मगर हुआ उलट। मंडी संसदीय उपचुनाव में जीत दर्ज कर प्रतिभा सिंह ने साबित कर दिया कि प्रदेश की सियासत में होल्ली लॉज का जलवा बरकरार है। साथ ही जिस तरह का जनसमर्थन अब तक विक्रमादित्य सिंह को मिला है, वो साबित करता है कि वीरभद्र कैंप का सियासी रसूख बरकरार रहने वाला है। सम्भवतः इस वक्त विक्रमादित्य सिंह कांग्रेस के सबसे बड़े क्राउड कैचर है। ऐसे में होली लॉज समर्थक मंडी सांसद प्रतिभा सिंह का नाम न सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष के लिए बल्कि मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ा रहे है। युवा कांग्रेस का फार्मूला बनेगा समाधान बीते वर्ष युवा कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुए और इस चुनाव में वीरभद्र गुट और सुक्खू गुट, दोनों के उम्मीदवार मैदान में थे। बाजी सुक्खू के समर्थक निगम भंडारी मार ले गए लेकिन संतुलन बनाये रखने के लिए कार्यकारी अध्यक्ष का पद वीरभद्र गुट के यदुपति ठाकुर को दिया गया। ऐसे में सवाल ये है कि क्या प्रदेश के मुख्य संगठन में भी कार्यकारी अध्यक्ष का पद सृजित किया जा सकता है ताकि संतुलन बना रहे। कुलदीप राठौर को हटाए बगैर पार्टी सुक्खू गुट से किसी नेता को कार्यकारी अध्यक्ष पद का कार्यभार देने पर विचार कर सकती है। एक से अधिक कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाये जा सकते है और ऐसे में क्षेत्रीय समीकरण साधने, विशेषकर कांगड़ा को प्रतिनिधित्व भी दिया जा सकता है।
प्रदेश की सियासत में तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट कई दशकों से है पर हर बार इन दावों की हवा निकलती रही है। सिर्फ 1998 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दे तो कभी भी सत्ता गठन में किसी तीसरी पार्टी की भूमिका नहीं रही। अब फिर प्रदेश में आम आदमी पार्टी ने हुंकार भरी है, ठीक वैसे ही जैसा 2017 से पहले हुआ था। हालांकि तब चुनाव आते आते पार्टी ने यू टर्न ले लिया था। फिर इस वर्ष हुए नगर निगम चुनाव में भी पार्टी ने ऐलान किया कि वो चुनाव लड़ेगी, पर जनता ने सारे जोश की हवा निकाल दी। अब विधानसभा चुनाव को एक वर्ष से भी कम वक्त बचा है और पार्टी फिर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है। बैठकें हो रही है, प्रदर्शन हो रहें है। पर हकीकत ये है कि न जमीनी स्तर पर संगठन है और न दमदार चेहरा, पर कोशिश पूरी की जा रही है। आम आदमी पार्टी द्वारा दिल्ली में किये गए विकास से लोग प्रभावित है इसमें भी कोई संशय नहीं। फिलवक्त आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं का फोकस दिल्ली और पंजाब के साथ साथ गोवा, उत्त्तराखंड और उत्तर प्रदेश में नज़र आ रहा है। हर जगह पार्टी के परफॉरमेंस को देख कर ये कयास लगाए जा रहे है कि पार्टी हिमाचल में भी कुछ बेहतर कर सकती है। हिमाचल प्रदेश में राजनीति की बागडोर मुख्य तौर पर दो ही राजनीतिक दल संभालते आए है। यही कारण है कि प्रदेश की जनता के पास नोटा ही तीसरा और अंतिम विकल्प शेष रह जाता है। प्रदेश में लगातार बढ़ती नोटा की संख्या को देख ये स्पष्ट है कि प्रदेश की जनता को किसी तीसरे विकल्प की दरकार है। अब ये तीसरा विकल्प आम आदमी पार्टी होती है या कोई और ये तो वक्त ही बताएगा। बता दें कि आम आदमी पार्टी पहले ही 2022 हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में सभी 68 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर चुकी है। ये घोषणा हिमाचल प्रदेश आम आदमी पार्टी के प्रभारी रत्नेश गुप्ता ने की थी। बहरहाल आम आदमी पार्टी ने हिमाचल में सदस्यता अभियान चलाया है। 68 विधानसभाओं में कार्यकारिणी बनाई जा रही है। अब पार्टी के कार्यकर्ता बूथ स्तर पर जाकर लोगों से सम्पर्क साध रहे है। जनता की समस्याएं सुनी भी जा रही है और उन्हें उजागर भी किया जा रहा है। हाल ही में आम पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पुरानी पेंशन बहाली, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के विरोध में तपोवन विधानसभा का घेराव भी किया। इस दौरान पार्टी के कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच झड़प भी हुई। पार्टी की सक्रियता निरंतर बढ़ती जा रही है। जनता की मांगों को उजागर करने के साथ साथ पार्टी विधायकों को घेरने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रही। हिमाचल में नहीं टिका तीसरा मोर्चा कांग्रेस और भाजपा से इतर तीसरा विकल्प देने के अब तक किए गए सभी प्रयोग असफल रहे हैं। हिमाचल विकास कांग्रेस और हिमाचल लोकहित पार्टी ने तीसरा मोर्चा खड़ा करने का प्रयास किया था, लेकिन बाद में दोनों दलों का कांग्रेस और भाजपा में विलय हो गया। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी प्रदेश के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ने तक सीमित है। तीसरे विकल्प का प्रभावशाली दखल केवल साल 1998 में पंडित सुखराम की हिविकां के सहयोग से बनी भाजपा सरकार में ही देखा गया। 1998 में हिमाचल विकास कांग्रेस के रूप में पंडित सुखराम के नेतृत्व में तीसरा मोर्चा बना और हिमाचल विकास कांग्रेस के पांच विधायक बने। हिविकां के सहयोग से तब मुख्यमंत्री प्रेमकुमार धूमल के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। हिविकां समर्थित भाजपा सरकार ने अपना कार्यकाल तो पूरा किया, मगर बाद में हिविकां का भी कांग्रेस में विलय हो गया। पंडित सुखराम अपनी पुरानी पार्टी में लौट आए। साल 2007 के चुनाव में उत्तरप्रदेश में बसपा की लहर हिमाचल तक पहुंची तो मेजर विजय सिंह मनकोटिया ने बसपा को तीसरे मोर्चे के रूप में खड़ा करने का प्रयास किया, लेकिन बाद में मनकोटिया खुद ही चुनाव हार गए। बसपा के खाते में केवल कांगड़ा की एक ही सीट आई। बसपा विधायक संजय चौधरी बाद में भाजपा में शामिल हो गए। हिलोपा के रूप में भाजपा के असंतुष्ट महेश्वर सिंह का थर्ड फ्रंट बनाने का प्रयास भी असफल रहा। महेश्वर सिंह ने साल 2012 के चुनाव में नई पार्टी बनाकर 36 विधानसभा सीटों में चुनाव लड़ा था। कई सीटों पर हिलोपा के समर्थन से माकपा के प्रत्याशी चुनावों में थे, लेकिन हिलोपा को जीत सिर्फ एक ही सीट पर मिली। साल 2016 में पार्टी बनाने के चार साल बाद महेश्वर सिंह भी अपनी पुरानी पार्टी भाजपा में जा मिले। और हाल ही में हुए मंडी लोकसभा उपचुनाव के लिए महेश्वर सिंह भाजपा की टिकट के प्रबल दावेदा माने जा रहे थे। पहले भाजपा और फिर आम आदमी पार्टी को छोड़ चुके पूर्व सांसद डॉ राजन सुशांत ने भी अपनी नई पार्टी हमारी पार्टी हिमाचल पार्टी बनाई है। राजन सुशांत ने 2022 में हर विधानसभा क्षेत्र से अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतारने की घोषणा भी की थी। मगर हाल ही में हुए उपचुनाव में डॉ राजन सुशांत अपने गृह क्षेत्र फतेहपुर में जीत हासिल नहीं कर पाए। अब उनकी पार्टी ऐसी स्थिति में पूरे प्रदेश पर फतेह कर पाएगी ऐसा नहीं लगता।
एक कंधे पर प्रदेश की जनता की बेतहाशा उम्मीदें और दूसरी तरफ खाली सरकारी खजाने की चाबी लिए प्रदेश सरकार दिन प्रति दिन कर्ज के दलदल में धंसती जा रही है। प्रदेश में भाजपा सरकार के चार साल पूरे होने को है। सरकार से हर वर्ग की अपनी मांगे है, अपनी उम्मीदें है। कोई सवर्ण आयोग चाहता है, कोई वेतन, कोई पुरानी पेंशन की टेंशन को दूर करने की उम्मीद लगाए बैठा है, तो कुछ ऐसे भी है जिन्हें नौकरी ही नहीं मिली। बर्फबारी के बाद किसान-बागवान मुआवजा मांग रहे है और व्यापारी टैक्स में कटौती। खून चूसती महंगाई तो हर घर का मसला है। सबकी उम्मीद भरी निगाहें सरकार पर टिकी है और हो भी क्यों ना, ये वो ही है जिन्होंने सत्ता में आने से पहले प्रदेश की जनता पर वादों की बौछार की थी। अब जो वादा किया वो निभाना तो पड़ेगा। बात सिर्फ सत्ता में आने से पहले की नहीं है, हाल फिलहाल भी सरकार ने कई बड़ी घोषणाएं की है, कई आश्वासन दिए, जो कैग की रिपोर्ट के सामने आने के बाद तो पूरे होते नहीं दिखाई दे रहे। कैग की रिपोर्ट में पेश किये गए आंकड़ों पर गौर किया जाए तो प्रदेश की खराब स्थिति समझने के लिए किसी को अर्थ शास्त्री होने की जरूरत नहीं है। कोई आम आदमी भी साफ समझ सकता है कि प्रदेश की आर्थिकी किस ओर अग्रसर है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानि कैग की रिपोर्ट में ये स्पष्ट हुआ है कि पिछले वर्ष (₹53,147 करोड़) की तुलना में 14.57% की वृद्धि के साथ वित्तीय वर्ष 2019-20 में हिमाचल प्रदेश का कर्ज का बोझ बढ़कर 62,212 करोड़ हो गया है। प्रदेश का राजकोषीय घाटा 5597 करोड़ दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 2019-20 में प्रदेश की राजस्व प्राप्तियों में 204.92 करोड़ की कमी आई है। 2018-19 के 30,950.28 करोड़ के मुकाबले 2019-20 में राजस्व प्राप्तियां घटकर 30,745.32 करोड़ रहीं। राजस्व प्राप्तियों में भी 67 फीसदी हिस्सा केंद्रीय करों में हिस्सेदारी व केंद्र सरकार से मिलने वाली सहायता अनुदान राशि का है। प्रदेश के अपने संसाधनों से खजाने में सिर्फ 33 फीसदी राजस्व आया है। इसके अलावा, पूंजीगत व्यय पिछले वर्ष के ₹4,583 करोड़ की तुलना में 13% (₹591 करोड़) बढ़कर ₹5,174 करोड़ हो गया और कुल व्यय में 14% का गठन किया। सिर्फ यही नहीं वित्त वर्ष 2019-20 की इस रिपोर्ट के मुताबिक हिमाचल सरकार ने पेयजल, सड़क, पर्यटन, ऊर्जा आदि से संबंधित 96 विकास योजनाओं पर फूटी कौड़ी तक खर्च नहीं की। इन योजनाओं पर बजट को खर्च न करने का कारण भी नहीं बताया गया है। इनमें से कोई भी योजना एक करोड़ से कम बजट की नहीं है। आमदनी अट्ठनी, खर्चा रुपया निसंदेह ये कर्ज का पहाड़ प्रदेश की अर्थव्यवस्था की खिल्ली उड़ाता जा रहा है। 62 हजार करोड़ को पार कर चुके इस कर्ज के आंकड़े से स्पष्ट होता है कि बजटीय प्रावधानों और आर्थिक प्रबंधन को संयोजने में लगे सरकारी अधिकारी वक्त बर्बाद करते रहे और सरकार सोती रही। या सरकार फिजूल खर्चे करती गई और अफसर खामोश बैठे देखते रहे। ऐसी स्थिति तो तब ही पैदा हो सकती है जब महत्वकांक्षाएं व्यक्ति की आमदनी से ज्यादा बढ़ जाए। प्रदेश की आमदनी घटने का एक बड़ा कारण कोरोना काल भी रहा है। इस दौरान केवल प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश की वित्तीय व्यवस्था डगमगाई है जो अब तक पूरी तरह पटरी पर नहीं लौट पाई है। इसी के साथ प्रदेश में राजस्व प्राप्तियां घटी है जबकि खर्च बढ़ा है। कैग के मुताबिक 2019-20 में प्रदेश की राजस्व प्राप्तियों में गिरावट दर्ज हुई और ये सिर्फ 33 फीसद प्राप्त हुआ। दूसरी ओर खर्चों में करीब साढ़े पांच फीसद की वृद्धि दर्ज हुई। ये भी स्पष्ट हुआ है कि 2019-20 में 53708 करोड़ रुपये के बजट व अनुदान प्रविधानों के मुकाबले 45528 करोड़ रुपये की रकम खर्च की गई है । इसमें 8229.36 करोड़ की बचतें भी शामिल हैं और इसके साथ ही 49.91 करोड़ का अधिक खर्च किया गया है । कैग रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि सरकार ने प्रदेश के शहरी व ग्रामीण निकायों, शैक्षणिक संस्थाओं और विकास प्राधिकरण के लिए वित्तीय सहायता देना कम किया है। पांच साल की आकलन रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना काल से एक साल पहले 2019-20 में ग्रामीण व शहरी निकायों को 1509.61 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता दी है, जबकि वर्ष 2018-19 के दौरान इन निकायों को 1514.06 करोड़ की सहायता की थी। दूसरी ओर शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों एवं अन्य धर्मार्थ संस्थान व विकास प्राधिकरण को 2019-20 में 1996.87 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता दी है। इसके विपरीत वर्ष 2018-19 के दौरान इन क्षेत्रों को 2119.89 करोड़ की सहायता दी है। प्रदेश को आर्थिक सुधारों, सुशासन तथा सरकारी कार्यसंस्कृति में बदलाव की आवश्यकता है और विपक्ष के लिए भी जरुरी है कि बतौर ज़िम्मेदार विपक्ष पथ से भटकती सरकार को वापस ट्रैक पर लाया जाए। परन्तु सत्ता का वनवास झेलता विपक्ष उन्हीं मुद्दों को चुनता नज़र आ रहा है जिससे सरकार की स्थिति और खराब होती जाए। प्रदेश के आर्थिक हालात, स्वरोजगार और निजी निवेश के जरिए रोजगार पर चर्चा के बजाय कर्मचारी सियासत को साधने में विपक्ष मसरूफ है। इस खाली जेब के साथ मसले महज घोषणाओं से सुलझ जाएंगे ऐसा नहीं लगता। प्रदेश सरकार ने हाल ही में जेसीसी की बैठक की थी, जिसमें कई बड़ी घोषणाएं की गई। उन वादों को पूरा करने के लिए 18 से 20 हजार करोड़ रुपये की रकम जुटाना 62 हजार करोड़ रुपये के कर्ज में डूबी सरकार के लिए चुनौती होगा, वहीं अब असंतुष्ट कर्मचारियों और अन्य वर्गों को न्यायोचित वित्तीय लाभ देना कैसे संभव हो पाता है ये बड़ा सवाल है। इस पर अगले वित्तीय वर्ष में केंद्र से लगभग 12 हजार करोड़ रुपये कम ग्रांट मिलने वाली है। पर्यटन को बढ़ावा देने से बदल सकती है स्थिति हिमाचल की आर्थिकी को सुदृढ़ करने में पर्यटन एक अहम भूमिका निभा सकता है। कोरोना काल के दौरान पर्यटन को एक बड़ा झटका लगा है। प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज हिमाचल प्रदेश में धार्मिक व साहसिक पर्यटन की भरपूर संभावना है। पर्यटन को प्रदेश की आर्थिकी का अहम हिस्सा माना जाता है और इसे बढ़ावा देने से स्थिति बेहतर हो सकती है। अपार संभावनाओं के बावजूद पहाड़ी प्रदेश हिमाचल में पर्यटन क्षेत्र में विकास की रूपरेखा नहीं बन सकी है। यदि सरकार एक बेहतर सोच के साथ पर्यटन को बढ़ावा दे तो स्थिति बेहतर होगी। सरकार भीड़-भाड़ वाले पर्यटन स्थलों पर बोझ कम कर के कम आकर्षण वाले स्थानों का विकास सुनिश्चित करके पर्यावरण पर्यटन (ईको-टूरिज्म) के विकास की भी परिकल्पना की जा सकती है। न सिर्फ संगठित क्षेत्र में बल्कि मोटे तौर पर असंगठित क्षेत्र में पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका है। सरकार को एक दूरगामी सोच के साथ कार्य करने की आवश्यकता है। आधारभूत ढांचे और और मजबूत किए जाने की आवश्यकता है। अब तक धरातल पर नहीं दिखी इन्वेस्टर मीट हिमाचल प्रदेश में 2019 में हुई इन्वेस्टर्स मीट के बाद अब तक सिर्फ 13,488 करोड़ का निवेश ही धरातल पर उतरा है। बता दें कि इन्वेस्टर मीट में कुल 703 एमओयू किए गए थे, जिनमें 96720.88 करोड़ रुपए का निवेश प्रस्तावित है। अब तक 236 में से 96 परियोजनाओं में 2710 करोड़ का निवेश हुआ है। 104 परियोजनाओं में निर्माण कार्य प्रगति पर है तथा शेष 36 परियोजनाएं कोरोना महामारी व अन्य कारणों से शुरू नहीं हो सकी हैं। दूसरी ग्राउंड ब्रेकिंग जल्द ही प्रस्तावित है। इन्वेस्टर मीट के बाद समझौतों में कुल 1 लाख 96 हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार संभावित है। प्रदेश में इन्वेस्टर मीट करवा आर्थिकी को सुधारने की सरकार की सोच अच्छी ज़रूर थी मगर अब तक इसका खास प्रभाव नहीं दिख पाया है। प्रदेश में नए उद्योगों के आने से आर्थिक व्यवस्था सुधर सकती है। अगर इस प्रस्तावित निवेश को सरकार हिमाचल ला पाई तो निसंदेह प्रदेश में रोज़गार भी बढ़ेगा और आर्थिक स्थिति भी बेहतर होगी।
विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम का वक्त बचा है, और कर्मचारियों की अनसुनी फरियादों की लम्बी फेहरिस्त सरकार के सामने है। उम्मीदें बेतहाशा है और अपनी -अपनी मांगों को लेकर कर्मचारी संगठन नेताओं से मिलने की कवायद में जुटे है। जयराम राज में एक ऐसी ही अनसुनी फ़रियाद है नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता की मांग। इसे लेकर वर्षों से चला आ रहा संघर्ष अब भी जारी है। जेसीसी की बैठक में नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता मांगने वाले कर्मचारियों को वरिष्ठता तो नहीं मिल पाई थी, पर इसके लिए कमेटी के गठन का आश्वासन ज़रूर मिला था। अब कर्मचारियों को कमेटी के गठन का इंतज़ार है। दरअसल, आश्वासन तो लम्बे वक्त से मिलते ही आ रहे है सो अब कर्मचारी चाहते है कि तुरंत एक्शन हो। चुनाव अब नजदीक है और हाल फिलहाल सरकार के ग्रह भी रूठे -रूठे से दिखे है, सो कोशिश ये ही है कि सरकार पर दबाव बनाया जाएँ, और आशा ये है कि सरकार अब आश्वासन से आगे निकल एक्शन ले। बहरहाल विधानसभा के शीतकालीन सत्र में हिमाचल अनुबंध नियमित कर्मचारी संगठन का एक प्रतिनिधिमंडल नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता की मांग को पूरा करवाने हेतु एक बार फिर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से सर्किट हाउस धर्मशाला में मिला। संगठन ने कमेटी के गठन की घोषणा के लिए सीएम का आभार जताया, साथ ही ये भी याद दिलाया कि अभी सिर्फ घोषणा ही हुई है। संगठन ने कमेटी में हिमाचल अनुबंध नियमित कर्मचारी संगठन के सदस्यों को शामिल करने की मांग भी की। दरअसल ये मसला शुरू हुआ 2008 में, जब बैचवाइज और कमीशन आधार पर लोकसभा आयोग और अधीनस्थ कर्मचारी चयन आयोग द्वारा कर्मचारियों की नियुक्तियां अनुबंध के तौर पर की जाने लगी l पहले अनुबन्ध काल 8 साल का हुआ करता था जो बाद में कम होकर 6 फिर 5 और फिर 3 साल हो गया। ये अनुबन्ध काल पूरा करने के बाद यह कर्मचारी नियमित होते है। अनुबंध से नियमित होने के बाद इन कर्मचारियों की अनुबंध काल की सेवा को उनके कुल सेवा काल में नही जोड़ा जाता, जो संगठन के अनुसार सरासर गलत है। इनका कहना है कि अनुबंध काल अधिक होने से पुराने कर्मचारियों को वित्तीय नुकसान के साथ प्रमोशन भी समय पर नहीं मिल पाती अब मांग है कि उनको नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता प्रदान की जाए ताकि उन्हें समय रहते प्रमोशन का लाभ मिल सके। अनुबंध काल की सेवा का वरिष्ठता लाभ ना मिलने के कारण उनके जूनियर साथी सीनियर होते जा रहे हैं। अनुबंध नियमित कर्मचारी संगठन का कहना है कि कुछ अनुबंध कर्मचारी 8 वर्ष के बाद नियमित हुए, कुछ 6 वर्ष के बाद, कुछ 5 वर्ष के बाद और वर्तमान में 3 वर्ष के बाद नियमित हो रहे हैं और अब आने वाले समय में 2 वर्ष में कर्मचारी नियमित होंगे। ऐसे में ये नीति कर्मचारियों के मौलिक और समानता के अधिकार का हनन है। मान सम्मान का विषय, सीएम से हुई सकरात्मक बातचीत : गर्ग हिमाचल अनुबंध नियमित कर्मचारी संगठन के प्रदेशाध्यक्ष मुनीष गर्ग और जिलाध्यक्ष सुनील पराशर का कहना है कि नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता ना मिलने से जूनियर कर्मचारी सीनियर होते जा रहे हैं। कर्मचारियों ने कहा कि उनका चयन भर्ती एवम पदोन्नति नियमों के अनुसार हुआ है इसलिए उनके अनुबंध की सेवा को उनके कुल सेवाकाल में जोड़ा जाना तर्कसंगत है। यह प्रदेश के 70 हजार कर्मचारियों के मान सम्मान से जुड़ा विषय है। सरकार जल्द इस मांग को पूरा करे। संगठन के पदाधिकारियों ने कहा कि उनकी मुख्यमंत्री से सकारात्मक माहौल में बातचीत हुई। प्रतिनिधिमंडल में जिलाध्यक्ष सुनील पाराशर,प्रदेश सचिव संदीप सकलानी, मनदीप,सुरेंद्र, कप, अश्विनी, शम्मी कुमार, शशि, विमल सागर दीपक भगसेन ,अनूप ,पवन, कुशल सहित अन्य शामिल रहे। आस : धूमल का वादा जयराम पूरा करेंगे ! जाती हुई सरकार की बात मत सुनो आती हुई सरकार की मानो, ये शब्द थे पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल के l 2017 विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री ने सुजानपुर में ये वादा किया था l वादा था कि भाजपा के सत्ता में आते ही मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया जाएगा और अनुबंध कर्मचारियों को नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता प्रदान करने हेतु कार्य किया जाएगा l जयराम सरकार के चार साल में इस विषय में कुछ नहीं हुआ, पर हाल ही में हुई जेसीसी बैठक में सरकार ने कमेटी गठित करने की बात कही है l इसके बाद कर्मचारियों में कुछ आशा जरूर जगी है। अब कर्मचारी चाहते है कि जल्द कमेटी गठित हो और मांग को पूरा किया जाए l
पूरी सरकार को मानो बंधक बनाया गया हो, बाहर जाने वाले एकमात्र रास्ते को बंद कर दिया गया, प्रदर्शनकारी बैरिकेड्स तोड़कर परिसर में घुस गए, गाड़ियों के शीशे तोड़े गए, शंखनाद हुए। सरकारी सम्पति को भी नुकसान पहुँचाया गया। प्रदर्शनकारियों पर पानी की बौछार हुई तो वापसी में पुलिस कर्मियों पर पत्थर बरसे। हाथ में भगवा झंडा, गले में केसरी पटका और जुबां पर जय भवानी का नारा लेकर सवर्ण समाज के लोगों ने तपोवन विधानसभा परिसर में जो प्रदर्शन किया, वैसा पहले कभी हिमाचल प्रदेश में नहीं देखा गया था। सवर्ण आयोग के गठन की मांग को लेकर प्रदर्शनकारियों का जैसा हुजूम उमड़ा उसकी आशंका सबको पहले से थी, पर शायद सरकार के तंत्र को इसका अहसास नहीं था, या इसे देखकर भी अनदेखा किया गया। शायद सरकार का ख़ुफ़िया तंत्र विफल हो गया, वरना बैठे बिठाये मुसीबत कौन मोल लेता है ? विधानसभा सत्र के पहले दिन तपोवन में परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि हज़ारों के हुजूम और बेइन्तिहाँ दबाव के बीच सरकार को झुकना पड़ा। इसे सवर्ण समाज के संघर्ष और हौसले की जीत समझ लीजिये या फिर दबाव में आकर जयराम सरकार का ऐलान, प्रदेश में अब सवर्ण आयोग के गठन की घोषणा हो चुकी है। निसंदेह ये घोषणा मंज़ूरी से ज़्यादा सरकार की मजबूरी नज़र आ रही है। जो परिस्तिथि तपोवन में बनाई गई उसके बाद सरकार के पास कोई दूसरा रास्ता निकालने का न तो वक्त था और न गुंजाइश। प्रदर्शन आक्रामक था और स्थिति सरकार और प्रशासन के नियंत्रण से बाहर। सवर्ण समाज में इस घोषणा के बाद ख़ुशी की लहर है, मगर इस पुरे घटनाक्रम को सरकार की एक बड़ी विफलता के रूप में देखा जा रहा है। ऐसा नहीं है कि सवर्ण आयोग के गठन की घोषणा करके सरकार ने कुछ गलत किया, मसला ये है कि जिस दबाव में सरकार को ये करना पड़ा उससे सरकार मजबूत से अधिक मजबूर दिखी है। सैकड़ों चेतावनियों के बावजूद भी सरकार सचेत नहीं हुई और प्रस्तावित प्रदर्शन को कम आँका, नतीजन परिणाम अब सभी के सामने है। देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा द्वारा सवर्ण आयोग के गठन की ये मुहीम करीब एक साल पहले शुरू की गई थी। प्रदेश में 70 फीसदी आबादी सामान्य वर्ग की है और इस वर्ग का एक बड़ा तबका लम्बे समय से सवर्ण आयोग की मांग कर रहा है। पहली दफे इस तबके की ताकत का अंदाजा सरकार को 20 अप्रैल 2021 को करवाया गया था जब सामान्य संयुक्त मोर्चे ने राज्य सचिवालय का घेराव किया था। करीब तीन घंटे तक छोटा शिमला में चक्का जाम किया गया था, उस दौरान भी प्रदर्शनकारियों की पुलिस के साथ काफी कहासुनी और धक्का मुक्की भी हुई थी। मांग थी कि प्रदेश की करीब 70 फीसदी सामान्य वर्ग की आबादी जो नेताओं की कठपुतली बनकर रह गई है उनके हित के लिए जातिगत आरक्षण को खत्म किया जाए। सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करे। एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट को समाप्त किया जाए क्यों कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। बाहरी राज्यों के लोगों को सामान्य वर्ग के कोटे में सरकारी नौकरियों में सेंध लगाने से रोकने के लिए एससी और एसटी की तर्ज पर हिमाचली बोनाफाइड होने की शर्त लगाने की मांग थी। और सबसे बड़ी मांग थी सवर्ण आयोग के गठन की। परन्तु तब भी सरकार ने 3 महीने का समय मांग कर प्रदर्शन बंद करवा दिया था। फिर तीन महीने के इंतज़ार के बाद भी मांग पूरी नहीं हुई और सवर्ण समाज द्वारा उपचुनाव में नोटा दबाने की चेतावनी दी गई। हुक्मरानों ने फिर भी गौर नहीं किया। उपचुनाव में नोटा का ख़ासा प्रभाव देखने को मिला, खासतौर पर अर्की विधानसभा क्षेत्र में, मगर मांग पूरी नहीं हुई। सरकार नज़रअंदाज़ करती रही और आंदोलन तेज़ होता चला गया। यहाँ जयराम सरकार ने बड़ी चूक कर दी, जरुरत थी एक सशक्त संवाद स्थापित करने की, पर स्थिति का सामना करने के बजाय इसे टालने का ही प्रयास दिखा। उधर आंदोलनकारी तैयार थे,हर जिले के सवर्णों को एक सूत्र में पिरोया गया और प्रदर्शन की तैयार की गई। इसके बाद सवर्ण संगठनों द्वारा जातिगत आरक्षण, एट्रोसिटी एससी-एसटी एक्ट और अन्य सवर्ण समाज विरोधी नीतियों की शवयात्रा निकाली गई। 800 किलोमीटर लम्बी पदयात्रा की गई। ये पदयात्रा 10 दिसंबर को धर्मशाला में खत्म होनी थी और यात्रा के खत्म होने पर जो हुआ वो सभी के सामने है। अनगिनत चेतावनियों को अनसुना करने का जो परिणाम निकला, उससे सरकार की खूब फजीहत हुई। बेहतर होता कि सरकार इस मामले की गंभीरता और लगातार बढ़ते जन समर्थन को भांपते हुए समय रहते बंद कमरे में इसका हल निकालती। मगर एक बार फिर जयराम सरकार चूक गई। रूपरेखा अभी स्पष्ट नहीं सरकार ने स्वर्ण आयोग के गठन को अनुमति ज़रूर दी है मगर अभी तक इसकी रूपरेखा स्पष्ट नहीं हो सकी है। यह साफ नहीं है कि सरकार आयोग का अलग से चेयरमैन नियुक्त करेगी या मुख्यमंत्री को ही इसका अध्यक्ष बनाया जाएगा। साथ ही इसके क्षेत्राधिकार और काम की भी व्याख्या होनी बाकी है। अलबत्ता आयोग के गठन को सरकार की हरी झंडी मिली हो लेकिन सवर्ण समाज की कई अन्य मांगे भी है जिन्हें लेकर आगामी वक्त में टकराव देखने को मिल सकता है।
कांग्रेस (Congress) अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में केन्द्र सरकार पर जोरदार हमला बोला है। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों को लेकर असंवेदनसील है। सोनिया गांधी ने कहा कि सरकार देश की संपत्तियों को बेचने का काम कर रही है। सीमा विवाद पर बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि विपक्ष सीमा पर असुरक्षा को लेकर चर्चा करना चाहता है, लेकिन सरकार इसको लेकर तैयार नहीं है। उन्होंने केन्द्र सरकार की महंगाई और विनिवेश की नीति को लेकर आड़े हाथों लिया। सोनिया गांधी ने राज्यसभा में 12 सांसदों के निलंबन को अनुचित करार दिया। इसके साथ ही, उन्होंने प्रदर्शनकारी किसानों को याद कर कहा- "आइए बलिदान देने वाले 700 प्रदर्शनकारी किसानों का सम्मान करें।" कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि मोदी सरकार भारत की संपत्ति बेचती है। लगातार बढ़ रही महंगाई करोड़ों परिवार के मासिक बजट को खराब कर रही है।
प्रदेश में बढ़ती महंगाई को लेकर विपक्ष लगातर सरकार का घेराव कर रहा है। पूर्व विधायक अजय महाजन ने महंगाई व बेरोजगारी पर सरकार को आड़े हाथ लिया है। अजय महाजन का कहना है कि बढ़ती महंगाई व बेरोजगारी से आम आदमी त्रस्त हो गया है। महंगाई कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। इससे साबित होता है कि प्रदेश सरकार की नीतियां जन विरोधी हैं। जनता त्रस्त है पर सरकार कोई भी जनकल्याण का फैसला नहीं ले रही है। अजय महाजन का कहना है कि जनता ज्यादा परेशान न हो यह सरकार अब कुछ ही दिनों की मेहमान है। कांग्रेस सत्ता में आते ही आम आदमी की परेशानी को दूर करने के लिए जन कल्याण की नीतियां बनाएगी और लोगों को महंगाई व बेरोजगारी की समस्याओं से निजात दिलाएगी। अजय महाजन का कहना कि हाल ही में हुई जेसीसी की बैठक में कर्मचारियों को कोई फायदा नहीं हुआ है। जिस छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। उसमें तो पहले ही पांच साल का विलंब हो चुका है। मुख्यमंत्री ने ओल्ड पेंशन स्कीम को लागू न कर सिर्फ 2009 की नोटिफिकेशन को मानकर कर्मचारियों के हितों के साथ कुठाराघात किया है, 2009 की नोटिफिकेशन तो ओल्ड पेंशन स्कीम का ही एक हिस्सा है। हजारों आउटसोर्स कर्मचारी जो सरकारी कर्मचारी के बराबर काम करते हैं, इसके लिए कोई नीति न लाकर सरकार ने कर्मचारी हितैषी न होने का प्रमाण दिया है। अजय महाजन का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने जनकल्याण के कार्य किए जिस कारण वह लोगों के दिलों में आज भी राजा की तरह राज करते हैं। जबकि भाजपा ने 2017 के विजन डॉक्यूमेंट में जो वादे कर्मचारियों से किए थे उन्हें ही पूरा करने में चार साल का विलंब कर दिया है। यही कारण है कि जनता ने उपचुनाव में चारों सीटें कांग्रेस को दिलवाकर बता दिया है कि सरकार की मशीनरी हांफ गई है। महंगाई व बेरोजगारी पर कोई लगाम नहीं है। Himachal Pradesh News | Himachal Politics
जेसीसी की बैठक के बाद पुलिस विभाग लगातार सरकार से अपनी मांगों को पूरा करने के लिए आवाज़ उठा रहा है। इसी बीच पुलिस विभाग की समस्याओं को नजरअंदाज करने को लेकर वरिष्ठ कांग्रेस नेता और सुजानपुर विधायक राजेंद्र राणा ने सरकार पर निशाना साधा है। राजेंद्र राणा का कहना है कि प्रदेश की जनता को हर तरफ से न्याय देने की जिम्मेदारी उठाए पुलिस विभाग की समस्याओं को सरकार नजरअंदाज न करे। अगर पुलिस विभाग को ही न्याय नहीं मिल रहा है तो यह सिस्टम की खामी नहीं, सरकार की नाकामी है। 7 रुपए प्रतिदिन की डाईट मनी देकर सरकार पुलिसकर्मियों से क्रूर मजाक कर रही है जो कि पुलिस कर्मियों के लिए न तर्कसंगत है न न्याय संगत और न ही सहन करने के काबिल है। लेकिन बीजेपी सरकार पुलिस की इस जायज मांग को लगातार नजरअंदाज कर रही है। राजेंद्र राणा का कहना है की पुलिस प्रशासनिक अधिकारी भी सरकार की घोर उपेक्षा को लेकर खासे नाराज हैं। सरकार पुलिस अधिकारियों की प्रमोशन को लेकर उपेक्षित व अडियल रुख अपनाए हुए है। राणा का कहना है कि पुलिस में एचपीएस स्तर के अधिकारियों की प्रमोशन 11 साल से लगातार रुकी है। पुलिस प्रमुख संजय कुंडू की अध्यक्षता में सिस्टम में चल रहे असंतुलन को लेकर सरकार को गुहार लगाई जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद भी सरकार मूक और मौन बनी हुई है। आलम यह है कि डीएसपी व एडिशनल एसपी स्तर के 189 अधिकारी वर्षों से अपनी प्रमोशन की राह देख रहे हैं। इनमें डायरेक्ट भर्ती हुए डीएसपी, एडिशनल एसपी व प्रमोट होकर आए कांस्टेबल व सब-इंस्पेक्टर से डीएसपी बने अधिकारियों की फौज सरकार की ओर टकटकी लगाए हुए देख रही है। राणा का कहना है कि विजिलेंस, सीआईडी, स्टेट नारकोटिक्स कंट्रोल सेंटर में अनुभव प्राप्त अधिकारियों की दरकरार है लेकिन सरकार इस समस्या से अनजान बनकर नई पोस्ट क्रिएट नहीं कर रही है। इस कारण से जुगाड़ व सिफारिश के आधार पर अधिकारियों को तैनात किया जा रहा है, जबकि लम्बा अनुभव रखने वाली पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों की फौज सरकार की इस घोर उपेक्षा से कुंठित व प्रताड़ित महसूस कर रही है। मौजूदा दौर में 34 एडिशनल एसपी के पदों की जरूरत है और जब यह पोस्टें क्रिएट होंगी तो इनकी प्रमोशन का रास्ता खुलेगा। इसलिए सरकार पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों की इस मांग व जरूरत को ध्यान में रखते हुए तुरंत कार्रवाई अमल में लाए। वहीं राजेंद्र राणा ने सवर्ण समाज की समस्या का भी सरकार को घेरते हुए कहा है कि इस मसले को जल्द हल करें अन्यथा सवर्ण समाज का बढ़ता आक्रोश समूचे समाज को तनावग्रस्त कर रहा है। सरकार अपनी जवाबदेही व जिम्मेदारी से लगातार भाग रही है। राणा का कहना है कि सवर्ण आयोग की मांगों को लेकर सरकार ने इस वर्ग से वायदा किया था लेकिन अब सरकार वायदा खिलाफी कर रही है। Himachal Pradesh News | Himachal Politics
उपचुनाव में जीत हासिल करने के बाद कांग्रेस पार्टी लगातार सरकार के खिलाफ हल्ला बोल रही है। खाद्य सामान, पेट्रोल डीजल में लगातार हो रही वृद्धि और बढ़ती महंगाई के खिलाफ प्रदेश कांग्रेस ने जन जागरण अभियान के तहत प्रदेश भर में हल्ला बोल है। इसी बीच कांग्रेस के नेता लगातार सरकार पर तंज कस रहे है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप राठौर का कहना है की जीत से उत्साहित होकर कांग्रेस चुप नहीं बैठी है और कांग्रेस पूरे प्रदेशभर में जन जागरण यात्रा के माध्यम से जनता को सरकार की गलत नीतियों से अवगत करवा रहे हैं। साथ ही सरकार के दुष्प्रचार से भी बचने के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। राठौर का कहना है कि पूरे प्रदेश में 22 विधानसभा क्षेत्रों को चुना गया है और जल्द ही जन जागरण अभियान का दूसरा चरण भी शुरू किया जाएगा। कांग्रेस का सदस्यता अभियान भी जोरों शोरों से चल रहा है। भाजपा सरकार की ओर से कर्मचारियों के लिए की जा रही घोषणाओं पर भी कुलदीप राठौर ने तंज कसा है। कुलदीप राठौर का कहना है कि अंतिम वर्ष में सरकार द्वारा कर्मचारियों और दूसरे वर्ग को खुश करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन प्रदेश की जनता समझदार है और जनता समझती है कि इन घोषणाओं को जमीनी स्तर पर अमल में नहीं लाया जाएगा। यह सिर्फ लोगों को भ्रमित करने के लिए किया जा रहा है। कुलदीप राठौर का कहना है कि कांग्रेस पार्टी के लिए पूरा प्रदेश एक है लेकिन भाजपा ने प्रदेश को बांटने का काम किया है। राठौर का कहना है कि पुलिसकर्मियों के साथ जयराम राज में नाइंसाफी हुई है और सरकार को चाहिए था कि पुलिस की समस्याओं पर गौर किया जाता, क्योंकि इस तरह की घटनाओं से जनता का मनोबल भी गिरता है। Himachal Pradesh News | Himachal Politics
अपनी मांगों को लेकर कई कर्मचारी वर्ग लगातार सरकार से गुहार लगा रहे है। कर्मचारिओं की मांगों को मुद्दा बनाकर विपक्ष भी सरकार को घेरने में लगा है। कांग्रेस के प्रदेश महासचिव केवल सिंह पठानिया का कहना है कि आज प्रदेश के हर वर्ग के कर्मचारी अपने हक की लड़ाई के लिए सड़कों पर उतर आए हैं और प्रदेश सरकार की नजर इन कर्मचारियों पर नहीं बल्कि अपनी नाकामी को छुपाने के लिए पुलिस बल का प्रयोग करके इन कर्मचारियों की आवाज को दबाने में लगी है। केवल सिंह पठानिया का कहना है कि प्रदेश सरकार को प्रदेश के आशा वर्कर, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सम्मान देना चाहिए था जिन्होंने कोरोना काल में आगे आकर अपने और अपने परिवार को जोखिम में डाल कर जनता की सेवा की थी, लेकिन प्रदेश सरकार ने अपनी घटिया मानसिकता का परिचय देकर सम्मान देने के बजाय लाठियां बरसाई। इस सरकार को अब सत्ता में रहने का कोई हक नहीं है। पठानिया का कहना है कि सचिवालय के घेराव को पहुंचे भारतीय मजदूर संघ के कार्यकर्ताओं को लाठियां खानी पड़ी, मजदूर संघ के कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस कर्मियों ने धक्कामुक्की की और इस दौरान महासंघ के महासचिव और एक महिला आशा वर्कर कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल भी हो गए। प्रदेश के नौजवान बेरोजगारों को भी परीक्षा देने के लिए सरकार की नाकामी से भारी तकलीफों का सामना करना पड़ा। अगर सरकार ने समय रहते इन कर्मचारियों की मांगों पर गौर किया होता तो किसी को भी किसी भी प्रकार की तकलीफ का सामना नहीं करना पड़ता। इस धरने से प्रदेश की आम जनता भी अछूती नहीं रही कही न कही आम जनमानस को भी धरने की वजह से कई लोगों को परेशान होना पड़ा है। केवल सिंह पठानिया का कहना है कि प्रदेश के कर्मचारी वर्ग अपने हक के लिए आवाज उठा रहा है और सरकार पुलिस द्वारा मजदूर संघ के पदाधिकारियों सहित कार्यकर्ताओं पर एफआईआर दर्ज करने में लग गई। एफआईआर तो उन लोगों पर होनी चाहिए जिनके द्वारा ये सब हुआ इसकी जिम्मेवार सरकार में बैठे सीएम, मंत्री और विधायक हैं। himachal Pradesh News | Himachal Politics
जेसीसी बैठक के बाद कांग्रेस (Congress) लगातार जयराम सरकार को कर्मचारी हितैषी न होने का दावा कर रही है। कांग्रेस नेता एवं कर्मचारी कल्याण बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष ठाकुर सुरिंद्र सिंह मनकोटिया का कहना है कि हाल ही में हुई जेसीसी बैठक (JCC Meeting) का कर्मचारियों को कोई फायदा नहीं हुआ है। जिस छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का ढिंढोरा सरकार द्वारा पीटा जा रहा है, उसमें तो पहले ही पांच साल का विलंब हो चुका है। मनकोटिया ने जयराम सरकार पर आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री की ओर से ओल्ड पेंशन स्कीम को लागू न कर सिर्फ 2009 की नोटिफिकेशन को मानकर कर्मचारियों के हितों के साथ कुठाराघात किया है। 2009 की नोटिफिकेशन तो ओल्ड पेंशन स्कीम का ही एक हिस्सा है। हजारों आउटसोर्स कर्मचारी जो सरकारी कर्मचारी के बराबर काम करते हैं, इसके लिए कोई नीति न लाकर सरकार ने कर्मचारी हितैषी न होने का प्रमाण दिया है। सरकार ने मकान भत्ता, कंपनसेटरी भत्ता, कैपिटल भत्ता, ट्राइबल भत्ता, विंटर भत्ता, दैनिक भत्ता आदि कई भत्तें हैं जो पिछले चार साल से नहीं बढ़े हैं ,उन पर कोई बात न करके कर्मचारियों को निराश किया है। करुणामूल्क आधार पर नौकरी पाने वाले लगभग 4500 युवा लगभग 80 दिन से हड़ताल पर चल रहे हैं, इसके बारे में कोई पॉलिसी न लाकर सरकार बहरी बनी हुई है। सुरिंद्र सिह मनकोटिया का कहना है कि रात दिन लोगों की सुरक्षा व्यवस्था का जिम्मा संभालने वाली पुलिस को सरकार ने इनकी आठ साल की अवधि को दूसरे समकक्ष कर्मचारियों के बराबर कम न करके पुलिस वर्ग में निराशा पैदा की है और यह निराशा पुलिस कर्मियों के मुख्यमंत्री से मिलने से भी झलक रही है। 4-9-14 वर्ष बाद मिलने वाली वेतन वृद्धि जैसी जटिल समस्या को सरकार हल नहीं कर पाई है, जिससे हजारों कर्मचारियों को नुकसान हो रहा है। सुरिंद्र सिह मनकोटिया का कहना है कि सरकार ने होमगार्ड, पैरा पंप आपरेटर, पैराफिटर, सिलाई अध्यापक, पंचायत चौकीदार, एसएमसी टीचर, आंगनबाड़ी वर्कर, आंगनवाड़ी वर्कर्स व हेल्पर, आशा वर्कर, एससीवीटी लैब तकनीशियन, अध्यापक, पीस मील वर्कर्स आदि बहुत सी ऐसी श्रेणियां हैं, जिनके प्रति मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का रवैया उदासीन रहा है, जबकि ये श्रेणियां कई सालों से पिस रही हैं। Himachal Pradesh | Government Employee News | JCC Meeting News Update
उपचुनाव में चारो सीटों पर मिली जीत के बाद प्रदेश में कांग्रेस (Congress) की जन जागरण अभियान के तहत निकाली पदयात्रा को लेकर उद्योग एवं परिवहन मंत्री बिक्रम सिंह ने कांग्रेस पर जुबानी हमला बोला है। बिक्रम सिंह का कहना है कि कांग्रेस ने इस तरह की पदयात्रा यूपी में भी की थी लेकिन वहां पर एक भी सीट कांग्रेस को नहीं मिल पाई थी। हिमाचल में उपचुनाव जीतने के बाद कांग्रेस अति उत्साहित है। बिक्रम सिंह का कहना है कि 2022 के चुनावों में भाजपा सुधार करते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की अगुवाई में सरकार बनाएगी। उपचुनावों में मिली हार से उन्हें सुधार करने का मौका मिला है और वह इसमें निश्चित तौर पर सुधार करेंगे। वहीं बिक्रम सिंह का कहना है कि इन्वैस्टर मीट की ग्राऊंड ब्रेकिंग सेरेमनी को लेकर भी विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। इन्वैस्टर मीट जैसा इवेंट हिमाचल में इससे पहले हुआ ही नहीं है। उद्योग मंत्री का कहना है कि जो लोग आलोचना कर रहे हैं उनकी सरकार लंबे समय तक प्रदेश में रही हैं, क्या कभी वह इस तरह का इवेंट करवा पाए हैं। आलोचना करने वाले लोग 5 से 10 लोग भी इकट्ठा नहीं कर पाए हैं। विधानसभा में जब सवाल उठाए गए तो तथ्यों के साथ सरकार ने जवाब दिया है कि इन ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी से कितने लोगों को लाभ मिला है। बिक्रम सिंह का कहना है कि हिमाचल में पहली बार प्राइवेट सेक्टर में हिमाचल के युवाओं को तवज्जो मिली है। प्रदेश में प्रस्तावित इस ग्राऊंड ब्रेकिंग सेरेमनी में 15000 करोड़ रुपए की इन्वेस्टमेंट होगी। Himachal News | Himachal Politics
2022 विधानसभा चुनाव का काउंटडाउन शुरू हो चुका है और दोनों राजनैतिक दलों के साथ -साथ टिकट के चाहवान भी मैदान में डटे है। यूं तो हर सीट पर रोचक घमासान तय है और अभी से खींचतान भी चरम पर है, पर सोलन निर्वाचन क्षेत्र की कहानी अलग भी है और अजब भी। यहां कांग्रेस के पास 80 पार कर चुके कर्नल का कोई विकल्प नहीं दिखता तो भाजपा के डॉक्टर अपनों के मर्ज का ही सबब बने हुए है। कर्नल के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार अच्छा कर रही है, बावजूद इसके उनके विरोधियों की खासी तादाद है। पर वर्तमान में कोई ऐसा नहीं दिखता जो कर्नल के टिकट को चुनौती दे रहा हो। उधर भाजपा में डॉ राजेश कश्यप को अपने ही पूरी तरह नहीं स्वीकार रहे। विरोधी इसी ताक में है कि कोई मौका हाथ लगे और डॉक्टर को चित कर दे। पार्टी इसका खामियाजा भी उठा रही है। सोलन की वर्तमान सियासत को समझने के लिए बीते दो दशक पर नज़र डालना जरूरी है। वर्ष 2000 में सोलन विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था और उस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी डॉ राजीव बिंदल ने जीत दर्ज की थी। ये पहली बार था जब बिंदल विधानसभा पहुंचे थे, यानी ये प्रदेश की सियासत में बिंदल की एंट्री थी। इसके बाद 2003 और 2007 में भी बिंदल जीते और सोलन निर्वाचन क्षेत्र भाजपा का मजबूत गढ़ बना गया। बिंदल ने आते ही तमाम विरोधी भी साइडलाइन कर दिए और इस दौरान सोलन में कांग्रेस भी कमजोर होती गई। फिर बदले परिसीमन के बाद सोलन निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित हो गया और 2012 के विधानसभा चुनाव में बिंदल चेहरा नहीं रहे। बिंदल ने नाहन को कर्मभूमि बनाया और पार्टी ने कुमारी शीला को चेहरा। वहीं कांग्रेस ने दो बार शिमला संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे कर्नल धनीराम शांडिल को मैदान में उतारा। नतीजे आये और शांडिल की जीत के साथ ही कांग्रेस ने जीत का सूखा खत्म किया। तब से अब तक सोलन निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा लगातार कमजोर होती दिखी है। बिंदल के बाद जिस एक अदद चेहरे की जरुरत पार्टी को है उसे लेकर अब भी संशय की स्थिति है। 2017 के विधानसभा चुनाव में जहां कांग्रेस ने फिर कर्नल धनीराम शांडिल पर भरोसा जताया था तो भाजपा ने आईजीएमसी में बतौर चिकित्सक सेवाएं देते रहे डॉ राजेश कश्यप को मैदान में उतारा। तब कुमारी शीला और तरसेम भारती भी दावेदार थे लेकिन डॉ राजेश कश्यप की पैराशूट लैंडिंग ने सबके अरमानो पर पानी फेर दिया। माना जाता है कि टिकट के लिए उनकी राह प्रशस्त करने में तब डॉ राजीव बिंदल की भी अहम भूमिका रही थी। हालांकि बिंदल के करीबी ही टिकट आवंटन को लेकर नाराज़ थे। खेर नजदीकी मुकाबले में डॉ राजेश कश्यप हार गए और कर्नल धनीराम शांडिल लगातार दूसरी बार विधानसभा पहुंचे। इस चुनाव के बाद सोलन भाजपा में बहुत कुछ बदला और पार्टी दो धड़ों में बंटी दिखी है। चुनाव के बाद कश्यप आहिस्ता-आहिस्ता सोफट गुट के नजदीक हो गए। वहीं महेंद्र नाथ सोफत जिन्हे बिंदल का धुर विरोधी माना जाता है। इसी गुटबाजी का नतीजा है कि इसी वर्ष हुए जिला परिषद और सोलन नगर निगम चुनाव भी भाजपा के लिए प्रतिकूल रहे है और वर्तमान स्थिति में पार्टी के लिए 2022 की राह भी आसान होने वाली नहीं है। शीला और तरसेम, सक्रियता और पकड़ दोनों बढ़ाने होंगे ! भले ही सोलन भाजपा में एक बड़ा तबका डॉ राजेश कश्यप के विरोध में दिख रहा हो लेकिन सवाल ये है कि 2022 में यदि डॉ राजेश कश्यप नहीं तो कौन ? जिला परिषद् चुनाव में सलोगड़ा वार्ड से कुमारी शीला भाजपा उम्मीदवार थी। लगातार तीन चुनाव जीत चुकी कुमारी शीला जीत का चौका लगाने का दावा कर रही थी लेकिन जनता का आशीर्वाद उन्हें नहीं मिला। ये हार कुमारी शीला के लिए बड़ा झटका है। शीला अगर जीत जाती तो 2022 के लिए उनका दावा भी मजबूत होता, किन्तु ऐसा हुआ नहीं। शीला अधिक सक्रीय भी नहीं दिख रही है। ऐसी ही स्थिति 2017 तक पार्टी में प्रो एक्टिव दिखते रहे तरसेम भारती की है। पहले ख़राब स्वास्थ्य ने तरसेम को सक्रिय राजनीति से दूर रखा। अब भी वे अधिक सक्रिय नहीं दिखते और न ही पार्टी के जमीनी संगठन में उनकी स्वीकार्यता और पकड़ दिखती है। इन दोनों नेताओं को यदि 2022 के लिए अपना दावा मजबूत करना है तो सक्रियता भी बढ़ानी होगी और दमखम भी दिखाना होगा। वर्तमान स्थिति में तो ये डॉ राजेश कश्यप को ज्यादा टक्कर देते नहीं दिखते। क्या दो भाइयों में होगा टिकट के लिए मुकाबला ? भाजपा के सामने एक अन्य विकल्प पूर्व सांसद वीरेंद्र कश्यप भी हो सकते है। कश्यप दो बार शिमला संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे है। रोचक बात ये है कि डॉ राजेश कश्यप और वीरेंद्र कश्यप भाई है। पर वीरेंद्र कश्यप 2019 लोकसभा चुनाव में टिकट कटने के बाद से ही लगभग साइलेंट है। जानकार मानते है कि सियासत महाठगिनी है और 2022 में टिकट के लिए दो भाई भी अगर दौड़ में दिखे तो शायद किसी को हैरानी न हो। कश्यप फेस, पर तालमेल बैठाने में फेल सोलन की सियासत में फिलवक्त डॉ राजेश कश्यप ही भाजपा का प्राइम फेस है। सरकार में कामकाज करवाने का रसूख कश्यप का ही माना जाता है लेकिन जमीनी संगठन में ही उन्हें लेकर स्वीकार्यता नहीं दिखती। दरअसल भाजपा के संगठन में बिंदल के निष्ठावानों की भरमार है। ऐसे में डॉ कश्यप के साथ संगठन पूरी तरह कदमताल करता नहीं दिखता। वहीँ कश्यप भी अब तक संगठन में उस तरह की जमीनी पैठ नहीं बना पाए जैसी समर्थकों को उनसे उम्मीद थी। इसी तालमेल की कमी का खामियाजा पार्टी जिला परिषद और नगर निगम चुनाव में भुगत चुकी है। हालात नहीं बदले तो निजी तौर पर डॉ राजेश कश्यप के लिए भी आगे की राह बेहद मुश्किल होगी। शांडिल का विकल्प नहीं 81 पार कर चुके डॉ कर्नल धनीराम शांडिल इस वक्त सोलन कांग्रेस का सबसे बड़ा और मजबूत चेहरा है। 2012 में शांडिल ने ही सोलन में कांग्रेस की वापसी करवाई थी और अब भी वे ही सोलन निर्वाचन क्षेत्र में एकछत्र नेता है। 2022 में भी संभवतः शांडिल ही कांग्रेस का चेहरा होंगे क्यों कि उनका विकल्प पार्टी के पास नहीं दिखता। वीरभद्र सरकार में मंत्री रहे शांडिल को गांधी परिवार का करीबी माना जाता है और यदि पार्टी की सत्ता वापसी होती है तो उन्हें कोई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी भी दी जा सकती है। पर ये जहन में रखना भी जरूरी है कि 2022 विधानसभा चुनाव के वक्त शांडिल की उम्र 82 पार होगी और उनका विकल्प न होना पार्टी के अच्छी स्थिति नहीं है। गिले शिकवे मिटाकर होगी राह आसान वीरभद्र सरकार में मंत्री रहते हुए कर्नल धनीराम शांडिल ने साढ़े चार सौ करोड़ से अधिक के काम करवाए थे, हालांकि इसके बावजूद शांडिल प्रभावशाली जीत दर्ज नहीं कर सके। कई मौकों पर शांडिल पार्टी के एक गुट पर 2017 में उनके विरोध में काम करने की बात कह चुके है। जिला परिषद् चुनाव में सिरिनगर वार्ड के टिकट के लिए वरिष्ठ नेता रमेश ठाकुर और कर्नल में खुलकर ठनी और उस दौरान शांडिल ने रमेश ठाकुर की पत्नी लीला देवी का टिकट कटवाया। बावजूद इसके लीला देवी जीत दर्ज करने में कामयाब रही। रमेश ठाकुर पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के करीबी मानते जाते है, पर अब वीरभद्र सिंह के निधन के बाद बदली स्तिथि में राजनैतिक समीकरण भी बदल सकते है। कंडाघाट ब्लॉक में ठाकुर का अच्छा प्रभाव है और 2022 में यदि पार्टी को बेहतर करना है तो कर्नल और ठाकुर को साथ आना होगा। बेदाग़ भी और गुटबाजी से भी दूर है शांडिल डॉ कर्नल धनीराम शांडिल, हिमाचल की सियासत का वो बेदाग़ नाम जिस पर विरोधी भी कभी कीचड़ नहीं उछाल पाएं। वीरभद्र सरकार के खिलाफ वर्ष 2016 में भाजपा एक चार्जशीट लाई जिसमे कांग्रेस के मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप थे। तब भाजपा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह, बेटे विक्रमादित्य सिंह, प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू, 10 मंत्रियों, 6 सीपीएस और 10 बोर्ड-निगम-बैंकों के अध्यक्ष-उपाध्यक्षों समेत कुल 40 नेताओं और एक अफसर पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे। पर उस चार्जशीट में भी कर्नल धनीराम शांडिल का नाम नहीं था। यानी विपक्ष भी कभी उनकी ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा पाया। एक बात और कर्नल शांडिल की खूबी है, वो है उनकी गुटबाजी से दुरी। प्रदेश कांग्रेस में कई धड़े है, पर शांडिल किसी भी गुट में शामिल नहीं है। ऐसे में शांडिल से पार पाने को भाजपा को संगठित भी होना होगा और पूरी ताकत भी झोंकनी होगी। Himachal Pradesh | Solan News | Himachal Politics
इशारों इशारों में एलान हो चूका है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर 2022 विधानसभा चुनाव के समर में उतरने को तैयार है। राठौर अपनी सियासी जमीन तलाशने में जुटे है और दो निर्वाचन हलकों में उनके चुनाव लड़ने की चर्चा जोरों पर है, पहला ठियोग और दूसरा शिमला शहरी सीट। विरोधी कभी मजबूर कहकर जिन कुलदीप राठौर का उपहास उड़ाते थे वो अब बेहद मजबूत दिख रहे है। चुनाव लड़ने के सवाल पर कुलदीप कहते है कि जिस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी की जमानत जब्त हुई थी वहां से ही चुनाव लड़ेंगे। अब दिलचस्प बात ये है कि 2017 में ठियोग और शिमला शहर, दोनों जगह कांग्रेस की जमानत जब्त हुई थी। ठियोग से कांग्रेस प्रत्याशी दीपक राठौर, तो शिमला शहर से हरभजन सिंह भज्जी की जमानत जब्त हुई थी। यानी राठौर ने दोनों विकल्प खुले रखे है। ठियोग विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस की कद्दावर नेता विद्या स्टोक्स का चुनावी क्षेत्र रहा है। पर पिछले चुनाव में पार्टी आलाकमान ने यहाँ से मैडम स्टोक्स का टिकट काटकर दीपक राठौर को उम्मीदवार बनाया था। कहते है राठौर पार्टी आलकमान के नजदीकी है जिसके बुते ही उन्हें टिकट मिला था। तब दीपक राठौर टिकट तो ले आये पर जीत नहीं सके। ख़ास बात ये है की उस चुनाव में राठौर की जमानत जब्त हुई थी। ठियोग की जनता ने कम्युनिस्ट राकेश सिंघा को अपना विधायक चुना था। हालांकि राठौर पिछले चुनाव हारने के बाद से ही क्षेत्र में सक्रिय जरूर है। पर यदि कुलदीप सिंह राठौर ठियोग से चुनाव लड़ने का मन बनाते है तो दीपक राठौर को दूसरा मौका मिलना मुश्किल होगा। पर यहाँ कुलदीप राठौर को ये भी जहन में रखना होगा कि यदि माकपा विधायक राकेश सिंघा फिर से मैदान में उतरते है तो मुकाबला आसान नहीं होने वाला। जानकार मान कर चल रहे है कि सिंघा के अगले कदम पर ही कुलदीप की चुनावी चाल निर्भर करेगी। शिमला शहर की बात करें यहां पिछले चुनाव में पार्टी ने हरीश जनारथा की दावेदारी को नकार हरभजन सिंह भज्जी को टिकट दिया था। नतीजन पार्टी के एक गुट में नाराजगी थी और भज्जी की जमानत भी नहीं बच सकी। अब भी शिमला शहर में कांग्रेस कई गुटों में बंटी है और ये अंतर्कलह शिमला शहर में पार्टी का पुराना मर्ज रहा है। शिमला शहर में बीते कई चुनाव में कांग्रेस के अपने ही बतौर बागी पार्टी प्रत्याशी का खेल बिगाड़ते आ आ रहे है। ऐसे में राठौर के लिए भी शिमला शहर आसान सीट नहीं रहने वाली। हाँ टिकट के लिए उनका दावा जरूर मजबूत रहेगा क्यों की बतौर प्रदेश अध्यक्ष उनके योगदान के बुते उनका सियासी कद निसंदेह बढ़ा है। Himachal Politics | Shimla News | Theog News |
कौन डटा रहेगा और किसे कुर्सी का मोह त्याग आगे बढ़ना होगा कुछ कह नहीं सकते। पर बदलाव होगा ये निश्चित है। स्वयं मुख्यमंत्री भी ये कह चुके है कि उपचुनाव की उस करारी शिकस्त के बाद अब वो होगा जो मंज़ूर-ए-आलाकमान होगा। कयासों की सुई अब संगठन और मंत्रिमंडल पर आकर टिक गई है। हालांकि कौन रहेगा और किसकी विदाई होगी अभी कुछ कह नहीं सकते। नगर निगम चुनाव और उपचुनाव में मिली हार के बाद, प्रेशर पॉलिटिक्स का दंश झेल रही भाजपा और भी कई मुसीबतों से गुज़र रही है। पार्टी विद डिसिप्लिन में व्यापक बदलाव की दरकार भी है और सुगबुगाहट भी। पहले तो मुख्यमंत्री तक बदलने के कयास लग रहे थे मगर अब माहौल थोड़ा ठंडा है तो ऐसा कुछ होता नहीं दिखाई दे रहा। पर मंत्रिमंडल के नॉन परफार्मिंग मंत्रियो पर अब भी बदलाव की तलवार लटक रही है। इस पर मुख्यमंत्री का दिल्ली दौरा भी खूब चर्चा में है। प्रदेश मंत्रिमंडल के कई मंत्री ऐसे है जो खुद को साबित करने में विफल रहे है। कई मौकों के बावजूद भी जो न तो अपना दमखम दिखा पाए और न ही अपनी साख बचा पाए। कई अपने शब्दों को लेकर विवादों में रहते है और कई अपने बर्ताव को लेकर। उपचुनाव में पार्टी ने जल शक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर को मंडी संसदीय सीट के लिए, बिक्रम ठाकुर को फतेहपुर के लिए, और मंत्री सुरेश भारद्वाज को जुब्बल कोटखाई उपचुनाव के लिए प्रभारी नियुक्त किया था। इनके आलावा मंत्री गोविन्द सिंह ठाकुर और मंत्री राम लाल मारकंडा पर भी अपने -अपने क्षेत्रों से लीड दिलवाने का जिम्मा था। पर ये सभी असफल रहे। हार मिली या जीत कम से कम उपचुनाव में ये मंत्री फील्ड पर दिख रहे थे। इनके अलावा कुछ ऐसे मंत्री भी है जिनका उपचुनाव के दौरान कोई ख़ास प्रभाव देखने को नहीं मिला। जैसे की मंत्री राजेंदर गर्ग, सरवीण चौधरी, और मंत्री सुखराम चौधरी। भाजपा की तीन दिवसीय कार्यसमिति की बैठक के बाद ये तर्क दिया गया भाजपा के कार्यकर्ता व नेताओं में अतिआत्मविश्वास था और इसीलिए भाजपा उपचुनाव हारी। हालाँकि असल में आत्मविश्वास वाली स्थिति भी सिर्फ मंडी में देखने को मिल रही थी। लग रहा था मानों कार्यकर्ताओं को केवल मुख्यमंत्री पर भरोसा है। परिणाम भी कुछ ऐसे ही बाहर आए। शिक्षा मंत्री गोविंद ठाकुर के जिला कुल्लू की चारों सीटों पर भाजपा पिछड़ी। मंत्री के अपने निर्वाचन क्षेत्र में भी पार्टी को लीड नहीं मिली। यानि मंडी संसदीय उपचुनाव के इम्तिहान में गोविन्द सिंह ठाकुर पूरी तरह फेल हो गए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि मंत्री के जिला में पार्टी अच्छा करती तो जीत हार का अंतर खत्म किया जा सकता था। तकनीकी शिक्षा मंत्री डा. रामलाल मारकंडा के क्षेत्र में भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। मंत्री अपने हलके व गृह जिले में भाजपा की साख नहीं बचा पाए। लाहौल स्पीति में कांग्रेस प्रत्याशी को बढ़त मिली। लाहुल स्पीति के विधायक एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री डा. रामलाल मारकंडा जिला परिषद के चुनाव में भी कुछ अच्छा नहीं कर पाए थे। जिला परिषद् के चुनाव में भी भाजपा को हार मिली थी। इस पर मंत्री का लड़ाई वाला वायरल वीडियो भी एक ऐड ऑन फैक्टर है। बात विवादों की हो तो ज़िक्र मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर और मंत्री सुरेश भारद्वाज का भी ज़रूरी है। अपने बयानों को लेकर दोनों ही खूब चर्चा में रहते है। मंत्री महेंद्र ठाकुर को मंडी संसदीय उपचुनाव का प्रभारी बनाया गया था। पर वे भी चुनाव प्रचार प्रसार में अधिक प्रभावशाली नहीं दिखे। वहीं मंत्री सुरेश भारद्वाज के हलके में जो हुआ उसे तो भूलना भी असंभव है। जुब्बल कोटखाई की हार को भाजपा के इतिहास का काला अध्याय कहा गया। यहां देश की सबसे बड़ी पार्टी के प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई। यहां संगठन भी टूटा और कार्यकर्त्ता भी पार्टी से रूठ गया। स्थिति सुधरने के बजाए दिन प्रति दिन बिगड़ती चली गई। चुनाव प्रभारी सुरेश भारद्वाज अपने कार्यकर्ताओं को मनाने में पूरी तरह विफल रहे और नतीजा अब सभी के सामने है। फतेहपुर के चुनाव प्रभारी, उद्योग मंत्री बिक्रम सिंह ठाकुर व सेह प्रभारी वन मंत्री राकेश पठानिया ने भी फेल हुए है। विशेषकर बिक्रम ठाकुर के लिए ये बड़ी हार है। इससे पहले पालमपुर नगर निगम चुनाव में भी मंत्री प्रभारी थे और भाजपा को करारी शिकस्त मिली थी। अब इन मंत्रियों के रिपोर्ट कार्ड पर क्या रिपोर्ट आती है इसपर सबकी निगाहें टिकी हुई है। बिंदल की वापसी के पक्ष में एक तबका कई मंत्रियों के एग्ज़िट के साथ साथ कुछ की मंत्रिमण्डल में एंट्री होने की सुगबुगाहट भी है। एक बड़ा तबका चाहता है कि भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व नाहन से विधायक डॉ राजीव बिंदल ककी संगठन या मंत्रिमंडल में वापसी हो। इसको लेकर प्रेशर पॉलिटिक्स की शुरुआत भी हो चुकी है। बिंदल के समर्थकों के इस्तीफे आना भी शुरू हुए है। ये सच है कि बिंदल भी बतौर प्रभारी अर्की उपचुनाव और सोलन नगरनिगम चुनाव में अच्छा नहीं कर पाए पर उनकी ज़मीनी पकड़ पर कोई संशय नहीं है और उनके समर्थकों का दबाव तो है ही। अब बिंदल की एंट्री होती है तो किसके स्थान पर होगी ये बड़ा सवाल है और अगर नहीं होती तो उन्हें मैनेज कैसे किया जाए ये भी बड़ा सवाल है। | Himachal Politics | Himachal News
2017 में फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा नेता बलदेव ठाकुर ने बगावत का बिगुल फूंका और चुनाव लड़ा। जैसा स्वाभाविक तौर पर होता है पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया। उस चुनाव में न तो बलदेव खुद जीते और न भाजपा को जीतने दिया। इसके बाद फिर वैसा ही हुआ जैसा सियासत में आम तौर पर होता है, यानी बलदेव की घर वापसी हो गई। हालहीं में उपचुनाव हुए और 2017 में जिन बलदेव ने पार्टी के समीकऱण बिगाड़े थे उन्हें ही पार्टी ने टिकट दे दिया। जाहिर है पार्टी को बलदेव जिताऊ दिख रहे थे। यानी सियासत में कुछ भी मुमकिन है। यहाँ निष्कासन के क्या मायने होते है ये फतेहपुर के इस प्रकरण से पता चलता है। अब बात करते है भाजपा के ताजा निष्कासन की, मतलब चेतन बरागटा की। हाल ही में हुए जुब्बल कोटखाई उपचुनाव में भाजपा ने चेतन का टिकट काटा, फिर चेतन ने बगावत की, पार्टी ने निष्कासित किया और दोनों हार गए। सबकुछ ठीक वैसा ही हुआ जैसा 2017 में फतेहपुर में हुआ था, बस अंतर ये है कि तब फतहेपुर में भाजपा लड़ कर हारी थी और जुब्बल कोटखाई में तो मानो भाजपा थी ही नहीं। अब इसके आगे भी शायद वो ही हो जो फतेहपुर में हुआ, यानी घर वापसी। जानकार चेतन बरागटा की जल्द घर वापसी तय मानकर चल रहे है, बस देखना ये है कि ये घर वापसी कब होती है या नहीं होती। हाल ही में हुए उपचुनाव में यूँ तो भाजपा सभी जगह परास्त हुई लेकिन सबसे बुरी स्थिति पार्टी के लिए जुब्बल - कोटखाई में रही। यहां पार्टी की जमानत जब्त हुई। पार्टी के हर मंथन में यहाँ टिकट आवंटन को लेकर सवाल उठे है। कहने को तो पार्टी ने करीब डेढ़ दशक से पार्टी से जुड़े नेता चेतन बरागटा के टिकट काटने का कारण परिवारवाद को बताया था, लेकिन ये तर्क किसी के गले से नहीं उतरा। ऐसा इसलिए क्यों कि चेतन ऐसे पहले नेता पुत्र नहीं है जो भाजपा में टिकट मांगने वालों में शामिल हो। भाजपा में ऐसे कई उदहारण है। चेतन तो पैराशूट से टिकट लेने भी नहीं आये थे, फिर उन्हें टिकट देने में क्या आपत्ति थी ? ये सवाल भाजपा के कार्यकर्ताओं के मन में भी था और अब भी है। इसी के चलते भाजपा का एक बड़ा तबका चेतन के समर्थन में था, जिसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा। इस दौरान पार्टी ने चेतन और उनके समर्थकों को 6 वर्ष के लिए निष्कासित कर दिया था। पार्टी के आला नेताओं के बयान भी आये जिनमें कहा गया कि ये निष्कासन वापस नहीं होगा। पर जानकार मान कर चल रहे है कि 2022 से पहले पार्टी में चेतन की वापसी तय सी है। वापसी होनी है तो देर नहीं करनी चाहिए ! बताया जा रहा है कि हार के बाद पार्टी के ज़ारी चिंतन - मंथन में जुब्बल कोटखाई में टिकट वितरण को हार का बड़ा कारण माना गया है, यानी पार्टी ने चेतन का टिकट काटकर चूक की है। अब जब 2022 का काउंटडाउन शुरू हो चूका है, ऐसे में पार्टी का एक वर्ग चेतन की जल्द वापसी का हिमायती बताया जा रहा है। 68 विधानसभा सीटों वाले हिमाचल प्रदेश में एक -एक सीट बेहद महत्वपूर्ण ही और ऐसे में पार्टी को जल्द तय करना होगा की चेतन की वापसी होगी या नहीं। यदि 'पार्टी विथ डिफ्रेंस' भाजपा 6 साल के लिए अपने दरवाजे चेतन के लिए बंद कर चुकी है तो भाजपा को अभी से 2022 के लिए जुब्बल कोटखाई में अपनी जमीन तैयार करनी होगी, ताकि उपचुनाव जैसी स्थिति टाली जा सके। पार्टी को जहन में रखना होगा कि उक्त क्षेत्र में कांग्रेस जमीनी तौर पर काफी मजबूत है, ऐसे में देरी उचित नहीं।
उपचुनाव में टिकट कटने के बाद खफा -खफा से दिखते रहे कांग्रेस नेता और भाजपा विधायक अनिल शर्मा के बेटे आश्रय शर्मा ने हाल ही गुपचुप सीएम जयराम ठाकुर से मुलाकात की है। इस मुलाक़ात के सियासी माहिर कई मायनें निकाल रहे है। अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहा पंडित सुखराम का परिवार आखिर किसकी तरफ है, ये काफी लम्बे समय से बड़ा सवाल बना हुआ है। उपचुनाव के दौरान भी अनिल और आश्रय के दो अलग पार्टियों में होने से ये बिलकुल भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि आखिर पंडित सुखराम का निष्ठावान वोट किस प्रत्याशी की ओर जाएगा। भाजपा से विधायक अनिल शर्मा जहां उपचुनाव में भाजपा के प्रचार प्रसार नहीं कर रहे थे तो वहीं आश्रय जरूर प्रतिभा सिंह के लिए औपचारिक प्रचार प्रसार करते नज़र आए थे। अब आश्रय की मुख्यमंत्री के साथ मुलाक़ात चर्चा में है और अंदरखाते क्या चल रहा है कुछ कहा नहीं जा सकता। 2017 में पंडित सुखराम के परिवार ने भाजपा का दामन थामा था, पर फिर 2019 में पंडित सुखराम और आश्रय शर्मा कांग्रेस में लौट गए। वहीँ अनिल शर्मा भाजपा में तो है लेकिन लगातार नज़रअंदाजी का दंश झेल रहे है। हालांकि आश्रय शर्मा की भी कांग्रेस में ज्यादा सहज नहीं दिखते। यानी दो अलग -अलगे सियासी नावों में सवार ये परिवार लगभग हाशिए पर है। बीते दिनों अनिल शर्मा भी कह चुके है कि अब बाप -बेटा दोनों एक ही पार्टी में रहेंगे जिसके बाद से ही सबको इस परिवार के अगले कदम का इंतज़ार है। मंडी लोकसभा के उपचुनाव के लिए आश्रय लगातार कांग्रेस से टिकट मांगते रहे। उनके दादा पंडित सुखराम का भी यही मानना था कि टिकट के असली हकदार आश्रय ही है। पर जैसा लग रहा था वैसा ही हुआ और कांग्रेस ने आश्रय को टिकट ना देकर पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह को टिकट दिया। हालाँकि इसके बाद उन्हें कांग्रेस द्वारा उपचुनावों के लिए प्रयवेक्षक नियुक्त किया गया। आश्रय ने प्रतिभा के लिए वोट मांगें ज़रूर मगर वो उपचुनावों में उतना एक्टिव नहीं दिखे। इस उपचुनाव में सदर मंडी से विधायक अनिल शर्मा के क्षेत्र से भाजपा को लीड मिली है। अनिल ने न तो भाजपा प्रत्याशी के लिए प्रचार किया और न ही वो मैदान में उतरे, बावजूद इसके उनके क्षेत्र से भाजपा के प्रत्याशी को करीब तीन हज़ार की बढ़त मिली। जबकि मंडी संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाले दो मंत्रियों के गृहक्षेत्रों से भाजपा को लीड़ नहीं मिली है। चुनाव के दौरान अनिल शर्मा को भी सीएम जयराम ठाकुर ने पार्टी के लिए काम करने के लिए कहा था और उनके मान सम्मान को बरकरार रखने की बात कही थी। अब उपचुनाव के बाद आश्रय शर्मा के सीएम जयराम ठाकुर से मिलने के बाद कई कयास लग रहे है। हालांकि आश्रय इसे शिष्टाचार भेंट बता रहे है। बहरहाल ये तथाकथित शिष्टाचार भेंट भविष्य में क्या रंग लाती है, इसको लेकर चर्चा होना तो लाज़मी है।
वो दो नेता जो निष्ठावान सिपाही बने, पार्टी का झंडा तो बुलंद करते रहे मगर उनके मुताबिक़ बीते कुछ समय में उन्हें न तो मान मिला, न सम्मान। नौबत यहां तक आ गई कि दोनों को अपने पदों से इस्तीफे देने पड़े। हम बात कर रहे है भाजपा के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष कृपाल परमार व पूर्व कार्यसमिति सदस्य पवन गुप्ता की। गुप्ता को डॉ राजीव बिंदल का करीबी माना जाता है और वे हालहीं में अनियमितताओ के चलते सुर्ख़ियों में आएं बघाट अर्बन कोआपरेटिव बैंक के चेयरमैन भी रहे है। इन दो नेताओं के इस्तीफों ने कहीं न कहीं ये साफ़ कर दिया कि भाजपा में कुछ ठीक नहीं चल रहा। हालांकि इनके इस्तीफे स्वीकार नहीं हुए और बाद में कृपाल परमार ने तो इस्तीफा वापस भी लिया और 26 नवंबर को कार्यसमिति की बैठक में शामिल भी हुए। दरअसल 2017 विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने से पश्चात ही कई भाजपाइयों के दिन फिर गए थे, तो कई हाशिये पर चले गए। अब तक तो ये नेता चुप्पी साधे हुए थे, मगर अब 2022 के नजदीक आते आते सब्र का बाँध टूटने लगा है, ये इन इस्तीफों से साफ़ दिखाई दे रहा है। इन दोनों नेताओं के इस्तीफों का कारण भी कुछ एक सा ही है। दोनों ने ही नज़रअंदाज़ किये जाने की बात कही। वहीं व्यापक तौर पर देखा जाएँ तो इन इस्तीफों के पीछे उपेक्षा तो बड़ा कारण माना जा रहा है, इसे प्रेशर पॉलिटिक्स के पैंतरे के तौर पर भी देखा जा रहा है। दरअसल उपचुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद जयराम सरकार और प्रदेश संगठन के खिलाफ विरोधियों को हमलावर होने का मौका मिला है। प्रेशर पॉलिटिक्स की बिसात पर स्पष्ट सन्देश दिया गया है कि एक वर्ग को उपेक्षित रखकर मिशन रिपीट का स्वपन साकार नहीं हो सकता। इस्तीफे के कारणों पर फर्स्ट वर्डिक्ट मीडिया ने इन दोनों से बातचीत की। कृपाल परमार के अनुसार उन्हें प्रायोजित तरीके से प्रताड़ित करवाया गया। तो पवन गुप्ता के अनुसार अफसरशाही सरकार पर हावी है और भ्रष्टचारियों को पनाह दे रही है। पेश है बातचीत के कुछ मुख्य अंश.... मैं प्रताड़ित होता रहा और मूकदर्शक बनें रहे संगठन और सरकार के मुखिया : परमार सवाल : इतने लम्बे समय से पार्टी के निष्ठावान सिपाही आप रहे है, अब अचानक ये इस्तीफा क्यों ? जवाब : पार्टी का निष्ठावान सिपाही होने के बावजूद लगातार मुझे प्रताड़ित किया जा रहा था, संगठन द्वारा भी और सरकार द्वारा भी। मैंने अपनी भावनाओं को, अपनी बात को पार्टी के हर स्तर पर रखने की कोशिश की, पर उसका कोई समाधान नहीं निकला। छोटे- मोटे कार्यकर्ताओं द्वारा भी विभिन्न तरीकों से मुझे प्रताड़ित करवाया गया। मैंने चीज़ें ठीक करने की बहुत कोशिश की, अंत तक चुप चाप सहता रहा पर जब चीज़ें नियंत्रण से बाहर हो गई तो मुझे ये इस्तीफ़ा देना पड़ा। सवाल : आप कह रहे है कि आपकी प्रताड़ना हुई, आपको ज़लील किया गया, ऐसे क्या वाक्य हुए जो आज आपको ये कहना पड़ रहा है ? जवाब : पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा बहुत सुनियोजित तरीके से बनाई गई रणनीति के तहत कुछ लोगों को हमारे पीछे लगा दिया गया। ऐसे लोग मेरे फेसबुक पर गलत और अभद्र कमैंट्स करते थे। मेरे साथ बुरा बर्ताव करते थे। मैंने कई बार पार्टी से उनकी शिकायत की लेकिन पार्टी खुद ही उन्हें प्रोटेक्ट करती रही। उनके खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर उन लोगों को पार्टी में प्रमोशन दिए गए। सवाल : हाल ही में हुए उपचुनाव में जिस तरह से आपका टिकट काटा गया या उसके अलावा जो भी आपके साथ हुआ इसका ज़िम्मेदार आप किसे मानते है ? क्या कोई व्यक्ति विशेष इसका ज़िम्मेदार है ? जवाब : मैं पिछले 35 सालों से पार्टी के लिए काम कर रहा हूँ। 1982 से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से मैं जुड़ा रहा हूँ। इसके बाद भाजपा युवा मोर्चा में मैने अपनी सेवाएं दी है और पिछले 22 -23 साल से में प्रदेश भाजपा का पदाधिकारी हूँ। 3 बार मैं प्रदेश का महामंत्री रहा हूँ और अभी प्रदेश का उपाध्यक्ष था। किसान मोर्चा का भी मैं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुका हूँ। राज्यसभा का सांसद भी मैं रह चूका हूँ। पार्टी का ऐसा कोई कार्य नहीं है जो मैंने नहीं किया परन्तु फिर भी मेरी अनदेखी हुई। इस सब के पीछे कई लोगों की मिली भगत है, ये सिर्फ किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है। सवाल : आपने ऐसे वक्त पर इस्तीफ़ा दिया जब प्रदेश में कार्यसमिति की बैठक होने वाली थी। ऐसा क्यों ? जवाब : 2017 में मैंने फतेहपुर से चुनाव लड़ा। कुछ लोग नहीं चाहते थे की मैं ये चुनाव लड़ूँ। कहीं न कहीं मैं उन लोगों के लिए बड़ी समस्या बना हुआ था। हमारी रैलियों को जान बुझ कर खराब करने की कोशिश की गई। फिर एक कार्यकर्त्ता द्वारा हमें ज़लील करवाया गया, एक मंत्री ने हमारी प्रताड़ना की। ये सभी चीज़ें हमने सरकार और संगठन के सामने रखी, परन्तु फिर भी सरकार का मुखिया और संगठन का मुखिया मूकदर्शक बन कर देखते रहे। मेरे इस्तीफे की टाइमिंग प्लैन्ड नहीं थी, जब स्थिति बर्दाश्त के बाहर हो गई तो हमें इस्तीफ़ा देना पड़ा। सवाल : आपको पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल का करीबी माना जाता है, आपके अलावा एक अन्य कार्यसमिति के सदस्य ने भी इस्तीफ़ा दिया है। भाजपा में ये इस्तीफ़ा पॉलिटिक्स क्या किसी पोलिटिकल स्ट्रेटेजी के तहत शुरू हुई है ? जवाब : देखिये मैंने धूमल जी के साथ भी काम किया है और शांता जी के साथ भी। मैंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत जगत प्रकाश नड्डा जी के साथ की है और केंद्र में मैंने नरेंद्र मोदी जी के साथ भी काम किया है। मैं काम करने वाला कार्यकर्ता हूँ, मैं सभी का करीबी हूँ किसी एक का नहीं। ये इस्तीफ़ा मेरा व्यक्तिगत इस्तीफ़ा है, इससे किसी और का कोई भी लेना देना नहीं है। भ्रष्टाचारियों को पनाह दे रही अफसरशाही : पवन गुप्ता सवाल - आपने हाल ही में पद से इस्तीफा दिया, क्या कारण रहे? जवाब - मैं चालीस सालों से भारतीय जनता पार्टी का सच्चा सिपाही रहा हूँ। पार्टी की नींव मजबूत करने के लिए मैंने जितना हो सकता था उतना प्रयास किया। मैं नगर परिषद सोलन में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर भी रह चुका हूँ और इसके अलावा 15 साल तक बघाट अर्बन कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन पद पर भी रह चुका हूँ। मैं भाजपा कार्यकारी समिति का सदस्य व जिला सिरमौर का प्रभारी भी था। किन्तु बीते छह माह से यह महसूस हो रहा था कि जो अफसरशाही है वो सरकार पर हावी हो गयी है। मैं पुनः ध्यान में लाना चाहता हूँ कि हमने कुछ भ्रष्टचारियों के चेहरे बेनकाब करने के लिए जाँच करवा के जाँच रिपोर्ट सबमिट कर दी और उनको ससपेंड भी कर दिया था, लेकिन तीन दिन के अंदर उन्हें किसी वजह से रिवॉक किया गया। खैर, हम इस मामले को हाई कोर्ट ले गए, हाई कोर्ट में मामला लंबित है और यह छठीं मर्तबा है जब हमें कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। यदि सरकार मदद करती तो आज हमे कोर्ट जाने की नौबत नहीं आती। इसके अलावा मैं बताना चाहूंगा कि सीएमओ ऑफिस में भी एक उच्च अधिकारी है जिसने दोषियों को बचाने का पूरा प्रयास किया है। मुझे दुखी मन से यह कहना पड़ रहा है कि जिस मामले को हमने सरकार व संगठन के सामने उजागर किया हमे वहाँ से भी कोई सहयोग नहीं मिला। अफसरशाही हावी हुई और मेरा बैंक चुनाव के नामकंन को भी रद्द कर दिया गया। मुझे हर सम्भव नीचा दिखाने का प्रयास किया जा रहा था। यही कारण है कि इस प्रताड़ना को मैं सहन नहीं कर पाया और अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। सवाल- क्या आपके कहने का यह तात्पर्य है कि सरकार दोषियों को पनाह दे रही है ? जवाब - दोषियों को अफसरशाही पनाह दे रही है। बस यह बात सही है कि संगठन व सरकार को हर बात मालूम है, इसके बाद भी आज कोई कार्यवाही सही तरीके से अमल में नहीं लायी गयी। इतनी बार बैंक से जुड़े इस मामले को उठाने के बाद भी कोई सहायता नहीं की गयी और दोषी व अफसरशाही अपने गलत मंसूबे पर कामयाब हुए। लेकिन मामला हाई कोर्ट में है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि बैंक के हित में ही फैंसला आएगा। सवाल- आप अफसरशाहों पर आरोप लगा रहें है। क्या आपको लगता है कि सरकार की अफसरों पर पकड़ नहीं है ? जवाब - मैं आज खुद को बहुत असहाय महसूस कर रहा हूँ। जब करप्शन बढ़ता है तो उसके जड़ें भी कई जगह तक जाती है और उसके सामने जो लोग ईमानदार होते है वो बोने हो जाते है, मैं इतना ही कहना चाहूंगा। सवाल - आप डॉ राजीव बिंदल को अपना गुरु मानते है, इस्तीफे से पहले क्या आपने उनसे मशवरा लिया था ? जवाब- डॉ बिंदल मेरे सहपाठी है और मेरे गुरु भी। डॉ बिंदल हर छोटे बड़े कार्यकर्ता से सीधा संवाद करते है। वो कद्दावर नेता है और वो प्रदेश स्तर के नेता है। मुझे लगता है कि मुझ जैसे छोटे से कार्यकर्ता को अपनी हर छोटी बड़ी बात उनसे साँझा करना पड़े, यह शोभा नहीं देता और यह जो इस्तीफे का कारण है यह मेरे दिल को लगी ठेस का नतीजा है। इसलिए इस मामले में मैंने अपनी गरिमा की लड़ाई खुद लड़ना उचित समझा। मुझे पद की लालसा नहीं है, मैं भाजपा का सच्चा सिपाही हूँ और पार्टी को मजबूत करने के लिए हमेशा आगे रहूँगा।
किन्नौर के विधायक जगत सिंह नेगी ने जयराम सरकार पर आरोप लगाए है। जगत सिंह नेगी का कहना है कि जयराम सरकार द्वारा पिछले चार सालों में प्रदेश में ऐसा कोई भी कार्य नहीं किया गया है जिससे कि प्रदेश के लोग इस सरकार को याद करे। जगत सिंह नेगी का कहना है कि इससे पहले जो भी प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं उनको लोग कुछ अच्छे कार्यों के लिए याद करते हैं और ये एक ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने प्रदेश के साथ साथ जनजातीय क्षेत्र के विकास के लिए कुछ भी कार्य नहीं किया है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का नाम काले अक्षरों में लिखा जाएगा, उन्होंने जब भी किन्नौर जिले का दौरा किया तो वो हेलीकाॅप्टर से किया। ऐसे में उन्हें हेलीकाॅप्टर वाले मुख्यमंत्री के नाम से जाना जाएगा। ये भी एक रिकॉर्ड रहेगा कि ये पहले एक ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो सड़क के रास्ते से जनजातीय क्षेत्रों में नहीं आए हैं। ऐसे मुख्यमंत्री जनजातीय क्षेत्रों का क्या विकास करेंगे जिनके पास जनजातीय क्षेत्र के लोगों के लिए समय ही नहीं है।
मंडी लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर लगातार प्रचार में जुटे हुए थे। अब उपचुनाव में मिली हार की जिम्मेदारी भी मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने अपने सिर ले ली है। सीएम का कहना है कि मंडी उपचुनाव में जीत-हार का अब तक का सबसे कम एक प्रतिशत का अंतर रहा है। ज्यादा दुख इस बात का है कि मंजिल तक पहुंचकर हार हो गई। विकास के जो काम बड़े स्तर पर मंडी संसदीय क्षेत्र के हर विधानसभा क्षेत्र में किए गए थे, उस पर ज्यादा फोकस नहीं हो पाया। मंडी हमारी है हमारी रहेगी को लेकर उनका मत पूरे संसदीय क्षेत्र से था, इसका कांग्रेस ने गलत प्रचार किया। सीएम का कहना है कि मंडी चुनाव सहानुभूति के कारण हारा है। कांग्रेस ने श्रद्धांजलि के नाम पर वोट मांगे, मगर हर बार श्रद्धांजलि का कार्ड नहीं चलेगा। साथ ही मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का कहना है कि सराज में अपेक्षा से कम वोट मिले हैं। नोटा, कम वोटिंग और वामपंथियों का 25 हजार वोट एक मुश्त कांग्रेस को चला जाना भी बड़ा कारण बना। महंगाई भी बड़ा कारण रहा। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का कहना है कि यह परिणाम किसी भी सूरत में विधानसभा चुनाव 2022 को प्रभावित नहीं करेगा। आगामी 2022 को लेकर अभी हमारे पास समय है और निश्चित तौर पर 2022 में हम सरकार बनाने के उस आंकड़े को फिर से पार करेंगे।
उपचुनाव में मिली हार के बाद भाजपाई भी बिखरे हुए नजर आ रहे है और उनके बयान भी। कुछ अपनी हार का कारण अतिआत्मविश्वास बता रहे है तो कुछ इस विषय पर बात ही नहीं करना चाहते। भाजपा की हार का असल कारण क्या रहा, इस पर न तो अभी मंथन पूरा हुआ है और न ही खुलकर सियासी दोषारोपण का सिलसिला आरंभ हुआ है। ऐसे में चुप्पी ही बेहतर है। पर फिर भी बड़े नेताओं द्वारा हार का कारण कभी महंगाई तो कभी सहानुभूति लहर, तो कभी अतिआत्मविश्वास बताया जा रहा है। पर हैरत ये है कि जिस कमजोर संगठन, अंतर्कलह और भीतरघात पर खुलकर बात होनी चाहिए, वो नदारद है। सिर्फ रमेश ध्वाला एकलौते ऐसे नेता है जिन्होंने तालमेल की कमी का मसला उठाया है, बाकी दिग्गज अभी मौन ही है। बीते दिनों जयराम कैबिनेट के मंत्री राकेश पठानिया ने अतिआत्मविश्वास को हार का कारण बताया। ब्यान बाहर आया तो चर्चाएं भी शुरू हो गई। मंत्री के ' अति आत्मविश्वास के कारण मिली हार' वाले ब्यान को प्रदेश प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने कवर अप करने की कोशिश की। खन्ना के मुताबिक ये मंत्री के व्यक्तिगत विचार है, इनसे पार्टी का कुछ भी लेना देना नहीं है। पर बात निकली है, तो चर्चा तो होगी ही। क्या सच में भाजपा की हार का कारण अतिआत्मविश्वास रहा है, ये विश्लेषण का विषय है। उपचुनाव में जमीनी हकीकत की बात करें तो भाजपा के अतिआत्मविश्वास को तो छोड़िये, पार्टी में विश्वास में भी नज़र नहीं आ रहा था। मंडी को छोड़ कर हर उपचुनाव क्षेत्र में भाजपा अंतर्कलह और भीतरघात से बचती बचती नज़र आई। इन तीनों उपचुनाव क्षेत्रों में कांग्रेस शुरुआत से लेकर ही आत्मविश्वास से भरपूर नज़र आ रही थी, मगर ऐसा भाजपा में नहीं था। मंडी संसदीय क्षेत्र में भी भाजपाई मुख्यमंत्री से उम्मीदें लगाए बैठे थे और निसंदेह निजी तौर पर मुख्यमंत्री उम्मीदों पर खरे भी उतरे। पर अन्य मंत्री कुछ खास नहीं कर पाए जो असल में हार का बड़ा कारण है। अन्य तीन उपचुनाव क्षेत्रों की बात करें तो जुब्बल कोटखाई में तो भाजपा की जद्दोजहद जमानत बचाने से आगे दिख ही नहीं रही थी। फतेहपुर में भी कृपाल परमार का टिकट काटने के बाद पार्टी सहज दिखी ही नहीं। अर्की में भी अंतर्कलह हावी थी और कार्यकर्ता बंटा हुआ। उपचुनाव में हार के बाद भाजपा के संगठन और सरकार के मंत्रिमंडल में बदलाव के कयास लग रहे है। भाजपा पार्टी विद डिसिप्लिन है, और प्रदेश में जो भी हाल हो मगर राष्ट्रीय स्तर पर इस हार को अनदेखा नहीं किया जाने वाला। नॉन परफार्मिंग नेता बाहर जाएंगे, ऐसा माना जा रहा है। जिन नेताओं को ज़िम्मेदारी दी गई थी उनसे सवाल तो पूछे ही जायेंगे, जवाबदेही भी तय होगी और निश्चित तौर पर आवश्यक सुधार भी होगा।
केंद्र में सत्तासीन नरेंद्र मोदी सरकार किसान आंदोलन के सामने आखिर झुक गई और सरकार ने तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया है। इसके साथ ही संभावना प्रबल है कि पंजाब की सियासत में एक नया ट्विस्ट देखने को मिले। तमाम नजरें पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह पर टिकी है। सब ये ही जानना चाहते है कि कैप्टेन का अगला कदम क्या होगा। नई पार्टी बनाने का ऐलान कर चुके कैप्टेन क्या भाजपा के साथ गठबंधन करेंगे या नई पार्टी का इरादा छोड़कर भाजपा में ही शामिल हो जायेंगे। दरअसल इसमें कोई संशय नहीं है कि इस वक्त पंजाब में जितनी जरूरत भाजपा को कैप्टेन की है उतनी ही जरुरत कैप्टेन को भी भाजपा की दिख रही है। कैप्टेन के आने से बड़ा फायदा यह होगा कि भाजपा को पंजाब में एक बड़ा चेहरा मिलेगा। अमरिंदर सिंह प्रदेश के कद्दावर नेता माने जाते हैं। निसंदेह उन्हें कमजोर आंकना विरोधियों के लिए भूल हो सकती है। ये भी तय है कि कांग्रेस को कमजोर करने के लिए अमरिंदर सिंह अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। ऐसे में यदि वे भाजपा के हो लिए तो उनकी ताकत भी बढ़ेगी। कैप्टन और भाजपा के साथ आने से भाजपा को पंजाब में अपने पांव मजबूत करने मे मदद मिलेगी,पंजाब में पार्टी को एक बूस्ट मिलेगा। कैप्टन भाजपा की राष्ट्रवादी छवि की मापदंड पर भी एकदम फिट बैठते हैं और दोनों का साथ पंजाब की सियासत को एक दिलचस्प मोड़ दे सकता है। फिर साथ आयेंगे या दूरियां बरकरार रहेंगी पंजाब की सियासत में भाजपा की बात करे तो यहाँ अकेले दम पर कभी पार्टी ने कोई कमाल किया ही नहीं। 2017 के विधानसभा चुनाव तक भाजपा पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ चुनाव लड़ती रही। साल 2017 के विधानसभा चुनावों और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में भी अकाली दल के खराब प्रदर्शन के बावजूद भाजपा ने उससे रिश्ता नहीं तोड़ा। पर कृषि कानूनों के विरोध में अकाली नेता और सुखविंदर सिंह की पत्नी हरसिमरत कौर ने मोदी सरकार से इस्तीफा दे दिया और समर्थन वापस ले लिया तो फिर दोनों के रास्ते अलग हो गए। अब ये देखना भी दिलचस्प होगा कि क्या कृषि कानून वापस लेने के बाद शिरोमणि अकाली दल और भाजपा फिर एक साथ आयेंगे या दूरियां बरकरार रहेंगी। पंजाब में मजबूर दिख रही थी भाजपा 2017 के विधानसभा चुनाव में जहां अकाली दल ने 15 सीटें जीती थीं वहीं भाजपा को केवल तीन सीटें मिली थीं। वहीं कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में चुनाव लड़ने पर कांग्रेस ने 117 में से 77 सीटें जीती थीं। जबकि आम आदमी पार्टी ने 19 सीटें जीती थीं। 2017 के चुनाव में भाजपा रेस में कहीं नहीं थी, और कृषि क़ानून वापस लेने के फ़ैसले के बाद भी बीजेपी को वहां कोई ख़ास बदलाव की उम्मीद नहीं कर रही होगी। पर अब बीजेपी नेताओं के लिए पंजाब में प्रचार करना ज़रूर आसान हो जाएगा, साथ ही पुराने गठबंधन अकाली दल सहित कुछ नए राजनीतिक साथी जैसे पंजाब पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी यदि भाजपा में शामिल होते है तो पार्टी कम से कम अपना जनाधार तो बढ़ा ही सकती है। वही यदि भाजपा कृषि कानून वापस नहीं लेती तो ये तय दिख रहा था कि किसानो की नाराज़गी के चलते उनके नेता शायद प्रचार तक नहीं कर पाते। ऐसे में कृषि कानून वापस लेना भाजपा की मजबूरी था। छोटे से कार्यकाल में ही पॉपुलर हो गए चन्नी बेशक कृषि कानून वापस लेने के बाद भाजपा पंजाब में नई राहें तलाश रही हो या इस उम्मीद में हो कि कैप्टेन का साथ और शिरोमणि अकाली दल के साथ संभावित गठजोड़ पार्टी के लिए टर्निंग पॉइंट होगा, लेकिन व्यापक तौर पर ऐसा लगता नहीं है। भाजपा कोई भी गठबंधन करके वहां सत्ता पर काबिज हो सकती है इसकी सम्भावना कम ही है। फिलवक्त पंजाब में मुख्य लड़ाई कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच दिख रही है। कैप्टेन के रिप्लेसमेंट के तौर पर कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी के तौर पर प्रदेश को पहला दलित मुख्यमंत्री दिया है और ऐसे में पंजाब का करीब 32 प्रतिशत दलित वोट कांग्रेस के लिए बड़ी आस है। साथ ही जिस तरह से बहुत छोटे से कार्यकाल में चन्नी ने अपनी छाप छोड़ी है वो भी कांग्रेस के पक्ष में है। आम आदमी से लेकर कर्मचारी तक, हर वर्ग के लिए चन्नी लगातार घोषणाएं करते जा रहे है। आम आदमी से उनका सीधा जुड़ाव इसी बात से समझा जा सकता है कि अभी से चन्नी कई सर्वेक्षणों में सीएम के तौर पर लोगों की पहली पसंद दिख रहे है।
कुल्लू : मलाणा में अग्नि पीड़ितों से मिलने के बाद क्या बोले मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, सुनिए
चार उपचुनाव में शानदार जीत के बाद कांग्रेस में जश्न का माहौल है और पार्टी में नई ऊर्जा का संचार हुआ है। जिस अदद जीत के टॉनिक की पार्टी को जरुरत थी वो आखिरकार मिल गया। इस जीत में कई नेताओं की बड़ी भूमिका रही है और सभी उक्त नेताओं के निष्ठावान भी अपने-अपने चहेते नेताओं को जीत का श्रेय दे रहे है। पर कांग्रेस में एक कद्दावर नेता ऐसे भी है जो चुपचाप उपचुनाव में अपना काम करते रहे और जीत के बाद भी क्रेडिट लेने के लिए ज्यादा हाथ पाँव नहीं मारते दिखे। ये नेता है सोलन विधायक डॉ कर्नल धनीराम शांडिल। शांडिल अर्की उपचुनाव के लिए प्रभारी थे और पार्टी के स्टार प्रचारक भी। उपचुनाव में संजय अवस्थी को टिकट देने के बाद अर्की में खुलकर बगावत हुई, ब्लॉक कांग्रेस के कई पदाधिकारियों ने इस्तीफा दिया और भाजपा ने पूरी ताकत लगाईं, बावजूद इसके कांग्रेस को शानदार जीत मिली। इस जीत में शांडिल की भी बड़ी भूमिका है। जब राजेंद्र ठाकुर ने खुलकर संजय अवस्थी के खिलाफ मोर्चा संभाला तो शांडिल वो नेता है जो राजेंद्र ठाकुर को मनाने कुनिहार पहुंच गए। हालांकि ठाकुर माने नहीं लेकिन शांडिल ने पूरा प्रयास किया और मतदान के दिन तक ठाकुर के समर्थकों को भी साधने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सोलन निर्वाचन क्षेत्र के साथ लगते अर्की के कई ग्रामीण क्षेत्रों में भी शांडिल अच्छा प्रभाव रखते है और उक्त क्षेत्रों में भी इसका लाभ अवस्थी को मिला। प्रचार के बीच भाजपा के पूर्व विधायक गोविंद राम शर्मा के साथ शिमला में कर्नल शांडिल की मुलाकात को लेकर भी खूब चर्चे हुए। कर्नल धनीराम शांडिल जुब्बल कोटखाई उपचुनाव में भी पार्टी के लिए निरंतर प्रचार करते दिखे। अपनी चिर परिचित शैली में कर्नल ने यहाँ मुद्दों की बात की और निसंदेह पार्टी को इसका लाभ भी मिला। कर्नल की खूबी ये है कि वे न तो हवा हवाई वादे करते है और न बिना तर्क के कोई मुद्दा उठाते है। अलबत्ता वे बहुत अच्छे वक्ता नहीं है लेकिन बदलते दौर की सियासत और जागरूक होते मतदाताओं के बीच शांडिल अच्छा प्रभाव छोड़ते है। मंडी संसदीय सीट के उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी प्रतिभा सिंह का कारगिल युद्ध को लेकर दिया गया एक बयान पार्टी की मुश्किलें बढ़ता दिख रहा था। हालांकि उन्होंने इस पर अपना स्पष्टीकरण दे दिया था, फिर भी विशेषकर सैनिक वोट पार्टी से नाराज़ न हो ये बड़ी चिंता थी। ऐसे में पार्टी के थिंक टैंक को याद आये कर्नल शांडिल। कर्नल ने प्रतिभा सिंह के समर्थन में कई जनसभाएं की और राजनीति में सेना के नाम के इस्तेमाल पर भाजपा पर जबरदस्त अटैक किया। कर्नल ने 1965 और 1971 के युद्ध में मिली जीत भी याद दिलाई और ये भी याद दिलाया कि कांग्रेस ने कभी इसके नाम पर वोट नहीं मांगे। वो बेदाग नाम जिसपर विरोधी भी कीचड़ नहीं उछाल पाएं डॉ कर्नल धनीराम शांडिल हिमाचल की सियासत का वो बेदाग़ नाम है जिस पर विरोधी भी कभी कीचड़ नहीं उछाल पाएं। वीरभद्र सरकार के खिलाफ वर्ष 2016 में भाजपा एक चार्जशीट लाई जिसमे कांग्रेस के मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप थे। तब भाजपा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह, बेटे विक्रमादित्य सिंह, प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू, 10 मंत्रियों, 6 सीपीएस और 10 बोर्ड-निगम-बैंकों के अध्यक्ष-उपाध्यक्षों समेत कुल 40 नेताओं और एक अफसर पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे। पर उस चार्जशीट में भी कर्नल धनीराम शांडिल का नाम नहीं था। यानी विपक्ष भी कभी उनकी ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा पाया। एक बात और कर्नल शांडिल की खूबी है, वो है उनकी गुटबाजी से दुरी। प्रदेश कांग्रेस में कई धड़े है, पर शांडिल किसी भी गुट में शामिल नहीं है।
जुब्बल-कोटखाई सीट पर कांग्रेस ने फिर परचम लहराया और एक बार फिर रोहित ठाकुर का दमखम दिखा। रोहित ठाकुर 6293 मतों से विजयी हुए हैं। मुकाबला निर्दलीय प्रत्याशी और भाजपा के बागी चेतन बरागटा के साथ था। चेतन के साथ सहानुभूति भी थी और उनका चुनाव प्रबंधन भी शानदार था लेकिन रोहित की क्षेत्र में लगतार सक्रियता और जमीनी पकड़ के तिलिस्म को चेतन भेद नहीं पाएं। जानकार मान कर चल रहे थे कि जीत हार का अंतर नजदीकी होगा लेकिन 6293 वोट का अंतर रोहित का असल दम बताता है। उपचुनाव में जहाँ भाजपा और चेतन एक दूसरे पर आरोप -प्रत्यारोप लगाने में उलझे रहे वहीं रोहित ख़ामोशी के साथ जनसम्पर्क में जुटे रहे। भाजपा की कोशिश शुरू से जमानत बचाने से ज्यादा नहीं दिखी तो चेतन का फोकस भी कुछ हद तक भाजपा को काउंटर करने का रहा। दोनों की लड़ाई ने रोहित की राह आसान कर दी। 2017 के विधानसभा चुनाव में रोहित ठाकुर नजदीकी मुकाबले में हार गए थे। तब मुकाबला खुद नरेंद्र बरागटा से था, भाजपा भी एकजुट थी और कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर भी थी। सो नतीजा रोहित के विरुद्ध में गया। पर उपचुनाव में बंटे हुए प्रतिद्वंदी रोहित के आगे नहीं टिके। 2003 में पहला विधानसभा चुनाव लड़ने वाले रोहित का ये पांचवा चुनाव था और तीसरी बार उन्हें जीत मिली। अपने पहले चुनाव से अब तक जनता ने उन्हें चाहे विधानसभा भेजा हो या नहीं, रोहित ठाकुर हमेशा क्षेत्र में सक्रिय रहे है। इसी सक्रियता और मजबूत पकड़ का इनाम उन्हें मिला है। 2022 में यदि कांग्रेस की सत्ता वापसी होती है और रोहित फिर जीत दर्ज करने में कामयाब रहे तो ये तय है कि उन्हें सरकार में कोई महत्वपूर्ण भूमिका मिलेगी। पर अगले विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने में एक वर्ष से भी कम वक्त है और उम्मीदें ज्यादा, सो रोहित को डे वन से मैदान में डटना होगा। इस उपचुनाव में बेशक रोहित ठाकुर ने शानदार जीत दर्ज की है लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार चेतन बरागटा हारने के बावजूद सबका दिल जरूर जीत गए। जुब्बल-कोटखाई में कुल 56,612 मत पड़े जिनमें से कांग्रेस प्रत्याशी रोहित ठाकुर ने 29,955 मत हासिल किए और चेतन बरागटा को 23662 मत पड़े। पर यक़ीनन तौर पर 20 दिन में जिस तरह से चेतन ने चुनाव लड़ा वो हैरान करने वाला है, विशेषकर उनका चुनाव प्रबंधन। बाकायदा वॉर रूम बनाया गया, कार्यकर्ताओं की पूरी ब्रिगेड तैयार की गई, जिम्मेदारियों का निर्धारण हुआ और रैलियों व चुनाव आयोजनों के लिए बेहतर क्राउड मैनेजमेंट भी दिखा। चेतन को बतौर निर्दलीय प्रत्याशी जितने मत प्राप्त हुए वो आज से पहले किसी भी निर्दलीय प्रत्याशी को नहीं मिले। चेतन अभी से 2022 के लिए ऐलान कर चुके है और जिस सहजता के साथ उन्होंने अपनी हार स्वीकार की है वो भी तारीफ के काबिल है। अलबत्ता चेतन के लिए चुनावी राजनीति की शुरुआत हार के साथ हुई हो लेकिन इतना तय है कि चेतन अब थमने वाले नहीं है।
जुब्बल कोटखाई उपचुनाव में जो हुआ वो भाजपा को अर्से तक याद रहेगा। ऐसी करारी हार भुलाई भी नहीं जा सकती। सत्तासीन भाजपा के लिए भी ये हार झटका भी है और सबक भी। इससे बुरी स्थिति क्या होगी कि भाजपा उपचुनाव में अपनी जमानत तक नहीं बचा पाई है। भाजपा प्रत्याशी के मतों का आंकड़ा 2644 में सीमट कर रह गया जो किसी राष्ट्रीय पार्टी के उम्मीदवार की ओर से लिए गए अब तक सबसे कम मतों का रिकॉर्ड है। जिस सीट पर भाजपा का कब्जा था वहां भाजपा की इतनी बुरी हालत होगी ये तो उन नेताओं ने भी नहीं सोचा होगा जिनकी मनमानी ने पार्टी की लुटिया डुबाई। दरअसल उपचुनाव में भाजपा टिकट आवंटन के बाद से ही अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी झेल रही थी। टिकट आवंटन के बाद मानों जुब्बल कोटखाई में भाजपा का पूरा संगठन ही ध्वस्त हो गया। जब अपना कार्यकर्ता ही साथ नहीं था तो नतीजा कैसे अनुकूल आता ? खुद मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री सुरेश भारद्वाज ने पूरा दमखम लगाया लेकिन इन कार्यक्रमों में जनता तो दूर की बात पार्टी कार्यकर्ता तक नहीं पहुंच रहे थे। कैबिनेट मंत्री अनुराग ठाकुर के कार्यक्रम के लिए भी आसपास के क्षेत्रों से लोग पहुंचे लेकिन स्थानीय लोग वहां भी नहीं दिखे। पार्टी की स्थिति का अंदाजा इसी से लगा लीजिये कि टिकट आवंटन से प्रचार बंद होने तक भाजपा में निष्कासन का दौर ही चलता रहा। अंत तक पार्टी अपने ही कार्यकर्ताओं को निष्कासित करती रही। जिला शिमला के एकमात्र मंत्री सुरेश भारद्वाज को भाजपा ने जुब्बल-कोटखाई क्षेत्र में चुनाव प्रभारी बनाया था। चुनाव प्रचार की पूरी कमान सुरेश भारद्वाज के हाथों में रही। पर भारद्वाज पूरी तरह बेअसर रहे। चेतन का टिकट काटने के बाद कार्यकर्ताओं में खूब रोष था और चेतन के समर्थक तो इसका जिम्मेदार मंत्री को ही बताते रहे। हालांकि भाजपा में टिकट का निर्णय पार्टी आलाकमान करता है और चेतन का टिकट काटने का तर्क परिवारवाद पर लगाम लगाना बताया गया पर समर्थक ऐसा नहीं मानते। दरअसल अतीत में स्व नरेंद्र बरागटा और सुरेश भारद्वाज के बीच का मतभेद कई मौकों पर सामने आता रहा, जिसके चलते बरागटा परिवार के समर्थकों की धारणा है कि चेतन के टिकट की राह भारद्वाज ने ही मुश्किल की। कारण जो भी हो लेकिन उपचुनाव में भाजपा की खूब किरकिरी हुई। करारी हार, उम्मीद से बदतर रहा प्रदर्शन जुब्बल कोटखाई उपचुनाव में भाजपा मात्र 2644 मतों में सीमट कर रह गई। जबकि भाजपा को जमानत बचाने के लिए करीब 9414 मत चाहिए थे। भाजपा प्रत्याशी नीलम जमानत बचाने के लिए आवश्यक मतों के एक तिहाई वोट भी नहीं ले सकीं। हालांकि ऐसा नहीं है कि नीलम की जमीनी पकड़ नहीं है या निजी तौर पर उन्हें लेकर लोगों में कोई रोष हो लेकिन भाजपा की खराब रणनीति ने उनकी भी फजीहत करवाई। माना जा रहा था कि नीलम की जमानत बचना मुश्किल होगा लेकिन इतनी बुरी स्थिति तो विश्लेषकों ने भी नहीं सोची होगी। जब अनुराग स्वीकार है तो चेतन क्यों नहीं ? परिवारवाद के जिस अजब तर्क के नाम पर भाजपा ने चेतन का टिकट काटा वो न जनता को हजम हुआ और न भाजपा कार्यकर्ताओं को। जो व्यक्ति करीब डेढ़ दशक से पार्टी में सक्रिय हो, लम्बे वक्त से पार्टी के प्रदेश आईटी सेल का प्रमुख हो, परिवारवाद के नाम पर उसका टिकट काटे जाना समझ से परे है। चेतन पैराशूटी नेता नहीं है जो अपने पिता के निधन के बाद टिकट लेने आ गए, वो निरंतर पार्टी में सक्रिय थे। एक आम कार्यकर्त्ता की तरह ही अपने कई वर्ष पार्टी को दे चुके है। अगर उनके टिकट की राह में परिवारवाद रोड़ा था तो पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के पुत्र अनुराग ठाकुर भी तो वर्तमान में केंद्रीय मंत्री है। समर्थक तो उन्हें भावी मुख्यमंत्री तक मानते है। जब अनुराग स्वीकार है तो चेतन क्यों नहीं ? अब ठेके कौन देगा माना जा रहा है कि भाजपा की स्थिति बदतर करने में बड़े नेताओं के बयानों ने भी खासी भूमिका अदा की है। जुब्बल कोटखाई में प्रचार के दौरान मंत्री सुरेश भारद्वाज का एक बयान भी खूब चर्चा में रहा। भारद्वाज का ठेकेदारों को लेकर दिया विवादित बयान सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। एक जनसभा में भारद्वाज इस वीडियो में कहते नजर आये कि यहां विकास के हर काम और ठेके भाजपा प्रत्याशी नीलम सरैईक और भाजपा सरकार के माध्यम से ही मिलेंगे। बहुत से ठेकेदार सोचते हैं कि वे उधर से आ जाएंगे और उनका चलता रहेगा। वैसे ठेके नहीं मिलेंगे।
फतेहपुर उपचुनाव में हार के साथ ही मंत्री बिक्रम ठाकुर के चुनाव प्रबंधन की पोल फिर खुल गई। एक बार फिर मंत्री बिक्रम सिंह ठाकुर चुनावी इम्तिहान में फेल हो गए। अभी तो पालमपुर नगर निगम में हार की टीस भी कम नहीं हुई थी और फतेहपुर ने फिर बड़ा झटका दे दिया। बढ़ती महंगाई, भीतरघात और जमीनी स्तर पर कार्यकर्तओं की नाराजगी के बीच बलदेव ठाकुर की नैय्या पार लगाने के लिए मैदान में डटे प्रभारी बिक्रम ठाकुर के लिए ये उपचुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। फिर भी उम्मीद थी कि मंत्री जी के प्रबंधन का कमाल यहाँ दिखेगा, पर ऐसा हुआ नहीं। रणनीतिक तौर पर भी भाजपा पुरे चुनाव में पिछड़ी दिखी। बड़े नेताओं के आयोजनों से आम जन की दुरी और नाराज दिख रहे कार्यकर्ता पहले ही हार के संकेत दे रहे थे, और हुआ भी ऐसा ही। जयराम सरकार में बिक्रम ठाकुर वो चेहरा है जिनका कद और पद लगातार बढ़ा है। 2019 में जयराम कैबिनेट के कुछ मंत्रियों का डिमोशन हुआ,पर बिक्रम ठाकुर को उद्योग मंत्रालय के साथ- साथ परिवहन जैसा अहम महकमा भी दे दिया गया। फिर उन्हें पालमपुर नगर निगम चुनाव की ज़िम्मेदारी सौंपी गई जिसमें भाजपा बुरी तरह परास्त हुई। इस हार के बाद अब फतहपुर उपचुनाव की ज़िम्मेदारी भी बिक्रम सिंह ठाकुर को दी गई थी जहाँ वे फिर नाकामयाब रहे है। कांगड़ा जैसे बेहद महत्वपूर्ण ज़िले में मिली इन दो हारों की कसक जरूर भाजपाई खेमे में होगी। जाहिर है फतेहपुर के बाद अब पार्टी आलाकमान भी विस्तृत विश्लेषण करेगा। ऐस में ये मंत्री बिक्रम सिंह के सियासी बहीखाते में जुड़ी एक और हार उनके लिए परेशानी का कारण है। वन मंत्री राकेश पठानिया फतेहपुर उपचुनाव में सह प्रभारी थे। कभी कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर के खिलाफ बयान को लेकर तो कभी सभी को मास्क पहनने वाले डंगर बताकर पठानिया लगातार चर्चा में रहे और अब हार को लेकर चर्चा में है। नूरपुर के साथ लगते क्षेत्रों में उनके प्रभाव से भाजपा को बड़ी आस थी पर वे भी बलदेव को जीत नहीं दिला सके। यहाँ जीत मिलती तो निसंदेह पठानिया का असर भी बढ़ता, पर ये हार कई सवाल छोड़ गई। एक सवाल ये भी है कि क्या भाजपा के बड़े चेहरे अति आत्मविश्वास से ग्रस्त है ? कांग्रेस के बनिस्पत फीका जमीनी प्रचार फतेहपुर में कांग्रेस ने पूर्व विधायक स्व सुजान सिंह पठानिया के पुत्र भवानी पठानिया को टिकट दिया था। भाजपा के हाथ में परिवारवाद एक बड़ा मुद्दा था लेकिन खुद से ही झूझती दिखी पार्टी आक्रामक तरीके से मतदातों के बीच इस मुद्दे को लेकर नहीं पहुंची। किसी तरह रैलियों में क्राउड मैनेजमेंट कर पार्टी जीत की उम्मीद में थी लेकिन जमीनी स्तर पर पार्टी प्रचार कांग्रेस के बनिस्पत फीका ही दिखा। कांग्रेस के कई नेता भवानी के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे, बावजूद इसके भाजपा इस स्थिति का लाभ उठाने में कामयाब नहीं रही। कांगड़ा के मतदाता नामों का लिहाज नहीं करते 2017 के विधानसभा चुनाव में वीरभद्र सरकार के बड़े बड़े चेहरे कांगड़ा में धराशाई हुए थे। इनमें सुधीर शर्मा और स्व. जीएस बाली भी थे। कांगड़ा के मतदाताओं ने कभी बड़े नामों का लिहाज नहीं किया है। जिस कांगड़ा में कभी खुद मुख्यमंत्री रहते हुए शांता कुमार चुनाव हार सकते है वहां भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेताओं का अति आत्मविश्वास समझ से परे है। फिलहाल कांगड़ा से बिक्रम सिंह ठाकुर, राकेश पठानिया और सरवीण चौधरी मंत्री है जबकि विपिन सिंह परमार विधानसभा अध्यक्ष है। बावजूद इसके पहले नगर निगम चुनाव में भाजपा को झटका लगा और अब फतेहपुर उपचुनाव में भी। वर्ष 2017 में इसी कांगड़ा ने भाजपा पर भरपूर प्यार बरसाया था, अगर कांगड़ा की हवा बदली तो 2022 में भाजपा की राह वहां मुश्किल होगी।
रतन सिंह पाल के साथ-साथ अर्की निर्वाचन क्षेत्र में वरिष्ठ भाजपा नेता डॉ राजीव बिंदल की साख भी दांव पर लगी थी। दरअसल बिंदल अर्की में भाजपा के प्रभारी थे, पर अर्की में बिंदल का जादू नहीं चला। संगठनात्मक कार्यक्रमों में भी पार्टी की कमजोरी खुलकर सामने आई। जिस 'बिंदल मैनेजमेंट' का राग उनके समर्थक गाते थे वो फिर एक बार फ्लॉप सिद्ध हुआ। इससे पहले बिंदल सोलन नगर निगम चुनाव में भी बिंदल प्रभारी थे पर नतीजा पार्टी के पक्ष में नहीं रहा था। सोलन बिंदल का गृह क्षेत्र था बावजूद इसके तब न सिर्फ भाजपा हारी बल्कि बिंदल के कई करीबियों को भी जनता ने नकार दिया। अब अर्की में भी बिंदल बेअसर रहे। अर्की में चुनाव प्रचार के दौरान हुए कार्यक्रमों में प्रबंधन की खामियां लगातार उजागर हुई। नामांकन के दिन केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर अर्की पहुंचे थे। तब अनुराग के स्वागत के लिए काफी संख्या में उनके समर्थक और चाहवान विभिन्न क्षेत्रों से अर्की पहुंचे थे सो कार्यक्रम जैसे-तैसे ठीक ठाक हुआ। किन्तु अनुराग के दूसरे दौरे में भाजपा के चुनाव प्रबंधन की पोल खुल गई। उसी दिन देवभूमि क्षत्रिय संगठन की कुहिनार में रैली थी जिसमें काफी संख्या में लोग पहुंचे जबकि अनुराग के कार्यक्रम में तुलनात्मक तौर पर काफी कम लोग थे। यानी डॉ राजीव बिंदल की अगुवाई में भाजपा के चुनाव प्रबंधक केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के कार्यक्रमों में इतनी भीड़ भी नहीं जुटा पाए जितनी एक नए संगठन ने एकत्र कर ली। इसके बाद 25 अक्टूबर को मुख्यमंत्री के कुनिहार में आयोजित कार्यक्रम में उचित प्रबंध करना भाजपा के लिए नाक का सवाल था। पर हकीकत ये है कि चप्पे -चप्पे पर पोस्टर बैनर की भरमार होने के बावजूद पुरे प्रचार अभियान में भाजपा आम जनता से कनेक्ट करने में नाकामयाब रही। साथ ही पार्टी के आम कार्यकर्त्ता की बॉडी लैंग्वेज भी वैसी नहीं थी जिसके लिए भाजपा जानी जाती है। स्वास्थ्य घोटाले के बाद इस्तीफा, अब हाशिये पर ! डॉ राजीव बिंदल लम्बे वक्त से पार्टी के कद्दावर नेता रहे है। वर्ष 2000 में हुए सोलन उपचुनाव को जीतकर बिंदल पहली बार विधानसभा पहुंचे थे और इसके बाद 2003 और 2007 में भी सोलन निर्वाचन क्षेत्र से जीते। 2012 में जब सोलन सीट आरक्षित हो गई तो बिंदल ने नाहन का रुख किया और वहां जीतकर अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। 2017 में बिंदल दूसरी बार नाहन से जीते और एक वक्त पर प्रो धूमल के हारने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी माना जा रहा था। पर समय के फेर में मुख्यमंत्री की रेस में शामिल बिंदल मंत्री तक नहीं बने। उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया। जैसे तैसे 2019 के अंत में बिंदल प्रदेश अध्यक्ष बनने में कामयाब रहे लेकिन कोरोना काल में हुए स्वास्थ्य घोटाले की वजह से 2020 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। तब बिंदल ने इसे नैतिकता के आधार पर दिया गया इस्तीफा बताया था और बाद में उन्हें क्लीन चिट भी मिल गई। पर इसके बाद से बिंदल एक किस्म से हाशिए पर दिख रहे है, न उन्हें मंत्री पद मिल रहा है और न ही संगठन में कोई अहम् भूमिका। समर्थकों को आस, परिवर्तन हो तो शायद कुछ बेहतर हो ! डॉ राजीव बिंदल के समर्थक निरंतर इसी आस में है कि या तो बिंदल को कबिनेट में एंट्री मिल जाएं या फिर संगठन में कोई बड़ी भूमिका। पर ऐसा हो नहीं रहा। अब प्रदेश में हुए चार उपचुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त मिली है जिसके बाद सरकार संगठन में फेरबदल के कयास है। बिंदल समर्थक इसी उम्मीद में है कि इस बारे डॉ बिंदल को भी कहीं बेहतर स्थान मिलेगा पर ये नहीं भुलाया जा सकता कि सोलन नगर निगम चुनाव और अर्की उपचुनाव की हार भी बिंदल के खाते में है। जिला संगठन में बदलाव की दरकार अर्की में भाजपा के संगठन की बात करें तो यहाँ संगठन में बदलाव की दरकार है। अर्की मंडल के पदाधिकारी इस उपचुनाव में जमीनी स्तर पर प्रभाव छोड़ने में नाकामयाब रहे है। न सिर्फ अर्की बल्कि भाजपा के जिला संगठन का भी ऐसा ही हाल है। पिछले कई सालों में सोलन जिला में भाजपा का संगठन कभी इतना कमजोर नहीं दिखा है। अमूमन ये ही हाल जिला भाजयुमो का है। जो भाजयुमो युवा शक्ति के सहारे पार्टी के आयोजनों में जोश भरता था वो भी अब फीका सा दिख रहा है। यूँ तो भाजयुमो का वन बूथ ट्वेंटी यूथ कार्यक्रम हर माह जारी है लेकिन सवाल ये है कि क्या यह अभियान केवल युवाओं को कागजों में जोड़ना मात्र ही साबित हो रहा है। फिलवक्त जिला सोलन में मिल रही हार के बाद संगठन में फेरबदल की जरुरत को भाजपा नकार नहीं सकती।
फतेहपुर में बीते चार चुनाव में चार चेहरे बदल चुकी भाजपा अब लगातार चार चुनाव हार चुकी है। 2009 के उपचुनाव से शुरू हुआ हार का ये सिलसिला 2021 के उपचुनाव में भी कायम रहा। कांगड़ा जिला से होकर ही शिमला की गद्दी का रास्ता जाता है, ऐसे में सत्ता के इस सेमीफाइनल में ये हार पार्टी के लिए करारा झटका है। इस जीत ने जहाँ कांग्रेस के नेताओं-कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भर दी है, वहीँ भाजपा अब सकते में है। यहाँ जयराम सरकार के दो कैबिनेट मंत्रियों की साख भी दांव पर थी, बिक्रम सिंह ठाकुर और राकेश पठानिया। पर ये दोनों ही मंत्री भाजपा की नैया पार नहीं लगा सके। विशेषकर बिक्रम ठाकुर के लिए तो ये बड़ा झटका है, बिक्रम ठाकुर ही यहाँ चुनाव प्रभारी थे। इससे पहले ठाकुर पालमपुर नगर निगम चुनाव में भी प्रभारी थे लेकिन वहां भी भाजपा को करारी शिकस्त मिली थी। फतेहपुर उपचुनाव में भाजपा ने पूरी ताकत झोंकी, पर न तो मुख्यमंत्री के दौरे भाजपा की हार टाल सके और न ही कैबिनेट मंत्री अनुराग ठाकुर की रैलियां काम आईं। हिमाचल प्रभारी अनिवाश राय खन्ना के जीत के दावे भी नतीजे के बाद हवा हवाई सिद्ध हुए। इसमें कोई संशय नहीं है कि इस चुनाव में टिकट आवंटन से लेकर नतीजे आने तक हर मोर्चे पर भाजपा की सांगठनिक योजना भी धराशायी हुई। दरअसल इस वर्ष फरवरी में पूर्व विधायक सुजान सिंह पठानिया का निधन हुआ था और उसके बाद से ही भाजपा उपचुनाव के लिए एक्शन में थी। लगातार मुख्यमंत्री और संगठन की विभिन्न इकाइयों के आयोजन हो रहे थे। गौर करने लायक बात ये है कि इन सभी आयोजनों में पार्टी पूर्व में प्रत्याशी रहे कृपाल परमार को आगे रखकर चलती दिखी। जिस तरह की तवज्जो कृपाल को दी जा रही थी उससे मोटे तौर पर ये तय माना जा रहा था कि कृपाल ही चेहरा होंगे। पर अंतिम समय में पार्टी ने बलदेव ठाकुर को टिकट दिया। नतीजन कृपाल के समर्थन में कई प्राधिकारियों ने इस्तीफे दिए, कई नाराज़ हुए। हालांकि बाहरी तौर पर मुख्यमंत्री ने कृपाल को मना लिया लेकिन इस स्थिति को ठीक से पार्टी मैनेज नहीं कर पाई। पार्टी के एक तबके ने प्रचार नहीं किया और भीतरघात से भी इंकार नहीं किया जा सकता। लगातार तीसरी बार हार के साथ ही भाजपा प्रत्याशी बलदेव ठाकुर के राजनीतिक भविष्य भी सवाल उठने लगने है। इससे बलदेव 2012 में पार्टी प्रत्याशी थे और 2017 में बतौर बागी चुनाव लड़े थे। हार की हैट्रिक बना चुके बलदेव के लिए आगे की राह आसान नहीं होनी। यहाँ दिलचस्प बात ये भी है की 2017 के चुनाव में बलदेव की बगावत ने पार्टी की लुटिया डुबाई थी, तब पार्टी ने उन्हें निष्कासित भी किया था। बावजूद इसके खुद को पार्टी विथ डिफरेंस एंड डिसिप्लिन कहने वाली भाजपा ने बलदेव को टिकट दिया। दोनों साथ थे तो मजबूत थे ! फतेहपुर क्षेत्र में डॉ राजन सुशांत एक समय में भाजपा के तेज तर्रार नेता माने जाते थे। दोनों साथ थे तो मजबूत थे, पर जब से दोनों की राह जुदा हुई है, दोनों का हाल खराब है। स्व सुजान सिंह पठानिया को 2007 के विधानसभा चुनाव में हारने वाले नेता भी डॉ राजन सुशांत ही थे। इस उपचुनाव में भी डॉ राजन सुशांत करीब 13 हजार वोट ले गए और भाजपा की हार का कारण बने। पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार राजन सुशांत के प्रदर्शन में ख़ासा सुधार दिखा। हालांकि उनकी इस हार के बाद उनकी पार्टी 'हमारी पार्टी हिमाचल पार्टी' के भविष्य पर भी संशय की स्थिति है।
3219 वोट से कांग्रेस प्रत्याशी संजय अवस्थी अर्की उपचुनाव जीतने में कामयाब रहे। उन्हें राजेंद्र ठाकुर की बगावत से भी झूझना पड़ा और भीतरघात से भी इंकार नहीं किया जा सकता, इस पर संजय अवस्थी ने चुनाव भी बेहद कमजोर तरीके से लड़ा। ऐसा लचर चुनाव प्रबंधन कम ही देखने को मिलता है, बावजूद इसके अवस्थी जीत गए। इसमें कोई संदेह नहीं है की अगर अवस्थी ने मजबूती से ये चुनाव लड़ा होता तो उनकी जीत का अंतर कहीं ज्यादा होता। पर जीत तो आखिर जीत है। वहीं भाजपा के लिए शायद ये हार पचाना अधिक मुश्किल नहीं रहा होगा क्योंकि जमीनी स्थिति कभी भाजपा के पक्ष में दिखी ही नहीं। बल्कि कांग्रेस की कमजोरी की वजह से पार्टी का प्रदर्शन अनुमान से बेहतर ही रहा है। दरअसल पार्टी प्रत्याशी रतन पाल के खिलाफ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के एक गुट खुलकर मुखालफत करता रहा है जिसकी अगुवाई पूर्व विधायक गोविंद राम शर्मा करते रहे। हालांकि चुनाव से पहले गोविन्द राम शर्मा को मना लिया गया लेकिन तब तक उनके समर्थकों में रतन पाल विरोधी माहौल चरम पर था। ये लोग भाजपा के साथ होने का तो दावा करते रहे लेकिन रतन पाल इन्हे मंजूर नहीं थे। 2017 में जयराम राज आने के बाद से अर्की में भाजपा ने सिर्फ रतन पाल को ही तव्वज्जो दी और जमीनी पकड़ रखने वाले कई मजबूत नेता दरकिनार कर दिए गए। इस पर रतन पाल से पार्टी का एक बड़ा तबका कभी खुश नहीं दिखा, इनमें आम कार्यकर्त्ता भी शामिल है। जब कार्यकर्त्ता ही रतन पाल के पक्ष में एकजुट नहीं था तो जीत सिर्फ चमत्कार से ही हो सकती थी। इस जमीनी स्थिति से पार्टी यदि वाकिफ नहीं थी तो ये संगठन की बड़ी नाकामयाबी है। और यदि इससे वाकिफ होने के बावजूद उचित कदम नहीं उठाये गए तो बड़ा सवाल ये है कि क्या पार्टी चुनाव हारने के लिए लड़ रही थी ? जिला परिषद चुनाव के बाद लामबंद हुए रतन पाल विरोधी रतन सिंह पाल के खिलाफ अर्की में इस साल की शुरुआत से ही खुलकर विरोध के स्वर उठने लगे थे। तब जिला परिषद् चुनाव में पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं के टिकट काटे गए। कुनिहार वार्ड से अमर सिंह ठाकुर और डुमहेर वार्ड से आशा परिहार का टिकट काटा गया। इन्होंने इसके पीछे रतन पाल का हाथ बताया। इन दोनों नेताओं ने चुनाव लड़ा भी और जीता भी। जिला परिषद् पर कब्जे के लिए भाजपा को इन दोनों की जरुरत पड़ी और दोनों ने पार्टी का साथ भी दिया। पर अर्की में जमीनी स्तिथि नहीं बदली। अर्की नगर पंचायत चुनाव में भी पार्टी को करारी हार झेलनी पड़ी थी। जब अनदेखी से आहत गोविंद राम ने खोला मोर्चा ! 1993 से 2003 तक भाजपा की लगातार तीन शिकस्त के बाद लगातार दो बार पार्टी को जीत दिलाने वाले पूर्व विधायक गोविन्द राम शर्मा का 2017 में टिकट काटा गया था। उस चुनाव में गोविंदराम शर्मा पूरी तरह पार्टी के लिए प्रचार करते दिखे थे और भाजपा एकजुट थी। तब रतन पाल तो चुनाव हार गए लेकिन प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी। उम्मीद थी गोविन्द राम को या किसी बोर्ड निगम में ज़िम्मेदारी मिलेगी या संगठन में अहम दायित्व मिलेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। नतीजन उनके समर्थकों की नाराजगी बढ़ती रही और इस वर्ष पंचायत चुनाव के बाद उन्होंने खुलकर मोर्चा खोल दिया। 2022 में नोटा भी बड़ी चुनौती ! अर्की उपचुनाव में 1626 लोगों ने नोटा का इस्तेमाल किया, जबकि 2017 में ये आंकड़ा 530 था। सवर्ण आयोग के गठन की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे देवभूमि क्षत्रिय संगठन ने नोटा दबाने का आग्रह किया था जिसके बाद इसकी संख्या में करीब तीन गुना बढ़ोतरी हुई। यदि मुकाबला नजदीकी होता तो ये जीत हार का कारण बन सकता था। माहिर मानते है कि इसमें से अधिक हिस्सा सत्ता के विरोध में जा सकता था। ऐसे में 2022 में नोटा को सभी प्रत्याशियों को ध्यान में रखना होगा। 2022 में नहीं होगी गलती की गुंजाइश ! संजय अवस्थी ने 2012 में पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा था और नजदीकी मुकाबले में हार गए थे। पर उसके बाद से ही अवस्थी लगातार अर्की में सक्रीय थे। नौ साल की ये मेहनत ही अवस्थी को बचा गई अन्यथा जिस लचर तरीके से कांग्रेस ने ये उपचुनाव लड़ा है वो चौकाने वाला रहा। बंटी हुई भाजपा और रतन पाल को लेकर पार्टी के एक तबके में विरोध ने भी उनकी स्थिति बेहतर की। अगर 2022 में भाजपा इन गलतियों से सबक लेकर लड़ती है तो कांग्रेस को भी मजबूती से चुनाव लड़ना होगा। तब गलती की शायद कोई गुंजाइश नहीं रहे। कांग्रेस को जहाँ में रखना होगा कि जीत का जो अंतर आठ से दस हज़ार का हो सकता था वो महज तीन हज़ार ही रहा है। क्या नया चेहरा लाना ही विकल्प है ? अर्की में भाजपा की वर्तमान स्थिति बेहद पेचीदा है। रत्न पाल और गोविन्द राम, ये दोनों ही चेहरे आगे भी क्या पार्टी को जीत दिला सकते है इस पर अभी से मंथन करना होगा। ये तय है कि दोनों के चलते पार्टी बंट चुकी है और इस स्थिति में 2022 में भी परिणाम अनुकूल आना मुश्किल होगा। ऐसे में मुमकिन है कि कोई नया चेहरा लाकर पार्टी सबको एक साथ ला सकती है? दो चुनाव हारने के बाद रतन पाल पर फिर दांव खेलना मुश्किल ही लगता है। बाकी सियासत में सब संभव है।
'बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है, बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है'...मुनव्वर राणा का शेर मंडी में भाजपा की स्थिति पर सटीक बैठता है। 2014 में जो मंडी करीब चालीस हज़ार के अंतर से भाजपा की हुई थी, 2019 में चार लाख के अंतर से भाजपा की हुई। इस बीच 2017 भी आया जहाँ भाजपा ने जिला मंडी की दस में से नौ सीटें जीती और संसदीय क्षेत्र की 17 में से 13। इस साल हुए पंचायत और शहरी निकाय चुनाव में भी नगर निगम मंडी सहित अधिकांश क्षेत्रों में भाजपा का ही डंका बजा। पर 2021 जाते जाते भाजपा को आइना दिखा गया। मुख्यमंत्री लगातार कहते रहे की मंडी हमारी थी है और रहेगी लेकिन मंडी वालों ने सारा भ्रम तोड़ दिया। मंडी लोकसभा उपचुनाव में पूरा दमखम दिखाने के बावजूद भी मुख्यमंत्री भाजपा को जीत नहीं दिलवा पाए। राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नारों के साथ मैदान में उतरी भाजपा इस दफे चूक गई। ये हार बड़ी इसलिए है क्योंकि मंडी मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का गढ़ है। दो मंत्री रामलाल मारकंडा और गोविन्द सिंह ठाकुर भी इसी संसदीय क्षेत्र से आते है। भरपूर संसाधन और ज़बरदस्त प्रचार प्रसार के बावजूद भी भाजपा को हार का मुँह देखना पड़ा। अंतर बेशक कम रहा हो लेकिन भाजपा की इस हार की आवाज दिल्ली तक गुंजी है और अब गहन चिंतन मंथन के बाद समीक्षा भी दिल्ली दरबार में ही होगी। मंडी संसदीय हलके के 17 निर्वाचन क्षेत्रों में से कई जगह पार्टी के विधायक पार्टी की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। 9 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को बढ़त मिली। जिला मंडी के 9 में से आठ विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को बढ़त मिली पर नाचन में कांग्रेस आगे रही। जिला कुल्लू कि सभी चार, शिमला की एक, चम्बा की एक, लाहौल स्पीति और किन्नौर में कांग्रेस को लीड मिली। सुंदरनगर, बल्ह, करसोग विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को लीड तो मिली लेकिन अपेक्षा से कम। यहाँ भाजपाई विधायक अपनी जमीनी पकड़ साबित नहीं कर पाए। विशेषकर सुंदरनगर विधायक राकेश जम्वाल से भाजपा अच्छी लीड की उम्मीद कर रही थी। विनोद कुमार, कर्नल इंद्र सिंह ठाकुर, जवाहर ठाकुर जैसे कई विधायक उपचुनाव में अपना दमखम नहीं दिखा पाए। जबकि मंडी सदर से यानि अनिल शर्मा के गढ़ से ब्रिगेडियर को 3 हजार से अधिक मतों की बढ़त प्राप्त हुई। भाजपा के विधायक ही नहीं शिक्षा मंत्री गोविंद ठाकुर व तकनीकी शिक्षा मंत्री डॉ. रामलाल मार्कंडेय अपने-अपने हलके व गृह जिले में भाजपा की साख नहीं बचा पाए। दोनों के हलकों व जिलों में कांग्रेस प्रत्याशी को बढ़त मिली। लाहुल स्पीति के विधायक एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री डॉ रामलाल मार्कडेंय ने जिला परिषद के चुनाव में भाजपा को मिली हार से भी कोई सबक नहीं सीखा। प्रतिभा सिंह को मंत्री गोविन्द सिंह ठाकुर के गढ़ मनाली में भी 1841 मत अधिक प्राप्त हुए है। मंडी संसदीय सीट पर चुनाव के लिए भाजपा ने मंत्री महेन्दर सिंह को चुनाव प्रभारी बनाया था। पर लग रहा था मानो मंत्री जी को प्रचार प्रसार में बोलने के बजाए चुप रहने के लिए कहा गया था। दरअसल बीते कुछ समय में मंत्री जी के कई बयानों से भाजपा को काफी नुक्सान झेलना पड़ा है। शायद इसीलिए मंत्री प्रचार प्रसार से दूर दूर नज़र आए। तो भाजपा के टिकट पर लड़ेंगे राणा जोगिंद्र नगर में निर्दलीय विधायक प्रकाश राणा भी भाजपा के साथ ही है और उनके क्षेत्र में भाजपा को अच्छी लीड मिली है। यहाँ सात हज़ार से अधिक की लीड लेकर राणा ने अपनी काबिलियत सिद्ध की है। संभावित है कि विधानसभा चुनाव से पूर्व राणा भाजपा में शामिल हो और अगली बार भाजपा टिकट पर चुनाव लड़े। विधानसभा क्षेत्र भाजपा कांग्रेस अंतर भरमौर 5893 21150 5257 लाहौल स्पिति 5588 7734 2147 मनाली 21251 23092 1841 कुल्लू 21778 25675 3897 बंजार 19713 21591 1878 आनी 20922 27965 7043 रामपुर 11552 31507 19555 किन्नौर 12566 17543 4977 नाचन 24422 26933 2511 करसोग 20643 19230 1413 सुंदरनगर 23761 21849 1912 सराज 38394 18735 21659 द्रंग 26352 23731 2621 जोगिंद्रनगर 27993 20849 7144 मंडी 22073 18827 3246 बल्ह 22875 21919 956 सरकाघाट 21109 19260 1849
लोकसभा के नतीजे सामने आने के बाद स्पष्ट हो गया की मंडी सबकी है और सबकी रहेगी। जिस तरह मुख्यमंत्री के गढ़ को कांग्रेस प्रत्याशी प्रतिभा सिंह ने भेदा है मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर का 'मंडी हमारी है, हमारी थी और हमारी ही रहेगी' का नारा भी हवा हवाई हो गया। मंडी लोकसभा का उपचुनाव जीतकर पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह ने ज़बरदस्त वापसी की है। इस जीत से प्रदेश की राजनीति में प्रतिभा सिंह का कद और भी बढ़ गया है। विक्रमादित्य सिंह की गिनती भी अब प्रदेश के बड़े नेताओं में होने लगी है। स्पष्ट है कि वीरभद्र के जाने के बावजूद भी होली लॉज के तिलिस्म में कोई कमी नहीं आएगी। होली लॉज अब भी प्रदेश की सियासत की धुरी बना रहेगा। सिर्फ वीरभद्र परिवार ही नहीं इस जीत के बाद मंडी लोकसभा में लगभग हाशिये पर जा चुकी कांग्रेस भी मानों दोबारा जीवित हो उठी है। संगठन और कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है।भाजपा के लिए ये हार जितनी बड़ी है उतनी ही बड़ी ये जीत कांग्रेस को मिली है। पर इसमें कोई संशय नहीं है कि यदि यहाँ उम्मीदवार प्रतिभा सिंह नहीं होती तो नतीजा भी संभवतः अलग होता। यानि मोटे तौर पर ये जीत प्रतिभा सिंह की जीत है, होली लॉज की जीत है। कारगिल युद्ध पर दिए गए बयान को छोड़ दिया जाएं तो जिस तरह उन्होंने इस चुनाव को लड़ा है वो भी काबिल ए तारीफ है। प्रतिभा सिंह ने वीरभद्र सिंह द्वारा किये गए विकास कार्यों के साथ- साथ महंगाई और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों को मुख्य तौर पर उठाया और सीधे जनता से कनेक्ट करने में कामयाब रही। इस जंग में उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह का सबसे बड़ी भूमिका रही। खास बात ये है कि मां - बेटे ने एकसाथ प्रचार न करके अलग -अलग मोर्चा संभाला और इस दोतरफा सियासी आक्रमण के आगे भाजपा परास्त हुई। दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के गढ़ रहे रामपुर और जनजातीय क्षेत्रों से प्रतिभा सिंह को मिली बढ़त ने भी कांग्रेस की जीत की राह आसान कर दी। रामपुर के लोगों ने बंपर वोटिंग करते हुए प्रतिभा सिंह को 20000 मतों की बढ़त देकर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के गृह विधानसभा क्षेत्र सराज से भाजपा को मिली लीड को न्यूट्रलाइज कर दिया। किन्नौर जिले से करीब 5000, लाहौल स्पीति से 2100 और भरमौर से कांग्रेस को 4100 की लीड प्रतिभा को मिली। बाकी की कसर कुल्लू जिले के कुल्लू, मनाली, बंजार और आनी विधानसभा क्षेत्र ने पूरी कर दी। यहां से कांग्रेस को चौदह हजार से ज्यादा की बढ़त मिली जो ब्रिगेडियर कुशल चंद ठाकुर कवर नहीं कर पाए। सियासी क्षितिज पर बिखेरी काबिलियत की चमक पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन के उपरांत सबकी निगाहें विक्रमादित्य सिंह पर टिकी थी और आलोचकों का मानना था कि विक्रमादित्य के लिए अकेले दम पर खुद को साबित करना मुश्किल होने वाला है। कहा जा रहा था की वीरभद्र विरोधी गुट उन्हें टिकने नहीं देगा और अपनों की महत्वकांक्षाएं उनके सियासी कद को बौना ही रखेगी। पर जिस तरह विक्रमादित्य सिंह ने सियासी क्षितिज पर अपनी काबिलियत की चमक बिखेरी है वो कई माहिरों को भी हैरान कर रही है। लोगों से सीधा संवाद उन्हें लोकप्रिय बना रहा है, खासतौर से सोशल मीडिया का उन्होंने बेहद उम्दा इस्तेमाल किया है। पर सियासत महाठगिनी है और विक्रमादित्य सिंह का असल इम्तिहान अभी बाकी है। अपनी ही अलग तरह की सियासत कर रहे विक्रमादित्य के हर कदम पर इस वक्त हर सियासी अपने बेगाने की नजर होगी। उनकी जरा सी चूक का इंतज़ार कई विरोधियों को होगा। पर उन्हें हल्के में लेने की गलती शायद ही कोई कर रहा हो।
संगठन ही शक्ति, संगठन ही सर्वोपरि भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी राजैनतिक पार्टी बनाने का मूल आधार ये ही मंत्र रहा है। पर हिमाचल में पार्टी का संगठन लचर नजर आ रहा है जो पार्टी को लाचार बनाता दिख रहा है। हालहीं में हुए उपचुनाव में भाजपा संगठन का नेटवर्क काम नहीं आया। चाहे त्रिदेव हों या बूथ प्रभारी, कोई तंत्र पार्टी की हार नहीं टाल पाया। न मुख्य संगठन में माहिरों का अनुभव दिखा और न ही भाजयुमो की युवा ब्रिगेड में पहले सा जोश। वास्तविक स्थिति ये है कि बूथ स्तर से ऊपर तक यानी बॉटम टू टॉप पार्टी का संगठन कमजोर दिखने लगा है। यूँ तो कागजों में हजारों -लाखों कार्यकर्त्ता है यानी लाखों परिवार पार्टी से जुड़े है, लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सक्रीय है या फिर महज कागजी आंकड़ा। या फिर नेतृत्व में ही कोई खामी है ? इन सवालों से इस वक्त भाजपा झूझ रही है। 2022 के सत्ता संग्राम से पहले भाजपा को इन सवालों का जवाब तलाशना होगा और खामियों को दूर भी करना होगा। ये ही हाल रहा तो मिशन रिपीट में पार्टी का पीटना तय होगा। पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष सुरेश कश्यप को 2020 में डॉ राजीव बिंदल के इस्तीफे के बाद पार्टी की कमान सौंपी गई थी। कश्यप युवा और इमानदार चेहरा है और लगातार खुद को साबित भी करते रहे है, पर जब नेतृत्व करने का मौका आया तो ज्यादा प्रभावशाली नहीं दिखे। दिलचस्प बात ये है कि उन्हें कमान मिलने के बाद से अब तक जमीनी स्तर पर पार्टी संगठन में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। अधिकांश नियुक्तियां डॉ राजीव बिंदल के अध्यक्ष रहते हुए थी और वे तमाम लोग अब भी संगठन में मौजूद है। इनमें बिंदल के कई खास सिपहसालार भी है। सुरेश कश्यप ने संगठन में न तो ज्यादा बदलाव दिया और न ही जमीनी संगठन को धार देने में अब तक कामयाब दिखे है। मोटे तौर पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा जारी दिशा निर्देश के अनुसार ही एक तरह से संगठन अपना कर्तव्य पूरा करने की औपचारिकता करता दिखा है। भाजपा के लिए एक और बड़ी परेशानी है, अमूमन हर जिले में जमीनी कार्यकर्ता में नाराजगी भी है और इसका कारण है वर्ग विशेष को मिल रही तवज्जो। मसलन कई शहरी निकायों में आम कार्यकर्ता की अनदेखी कर पैराशूट से पार्टी में उतरे लोगों को मनोनीत किया गया। जाहिर है ऐसे में पार्टी का झंडा बुलंद रखने वाला आम कार्यकर्ता हतोत्साहित हुआ है। ऐसे और कई मसले है। पार्टी के जिला संगठनो की बात करें तो कई जिलों में नेतृत्व ऐसे नेता कर रहे है जिनकी न तो जमीनी पकड़ दिख रही है और न ही वे प्रभावशाली दिख रहे है। कांग्रेस में तो इस तरह चहेतों को पद लाभ देने का रिवाज रहा है लेकिन भाजपा में भी अब स्थिति ऐसी ही है। कॉर्पोरेट कल्चर वाली भाजपा में भी अब नॉन परफॉर्मर्स को लादा जाना सवाल तो खड़े करता ही है। बहरहाल उपचुनाव में क्लीन स्वीप के बाद प्रदेश संगठन में व्यापक फेरबदल की बहस भी छिड़ गई है। एक बड़ा तबका इसका हिमायती दिख रहा है। ये तो तय है की पार्टी इस हार से सबक लेगी और आवश्यक बदलाव भी करेगी। सवाल ये भी है क्या संगठन में व्यापक बदलाव होने जा रहा है ? दरअसल अध्यक्ष पद संभालने के बाद सुरेश कश्यप का पहला बड़ा इम्तिहान पार्टी सिंबल पर हुए नगर निगम चुनाव थे जहाँ पार्टी कांग्रेस के मुकाबले उन्नीस ही दिखी थी। अब उपचुनाव में पार्टी को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा है। ऐसे में सुरेश कश्यप पर भी सबकी निगाहें टिकी है।
प्रदेश के सियासी क्षितिज पर जगमगा रहे कई तारे उपचुनाव नतीजों के बाद जमीन पर आते दिख रहे है। नगर निगम चुनाव के बाद उपचुनाव में भाजपा को जोर का झटका लगा है वो भी जोर से। कई आत्ममुग्ध नेता और दिग्गज जनता दरबार में धराशाई हो गए। खुद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर समेत कई कैबिनेट मंत्रियों और पार्टी संगठन को जनता ने आइना दिखा दिया। उपचुनाव में मुख्यमंत्री समेत कई मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं की साख दाव पर थी। कई नेताओं को प्रभारी बनाया गया था तो कई पर अपने -अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लीड दिलवाने का जिम्मा था। पर अधिकांश खरे नहीं उतरे। ऐसा ही हाल पार्टी संगठन का भी है, नगर निगम चुनाव के बाद दूसरे बड़े इम्तिहान में भी संगठन बेअसर दिखा। भाजपा पार्टी विद डिसिप्लिन है, और प्रदेश में जो भी हाल हो मगर राष्ट्रीय स्तर पर इसे अनदेखा नहीं किया जाने वाला। सवाल तो पूछे ही जायेंगे, जवाबदेही भी तय होगी और निश्चित तौर पर सुधार भी होगा। बीते कुछ महीनों में पार्टी ने जिस तरह कई राज्यों में परिवर्तन किया है उसे देखते हुए अभी से सियासी पंडित कयास लगाने लगे है। किन्तु ये नहीं भूलना चाहिए कि जयराम ठाकुर का बचाव न सिर्फ उनकी स्वच्छ छवि की ढाल कर रही है बल्कि मंडी के नौ में से आठ निर्वाचन क्षेत्रों में मिली बढ़त भी उनके पक्ष में गई है। सही मायनों में उपचुनाव में वे अकेले ही भाजपा की तरफ से लोहा लेते दिखे है, बाकी तो मानो फर्ज अदायगी चल रही थी। भाजपा ये दावा करती है कि चुनाव में प्रत्याशी तय करने से पहले ग्राउंड सर्वे होता है, फिर गहन मंथन के बाद प्रत्याशी तय किये जाते है। इसमें चुनाव प्रभारियों से लेकर आम कार्यकर्ताओं के फीडबैक को तवज्जो दी जाती है। सब कुछ पूरी प्लांनिग के साथ होता है परन्तु जो नतीजे सामने आए है उनसे तो भाजपा के सर्वे पर भी सवाल उठ रहे है। ये सर्वे और फीडबैक पार्टी की जीत के लिए हुए थे या कोई इनसाइड स्टोरी है, ये भी बड़ा सवाल है। भाजपा का कोई एक प्रभारी भी अपनी साख नहीं बचा पाया। पार्टी ने जल शक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर को मंडी संसदीय सीट के लिए, बिक्रम ठाकुर को फतेहपुर के लिए, डॉ राजीव बिंदल को अर्की के लिए और मंत्री सुरेश भारद्वाज को जुब्बल कोटखाई उपचुनाव के लिए प्रभारी नियुक्त किया था। इनके आलावा मंत्री गोविन्द सिंह ठाकुर और मंत्री राम लाल मारकंडा पर भी अपने -अपने क्षेत्रों से लीड दिलवाने का जिम्मा था। पर ये सभी असफल रहे। थम गया जयरथ जयराम ठाकुर सरकार के मुखिया है और जाहिर है जीत का श्रेय और हार का जिम्मा दोनों उनके खाते में ही दर्ज होने थे। ये चार- शून्य से मिली हार निसंदेह उनके लिए बड़ा झटका है। उपचुनाव में मुख्यमंत्री ने करीब 70 जनसभाएं की लेकिन सब व्यर्थ गया। मंडी में तो मुख्यमंत्री ने स्वयं मोर्चा संभाला था। इससे मुकाबला कड़ा जरूर हुआ परन्तु भाजपा को जीत नहीं मिल पाई। पर जिला के नौ में से आठ निर्वाचन क्षेत्रों में मिली लीड जरूर बताती है कि जिला मंडी में जयराम ठाकुर की पकड़ जबरदस्त है। ये जगजाहिर है कि भाजपा का एक गुट जयराम ठाकुर का विरोधी है, पर अब तक ये गुट खुलकर उनके खिलाफ मुखर नहीं हो पा रहा था। दरअसल चुनावी विजय रथ पर सवार जयराम ठाकुर ने कभी उन्हें ऐसा मौका ही नहीं दिया। पर इस हार के बाद दबे हुए विरोध के सुर बुलंद हो सकते है, जिन्हें थामना जयराम ठाकुर के लिए बड़ी चुनौती होगी। दमखम दिखा पाते तो मंडी भाजपा की होती शिक्षा मंत्री गोविंद ठाकुर के जिला कुल्लू की चारों सीटों पर भाजपा पिछड़ी। मंत्री के अपने निर्वाचन क्षेत्र में भी पार्टी को लीड नहीं मिली। यानि मंडी संसदीय उपचुनाव के इम्तिहान में गोविन्द सिंह ठाकुर पूरी तरह फेल हो गए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि मंत्री के जिला में पार्टी अच्छा करती तो जीत हार का अंतर खत्म किया जा सकता था। यदि गोविन्द ठाकुर अपना दमखम दिखा पाते तो मंडी भाजपा की होती। प्रतिभा सिंह को मंत्री गोविन्द सिंह ठाकुर के गढ़ मनाली में भी 1841 मत अधिक प्राप्त हुए है। भाजपा ने कुल्लू जिले का दायित्व भी शिक्षा मंत्री गोविंद ठाकुर को सौंपा था। बता दें की कुल्लू जिले के चारों हलकों में कांग्रेस ने 14,659 मतों की बढ़त प्राप्त की है। मार्कण्डेय फिर विफल तकनीकी शिक्षा मंत्री डा. रामलाल मारकंडा भी उपचुनाव में नाकाम रहे। मंत्री अपने हलके व गृह जिले में भाजपा की साख नहीं बचा पाए। लाहौल स्पीति में कांग्रेस प्रत्याशी को बढ़त मिली। लाहुल स्पीति के विधायक एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री डा. रामलाल मारकंडा ने जिला परिषद के चुनाव में भाजपा को मिली हार से भी कोई सबक नहीं सीखा। वह क्षेत्र के 23,790 मतदाताओं की नब्ज टटोलने में पूरी तरह विफल रहे। 23,790 से 13,547 ने मतदान किया था। कांग्रेस यहां 2147 मतों की बढ़त ले गई। बेअसर दिखे मंत्री महेंद्र उपचुनाव में मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर भी अपना प्रभाव नहीं दिखा पाए। महेंद्र ठाकुर को मंडी संसदीय उपचुनाव का प्रभारी बनाया गया था। पर वे भी चुनाव प्रचार प्रसार में अधिक प्रभावशाली नहीं दिखे। जिला मंडी के बाहर हर जगह भाजपा पिछड़ी जो हार का कारण सिद्ध हुआ। लगातार अपने बयानों से चर्चा में रहने वाले मंत्री कहने को चुनाव प्रभारी जरूर थे पर चुनाव पूरी तरह जयराम ठाकुर के इर्दगिर्द ही घूमता दिखा। हालांकि मंत्री का अपना निर्वाचन क्षेत्र धर्मपुर मंडी संसदीय क्षेत्र में नहीं आता लेकिन कुछ अन्य क्षेत्रों से महेंद्र सिंह दूर ही दिखे। बतौर प्रभारी दूसरी हार, उठेंगे कई सवाल फतेहपुर में उद्योग मंत्री बिक्रम सिंह ठाकुर व वन मंत्री राकेश पठानिया ने कमान संभाल रखी थी। यहां भी दोनों ही मंत्री फेल हो गए। विशेषकर बिक्रम ठाकुर के लिए ये बड़ी हार है। इससे पहल पालमपुर नगर निगम चुनाव में भी मंत्री प्रभारी थे और भाजपा को करारी शिकस्त मिली थी। बिक्रम ठाकुर जिला कांगड़ा में भाजपा के सबसे मजबूत मंत्री है और उद्योग व परिवहन जैसे महत्वपूर्ण महकमे उनके पास है। बतौर प्रभारी उनका लगातार विफल होना पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं है। सत्ता का रास्ता कांगड़ा से होकर ही जाता है। अर्की में नहीं हुई जीत वाली नाटी अर्की में भी लोग बस इंतज़ार करते रह गए और बिंदल का जादू नहीं चला। लगा था जीत की नाटी करने का जो मौका सोलन नगर निगम चुनाव के बाद नहीं मिला वो शायद अर्की में मिल जाए, पर ऐसा जनादेश आया नहीं। बिंदल को संगठन का डॉक्टर भी कहा जाता है लेकिन उनके प्रभारी रहते पार्टी को फिर हार मिली है। आमतौर पर अपने संवाद से ही कार्यकर्ताओं में जोश भर देने वाले बिंदल को जो लोग करीब से जानते है, जो उनकी कार्यशैली को जानते है उन्हें भी समझ नहीं आ रहा कि आखिर हुआ क्या है। भुलाएं नहीं भूलेगी ये हार बाकि हलकों में जो हुआ उसे भुलाया जाना उतना कठिन नहीं है परन्तु जुब्बल कोटखाई की हार को भाजपा के इतिहास का काला अध्याय कहा जाने लगा है। यहां देश की सबसे बड़ी पार्टी के प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई। यहां संगठन भी टूटा और कार्यकर्त्ता भी पार्टी से रूठ गया। स्थिति सुधरने के बजाए दिन प्रति दिन बिगड़ती चली गई। चुनाव प्रभारी सुरेश भारद्वाज अपने कार्यकर्ताओं को मनाने में पूरी तरह विफल रहे और नतीजा अब सभी के सामने है। सवाल ये भी है कि उपचुनाव के दौरान परिवारवाद को लेकर भाजपा का जो जमीर जागा है क्या वो आगे भी जाएगा रहेगा। दूसरा क्या चेतन बरागटा का निष्कासन 6 वर्ष तक बरकरार रहेगा या पार्टी को 2022 आते -आते फिर उनकी याद आएगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में केदारनाथ यात्रा पर थे जहां उन्होंने आदि शंकराचार्य की प्रतिमा का भी लोकार्पण किया। प्रधानमंत्री की इस उत्तराखंड यात्रा को आम आदमी पार्टी ने एक चुनावी यात्रा बताया है। पार्टी ने कहा है कि भगवान शंकर के मंदिर से प्रधानमंत्री का दिया गया वक्तव्य कोई सामान्य वक्तव्य नहीं था, बल्कि यह पूरी तरह से उत्तराखंड विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर दिया गया एक चुनावी भाषण था। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा को चुनावी यात्रा कहा जाना चाहिए। आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार पूर्व कर्नल अजय सिंह कोठियाल ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री से पांच सवाल भी पूछे हैं। आम आदमी पार्टी नेता पूर्व कर्नल अजय सिंह कोठियाल ने शुक्रवार को कहा कि उत्तराखंड की सरकार ने पिछले 5 साल के दौरान कोई काम नहीं किया है। वह अपने काम के बदले सत्ता में दोबारा वापसी करने की हिम्मत नहीं कर पा रही है। यही कारण है कि अब चुनावी स्टंट करके चुनाव में अपनी जीत तय करने की कोशिश की जा रही है। आम आदमी पार्टी नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड के पुजारियों पुरोहितों धर्म आचार्यों की भूमिका को स्वीकार किया है, लेकिन इसके बाद भी उनके अधिकारों को चोट करने वाली देवस्थानम बोर्ड को भंग करने पर कोई वादा नहीं किया। इसी से उनकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। कोठियाल ने ट्वीट के माध्यम से प्रधानमंत्री से 5 सवाल पूछे : 1. देवस्थानम बोर्ड पर पीएम ने कुछ क्यों नहीं कहा? 2. कोठियाल ने पूछा,आपके स्वागत में पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी शामिल थे, जिन्होंने इस बोर्ड को ऐतिहासिक बताते हुए उसका विरोध कर रहे तीर्थ-पुरोहितों को स्वार्थी कहा है। क्या यह भाषा भाजपा की आधिकारिक लाइन है? 3. मंदिर परिसर के गर्भगृह के अंदर के दृश्यों को कैमरे के जरिए लाइव दिखाकर हजारों साल पुरानी परंपरा तोड़ी गई। क्या यह अपराध आपको स्वीकार्य है? 4. उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा पर अब तक केंद्र ने कोई राहत क्यों नहीं प्रदान की? 5. बीजेपी ने रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन आदि क्षेत्रों मे जो चुनावी वादे किए थे, धरातल पर उन वादों की हकीकत क्या है?
हिमाचल में उपचुनाव है और सियासत चरम पर। महंगाई को लेकर विपक्ष ने हल्ला बोल दिया है और महंगाई इस चुनाव में बड़ा मुद्दा है। लगातार बढ़ रही प्याज की कीमत भी सियासी चर्चा का विषय बन गई है। देश की सियासत पर नज़र डाले तो महंगाई हमेशा से चुनावी मुद्दा रहा है, विशेषकर प्याज के दामों ने कई बार सियासतगारों को रुलाया है। विपक्ष में बैठे नेताओं ने कई मर्तबा प्याज को चुनावी हथियार बनाया है। आपातकाल के बाद जब 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी थी तब विपक्ष में बैठी इंदिरा गांधी के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं था जिससे वो सरकार को घेर सके। तब प्याज की कीमतें आसमान छूने लगी और बैठे बिठायें इंदिरा गाँधी को एक मुद्दा मिल गया। प्याज की बढ़ती कीमतों की तरफ ध्यान खींचने के लिए कांग्रेस नेता सीएम स्टीफन तब संसद में प्याज की माला पहन कर पहुँच गए और प्याज पॉलिटिक्स का जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोलने लगा। 1980 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने प्याज की माला पहनकर प्रचार किया। फिर वर्ष 1998 में केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो प्याज की कीमतों ने फिर रुलाना शुरू कर दिया। तब दिल्ली में भाजपा की सरकार थी और विधानसभा चुनाव दस्तक दे रहे थे। फिर एक बार कांग्रेस ने प्याज का जबरदस्त राजनीतिक इस्तेमाल किया और इस मुद्दे पर भाजपा को जमकर घेरा। नतीजन चुनाव में मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज के नेतृत्व वाली भाजपा बुरी तरह हार गई। इसी तरह 1998 में महाराष्ट्र में प्याज की भारी किल्लत थी और प्याज की कीमत आसमान पर। तब कांग्रेसी नेता छगन भुजबल ने दिवाली पर महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी को मिठाई के डिब्बे में रखकर प्याज भेजे थे।
सीएम जयराम ठाकुर विपक्ष पर जमकर हमला बोल रहे है। मंडी में मुख्यमंत्री ने खुद मोर्चा संभाला हुआ यही और कांग्रेस को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। जयराम ठाकुर का कहना है कि कांग्रेस के लोग बार-बार मंडी का जिक्र कर रहे हैं मगर उन्हें पता होना चाहिए कि मंडी का मतलब मंडी संसदीय क्षेत्र है। इसमें किन्नौर से भरमौर और रामपुर भी आता है। प्रचार के दौरान एक बयान में मुख्यमंत्री ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह हिमाचल में लंबे समय तक सत्ता में रहे। वैचारिक रूप से हम आमने-सामने होते थे, लेकिन हमारा झगड़ा कभी इस तरह नहीं था। उन्होंने हमेशा हमारी तारीफ भी की है। हमारी शराफत के बारे में भी बोला। वे आज हमारे बीच नहीं हैं। इस बात का भी दुख है। प्रतिभा सिंह को घेरते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि मंडी संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी प्रतिभा सिंह बार-बार यह कहती आ रही हैं कि उन्होंने उपचुनाव नहीं लड़ना था। हम इस मंच से कहना चाहते हैं कि हमें सांसद मजबूर नहीं, मजबूत सांसद चाहिए। मैं पहले यहां का विधायक हूं, सीएम बाद में : जयराम प्रचार के दौरान अपने निर्वाचन क्षेत्र में पहुंचे मुख्यमंत्री ने सराज विधानसभा क्षेत्र में किए गए विकास कार्य भी गिनवाए। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने विपक्ष को बताया कि मैं यहां का विधायक हूं, सीएम बाद में हूं। चुने हुए प्रतिनिधि होने के नाते यह मेरी जिम्मेदारी है कि यहां की जनता की सेवा पहले करूं। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में हमने विकास कार्यों रुकने नहीं दिया। कांग्रेस वालों ने तो एक-एक लिस्ट बनाई, 12 करोड़ का बिल बनाया और पार्टी हाईकमान को भेजा और खाते में डालने को कहा। जयराम ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस ऐसी पार्टी है जो अपनी ही पार्टी को ठगने से बाज नहीं आ रही है। सारी महंगाई और बेरोजगारी पिछले चार साल में नहीं आई मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि देश और प्रदेश में लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार रही। आज हमारे मित्र बेरोजगारी और महंगाई का आरोप लगा रहे हैं। सारी महंगाई और बेरोजगारी पिछले चार साल में नहीं आई। नौकरी देने के लिए हम जितना कर सकते हैं उसे हम कर रहे हैं। कांग्रेस की सरकार से पूछना चाहिए कि तुम लोगों ने गरीबों के लिए क्या किया। हमार सरकार ने 65 वर्ष की आयु वाली माताओं के लिए पेंशन दी। हमने गरीबों के लिए हिमकेयर योजना चलाई, जिसके तहत 1 लाख 75 हजार गरीबों का इलाज करवाया। सहारा योजना चलाई जिसमें पात्र को हर महीने 3 हजार रुपये उनके खाते में डालते हैं। बीपीएल परिवार की बेटी को शगुन योजना में पात्रों को 31 हजार दे रहे हैं।
हिमाचल का उपचुनाव आम मुद्दों से भटक कर राष्ट्रवाद और परिवारवाद के इर्द गिर्द ही घूम रहा है। कांग्रेस के स्टार प्रचारक कन्हैया कुमार के हिमाचल आने पर उपजा विवाद शांत होने का नाम नहीं ले रहा। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद सुरेश कश्यप ने कांग्रेस पर हमलावर होते हुए कहा है कि कुछ दिनों पहले कांग्रेस पार्टी ने उस व्यक्ति को अपनी पार्टी में शामिल किया जो देश के टुकड़े-टुकड़े करने वालों का समर्थन करता है। देश को तबाह करने का ख्वाब देखने वाले कन्हैया कुमार को हिमाचल लाकर कांग्रेस ने इस वीरभूमि का अपमान किया है। उन्होंने कहा हिमाचल मेजर सोमनाथ शर्मा की धरती है, कैप्टन विक्रम बत्रा की धरती है। आज वे शहीद स्वर्ग से देख रहे होंगे और उन्हें कितना दुख हो रहा होगा। वीरभद्र सिंह जी देशभक्त थे, बकौल कश्यप, उन्हें यकीन है कि वो आज होते तो कन्हैया कुमार जैसे शख्स को हिमाचल की धरती पर पांव नहीं रखने देते। कांग्रेस में ऐसे लोग शामिल हैं जो अफजल गुरु जैसे आतंकी की बरसी मनाते हैं और देश के खिलाफ विरोधी नारे लगाते हैं । शायद देश के विरोधियों को शह देना कांग्रेस पार्टी की आदत बन गई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की स्टार प्रचारक लिस्ट से स्थानीय नेता गायब हैं, पर भाजपा को अपने स्टार प्रचारकों पर पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा जब भारतीय जनता पार्टी ने एक फौजी को सम्मान देकर मंडी लोकसभा सीट से उतारा है तो उस फौजी के खिलाफ प्रचार के कि लिए कांग्रेस उसी कन्हैया कुमार को ले आई जो फौज और फौजियों को बलात्कारी कहता है। जो ' हर घर से अफजल निकलेगा ' जैसे नारे लगाने वालों को शह देता है। प्रतिभा पर भी बोला हमला कारगिल युद्ध पर प्रतिभा सिंह के बयान पर सुरेश कश्यप ने कहा है कि उन्हें याद नहीं कि उस लड़ाई में देश के 500 से ज्यादा जवानों ने शहादत दी। हिमाचल में 50 से ज्यादा माताओं ने अपने बेटे, बहनों ने अपने भाई, बीवियों में अपने सुहाग को खोया। उन्होंने कहा कि जब कांग्रेस को कारगिल योद्धा ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर के सामने अपनी हार निश्चित लग रही है तो उसने कन्हैया कुमार को अपना स्टार प्रचारक बना दिया। क्या कांग्रेस पार्टी को कोई और नहीं मिला था हमें लगता है कि एक सैनिक के खिलाफ कांग्रेस जानबूझकर उस शख्स को लाई जो सेना और सैनिकों के बलिदान का अपमान करता है।
आगामी चार उपचुनाव 20 विधानसभा क्षेत्रों में दोनों राजनीतिक दलों का इम्तिहान है। ये उपचुनाव आठ जिलों में दोनों मुख्य दलों की जमीनी स्थिति बताएगा। ये विधानसभा चुनाव से पहले शक्ति परिक्षण का बेहतरीन मौका है, दरअसल ये सही मायनों में सत्ता का सेमीफाइनल है। ये किसी अन्य उपचुनाव की तरह नहीं है, ये कहीं चेहरे तय कर सकता है तो कहीं चेहरे बदल सकता है। किसी का दावा मजबूत कर सकता है तो 2022 से पहले किसी की राह कठिन। 30 अक्टूबर को मतदान होना है और उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। चाहे मंडी संसदीय क्षेत्र हो या जुब्बल कोटखाई, अर्की और फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव, हर तरफ जोर आजमाइश चली है। कोई प्रत्याशी कोई राजनीतिक दल कसर नहीं छोड़ना चाहता। यहां कसर रह गई तो इसका असर दूर तक दिखेगा। जुब्बल-कोटखाई: नित नए समीकरण और दिलचस्प होता उपचुनाव उपचुनाव में जुब्बल - कोटखाई इस वक्त हॉट सीट है। सबकी नजरें यहाँ टिकी है। कारण है यहाँ दिख रही रोचक जंग। कांग्रेस ने यहाँ से पूर्व विधायक और जांचे -परखे उम्मीदवार रोहित ठाकुर पर ही भरोसा जताया है। उनके टिकट को लेकर शुरू से कोई संशय नहीं था और रोहित कई माह पहले ही प्रचार शुरू कर चुके थे। साथ ही क्षेत्र में उनकी लगातार सक्रियता और स्थानीय संगठन पर उनकी पकड़ भी उन्हें पक्ष में रहे है। पर रोहित और कांग्रेस को अति आत्मविश्वास की स्थिति से बचना होगा और याद रखना होगा कि 2017 में ऐसा ही आत्मविश्वास उन्हें ले बैठा था। ये तय है की ये चुनाव उनके लिए आसान नहीं है। यहां से दूसरे उम्मीदवार जिन पर सबकी निगाहें टिकी है वो है चेतन बरागटा। इनकी एंट्री ने इस चुनाव को दिलचस्प मोड़ दे दिया है। दरअसल भाजपा ने यहां बरागटा का टिकट काट नीलम सरैक को टिकट दिया। टिकट कटा तो पहले चेतन आहत हुए और फिर चेतन के समर्थक। चेतन बतौर निर्दलीय मैदान में है और भाजपा की मुश्किलें बढ़ा चुके है। भले ही ये चेतन का पहला हो लेकिन उन्हें चुनाव लड़वाने का ठीक अनुभव है, जो उनकी रणनीति में भी दिख रहा है। लगातार सुर्ख़ियों ने बने रहकर चेतन इस चुनाव को अलग मोड़ पर ले जा रहे है जिससे कांग्रेस -भाजपा दोनों तो सतर्क और सावधान रहना होगा। भाजपा और नीलम की बात करें तो इन्हें गियर बदलने की ज़रूरत है। अभी चुनाव प्रचार का अंतिम चरण बाकी है और इसमें कोई संशय नहीं कि भाजपा को भी कम नहीं आंकना चाहिए। उम्मीद ये ही है कि मतदान का दिन आते -आते भाजपा भी रंग में होगी और पार्टी की चिर परिचित आक्रामकता इस चुनावी संग्राम में देखने को मिलेगी। नीलम की जमीनी पकड़ को भी यहां दरकिनार नहीं किया जा सकता। यहां एक और निर्दलीय प्रत्याशी सुमन कदम भी मैदान में है, वो भी भरपूर प्रयास कर रही है। चुनाव में वो कितनी प्रभावशाली साबित होती है, ये तो वक़्त ही बताएगा। फतेहपुर: विपक्षी हमले से साथ झेलने पड़ रहे है भीतरघाती बाण कांग्रेस ने यहां भवानी पठानिया को प्रत्याशी बनाया है जो परिवारवाद की बिसात पर अपनी राजनीतिक पारी का आगाज करने जा रहे है। पर यहां कांग्रेस के लिए अच्छी खबर ये है की परिवारवाद के नाम पर जो कार्यकर्ता कांग्रेस प्रत्याशी का विरोध करने पर उतारू थे वो अब 'मिस्टर इंडिया' होते दिख रहे है। परन्तु कांग्रेस को ये याद रखना होगा कि सियासत महाठगिनी है। यहां अक्सर जो दिखता है वो होता नहीं है। पार्टी के पास चूक की जरा भी गुंजाईश नहीं होनी चाहिए।भाजपा की बात करें तो फतेहपुर की दीवारों पर अब भी आये दिन नए पोस्टर नजर आ रहे है। यहां पोस्टर पॉलिटिक्स खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। जब भाजपा के कृपाल परमार को टिकट देने की सुगबुगाहट थी तो 'अबकी बार चक्की पार' के पोस्टर लग रहे थे और अब जब बलदेव भाजपा के फाइनल कैंडिडेट है तो 'अबकी बार जवाली पार' के पोस्टरों ने फतेहपुर की दीवारों को रंगीन बना रखा है। अब ये विपक्षी हमला है या भीतरघाती बाण कुछ कहा नहीं जा सकता। भाजपा के धुआंधार प्रचार के बावजूद कुछ क्षेत्रों में भाजपा कार्यकर्ताओं का किसानों द्वारा विरोध किया जा रहा है। पर इसमें कोई शक ओ शुबा नहीं है कि पार्टी ने यहां पूरी ताकत झोंक रखी है और भाजपा की ये आक्रामक प्रचार शैली विरोधियों के पसीनी छुड़ा सकती है। फतेहपुर की टक्कर में एक बड़ा नाम डॉ राजन सुशांत भी है। हमारी पार्टी हिमाचल पार्टी के संस्थापक बतौर निर्दलीय मैदान में है और कर्मचारियों और कास्ट फैक्टर से आस लगाए बैठे है। बेशक बीता कुछ वक्त अनुकूल न रहा हो पर राजन सुशांत राजनीति के पुराने घाघ है। वे पांच बार विधायक और एक बार कांगड़ा से सांसद भी रहे है। सियासी माहिरों का मानना है की फतेहपुर के समीकरण बनाने और बिगाड़ने में राजन सुशांत का बड़ा हाथ रहेगा। फतेहपुर से हिमाचल जनक्रांति पार्टी के पंकज कुमार दर्शी और निर्दलीय प्रत्याशी डॉ. अशोक कुमार भी चुनावी मैदान में है, नतीजे के दिन इनके प्रदर्शन पर भी निगाहें रहेगी। मंडी : 'जयराम' की पकड़ और 'वीरभद्र' के नाम का है सवाल ! मंडी लोकसभा का उपचुनाव इस वक्त वीआईपी उपचुनाव बना हुआ है, जिसे राष्ट्रवाद बनाम श्रद्धांजलि के मुद्दे पर लड़ा जा रहा है। यहां एक तरफ वीरभद्र परिवार मैदान में है तो दूसरी ओर पूर्व सैनिक ब्रिगेडियर कुशाल सिंह ठाकुर को भाजपा ने चेहरा बनाया पर। पर मोटे तौर पर बात करें तो कि कुशाल ठाकुर के नाम के साथ खुद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर मैदान में है। मुख्यमंत्री स्वयं घूम घूम कर भाजपा प्रत्याशी के लिए वोट मांग रहे है, एड़ी चोटी का ज़ोर लगाया जा रहा है। मंडी लोकसभा का उपचुनाव निसंदेह भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, यहां मुख्यमंत्री से लेकर विधायकों के रिपोर्ट कार्ड बनने है और इसीलिए भाजपा यहां हर मुनासिब तरकीब अपना रही है। दूसरी तरफ ये उपचुनाव वीरभद्र परिवार के लिए वर्चस्व की जंग है। आगामी समय में होली लॉज का रसूख कितना बरकरार रहता है ये भी काफी हद तक इस उपचुनाव पर निर्भर करेगा। प्रतिभा सिंह स्वयं हो या कोई भी अन्य कांग्रेसी नेता, मंडी में प्रचार प्रसार के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा किये गए विकास के नाम पर वोट मांगे जा रहे है। बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी के जैसे मुद्दे भी जनता को याद करवाए जा रहे है। कई अन्य प्रत्याशी भी मैदान में है जैसे राष्ट्रीय लोकनीति पार्टी की अंबिका श्याम, हिमाचल जनक्रांति पार्टी के मुंशी राम ठाकुर, निर्दलीय उम्मीदवार अनिल कुमार और सुभाष मोहन स्नेही। हालांकि मुख्यमंत्री के प्रचार और वीरभद्र के नाम के आगे ये कितना टिक पाते है ये देखना रोचक होगा। अर्की : उपचुनाव हो रहा रोचक, अपने ही बिगाड़ रहे समीकरण अर्की विधानसभा के उपचुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों की ही परिस्थिति कुछ हद तक एक समान नजर आ रही है। दोनों ही राजनीतिक दलों के लिए अंतर्कलह बड़ी चुनौती बना हुआ है। एक तरफ जहां कांग्रेस के प्रत्याशी संजय अवस्थी के खिलाफ खुलेआम मुखालफत करने वाले राजेंदर ठाकुर कांग्रेस के समीकरण बिगाड़ रहे है तो दूसरी ओर भाजपा से नाराज चल रहे गोविंद राम शर्मा और उनके साथी भी रतन पाल के पक्ष में प्रचार नहीं कर रहे। भाजपा या यूँ कहे की अनुराग ठाकुर के प्रयास के बाद गोविंद राम शर्मा चुनाव न लड़ने पर सहमत ज़रूर हो गए थे, मगर वो पूरी तरह मान गए है ऐसा नहीं कहा जा सकता। ये स्पष्ट है की यदि इस बार रतन पाल अच्छा नहीं कर पाते है तो 2022 में गोविंदराम की टिकट राह ओर प्रशस्त होगी। ऐसा ही कुछ संजय अवस्थी के साथ भो होगा। संजय दूसरी दफे अर्की से चुनाव लड़ रहे है। इससे पहले उन्हों 2012 में चुनाव लड़ा था। अगर संजय अच्छा परफॉर्म करते है तो आल गुड पर यदि इस बार भी वे अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाते है तो सवाल तो उठेंगे ही। ताजा स्थिति की बात करें तो निसंदेह भाजपा का प्रचार कुछ तेजी पकड़ता हुआ दिख रहा है, पर संजय अवस्थी को क्षेत्र में लगातार सक्रीय होने का लाभ भी मिल रहा है। राजेंद्र ठाकुर की नाराजगी यहां कांग्रेस की चिंता का सबब है तो गोविंदराम का खफा होना भजाईयों के लिए परेशानी।
हिमाचल प्रदेश में उपचुनाव में परिवारवाद शुरुआत से ही मुख्य मुद्दा बना हुआ है। कभी भाजपाई कांग्रेस पर वंशवाद के आरोप लगाती है तो कभी कांग्रेस भाजपा पर। वार पलटवार का सिलसिला बदस्तूर जारी था पर फिर भाजपा ने चेतन बरागटा का टिकट काट नीलम सरैक को टिकट दे एक उदहारण पेश करने कि कोशिश की कि भाजपा परिवारवाद नहीं करती। खुद पलड़ा झाड़ने के बाद अब भाजपा कांग्रेस को परिवारवाद के मुद्दे पर खूब घेर रही है। भाजपा द्वारा कई ब्यान दिए गए जिसका जवाब कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप राठौर ने दिया है। कुलदीप राठौर ने कहा की अनुराग ठाकुर को जब पहली बार चुनाव लड़ाया था तब वह भाजपा सदस्य तक नहीं थे, क्या यह परिवारवाद नहीं था। अगर किसी परिवार का कोई व्यक्ति अच्छा काम कर रहा है उसे टिकट देने में कोई बुराई नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस से ज़्यादा परिवारवाद भाजपा में है। इसी के साथ कुलदीप ने भाजपा को कई अन्य मुद्दों पर भी घेरा। उन्होंने कहा की जब भाजपा शहीदों के नाम पर वोट मांग सकती है तो क्या कांग्रेस स्व. वीरभद्र सिंह के नाम पर नहीं मांग सकती, जिन्होंने हिमाचल प्रदेश को ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा लाशों के ऊपर राजनीति कर रही है। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में सत्ता विरोधी रुझान आज देखने को मिल रहा है। उपचुनाव में महंगाई, बेरोजगारी, बाहरी लोगों को रोजगार देने और विकास का मुद्दा होगा। प्रतिदिन बढ़ रही महंगाई पर भाजपा सरकार ने मौन धारण कर लिया है। इस पर भाजपा सरकार न तो रोक लगा पा रही है और न ही इस पर जवाब दे पा रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार दिल्ली से कर्ज ले रही है पर कर्ज में लिया गया पैसा कहां पर व्यय किया जा रहा है इसका कोई पता नहीं चल पा रहा है। जब इस पर भाजपा नेता और मुख्यमंत्री से जवाब मांगा जाता है तो जवाब नहीं दिया जा रहा है। इस पर मौन न रखकर मुख्यमंत्री श्वेत पत्र जारी करें। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का संगठन एकजुट है, मगर भाजपा में विरोध के स्वर देखने को मिल रहे हैं। कांग्रेस की मजबूती के कारण आज भारतीय जनता पार्टी बैकफुट पर आ गई है।
केंद्र और राज्य सरकार से खफा हिमाचल किसान सभा ने उपचुनाव में सरकार का विरोध करने का फैसला लिया है। हिमाचल किसान सभा के राज्य अध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह तंवर ने कहा कि केंद्र और राज्य की भाजपा की डबल इंजन की सरकार ने आम आदमी और किसानों पर डबल मार की है। महंगाई चरम पर है। अन्नदाता को अपने उत्पाद के उचित दाम नहीं मिल रहे हैं। डॉ. तंवर ने कहा कि केंद्र सरकार कृषि कानूनों के जरिये किसानों की जमीन को पूंजीपतियों के हवाले करने की साजिश रच रही है। प्रदेश सरकार की बेरुखी से किसानों पर चौतरफा मार पड़ रही है। प्रदेश में जहां उपचुनाव हो रहे हैं, वहां सभी जगह किसानों-बागवानों और सब्जी उत्पादकों की फसलें बुरी तरह से पिटी हैं। सेब सीजन के दौरान सरकार ने बागवानों की खिल्ली उड़ाई है। जुब्बल-कोटखाई में बागवानों को सेब का उचित दाम नहीं मिला। प्रदेश के 45 खंडों में सेब पैदा होता है। शिमला जिले के जुब्बल-कोटखाई खंड में सेब का सबसे ज्यादा उत्पादन किया जाता है। इस बार प्राकृतिक आपदा के साथ फल मंडी में पड़ी मार से बागवानों को सेब की उत्पादन लागत तक वापस नहीं आई। हिमाचल किसान सभा का कहना है कि फतेहपुर के मंड क्षेत्र के किसानों की खरीद केंद्र की समस्या अभी भी बरकरार है। अर्की के सब्जी उत्पादक भी मंदी की मार से अछूते नहीं रहे। इस बार टमाटर की दुर्दशा हुई है। सौ रुपये से लेकर डेढ़ सौ रुपये तक भी टमाटर की क्रेट बिकी। मंडी संसदीय क्षेत्र में सेब, सब्जी, मक्की जैसे सभी उत्पादों पर मार तो पड़ी साथ ही फोरलेन से प्रभावित लोग भी लंबे समय से अपनी मांग को लेकर संघर्षरत हैं। बल्ह क्षेत्र की उपजाऊ जमीन को प्रदेश और केंद्र सरकार हवाई अड्डे के लिए अधिग्रहण करने पर उतारू है।
उपचुनाव में बढ़ती महंगाई को कांग्रेस ने मुख्य मुद्दा बनाया है। इन्ही मुद्दों को लेकर कांग्रेस जनता के बीच है। लगातार बढ़ रहे पेट्रोल डीजल के दामों ने महंगाई को रफ़्तार दे दी है। दाल, चीनी, खाद्य तेल सहित एलपीजी के दामों ने रसोई का जायका खराब किया है। ऐसे में कांग्रेस अपने प्रचार अभियान में महंगाई की बात कर जनता से कनेक्ट करने का प्रयास कर रही है। जाहिर है हिमाचल में सत्ता के सेमीफाइनल के तौर पर हो रहे चार उपचुनाव में महंगाई का मुद्दा खूब चर्चा में रहने वाला है। प्रदेश की आधी आबादी की अगुवाई करने वाली महिलाएं रसोई में इस्तेमाल होने वाले घरेलू सिलेंडर का मूल्य एक हजार रुपये पार जाने से निराश हैं। यह देखना दिलचस्प रहेगा कि रसोई गैस सिलेंडर के साथ-साथ एक सौ रुपये प्रति लीटर पहुंच चुके पेट्रोल मूल्य को लेकर आमजन की प्रतिक्रिया क्या रहती है, क्या जनता इन मुद्दों पर वोट डालेगी या अन्य मुद्दे ही वोट का आधार बनेंगे। वहीँ बेरोजगारी के मुड़े पर बह कांग्रेस सरकार को घेर रही है। उधर भाजपा की बात करें तो प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के जरिये किसानों के खातों में छह हजार रुपये की धनराशि निरंतर आ रही है। इसी तरह वृद्धावस्था पेंशन से भी लोगों को राहत मिली है। इस पर सरकार ने 1.91 लाख सरकारी कर्मचारियों को छह फीसद महंगाई भत्ता का लाभ दिया है। इन योजनाओं के अलावा भी कई ने जनकल्याणकारी योजनाएं है जिनके सहारे भाजपा जीत की आस में है। जनता के बीच इन योजनाओं और विकास ने नाम पर वोट माँगा जा रहा है और यह भाजपा का मुद्दा है। विकास के मुद्दे पर चुनाव, जनता साथ : जयराम ठाकुर हिमाचल के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का कहना है भाजपा उपचुनाव में विकास को आधार बनाकर चुनाव लड़ेगी। कोरोना महामारी के कारण समूचा विश्व संकट के दौर से जूझता रहा और ऐसे गंभीर संकटकाल में केंद्र सरकार ने किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के तहत सालाना छह हजार रुपये बैंक खातों में समयानुसार डाले। प्रदेश सरकार के सीमित संसाधन होने के बावजूद सरकारी कर्मचारियों व पेंशनरों को छह फीसद महंगाई भत्ता दिया। अन्य कल्याणकारी योजनाओं से भी हमने प्रदेश का हर संभव विकास किया है, हर वर्ग का ख्याल रखा है। भाजपा सरकार के कार्यकाल में हिमाचल प्रदेश में अथाह विकास हुआ है और जनता मौका दे तो आगे भी ऐसा ही होगा। उन्नति के नए आयाम स्थापित कर रही भाजपा सरकार : अनुराग ठाकुर केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जहां देश उन्नति के नए आयाम स्थापित कर रहा है, वहीं हिमाचल प्रदेश में भी मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के नेतृत्व में विकास के नए आयाम प्रस्तुत किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार किसानों की हितैषी है। किसानों की फसलों को सुरक्षित रखने के लिए शीघ्र ही पूरे देश में एक लाख करोड़ की लागत से कोल्ड स्टोर बनाए जाएंगे। साथ ही केंद्र सरकार की ओर से जल्द किसान रेलगाड़ियां चलाई जाएंगी, जिससे किसान अपनी फसलें पूरे देश में अपनी कीमत पर बेच सकेंगे। अनुराग ठाकुर ने कहा कि इन उपचुनाव में भाजपा के प्रत्याशी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केंद्रीय मंत्री अमित शाह व राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने तय किए हैं ओर ये सभी प्रत्याशी विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगे। महंगाई ही मुद्दा, जनता मांग रही जवाब : मुकेश नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने कहा कि उपचुनाव में कांग्रेस महंगाई के मुद्दे पर जनता के बीच है। कमर तोड़ महंगाई से आम आदमी त्रस्त है। आज गरीब परिवार के लिए दो वक्त का खाना पकाना मुश्किल हो गया है। केंद्र सरकार नाकाम रही और प्रदेश की भाजपा सरकार या फिर डबल इंजन की सरकार ने आम आदमी को दोहरे ढंग से धोया है। उपचुनाव में भाजपा को समझ नहीं आ रहा है कि किस तरह से जनता का सामना करे। बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी इस उपचुनाव में बड़े मुद्दे है और कांग्रेस इन्हें लेकर जनता के बीच है। जनता भाजपा को सबक सीखाने के मन बना चुकी है। खामियाजा भुगतने को तैयार रहे भाजपा : शांडिल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ कर्नल धनीराम शांडिल का कहना है कि एक संसदीय क्षेत्र और तीन विधानसभा क्षेत्रों में होने जा रहे उपचुनाव में बेरोजगारी और महंगाई बड़े मुद्दे है। भाजपा राज में जनता त्रस्त है, अमीर और आमिर हो रहा है, जबकि गरीब के सामने दो वक्त की रोटी का संघर्ष है। उपचुनाव में कांग्रेस इन दोनों मुद्दों पर जनता के बीच है और आज प्रदेश की जनता भाजपा से जवाब मांग रही है। बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी का खामियाजा भुगतने को भाजपा तैयार रहे। मुद्दों से भटकाने का प्रयास, पर जनता भटकेगी नहीं : विक्रमादित्य शिमला ग्रामीण के विधायक विक्रमादित्य सिंह ने कहा कि मंडी संसदीय क्षेत्र का उपचुनाव महिलाओं का चुनाव है। जब रसोई में तड़का लगता है तो महिलाएं महंगाई के आंसू रोती हैं। महंगाई और बेरोजगारी इस उपचुनाव में बड़े मुद्दे है। प्रदेश में अन्य राज्यों के लोगों को नौकरी दी जा रही है। यह चुनाव बेरोजगारों का है। विक्रमादित्य ने कहा कि भाजपा व मुख्यमंत्री लोगों को मुद्दों से भटकाने का प्रयास कर क्षेत्रवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। यह व्यक्ति विशेष का नहीं, केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ चुनाव है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पास धनबल की कमी है, मगर जनता का बल साथ है। विपरीत परिस्थितियों में भी चुनाव लड़ेंगे और जनता के आशीर्वाद से चुनाव जीतेंगे।
पूर्व मंत्री कौल सिंह ठाकुर द्वारा सुखराम परिवार के खिलाफ कही गई बातों को लेकर कांग्रेस पार्टी में बवाल मचा हुआ है। कॉल सिंह लगातार सुखराम परिवार पर टिप्पणियां कर रहे है जिसका जवाब आश्रय शर्मा ने दिया है। पूर्व में मंडी लोकसभा से कांग्रेस के प्रत्याशी रहे आश्रय शर्मा ने कॉल पर तीखा पलटवार किया है। वीडियो संदेश जारी करके आश्रय शर्मा ने कहा कि सीएम पद का जो सौभाग्य मंडी जिला को आज मिला है, वो वर्षों पहले मिल जाता, यदि कौल सिंह ठाकुर ने उस वक्त पंडित सुखराम का साथ दिया होता। उन्होंने कहा कि सभी जानते हैं कि उस वक्त जिला की पीठ किसने जमीन पर लगाई थी। आश्रय ने कहा कि पार्टी हाईकमान ने उनका टिकट पिछले चुनाव में मिली हार के चलते काटा है और अगर पार्टी ने यह मापदंड तय किया है तो फिर आगामी विधानसभा चुनावों में कौल सिंह ठाकुर और उनकी बेटी चंपा ठाकुर को भी टिकट न दिया जाए, क्योंकि ये दोनों भी पिछले विधानसभा चुनावों में हार का सामना कर चुके हैं। आश्रय शर्मा ने कहा कि उन्होंने कभी किसी के पैर पकड़कर टिकट नहीं मांगा। आदर सम्मान के चलते वे सभी के पांव छूते हैं और उसमें कौल सिंह ठाकुर भी शामिल हैं। 2019 के चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने खुद उन्हें पार्टी में आने के लिए कहा था। उस वक्त राहुल गांधी ने कहा था कि पंडित सुखराम के साथ उनका राजनैतिक नहीं बल्कि पारिवारिक रिश्ता है। आश्रय शर्मा ने कहा कि जी 23 का जो ग्रुप बना है, उसमें हिमाचल प्रदेश से सिर्फ कौल सिंह ठाकुर ही शामिल हैं। कौल सिंह ठाकुर ने भी उसमें अपने हस्ताक्षर किए हैं और ऐसा करने वाले कौल सिंह ठाकुर प्रदेश के इकलौते कांग्रेसी नेता हैं। कौल सिंह ठाकुर खुद सोनिया और राहुल गांधी के खिलाफ होकर पार्टी को तोड़ने की कोशिशें कर रहे हैं। उन्हें ऐसी हरकतों से बचना चाहिए और संगठन की मजबूती के लिए काम करना चाहिए।
जुब्बल-कोटखाई विधानसभा क्षेत्र से टिकट कटने के बाद चेतन बरागटा मंच पर फूट-फूटकर रोए। चेतन भावुक हो उठे और कहा, पिता की अस्थियां विसर्जित करके घर पहुंचा तो प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने फील्ड में जाने के आदेश दिए। मुझे कहा गया कि आप ही भाजपा का चेहरा होंगे। गांव-गांव जाकर प्रचार शुरू करें। चेतन बोले बीते तीन माह से मैं जनता के बीच जा रहा हूं और आज भाजपा संगठन ने मुझे परिवारवाद की उपज कहकर बाहर का रास्ता दिखा दिया है। 15 वर्ष संगठन के लिए राष्ट्रीय स्तर से प्रदेश स्तर तक कार्य किया है जिसका इनाम पार्टी ने दिया। इसके बाद समर्थकों से मंथन करने के उपरांत चेतन बतौर निर्दलीय मैदान में है और भाजपा की मुश्किलें बढ़ चुकी है।
नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को चेताया है कि वह पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के स्वजन व कांग्रेसियों को धमकाना बंद करें। अग्निहोत्री ने कहा कि बदलाव का दौर शुरू हो चुका है। कांग्रेसी अब अपना मुंह बंद नहीं रखेंगे। प्रदेश व केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों से लोगों को घर-घर जाकर अवगत करवाएंगे। ये बात मुकेश अग्निहोत्री ने मंडी संसदीय उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी प्रतिभा सिंह कि जनसभा को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए कांग्रेस के लोगों को मुंह बंद रखने को कह रहे हैं। एक महिला व उसके बेटे को डरा रहे हैं। मंडी का विकास कांग्रेस की देन है। मुख्यमंत्री ने चार साल में सिर्फ हेलीकाप्टर उड़ाया। विकास के नाम पर नहीं सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए लोगों को गुमराह कर रहें है। नेता प्रतिपक्ष ने जयराम ठाकुर से पूछा कि बल्ह में प्रस्तावित एयरपोर्ट का क्या हुआ। एयरपोर्ट अब कांग्रेस बनाएगी। अगर मंडी आपकी तो सड़कों की हालत इतनी दयनीय क्यों हैं। उन्होंने कहा कि जयराम ठाकुर अगर हेलीकाप्टर से उतरते तो सड़कों की हालत ऐसी नहीं होती। लोग खुलकर सामने आएं। सरकार से डरने की जरूरत नहीं। अब प्रतिभा की गाड़ी चल पड़ी है। कांग्रेस को खामोश कहने वालों को जनता चारों खाने चित्त करेगी। यह वीरभद्र परिवार का कर्ज चुकाने का समय है। पैसे से नहीं जनता के दम पर चुनाव जीतेंगे। सुखराम परिवार का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि कुछ लोग घूंघट में रहकर काम करने के बजाय खुलकर सामने आएं, यहीं उचित समय है। बाद में गाड़ी छूट जाएगी।
मंडी संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी एवं पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह की धर्मपत्नी प्रतिभा सिंह ने मंडी रैली के दौरान ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर के चुनाव लड़ने पर कहा था कि चुनाव सेना का मैदान नहीं होता। प्रतिभा के इस बयान पर भाजपा ने पलटवार किया है। इस बयान को लेकर भाजपा प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने कांग्रेस प्रत्याशी प्रतिभा सिंह को खूब खरी-खोटी सुनाई है। हिमाचल भाजपा प्रभारी ने कहा कि तथाकथित महलों में जन्मी और महलों में रहने वाली प्रतिभा सिंह को क्या पता कि सैनिकों की चुनौतियां क्या होती हैं। सुविधा संपन्न जीवन जीने वालों को सब कुछ मैदान की तरह आसान लगता है। दूसरी ओर सैनिक देश के लिए अपने घर और परिवार से दूर कभी बर्फीले पहाड़ों, कभी तपते रेगिस्तानों तो कभी उफनते समंदर का सामना करते हैं। वे मैदान में नहीं, दुश्मन की गोलियों के बीच सीमाओं पर बने बंकरों में रहकर देश की रक्षा करते हैं।अविनाश राय खन्ना ने कहा कि सैनिकों का काम तो हर वक्त चुनौतियों को स्वीकार करना है। सैनिक हार-जीत की चिंता किए बिना युद्ध के हर मोर्चे पर डटा रहता है। वह कभी भी मैदान नहीं छोड़ता। प्रतिभा सिंह बताएं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के भय से मैदान क्यों छोड़ा था, जो आज राजनीतिक अखाड़े की बात कर रही हैं। उन्होंने प्रतिभा सिंह को दो टूक जवाब देते हुए कहा कि पहले ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर ने सेना में रहते हुए देश की रक्षा की, अब मंडी संसदीय सीट में भारी बहुमत से जीत कर वे जनता की सेवा करेंगे। उन्होंने प्रतिभा सिंह से पूछा कि जब वह पूर्व में सांसद थीं तो जनता के बीच घूमने की मंशा क्यों नहीं रखती थी। आज जब उन्हें लगता है कि सहानुभूति लाकर उनकी राह आसान हो सकती है तो चुनाव लड़ रही हैं, ऐसा संभव नहीं होगा। अविनाश राय खन्ना ने कहा कि जनता प्रतिभा सिंह को मौका देकर देख चुकी है। उन्हें अब तक दो बार सांसद बनाया गया, लेकिन उन्होंने जीत कर जनता की सुध लेना भी गवारा नहीं समझा। यही वजह है, कि उन्हें एक चुनाव में हार देखनी पड़ी तो दूसरे चुनाव में वो बीजेपी का सामना करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाईं। भाजपा नेता ने कहा कि मंडी संसदीय सीट समेत तीनों विधानसभा सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों की ही जीत होगी।
भाजपा के प्रचारकों की लिस्ट में अनुराग ठाकुर के अलावा केंद्र से किसी नेता का नाम नहीं है। दिलचस्प बात ये है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा हिमाचल से हैं लेकिन उनका नाम भी इस लिस्ट में शामिल नहीं हैं। पार्टी के प्रचार करने वाले नेताओं की फेहरिस्त में पार्टी के अध्यक्ष सुरेश कश्यप, मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार, पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल, केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर, हिमाचल भाजपा प्रभारी अविनाश राय खन्ना व सह प्रभारी संजय टंडन शामिल हैं। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व से कम ही नेताओं के आने की उम्मीद है। पार्टी की ओर से चुनाव प्रचार में आने वाले नेताओं की जो सूची चुनाव आयोग को सौंपी गई है, जिसमें सभी नेता हिमाचल से संबंधित हैं। प्रदेश सरकार में मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर, सुरेश भारद्वाज, वीरेंद्र कंवर, बिक्रम सिंह ठाकुर, गोविंद सिंह ठाकुर, डॉक्टर राजीव सैजल, डॉक्टर राजीव बिंदल, सुखराम चौधरी, राकेश पठानिया, इंदु गोस्वामी, त्रिलोक कपूर और राकेश जम्वाल के नाम इस सूची में शामिल हैं। ये सभी नेता मंडी फतेहपुर अर्की और जुब्बल कोटखाई उपचुनाव में उतरे प्रत्याशियों के प्रचार में उतरेंगे। उधर कांग्रेस ने भी स्टार प्रचारकों की सूची जारी कर निर्वाचन आयोग को भी भेज दी है। इनमें कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू, राज बब्बर, कन्हैया कुमार, पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, सचिन पायलट और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा प्रमुख हैं। स्टार प्रचारकों में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, प्रदेश प्रभारी राजीव शुक्ला, सह प्रभारी गुरकीरत सिंह कोटली और संजय दत्त भी शामिल हैं। इनके अलावा प्रदेश कांग्रेस से पार्टी प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर, नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री, आशा कुमारी, कर्नल धनीराम शांडिल, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू, विधायक राजेंद्र राणा, विधायक विक्रमादित्य सिंह, पूर्व मंत्री कौल सिंह ठाकुर और सेवानिवृत्त मेजर जरनल धर्मवीर सिंह राणा को इस लिस्ट में शामिल किया गया है। शाह- राजनाथ कर सकते है रैली बेशक भाजपा के स्टार प्रचारकों की लिस्ट में केंद्रीय नेताओं के नाम न हो लेकिन पार्टी कुछ बड़े नेताओं की जनसभा करवा सकती है, विशेषकर मंडी संसदीय क्षेत्र में। मंडी में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की जनसभा होगी। इनके अतिरिक्त भी कई नेता चुनावी संग्राम में कूद सकते है। मांग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली की भी है लेकिन प्रधानमंत्री उपचुनाव में प्रचार करेंगे ऐसी संभावना कम ही है।
हिमाचल प्रदेश के संसदीय क्षेत्र मंडी और अन्य तीन विधानसभा क्षेत्रों में होने वाले उपचुनाव में 24 उम्मीदवार चुनावी मैदान में है। मंडी संसदीय क्षेत्र में सबसे ज्यादा 8 उम्मीदवारों ने नामांकन पत्र दाखिल किया है। विधानसभा क्षेत्र फतेहपुर में 7, अर्की में 4 और जुब्बल कोटखाई में 5 उम्मीदवारों ने पर्चा भरा है। 11 को नामांकन छंटनी होगी और 13 तक प्रत्याशी नामांकन वापस ले सकेंगे। 28 अक्टूबर की शाम चुनाव प्रचार थम जाएगा। सभी सीटों पर 30 अक्टूबर को मतदान होगा, जबकि मतगणना और परिणाम दो नवंबर को घोषित होंगे। नामांकन के अंतिम दिन शुक्रवार को 15 प्रत्याशियों ने पर्चे दाखिल किए। मंडी संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी प्रतिभा सिंह ने नामांकन पत्र भरा। कांग्रेस के सुंदर सिंह ठाकुर (कवरिंग) राष्ट्रीय लोक नीति पार्टी अंबिका श्याम, भारतीय जनता पार्टी से प्रियंका शर्मा ने (कवरिंग) सुभाष मोहन और अनिल कुमार ने निर्दलीय पर्चा भरा। फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी बलदेव ठाकुर और जीत कुमार ने कवरिंग नामांकन पत्र दाखिल किया है। इसी तरह अंतिम दिन इसी तरह अर्की विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी रतन सिंह पाल और निर्दलीय जीतराम ने नामांकन पत्र दाखिल किया है। जुब्बल-कोटखाई विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी रोहित ठाकुर, भाजपा प्रत्याशी नीलम सरैक, चेतन बरागटा, सुमन कदम और केवल राम नेगी ने निर्दलीय नामांकन पत्र भरा। संसदीय क्षेत्र मंडी व अर्की, फतेहपुर और जुब्बल कोटखाई उपचुनाव के लिए बेशक 24 उम्मीदवार मैदान में है लेकिन जाहिर में इनमें से सिर्फ चार को जनता का आशीर्वाद मिलेगा। धनतेरस के दिन 2 नवंबर को उपचुनाव के नतीजे आएंगे, ऐसे चार उम्मीदवारों को जहाँ दिवाली से पहले होली मनाने का मौका मिलेगा तो अन्य को मायूस होना पड़ेगा। मान गए गोविन्द और परमार नामांकन के आखिरी दिन तक भाजपा के लिए अर्की , फतेहपुर और जुब्बल कोटखाई में बगावत की स्थिति बनी हुई थी। हालांकि अंतिम दिन भाजपा ने अर्की से पूर्व विधायक गोविंद राम शर्मा और फतेहपुर से पूर्व राज्यसभा सांसद कृपाल परमार को मना लिया। जुब्बल-कोटखाई से चेतन बरागटा ने आजाद उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन भरा। फतेहपुर और जुब्बल पहुंचे सीएम, अर्की में अनुराग फतेहपुर में भाजपा प्रत्याशी बलदेव ठाकुर और जुब्बल-कोटखाई में नीलम सरैक के परचा भरने के दौरान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर खुद मौजूद रहे। कृपाल परमार को तो सीएम जयराम अपने साथ हेलीकाप्टर में शिमला के जुब्बल-कोटखाई लेकर गए। उधर अनुराग ठाकुर अर्की से पार्टी प्रत्याशी रतन सिंह पाल के नामांकन में पहुंचे। अनुराग ने गोविन्द राम शर्मा से भी मुलाकात की और उन्हें मनाने में बड़ी भूमिका निभाई। भारद्वाज के खिलाफ लगे नारे नीलम सरैईक के परचा भरने के बाद आयोजित कार्यक्रम में लोगों की मौजूदगी कम रहने से यहां कुर्सियां भी खाली रह गईं। जुब्बल-कोटखाई में भाजपा का टिकट न मिलने से नाराज चेतन बरागटा के नामांकन के दौरान बड़ी संख्या में लोग जुटे। सड़कों पर इन्होंने भाजपा प्रत्याशी के साथ जा रही गाड़ियां तक रोक डालीं। चेतन बरागटा के समर्थकों ने जुब्बल-कोटखाई के चुनाव प्रभारी सुरेश भारद्वाज के खिलाफ नारे तक लगा दिए। प्रतिभा सिंह के साथ उमड़ी भीड़ कुछ तो कहती है वहीं मंडी में कांग्रेस टिकट पर पूर्व सांसद एवं पूर्व सीएम दिवंगत वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह ने अंतिम दिन शुक्रवार को नामांकन भरा। इस दौरान मंडी के सेरी मंच में प्रतिभा सिंह के कार्यक्रम में जबरदस्त भीड़ उमड़ी। हालात ऐसे थे कि कुर्सियां भी कम पड़ गईं और समर्थकों की भीड़ को देखते हुए बाद में गेट तक बंद करना पड़ा। मुख्यमंत्री के गढ़ में प्रतिभा सिंह के समर्थन में उमड़ी भीड़ ने संकेत दिया कि आगामी उपचुनाव में जबरदस्त घमासान देखने को मिलेगा। नेताओं वाले है ब्रिगेडियर के तेवर मंडी संसदीय क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार ब्रिगेडियर खुशाल चंद के लिए चुनावी राजनीति नई जरूर है लेकिन ब्रिगेडियर एक मंजे हुए नेता की तरह तेवर में है। बीते दिनों नामांकन भरने के बाद पहले ब्रिगेडियर ने भारत माता की जय के नारे के साथ अपने भाषण की शुरुआत की। फिर देवी-देवताओं, शहीदों को नमन किया और मंडी से सांसद रहे दिवंगत रामस्वरूप शर्मा को श्रद्धांजलि दी। ब्रिगेडियर ने पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत वीरभद्र सिंह को भी श्रद्धांजलि दी और कई दिल जीत लिए। उन्होंने कहा कि वे फौजी है, राजनीति की उतनी समझ नहीं, मगर सेरी मंच उनके लिए नया नहीं है।1970 से इससे जुड़े और सेना में जाने से पहले जब पटवारी थे तो सामने ही उनका दफ्तर हुआ करता था। ब्रिगेडियर ने कहा कि मैं जानता हूं कि यहां की जरूरतें और अपेक्षाएं क्या हैं। मैं केंद्र के सामने हिमाचल के मुद्दे रखूंगा।
फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र, कांग्रेस का वो गढ़ जिसे जीत पाना भाजपा के लिए कभी आसान नहीं रहा। पिछले तीन चुनाव में कांग्रेस यहां जीत की हैट्रिक लगा चुकी है। कारण चाहे भाजपा का कमज़ोर संगठन और आपसी मतभेद रहे हो या फतेहपुर की जनता का सुजान सिंह पठानिया पर भरोसा, कांग्रेस यहां हर बार जीती। अब सुजान सिंह पठानिया के निधन के बाद ये उपचुनाव भाजपा के लिए वापसी का एक मौका है और शायद इसीलिए भाजपा ने यहां अंतर्कलह साधने में पूरा ज़ोर लगा दिया। रूठों को मनाने की जो जुगत भाजपा ने फतेहपुर में लगाईं है उसे देख सभी हैरान है। कांग्रेस ने भी जैसे - तैसे विद्रोह और अंतर्कलह की स्थिति को कुछ हद तक साध ही ली है, बाकी नतीजे तय करेंगे। परन्तु फतेहपुर का चुनाव सिर्फ इन दो मुख्य राजनीतिक दलों तक ही सीमित नहीं है। इन उपचुनाव के लिए कुल 6 प्रत्याशियों ने नामांकन भरा है और ये स्पष्ट है कि यहां निर्दलीय उम्मीदवार समीकरण बना और बिगाड़ सकते है। फतेहपुर में कांग्रेस ने भवानी पठानिया तो भाजपा ने बलदेव ठाकुर को मैदान में उतारा है। इनके अलावा यहां राजन सुशांत (निर्दलीय ), पंकज दर्शी (हिमाचल जनक्रांति पार्टी), प्रेमचंद (निर्दलीय), डॉ. सोमाल (निर्दलीय) भी मैदान में है। भाजपा को बलदेव के 'बल' से उम्मीद भाजपा ने यहां पूर्व प्रत्याशी कृपाल परमार का टिकट काट बलदेव ठाकुर को तरजीह दी है। पूर्व में पार्टी के मंडल अध्यक्ष व वर्तमान में प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य बलदेव ठाकुर लम्बे समय से पार्टी से जुड़े है और एक किसान परिवार से संबंध रखते हैं। बलदेव ठाकुर ने अब तक दो चुनाव लड़े हैं। पहला 2012 में भाजपा प्रत्याशी के तौर पर और दूसरा 2017 में एक आजाद उम्मीदवार के तौर पर। वे दोनों ही चुनाव हारे हैं। बलदेव ठाकुर वर्तमान में प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य भी हैं। 2017 में पार्टी से बाहर होने के बाद लोकसभा के चुनाव में उन्हें वापस संगठन में जगह दी गई थी और अब उन्हें भाजपा ने विधानसभा उपचुनाव के लिए अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया है। परन्तु कृपाल परमार के समर्थक भाजपा के इस निर्णय से बिलकुल भी संतुष्ट नहीं थे। शुरुआत से ही राज्यसभा के सांसद रह चुके प्रदेश भाजपा के पूर्व उपाध्यक्ष, पूर्व महासचिव कृपाल परमार का नाम प्रत्याशियों की सूची में सबसे आगे चल रहा थ। समर्थक उनका टिकट लगभग तय मान रहे थे परन्तु क्षेत्र में विरोध होने के चलते उनका टिकट कट गया। उनके अलावा जगदेव ठाकुर और रीता ठाकुर का नाम भी आगे आया परन्तु अंत में बलदेव बाज़ी मार गए। कृपाल परमार का टिकट काटने पर फतेहपुर भाजपा मंडल के सभी सदस्यों ने संयुक्त इस्तीफे सौंप दिए थे। पार्टी हाईकमान की मनमानी को मानने के लिए कृपाल परमार के समर्थक बिलकुल भी तैयार नहीं थे। परन्तु मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने स्थिति समय रहते अंडर कण्ट्रोल कर ली। मुख्यमंत्री प्रत्याशी बलदेव ठाकुर के नामांकन के लिए फतेहपुर गए और कृपाल परमार से बात की। वे कृपाल परमार को शांत कर हेलिकॉप्टर में उन्हें अपने साथ फतेहपुर से जुब्बल कोटखाई भी ले आए। बाद में वह शिमला भी सीएम के साथ ही आए जिससे फतेहपुर यहां बगावत का खतरा टल गया। बता दें की 15 साल से भी ज्यादा वक्त में ये पहली दफे है जब इस सीट पर भाजपा का कोई बड़ा बागी नहीं होगा। फतेहपुर भाजपा में अंतर्कलह की ये गाथा 2012 से शुरू हुई है । फतेहपुर में भाजपा ने बलदेव ठाकुर को 2012 में टिकट दिया था। वे चुनाव लड़े परन्तु जीत नहीं पाए। इसके बाद 2017 में बलदेव ठाकुर का टिकट काट कृपाल परमार को टिकट दिया गया और बलदेव ठाकुर ने भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ बतौर आजाद उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा। बलदेव तो नहीं जीत पाए परन्तु उनकी बगावत ने भाजपा के समीकरण भी बिगाड़ दिए। इस बार पार्टी ने उल्टा किया और कृपाल का टिकट काट कर बलदेव को दे दिया। बहरहाल मुख्यमंत्री ने भले ही बाहरी तौर पर कृपाल परमार को समझा लिया हो, बेशक हाथ मिल गए हो लेकिन दिल मिले है या नहीं ये आकलन का विषय होगा। क्या कृपाल के समर्थक दिल से बलदेव का साथ देंगे, ये ही यक्ष प्रश्न है। कांग्रेस में जय भवानी का नारा बुलंद कांग्रेस ने फतेहपुर उपचुनाव में पूर्व विधायक सुजान सिंह पठानिया के बेटे भवानी सिंह पठानिया को टिकट दिया है। भवानी सिंह पठानिया कॉर्पोरेट जगत की नौकरी छोड़कर अपने पिता स्व सुजान सिंह पठानिया की राजनैतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए फतेहपुर लौटे है। लगातार वंशवाद का हल्ला मचने के बावजूद पार्टी ने उन्ही पर भरोसा जताया है। इस पर कई कांग्रेसी बेहद नाराज़ हुए। निशावर सिंह ने तो बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान भी कर दिया था। टिकट आवंटन से नाराज़ कार्यकर्ताओं ने भवानी पठानिया को चुनावी रणक्षेत्र में चुनौती देने की बात भी कही थी परन्तु अब सब शांत है। अब भवानी कांग्रेस से अकेले ही मैदान में है और मात तौर पर कांग्रेस में जय भवानी का नारा बुलंद है। पर भवानी और विधानसभा के बीच अंतर्कलह की खाई होगी जिसे पाटना भवानी के सामने चुनौती है। अलबत्ता कोई बागी मैदान में नहीं है लेकिन सभी एकजुट होकर बहनी का साथ देंगे ऐसी स्थिति नहीं दिख रही। 7 बार विधायक स्व. पठानिया भवानी पठानिया के पिता एवं पूर्व मंत्री स्व. सुजान सिंह पठानिया 1977 से लेकर 2017 तक सात बार विधायक रहे। वह 1977, 1990, 1993, 2003 में ज्वाली विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर आए। उसके बाद 2009 के उप चुनाव में भी ज्वाली से जीते थे। बदले परिसीमन के बाद वर्ष 2012 और 2017 के चुनाव में वे फतेहपुर सीट से जीते। सुजान सिंह पठानिया वीरभद्र सिंह के बेहद करीबी माने जाते थे। वीरभद्र सरकार में वह दो बार प्रदेश के मंत्री भी रहे हैं। 1977 में सुजान सिंह पठानिया ने जनता पार्टी में शामिल होने के लिए सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। 1980 में सुजान सिंह पठानिया कांग्रेस में शामिल हो गए थे। पिता की इस मजबूत राजनैतिक विरासत की बिसात पर भवानी एक मंजे हुए नेता की तरह नाप -तोल कर अपने राजनीति कदम आगे बढ़ाते दिख रहे है।
पहली बार 1952 के चुनाव में राजकुमारी अमृत कौर व गोपी राम निर्वाचित हुए थे, उस दौरान मंडी से दो सांसद चुने गए थे। इसके बाद मंडी रियासत के राजा जोगिंद्र सेन ने 1962 तक प्रतिनिधित्व किया। फिर सुकेत रियासत के राजा ललित सेन विजयी रहे थे। कांग्रेस ने फिर रामपुर रियासत के वीरभद्र सिंह को यहां से मैदान में उतारा। 1977 से 1979 की अवधि में जनता पार्टी के गंगा सिंह ने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। तब पहली बार यहां कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था। 1980 के चुनाव में फिर वीरभद्र सिंह विजयी हुए। 1985 में पंडित सुखराम संसद पहुंचे। 1989 के आम चुनाव में यहां से भाजपा ने कुल्लू के महेश्वर सिंह को मैदान में उतारा और लोकसभा में पहुंचे। 1991 के चुनाव में पंडित सुखराम ने फिर से जीत हासिल की। 1998 में महेश्वर सिंह ने कांग्रेस की प्रतिभा सिंह को पराजित किया था। 2004 में कांग्रेस की प्रतिभा सिंह ने महेश्वर सिंह को हराया। 2009 में वीरभद्र सिंह ने महेश्वर सिंह को हराया। 2013 के उपचुनाव में कांग्रेस की प्रतिभा सिंह विजयी रही। 2014 और 2019 के चुनाव में लगातार दो बार भाजपा के रामस्वरूप शर्मा विजयी रहे। अब उनके निधन से यहां उपचुनाव हो रहा है। 17 विधानसभा क्षेत्रों का बनेगा रिपोर्ट कार्ड मंडी संसदीय क्षेत्र में 17 विधानसभा क्षेत्र आते है। जाहिर है ऐसे में दोनों मुख्य राजनीतिक दलों का सभी 17 विधानसभा क्षेत्रों में इम्तिहान होगा। ये हिमाचल की कुल 68 विधानसभा सीटों का 25 फीसदी है। ऐसे में 2022 से पहले मंडी संसदीय उपचुनाव में बेहतर करने का दबाव दोनों राजनीतिक दलों पर होगा। जीत मिले या हार, पर विश्लेषण सभी 17 विधानसभा क्षेत्रों का होना है। जाहिर है स्थानीय नेताओं पर भी बेहतर करने का दबाव रहेगा। फिलवक्त इन 17 विधानसभा क्षेत्रों में से सिर्फ किन्नौर, रामपुर और कुल्लू में ही कांग्रेस के विधायक है। 2022 के लिए कांग्रेसी की कितनी तैयारी है, इसकी झलक भी लोकसभा उपचुनाव में देखने को मिलेगी। चुनाव के बाद सभी सम्बंधित विधानसभा क्षेत्रों का रिपोर्ट कार्ड बनना भी तय है। 2017 से कांग्रेस के सितारे गर्दिश में, भाजपा लगातार हावी मंडी में 2017 का विधानसभा चुनाव बुरी तरह हारने के बाद कांग्रेस 2019 का लोकसभा चुनाव भी रिकॉर्ड अंतर से हारी थी। हालहीं में हुए नगर निगम चुनाव में कांग्रेस को 15 में से सिर्फ 4 वार्ड में जीत मिली। जबकि इसी वर्ष जनवरी में हुए जिला परिषद् चुनाव में 36 वार्ड में से कांग्रेस ने सिर्फ एक वार्ड पर जीत दर्ज की थी। कमोबेश ऐसी ही स्थिति पंचायत समिति में भी रही जहां भाजपा का दबदबा रहा। अब प्रतिभा सिंह से कांग्रेस को उम्मीद है। कर्मचारी नेता भी लड़ चुके है चुनाव हिमाचल की कर्मचारी राजनीति के कई दिग्गज असली सियासी पटल पर भी अपनी किस्मत आजमाते रहे है। मंडी संसदीय क्षेत्र में भी कर्मचारी नेता अपनी किस्मत आजमा चुके है। मंडी संसदीय क्षेत्र में इससे पहले भाजपा दो कर्मचारी नेताओं को टिकट दे चुकी है, 1984 में व 1996 में और दोनों ही मर्तबा भाजपा को शिकस्त मिली। प्रदेश कर्मचारी महासंघ में अध्यक्ष के पद पर रह चुके फायर ब्रांड कर्मचारी नेता मधुकर और ठाकुर अदन सिंह ने यहां से चुनाव लड़ा था। इन दोनों ने हिमाचल की राजनीति के चाणक्य पंडित सुखराम के खिलाफ चुनाव लड़ा। हालांकि दोनों को ही चुनावों में सफलता नहीं मिली थी, लेकिन संसदीय क्षेत्र के चुनाव में कर्मचारी नेताओं ने दिग्गज नेता को टक्कर दी थी। मधुकर ने 1984 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था, तो वहीं अदन सिंह ठाकुर ने 1996 में भाजपा के ही टिकट पर चुनाव लड़ा था।


















































