सुप्रीम कोर्ट ने आज NEET पोस्ट ग्रेजुएट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को अनुमति देते हुए विस्तृत फैसला जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि PG और UG ऑल इंडिया कोटा में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण संवैधानिक रूप से मान्य होंगे। साथ ही कहा कि, केंद्र को आरक्षण देने से पहले इस अदालत की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। दरअसल बीते 7 जनवरी को ही कोर्ट ने आरक्षण को अनुमति दे दी थी। सरकार को ज़रूरतमंद तबके के लिए विशेष व्यवस्था करने का अधिकार देने वाले संविधान के अनुच्छेद 15 (4) और 15 (5), अनुच्छेद 15 (1) का ही विस्तार हैं। अनुच्छेद 15 (1) में सरकार की तरफ से किसी वर्ग से भेदभाव न करने की जो बात कही गई है, कमज़ोर वर्ग के लिए विशेष व्यवस्था उसी भावना के अनुरूप है। वंही केंद्र के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि वह ऑल इंडिया कोटा में obc आरक्षण देने के लिए कोर्ट से अनुमति ले। परीक्षा में प्राप्त अंक मेरिट का इकलौता आधार नहीं हो सकता। समाज के कई वर्ग सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से लाभ की स्थिति में रहे हैं। यह परीक्षा में उनकी अधिक सफलता की वजह बनता है। बता दें कि 7 जनवरी को दिए आदेश में जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और ए एस बोपन्ना की बेंच ने NEET पीजी में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (EWS) के 10 प्रतिशत आरक्षण को भी मंजूरी दी थी। हालांकि, कोर्ट ने माना था कि EWS के आकलन के लिए पूरे देश में 8 लाख रुपए सालाना अधिकतम आय सीमा तय कर देना सही नहीं लगता। कोर्ट ने कहा है कि इस बिंदु पर विस्तृत चर्चा की ज़रूरत है। लेकिन अगर यह सुनवाई की जाती तो इस साल के पीजी दाखिलों में और विलंब होता। इसलिए, सरकार की अधिसूचना को इस साल के लिए मंजूरी दे दी गई है। मामले को मार्च के तीसरे हफ्ते में विस्तृत सुनवाई के लिए लगाया जाएगा।
भारत ने आज बालासोर में ओडिशा के तट से दूर ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के एक नए संस्करण का सफल परीक्षण किया है। रक्षा सूत्रों ने मामले की जानकारी देते हुए बताया कि मिसाइल नए तकनीक से पूरी तरह लैस थी जिसका आज सफल परीक्षण किया गया। इससे पहले 11 जनवरी को भारत ने आधुनिक सुपरसोनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल के नए वेरिएंट का परीक्षण किया था। भारतीय नौसेना ने इसे गुप्त तरीके से निर्देशित मिसाइल विध्वंसक पोत में सफल परीक्षण किया था। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ने बताया कि मिसाइल ने निर्धारित लक्ष्य पर सटीक निशाना साधा। बताया गया कि मिसाइल में 290 किलोमीटर की क्षमता की तुलना में 350 से 400 किलोमीटर तक प्रहार करने की पूरी क्षमता है।
अब जम्मू कश्मीर और लद्दाख में भी दिल्ली पुलिस के अधिकारियों की पोस्टिंग हो सकेगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसके लिए आज यानी वीरवार को यह आदेश जारी कर दिया है। संयुक्त कैडर के आदेश के मुताबिक, जम्मू कश्मीर के आईपीएस अधिकारियों की भी राजधानी दिल्ली में तैनाती हो सकती है। वहीं, आदेश के मुताबिक, जम्मू कश्मीर और लद्दाख में यूपी कैडर के अधिकारियों की पोस्टिंग को हार्ड पोस्टिंग माना जाएगा। वहीं, अब जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवानों को आतंकवाद रोधी अभियानों को अंजाम देने के लिए जल्द ही अमेरिकी सिग सॉयर असॉल्ट राइफल और पिस्तौल दी जाएगी। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। सेना ने पाकिस्तान से लगी नियंत्रण रेखा और चीन से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा की रखवाली करने वाले अपने जवानों को पहले ही कई अत्याधुनिक राइफल दी हैं।
गोवा में विधानसभा चुनाव एक चरण में 14 फरवरी को होगा और 10 मार्च को नतीजे घोषित किए जाएंगे। गोवा में 40 विधानसभा सीट हैं। जिसके लिए आज बीजेपी अपने 38 उम्मीदवारों की सूचा जारी करेगी। जानकारी के मुताबिक आज दोपहर एक बजे उत्पल पार्रिकर बीजेपी लिस्ट घोषित करेंगे साथ ही इसके बाद वो मीडिया से भी बातचीत करेंगे। बता दें, उत्पल पर्रिकर ने गोवा की पंजिम विधान सभा सीट से टिकट मंगा है। जानकारी के मुताबिक गोवा प्रभारी देवेंद्र फडणवीस ने उत्पल पर्रिकर को पंजीम छोड़ दूसरे दो अन्य ऑप्शन पर विचार करने को कहा है। देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या उत्पल पर्रिकर को पंजिम सीट से टिकट मिलती है या नहीं।
अरुणाचल प्रदेश के एक युवक के लापता होने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार हरकत में आ गई है। भारतीय सेना के स्थानीय कमांडर ने हॉटलाइन पर चीनी सेना से संपर्क किया है, ताकि युवक की सुरक्षित वापसी हो सके। युवक का नाम मिराम तारोन बताया जा रहा है और वह अरुणाचल प्रदेश से है। रक्षा सूत्रों के मुताबिक, जानकारी के आधार पर भारतीय सेना ने पीएलए से संपर्क किया और तय प्रोटोकॉल के तहत उनसे युवक को वापस करने में सहायता मांगी गई है। फिलहाल चीन की ओर से जवाब का इंतजार है। उधर, अरुणाचल प्रदेश से लोकसभा सांसद तापिर गाओ ने दावा किया है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने राज्य में भारतीय क्षेत्र के अपर सियांग जिले से 17 साल के एक किशोर का अपहरण कर लिया है। उन्होंने कहा कि चीनी सेना ने सियुंगला क्षेत्र के लुंगता जोर इलाके से किशोर का अपहरण किया। सांसद ने लोअर सुबनसिरी जिले के जिला मुख्यालय जिरो से कहा कि पीएलए से बचकर भागने में कामयाब रहे तरोन के मित्र जॉनी यइयिंग ने स्थानीय अधिकारियों को अपहरण के बारे में जानकारी दी।
हिमाचल प्रदेश में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ने लगे है। यहां कोरोना के मामले हर दिन अपना ही रिवॉर्ड तोड़ रहे है। राज्य में 19 जनवरी को 3148 रिकॉर्ड मामले सामने आए है जबकि 7 लोगों की मौत हो गई। 1 जनवरी को प्रदेश में जो एक्टिव मामले 474 थे वह बढ़कर 14918 पहुंच गए है। प्रदेश में अभी तक 3892 लोगों को संक्रमण के बाद मौत हो चुकी है। तेज़ी से बढ़ते कोरोना के मामलों के चलते सरकार ने कुछ बंदिशे भी लगाई है बावजूद इसके पिछले कुछ दिनों से मामलों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि जनवरी के आखिर में हिमाचल में कोरोना की तीसरी लहर का पीक हो सकता है। जिसको देखते हुए स्वास्थ्य विभाग के मुख्य सचिव अमिताभ अवस्थी ने प्रदेश में बंदिशों को बढ़ाने की बात कही है। स्वास्थ्य विभाग के सचिव अमिताभ अवस्थी ने बताया कि हिमाचल में जिस रफ्तार से मामले बढ़ रहे है जनवरी के आखिर तक तीसरी लहर का पीक होगा। हिमाचल में बढ़ते कोरोना के मामलों को देखते हुए और बंदिशें लगाई जाएंगी। लेकिन इन बंदिशों में लोगों को इस तरह नहीं बांधा जाएगा जिससे आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हों। उन्होंने बताया कि हिमाचल में ऑक्सीजन की कमी नहीं है। हिमाचल में 100 मीट्रिक टन से ऊपर ऑक्सीजन उत्पादन हो रहा है। आईसीयू में मरीज कम है। आईसीयू व ऑक्सीजन में कुल 100 कोविड मरीज अस्पताल में भर्ती है।
एयरइंडिया समेत कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन कंपनियों ने 5जी विवाद को लेकर अमेरिका जाने वाली उड़ानों को रद्द कर दिया है या उपयोग किए जा रहे विमानों को बदल दिया है। नई 5जी मोबाइल फोन सेवा विमान प्रौद्योगिकी को प्रभावित कर सकती है और इसी चिंता को लेकर एयरलाइंस ने उड़ानों को रद्द किया है। एयरलाइंस के इस फैसले के बाद नागर विमानन महानिदेशालय हालात पर काबू पाने की कोशिश कर रहा है। कुछ एयरलाइंस ने कहा कि उन्हें चेतावनी दी गई थी कि दुनियाभर में इस्तेमाल किया जाने वाला विमान बोइंग 777 विशेष रूप से नई तीव्र गति वाली वायरलेस सेवा से प्रभावित है। यह स्पष्ट नहीं है कि उड़ानों को रद्द किये जाने से कितना प्रभाव पड़ेगाय कई एयरलाइन कंपनियों ने कहा कि वे अपनी सेवा को बनाए रखने के लिए केवल विभिन्न विमानों का उपयोग करने की कोशिश करेंगे। एयर इंडिया ने ट्वीट कर कहा, ‘‘वह अमेरिका में 5जी संचार सेवा शुरू होने के कारण" भारत-अमेरिका के बीच उड़ानें संचालित नहीं करेगी।’’ एयर इंडिया की इन उड़ानों में दिल्ली-न्यूयॉर्क, न्यूयॉर्क-दिल्ली, दिल्ली-शिकॉगो, शिकॉगो-दिल्ली, दिल्ली-सैन फ्रांसिस्को, सैन फ्रांसिस्को-दिल्ली, दिल्ली-नेवार्क और नेवार्क-दिल्ली शामिल हैं।
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने आज जिला कांगड़ा में धर्मशाला से मैकलोडगंज तक धर्मशाला स्काईवे रोपवे का लोकार्पण किया। धर्मशाला शहर को मैकलोडगंज से जोड़ने वाले 1.8 किलोमीटर लंबे इस रोपवे का निर्माण 207 करोड़ रुपये की लागत से किया गया है। इस अवसर पर मीडिया कर्मियों से बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इस रोपवे का निर्माण 2018 में शुरू किया गया था और इसे धर्मशाला रोपवे लिमिटेड और हिमाचल प्रदेश पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन विभाग द्वारा सार्वजनिक निजी भागीदारी परियोजना के रूप में डीएफबीओटी मोड के अन्तर्गत विकसित किया गया है। जयराम ठाकुर ने कहा कि यह रोपवे मैकलोडगंज की यातायात समस्या को हल करने में सहायक सिद्ध होगा और इससे पर्यटन को और अधिक बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि यह रोपवे एक घंटे में 1000 लोगों को एक दिशा में ले जाएगा और ट्रॉली को धर्मशाला से मैकलोडगंज पहुंचने में कुल पांच मिनट का समय लगेगा। इसमें 10 टावर और दो स्टेशन हैं। उन्होंने कहा कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना में मोनो केबल डिटेचेबल गोंडोलस तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
हिमाचल काडर के दिल्ली में तैनात 1996 बैच के आइपीएस अधिकारी आइजी एनएसजी अभिषेक त्रिवेदी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौट रहे हैं। वह यहां एडीजीपी का पदभार संभालेंगे। अभिषेक त्रिवेदी 11 जनवरी को आइजी एसएसजी के पदभार से भारमुक्त हो गए हैं। अब 60 दिन के अवकाश के बाद 13 मार्च को प्रदेश में पदभार संभालने के संबंध में जानकारी प्रदेश पुलिस मुख्यालय को दी है। ऐसे में उनके केंद्र से प्रतिनियुक्ति से लौटने के बाद एडीजीपी का एक पद भर जाएगा।
हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड के जंगलों में पाए जाने वाले बुरांस के फूल की पंखुड़ियों का अर्क कोरोना वायरस को रोकने में मदद करेगा। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी व नई दिल्ली के इंटरनेशनल सेंटर फार जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलाजी के विज्ञानियों ने बुरांस की पंखुड़ियों में फाइटोकेमिकल्स की पहचान की है। इससे कोरोना के संक्रमण के इलाज की संभावना सामने आई है। बुरांस का फूल सामान्यतया 15 मार्च से 15 अप्रैल तक खिलता है। इन्हें बुरुंस व बराह भी कहा जाता है। शोधार्थियों के मुताबिक बुरांस की पंखुड़ियों के गर्म पानी के अर्क में प्रचुर मात्रा में क्विनिक एसिड व इसके डेरिवेटिव पाए गए। मालीक्यूलर अध्ययन से पता चला है कि ये फाइटोकेमिकल्स वायरस से लड़ने में दो तरह से प्रभावी हैं। यह मुख्य प्रोटीएज से जुड़ जाते हैं, जो एक तरह का एंजाइम है और वायरस की प्रतिकृति (रेप्लिका) बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह मानव एंजियोटेंसिन परिवर्तित एंजाइम-2 से भी जुड़ता है, जो होस्ट सेल में वायरस के प्रवेश की मध्यस्थता करता है। प्रायोगिक परीक्षण में यह पाया गया कि पंखुड़ियों के अर्क की गैरविषाक्त खुराक से वेरो ई-6 कोशिकाओं में कोरोना का संक्रमण रुकता है। पंखुड़ियों के अर्क ने कोरोना वायरस को बनने से रोका है।
हिमाचल प्रदेश मे मौसम एक बार फिर कड़े तेवर दिखाएगा। 21 जनवरी से पहाड़ो पर बर्फ तो वहीं मैदानी इलाकों के लिए मौसम विभाग ने भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। बता दें कि बीते दिनों लाहौल स्पीति और किन्नौर में हल्की बर्फबारी दर्ज की गई है। जिससे न्यूनतम तापमान केयलोंग में -7.2 दर्ज किया गया है।21 जनवरी से प्रदेश में पश्चिम विक्षोभ के चलते एक बार फिर मौसम कड़े तेवर दिखायेगा और इसका असर 23 जनवरी तक रहेगा। मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के वैज्ञानिक सन्दीप शर्मा ने बताया कि से 20 जनवरी तक लाहौल स्पीति, चंबा, किन्नौर,कुल्लू में हल्की बारिश की संभावना है।21जनवरी से प्रदेश में पश्चिमी विक्षोभ प्रवेश करेगा जिसके कारण सोलन, सिरमौर, ऊना, शिमला में भारी बारिश होने की संभावना है। जिसके लिए अलर्ट भी विभाग द्वारा जारी किया गया है। जहां मैदानी इलाकों में बारिश होगी वहीं ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी भी हो सकती है। आने वाले दिनों में तापमान की बात की जाए तो बर्फबारी के बाद तापमान में फिर गिरावट दर्ज की जाएगी। कुछ जिलों में धुन्ध रहने की भी सम्भावना रहेगी।
भले ही सड़क विस्तार में हिमाचल को देश का सरताज बना दिया हो लेकिन पहाड़ी प्रदेश की सर्पीली सड़कें मानवीय खून से रंग रही है। राज्य की खस्ताहाल तंग सड़कों पर कदम कदम पर मौत का पहरा लगा हुआ है। शिमला जिला के ग्रामीण हल्को की सर्पीली सड़के वाहन चालको के लिए काल का ग्रास बनती जा रही है। जिला शिमला में 3 साल में 1287 सड़क हादसो में 530 लोगों की जान जा चुकी है और 2199 लोगो ने मौत को करीब से देखा है। औसतन प्रतिवर्ष जिला शिमला की सड़कों पर दो सौ के करीब बेगुनाहों की जाने जा रही है। या यूं कहें कि औसतन हर माह 40 के करीब सड़क हादसों में 15 मौतें और 60 से उपर लोग अपंगता का दंश झेलने को मजबूर हो रहे है। भले ही सरकार राज्य की सड़को पर 90 फीसदी दुर्घटनाओं का कारण ड्राइवर का नशे में रहकर गाड़ी दौड़ाना बता रही हो लेकिन सरकार की लापरवाही और विभागीय सिस्टम भी इसके लिए जिमेवार है। यंहा बताते चले कि हिमाचल के कुछ साल के सड़क हादसो को देखते हुए नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की सर्वे में हिमाचल को अन्य पहाडी राज्यों की तुलना में सडक हादसों में सबसे खतरनाक राज्य बताया है। हिमाचल में औसतन अन्य पहाड़े राज्यों की तुलना सबसे ज़्यादा सडक दुर्घटनाएं सामने आती हैं। इस रिपोर्ट के बाद भी सरकार ने सडक हादसों को रोकने के लिए काफी कोशिशें की थीं लेकिन इन हादसों में कोई ख़ास कमी दर्ज नहीं हो पाई। सड़क दुर्घटनाओं के बाद अब तक सरकार सिर्फ मजिस्ट्रेट इन्क्वायरी ही करवाती आ रही है, लेकिन सड़क हादसो को रोकने के लिए कोई कारगर निति नही अपनाई जा रही है। वंही डीएसपी मंगतराम ने बताया कि सड़क हादसे में 3 सालों का आंकड़ा देखें तो 2021 में कम सड़क हादसे हुए हैं। उन्होंने कहा कि इसका मुख्य कारण पुलिस द्वारा चलाए जा रहे जागरूकता अभियान है। उन्होंने बताया कि पुलिस लोगों को जागरूक कर रही है कि नशा करके गाड़ी न चलाएं। बिना मतलब ओवरटेक न करें, तेज रफ्तार से गाड़ी न चलाएं। उन्होंने कहा कि पुलिस की जागरूकता का ही नतीजा है कि सड़क हादसे कम हो रहे हैं।
गुजरात के सूरत शहर में मंगलवार रात एक निजी लग्जरी बस में आग लगने से उसमें सवार एक महिला की जलकर मौत हो गई और एक अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से झुलस गया। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह घटना शहर के वराछा इलाके में हुई। सूरत के मुख्य अग्निशमन अधिकारी ने कहा कि शुरुआती जांच में पता चला है कि बस में आग लगने के समय लगभग 15 यात्री सवार थे। उन्होंने कहा कि आग वाहन में तेजी से फैल गई। घटना के दौरान अन्य सभी यात्री समय पर बस से उतरने में कामयाब रहे जबकि एक महिला और एक पुरुष जलती हुई बस में फंस गए। उन्होंने कहा कि हादसे में महिला की मौत हो गई जबकि गंभीर रूप से झुलसे व्यक्ति को कुछ लोगों ने किसी तरह बस से बाहर निकाला। स्थानीय लोगों के अनुसार, जब बस ने कटारगाम इलाके से भावनगर के लिए यात्रा शुरू की तो उसमें बहुत कम यात्री थे। अग्निशमन अधिकारी ने कहा कि जब यह बस रात करीब साढ़े नौ बजे हीराबाग सर्किल में और यात्रियों को लेने के लिए पहुंची तो अचानक चिंगारी और विस्फोट के बाद बस आग की लपटों में घिर गई।
पांच राज्यों में जारी विधानसभा चुनाव के दौरान वर्तमान में रैलियों, रोड शो व सभाओं पर जारी रोक को देखते हुए भाजपा ने हाइब्रिड तरीके से प्रचार की रणनीति बनाई है। देश में बढ़ते कोरोना संक्रमण को देखते हुए चुनाव आयोग ने 22 जनवरी तक फिजिकल रैलियों व रोड शो पर पाबंदी लगा रखी है। ऐसे में भाजपा ने तय किया है कि वह हाइब्रिड रैलियां करेगी। भाजपा पहले से ही सोशल मीडिया व आनलाइन प्रचार माध्यमों पर अन्य दलों के मुकाबले ज्यादा ही सक्रिय है। उसके नेताओं को भी इसमें महारथ हासिल है। इसलिए उसने पांचों चुनावी राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, उत्तराखंड और मणिपुर में हाइब्रिड रैलियां करने का फैसला किया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने विभिन्न नेताओं से परामर्श के बाद प्रचार की नई रण्नीति बनाई है। इसमें तय किया गया है कि पार्टी के बड़े नेताएं छोटी-छोटी सभाएं करेंगे, लेकिन इन रैलियों का विभिन्न इलाकों में सीधा प्रसारण किया जाएगा। सीधे प्रसारण के अलावा भी विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर इन्हें प्रसारित किया जाएगा। बता दें कि चुनाव आयोग ने 15 जनवरी को पांचों चुनावी राज्यों में फिजिकल रैलियों, रोड शो व सभाओं पर पाबंदी बढ़ाकर 22 जनवरी तक कर दी है। इन पांचों राज्यों में विधानसभा चुनाव की शुरुआत 10 फरवरी को पहले चरण के मतदान से हो रही है। 10 मार्च को मतगणना के साथ ही ये चुनाव संपन्न होंगे। इससे पहले पांचों चुनावी राज्यों के चुनाव कार्यक्रम का एलान करते हुए 8 जनवरी को आयोग ने देश में कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए 15 जनवरी तक इन राज्यों में भौतिक प्रचार पर रोक लगा दी थी।
जिला मंडी में शराब पीने से चार लोगों की संदिग्ध हालत में मौत होने का मामला पेश आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, सुंदरनगर के स्लापड में शराब के सेवन के बाद चार लोगों की संदिग्ध हालात में मौत हो गई। वंही मृतकों के परिजनों ने आरोप लगाया है कि जहरीली शराब के सेवन से इनकी मौत हुई है। पुलिस ने शव कब्जे में ले लिए हैं। इन्होंने शराब के साथ किस खाद्य पदार्थ का सेवन किया था, इसकी भी जांच की जा रही है। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक आशीष शर्मा ने घटना की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही मौत के कारण का पता लग पाएगा। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि पिछले कई दिनों से सलापड़ क्षेत्र में चोरी छिपे चंडीगढ़ से शराब लाकर बेची जा रही थी। इन्होंने इसी शराब का सेवन किया था। बताया जा रहा है क्षेत्र में इस शराब की मांग ज्यादा हो गई थी, इससे ज्यादा नशा होने की बात कही जा रही है।
मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में मंगलवार को एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई है। आईएनएस रणवीर के एक आंतरिक कंपार्टमेंट में विस्फोट हो गया। इस धमाके में तीन नौसैनिकों की जान चली गई। वहीं, 10 सैनिक घायल बताए जा रहे हैं। घटना के तुरंत बाद जहाज के चालक दल ने स्थिति को काबू में किया। इसकी जानकारी भारतीय नौसेना के अधिकारी ने दी है। घायल जवानों का नौसेना के अस्पताल में इलाज चल रहा है। घायल जवानों को कोलाबा नेवी नगर के INHS अश्विनी भेजा गया है। आईएनएस रणवीर भारतीय नौसेना का पोर्ट है। आईएनएस रणवीर नवंबर 2021 से पूर्वी नौसेना कमान से क्रॉस कोस्ट ऑपरेशनल तैनाती पर था और जल्द ही बेस पोर्ट पर लौटने वाला था। मामले की जांच के लिए बोर्ड ऑफ इंक्वायरी के आदेश दे दिए गए हैं। बताया जा रहा है कि धमाके में घायल हुए तीन नौसैनिकों को अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। आईएनएस रणवीर में ये किस कारण से धमाका हुआ इसे लेकर नौसेना की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई है। धमाके की जांच के लिए भारतीय नौसेना ने कमिटी बैठा दी है, जो इस बात की जांच करेगी कि ये धमाका कैसे हुआ।
देश की राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों में कड़ाके की ठंड पड़ते दिख रही है जिससे अगले कुछ दिनों तक राहत मिलते नहीं दिखेगी। मौसम विभाग के मुताबिक, दिल्ली, बिहार, यूपी, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में आज और कल के लिए कोल्ड डे का अनुमान लगाया गया है। वहीं, पहाड़ी राज्यों में बारिश और बर्फबारी होने की पूरी संभावना बनी हुई है। जम्मू-कश्मीर में इसकी शुरुआत होते दिख रही है। दिल्ली में कड़ाके की ठंड का दौर बीते कई दिनों से लगातार जारी है। मौसम विभाग के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर में मंगलवार को लगातार छठा ठंडा दिन रहा। न्यूनतम तापमान 10 डिग्री से कम दर्ज हुआ तो वहीं अधिकतम तापमान सामान्य से करीब 4 डिग्री सेल्सियस कम रहा। वहीं, दिल्ली में 22 जनवरी से दो दिन भारी बारिश के होने का अनुमान जाहिर किया गया है। मौसम विभाग के अनुसार, जम्मू के मैदानी इलाकों में हल्की बारिश होने का अनुमान है तो वहीं कश्मीर के मैदानी इलाकों में हल्की बर्फबारी होती दिख सकती है। 21 और 22 जनवरी को जम्मू-कश्मीर में हल्की से मध्यम हिमपात का अनुमान भी जाहिर किया गया है।
हिमाचल प्रदेश में बीते दिनों हुए उपचुनाव में महंगाई का मुद्दा हावी रहा। चारों चुनावी क्षेत्रों में जगह-जगह 68 चुनावी जनसभाएं करने के बावजूद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी जनता को लुभा नहीं पाए। हालात यह रहे कि उनकी गृह लोकसभा क्षेत्र मंडी की सीट पर भी कांग्रेस काबिज हो गई। हार के पोस्टमार्टम में महंगाई को एक बड़ा कारण माना गया। खुद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने भी माना कि महंगाई उपचुनाव में मुद्दा बनी। जनता ने हार का दिवाली गिफ्ट दिया तो सरकार को पेट्रोल डीजल के दामों में कटौती कर रिटर्न गिफ्ट देना पड़ा। विपक्ष ने इस पर जमकर चुटकी भी ली। बहरहाल उपचुनाव में जो हुआ सो हुआ, पर यदि महंगाई नियंत्रण में नहीं आई तो आगामी विधानसभा चुनाव में भी सत्तारूढ़ दल को इसका खामियाजा भुगतान पड़ सकता है। इतिहास भी इस बात की तस्दीक करता है कि चुनाव चाहे पंच का हो या प्रधानमंत्री का, महंगाई ऐसा विषय है जिसने हमेशा मतदाता को प्रभावित किया है। "आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया " हिंदी का यह मुहावरा अब सिर्फ एक मुहावरा ही नहीं रह गया बल्कि आम आदमी के जीवन की वास्तविकता बन गया है। पहले कोरोना महामारी ने आम आदमी की कमर तोड़ी और अब ये दिन दोगुनी रात चौगुनी तरक्की करती महंगाई आम आदमी की जान लेने पर तुली है। महंगाई की मार रसोई के तड़के से लेकर गैराज में खड़ी गाड़ी तक पहुँच गई है। हर तरफ हाहाकार है। सरसों तेल, आलू-प्याज, टमाटर, सब्जियां, रसोई गैस और पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें आम-आदमी के जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं। हर चीज की कीमत दोगुनी होने से जनजीवन त्रस्त है। कोरोना काल के बाद सभी क्षेत्रों में बढ़ती महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। आम आदमी की आमदनी तो वहीं ठहरी है, लेकिन जीवन यापन के लिए आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छूते जा रहे है। इस पर बेरोजगारी जनता की परेशानियों का एक बड़ा कारण बन गई है। सरकार से पूछा जाए तो 'इस पर हमारा नियंत्रण नहीं है' कह कर नेता अपना पल्ला झाड़ लेते है और विपक्ष इस महंगाई को आम आदमी की समस्या से ज्यादा चुनावी मुद्दे की तरह देखता है। यानी चुनाव के दौरान तो पेट्रोल और बाकी के दाम पर बड़े बड़े भाषण दिए जाते है परन्तु बाद में इसके समाधान पर चर्चा तक नहीं की जाती। हालांकि ये स्वाभाविक है कि यदि आम जनता महंगाई से त्रस्त हो तो फायदा विपक्ष को होता है। हिमाचल प्रदेश में इसी वर्ष के अंत में विधानसभा चुनाव होने है और तब तक यदि महंगाई की ताप बरकरार रही तो निसंदेह भाजपा की मुश्किलें बढ़ने वाली है और कांग्रेस इस मुद्दे का लाभ लेने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। पाँच राज्यों में भी महंगाई मुद्दा महंगाई सिर्फ राज्य का मसला नहीं है अपितु इसके लिए काफी हद तक केंद्र सरकार जिम्मेदार समझी जाती है जहां भी भाजपा सत्तासीन है। 10 फरवरी से पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है जिनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर शामिल है। इन राज्यों में भी कांग्रेस महंगाई को लेकर भाजपा को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रही, ठीक वैसे ही जैसे हिमाचल के उपचुनाव में देखने को मिला था। उपचुनाव में कांग्रेस को हुआ लाभ हर चुनाव में महंगाई एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आती है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश में हुए उपचुनाव में भी बढ़ती महंगाई को भाजपा की हार का एक बड़ा कारण माना गया। इन उपचुनावों में कांग्रेस ने क्षेत्रीय मुद्दों के साथ साथ महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे को खूब भुनाया जिसका लाभ भी कांग्रेस को मिला। हालांकि महंगाई पूरी तरह से प्रदेश नहीं बल्कि केंद्र सरकार का मुद्दा है फिर भी इसका प्रभाव प्रदेश के चुनाव में रहता है । दिसंबर में भी महंगाई बेलगाम साल 2021 के दिसंबर महीने के खुदरा महंगाई के आंकड़े हाल ही में जारी हुए हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक पिछले महीने की खुदरा महंगाई दर 5.59 प्रतिशत पर थी। यह पिछले छह महीनों में खुदरा महंगाई दर का सबसे ऊंचा स्तर था। खुदरा महंगाई दर का यह आंकड़ा इतना ऊंचा है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा निर्धारित 6 प्रतिशत की महंगाई की सहनशील सीमा को छू रहा है। सरल शब्दों में समझें तो यह कि अगर खुदरा महंगाई दर 6 प्रतिशत को पार कर जाती है तो इसका मतलब है कि पानी सर से ऊपर निकल गया है। महंगाई मालिक को मुनाफा देने की बजाय मालिक को घाटा देने की तरफ बढ़ती जा रही है। अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह साबित होती जा रही है। खुदरा महंगाई दर उन सामानों और सेवाओं की कीमत के आधार पर निकाली जाती है जिसे ग्राहक सीधे खरीदता है। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार कुछ सामानों और सेवाओं के समूह के कीमतों का लगातार आकलन कर खुदरा महंगाई दर निकालती है। सरकार ने इसके लिए फार्मूला फिक्स किया है जिसके अंतर्गत तकरीबन 45 प्रतिशत भार भोजन और पेय पदार्थों को दिया है और करीबन 28 फीसदी भार सेवाओं को दिया है। यानी खुदरा महंगाई दर का आकलन करने के लिए सरकार जिस समूह की कीमतों पर निगरानी रखती है उस समूह में 45 प्रतिशत हिस्सा खाद्य पदार्थों का है, 28 फीसदी हिस्सा सेवाओं का है। यह दोनों मिल कर के बड़ा हिस्सा बनाते हैं। बाकी हिस्से में कपड़ा, जूता, चप्पल, घर, इंधन बिजली जैसे कई तरह के सामानों की कीमतें आती है। दिसंबर महीने में खुदरा महंगाई दर पिछले महीने के 4.91 फीसदी से बढ़कर 5.59 फीसदी पर जा पहुंची है। दरअसल खाने के तेल, महंगी साग-सब्जियों और महंगे पेट्रोल, डीजल, बिजली के चलते खुदरा महंगाई दर में बढ़ोतरी देखी जा रही है। सांख्यिकी मंत्रालय ने ये आंकड़े जारी किये हैं। दिसंबर 2020 में रिटेल महंगाई दर 4.59 फीसदी रही थी। सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी किए आंकड़े के मुताबिक खाद्य महंगाई दर दिसंबर महीने में 4.47 फीसदी पर जा पहुंची है, जबकि नवंबर महीने में खाद्य महंगाई दर 1.87 फीसदी रही थी। ईंधन और बिजली महंगाई दर 10.95 फीसदी रही। ये अभी भी दहाई अंक में है। हालांकि नवंबर 2021 के मुकाबले ईंधन और बिजली के महंगाई में कमी आई है। कपड़े और जूते-चप्पल महंगे हुए हैं। कपड़ों और जूते-चप्पल की महंगाई दर 8.30 फीसदी रही जबकि नवंबर में ये 7.94 फीसदी रही थी। दरअसल नवंबर महीने में केंद्र सरकार ने पेट्रोल डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कमी की थी वहीं कई राज्यों में सरकारों ने वैट घटाया था। खुदरा महंगाई में उछाल आया है लेकिन ये अभी भी आरबीआई के महंगाई दर से 2 से 6 फीसदी रहने के लक्ष्य के भीतर है । बेहिसाब-बेलगाम मुनाफाखोरी भी है कारण बेकाबू महंगाई के पीछे एक तर्क ये दिया जा रहा है कि पिछले साल मानसून कमजोर रहा या पर्याप्त बारिश नहीं हुई, जिसके चलते खाद्य सामग्री के दाम बढ़े है। पर सवाल ये है कि क्या इसका असर सभी चीजों पर एकसाथ पड़ा है। कीमत इतनी ज्यादा होने के बावजूद बाजार में किसी भी आवश्यक वस्तु का अकाल-अभाव दिखाई नहीं पड़ता, पर जब आपूर्ति कम होती है तो बाजार में चीजें दिखाई नहीं पड़ती हैं और उनकी कालाबाजारी शुरू हो जाती है। मूल सवाल ये है कि क्या बेहिसाब-बेलगाम मुनाफाखोरी ही तो बेकाबू महंगाई का कारण नहीं है। मसलन जो सब्जी किसान बाजार में 10 रुपये किलोग्राम की दर से बेचता है उसकी कीमत आम आदमी तक पहुँचते -पहुँचते 40 -50 रुपये हो जाती है। सरकार को बाजार पर योजनाबद्ध तरीके से अंकुश लगाना चाहिए। उत्पादन लागत के आधार पर चीजों के विक्रय दाम तय होने चाहिए। सवाल ये भी है कि जब सरकार कृषि उपज के समर्थन मूल्य तय कर सकती है तो वह बाजार में बिकने वाली चीजों की अधिकतम कीमत क्यों नहीं तय कर सकती? बेरोजगारी : हर साल दो करोड़ रोजगार देने का था वादा बढ़ती महंगाई के साथ साथ बढ़ती बेरोज़गारी भी एक बड़ा मसला है। राजनीतिक दल चुनाव के दौरान बेरोज़गारी खत्म करने के कई दावे करते है परन्तु असल में ऐसा हो नहीं पाता। बढ़ती बेरोजगारी शिक्षित युवाओं को परेशान कर रही है। जनसंख्या अनुसार रोजगार के अवसर जितने सृजित किए जाने की आवश्यकता है, उतने नहीं हो पा रहे हैं। नतीजतन युवा वर्ग बेरोजगारी की चक्की में पिसकर अपने लक्ष्यों से भटकता जा रहा है। युवा देश की रीढ़ की हड्डी की तरह होते हैं, जिन्हें राष्ट्र और समाज के पुनर्निर्माण के लिए अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है। देश में हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा कर भाजपा सत्ता में आई थी। शहरों में बेरोजगार लोगों की तादाद में लगातार इजाफा हो रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शहरों में बेरोजगारी दर चार माह के शीर्ष पर पहुंच चुकी है। सीएमआईई की हालिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। हिमाचल में 13.6 फीसदी बेरोजगारी दर गौरतलब है कि सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई), ने दिखाया कि 29.3 प्रतिशत के साथ हरियाणा बेरोजगारी में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शीर्ष पर है। इसके बाद जम्मू और कश्मीर 21.4 प्रतिशत के साथ दूसरे, जबकि 20.4 प्रतिशत के साथ राजस्थान तीसरे स्थान पर है। इसके अलावा बिहार (14.8 फीसदी), हिमाचल प्रदेश (13.6 फीसदी), त्रिपुरा (13.4 फीसदी), गोवा (12.7 फीसदी) और झारखंड (11.2 फीसदी) उन राज्यों में शामिल है, जहां दिसंबर में बेरोजगारी दहाई अंक में है। दिल्ली में बेरोजगारी दर 9.3 फीसदी दर्ज की गई है। इतिहास गवाह है, महंगाई ने मचाई है राजनीतिक उथल-पुथल इतिहास गवाह है कि असाधारण रूप से महंगाई जब भी बढ़ी है राजनीतिक उथल-पुथल मची है। 1973 में, हॉस्टल मेस के बकाए को लेकर गुजरात में एक कॉलेज का विरोध प्रदर्शन बढ़ती महंगाई के खिलाफ एक आंदोलन में बदल गया, जिसकी वजह से राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। इस इस्तीफे के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ जेपी नारायण के राष्ट्रव्यापी आंदोलन को पंख मिल गए। आखिरकार इसी वजह से इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी। आपातकाल के बाद के चुनावों में गांधी ने सत्ता खो दी, लेकिन उसके बाद बनी सरकार भी कीमतों को नीचे लाने में विफल रही। जब 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो विपक्ष में बैठी इंदिरा गांधी के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं था जिससे वो सरकार पर हमलावर हो सके। पर तभी अचानक प्याज की कीमतें आसमान छूने लगी और बैठे बिठायें इंदिरा गाँधी को एक मुद्दा मिल गया। कांग्रेस ने इस मुद्दे का बेहद नाटकीय ढंग से इस्तेमाल किया। प्याज की बढ़ती कीमतों की तरफ ध्यान खींचने के लिए कांग्रेस नेता सीएम स्टीफन तब संसद में प्याज की माला पहन कर गए। देखते -देखते इस मुद्दे का जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोलने लगा। 1980 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी प्याज की माला पहनकर प्रचार करने गईं। चुनावी नारा भी बना कि ' जिस सरकार का कीमत पर जोर नहीं, उसे देश चलाने का अधिकार नहीं।' चुनावी नतीजे आए तो जनता पार्टी की हार हुई और कांग्रेस ने सरकार बनाई। माना जाता है कि जनता पार्टी की सरकार भले ही अपनी वजहों से गिरी हो, लेकिन कांग्रेस की सत्ता वापसी में प्याज का भी अहम् योगदान रहा। हालांकि सत्ता में लौटी कांग्रेस भी इसकी कीमतों का बढ़ना नहीं रोक पाई और एक साल बाद फिर प्याज ने रुलाना शुरू कर दिया। इस बार विपक्ष ने प्याज का नाटकीय इस्तेमाल किया। तब लोकदल नेता रामेश्वर सिंह प्याज का हार पहन कर राज्यसभा में गए, पर बात नहीं बनी और सभापति एम हिदायतुल्ला ने उन्हें खरी-खोटी सुना दी। 1998 में दिल्ली में सुषमा स्वराज की सरकार भी प्याज की बढ़ी कीमतों की बलि चढ़ गई। इसके अलावा 2014 में मोदी के सत्ता में आने से पहले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के अंतिम सालों के दौरान मूल्य वृद्धि के खिलाफ जनमत जुटाने में अरुण जेटली समेत भाजपा के कई नेताओं की भूमिका रही। भाजपा नेताओं ने यूपीए सरकार में महंगाई को मुद्दा बनाया था, सिलेंडर और सब्जियां लेकर प्रदर्शन किया था। वर्तमान सरकार में मंत्रालय संभाल रहे सभी बड़े नेता उस समय सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे। 2014 के चुनाव में भाजपा ‘बहुत हुई महंगाई की मार,अबकी बार मोदी सरकार’ के नारे के साथ चुनाव में उतरी। ऐसे कई अन्य उदाहरण है जो तस्दीक करते है कि महंगाई को कम आंकना ठीक नहीं।
जुब्बल - कोटखाई, चौपाल, कुल्लू, आनी, करसोग, सिराज, ठियोग, किन्नौर, लाहौल -स्पीति, मनाली, रामपुर, बंजार, चुराह, भरमौर सहित प्रदेश के करीब 15 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे है जहाँ सेब की पैदावार होती है, कहीं थोड़ी कम तो कहीं ज्यादा। जाहिर है ऐसे में प्रदेश की सियासत में भी सेब बागवानों का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण है। कई निर्वाचन क्षेत्र तो ऐसे है जहां बागवान ही जीत -हार तय करते है। ऐसे में लाज़मी है कि सभी राजनैतिक दल और नेता बागवानों के वोट के लिए हरसंभव प्रयास करते है। बाकायदा घोषणा पत्र में बागवानों के मुद्दों को जगह दी जाती है, बड़े -बड़े आश्वासन दिए जाते है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी वादों और घोषणाओं की ये सियासी फिल्म फिर चलाई जाएगी। निसंदेह बागवानों का वोट कई सीटों पर जीत -हार तय करेगा। सेब हिमाचल की आर्थिकी का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। प्रदेश में हजारों बागवान परिवार हैं जिनमें से अधिकतर की आय का साधन सिर्फ और सिर्फ सेब ही है। कभी मौसम की मार सेब की गुणवत्ता पर असर डालती है, तो कभी निजी कंपनियों के सेब खरीद के कम दाम बागवानों को परेशान करते है। इस पर कम दामों पर आयात हो रहे सेब भी बागवानों के लिए एक बड़ी समस्या है। निसंदेह प्रदेश के बागवानों को सरकार से हौंसला चाहिए, बागवानी के लिए उचित व्यवस्था चाहिए। विडम्बना ये है कि आर्थिकी का इतना बड़ा हिस्सा होने के बावजूद सेब को लेकर प्रदेश में अब भी सुचारू व्यवस्थाएं नहीं है, इन व्यवस्थाओं की कमी के कारण ही बीते सेब सीजन में बागवानों को सेब के उचित दाम नहीं मिल पाए। गिरते दामों के अलावा भी सेब बागवानों की कई मांगें लंबित है जो प्रदेश के सियासी समीकरण बना बिगाड़ सकती है। हिमाचल के किसान -बागवान उम्मीदें लगाए बैठे है और हर बागवान के जहन में यह सवाल है कि आखिर क्यों समस्या का हल नहीं होता और कहाँ व्यवस्था में खामी है ? बागवानों का कहना है कि अडानी और लदानी प्रदेश के बागवानों को लूट रहे हैं और ऐसी नाजुक स्थिति में सरकार और विपक्ष पूरे परिदृश्य से गायब हैं। ईरान और तुर्की का सेब बना आफत हिमाचल की करीब साढ़े चार हजार करोड़ रुपये की सेब की आर्थिकी के लिए ईरान और तुर्की का सेब चुनौती बन गया है। बीते सीजन में सेब के दाम करीब तीस फीसदी तक कम मिलने का एक कारण ये भी है। बाजार में ईरान का सेब हिमाचली सेब को पछाड़ रहा है। ईरान का सेब रंग और स्वाद में श्रीनगर और किन्नौर की सेब की बराबरी करता है, जबकि वह एक हजार से 1500 रुपये प्रति पेटी तक उपलब्ध है। यह सेब मई से आना शुरू हो जाता है। बागवानों के अनुसार भारत में अफगानिस्तान के रास्ते ईरान और तुर्की से सेब का अनियंत्रित और अनियमित आयात हो रहा है जो बागवानों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। बागवान वाणिज्य मंत्रालय को पत्र लिखकर ईरान और तुर्की से सेब आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग भी कर चुके है। इनका मानना है कि भारी मात्रा में इन देशों से सेब का आयात होने के बाद मार्केट में हिमाचली सेब की मांग कम हुई है। चिंता की बात यह है कि ईरान और तुर्की से आयात होने वाले सेब पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं है, जिसके चलते हिमाचल के सेब कारोबार पर इसका नकारात्मक असर पड़ा है। दरअसल अफगानिस्तान साफ्टा (SAFTA) दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र का हिस्सा है और यहां से सेब के आयात पर कोई शुल्क नहीं लगता है। ईरान इस समझौते का हिस्सा नहीं है और माना जा रहा है कि इसलिए ईरान अपना सेब अफगानिस्तान से पाकिस्तान के रास्ते अटारी बॉर्डर से भारत भेजता हैं। ऐसा हो रहा है तो एक कंटेनर पर आठ लाख के करीब आयात शुल्क की चोरी हो रही है। इसके कारण ईरान का सेब सस्ता बिकता है। यदि ये सेब ईरान के रास्ते आए तो इसमें पंद्रह प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी और 35 प्रतिशत सेस लगेगा। हालही में हुई केंद्रीय बजट 2022-23 पर बजट पूर्व परामर्श बैठक में भाग लेते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मांग की थी कि राज्य में 2.5 लाख परिवारों की आजीविका की रक्षा के लिए सेब पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत किया जाना चाहिए। हालाँकि अब तक इसपर कोई फैसला नहीं लिया गया है। नैफेड से खरीद क्यों नहीं ? हिमाचल के बागवानों का मानना है की उनकी स्थिति इतनी बुरी नहीं होती अगर हिमाचल में भी कश्मीर की तरह नैफेड जैसी कोई केंद्रीय संस्था बागवानों का सेब खरीदती। दरअसल कश्मीर में केंद्रीय कैबिनेट द्वारा जम्मू कश्मीर के सेब उत्पादकों और व्यापारियों की मदद के लिए बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) को मंजूरी दी गई है। एमआईएस के तहत नेशनल एग्रीकल्चर कोआपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (नैफेड) किसानों और व्यापारियों से सीधे सेब खरीदती है। सेब की कीमत उसकी ग्रेडिंग के आधार पर होती है। इसका भुगतान सीधे बागवानों के बैंक खाते में होता है। इस योजना के तहत तीनों ग्रेड का सेब बागवानों से खरीदा जाता है। एमआईएस के तहत सेब खरीद की प्रक्रिया में ग्रामीण आबादी के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होते है। सेब की पैकिंग, गाड़ियों में लोडिंग-अनलोडिंग और मंडियों तक पहुंचाने के काम में कई लोगों को रोजगार मिलता है और बागवानों को सेब के अच्छे दाम मिलते है। परन्तु हिमाचल में अब तक ऐसा कुछ भी नहीं है। इसीलिए हिमाचल के बागवान मांग कर रहे है कि जम्मू कश्मीर की तर्ज पर हिमाचल में भी सेब की खरीद की जाए। बागवानों ने सरकार काे तीन श्रेणियों में बांट कर अलग-अलग रेट भी सुझाएं है। बागवानों की मांग के बाद सरकार भी एक्शन में है। बागवानी विभाग ने नैफेड और जम्मू-कश्मीर के बागवानी विभाग से ग्रेड सिस्टम काे लेकर जानकारी जुटानी शुरू कर दी है। विभाग यह जानने में जुट गया है कि बाजार में सेब के दामों गिरावट आने के बाद कैसे उसे स्थिर किया जाए ताकि बागवानाें काे नुकसान न हाे। साथ ही ग्रेड के आधार किस तरह से सेब की खरीद की जाए। मंडी मध्यस्थता योजना में सुधार की दरकार हिमाचल में एचपीएमसी द्वारा भी 'सी' कैटेगरी के सेब को पूरी तरह से बाजार से बाहर नहीं किया जा रहा। मार्किट इंटरवेंशन स्कीम के तहत जो 'सी' कैटेगरी का सेब उठाया जाता है, उसे भी एचपीएमसी पूरी तरह इस्तेमाल करने के बजाए उसका ऑक्शन कर देता है। ऑक्शन के बाद जो लोग इस सेब को खरीद रहे है वो इसे फिर मार्किट में ले आते है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। मौजूदा समय में 'सी' ग्रेड सेब भी मार्केट में पहुंच रहा है। इस कारण अच्छे सेब को भी बढ़िया रेट नहीं मिल पा रहे। बागवानों के अनुसार 'सी' ग्रेड सेब को मार्केट में जाने से रोकने के लिए कदम उठाने की जरूरत है। जब मार्केट में ‘ए' और 'बी’ ग्रेड सेब ही पहुंचेगा तो रेट में सुधार आएगा। मंडी मध्यस्थता योजना में सरकार 9.50 पैसे प्रति किलो की दर से सेब खरीद रही है। पर बागवानों की माने तो निम्न गुणवत्ता वाले इस सेब को परवाणू में बोली के बाद डेढ़ से ढाई रुपये प्रति किलो के दाम पर बेचा जाता है, जिसके बाद यह सेब दोबारा मार्केट में पहुंच जाता है। ऐसे में अच्छे सेब की मार्केट भी गिर रही है। बागवानों का सुझाव है कि इस सेब को बागवानों से खरीदने के बाद नष्ट कर दिया जाए और सी ग्रेड के सेब को बोरी के स्थान पर पेटी में पैक कर जूस और जैम बनाने के लिए प्रोसेसिंग प्लांट तक पहुंचाया जाए तो फायदेमंद रहेगा। मौजूदा समय में बागवान सी ग्रेड सेब को पेटियों में पैक कर मंडियों में भेज रहे हैं। गुणवत्ता सही न होने के कारण मंडियों में ऐसे सेब को सही दाम नहीं मिल रहे साथ ही अच्छे सेब के रेट भी प्रभावित हो रहे हैं। अगर यह व्यवस्था लागू होती है तो सरकार का सी ग्रेड सेब स्टोर करने और ऑक्शन का खर्च भी बचेगा। महंगी खेती कम आमदनी बीते अक्टूबर कार्टन में इस्तेमाल होने वाले एग्रो वेस्ट पेपर पर लगने वाले जीएसटी को 12 से बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। एग्रो वेस्ट पेपर पर छह प्रतिशत जीएसटी बढ़ाया गया। जीएसटी के बढ़ने से सेब बागवानों को कार्टन महंगा मिल रहा है। सिर्फ ये ही नहीं खाद की कीमतों में भारी वृद्धि की गई है। रासायनिक खादों के दामों में 40 फीसदी तक वृद्धि हुई है। नए दाम के अनुसार 12:32:16 खाद 315 रुपये तक महंगी हो गई है। यानी जीएसटी के साथ अब किसानों को यही खाद 1450 रुपये प्रति बैग मिलेगी, जबकि इस खाद की कीमत पहले 1135 रुपये प्रति बैग थी। इसी तरह से 15:15:15 खाद भी 170 रुपये प्रति बैग महंगी हुई। यह खाद अब जीएसटी को जोड़कर 1350 रुपये में मिलेगी। इसका पुराना दाम 1180 रुपये प्रति बैग के करीब था। आईपीएल पोटाश के भी अब किसानों को 1150 रुपये चुकाने होंगे। कृषि-बागवानों को बीज, खाद, कीटनाशक, फफूंदनाशक और अन्य लागत वस्तुओं पर दी जाने वाली सब्सिडी भी नहीं है। एंटी हेलनेट पर भी जीएसटी 5 से बढ़ाकर 12 फीसदी कर दिया है। यह नीतियां किसान पर आर्थिक दबाव बना रही हैं। समय पर न बिकने से हर साल 30 फीसदी सेब बर्बाद हिमाचल प्रदेश हर साल बागवानों की तैयार फसल में से 30 फीसदी सेब बेचने से पहले बर्बाद होता है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि अधिकांश बागवान किसी न किसी कारण से सेब की फसल समय पर मंडियों में नहीं बेच पाते और पूरी फसल को दाम नहीं मिल पाता। सेब अधिक पका हो तो भी बाजार में फसल को बेचना कठिन होता है। अच्छे सेब की बिक्री बागवानों को खुद ही करनी पड़ती है। फसल पेड़ से तोड़ने के बाद मंडियों में बेचनी पड़ती है। सेब खराब न हो जाए इसके लिए बागवानों को फसल औने पौने दामों में बेचनी पड़ती है। यह सिलसिला पिछले कई साल से सेब सीजन में रहता है। हिमाचल में वर्षों बाद भी ऊपरी क्षेत्रों में सेब पर आधारित छोटे उद्योग नहीं लगे है। अगर फलों पर आधारित उद्योग समय पर स्थापित किए होते तो बागवानों के पास फल बेचने का विकल्प रहता। बागवानों की तीस फीसदी खराब होने वाली फसलों को बेचकर मुनाफा होता। आज सिर्फ मंडियों में सेब बेचना मजबूरी रहती है। सरकारी उपक्रम एचपीएमसी के संयंत्र सिर्फ प्रदेश के सी ग्रेड के सेब से जूस निकालने तक सीमित हैं। इसके अलावा बंपर सीजन में सी ग्रेड का सेब पेटियों में भरकर बाजार में आ जाए तो अच्छे सेब को दाम नहीं मिल पाते। वर्षों से राजनैतिक दल प्रदेश में कोल्ड स्टोरेज स्थापित करने के दावे करते आ रहे है, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कार्य नहीं हुआ। बागवानों को निजी कोल्ड स्टोरेज का सहारा लेना पड़ता है जिससे लागत बढ़ जाती है। वहीं छोटे बागवानों के सामने कोई विकल्प नहीं बचता। स्वचालित मौसम केंद्र स्थापित नहीं कर पाई सरकार अप्रैल 2021 में सरकार द्वारा किसानों-बागवानों को फसलों से जुड़े जलवायु परिवर्तन की हर पल जानकारी देने के लिए हर पंचायत में स्वचालित मौसम केंद्र स्थापित करने की घोषणा की गई थी, मगर ये काम ज़मीनी स्तर पर नहीं हो पाया है। अधिकतर बागवानों तक ये सुविधा अभी नहीं पहुंची है और इसलिए बागवानों को स्वयं अपने स्तर पर ये वेदर स्टेशन स्थापित करने पड़ रहे है। बता दें कि सेंसर से लैस इन वेदर स्टेशनों की मदद से मौसम के पूर्वानुमान के अलावा बगीचे की मिट्टी में नमी की जानकारी मिलती है। बढ़िया फसल के लिए जरूरी चिलिंग आवर्स की स्थिति का भी पता चलता है। तापमान में उतार-चढ़ाव के अलावा हवा की रफ्तार का भी अंदाजा लगता है जिससे बगीचों में जरूरी छिड़काव के सही समय का निर्णय लिया जा सकता है। वेदर स्टेशन की मदद से सेब में लगने वाली बीमारियों का भी पता लगाया जा सकता है। नमी के कारण पेड़ का पत्ता कितनी देर गीला रहा, जिसके बाद फंगस पनप गई, इसकी सटीक जानकारी मिलती है। आवश्यकतानुसार बागवान बीमारी पनपने से पहले ही जरूरी छिड़काव कर सकते है। सही जानकारी होने पर बागवान अनावश्यक छिड़काव नहीं करेंगे जिससे पैसे की बचत होती है। रस्टिंग से हुआ करोड़ों का नुक्सान सेब की फसल को रस्टिंग नामक बीमारी से करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ है। प्रदेश में बीते 3-4 सालों के दौरान रस्टिंग का हमला ज्यादातर इलाकों में देखा जा रहा है। चिंता इस बात की है कि यह बीमारी हर साल बढ़ती जा रही है। बागवानों का दावा है कि इस साल 50 प्रतिशत से भी अधिक सेब रस्टिंग के कारण खराब हुआ है। बागवान लगातार मुख्यमंत्री, नौणी यूनिवर्सिटी के कुलपति से रस्टिंग बीमारी के कारणों का पता लगाने के लिए अनुसंधान (रिसर्च) करने का आग्रह कर रहे है। दरअसल, रस्टिंग की वजह से सेब को मार्किट में उचित दाम नहीं मिल पाते। रस्टिंग कई प्रकार का हो सकता है, जैसे कि सेब का खुरदरा होना, कई बार यह सेब की खाल को ढक देती है। कई जगह इससे सेब में जाती हैं। रस्टिंग होने के कई कारण हो सकते हैं। कई बार यह प्राकृतिक कारणों, नमी अधिक होने, कोहरा जमने, तापमान में ज्यादा कमी या वृद्धि तथा रसायनों का गलत छिड़काव करने इत्यादि से हो सकता है। ये चाहते है बागवान -सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय हो - हिमाचल प्रदेश में भी कश्मीर की तर्ज पर सेब के लिए मंडी मध्यस्थता योजना लागू हो -मंडी मध्यस्थता योजना के तहत A, B व C ग्रेड के सेब की क्रमशः 60 रुपए, 44 रुपए और 24 रुपए प्रति किलो समर्थन मूल्य पर खरीद की जाए -प्रदेश की विपणन मंडियों में एपीएमसी कानून को सख्ती से लागू किया जाए -किसानों के आढ़तियों व खरीददारों के पास बकाया पैसों का भुगतान तुरंत कराया जाए -मंडियों में एपीएमसी कानून के प्रावधानों के तहत किसानों को जिस दिन उनका उत्पाद बिके उसी दिन उनका भुगतान सुनिश्चित किया जाए -अडानी और अन्य कंपनियों के कोल्ड स्टोर में इसके निर्माण के समय की शर्तों के अनुसार बागवानों को 25 प्रतिशत सेब रखने के प्रावधान को तुरंत सख्ती से लागू किया जाए - किसान सहकारी समितियों को स्थानीय स्तर पर कोल्ड स्टोर बनाने के लिए 90 प्रतिशत अनुदान दिया जाए -सेब व अन्य फल, फूल और सब्जियों की पैकेजिंग में इस्तेमाल किए जा रहे कार्टन व ट्रे की कीमतों में की गई बढ़ोतरी वापस ली जाए -किसानों व बागवानों को हुए नुकसान का सरकार मुआवजा दें - मालभाड़े में की गई वृद्धि वापस ली जाए - प्रदेश की सभी मंडियों में सेब व अन्य सभी फसलें वजन के हिसाब से बेची जाए. - HPMC व हिमफैड द्वारा गत वर्षों में लिए गए सेब का भुगतान तुरन्त किया जाए - खाद, बीज, कीटनाशक, फफूंदी नाशक व अन्य लागत वस्तुओं पर दी जा रही सब्सिडी को पुनः बहाल किया जाए - कृषि व बागवानी के लिए प्रयोग में आने वाले उपकरणों स्प्रेयर, टिलर, एंटी हेल नेट आदि की बकाया सब्सिडी तुरन्त प्रदान की जाए. बागवानों पर आर्थिक दबाव बना रही हैं सरकार की नीतियां :बिष्ट प्रोग्रेसिव ग्रोवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष लोकेंद्र सिंह बिष्ट का कहना है कि बागवानों के लिए खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करने में विफल रहने के बाद सरकार ने कीमतों में बढ़ोतरी कर परेशानी बढ़ा दी है। सेब के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य देने विदेशी सेब पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाने के लिए सरकार कोई पहल नहीं कर रही। कार्टन और एंटी हेलनेट पर जीएसटी 5 से बढ़ाकर 12 फीसदी कर दिया है। यह नीतियां किसान पर आर्थिक दबाव बना रही हैं। बिष्ट के अनुसार इस बार सिर्फ बाजार के कारणों की वजह से ही सेब के दाम कम नहीं हुए है, बल्कि मौसम ने भी काफी काम बिगाड़ा है। इस साल शुरुआत में काफी सूखा पड़ा और बाद में ओलावृष्टि हुई जिसके कारण सेब की क्वालिटी प्रभावित हुई है। इसी का फायदा उठा कर आढ़तियों ने और बड़े कॉर्पोरेट्स ने सेब का दाम गिरा दिए। जहां दाम 400 से 500 तक गिराया जाना था वहां दाम 1000 रूपए तक गिरा दिया गया। इसके अलावा पिछले तीन सालों से तुर्की और ईरान का सेब भी भारत आ रहा है ये सेब उसी सीजन में आता है जब हिमाचल के सेब का पीक सीजन होता है। अफगानिस्तान के रास्ते ये सेब बिना ड्यूटी के भारत आ रहा है। ये सेब बहुत सस्ते दामों पर यहां आता है तो लदानी इसे खरीदते है जो हमारे सेब के दामों को प्रभावित करता है। बागवानों का खून चूस रही निजी कंपनियां : डिंपल पांजटा हिमालयन सोसाइटी फॉर हॉर्टिकल्चर एंड एग्रीकल्चर डेवलपमेंट के अध्यक्ष डिंपल पांजटा मानते है कि प्रदेश के बागवानों के विकास के लिए प्रदेश में बागवानों को बेहतर प्लांटिंग मटेरियल उपलब्ध करवाया जाना चाहिए। आज बागवानों को अपने स्तर पर वैदर स्टेशन अपने स्तर ऊपर लगवाने पड़ रहे है, अगर ये सहायता सरकार द्वारा प्रदान की जाए तो छोटे बागवानों को भी इसका लाभ मिल पाएगा। सेब की मार्केटिंग के लिए भी उचित व्यस्था की जरुरत है। सेब बागवानों तक सिंचाई की बेहतर योजनाएं पहुंचाई जानी चाहिए। जो दूसरे और तीसरे ग्रेड का सेब बाजार में जा रहा है वो सेब के दाम कम होने का बड़ा कारण है। सरकार या एपीएमसी को चाहिए कि वो इस सेब को खरीद कर फ़ूड प्रोसेसेसिंग यूनिट्स में या किसी भी तरह बाजार से बाहर भिजवा दे। पांजटा मानते है कि इसके अलावा जो निजी कंपनियां जैसे अडानी या कोई अन्य भी यदि अपने रेट्स कम निकालते है तो दाम भी गिरते है। इस बार भी अडानी ने दाम बहुत कम किये है। मंडियों में जिस तरह सेब के रेट गिरे हैं, यह पूरी तरह सरकारी तंत्र की विफलता है। बागवान भी जागरूक नहीं है। निजी कंपनियां बागवानों का खून चूस रही है, इनपर लगाम होनी चाहिए। इन पर भी एमएसपी लागू की जानी चाहिए। नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बागवानों को निजी कंपनियों का बहिष्कार करना चाहिए। नैफेड के तहत हिमाचल का सेब भी खरीदा जाना चाहिए जिसकी कवायद हिमाचल सरकार द्वारा शुरू कर दी गई है। बागवानों को इस सरकार से अब कोई उम्मीद नहीं : सुरेंद्र सिंह यंग एंड यूनाइटेड ग्रोवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह का कहना है कि संकट के समय में सेब बागवानों को राहत देने में राज्य सरकार पूरी तरह विफल साबित हुई है। मंडियों में रेट गिर रहे थे और मंत्री बयानबाज़ी कर रहे थे। बागवानों को सरकार से अब कोई उम्मीद नहीं है, कारण है बागवानी मंत्री के बेतुके बयान। नौणी विश्वविद्यालय भी प्रदेश के सेबों के लिए कुछ खास नहीं कर रहा। किस क्षेत्र में कौन सी वैरायटी का सेब लगना चाहिए इस पर रिसर्च होना जरुरी है, जो ये सरकार करवा नहीं पाई। स्कैब और रस्टिंग जैसी बीमारियों का हल भी निकाला जाना चाहिए। गलत नीतियों के कारण बागवानी पर संकट : चौहान संयुक्त किसान मंच के संयोजक हरीश चौहान और सह संयोजक संजय चौहान का कहना है कि सरकार की गलत नीतियों के कारण कृषि बागवानी पर संकट खड़ा हो गया है। निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए पहले खाद पर सब्सिडी खत्म की, अब खाद के रेट बढ़ा दिए हैं। किसान महंगी दरों पर बाजार से खाद खरीदने को मजबूर है। सरकार की नीतियों से गरीब किसान परेशान हैं। खेती के लिए खाद का इस्तेमाल किसान की पहुंच से बाहर हो गया।
शिमला संसदीय क्षेत्र में किसान लम्बे समय से टमाटर आधारित फूड प्रोसेसिंग प्लांट की मांग करते आ रहे है। अमूमन हर चुनाव में सियासी दल फूड प्रोसेसिंग प्लांट का वादा करते है और ऐसा दशकों से होता आ रहा है, किन्तु अब तक क्षेत्र को फूड प्रोसेसिंग प्लांट नहीं मिला। टमाटर का समर्थन मूल्य तय करने और कोल्ड स्टोर की मांग भी किसान संगठन लम्बे वक्त से करते आ रहे है पर इस दिशा में भी किसानों को आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिला। शिमला संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाले जिला सोलन और सिरमौर में टमाटर की अच्छी पैदावार होती है, विशेषकर जिला सोलन में। ये ही कारण है कि सोलन को सिटी ऑफ रेड गोल्ड भी कहा जाता है। यहाँ टमाटर हजारों किसान परिवारों के लिए जीव यापन का जरिया है, पर शायद अन्य तंत्र के लिए महज राजनीति की वस्तु भर है। सोलन में टमाटर आधारित फूड प्रोसेसिंग यूनिट करीब ढ़ाई दशक से चुनावी मुद्दा है। अमुमन हर चुनाव में किसान वोट हतियाने के लिए नेता फूड प्रोसेसिंग यूनिट का ख्वाब दिखाते है, वोट बटोरते है और फिर भूल जाते है। खासतौर से लोकसभा पहुंचने के लिए टमाटर फैक्टर का भरपूर इस्तेमाल होता आया है। वर्तमान मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक इस दिशा में पहल करने की बात कह चुके है। लंबी समय से विभिन्न किसान संगठन भी इसकी मांग करते आ रहे है, लेकिन बात कभी कागजों से आगे नहीं बढ़ी। बहरहाल बात करते है वर्तमान स्थिति की। 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री बने। जयराम कैबिनेट में कृषि मंत्रालय का भार दिया गया डॉ रामलाल मार्कंडेय को। मंत्री बनने के बाद वर्ष 2018 की शुरुआत में डॉ रामलाल मार्कंडेय सोलन आएं और इस दौरान उन्होंने टमाटर प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की घोषणा की। इसके बाद जुनती गांव में यूनिट लगाने के लिए कृषि विभाग व एपीएमसी सोलन के अधिकारियों ने भूमि का निरीक्षण किया, लेकिन ग्रामीणों ने यूनिट लगाने का विरोध किया। इसके बाद करीब एक साल तक सरकार को प्लांट लगाने के लिए जमीन नहीं मिली। वर्ष 2020 में सरकार को कालका-शिमला हाईवे पर धर्मपुर से एक किमी की दूरी पर दोसड़का में वन विभाग की भूमि मिली और इसका निरीक्षण भी किया गया। निरीक्षण किये एक साल से अधिक का समय बीत चुका है, पर टोमेटो प्रोसेसिंग यूनिट कब स्थापित होगा इसको लेकर अभी भी संशय बरकरार है। पीएम बनने के बाद मोदी ने जिक्र भी नहीं किया देश के वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह वर्ष 2007 में सोलन में प्रचार करने पहुंचे थे। तब उन्होंने शहर के पुराने बस अड्डे पर अपनी चुनावी जनसभा में कहा था कि भाजपा को जिला की पांचों सीटें मिली तो सोलन में फूड प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना की जाएगी। पांचों विस सीटों पर भाजपा को भारी मतों से जीत मिली और प्रदेश में भाजपा की सरकार भी बनी, लेकिन नहीं बना तो बस फूड प्रोसेसिंग यूनिट। ऐसे ही कई बार टमाटर किसानों को झूठे वादों से छला गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वर्ष 2014 में सोलन रैली में किसानों से टमाटर के समर्थन मूल्य व फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की बात कह चुके है। तब वे प्रधानमंत्री नहीं थे, प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। खेर, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उम्मीद जगी कि शायद सरकार टमाटर किसानों की सुध लेगी। परंतु कुछ नहीं बदला। दिलचस्प बात ये है कि 2019 में जब नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री सोलन आये तो उन्होंने न फूड प्रोसेसिंग प्लांट का जिक्र किया और न ही टमाटर के समर्थन मूल्य का। मवेशियों को खिलाने पड़ते है टमाटर उल्लेखनीय है कि संसदीय क्षेत्र शिमला का प्रदेश के कुल टमाटर उत्पादन का करीब 70 फीसदी योगदान है। यहां के हजारों परिवार जीवन यापन के लिए टमाटर खेती पर आश्रित है। विडंबना ये है कि अधिक उत्पादन की स्थिति में किसानों को टमाटर का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। टमाटर को लम्बे वक्त तक संभाल कर नहीं रखा जा सकता और ऐसे में इसके जल्द खराब होने की अधिक सम्भावना रहती है। कई मर्तबा तो तैयार फसल को खेतों से मंडी तक पहुंचाने की लागत भी कीमत से कम होती है। ऐसी स्तिथि में किसानों को टमाटर मवेशियों को खिलाने पड़ते है। इसी के चलते किसान लम्बे समय से टमाटर के समर्थन मूल्य और फूड प्रोसेसिंग यूनिट की मांग कर रहे है। फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगने से टमाटर की मांग हमेशा बरकरार रहेगी और किसानों को उचित मूल्य मिल पायेगा। बॉर्डर पर तनाव, किसानों का नुकसान गौर हो कि सोलन से टमाटर आमतौर पर पाकिस्तान एक्सपोर्ट किया जाता है। इसी के चलते किसानों को अधिक उत्पादन होने पर राहत मिलती है। साथ ही उन्हें उचित मूल्य भी मिलता है। किन्तु अगर बॉर्डर पर तनाव हो तो व्यापारी एक्सपोर्ट से परहेज करते है या एक्सपोर्ट पर रोक लगा दी जाती है, जिसका खामियाजा किसानों को भी भुगतना पड़ता है। ऐसे में स्थानीय फूड प्रोसेसिंग यूनिट होने से किसानो का आर्थिक नुक्सान कम किया जा सकता है। सोलन - सिरमौर से होता है 70 फीसदी उत्पादन बता दें कि सोलन में बड़े पैमाने पर टमाटर का उत्पादन होता है। जिला सोलन में करीब पैंतालीस सौ हेक्टेयर भूमि पर टमाटर की खेती की जाती है। सोलन की हैप्पी वैली यानी कायलर, घट्टी, कोठी, बैरटी, जगातखाना और देवठी के अलावा जौणाजी, नौणी, सलोगड़ा, मनसार, कंडाघाट, चायल, वाकनाघाट, छावशा, प्राथा, बनासर के अलावा गंभरपुल, हरिपुर, कुठाड़, कंडा, हुड़ंग, कैंथड़ी, डगशाई क्षेत्र में बहुतायात में टमाटर का उत्पादन होता है। यहां टमाटर जून में मंडी तक पहुंचना शुरू हो जाता है और बरसात के बाद तक इसका सीजन बरकरार रहता है। बरसात के दिनों में जब देश के अन्य राज्यों में जल भराव से फसल बर्बाद होती है तो हिमाचल के टमाटर की मांग देश भर में बढ़ जाती है। प्रदेश के कुल टमाटर उत्पादन का करीब 40 फीसदी से अधिक अकेले सोलन शहर से आता है। वहीं संसदीय क्षेत्र के एक अन्य जिला सिरमौर का योगदान कुल उत्पादन का करीब 30 फीसदी है। प्लांट लगा तो बढ़ेगी मार्केट कमेटी की आय सोलन सब्जी मंडी में हर वर्ष औसतन पांच से सात लाख क्रेट टमाटर पहुंचता है। इसमें 80 फीसद टमाटर बी व सी ग्रेड का होता है। साइज छोटा होने की वजह से किसानों को यह तीन से चार रुपये प्रति किलो तक बेचना पड़ता है। प्रत्येक वर्ष मंडी में करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक का टमाटर का कारोबार होता है। टमाटर प्रोसेसिंग यूनिट लगने के बाद मार्केट कमेटी की आय में भी वृद्धि होगी। अब यहाँ फंसा है पेंच मार्केट कमेटी सोलन की ओर से धर्मपुर में पांच बीघा भूमि का चयन कर लिया है। पर इस भूमि को अभी तक मार्केट कमेटी को स्थानांतरित नहीं किया गया है। दरअसल टोमेटो प्रोसेसिंग प्लांट के लिए जिस भूमि का चयन किया गया है वो वन विभाग की है। हालांकि प्लांट स्थापित करने के लिए निरीक्षण भी किया जा चुका है। वर्तमान में यह मामला फारेस्ट क्लीयरेंस अप्रूवल के लिए अटका है, जहाँ से अप्रूवल मिलने के बाद टेंडर की प्रक्रिया होगी, लेकिन इसमें अभी भी काफी समय लग सकता है। सत्ता में रहते कांग्रेस ने भी कुछ नहीं किया भले ही वर्तमान में केंद्र और प्रदेश दोनों जगह भाजपा की सरकार हो लेकिन कांग्रेस भी लम्बे समय तक सत्ता में रही है। हकीकत ये है की आज भाजपा पर सवाल उठा रही कांग्रेस ने भी सत्ता में रहते इस दिशा में कुछ नहीं किया। वर्तमान में सोलन विधायक कर्नल धनी राम शांडिल दो बार शिमल संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे है और लगातार दूसरी बार सोलन से विधायक बने है। शांडिल प्रदेश की पिछली सरकार में मंत्री भी थे। इसी तरह वर्तमान में शिमला से सांसद सुरेश कश्यप ने भी फ़ूड प्रोसेसिंग प्लांट का वाद किया था लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ। भाजपा नेता और पूर्व सांसद रहे वीरेंद्र कश्यप को अर्से तक चुनाव में इस मुद्दे को भुनाते रहे लेकिन सांसद रहते कभी उनके प्रयास नहीं दिखे। किसानों को लाभ देने में असफल रही भाजपा : शांडिल सोलन के विधायक कर्नल धनी राम शांडिल का कहना है कि टमाटर प्रोसेसिंग यूनिट शुरू करवाने में भाजपा फेल रही है। सरकार को बने चार साल बीत चुका है। केंद्र में भी भाजपा की ही सरकार है, इसके बावजूद अभी तक यूनिट शुरू नहीं हो पाया। किसानों को लेकर भाजपा ने सत्ता में आने से पूर्व बड़ी-बड़ी बातें की थी लेकिन उन्हें पूरा नहीं किया। सोलन - सिरमौर के किसानों को इससे भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। निश्चित तौर पर यह किसानों के साथ एक बड़ा छल भाजपा ने किया है। प्रदेश सरकार कर रही काम टमाटर आधारित फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट सोलन -सिरमौर के किसानों की आर्थिकी सुधारने में बड़ा कदम होगा और प्रदेश की सरकार इस दिशा में कदम उठा रही है। केंद्र की मोदी सरकार किसान हितेषी है और किसान हित में हरसंभव कदम उठाये जा रहे है। जल्द नतीजा सामने होगा। - सुरेश कश्यप, सांसद शिमला संसदीय क्षेत्र। आदतन तुम ने कर दिए वादे, आदतन हम ने ए'तिबार किया सोलन व आसपास के क्षेत्रों में टमाटर को लाल सोना कहा जाता है। ऐसा इसलिए है क्यूंकि टमाटर ने हज़ारों परिवारों की आर्थिकी बदली है। 1940 के दशक में स्थानीय किसान डीसी मेहता ने सोलन में टमाटर की खेती शुरू की थी और उनकी ये पहल एक क्रांतिकारी कदम साबित हुई। आज सोलन को सिटी ऑफ़ रेड गोल्ड भी कहा जाता है। प्रदेश के कुल टमाटर उत्पादन का करीब 40 फीसदी से अधिक हिस्सा सोलन से आता है, वहीँ जिला सिरमौर का योगदान करीब 30 फीसदी है। शायद ये ही कारण है कि चाहे चुनाव विधानसभा का हो या लोकसभा का, नेता टमाटर किसानों को साधने का कोई प्रयास नहीं छोड़ते। पर विडम्बना ये है कि चुनाव के बाद ये वादे पूरे नहीं होते। 4 निर्वाचन क्षेत्रों में चलेगा टमाटर फैक्टर टमाटर का मुद्दा किसी एक निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित नहीं है। सोलन निर्वाचन क्षेत्र के साथ-साथ मुख्य तौर पर अर्की, कसौली और पच्छाद निर्वाचन क्षेत्रों में टमाटर की अच्छी पैदावार होती है। ऐसे में कम से कम इन चार विधानसभा क्षेत्रों में ये एक महत्वपूर्ण मुद्दा होगा। - टमाटर आधारित फूड प्रोसेसिंग यूनिट की मांग - टमाटर का समर्थन मूल्य तय करने की मांग - कोल्ड स्टोरेज की मांग
68 विधानसभा क्षेत्रों वाले हिमाचल प्रदेश में सत्ता प्राप्ति के लिए हर एक सीट बेहद महत्वपूर्ण है। हर निर्वाचन क्षेत्र की अपनी समस्याएं है, अपने मुद्दे है। प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर के तहत सिर्फ एक ही विधानसभा क्षेत्र आता है, किन्नौर विधानसभा क्षेत्र। इस क्षेत्र के भी छोटे - बड़े कई मसलें है जिनपर सबकी नज़र रहने वाली है, और सबसे बड़ा मसला है प्रस्तावित बिजली प्रोजेक्ट्स। बीते एक साल में प्रदेश के ऊपरी इलाकों में जिस तरह भूस्खलन की घटनाएं हुई है उसके बाद किन्नौर वासियों ने इन प्रोजेक्ट्स के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इसमें कोई संशय नहीं है कि इस क्षेत्र में दरकते पहाड़ विकास की तमाम नीतियों की खामियों को उजागर कर रहे है। किसी ने सही कहा है कि 'अब साेया ताे सुन ले साथी कभी जाग न आएगी।' लगता है किन्नौर की जनता ने ये बात गाँठ बांध ली है। मन में किन्नौर की वादियों को सुरक्षित रखने का दृढ़ निश्चय लेकर किन्नौर की जनता ने जिले में प्रस्तावित बिजली प्रोजेक्ट्स के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजा दिया है। स्थानीय लोगों के अनुसार पूर्व में स्थापित हुए पावर प्राेजेक्ट्स ने किन्नौर की स्थिति ख़राब कर दी है, आए दिन सामने आती प्राकृतिक आपदाओं ने लोगों की परेशानियों को बढ़ा दिया है। ये ही कारण है कि बीते दिनों हाथ में 'नाे माेर प्राेजेक्ट इन किन्नौर, नाे मींज़ नाे' के बैनर के साथ हर वर्ग, हर तबके के युवा, बुद्धिजीवी सड़कों पर उतरे थे। अब किन्नौर की जनता तय कर चुकी है कि विकास के नाम पर किन्नौर को छलनी नहीं होने दिया जायेगा। ये ही वादा यहाँ की जनता नेताओं से भी चाहती है, ये अलग बात है कि अधिकांश नेता इस मुद्दे से बचते नज़र आते है। पर अब चुनावी साल है और नेताओं को जनता के दरबार में आना ही होगा। ये देखना भी दिलचस्प होगा कि क्या राजनैतिक दल बिजली परियोजनाओं के मुद्दे को अपने घोषणा पत्र में शामिल करेंगे। ऊर्जा राज्य हिमाचल में भले ही बिजली उत्पादन की भारी क्षमता है, मगर प्रदेश के पहाड़ अब खोखले हाेने की कगार पर है। जिला किन्नौर की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है। किन्नौर की जनता के संघर्ष का भी ये ही कारण है। फिलवक्त जो सबसे बड़ी बिजली परियोजना किन्नौर में प्रस्तवित है वो है एसजेवीएन के तहत सतलुज बेसिन पर प्रस्तावित 804 मेगावाट क्षमता वाली जंगी-थाेपन बिजली प्राेजेक्ट जिससे सात गांव प्रभावित होंगे। फिलवक्त इस प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य शुरु नहीं हुआ हैं पर निर्माण कार्य शुरु होने की स्थिति में सात गांव को खतरा हाे सकता है। कारण यह है कि जिस क्षेत्र में प्रोजेक्ट तैयार होना है वहां का पूरा एरिया चट्टानों से भरा है। रारंग गांव का पूरा क्षेत्र एनएच-5 के ऊपर ढांक पर बसा हुआ है। उसके बाद थाेपन, खादरा, आकपा, जंगी और लिप्पा गांव तक इस परियाेजना का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब पिछले साल एनएच-5 काे चाैड़ा करने के लिए यहां बलास्टिंग हाे रही थी तब भी रारंग गांव के कुछ लाेगाें के मकानाें में दरारें आ गई थी। इसी के साथ लोगों का मानना है कि परियोजना शुरु होने से इन क्षेत्रों में प्राकृतिक जल स्रोत सूख जाएंगे, जिससे सिंचाई व्यवस्था पूरी तरह से प्रभावित होगी। लोगों के मन में ये डर है कि प्रोजेक्ट बनने के बाद उन्हें विस्थापित किया जा सकता है। ऐसे में जंगी-थोपन बिजली परियोजना निर्माण कार्य शुरु होने से पहले ही सात गांव के लाेगाें ने एकजुट होकर संघर्ष का बिगुल बजा दिया है। एसजेवीएन का दावा, कोई भी गांव नहीं होगा विस्थापित कई वर्षों से विवादों में रही जंगी-थोपन बिजली परियोजना को लेकर हल्ला बाेल के बीच एसजेवीएन ने दावा किया है कि कोई भी गांव विस्थापित नहीं हाेगा। एसजेवीएन का कहना है कि प्रोजेक्ट निर्माण कार्य शुरु होने में अभी तीन से चार साल लग सकते हैं। अभी प्रोजेक्ट प्रस्तावित है और निर्माण से पहले सर्वे किया जा रहा है। एसजेवीएन के अनुसार जहां भी टनल, डैम, पावर हाउस स्थापित होंगे, सब जगहों का वैज्ञानिक तरीके से सर्वे हो रहा है। सर्वे के बाद ही निर्माण कार्य शुरू हाेगा। एसजेवीएन का दावा है कि परियाेजना क्षेत्र में विकास ही हाेगा न कि विनाश। इसके साथ-साथ हिमाचल प्रदेश पावर पाॅलिसी के तहत प्रभावित गांव के परिवाराें काे नाैकरी भी दी जाएगी। लोगों को डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। उल्लेखनीय है कि 804 मेगावॉट की क्षमता वाली जंगी-थोपन बिजली परियोजना स्थापित करने के लिए प्रदेश सरकार के पास एसजेवीएन सहित चार पावर कारपोरेशन से ऑफर आया था। इसमें से एसजेवीएन के साथ एमओयू साइन किया गया। हालांकि इस परियोजना को स्थापित करने के लिए बीडिंग व प्रीमियम की शर्त नहीं हैं, लेकिन बिजली उत्पादन शुरू होने के 40 साल बाद परियोजना राज्य सरकार की होगी। प्राप्त जानकारी के मुताबिक सरकारी शर्तों के अनुसार ही जंगी-थोपन बिजली परियोजना निर्माण कार्य शुरू होगा। ऐसा रहा प्रस्तावित जंगी-थोपन बिजली प्रोजेक्ट का इतिहास जंगी थोपन प्रोजेक्ट का काम पिछले डेढ़ दशक से लटका हुआ है। वर्ष 2006 में राज्य सरकार ने इस प्रोजेक्ट का टेंडर किया था और ब्रेकल को ये प्रोजेक्ट मिला। ब्रेकल ने इसका काम अदानी कंपनी को दिया और अदानी कंपनी से अपफ्रंट मनी की 280 करोड़ की राशि सरकार को मिली। उसके बाद ये प्राेजेक्ट रिलायंस काे दिया गया, लेकिन अपफ्रंट मनी के चक्कर में रिलायंस कंपनी भी पीछे हट गई। इसके बाद इस मसले पर तत्कालीन वीरभद्र सरकार ने 21 सितंबर 2016 को बड़ा फैसला लिया था। रिलायंस के पीछे हटने के बाद राज्य सरकार ने पीएसयू यानी पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग के साथ समझौता करने का फैसला किया, जिसके बाद ये प्रोजेक्ट एसजेवीएन को सौंप दिया गया। जंगी-थाेपन बिजली परियोजना पर अनुमानित 5708 करोड़ रुपये व्यय होने है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक परियोजना के लिए अनुमानित 281.16 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता होगी जिसमें से 247.12 हेक्टेयर भूमि वन भूमि होगी, जबकि 24.81 हेक्टेयर निजी भूमि तथा 9.23 हेक्टेयर बीआरओ व लोक निर्माण विभाग से उपलब्ध होगी। बता दें कि परियोजना के तहत जंगी गांव के नजदीक बांध प्रस्तावित है, जबकि भूमिगत पाॅवर हाऊस का निर्माण काशंग नाला में किया जाएगा। परियोजना से कानम, जंगी, रारंग, मूरंग, स्पीलो व अकपा पंचायतें प्रभावित होंगी। परियोजना के तहत बनने वाली सुरंग आधुनिक तकनीक टीवीएम से बनाई जाएगी। सरकार ठंडे बस्ते से निकाले शुक्ला कमेटी की रिपोर्ट किन्नौर के पहाड़ कच्चे, खुरदरे और संवेदनशील हैं। इस कारण ये अपनी वास्तविक अवस्था से हिल-ढुल गए हैं। विशेषज्ञ मानते है कि पन बिजली परियोजनाओं के बारे में शुक्ला कमेटी की रिपोर्ट को सरकार को ठंडे बस्ते से निकालना चाहिए। उस पर सरकार को अमल करना चाहिए। इस रिपोर्ट के मुताबिक ट्री लाइन से ऊपर कोई भी पन विद्युत परियोजनाएं नहीं बननी चाहिए। प्रोजेक्टों के बीच में भी एक निश्चित दूरी होनी चाहिए। रिटायर्ड अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) अभय शुक्ला ने अपनी रिपोर्ट में ये भी साफ किया था कि हिमाचल के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सभी तरह के प्रोजेक्ट्स पर पूरी तरह रोक लगानी चाहिए। विशेषकर रावी, चिनाव और सतलुज बेसिन पर कोई भी प्रोजेक्ट नहीं होना चाहिए। मुख्य नदियों पर लगने वाले बड़े-बड़े हाइडल प्रोजेक्ट उत्तराखंड जैसी त्रासदी को न्योता दे रहे हैं। सतलुज बेसिन पर ही 22 विद्युत् प्राेजेक्ट्स हर राजनीतिक पार्टी सत्ता में आते ही विकास को गति देने की बात कहती है। प्रदेश की आर्थिकी को बढ़ाने के लिए विकास ज़रूरी है, मगर अब किन्नौर में बने हाईडल प्राेजेक्ट्स संभवत: विकास की जगह विनाश का कारण बन रहे है। जिला किन्नौर में इस वक्त सतलुज बेसिन पर ही 22 छाेटे-बड़े विद्युत् प्राेजेक्ट्स बन चुके हैं और अब एक नया प्रोजेक्ट जंगी थोपन विद्युत् प्रोजेक्ट प्रस्तावित है। घाटी के निवासी अप्रैल 2021 से सतलुज पर प्रस्तावित 804 मेगावाट के जंगी थोपन पोवारी जलविद्युत परियोजना (जेटीपी एचईपी) का विरोध कर रहे हैं। जानकार मानते है कि किन्नौर में सतलुज नदी के बेसिन पर 22 बिजली प्रोजेक्टों का निर्माण किया गया है जो नुक्सान का एक बड़ा कारण है। सतलुज ने 90 के दशक की शुरुआत से राज्य की जलविद्युत महत्वाकांक्षा का सबसे बड़ा भार उठाया है। जानकारी के अनुसार कुल स्थापित क्षमता में से 56 प्रतिशत विद्युत् उत्पादन (5720 मेगावाट) सतलुज बेसिन में किया जाता है। नदी की प्राकृतिक स्थिति के साथ इतने बड़े पैमाने पर गड़बड़ी ने सतलुज बेसिन में जीवन, आजीविका और पारिस्थितिकी को काफी प्रभावित किया है। इसके अलावा सड़कों के निर्माण के लिए होने वाले ब्लास्ट से भी पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। किन्नौर जिले के अधिकांश पहाड़ अति संवेदनशील हैं। बरसात के दौरान यह सबसे ज्यादा दरकते हैं। हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर के पहाड़ बिजली प्रोजेक्टों के निर्माण से खोखले हो रहे हैं। लगातार ब्लास्टिंग बढ़ने से किन्नौर जिले में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। अब नेताओं की होगी जनता की अदालत में पेशी 2022 विधानसभा चुनाव में प्रस्तावित बिजली प्रोजेक्ट्स और खोखले होते पहाड़ों का मुद्दा गूंजना तय है। आज किन्नौर की जो स्थिति है उसके लिए दोनों मुख्य राजनैतिक दल जिम्मेदार है क्यों कि हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन के सियासी रिवाज के साथ दोनों दलों ने सत्ता सुख भोगा है। पर अब बदले हालत में जनता मुखर है और नेताओं के लिए आगे कि रह आसान नहीं होने वाली। अब जब चुनावी साल में टालमटोल की राजनीति करने वाले नेताओं की जनता के दरबार में पेशी होगी, तो उन्हें भी खुलकर अपना रख स्पष्ट करना होगा। जल, जंगल, जमीन बचाने को पूरा क्षेत्र एकजुट हमें किसी भी कीमत पर पावर प्रोजेक्ट मंजूर नहीं है, विकास के नाम पर विनाश होते हुए हम देख नहीं सकते। हमारी पंचायत इस बात पर अड़ी हुई है कि परियोजना का निर्माण होने नहीं दिया जाएगा। इस क्षेत्र में सिंचाई का एक मात्र साधन प्राकृतिक जल स्त्राेत है, साथ ही गांव चट्टानों पर बसे हुए है। यदि प्राेजेक्ट निर्माण कार्य शुरु हाेगा ताे संभवत: पूरे का पूरा क्षेत्र उजड़ जाएगा। इसके लिए सबकाे राजनीति से उठकर संघर्ष करना हाेगा, तभी जल, जंगल और जमीन काे हम बचा पाएंगे। 2022 के चुनाव में ये बड़ा मुद्दा होगा, जो नेता खुलकर साथ देगा उसे ही समर्थन मिलेगा। -राजेंद्र नेगी, प्रधान ग्राम पंचायत रारंग। राजनीति से ऊपर उठ कर संघर्ष करना होगा संघर्ष समिति रारंग ने यह ठान लिया है कि जंगी-थोपन बिजली परियोजना को किसी भी सूरत में शुरु होने नहीं दिया जा सकता। क्षेत्र काे बचाने के लिए सबको एकजुट होकर प्रोजेक्ट का विरोध करना होगा। हम पिछले साल से ही आंदोलन की राह पर अग्रसर है, लेकिन कुछ लोग इसमें भी राजनीति कर रहे हैं, जो बिल्कुल गलत है। हम प्रकृति को बचाने के लिए राजनीति से ऊपर उठ कर संघर्ष करना हाेगा। रारंग, खादरा और अकपा गांव की जनता ने विद्युत परियोजना प्रबंधन को पहले ही चेतावनी दे दी है कि प्रोजेक्ट का काम शुरू हुआ तो अंजाम भुगतने के लिए वे तैयार रहें। हमने कह दिया है कि 'NO MEANS नो'। सभी राजनैतिक दलों और नेताओं को किनौर की आवाज सुननी ही होगी। -सुंदर नेगी, उपाध्यक्ष संघर्ष समिति रारंग। प्रोजेक्ट बना तो कभी भी उजड़ सकते हैं कई क्षेत्र सीधी सी बात है कि थाेपन से लेकर जंगी तक का एरिया पावर प्राेजेक्ट के लिए अनुकूल नहीं हैं, यह क्षेत्र काफी संवेदनशील है, जहां पर छाेटे-छाेटे पहाड़ हैं। प्रोजेक्ट बनने से ये क्षेत्र कभी भी उजड़ सकते हैं। हमारा यही मानना है कि जंगी-थाेपन बिजली परियाेजना का भार सहने के लिए प्राकृतिक एवं भाैगाेलिक दृष्टि से इन पहाड़ों में क्षमता नहीं हैं। हमने पहले दिन से इसका विरोध किया है, जाे अंतिम चरण तक जारी रहेगा। यह प्राेजेक्ट न ताे न्याय संगत है और न ही प्रकृति के अनुकूल। प्राकृतिक जल स्त्रोत से ही हमारे क्षेत्र में कृषि एवं बागवानी होती है। यदि बिजली परियोजना का निर्माण कार्य शुरु हाेगा ताे सब कुछ लुप्त हाे जाएगा जिसे हम होने नहीं देंगे। -राेशन लाल नेगी, अध्यक्ष संघर्ष समिति जंगी। सनद रहे, चार पंचायतों ने किया था चुनाव का बहिष्कार ऐसा नहीं है कि हम प्रोजेक्ट्स का विरोध कुछ महीने पहले से कर रहे है, हिमालय संरक्षण को लेकर हम कई वर्षो से आवाज़ उठा रहे है। मसलन हर चुनावी वर्ष में सेव किन्नौर का मुद्दा अहम रहा है। कई वर्ष पहले से ही हम लोगों से अपील करते आ रहे है जो दुष्परिणाम से अवेयर नहीं थे, हमने नोटा दबाने को लेकर अपील कि लेकिन लोगों में इतना रोष था कि चार पंचायतों ने चुनाव का ही बहिष्कार किया। इसमें रारंग पंचायत, आकपा पंचायत, जंगी पंचायत और कानम यूथ क्लब शामिल है। हमने कैलकुलेट किया पिछले मंडी संसदीय सीट पर हुए चुनाव में नोटा की संख्या में चार गुणा इजाफा हुआ है, निश्चित तौर पर यह काफी बड़ा आंकड़ा है। देखिये हमारी लड़ाई सिर्फ प्रोजेक्ट्स को शुरू करने को लेकर ही नहीं है, हमारी लड़ाई है उन कर्मियों को लेकर जिन्हे बिना नोटिस दिए नौकरी से निकाल दिया जा रहा है या वेतन नहीं दिया जा रहा है, इसके अलावा मुआवजा को लेकर भी हम आवाज़ उठा रहे है। हमारे लिए यह काफी हर्ष की बात है कि इस लड़ाई में साथ देने वाले लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है और हिमालयन रेंज के संरक्षण को लेकर हम अन्य राज्यों से भी लोगों को जोड़ने का प्रयास कर रहे है। यह लड़ाई सिर्फ किन्नौर को बचाने का ही नहीं है बल्कि प्रकृति को बचाने के लिए है। -महेश रोंसेरू,क्यंग किन्नौर सपने दिखाकर किन्नौर वासियों को ठगा गया : निगम भंडारी युवा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष निगम भंडारी ने कहा कि किन्नौर वासियों का हाइड्रो प्रोजेक्टका विरोध करना जायज है। सरकार ने बड़े बड़े सपने दिखा कर किन्नौर वासियों को ठगा और शोषण किया। आज किन्नौर के मजबूत पहाड़ भी जर्जर होने की कगार पर है। पिछले वर्ष पेश आये कई हादसे इस बात के गवाह है कि किन्नौर को सरकार ने खतरे में डाला है। इसके अलावा किन्नौर जिले के काफनू में रमेश एवं पन्छोर हाइड्रो प्रोजेक्ट से 36 कर्मचारियों को नौकरी से निकलना दुर्भाग्यवश है। रोजगार के सपने दिखा कर लोगों को ठगा गया और आज इन स्थानीय मजदूरों को प्रोजेक्ट द्वारा नौकरी से निकालने के बाद अब इन सभी कर्मचारियों के घर के चूल्हे भी जलने बंद हो गए हैं। यदि समय रहते सरकार व प्रोजेक्ट के आलाधिकारी काफनू के स्थानीय कर्मचारियों को नौकरी पर वापस नहीं लेती और 9 महीने की सैलरी नहीं देती, तो आने वाले दिनों में प्रदेश युवा कांग्रेस सरकार व रमेश एवं पन्छोर हाइड्रो प्रोजेक्ट के खिलाफ एक उग्र धरना प्रदर्शन करेगी, जिसकी जिम्मेदार सरकार होगी।
"तुझ को देखा तेरे वादे देखे, ऊँची दीवार के लम्बे साए"..ये कहना है प्रदेश के उन कर्मचारियों का जिनकी मांगें सचिवालय की फाइलों में दबी रह गई, या जिनकी मांगें मंत्री और मुख्यमंत्री के आश्वासनों में उलझी रह गई। अपने अंतिम साल में ये सरकार यूँ तो कई कर्मचारियों पर मेहरबान हुई मगर कुछ कर्मचारी और उनकी मांगें ऐसी रह गई जिन पर मुख्यमंत्री की या तो दृष्टि ही नहीं पड़ी या उन्हें सुलझा पाना अब तक सरकार के लिए सम्भव नहीं रहा। कर्मचारियों को शिकवा विपक्ष से भी है क्योंकि विपक्ष ने भी इनकी आवाज को पुरजोर तरीके से बुलंद नहीं किया। कहते है कि लंबित मांगें अक्सर मुद्दा बन जाया करती है। प्रदेश में भी ऐसी कई लंबित मांगें है जिनके पूरा होने का इंतजार कर्मचारियों को है और यदि ये मांगे पूरी नहीं हुई तो 2022 के विधानसभा चुनाव में ये बड़ा मुद्दा हो सकती है। हिमाचल में कर्मचारियों को भी एक बड़ा वोट बैंक माना जाता है, यहां कर्मचारी और राजनीति का पुराना नाता रहा है। कर्मचारी वोट बैंक सत्ता के लिए कितना महत्वपूर्ण है ये 1993 के विधानसभा चुनाव को याद कर भी समझा जा सकता है। इतिहास गवाह है कि कर्मचारियों को नाराज कर सरकार कभी सत्ता बरकरार नहीं रख पाई। प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में 2,00,000 से अधिक कर्मचारी कार्यरत्त हैं, 2 लाख कर्मचारी यानी 2 लाख परिवार। यह आंकड़ा हिमाचल प्रदेश में सत्ता का गुणा-भाग बदलने के लिए काफी है। जाहिर है कि ये बात सरकार बखूबी जानती है और इसीलिए इस अंतिम साल में कर्मचारियों की मांगें पूरी हो रही है। मगर कुछ मुद्दे अब भी ज्यूं के त्यूं पड़े हुए है। विपक्ष भी इन्हें भुनाने का प्रयास तो कर रहा है लेकिन कई मसलों पर खुलकर बोलने से बचता रहा है। ऐसे ही पांच लंबित मसलो पर पेश है फर्स्ट वर्डिक्ट की विशेष रिपोर्ट.... अपने अंतिम वर्ष में यदि जयराम सरकार कर्मचारियों की इन पांच मुख्य लंबित मांगो पर सकारात्मक निर्णय लेती है तो निसंदेह सत्तारूढ़ भाजपा को इसका लाभ मिल सकता है। वहीं बतौर विपक्ष कांग्रेस अब तक इन मुद्दों को भुनाने में पूरी तरह असरदार नहीं दिखी है। कांग्रेस को इन मुद्दों पर खुलकर अपना पक्ष रखने की जरूरत है। धूमल ने कहा था, आती हुई सरकार की बात मानो जाती हुई सरकार की बात मत सुनो आती हुई सरकार की मानो, ये शब्द थे पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल के l 2017 विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री ने सुजानपुर में ये चुनावी वादा किया था l वादा था कि भाजपा के सत्ता में आते ही मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया जाएगा और अनुबंध कर्मचारियों को नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता प्रदान करने हेतु कार्य किया जाएगा l वादा चुनावी था इसलिए वादा ही रहा, हकीकत नहीं बन पाया। अलबत्ता प्रेम कुमार धूमल सत्ता के शीर्ष पर न हो, पर भाजपा को सत्ता में आए चार साल से अधिक हो गए है l जयराम राज में कई अनसुनी फरियादों में एक अनसुनी फ़रियाद है नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता की मांग। इसे लेकर वर्षों से चला आ रहा संघर्ष अब भी जारी है। जेसीसी की बैठक में नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता मांगने वाले कर्मचारियों को वरिष्ठता तो नहीं मिल पाई थी, पर इसके लिए कमेटी के गठन का आश्वासन जरूर मिला था। अब कर्मचारियों को कमेटी के गठन का इंतजार है। हिमाचल अनुबंध नियमित कर्मचारी संगठन जो पिछले कई सालों से ये मांग कर रहा है कि विभिन्न विभागों में भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के अंतर्गत अनुबंध पर नियुक्त होने के बाद नियमित हुए कर्मचारियों को नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता प्रदान की जाए। इनका कहना है कि सरकार की दहलीज पर हम लगातार दस्तक दे रहे है, जूते घिस गए मगर मांग अब भी पूरी नहीं हुई। बस आश्वासन पर आश्वासन ही दिया जा रहा है। दरअसल ये मसला शुरू हुआ 2008 में, जब बैचवाइज और कमीशन आधार पर लोकसभा आयोग और अधीनस्थ कर्मचारी चयन आयोग द्वारा कर्मचारियों की नियुक्तियां अनुबंध के तौर पर की जाने लगी l पहले अनुबन्ध काल 8 साल का हुआ करता था जो बाद में कम होकर 6 फिर 5 और फिर 3 साल हो गया। ये अनुबन्ध काल पूरा करने के बाद यह कर्मचारी नियमित होते है। अनुबंध से नियमित होने के बाद इन कर्मचारियों की अनुबंध काल की सेवा को उनके कुल सेवा काल में नही जोड़ा जाता, जो संगठन के अनुसार सरासर गलत है। इनका कहना है कि अनुबंध काल अधिक होने से पुराने कर्मचारियों को वित्तीय नुकसान के साथ प्रमोशन भी समय पर नहीं मिल पाती अब मांग है कि उनको नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता प्रदान की जाए ताकि उन्हें समय रहते प्रमोशन का लाभ मिल सके। अनुबंध काल की सेवा का वरिष्ठता लाभ ना मिलने के कारण उनके जूनियर साथी सीनियर होते जा रहे हैं। अनुबंध नियमित कर्मचारी संगठन का कहना है कि कुछ अनुबंध कर्मचारी 8 वर्ष के बाद नियमित हुए, कुछ 6 वर्ष के बाद, कुछ 5 वर्ष के बाद और वर्तमान में 3 वर्ष के बाद नियमित हो रहे हैं और अब आने वाले समय में 2 वर्ष में कर्मचारी नियमित होंगे। ऐसे में ये नीति कर्मचारियों के मौलिक और समानता के अधिकार का हनन है। 70 हजार कर्मचारियों के सम्मान से जुड़ा मुद्दा हिमाचल अनुबंध नियमित कर्मचारी संगठन के प्रदेशाध्यक्ष मुनीष गर्ग और जिलाध्यक्ष सुनील पराशर का कहना है कि नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता ना मिलने से जूनियर कर्मचारी सीनियर होते जा रहे हैं। कर्मचारियों ने कहा कि उनका चयन भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के अनुसार हुआ है इसलिए उनके अनुबंध की सेवा को उनके कुल सेवाकाल में जोड़ा जाना तर्कसंगत है। यह प्रदेश के 70 हजार कर्मचारियों के मान सम्मान से जुड़ा विषय है। सरकार जल्द इस मांग को पूरा करे। कंप्यूटर शिक्षकों के हिस्से आया सिर्फ आश्वासन चार उपचुनाव में सूपड़ा साफ होने के बाद प्रदेश की जयराम सरकार एक्शन मोड में कर्मचारियों की कई लंबित मांगो को पूरा करती दिखी है। एक के बाद एक कई एलानों ने निसंदेह कर्मचारी वर्ग की नाराजगी कम जरूर की है। पर एक वर्ग ऐसा है जिसे लगता है कि सरकार उन्हें अपना समझती ही नहीं है। ये शिकवा है प्रदेश के सरकारी स्कूलों में सेवाएं दे रहे 1421 कंप्यूटर शिक्षकों का। इनका प्रतिनिधित्व कर रहे कंप्यूटर शिक्षक संघ का कहना है कि सरकारी स्कूलों में तैनात कंप्यूटर शिक्षक खुद को ठगा सा महसूस कर रहे है। 20 सालों तक लगातार संघर्ष करने के बावजूद भी कंप्यूटर शिक्षकों की मांगें पूरी नहीं हो पाई है। पिछले करीब दो दशक से कम्प्यूटर अध्यापक राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक स्कूलों में शिक्षा देने का कार्य कर रहे हैं, लेकिन किसी भी सरकार ने कम्प्यूटर अध्यापकों के लिए नीति नहीं बनाई है। इस बीच कांग्रेस की सरकार भी आई लेकिन उन्होंने भी कुछ नहीं किया। इनके हिस्से में अब तक सिर्फ आश्वासन ही आया है। दरअसल 1998 में पूर्व भाजपा सरकार के सीएम प्रेम कुमार धूमल द्वारा शुरुआती दौर में सेल्फ फाइनेंसिंग प्रोजेक्ट के तहत 250 स्कूलों में कंप्यूटर टीचरों को तैनात किया गया था। उसके बाद 2001 में सरकार द्वारा 900 स्कूलों में आईटी शिक्षा आरंभ की गई और कंप्यूटर टीचरों को नाइलेट कंपनी के अधीन कर दिया गया था। वर्ष 2010 में कंप्यूटर टीचरों को आउटसोर्स नाम दिया गया। कंप्यूटर शिक्षक संघ का कहना है कि जो पैट, पीटीए व विद्या उपासक टीचर 2006 के बाद नियुक्त किए गए थे उन्हें सरकार ने नीति बनाकर रेगुलर कर दिया, परंतु कंप्यूटर टीचरों के बारे आजतक किसी भी सरकार ने नहीं सोचा। एक ओर सरकार आईटी शिक्षा को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है वहीं कंप्यूटर टीचरों का बीते दो दशकों से शोषण हो रहा है। महंगाई के दौर में कम्प्यूटर टीचर मात्र 12870 रुपए मासिक वेतन पर कार्य कर रहे है। चालू वित्त वर्ष के बजट में केवल 500 रुपए बढ़ाए गए हैं। राज्य के सरकारी स्कूलों में 1354 कम्प्यूटर शिक्षक शिक्षा दे रहे हैं तथा समस्त शिक्षक आर एंड पी नियमों का अनुसरण करते हैं। इनमें से 90 प्रतिशत कम्प्यूटर शिक्षक 45 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं। कंप्यूटर शिक्षक संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि जब उक्त कम्प्यूटर शिक्षक नौकरी पर लगे थे तो उनका वेतन मात्र 2400 रुपए था और 20 सालों के बाद 13000 तक पहुंचा है। कम्प्यूटर शिक्षक इतने कम वेतन पर बच्चों की पढ़ाई के साथ परिवार का भरण पोषण भी नहीं कर पा रहे हैं तथा अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से मांग की कि कंप्यूटर शिक्षकों को शिक्षा विभाग में समायोजित किया जाए ताकि प्रदेश के कंप्यूटर शिक्षकों का भविष्य सुरक्षित हो सके। निजी कंपनी को बार -बार एक्सटेंशन साल 2001 में सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा शुरू की गई थी और इसका जिम्मा कंपनी को सौंपा गया था। कंपनी की एक्सटेंशन को बार-बार बढ़ा दिया जाता है। कंप्यूटर शिक्षक संघ का कहना है कि आज दो दशक बीत जाने के बाद भी कंपनी की ओर से उनका शोषण ही किया जा रहा है। कंप्यूटर शिक्षक लगातार सरकार से नियमितीकरण की मांग करते आ रहे हैं लेकिन अभी तक मांग पूरी नहीं हो पाई है। जो हक की बात करेगा, 2022 में उसे ही समर्थन ये सिर्फ डेढ़ हजार शिक्षकों का नहीं अपितु डेढ़ हजार परिवारों से जुड़ा मुद्दा है। यदि वर्तमान सरकार इनकी मांगों को पूरा नहीं करती है तो 2022 के विधानसभा चुनाव में निसंदेह इनका साथ उसकी राजैनतिक दल को मिलेगा जो घोषणा पत्र में भी इनकी मांग को स्थान दे, साथ ही इनकी आवाज को उठाये भी। पर विडम्बना का विषय ये है कि फिलवक्त कोई राजनैतिक दल या नेता दमदार तरीके से इनके मसले को नहीं उठा रहा, बस खानापूर्ति की जा रही है। आउटसोर्स कर्मचारी: समीकरण बदलने के लिए काफी है इनकी तादाद बड़े कर्मचारी मुद्दों की फेहरिस्त में एक बड़ा मसला प्रदेश के आउटसोर्स कर्मचारियों से जुड़ा है। हिमाचल के आउटसोर्स कर्मचारियों की समस्याएं पिछले 18 सालों से बढ़ रही है। पिछले 18 सालों से आउटसोर्स कर्मचारी हिमाचल के विभिन्न विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे है मगर उनकी स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं आया। आउटसोर्स कर्मचारी निरंतर अपनी मांगों को लेकर आवाज उठा रहे है मगर सरकार सिर्फ आश्वासन दे रही है। आउटसोर्स कर्मचारियों के मसले हल करने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा एक कमेटी का गठन किया है जिसकी अध्यक्षता जल शक्ति मंत्री महेन्दर सिंह ठाकुर कर रहे है। मंत्री के दरबार में आउटसोर्स कर्मचारियों की पेशियाँ लगातार लग रही है। कभी विभिन्न विभागों में कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों के आंकड़े तलब किये जाते है तो कभी कर्मचारियों को विभागों में ही मर्ज करने का दिलासा दिया जाता है। ये बदस्तूर जारी है मगर ज़मीनी स्तर पर कमेटी के गठन के अलावा और कुछ भी बड़ा नहीं हुआ है। आउटसोर्स कर्मचारी हिमाचल महासंघ प्रदेश सरकार से लगातार स्थायी नीति बनाने, समयावधि पूर्ण होने पर नियमित करने व समान वेतनमान की मांग कर रहा है। संघ के अध्यक्ष शैलेन्द्र शर्मा का कहना है कि आउटसोर्स कर्मचारी कई वर्षों से लगातार अपनी सेवाएं दे रहे हैं परंतु सरकार अभी तक आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए कोई स्थाई नीति नहीं बना पाई है, जबकि इनका मासिक वेतन भी बहुत कम हैं। अध्यक्ष शैलेन्द्र शर्मा का कहना है कि आउटसोर्स कर्मचारियों को मलाल तो इस बात का है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तो बतौर विधायक खुद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने इस मुद्दे को जोर - शोर से उठाया मगर आज सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के बाद इसकी सुध नहीं ली गई। वहीं विपक्ष में रहकर इनकी बात करने वाली कांग्रेस ने भी सत्ता में रहते इनके लिए कुछ नहीं किया। हिमाचल प्रदेश के विभिन्न विभागों, बोर्डो और निगमों में आउटसोर्स आधार पर नियुक्त करीब 25 हजार कर्मचारियों के लिए नीति निर्धारण का काम शुरू जरूर है। जल शक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर को आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए नीति बनाने की कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। कमेटी में शहरी विकास मंत्री सुरेश भारद्वाज और ऊर्जा मंत्री सुखराम चौधरी भी बतौर सदस्य शामिल किए गए हैं। कमेटी का गठन करके सरकार ने इन कर्मचारियों को उम्मीद दी जरूर है ,मगर मांग पूरी होती है या नहीं इसपर सबकी निगाहें है। बता दें कि आउटसोर्स कर्मचारी हिमाचल महासंघ ही वो संगठन है जिसने उपचुनाव के दौरान नो वोट फॉर बीजेपी अभियान छेड़ा था। हालाँकि बाद में इन्हें आश्वासन देकर मना लिया गया था। ऐसे में 2022 विधानसभा चुनाव से पूर्व यदि भाजपा शासित सरकार इनके लिए कुछ नहीं करती तो इनकी नाराजगी सरकार को भारी पड़ सकती है। कमीशन काटकर वेतन देते हैं ठेकेदार आउटसोर्स कर्मचारी वो कर्मचारी हैं जिनको सरकारी विभागों में कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर रखा जाता है। मतलब ये सरकारी विभाग में तो हैं पर सरकारी नौकरी में नहीं हैं। इनकी नियुक्तियां या तो ठेकेदारों के माध्यम से की जाती है या किसी निजी कंपनी के माध्यम से। रूट जो भी है इन कर्मचारियों का शोषण होना तो तय है। ये कर्मचारी काम तो सरकार का करते है मगर इन्हें वेतन ठेकेदार या कंपनी द्वारा मिलता है। न तो इन्हें सरकारी कर्मचारी होने का कोई लाभ प्राप्त होता है न ही एक स्थिर नौकरी। इन्हें जब चाहे नौकरी से निकाला जा सकता है। सरकार द्वारा वेतन तो दिया जाता है मगर ठेकेदार की कमिशन के बाद इन तक तक पहुंच पाता है। कर्मचारियों को चाहिए 15 फीसदी वेतन वृद्धि वाला विकल्प हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में छठे वेतनमान की अधिसूचना जारी की गई है। कर्मचारियों का कहना है की 6 वर्ष से देय वेतनमान की रिपोर्ट के सरकार द्वारा जारी पे रूल्स और पे मैट्रिक्स उनके लिए राहत नहीं बल्कि परेशानियां लेकर आए है। हिमाचल प्रदेश सरकार ने करीब दो लाख नियमित कर्मचारियों के लिए नए संशोधित वेतनमान की अधिसूचना जारी की है, पर कर्मचारियों को इसमें कई विसंगतिया नजर आ रही है। अपने-अपने स्तर पर कई कर्मचारी संगठन इस मसले को उजागर कर रहे है। कुछ संगठन एकजुट हो गए है तो कुछ अकेले ही ये लड़ाई लड़ रहे है। इस वेतनमान में कर्मचारियों को अपना संशोधित वेतनमान लेने के लिए दो विकल्प दिए गए हैं। अगर वे वर्ष 2009 के नियमों को चुनते हैं तो उन्हें 31 दिसंबर, 2015 की बेसिक पे को 2.59 के फैक्टर से गुणा करना होगा। अगर वर्ष 2012 को चुनते हैं तो 2.25 फैक्टर को अपनाना होगा। अगर कोई अधिकारी/कर्मचारी 2009 के नियमों को आधार बनाकर लाभ लेना चाहता है और उसने 2012 के वेतन संशोधन का लाभ नहीं लिया है तो 31 दिसंबर 2015 को उसकी बेसिक पे पर फैक्टर 2.59 लगेगा। इसमें भत्ते और अन्य लाभ अलग से शामिल होंगे। वहीं अगर कोई कर्मचारी वर्ष 2012 के पुनः संशोधन को आधार बनाकर नए वेतनमान का लाभ लेना चाह रहा है तो उसके लिए दो विधियां लगाई जाएगी। पहली विधि के अनुसार 31 दिसंबर 2015 को लिए वेतन को आधार बनाएंगे तो बेसिक वेतन में फैक्टर 2.25 लगाया जाएगा। या फिर दूसरी विधि के अनुसार 31 दिसंबर 2015 की नोशनल पे को आधार बनाया जाएगा। ये विकल्प कर्मचारियों को दिए जरूर गए है लेकिन प्रदेश के कर्मचारियों को पंजाब की तर्ज पर सीधे 15 फीसदी वेतन वृद्धि वाला तीसरा विकल्प नहीं दिया गया है। प्रदेश के कर्मचारी लगातार ये मांग कर रहे थे कि उन्हें वेतन वृद्धि का ये तीसरा विकल्प भी दिया जाए परन्तु ऐसा नहीं हुआ। राज्य के सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी का एक बड़ा कारण 4-9-14 जैसी एश्योर्ड कैरियर प्रोग्रेशन स्कीम का लाभ खत्म होना भी है। तीन जनवरी, 2022 से 4-9-14 के लाभ कर्मचारियों को मिलना बंद हो गए है। 6 सालों के इंतजार के बाद मिले इस नए वेतनमान में कर्मचारियों को कई विसंगतियां नजर आ रही है। सरकारी कर्मचारी जिस तरह से छठे वेतनमान से वित्तीय लाभ प्राप्त होने की गणना कर रहे थे, शायद उस तरह के वित्तीय लाभ उन्हें मिलते नहीं दिख रहे। ये ही कारण है कि हिमाचल का कर्मचारी इस छठे वेतन आयोग की सिफारिशों से पूर्ण संतुष्ट नजर नहीं आ रहा। कर्मचारियों का कहना है कि 6 वर्ष तक कर्मचारियों की बकाया राशी का जो ब्याज सरकार ने कमाया, ये लाभ उसके भी बराबर नही लग रहा। विपक्ष भी भुना रहा ये मुद्दा इस मुद्दे को कर्मचारी ही नहीं बल्कि विपक्ष भी खूब भुना रहा है। छठे वेतनमान को लेकर माकपा विधायक राकेश सिंघा ने सरकार पर कर्मचारियों को बांटने के आरोप लगाए हैं। सिंघा ने कहा है कि सरकार ने वेतनमान को एक समान लागू नहीं किया है। सरकार ने दो कैटेगिरी बनाकर निचले तबके के कर्मचारियों के साथ अन्याय किया है। जबकि निचले तबके के कर्मचारी ही हिमाचल प्रदेश की रीढ़ है। सरकार ने पहले ही पंजाब के समान वेतनमान लागू नहीं किया है। उनका कहना है कि सरकार ने 4-9-14 का फॉर्मूला खत्म करके कर्मचारियों से अन्याय किया है। वहीं कांग्रेस ने भी इसे छलावा करार दिया है। बहरहाल 2022 के विधानसभा चुनाव में ये फैक्टर क्या रंग लाता है, ये देखना रोचक होगा। हिमाचल पुलिस कांस्टेबल का प्रोबेशन पीरियड अब भी 8 वर्ष प्रदेश पुलिस जवानों के पे बैंड का मसला अब तक नहीं सुलझ पाया है। जवानों का मानना है कि सरकार उनके साथ पराया व्यवहार कर रही है। जहां सभी विभागों का अनुबंध कार्यकाल 3 वर्ष से घटाकर 2 वर्ष किया गया, वहीं पुलिस कांस्टेबल का प्रोबेशन पीरियड अब भी 8 वर्ष ही रखा गया है। पुलिस कर्मचारियों ने सरकार से सवाल किये है कि आखिर प्रदेश के इन रक्षकों के साथ सौतेला व्यवहार क्यों ? प्रदेश सरकार की इस अनदेखी से पुलिस जवान व उनके परिवार काफी खफा है। एक तरफ सभी विभागों को सौगातें दी गयी वहीं दूसरी तरफ पुलिस को अनदेखा किया गया। पुलिस कर्मियों का कहना है कि कोविड के समय यही जवान सड़कों पर खड़े थे और अब भी दिन -रात ड्यूटी पर तैनात है। किसी भी प्रकार की इमरजेंसी में पुलिस को ही सबसे पहले याद किया जाता है फिर सरकार क्यों इनको भूल जाती है ? रोष के चलते बीते दिनों पुलिस कॉन्स्टेबल्स ने अपनी मेस बंद रखने का ऐलान भी किया। हिमाचल प्रदेश में पुलिस कर्मी शायद ही इससे पहले कभी इस तरह मुखर हुए हो। दरअसल साल 2015 में सरकार द्वारा पुलिस कांस्टेबल का प्रोबेशन पीरियड 2 साल से बढ़ा कर 8 साल कर दिया गया था। इन कर्मचारियों ने अपनी मांगें कई बार सरकार के सामने रखने की कोशिश की मगर अब तक इनकी मांग को अमलीजामा नहीं पहनाया गया। अब पे बैंड के अलावा राशन भत्ते का भी मामला उठाया गया है। इसे राशन मनी कहा जाता है। यह प्रतिमाह केवल 210 रुपये ही प्रदान किया जा रहा है। हजारों पुलिस कॉन्स्टेबल्स और उनके परिवारों की नाराजगी सरकार को भारी पड़ सकती है। मान लंबित रही तो बनेगा चुनावी मुद्दा पुलिस कॉन्स्टेबल्स के प्रोबेशन पीरियड कम करने की मांग को विपक्ष का भी साथ मिला है। हालांकि सत्ता में रहते कांग्रेस ने भी कभी इनकी सुध नहीं ली, पर अब सियासत जमकर हो रही है। बहरहाल वर्तमान सरकार यदि इस मांग को पूरा नहीं करती है तो इस मुद्दे को चुनावी रंग दिए जाना तय है। हजारों पुलिस कर्मी और उनके परिवार किसी भी राजनैतिक दल के समीकरण बना-बिगाड़ सकते है।
"जो पेंशन की बात करेगा, वो देश पर राज करेगा", ये नारा है उन लाखों कर्मचारियों का जो अपने हक की पेंशन के लिए संघर्ष कर रहे है। पुरानी पेंशन बहाली सिर्फ हिमाचल ही नहीं बल्कि पूरे देश में एक बड़ा मुद्दा बन गई है। प्रदेश में ये मुद्दा क्या स्तर रखता है इसकी झलक 10 दिसंबर को धर्मशाला के दाड़ी मैदान में देखने को मिली। उस दिन पूरा धर्मशाला पेंशन बहाली के नारों से गूँज उठा था। एक नहीं अनेक संगठन पेंशन की मांग के लिए एकत्र हुए और अंत में सरकार को झुकना पड़ा। जो सरकार एक दिन पहले कर्मचारियों को पुरानी पेंशन देने से साफ इंकार कर चुकी थी उसी सरकार ने पुरानी पेंशन बहाली के लिए एक कमेटी गठन करने का आश्वासन दिया। हालांकि वो कमेटी अब तक गठित नहीं हो पाई है। पर कर्मचारियों में कम से कम एक उम्मीद जगी है कि शायद ये सरकार जाते-जाते उनके इस सबसे बड़े मसले को हल कर दे। हिमाचल प्रदेश का कर्मचारी वर्ग अब इस मांग को एक आंदोलन का रूप दे चुका है और सन्देश स्पष्ट है कि चुनावी वर्ष में यदि याचना से काम नहीं चला तो कर्मचारी संगठन रण के लिए तैयार है। पुरानी पेंशन प्रदेश एक ऐसा मुद्दा है जो सत्ता हिलाने की कुव्वत रखता है। लाखों कर्मचारियों का ये मुद्दा अक्सर चर्चा में बना रहता है। इस मुद्दे पर सियासत भी खूब होती है, आए दिन ओपीएस को लेकर किसी न किसी नेता का ब्यान सामने आता है। जाहिर है इनमें विपक्ष के नेता अधिक होते है, वो ही नेता जो सत्ता में रहते हुए चुप्पी साधे हुए थे और अब सरकार को घेरने में आगे रहते है। बहरहाल, यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा कि ये मुद्दा फिलवक्त प्रदेश का एक ऐसा सियासी मुद्दा बन चुका है जो 2022 में 'मिशन रिपीट' या 'मिशन डिलीट' में बड़ी भूमिका निभाएगा। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ये किसी एक कर्मचारी संगठन का मुद्दा नहीं है, अपितु हर कर्मचारी संगठन की मांग में यह शामिल है। हिमाचल प्रदेश एक कर्मचारी बाहुल्य प्रदेश है और ऐसे में यह तय है कि चुनावी फिज़ा में पुरानी पेंशन बहाली का मुद्दा जमकर गूंजने वाला है। पुरानी पेंशन के न होने से प्रदेश के कर्मचारी अपने रिटायरमेंट के बाद के भविष्य की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। कर्मचारी किसी भी सरकार की रीढ़ होती है और जब कर्मचारी ही अपने भविष्य को लेकर सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे है तो ऐसे में सरकार के भविष्य पर सवाल खड़े होते हैं। इस वक्त प्रदेश में करीब पौने तीन लाख कर्मचारी है जिनमें करीब एक लाख बीस हजार वो कर्मचारी है जिन्हें नए पेंशन सिस्टम के तहत पेंशन प्राप्त होती है या होगी। पुरानी पेंशन बहाली की मांग को प्रमुखता से उठाने वाला प्रदेश का सबसे बड़ा संगठन नई पेंशन स्कीम कर्मचारी संघ है जिसमें ये अधिकतर कर्मचारी जुड़े हुए है। सिर्फ यही नहीं बल्कि प्रदेश में कई अन्य संगठन भी है जो पेंशन बहाली की इस मांग को मुनासिब मानते है और इसके लिए संघर्षरत है। हिमाचल के राजनैतिक इतिहास की बात करें तो वर्ष 1993 में कर्मचारियों ने अपनी असल ताकत दिखाई थी और विरोध के चलते भाजपा दहाई का अंक भी पार नहीं कर पाई थी। जाहिर है वर्तमान सरकार भी कर्मचारियों की नाराजगी मोल लेने की स्थिति में नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस मुद्दे पर एनपीएस कर्मचारियों को ओपीएस (ओल्ड पेंशन स्कीम) कर्मचारियों का भी समर्थन मिल रहा है। यह आंदोलन धीरे- धीरे और अधिक उग्र होता जा रहा है और निसंदेह अगले विस चुनाव में यह प्रमुख मुद्दा हो सकता है। मिशन रिपीट के लिए प्रदेश की जयराम सरकार को इस दिशा में कुछ कारगर कदम उठाने होंगे। यदि सरकार ऐसा करने में कामयाब रही तो लाभ तय है और अगर कदम नहीं उठाए तो नुकसान होना भी तय है। 2004 में केंद्र ने लागू की नई पेंशन योजना साल 2004 में केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों की पेंशन योजना में एक बड़ा बदलाव किया था। इस बदलाव के तहत नए केंद्रीय कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना के दायरे से बाहर हो गए। ऐसे कर्मचारियों के लिए सरकार ने नेशनल पेंशन सिस्टम को लॉन्च किया। यह 1972 के केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम के स्थान पर लागू की गई और उन सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए इस स्कीम को अनिवार्य कर दिया गया जिनकी नियुक्ति 1 जनवरी 2004 के बाद हुई थी। अधिकतर सरकारी कर्मचारी नेशनल पेंशन सिस्टम लागू होने के बाद से ही पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल करने को लेकर मुहिम चला रहे हैं। पश्चिम बंगाल को छोड़ कर देश के हर राज्य में नई पेंशन योजना को लागू किया गया है। अधिकतर सरकारी कर्मी पुरानी पेंशन व्यवस्था को इसलिए बेहतर मानते हैं क्योंकि यह उन्हें अधिक भरोसा उपलब्ध कराती है। जनवरी 2004 में एनपीएस लागू होने से पहले सरकारी कर्मी जब रिटायर होता था तो उसकी अंतिम सैलरी के 50 फीसदी हिस्से के बराबर उसकी पेंशन तय हो जाती थी। ओपीएस में 40 साल की नौकरी हो या 10 साल की, पेंशन की राशी अंतिम सैलरी से तय होती थी यानी यह डेफिनिट बेनिफिट स्कीम थी। इसके विपरीत एनपीएस डेफिनिटी कॉन्ट्रिब्यूशन स्कीम है यानी कि इसमें पेंशन राशी इस पर निर्भर करती है कि नौकरी कितने साल की गई है और एन्युटी राशी कितनी है। एनपीएस के तहत एक निश्चित राशि हर महीने कंट्रीब्यूट की जाती है। इसलिए कर्मचारी नहीं चाहते नई पेंशन स्कीम शुरूआती दौर में कर्मचारियों ने इस स्कीम का स्वागत किया, लेकिन जब एनपीएस का असल मतलब समझ आने लगा तो विरोध शुरू हो गया। नई पेंशन स्कीम के अंतर्गत हर सरकारी कर्मचारी की सैलरी से अंशदान और डीए जमा कर लिया जाता है। ये पैसा सरकार उसके एनपीएस अकाउंट में जमा कर देती है। रिटायरमेंट के बाद एनपीएस अकाउंट में जितनी भी रकम इकट्ठा होगी उसमें से अधिकतम 60 फीसदी ही निकाला जा सकता है। शेष 40 फीसदी राशी को सरकार बाजार में इन्वेस्ट करती है और उस पर मिलने वाले सालाना ब्याज को 12 हिस्सों में बांट कर हर महीने पेंशन दी जाती है। यानी कि पेंशन की कोई तय राशी नहीं होती। पैसा कहां इन्वेस्ट करना है, ये फैसला भी सरकार का ही होगा। इसके लिए सरकार ने PFRDA नाम की एक संस्था का गठन किया है। विरोध कर रहे कर्मचारियों का मानना है कि उनका पैसा बाजार जोखिम के अधीन है और बाजार में होने वाले उलटफेर के चलते उनकी जमा पूंजी सुरक्षित नहीं है। पुरानी पेंशन स्कीम इससे कई ज्यादा बेहतर मानी जाती है। उसमें सरकारी नौकरी के सभी लाभ मिला करते थे। पहले रिटायरमेंट पर प्रोविडेंट फण्ड के नाम पर एक भारी रकम और इसके साथ ताउम्र तय पेंशन जो मृत्यु के बाद कर्मचारी के सर्विस बुक में दर्ज नॉमिनी को भी मिला करती थी। अब आश्वासन से काम नहीं चलेगा हिमाचल प्रदेश के दोनों मुख्य राजनैतिक दल यानी कि कांग्रेस और भाजपा पुरानी पेंशन की मांग को जायज भी ठहराते रहे है और इसे पूरा करने का आश्वासन भी देते रहे है। मसला ये है कि विपक्ष में रहते हुए तो दोनों ही इसे कर्मचारियों का अधिकार और हक़ बताते है लेकिन सत्ता में आकर इस मांग को पूरा नहीं करते। पर बीते कुछ समय में यह मुद्दा एक आंदोलन का रूप ले चुका है और ऐसे में दोनों ही दलों के लिए अब इसे ज्यादा लटकाकर रखना संभव नहीं होगा। 2022 चुनाव से पहले जहां सत्तारूढ़ भाजपा पर इस मांग को पूरा करने का दबाव है तो वहीं कांग्रेस को भी इस विषय पर स्पष्ट राय रखनी होगी। नई पेंशन स्कीम लागू होने के बाद केन्द्र में 10 वर्ष कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए ने शासन किया। जबकि 2014 से भाजपा के नेतृत्व में एनडीए सरकार का एकछत्र राज है। इसी तरह प्रदेश में दो मर्तबा वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस काबिज रही है और भाजपा का भी दूसरा टर्म है लेकिन किसी भी सरकार ने पुरानी पेंशन की बहाली के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किये। आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के हर कर्मचारी को पुरानी पेंशन देने के लिए सरकार एकमुश्त दो हजार करोड़ रुपये चाहिए जो फिलवक्त प्रदेश सरकार की आर्थिक हालातों को देखते हुए संभव नहीं लगता। पेंशन पर कितना खर्च मुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा में पेश किये गए आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के हर कर्मचारी को पुरानी पेंशन योजना लागू करने पर एकमुश्त अनुमानित व्यय लगभग 2000 करोड़ रुपये होगा। प्रति वर्ष आवर्ती व्यय लगभग पांच सौ करोड़ होने का अनुमान है, जो फिलवक्त प्रदेश सरकार की आर्थिक हालातों को देखते हुए संभव नहीं लगता। इस पर नई पेंशन स्कीम कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष प्रदीप ठाकुर का तर्क है कि सरकार हर साल अपना और कर्मचारियों का लगभग 1200 करोड़ रुपये की राशी एसबीआई फंड्स प्राइवेट लिमिटेड, एलआईसी पेंशन फंड्स प्राइवेट लिमिटेड और यूटीआई रिटायरमेंट सोल्यूशंस में जमा करती है। ये राशी पीएफआरडीए द्वारा एप्रूव्ड 31 : 35 : 34 के अनुपात में इन तीनों फंड्स में जमा की जाती है। प्रदीप का कहना है कि यदि सरकार डायरेक्ट इन कर्मचारियों को पेंशन देती है तो सरकार के 700 करोड़ रुपये बचेंगे, जो फायदे का सौदा है। नेताओं के लिए क्यों नहीं नई पेंशन स्कीम ? मई 2003 के बाद से माननीयों (सांसद व विधायकों ) को तो पेंशन का लाभ मिल रहा है, जबकि सरकारी कर्मचारी को एनपीएस का झुनझुना थमा दिया गया है। यदि यह योजना इतनी बढ़िया है तो सांसद व विधायकों को भी पेंशन के स्थान पर एनपीएस का ही लाभ देना चाहिए। यदि एक नेता पहले विधायक हो और फिर लोकसभा का चुनाव लड़े और सांसद बन जाए तो उसे दोनों तरफ से पेंशन मिलती है। इस देश में ये सुविधा सिर्फ और सिर्फ नेताओं को ही उपलब्ध है।
" बस्ती में तुम ख़ूब सियासत करते हो, बस्ती की आवाज़ उठाओ तो जानें " फ़ैज़ जौनपूरी का ये शेर व्यापक तौर पर सियासत की असल तस्वीर है। पहले वादे करना और फिर उन वादों को तोड़ देना, ये पुरानी सियासी रवायत है। ऐसे कई नेता है जिन्हें कुर्सी मिलने के बाद अपने क्षेत्र की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं होता। वो कहते है न हमारे देश में चुनाव दो चरणों में होते है, पहले नेता जनता के चरणों में होते है और फिर पांच साल जनता नेताओं के चरणों में। पर लोकतंत्र की खूबसूरती ये ही है कि पांच साल में ही सही नेताओं को जनता दरबार में हाजिरी भी भरनी पड़ती है और पांच साल का हिसाब भी देना पड़ता है। 2022 की शुरुआत हो चुकी है और इस वर्ष के अंत में हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने है। नेताओं का रिपोर्ट कार्ड बनेगा भी और जनता दरबार में पेश भी होगा। कोई आरोप लगाएगा तो कोई सफाई पेश करेगा। कोई उपलब्धियां गिनायेगा तो कोई कमियां उजागर करेगा। पुराने मुद्दे भी कब्र से बाहर निकलेंगे और नेताओं को नए सियासी वचन भी देने होंगे। बहरहाल, हिमाचल प्रदेश में कई ऐसे बड़े मुद्दे है जो आगामी विधानसभा चुनाव में जनमानस के जहन में होंगे। इनमें कई प्रदेश स्तरीय मुद्दे है, कई संसदीय क्षेत्रों के तो कई ज़िलों और विधानसभा क्षेत्रों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ऐसे ही कुछ मुद्दों को फर्स्ट वर्डिक्ट ने टटोला जो अगली सरकार चुनते वक्त प्रदेश के मतदाता के लिए महत्वपूर्ण हो सकते है। यहाँ न सिर्फ ये महत्वपूर्ण होगा कि वर्तमान सरकार ने इस संदर्भ में क्या किया बल्कि विपक्ष का रवैया भी अहम होने वाला है। इनमें से कई मुद्दे दशकों पुराने है, सो मतदाता के जहन में ये भी रहेगा कि जो विपक्ष आज हल्ला मचा रहा है, सत्ता में रहते वक्त उसका क्या रुख था। पेश है ऐसे ही कुछ चुनिंदा मुद्दों पर फर्स्ट वर्डिक्ट का विशेष संस्करण सियासी अतीत 1985 में हुआ था रिपीट हिमाचल प्रदेश में हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन का सियासी रिवाज है। अंतिम बार वर्ष 1985 में वीरभद्र सिंह मिशन रिपीट में कामयाब हुए थे, उसके बाद कोई सरकार रिपीट नहीं कर पाई। इसी सत्ता परिवर्तन थ्योरी से कांग्रेस उत्साहित है, तो वहीं जयराम ठाकुर इतिहास रचने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। 1990 में सीटिंग सीएम हारे वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश की सियासत के सबसे कद्दावर नेता माने जाते है। वीरभद्र सिंह 6 बार मुख्यमंत्री रहे पर एक मौका ऐसा भी आया जब सीएम रहते हुए भी वे चुनाव हार गए। 1990 के विधानसभा चुनाव में वीरभद्र सिंह जुब्बल कोटखाई से चुनाव हार गए और उन्हें हराने वाले थे पूर्व मुख्यमंत्री ठाकुर रामलाल। हालांकि वीरभद्र सिंह रोहड़ू से भी चुनाव लड़े थे जहां से उन्हें जीत मिली। 1993 में चली कर्मचारी लहर 1990 में शांता कुमार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आये थे पर इन दो साल में शांता सरकार के खिलाफ कर्मचारी वर्ग सड़कों पर था। शांता सरकार की "नो वर्क नो पे" की नीति ने उनकी सरकार की विदाई का सारा बंदोबस्त कर दिया था। ताबूत में आखिरी कील साबित हुई 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद बीजेपी शासित राज्य सरकारों की बर्खास्ती। 1993 में राज्य में चुनाव हुए, और भाजपा को शिकस्त मिली। इस चुनाव में शांता अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। 1998 में किंगमेकर बने पंडित सुखराम 1998 के विधानसभा चुनाव में पंडित सुखराम की हिमाचल विकास कांग्रेस ने वीरभद्र सिंह के मिशन रिपीट के अरमान पर पानी फेर दिया था। पंडित सुखराम के पांच विधायक जीतकर आये थे जिनके समर्थन से प्रो. प्रेम कुमार धूमल मुख्यमंत्री बने और पांच साल सरकार चलाई। ये इकलौता मौका था जब इस तरह कोई तीसरा दल हिमाचल में किंगमेकर बना हो। 2003 में सीएम नहीं बन पाई मैडम स्टोक्स 2003 में कांग्रेस की सत्ता वापसी हुई और मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस की तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष विद्या स्टोक्स ने वीरभद्र सिंह को चुनौती दे दी। वीरभद्र सिंह के विरोधियों का साथ भी तब मैडम स्टोक्स को मिलता दिखा। बताया जाता है कि तब मैडम स्टोक्स दिल्ली पहुँच चुकी थी पर वीरभद्र सिंह ने शिमला में अपना तिलिस्म साबित कर दिया। वीरभद्र सिंह ने मीडिया के सामने अपने 22 विधायकों की परेड करा कर अपनी ताकत का अहसास आलाकमान को करवा दिया। 2007 में प्रदेश की सत्ता में फिर भाजपा 2007 में प्रदेश की सत्ता में फिर भाजपा की वापसी हुई और प्रो प्रेम कुमार धूमल दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। तब प्रदेश भाजपा में शांता गुट भी मजबूत हुआ करता था और भाजपा की अंदरूनी खींचतान चरम पर थी। किन्तु प्रो. धूमल ही पार्टी आलाकमान का विश्वास जीतने में कामयाब हुए। इस चुनाव में भी सत्तारूढ़ कांग्रेस के कई मंत्रियों की हार हुई थी। वीरभद्र बोले, 'मैं ढोलक बजाऊंगा और सेना नृत्य करेगी' साल 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले वीरभद्र सिंह केंद्र की सियासत छोड़ वापस हिमाचल लौट आए थे। आलाकमान वीरभद्र के हाथ कांग्रेस की कमान सौंपने के लिए राज़ी नहीं था। पिछले कई साल से प्रदेश में कांग्रेस की जड़ें मज़बूत कर रहे कौल सिंह ठाकुर और आलाकमान के करीबी सुखविंदर सिंह सुक्खू मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। मगर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर वीरभद्र ने आलाकमान को दो टूक चेतावनी दी, 'मैं ढोलक बजाऊंगा और सेना नृत्य करेगी। 'आलाकमान झुका और वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया और वे छठी बार सीएम बने। भाजपा को तो जीता दिया पर धूमल हार गये 18 दिसंबर 2017 को हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आये और भाजपा की सरकार बनी। पर पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के सीएम उम्मीदवार प्रो. प्रेम कुमार धूमल 1911 वोटों से परास्त हो गए। कहते है इस चुनाव में भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं थी, इसी के चलते 30 अक्टूबर को राजागढ़ की रैली में अमित शाह ने धूमल को सीएम फेस घोषित किया। धूमल ने भाजपा को तो जीता दिया लेकिन जनता ने धूमल को ही हरा दिया। इस चुनाव में वीरभद्र कैबिनेट के पांच मंत्री हारे थे।
देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा के संयुक्त तत्वाधान में चल रही सवर्ण आंदोलन जैसा ही एक आंदोलन 2018 के विधानसभा चुनाव से पूर्व मध्य प्रदेश में भी देखने को मिला था। हालांकि दोनों में पूरी तरह समानता नहीं है, दोनों प्रदेशों के सियासी समीकरण भी अलग है, फिर भी जो कुछ हिमाचल में चल रहा है उसे बेहतर तरीके से समझने के लिए मध्य प्रदेश में सवर्ण समाज के आंदोलन पर नज़र डालना बेहद जरूरी है। कुछ लोग मानते है कि हिमाचल में चल रहा आंदोलन मध्य प्रदेश के आंदोलन से प्रेरित है। खासतौर से उपचुनाव में जिस तरह नोटा को लेकर मुहिम छेड़ी गई थी उसके बाद से ही जानकार इस आंदोलन को हल्का लेने की भूल नहीं कर रहे। बेशक सवर्ण आयोग गठन का सरकार ने ऐलान कर दिया हो लेकिन लगता है कि सियासी पिक्चर अभी बाकी है। वर्ष 2018 में एससी/एसटी संशोधन विधेयक संसद से पारित हुआ और सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश निरस्त कर दिया गया जहां इस कानून के तहत बिना जांच गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई थी। देशभर में सवर्ण समाज में इसे लेकर रोष था, पर इसका ज्यादा प्रभाव दिखा मध्य प्रदेश में। दिसंबर 2018 में ही मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी होने थे सो जाहिर है चुनावी बेला में असर भी ज्यादा दिखा। सामान्य पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था (सपाक्स) के बैनर तले मध्य प्रदेश में तब शिवराज सरकार को विरोध का सामना करना पड़ा था। दिलचस्प बात ये है कि तब सपाक्स इस मुद्दे को आधार बनाकर चुनाव मैदान में भी उतरी, हालाँकि जनता ने उसे पूरी तरह नकार दिया। माहिर मानते है कि चुनावी साल में हिमाचल में भी सवर्ण समाज के नाम पर सियासत होना तय है। पर बड़ा सवाल ये है कि क्या देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा चुनावी रण में दिखेंगे या ये नोटा की मुहिम के साथ ही प्रेशर पॉलिटिक्स बरकरार रखने का प्रयास करेंगे। देवभूमि क्षत्रिय संगठन के अध्यक्ष रुमीत सिंह ठाकुर का कहना है कि दोनों राजनैतिक दलों ने बीते कई दशकों से प्रदेश के हितों पर कुठारघात किया है। वो ये भी कहते है कि आने वाले समय में बागवानों के मुद्दों को भी उठाया जायेगा। साथ ही ये कहने से भी गुरेज नहीं करते कि यदि भाजपा -कांग्रेस ने उनकी नहीं सुनी तो जरुरत पड़ने पर तीसरे राजनैतिक विकल्प का रास्ता भी खुला है। नोटा को बनाया जा सकता है हथियार 2018 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की 22 सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा नोटा दबाया गया था और इनमें से अधिकांश भाजपा हारी थी। सवर्ण समाज का वोट भाजपा के साथ माना जाता है और यदि ये नोटा सवर्ण समाज का था तो निसंदेह इसमें भाजपा का ही घाटा रहा। हिमाचल प्रदेश में बीते दिनों हुए उपचुनाव में जिस तरह नोटा को लेकर अभियान चलाया गया उसके पीछे मध्य प्रदेश की इस केस स्टडी को आधार माना जाता है। संभवतः आगामी विधानसभा चुनाव में भी नोटा के इस्तेमाल को ही हथियार बनाया जा सकता है।
प्रदेश की जयराम सरकार भले ही सवर्ण आयोग के गठन को मंजूरी दे चुकी हो लेकिन ये मसला आसानी से हल होता नहीं दिखता। सवर्ण आयोग का गठन देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा द्वारा चलाये गए आंदोलन की सिर्फ एक मांग है। आर्थिक आधार पर आरक्षण और एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट को समाप्त करने जैसी कई अन्य मांगे भी है जिन्हें लेकर सवर्ण समाज का एक तबका आवाज उठा रहा है। 2022 चुनावी साल है और ऐसे में मुमकिन है कि विरोध में उठ रही आवाजें और बुलंद हो। जिस सामान्य वर्ग आयोग (सवर्ण आयोग) के गठन को जयराम सरकार ने मंजूरी दी है उसकी रूपरेखा भी अभी स्पष्ट नहीं है, ऐसे में जानकार मानकर चल रहे है कि टकराव अभी बाकी है। उधर, जानकारों को देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा के सुर अभी से सियासी लग रहे है। जिस तरह इन संगठनों ने उपचुनाव में नोटा को लेकर मुहिम चलाई थी, उसे देखते हुए लगता है कि 2022 में भी इस आंदोलन का राजनैतिक असर देखने को मिलेगा। यहाँ गौर करने लायक बात ये भी है कि ये संगठन भाजपा -कांग्रेस दोनों के खिलाफ मुखर दिखे है। शिमला ग्रामीण विधायक और कांग्रेस नेता विक्रमादित्य सिंह इकलौते ऐसे नेता है जिनसे इन संगठनों को कोई शिकवा नहीं है। अब ऐसा क्यों है और इसके क्या मायने है, इसे लेकर सबका अपना-अपना विश्लेषण है। बहरहाल, 2022 विधानसभा चुनाव की बात करें तो सवर्ण समाज का आंदोलन दोनों मुख्य राजनैतिक दलों के समीकरण बना - बिगाड़ सकता है। विशेषकर, अर्की सहित कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा का खासा प्रभाव दिखता है। अर्की उपचुनाव की भी बात करें तो 2.63 प्रतिशत नोटा दबाया गया था। मंडी संसदीय क्षेत्र उपचुनाव में भी नोटा की संख्या में इजाफा हुआ था। जाहिर है ऐसे में दोनों ही राजनैतिक दल सवर्ण समाज के इस आंदोलन को हल्के में लेने की भूल नहीं कर सकते। एक शगूफा ये भी है कि देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा सीधे तौर पर चुनाव में भी अपना भाग्य आजमा सकते है। देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा द्वारा सवर्ण आयोग के गठन की मुहिम प्रदेश का बड़ा सियासी मुद्दा बन जाएगी, ये शायद किसी ने नहीं सोचा था। सरकार हो या विपक्ष, सब हल्के में लेते रहे और ये आंदोलन अपनी जड़े जमाता गया। करीब एक वर्ष पहले शुरू हुई यह मुहिम आहिस्ता-आहिस्ता नेताओं के जी का जंजाल बन गई। दरअसल हिमाचल प्रदेश में 70 फीसदी आबादी सामान्य वर्ग की है और इस वर्ग का एक बड़ा तबका लम्बे समय से सवर्ण आयोग की मांग कर रहा था। जब देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा के रूप में इस वर्ग को मजबूत आवाज मिली तो सियासी गलियारों का तापमान तो बढ़ना ही था। पहली दफा देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा ने अपनी ताकत का अहसास 20 अप्रैल 2021 को करवाया गया था जब सामान्य संयुक्त मोर्चे ने राज्य सचिवालय का घेराव किया था। करीब तीन घंटे तक छोटा शिमला में चक्का जाम किया गया। मांग थी कि प्रदेश की करीब 70 फीसदी सामान्य वर्ग की आबादी के हित के लिए जातिगत आरक्षण को खत्म किया जाए। दूसरा, सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करे। तीसरी मुख्य मांग एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट में संशोधन करने की थी। चौथी मांग थी कि बाहरी राज्यों के लोगों को सामान्य वर्ग के कोटे में सरकारी नौकरियों में सेंध लगाने से रोकने के लिए एससी और एसटी की तर्ज पर हिमाचली बोनाफाइड होने की शर्त लगायी जाएं। पांचवी और सबसे बड़ी मांग थी सवर्ण आयोग के गठन की। तब सरकार ने 3 महीने की मोहलत मांगी, लेकिन जब तीन महीने के इंतज़ार के बाद भी मांग पूरी नहीं हुई तो सवर्ण समाज द्वारा उपचुनाव में नोटा दबाने की चेतावनी दी। उपचुनाव में नोटा का खासा प्रभाव देखने को भी मिला, खासतौर पर अर्की विधानसभा क्षेत्र में। पर सरकार लगातार इस मांग को नजरअंदाज करती रही और आंदोलन प्रखर होता रहा। सच तो ये है कि सरकार ने कभी इस वर्ग के साथ एक सशक्त संवाद स्थापित करने की शायद जरुरत ही नहीं समझी। उधर, देवभूमि क्षत्रिय संगठन और देवभूमि सवर्ण मोर्चा के सयुंक्त तत्वाधान में आंदोलन मजबूत होता गया। कभी सवर्ण संगठनों द्वारा जातिगत आरक्षण, एट्रोसिटी एससी-एसटी एक्ट और अन्य सवर्ण समाज विरोधी नीतियों की शवयात्रा निकाली गई, तो कभी 800 किलोमीटर लम्बी पदयात्रा की गई। ये पदयात्रा 10 दिसंबर 2021 को धर्मशाला में खत्म हुई और यात्रा के खत्म होने पर जो हुआ वो इतिहास है। विधानसभा सत्र के पहले दिन तपोवन में परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि हजारों के हुजूम और बेइंतहा दबाव के बीच सरकार को झुकना पड़ा। इसे सवर्ण समाज के संघर्ष और हौंसले की जीत समझ लीजिये या फिर दबाव में आकर जयराम सरकार का ऐलान, प्रदेश में अब सवर्ण आयोग के गठन की घोषणा हो चुकी है। ऐसा प्रदर्शन कभी नहीं हुआ 10 दिसंबर 2021 को जो धर्मशाला में हुआ वैसा हिमाचल में कभी नहीं देखा गया। 'जय भवानी' के उद्घोष के साथ हजारों प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने पूरी सरकार को मानो बंधक बना लिया। बाहर जाने वाले एकमात्र रास्ते को बंद कर दिया गया। प्रदर्शनकारी बैरिकेड्स तोड़कर परिसर में घुस गए, गाड़ियों के शीशे तोड़े गए और शंखनाद हुए। सरकारी सम्पति को भी नुकसान पहुंचा और पुलिस कर्मियों पर पत्थर भी बरसे। सरकार इस कदर घेरी गई कि आनन -फानन में सवर्ण आयोग के गठन की घोषणा करनी पड़ी। कैसी होगी सवर्ण आयोग की रूपरेखा सरकार ने सवर्ण आयोग के गठन को अनुमति ज़रूर दी है मगर अभी तक इसकी रूपरेखा स्पष्ट नहीं हो सकी है। यह साफ नहीं है कि सरकार आयोग का अलग से चेयरमैन नियुक्त करेगी या मुख्यमंत्री को ही इसका अध्यक्ष बनाया जाएगा। साथ ही इसके क्षेत्राधिकार और काम की भी व्याख्या होनी बाकी है। अलबत्ता आयोग के गठन को सरकार की हरी झंडी मिली हो लेकिन सवर्ण समाज की कई अन्य मांगे भी है। जाहिर है आर्थिक आधार पर आरक्षण और एट्रोसिटी एक्ट में संशोधन करने जैसी मांगों का जल्द पूरा होना मुमकिन नहीं लगता। ऐसे में आगामी वक्त में टकराव होना तय है। हिमाचल प्रदेश में करीब 70 फीसदी आबादी सामान्य वर्ग की है और इस वर्ग का एक बड़ा तबका लम्बे समय से सवर्ण आयोग की मांग कर रहा था। अब सरकार ने दबाव में आकर सामान्य वर्ग आयोग के गठन को तो हरी झंडी दे दी है लेकिन एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट में संशोधन करने व आर्थिक आधार पर आरक्षण जैसी कई मांगों को लेकर आंदोलन जारी है। अमूमन हर विधानसभा क्षेत्र में इस आंदोलन को कम या ज्यादा समर्थन मिल रहा है। ऐसे में 2022 के विधानसभा चुनाव में ये एक बड़ा फैक्टर होगा। न सिर्फ सत्तारूढ़ भाजपा बल्कि कांग्रेस भी इनके निशाने पर है। मुख्य मांग सामान्य वर्ग की आबादी के हित के लिए जातिगत आरक्षण को खत्म किया जाए आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू हो एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट में संशोधन किया जाए बाहरी राज्यों के लोगों को सामान्य वर्ग के कोटे में सरकारी नौकरियों में सेंध लगाने से रोकने के लिए एससी और एसटी की तर्ज पर हिमाचली बोनाफाइड होने की शर्त लगायी जाएं सवर्ण आयोग का गठन हो
प्रकृति की गोद में बहती टौंस नदी के एक पार है शरली गांव और दूसरे छोर पर है सुमोग गांव। दोनों गांवों में बहुत समानता है, एक ही बोली-भाषा, पहनावा, रीति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान, परंपराएं और समान जीवन शैली। इन दोनों के कुल वंश भी एक ही है और ये दोनों गांव आज भी आपस में खून का रिश्ता मानते हैं। यही वजह है कि वे आपस में शादियां नहीं करते हैं। पर अनेक समानताएं होने के बावजूद इन दोनों गांवों में एक बड़ा फर्क है। मसला ये है कि शरली गांव उत्तराखंड की सीमा से सटा है और हिमाचल के गिरिपार क्षेत्र के तहत आता है। जबकि सुमोग गांव उत्तराखंड के जोंसार बाबर क्षेत्र के तहत आता है। टौंस नदी के उस पार जोंसारा समुदाय को एसटी का दर्जा है और इस पार हाटी समुदाय जनजातीय दर्जे के लिए पांच दशक से भी अधिक वक्त से संघर्ष कर रहा है। यह जिला सिरमौर की 144 पंचायतों का मुद्दा है और हर चुनाव में यह मुद्दा उठता -गूंजता रहा है, पर आश्वासन के सिवा हाटी समुदाय को कुछ नहीं मिला। इसे विडंबना ही कहेंगे कि दूरदराज क्षेत्र से होने के बावजूद भी गिरिपार के हाटी समुदाय को अनुसूचित जनजाति के दर्जे के साथ आने वाली प्रतिष्ठित सरकारी परिलब्धियां नहीं मिल पाई है। इस समुदाय के प्रतिनिधि कई वर्षों से अपनी मांगों को लेकर संघर्षरत है। मगर हुक्मरानों को शायद हाटी समुदाय का मुद्दा सिर्फ चुनाव के दौरान ही याद आता है। हम ऐसा इसलिए कह रहे है क्यूंकि लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव यह मुद्दा हमेशा हर पार्टी का एजेंडा रहा है, मगर अब तक कोई भी सरकार इस मुद्दे का हल नहीं कर पाई है। कई दशकों से गिरिपार क्षेत्र के हाटी समुदाय के लोग जनजातीय दर्जे की मांग कर रहे है, कई सरकारें आई और कई गई मगर अब तक हल नहीं निकल पाया है। 2022 के चुनाव भी नजदीक है और चुनावी लहर में अब नेताओं ने इस मुद्दे को फिर हवा दे दी है। परन्तु अब हाटी समुदाय के लोग किसी झांसे में आने के मूड में नहीं है। वे भी इस मुद्दे पर नेताओं से अपना स्पष्ट रुख चाह रहे हैं। केंद्र और प्रदेश, दोनों में ही भाजपा की सरकार है इसलिए उम्मीदें भी बहुत है और सरकार भी इस ओर सकारात्मक रुख अपनाए हुए है अब बस देखना ये है कि क्या जयराम सरकार के कार्यकाल में केंद्र सरकार इस मांग पर मोहर लगाती है या फिर हाटी समुदाय के लोगों को संघर्ष जारी रखना होगा। गिरिपार का हाटी समुदाय उत्तराखंड के जौनसार बाबर क्षेत्र के जोंसारी समुदाय की तर्ज पर जनजातीय दर्जे की मांग कर रहा है। बता दें कि पूर्व में उत्तराखंड का जौनसार बाबर क्षेत्र सिरमौर रियासत का ही एक भाग था।जौनसार बाबर को 1967 में केंद्र सरकार ने जनजाति का दर्जा दिया था। जौनसार बाबर और सिरमौर के गिरिपार की लोक संस्कृति, लोक परंपरा, रहन-सहन एक समान है। इनके गांवों के नामों और भाषा में भी समानता है। किसी ने नहीं दिया जनजातीय दर्जा कई सरकारें आई और गई, लेकिन हाटी समुदाय को कोई भी सरकार जनजातीय दर्जा नहीं दिला पाई। पहले मनमोहन सिंह और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सिरमौर जिले के गिरिपार को जनजातीय दर्जा दिलाने की फरियाद लगाई गई, लेकिन आज तक हाटी समुदाय अपने हक के लिए लड़ रहा है। सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बावजूद जनजातीय दर्जे का मामला आरजीआई के कार्यालय में अटका हुआ है। पांच दशकों से गिरिपार के लोग जनजातीय दर्जे की मांग कर रहे है लेकिन अब तक किसी भी सरकार के प्रयास नाकाफी रहे है। 1978 से मामला लंबित क्यों? 1978 में पहली बार गिरीपार क्षेत्र के लिए जनजातीय दर्जे की मांग के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को पत्र भेजा गया। 1979 में जब पहली रिपोर्ट आई तो राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग जनजाति के लिए सिफारिश की गयी लेकिन उसके बाद भी मामला लंबित पड़ा रहा। इसके बाद विधानसभा में इसके तहत एक कमेटी गठित की गई जिसका नाम कन्हैया लाल कमेटी रखा गया। ट्राइबल कमीशन के सदस्य टीएस नेगी की कमेटी ने इलाके का दौरा किया और रिपोर्ट भी सौंपी। 1983 में केंद्रीय हाटी समिति बनाई गयी। वर्ष 2011 में केंद्र सरकार ने राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी। राज्य सरकार ने प्रदेश विश्वविद्यालय के जनजातीय शोध एवं अध्ययन संस्थान को यह जिम्मा सौंपा। वर्ष 2011 में केंद्र सरकार ने राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी। राज्य सरकार ने प्रदेश विश्वविद्यालय के जनजातीय शोध एवं अध्ययन संस्थान को यह जिम्मा सौंपा। वर्ष 2016 में इसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी गई। जिसके बाद मामले की फाइल रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के पास लंबित थी। सितंबर 2018 में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने स्वयं हाटी मुद्दे को लेकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह से चर्चा की। छह दिसंबर 2018 को तत्कालीन सांसद वीरेंद्र कश्यप के नेतृत्व में केंद्रीय हाटी समिति का एक प्रतिनिधिमंडल गृह मंत्री से मिला। आरजीआई को गृह मंत्री ने जल्द कार्यवाही के निर्देश दिए गए पर हुआ कुछ नहीं। जनजातीय घोषित होने पर मिलेगा ये फायदा - गिरिपार के युवाओं को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिलेगा और रोजगार के नए द्वार खुलेंगे। - केंद्र सरकार से विकास कार्यों के लिए अतिरिक्त मदद मिलेगी। - लुप्त होती जा रही हाटी लोक संस्कृति को नई पहचान मिलेगी। - क्षेत्र के विद्यार्थियों को शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक मदद मिलेगी। चेतावनी : हाटी समुदाय 2022 के चुनाव का करेगा बहिष्कार सिरमौर के गिरिपार में बसने वाले हाटी समुदाय मामले की गूंज अब सियासत को पलट सकती है। विधानसभा चुनाव 2022 के नजदीक आते ही हाटी विकास मंच के प्रतिनिधिमंडल ने आवाज बुलंद कर दी है। हाटी को जनजातीय क्षेत्र का दर्जा दिलवाने के लिए अब करीब तीन लाख लोग आर पार की लड़ाई के मूड में है। हाल ही में जन प्रतिनिधियों ने गिरिपार की 144 पंचायतों में विशेष बैठकें की। प्रतिनिधिमंडल में मंच के अध्यक्ष प्रदीप सिंगटा समेत सभी सदस्यों का कहना है कि राज्य सरकार ने इस मामले को केंद्र के साथ प्रमुखता से उठाया है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने स्वयं भी इसमें पहल की है, लेकिन अभी तक केंद्र सरकार हाटी को जनजाति का दर्जा नहीं दे पाया है। इससे करीब तीन लाख लोगों में रोष है। मंच के पदाधिकारियों का कहना है कि शिमला के सांसद एवं भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सुरेश कश्यप के प्रति लोगों में रोष है। मंच के पदाधिकारियों का कहना है कि कश्यप इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर केंद्र ने एसटी का दर्जा नहीं दिया तो हाटी समुदाय 2022 के चुनाव का बहिष्कार करेगा। मंच ने सिरमौर जिले के विधायकों के प्रति भी रोष जताया। सांसद रहते धूमल भी उठा चुके है मुद्दा 1994 में पूर्व मुख्यमंत्री प्रोफ़ेसर प्रेम कुमार धूमल ने सांसद रहते हुए संसद में इस मामले को प्रमुखता व प्रखरता के साथ उठाया था। उनके नेतृत्व में भाजपा ने इस मुद्दे को वर्ष 2007 और 2017 के अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल किया। हिमाचल प्रदेश की भाजपा सरकार ने समय समय पर गिरिपार क्षेत्र को जनजातीय घोषित करने की संस्तुतियां की और घोषणा पत्र में शामिल किया। जनजातीय मंत्री जुयाल ओराम ने हरिपुरधार में सार्वजनिक मंच पर गिरिपार क्षेत्र को जनजातीय दर्जा देना की घोषणाएं की थी। आश्वासन : एथनोग्राफिक रिपोर्ट पर चर्चा कर भेजी जाएगी रिपोर्ट केंद्रीय हाटी समिति का एक प्रतिनिधिमंडल बीत दिनों सांसद सुरेश कश्यप की अगुवाई में दिल्ली में आरजीआई से मिला। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने उनसे जनजातीय विकास विभाग द्वारा किए एथनोग्राफिक सर्वे की रिपोर्ट पर भी चर्चा की। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल द्वारा आर.जी.आई को पहले की रिपोर्ट में लगाई गई सभी आपत्तियों के बारे में तथ्यों के साथ स्पष्टीकरण दिया गया, जिसका समाधान हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा 18 सितम्बर 2021 को जनजातीय मंत्रालय भारत सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी गई एथनोग्राफिक रिपोर्ट में भी किया गया है। आर.जी.आई ने आश्वस्त किया कि वह तकनीकी विशेषज्ञों के साथ हाटी समुदाय की एथनोग्राफिक रिपोर्ट पर चर्चा करेंगे और उसके बाद रिपोर्ट जनजातीय मंत्रालय को भेजी जाएगी। अब आश्वासन नहीं एक्शन चाहिए यूँ तो गिरिपार क्षेत्र को जनजातीय दर्जा देने का मामला दशकों पुराना है और संघर्ष लगातार जारी है। किन्तु बीते कुछ समय में यह आंदोलन अधिक संगठित और नियोजित दिख रहा है। सोशल मीडिया का भी भरपूर इस्तेमाल हो रहा है और सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास जारी है। हाल ही में जिस तरह सवर्ण समाज के आंदोलन के आगे सरकार घुटने टेकती दिखी है उसके बाद हाटी समुदाय में भी जोश बढ़ा है। अब यह समुदाय किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं है। अब इन्हे आश्वासन नहीं एक्शन चाहिए। हाटी समुदाय के मुद्दे पर कांग्रेस ने की राजनीति : कश्यप भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद सुरेश कश्यप का कहना है कि उत्तराखंड का जौनसार बाबर एवं जिले का गिरिपार क्षेत्र रियासत काल में जिला सिरमौर रियासत का ही हिस्सा था। गिरिपार क्षेत्र के साथ लगते जौनसार बाबर क्षेत्र को 1967 में जनजातीय घोषित किया गया था लेकिन इसके साथ लगते जिला सिरमौर की 2 विधानसभा क्षेत्र और एक आधे क्षेत्र में भी जनजाति घोषित करने की मांग काफी समय से चली आ रही है। सांसद का कहना है कि इस मांग को लेकर जिले के प्रतिनिधि 20 दिसंबर, 2011 को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं 14 फरवरी 2017 को वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिल चुके हैं। हमने समय-समय पर लोकसभा में यह मुद्दा में उठाया है। अगर हाटी समुदाय की लड़ाई किसी पार्टी ने लड़ी है तो वह भाजपा है, कांग्रेस ने केवल इस मुद्दे पर राजनीति की है। भाजपा ने निरंतर हाटी समुदाय को जनजातीय दर्जा दिलाने का प्रयास किया है, केंद्रीय मंत्री से मिलना, आरजीआई को सभी पहलुओं को पूर्ण रूप से समझाना और इस मुद्दे को आगे लेकर जाने का काम भाजपा ने किया है। सांसद सुरेश कश्यप का कहना है कि हाटी समुदाय के मुद्दे को केंद्र लोक सभा मे भी भाजपा ने अनेकों बार उठाया है और जल्द ही इस मुद्दे पर सकारात्मक फैसला आएगा।
ज्वालामुखी विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत आधवाणी में आज स्थानीय विधायक एवं राज्य योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष रमेश धवाला ने साढ़े 37 लाख रुपए की लागत से बने मुख्यमंत्री लोक भवन का विधिवत उद्घाटन कर जनता को समर्पित किया। इसके साथ ही उन्होंने पानी की समस्या को देखते हुए इसी क्षेत्र में एक नए ट्यूबवेल का भी शुभारंभ किया और क्षेत्र के लोगों की बिजली की समस्या को समाप्त करने के लिए 63 केवी बिजली का ट्रांसफार्मर रखवाया। विधायक रमेश धवाला ने जनता को संबोधित करते हुए कहा की जयराम ठाकुर सरकार ने प्रदेश के हर क्षेत्र का समान विकास किया है और समाज के हर वर्ग को राहत प्रदान की है उन्होंने कहा कि देश और प्रदेश में डबल इंजन की सरकार ने विकास के आयाम प्रस्तुत किए हैं चंगर् और बलिहार क्षेत्र में करोड़ों रुपए की योजनाएं बनकर तैयार हो रहे हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास हुआ है जल शक्ति विभाग में कई योजनाओं को विस्तार किया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं कृषि बागवानी विद्युत व अन्य क्षेत्रों में बहुत तरक्की हुई है जिसका श्रेय मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को जाता है। इस मौके पर भाजपा नेता मान चंद, राणा विजय मेहता, रामस्वरूप शास्त्री, विमल चौधरी, अनिल धीमान, कुलदीप शर्मा, श्याम दुलारी व क्षेत्र के अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
पुलिस थाना खुंडिया के अंतर्गत लहासा गिरने एक व्यक्ति की मौत हो गई। प्रधान वारीकलां सतवीर कुमार ने फोन करके थाना पर सूचना दी कि उन्होंने पंचायत में मनरेगा के तहत बावड़ी का काम लगाया हुआ था,जिसमें लहासा गिरने से ब्रह्म दास निवासी गांव रामनगर ल्हासे की चपेट में आ गया, जिसे तुरंत उपचार के लिए पनहार ले जाया गया। जहां पर प्राथमिक इलाज में डाक्टर ने व्यक्ति को मृत घोषित कर दिया। पनहार अस्पताल पहुँची पुलिस ने मृतक ब्रह्म दास के परिवार जन व अन्य लोगों के ब्यान भी कलमबंद किए हैं, बताया जा रहा है कि ब्रह्म दास की मृत्यु बावडी में काम करते समय लहासा उसके उपर गिरने से होना पाई गई, इस मामले पर कोई भी शक जाहिर नहीं हुआ है। मामले की पुष्टि करते हुए डीएसपी ज्वालामुखी चन्द्रपाल ने बताया कि पुलिस द्वारा शव को कब्जे में लेकर आगामी पोस्मार्टम हेतु सिविल अस्पताल देहरा भेज दिया है।पुलिस द्वारा 174 सीआरपीसी के तहत कार्यवाही अमल में लाई गई है।
हिमाचल में लगातार बढ़ रहे कोरोना के मामलों के चलते राज्य सरकार की कैबिनेट बैठक शुरू हो गई है। इस बैठक में कोरोना बंदिशों के साथ वीक एंड कर्फ्यू या लॉकडाउन जैसे कड़े फैसले ले सकती है। बता दें की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चर्चा के बाद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर बंदिशें बढ़ाने की घोषणा कर सकते हैं। परिवहन निगम की बसों को 50 फीसदी ऑक्यूपेंसी के साथ चलाने पर भी मंथन होना हैं। बाहरी राज्यों से हिमाचल आने वाले लोगों के लिए सरकार कोरोना वैक्सीन की दोनों डोज अनिवार्य कर सकती है। स्वास्थ्य विभाग कैबिनेट की बैठक में कोरोना की वास्तविक स्थिति के बारे में प्रस्तुति देगा। बैठक में पिछले 10 दिन की कोरोना की स्थिति का ब्योरा रखा जाएगा। प्रदेश में महामारी तीन गुना रफ्तार से फैल रही है। प्रदेश में एक्टिव मरीजों की संख्या 6 हजार पार हो गई है। इधर स्वास्थ्य विभाग ने 20 हजार आइसोलेट किट तैयार की हैं। प्रदेश में इस समय 17 मरीजों की हालत ठीक नहीं है। सरकार ने डॉक्टरों, नर्सों और फार्मासिस्टों के तबादलों व समायोजनों पर फिर रोक लगाई है। स्वास्थ्य विभाग के छह हजार कर्मचारियों की फील्ड में तैनाती की है।
कोरोना की तीसरी लहर लगातार प्रदेश में बढ़ रही है , इसके चलते अब नेताओं को भी कोरोना अपनी चपेट में ले रहा है . अब शिमला संसदीय क्षेत्र के सांसद और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुरेश कश्यप कोरोना संक्रमित पाए गए हैं। उन्होंने इसकी जानकारी ट्वीट कर दी। सुरेश कश्यप ने कहा कि शुरुआती लक्षण दिखने पर उन्होंने कोरोना टेस्ट करवाया था जिसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। उन्होंने खुद को घर पर आइसोलेट कर लिया है और डॉक्टरों की सलाह ले रहे हैं। सुरेश कश्यप ने कहा कि उनके संपर्क में आए लोग कोरोना जांच करवा लें और डॉक्टर की सलाह से खुद को आइसोलेट करें। इसके साथ ही प्रदेश के शिक्षा मंत्री गोविंद ठाकुर भी कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। उन्होंने भी अपने आप को आइसोलेट कर दिया है .
हिमाचल प्रदेश के राशनकार्ड उपभोक्ताओं के लिए राहत की खबर सामने आई है। राशनकार्ड उपभोक्ताओं को फरवरी माह से और सस्ता रिफाइंड तेल मिलेगा। खाद्य आपूर्ति निगम ने कंपनियों से 17 जनवरी तक टेंडर आमंत्रित किए हैं। कंपनियों को इसी तारीख तक खाद्य आपूर्ति निगम में रिफाइंड तेल के सैंपल भी जमा करने होंगे। वर्तमान में राशनकार्ड उपभोक्ताओं को 137 रुपये प्रति लीटर रिफाइंड तेल मिलता है। आयात शुल्क में 5 फीसदी की कमी होने से उपभोक्ताओं को यह तेल 125 रुपये प्रति लीटर मिलने की संभावना है। हिमाचल प्रदेश के साढ़े 18 लाख राशनकार्ड उपभोक्ताओं को डिपो में सस्ता राशन मिलता है। इसमें दो लीटर तेल दिया जाता है। एक लीटर सरसों और एक लीटर रिफाइंड दिया जाता रहा है। कई डिपो में रिफाइंड तेल की कमी होने से उपभोक्ताओं को दो लीटर सरसों तेल भी दिया गया है। इसके अलावा तीन दालें, 500 ग्राम प्रति व्यक्ति चीनी और एक किलो आयोडीन नमक सब्सिडी पर दिया जा रहा है। आटा और चावल केंद्र सरकार सब्सिडी पर उपलब्ध करा रही है।
जिला शिमला में बर्फबारी के कारण सड़कों की हालत खस्ता बनी हुई है। सड़क पर फिसलन होने के कारण लोगों को पैदल चलना भी काफी मुश्किल हो रहा है। ऐसे में शिमला पुलिस लोगों के लिए मददगार साबित हो रही है। पुलिस बर्फ में फंसे लोगों को ना कर बचाती है बल्कि उन्हें सुरक्षित स्थान पर भी पहुंचा रही है। ऐसे ही ताजा मामले में पुलिस ने कुफरी के समीप पश्चिमी बंगाल के 6 पर्यटकों को रेस्क्यू किया है। यह लोग फिसलन होने के कारण फस गए थे और अपनी गाड़ी तक नहीं पहुंच पा रहे थे। ऐसे में शिमला पुलिस को सूचना मिली कि कुफरी चीनी बंगला के पास सड़क पर फिसलन होने के कारण कुछ लोग फंस गए हैं। ढली पुलिस मौके पर पहुंची और 6 लोगों को सुरक्षित निकाला। पुलिस ने उन्हें उनकी पांच गाड़ियों तक पहुंचाय। पुलिस की पूछताछ में उन्होंने बताया कि वह पश्चिम बंगाल से घूमने शिमला आए थे। उनमे से एक लड़की की हार्टबीट बढ़ रही थी, ऐसे में पुलिस ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। जहां उन्हें प्राथमिक उपचार दिया गया। उसके बाद अब लड़की की हालत ठीक बताए जा रही है। गौरतलब है कि पुलिस आए दिन लोगों को आगाह कर रही है कि फिसलन वाली जगहों पर ना जाए और गाड़ी सुरक्षित चलाएं। बावजूद इसके कुछ लोग पुलिस तीन बातों को नजरअंदाज कर रहे हैं और मुसीबत में फंस रहे हैं। अंत में पुलिस ही उनके लिए मददगार साबित हो रही है। बीते दिनों भी पुलिस ने नारकंडा में कई लोग जो बर्फ में फंस गए थे और चलने में समस्या आ रही थी उन्हें सुरक्षित बचाया और उनके स्थान पर पहुंचाया था।
शिमला: नए साल में भाजपा विधायक दल की पहली बैठक 16 जनवरी को पीटरहॉफ शिमला में होगी। सीएम जयराम ठाकुर इसमें विधायक प्राथमिकता योजनाओं बैठकों के बारे में भी चर्चा करेंगे। वंही मुख्यमंत्री विधानसभा के चुनावी साल में विधायकों को अधिक सक्रियता से काम करने के बारे में निर्देश जारी करेंगे। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी सभी विधायकों को पिछले चार साल का रिपोर्ट कार्ड देने को कहा है। कई विधायकों को चुनावी वर्ष शुरू होते ही अभी से टिकट कटने की आशंका है। इस बैठक में कोविड की तीसरी लहर के चलते विधानसभा हलकों में भी बेहतरीन कार्य करने के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर निर्देश जारी करेंगे। वन्ही भाजपा आगामी चुनावों के लिए रणनीति तैयार करेगी।
एमसीएक्स पर गुरुवार को सोने और चांदी की कीमतों में इजाफा हुआ है। सोने की कीमत में आज 0.08 फीसदी बढ़ गई है। इस तेजी के साथ दस ग्राम 24 कैरेट सोने की कीमत बढ़कर 47,848 रुपये पर आ गई है। इसके साथ ही चांदी की कीमत में भी तेजी आई है। चांदी का दाम 0.12 फीसदी बढ़कर 61,931 रुपये प्रति किलोग्राम हो गया है। आभूषण बनाने के लिए ज्यादातर 22 कैरेट का ही इस्तेमाल होता है। कुछ लोग 18 कैरेट सोने का भी इस्तेमाल करते हैं। आभूषण पर कैरेट के हिसाब से हॉल मार्क बना होता है। 24 कैरेट सोने के आभूषण पर 999 लिखा होता है, जबकि 23 कैरेट पर 958, 22 कैरेट पर 916, 21 कैरेट पर 875 और 18 कैरेट पर 750 लिखा होता है।
कड़ाके की ठंड के बीच उत्तर भारत के कई राज्यों में बारिश की संभावना जताई गई है। मौसम विभाग ने बुधवार सुबह बारिश की चेतावनी जारी की है। इस बारिश के कारण इन राज्यों में और भी ठिठुरन बढ़ेगी। वहीं मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में शीतलहर के आसार जताए गए हैं। ओडिशा में चक्रवाती परिसंचरण की वजह से बुधवार को जमकर बारिश हुई। मौसम विभाग ने अगले 24 घंटे के दौरान और भी अधिक बारिश होने का पूर्वानुमान जताया है। मौसम विभाग ने आज सुबह ट्वीट कर जानकारी देते हुए बताया कि अगले दो घंटों के दौरान हरियाणा के कुरुक्षेत्र और करनाल के अलावा उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, देवबंद, मुजफ्फरनगर और शामली के आसपास क्षेत्रों में हल्की से मध्यम तीव्रता की बारिश होने की संभावना जताई है। मौसम विभाग ने यूपी के मेरठ में भी बारिश की संभावना जताई थी। पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान, मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में शीतलहर के आसार हैं। उत्तर पश्चिम भारत के मैदानी इलाकों में न्यूनतम तापमान में दो से तीन डिग्री की गिरावट आएगी। 13 से 15 जनवरी के बीच पंजाब, उत्तरी राजस्थान, हरियाणा और चंडीगढ़ में अलग-अलग इलाकों में शीत लहर रह सकती है।
भारत में कोरोना वायरस के मामलों में अचानक आए उछाल के बीच उसके नए वैरिएंट के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से बुधवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में पिछले 24 घंटों में ओमिक्रॉन के 620 नए केस दर्ज किए गए हैं। नए मामलों के आने के साथ देश में ओमिक्रॉन के कुल मामलों की संख्या बढ़कर 5,488 पहुंच गई है। इससे पहले, बुधवार को 407, मंगलवार को 428 और सोमवार को 410 नए मामले दर्ज किए गए थे। हालांकि, राहत की बात यह है कि ओमिक्रॉन के कुल संक्रमितों में से 2,162 मरीज़ ठीक हो चुके हैं। ओमिक्रॉन से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में महाराष्ट्र, राजस्थान और दिल्ली शीर्ष पर हैं। महाराष्ट्र में अब तक सबसे ज्यादा 1,367 ओमिक्रॉन के मरीज सामने आए हैं। इनमें से 734 मरीज ठीक हो चुके हैं। दूसरे नंबर पर राजस्थान में 792 और दिल्ली में 549 मामले (तीसरे पायदान पर) अब तक सामने आए हैं। वंही अन्य राज्यों की बात करें तो केरल में 486, कर्नाटक में 479, पश्चिम बंगाल में 294, उत्तर प्रदेश में 275, तेलंगाना में 260, गुजरात में 236, तमिलनाडु में 185, ओडिशा में 169, हरियाणा में 162, आंध्र प्रदेश में 61, मेघालय में 31, बिहार में 27, पंजाब में 27, जम्मू-कश्मीर में 23, गोवा में 21, मध्य प्रदेश में 10, असम में 9, उत्तराखंड में 8, छत्तीसगढ़ में 5, अंडमान एंड निकोबार में 3, चंडीगढ़ में 3, लद्दाख में 2, पुद्दुचेरी में 2, हिमाचल प्रदेश में 1 और मणिपुर में 1 मामला दर्ज किया गया है।
एमसीएक्स पर बुधवार को सोने की चमक कमजोर हुई, तो दूसरी ओर चांदी की कीमत में भी गिरावट आई है। अगर आप आभूषण खरीदने का मन बना रहे हैं तो आज आपके लिए बेहतर मौका है। इससे पहले सोने और चांदी का ताजा भाव जानना आपके लिए फायदेमंद होगा। सोने की कीमत में आज 0.11 फीसदी की कमी आई है। इस गिरावट के साथ दस ग्राम 24 कैरेट सोने की कीमत कम होकर 47,635 रुपये पर आ गया है। इसके साथ ही चांदी की कीमत भी टूटी है। चांदी का दाम 0.15 फीसदी गिरकर 61,014 रुपये प्रति किलोग्राम हो गया है। आभूषण बनाने के लिए ज्यादातर 22 कैरेट का ही इस्तेमाल होता है। कुछ लोग 18 कैरेट सोने का भी इस्तेमाल करते हैं। आभूषण पर कैरेट के हिसाब से हॉल मार्क बना होता है। 24 कैरेट सोने के आभूषण पर 999 लिखा होता है, जबकि 23 कैरेट पर 958, 22 कैरेट पर 916, 21 कैरेट पर 875 और 18 कैरेट पर 750 लिखा होता है।
देश में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। इस बीच दिल्ली की स्थिति भी कोरोना संक्रमण के मामले में काफी खराब है। बीजेपी ऑफिस में कोरोना बम फूटा है। चुनावी मौसम के बीच बीजेपी दफ्तर में एक साथ 30 से ज्यादा लोग कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं। जानकारी के मुताबिक बीजेपी के केंद्रीय कार्यालय में कोविड-19 जांच में पार्टी प्रवक्ता समेत 30 से ज्यादा लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। बीजेपी ऑफिस में पार्टी प्रवक्ता के अलावा ऑफिस में काम करने वाले, कई कैंटीन कर्मचारी भी कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। चुनावी मौसम में बैठकों का दौर शुरू होने के बीच पार्टी की ओर से सभी पदाधिकारियों और कर्मचारियों का मंगलवार को कोरोना टेस्ट करवाया गया था। जांच रिपोर्ट में बीजेपी ऑफिस के 30 से ज्यादा लोग कोविड-19 वायरस से संक्रमित मिले। इसके अलावा बीजेपी के कई दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री भी कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के बाद अब केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं।
हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों में अब नए शैक्षणिक सत्र से पहली से पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों को योग और संगीत विषय पढ़ाया जाएगा। प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय को इस बाबत आदेश जारी हो गए हैं। प्राथमिक स्तर के शिक्षकों को दोनों विषयों को पढ़ाने की जिम्मेवारी सौंपी गई है। शीतकालीन स्कूलों में फरवरी और ग्रीष्मकालीन स्कूलों में अप्रैल से यह दोनों नये विषय पढ़ाए जाएंगे। विद्यार्थियों को शारीरिक तौर पर चुस्त दुरुस्त रखने के लिए सरकार ने योग विषय को शुरू करने का फैसला लिया है। सरकारी स्कूलों में योग को विषय के तौर पर शुरू करने के लिए चुनावी दृष्टि पत्र में घोषणा की गई थी। इसमें अब योग के साथ संगीत विषय को भी जोड़ दिया गया है। योग और संगीत का पाठ्यक्रम एससीईआरटी सोलन ने तैयार कर लिया है।
जिला चंबा में एक दर्दनाक हादसा पेश आया है। दरअसल चंबा जिले में ब्रंगाल-मंगलेरा सड़क मार्ग पर द्रबला के पास एक कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इस हादसे में दो लोगों की मौत हो गई जबकि तीन घायल हैं। मिली जानकारी के अनुसार कार अनियंत्रित होकर 300 मीटर गहरी खाई में जा गिरी है। कार को खाई में गिरता देख ग्रामीण घटनास्थल की ओर भागे और पुलिस को सूचित किया। पुलिस टीम ने मौके पर पहुंच कर ग्रामीणों की मदद से घायलों को अस्पताल पहुंचाया। डीएसपी मयंक चौधरी ने बताया कि हादसे के कारणों की छानबीन की जा रही है।
देशभर में आज राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा की काउंसलिग शुरू हो जाएगी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने भी पिछले दिनों इस बात की पुष्टी की थी। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सात जनवरी को अपने अंतरिम आदेश में 2021-22 के लिए नीट-पीजी दाखिले के लिए मेडिकल काउंसलिंग करने की अनुमति दे दी थी। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा था कि सभी रेजिडेंट डॉक्टर्स को स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा दिए आश्वासन के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद MCC द्वारा NEET-PG काउन्सलिंग 12 जनवरी 2022 से शुरू की जा रही है। इससे कोरोना से लड़ाई में देश को और मज़बूती मिलेगी। न्यायालय ने अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को 27 प्रतिशत तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए दस प्रतिशत आरक्षण की वैधता पर मुहर लगाते हुए सरकार को जल्द से जल्द कांउसलिंग कराने का निर्देश दे दिया था। उल्लेखनीय है कि देश में नीट-पीजी परीक्षाएं 11 सितंबर 2021 को शुरू हुईं थी। इससे पहले जनवरी और अप्रैल में दो बार परीक्षा कार्यक्रम में बदलाव किया गया था।
पंजाब में विधानसभा चुनावों की तारीखों के ऐलान के बाद आज चंडीगढ़ में मीडिया से बात करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब सरकार की कानून व्यवस्था पर सवाल उठाए है। उन्होंने कहा कि इतने सालों से बादल परिवार और कांग्रेस दोनों मिलकर पंजाब को लूट रहे थे, ये सिलसिला अब बंद होगा। पंजाब में कांग्रेस सरकार के दौरान बेअदबी कांड, बम ब्लास्ट और प्रधानमंत्री तक की सुरक्षा में चूक हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। जिसे चन्नी सरकार संभाल नहीं पा रही है। वहीं केजरीवाल ने कहा कि पंजाब में आम आदमी पार्टी के लिए मुख्यमंत्री के चेहरे का ऐलान अगले हफ़्ते तक कर दिया जाएगा।
आज सुबह केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय का ट्विटर अकाउंट हैक हो गया। इस दौरान हैकर्स ने बिटकॉइन का एक लिंक शेयर किया, जिसपर टेस्ला के सीइओ एलन मस्क की फोटो लगी थी। हैकर्स ने लिंक के साथ कैप्शन में लिखा- 'Something Amazing'। हालांकि अब मंत्रालय ने ट्वीट करके जानकारी दी है कि अकाउंट को फिर से ठीक कर दिया गया है। हैकर्स ने जो लिंक पोस्ट किया था, उसके रिप्लाई में ग्रेट जॉब भी लिखा था। अब ये अकाउंट फिर से रिस्टोर कर लिया गया है। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय के ट्विटर पर 1.4 मिलियन फॉलोअर्स हैं। बता दें कि पिछले साल दिसंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्विटर अकाउंट भी हैक किया गया था। उस दौरान भी हैकर्स ने बिटकॉइन को लेकर ट्वीट किए थे। हैकर्स ने पीएम मोदी के अकाउंट से ट्वीट कर बिटकॉइन को कानूनी मान्यता दिए जाने की बात कही गई थी। हालांकि हैक होने के बाद अकाउंट को कुछ ही मिनटों में रिस्टोर कर दिया गया था।
देशभर में मौसम सर्द होता जा रहा है। बारिश, बर्फबारी और शीतलहर से तापमान में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। उत्तर भारत में ठंडी हवाएं चल रही हैं। कई पहाड़ी प्रदेशों में बर्फबारी और मैदानी इलाकों में बारिश से मौसम में बदलाव नजर आ रहा है। जम्मू-कश्मीर से लेकर राजस्थान तक सर्दी का सितम बढ़ गया है। बिहार के कई हिस्सों में गरज के साथ बारिश हो रही है। मौसम विभाग ने बिहार, झारखंड और वेस्ट बंगाल के लिए 11 जनवरी से 13 जनवरी तक येलो अलर्ट जारी किया है। ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल में बादलों का प्रभाव देखने को मिल रहा है। मौसम विभाग के अनुसार वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के कारण पूर्वी भारत के कई हिस्सों में जोरदार बारिश होगी। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश, गुजरात के क्षेत्र ठंडी हवाओं की गिरफ्त में हैं, जिसकी वजह से तापमान में गिरावट आई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 जनवरी को मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक करेंगे। इस बैठक में वह देश के राज्यों में कोरोना और ओमिक्रोन के बढ़ते मामलों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मुख्यमंत्रियों के साथ समीक्षा बैठक करेंगे। इस बैठक में ओमिक्रोन से रोकथाम के लिए चर्चा की जाएगी। गौरतलब है कि इस समय देश में कोविड ओमिक्रोन के मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने भी कोविड के इस नए वेरिएंट को लेकर एक उच्च स्तरीय बैठक की थी। उस बैठक में ओमिक्रोन की रोकथाम और प्रबंधन के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया उपायों, दवाओं की उपलब्धता सहित स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की समीक्षा की गई थी। इस दौरान ऑक्सीजन सिलेंडर, वेंटिलेटर, पीएसए संयंत्र, आईसीयू, ऑक्सीजन बेड, मानव संसाधन, आईटी हस्तक्षेप और टीकाकरण की स्थिति की समीक्षा की गई थी। अधिकारियों ने उच्च टीकाकरण कवरेज और ओमिक्रोन वेरिएंट की उपस्थिति वाले देशों में मामलों में वृद्धि के अवलोकन के साथ नए वेरिएंट को लेकर विश्व स्तर पर उभरते हालात के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जानकारी दी थी।
दिल्ली में नई पाबंदियों के बावजूद कोरोना की रफ्तार बेकाबू है। इसकी वजह के डीडीएमए ने मंगलवार को नई गाइडलाइन जारी करते हुए कुछ और प्रतिबंधों को सख्त कर दिया है। डीडीएम की तरफ से मंगलवार की जारी नई गाइडलाइन में कहा गया है कि जरूरी सेवाओं जुड़े दफ्तरों को छोड़कर सभी प्राइवेट ऑफिस किए जाएंगे।सभी रेस्टुरेंट्स और बार बंद होंगे सिर्फ टेकवे की सुविधा ही रहेगी। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बीते सोमवार को कोविड संक्रमितों के 19,166 नए दर्ज किए गए। राजधानी में कोविड के कुल 65,806 एक्टिव मरीज हैं। इन अंडरट्रीटमेंट लोगों में से 44,028 लोग होम आइसोलेशन में अपना इलाज करवा रहे हैं जबकि 1912 अस्पताल में भर्ती हैं। दिल्ली की जेलों में बंद 66 कैदी कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं। वहीं 48 जेल स्टाफ भी कोविड पॉजिटिव मिले हैं। दिल्ली में सोमवार को कोरोना संक्रमण की दर बढ़कर करीब 25 फीसदी तक पहुंच गई है। राजधानी दिल्ली की तिहाड़ जेल, मंडोली जेल और रोहिणी जेल में कैदियों और स्टाफ को मिलाकर कुल 114 लोग कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं। उन्हें आइसोलेट किया जा रहा है।
हमारे देश में नए साल के आगाज के साथ ही कई त्यौहार आते है। बैसाखी, मकर सक्रांति, पोंगल इसके कई उदाहरण हैं। इसी बीच एक और त्योहार है जो अपने रंग, रुप और कला से भारतीय संस्कृति को कई सालों से समृद्ध करती हुई आ रही है। इस अनोखे फेस्टिवल को ‘लोसर’ कहा जाता है। वैसे तो लोसर तिब्बती न्यू ईयर के रुप में मनाया जाता है और इसका मतलब तिब्ब्ती भाषा में नया साल ही होता है, लेकिन यह त्यौहार भारत के भी कई हिस्सों में मनाया जाता है। भारत के वो इलाके जहां तिब्बती मूल के लोग रहते हैं, वहां इस त्यौहार को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस विशेष पर्व को मनाने का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक संस्कृति को संजोए रखने के साथ-साथ आपसी भाईचारे और रिश्तों को मजबूत बनाना और नववर्ष का स्वागत करना है। समृद्धि का पर्याय है लोसर लोसर वैसे तो मुख्य रुप से तिब्ब्ती न्यू ईयर का त्यौहार है, लेकिन इस त्यौहार को बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के अलावा देश के कई हिस्सो में रहने वाले भारतीय और तिब्बती लोग भी मनाते हैं।। हिमाचल के कुछ इलाकों में इस त्यौहार का हिन्दु रुपांतरण भी देखने को मिलता है। तीन दिनों के इस त्यौहार में लोग बौद्ध पंचाग के अनुसार अपना घर सजाते हैं। लोसर के पहले दिन सूर्योदय से पहले घर का सबसे बड़ा सदस्य घर की छत पर "दारछोत" यानी झंडा लगाते है। इसके बाद घर के चूल्हे में "शुर्कू" यानी पहाड़ी जड़ी बूटी से निर्मित हवन सामग्री डाला जाता है। इसके बाद सत्तू, घी, रत्न ज्योत के मिश्रण से त्रिकोणीय प्रतिमा बनाया जाता है जिसे ब्रयंगस कहा जाता है और इसे एक बड़े परात में रखा जाता है इसके अलावा आटे से बकरी भेड़ का स्कल्पचर बना कर ब्रयंगस के चारो और इसे रखा जाता है, जिसमें सेब, खुमानी, चिलगोज़ा सहित सभी फसल को रखा जाता है। ब्रयंगस के ऊपर घी का तिलक लगाया जाता है और ड्राई फ्रूट नट्स की माला बना कर प्रतिमा को पहनाया जाता है, इस माला को "दिरमा" कहा जाता है। इसके बाद घर में सबसे कम उम्र की औरत या बेटी इसकी पूजा कर सुख समृद्धि की कामना करती है । इस विधि के दौरान घर के सभी सदस्य का शामिल होना अनिवार्य होता है। लोसर के पहले दिन हॉर्स रेस आकर्षण का केंद्र रहता है। लोसर के दूसरे दिन किसी प्राचीन मैदान या खेत में सुबह से ही नाच गाने का दौर शुरू होता है इस दौरान सभी लोग स्थानीय वेशभूषा में शामिल होते है। लोसर के अंतिम दिन ब्रयंगस खंडित किया जाता है और इसे प्रसाद के रूप में सभी को वितरित किया जाता है। लोसर का इतिहास लोसर की उत्पत्ति बौद्ध-पूर्व काल में तिब्बत में हुई थी। इतिहास पर अगर गौर करें तो लोसर फैस्टिवल की जड़े हमें यहां के पुराने बॉर्न धर्म से जुड़ी हुई मिलती हैं, जिसमें ठंड के दिनों में धूप जलाने का रिवाज हुआ करता था। बताया जाता है कि नौवें तिब्बती राजा, पुड गुंग्याल के शासनकाल के दौरान इसी रिवाज़ को वार्षिक त्यौहार बनाने के लिए इसे एक फसल त्यौहार के साथ मिला दिया गया। बैशाखी, पोंगल आदि की तरह ही लोसर में भी फसल के लिए आभार व्यक्त किया जाता है। लोसार का बाद में तिब्बत में आई बौद्ध परंपरा की ओर झुकाव हो गया। ऐसा माना जाता है कि, पुड गुंग्याल के शासनकाल के दौरान बेल्मा नाम की एक बूढ़ी औरत हुआ करती थी, जो लोगों को चंद्रमा के आधार पर समय की गणना करना सिखाती थी। उस विश्वास के साथ, कुछ स्थानीय लोग लोसर को बाल ग्याल लो के रूप में संदर्भित करते हैं। लोसर को मनाने की तिथि हर साल बदलती है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में होती है लोसर की धूम भारत देश में लोसर का ये पर्व लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में मनाया जाता है। यह त्योहार इन जगहों पर रहने वाली तिब्बती और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के लिए नए साल की शुरूआत है। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर, लाहौल, स्पीति और कांगड़ा में इस त्योहार की धूम दिखती है। वहीं अरुणाचल प्रदेश में मोनपा जनजातियों द्वारा तवांग, मेम्बा और मेचुखा घाटी में इसे मनाया जाता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले योलमो, शेरपा, तमांग, गुरुंग और भूटिया समुदाय भी लोसार के उत्सव में भाग लेते हैं। हिमाचल में ऐसे मनाया जाता है लोसर मेला जिला किन्नौर के ऊपरी क्षेत्र रोपा घाटी में नव वर्ष का लोसर मेला हर वर्ष शकसंवत के पौष माह के पहले दिन से शुरू होता है, जो कई दिनों तक चलता है। ग्रामवासी इस मेले की तैयारी कई दिन पूर्व से ही करते हैं। खास कर भोटी (स्थानीय जनजाति) इस मेले को लेकर खासे उत्सुक रहते है। वे लोग इस दिन एक-दूसरे को मिलते हैं, किन्नौरी सूखे मेवे चिलगोजा, बादाम से बनी माला एक-दूसरे के गले मे पहनाकर नव वर्ष की बधाई लोसमा टाशी (नव वर्ष शुभ हो) कह कर देते हैं। खास बात यह भी है कि इस दिन जो भी घर का सदस्य बाहर रहता हो या घर से बाहर गया हो, उसका घर में आना जरूरी है नहीं तो इसका महत्व नहीं रहता है। नव वर्ष के अवसर पर सभी को नए वस्त्र पहनना अनिवार्य है वह भी किन्नौरी वेशभूषा न कि आधुनिक परिधान। पूह क्षेत्र में लोसर- बौद्ध अनुयायियों नव वर्ष का त्योहार है। दिसंबर के अंत में मनाए जाने वाले इस त्योहार को लामा लोग ही मानते हैं। इसमें गृह देवता के पास दीपक जलाया जाता है, आटे की कई प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं। लोग दोपहर के पहले घर से नहीं निकलते। लामा और जोमो अर्थात भिक्षुणी दोनों मेले में नाचते हैं। इस दिन प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है कि वह शुभ शकुन देखे। इसलिए लोग उसी व्यक्ति, जानवर व पक्षी को देखने का प्रयास करता है, जिसके साथ शुभ जुड़ा हो। अरुणाचल में दिसंबर से ही शुरू होती है लोसर की तैयारियां अरुणाचल प्रदेश में मोनपा लोग लोसर की तैयारियाँ दिसंबर से ही शुरू कर देते है। जैसे घर की साफ़ -सफाई करवाते है, नए कपड़े खरीदे जाते है, खाने पीने का सामान इकठ्ठा किया जाता है। यहाँ पहले दिन लोग अपने घरवालों के साथ ही इसे मानते है और घर में ही खाते पीते और विभिन्न तरह के खेल खेलते है। दूसरे दिन लोग एक-दूसरे के घर जाते है और नए साल की बधाई देते है और तीसरे दिन प्रार्थना के झंडे लगाए जाते है। ईटानगर के थप्टेन ग्यात्सेलिंग मठ में यह उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। सबसे पहले मठ के बाहर भगवान बुद्ध की प्रतिमा को एक पेड़ के नीचे स्थापित किया जाता है और उसके सामने दिया जलाया जाता है। उसके बाद प्रार्थना झंडों को बाँधा जाता है। इसके बाद नृत्य संगीत का कार्यक्रम होता है। इनका संगीत बहुत ही मधुर होता है और नृत्य की शैली अत्यंत मधुर और मंद सी होती है। नर्तक जो टोपी पहनते है वह याक के बालों से बनाई जाती है और ये मोनपा जनजाति की बहुत ही पारंपरिक टोपी होती है। उत्तराखंड में होली खेल कर मनाया जाता है लोसर उत्तराखंड राज्य के पर्वतीय इलाको में रहने वाले लोग लोसर मनाकर अपनी परम्पराओं को जीवित रखे हुए हैं। इस प्रांत के डुण्डा ब्लाक में भूटिया जनजाति के लोग तीन दिन तक इस त्योहार की मस्ती में डूबे रहते हैं। सभी बच्चे, बूढ़े और महिला एक दूसरे के साथ होली खेलते हैं, ये लोग गुलाल से होली नहीं खेलते बल्कि एक दूसरे पर रंग की तरह सूखा आटा लगाकर खुशी प्रकट करते हैं। भूटियो के साथ ही तिब्बती भी भगवान बुद्ध की पूजा अर्चना कर इस त्योहार में भाग लेते हैं। बौद्ध मंदिरों में बड़े बड़े रंगबिरंगे झंडे लगाए जाते हैं और त्योहार की मिठाई बाँटी जाती है। बौद्धनाथ स्तूप में होती है रौनक नेपाल में लोसर बहुत ही अलग तरीके से मनाया जाता है। जो लोग बौद्ध नहीं हैं वे भी अपने बौद्ध मित्रों से इस उत्सव में शामिल होने जाते हैं। मंदिरों और स्तूपों में पारंपरिक नृत्य और गायन चलता रहता है। काठमांडू के बौद्धनाथ स्तूप पूजा के लिये आने वाले परिवारों द्वारा जलाई गई मोमबत्तियों की रोशनी और झंडियाँ से सभी परिवेश को एक रंगीन स्वर्गिक दृश्य में बदल देती हैं। लाल वस्त्र धारण किये हुए हजारों बौद्ध भिक्षुओं की उपस्थिति इस स्तूप भी लोसर उत्सव में अद्भुत बना देती है। लो शोमा टाशी के साथ यह उत्सव पूरा होता है और सब अपने अपने घर लौटते हैं। लो शोमा टाशी का अर्थ है नव वर्ष मंगलमय रहे। इसी प्रकार नेपाल में टाशी या टासी दोनो प्रकार के रूप इस वाक्य में प्रयुक्त होते हैं। लद्दाख में ख़ास फेस्टिवल्स में से एक है लोसर लद्दाख का लोसर फेस्टिवल यहां मनाए जाने वाले खास फेस्टिवल्स में से एक है जिसे दिसंबर महीने में मनाया जाता है। फेस्टिवल में लद्दाखी बौद्धजन घरेलू धार्मिक स्थलों पर या गोम्पा यानी की मोनास्ट्री में अपने देवताओं को धार्मिक चढ़ावा चढ़ाकर खुश करते हैं। इसके अलावा इस महोत्सव में अलग-अलग तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम, पारंपरिक प्रदर्शनी और पुराने रीति-रिवाजों का भी प्रदर्शन किया जाता है। पुरानी परंपरा के अनुसार लदाख में लोग अपने परिवार के सदस्यों की छोक्तेन पर जाते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। इस फेस्टिवल में नृत्य और संगीत की खूबसूरत जुगलबंदी से आम लोग भी आकर्षित होते है। लद्दाख में लोसर के पहले तीन दिन बेहद ख़ास देश के विभिन्न प्रांतों में मनाये जाने वाले लोसर का ये पर्व दस से पंद्रह दिन तक चलता है। इस त्यौहार की शुरूआत घरो और मंदिरों में रोशनी के साथ होती है। चारों ओर रोशनी से देश का हर वो हिस्सा जगमगा उठता है जहां लोसर की धूम रहती है। पुरानी परंपराओं की मानें तो कई जगह इस दिन परिवार के लोग अपने घरों के मृत लोगों के छोक्तेन पर जाते हैं। यूँ तो इस त्यौहार के सभी पंद्रह दिन हर्षोउल्लास के साथ मनाये जाते है, लेकिन लोसर के पहले तीन दिन बेहद ही ख़ास माने जाते है। पहला दिन - इस त्योहार के पहले दिन को पिछले वर्ष की हर तरह की बुराइयों और बुरी आत्माओं को दूर करने के लिए घरों की अच्छी तरह से लोग साफ-सफाई करते हैं। इस दिन को ‘गुटुक’ नाम का एक अनोखा व्यंजन बनाया जाता है। वहीं विशेष आटे के गोले बनाए जाते हैं जिनमें विभिन्न सामग्रियों को भरा जाता है। आटे के गोले को खाते समय जिस व्यक्ति के खाने में जो सामग्री निकलती है वो उस आदमी के चरित्र के विशिष्ट लक्षणों के रुप में देखा जाता है। ऐसा सिर्फ हंसी मजाक के तौर पर लोग आपस में करते हैं। दूसरा दिन - दूसरे दिन लोग स्थानीय ‘मठों’ पर पहुंचते हैं और अपना ट्रिब्यूट देते हैं। मठो पर जाने से पहले बाजारों, सड़कों और गलियों से लोग एक जुलूस निकालते हैं जिसमें वे अपने माथे पर ‘मेथी’ नाम की एक चीज ढ़ोते हैं। इस दौरान लोग ज्वलंत मशालें लेकर नारे लगाते हुए मठों की ओर जाते हैं। कहा जाता है कि, यह जुलूस शहर से बुरी आत्माओं या शक्तियों की विदाई के लिए निकाली जाती है। इस दिन लोग मठो पर दुआ मांगते हैं और अपनी इच्छा अनुसार मठो के भिक्षुओं को उपहार भेंट करते हैं। तीसरा दिन - यह दिन लोसर महोत्सव के मुख्य समारोहों का अंतिम दिन होता है। इस दिन लोग एक री-यूनियन भोज का आयोजन करते है, वो आपस में मिलते हैं और एक खास तरह का केक जिसे काप्स कहते है, उसका सेवन चांग नामक एक मादक पेय का सेवन करते हैं। पारंपरिक नृत्य बनता है आकर्षण का केन्द्र यूँ तो लोसर के त्यौहार में कई प्रकार की पारम्परिक चीज़े लोगो को आकर्षित करती है, लेकिन इस त्योहार का सबसे मुख्य आकर्षण होता हैं पारंपरिक नृत्य, जो लोग इस त्यौहार के दौरान करते हैं। इसमें डांस करने वाले लोग कुछ खास किस्म के रंगीन और चमकीले कपड़े पहनते हैं और अपने चेहरे पर दानव या किसी पशु का मुखौटा पहनते है। यह डांस दुनियाभर के लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र बनता हैं। लोसर पर खान-पान भी विशिष्ट लोसर पर्व के पहले दिन गांव में घरों की छतों पर बौद्धमंत्रों के साथ बौद्ध झंडे लगाकर सुख-शांति, अमन और नए साल का स्वागत करते हुए लोसर मेले का आगाज किया जाता है। इस दौरान गांव के प्रत्येक घर में बाड़ी दु, ओगला और फाफरे के पारंपरिक व्यंजन बनाए और सब्जियों के साथ परोसे जाते है। इसके बाद ग्रामीण जुटे और तोषिम कार्यक्रम किया जाता है। इस दौरान किन्नौरी नाटी यानी कायंग का दौर चलता है व् तीन दिन इस पर्व की धूम रहती है।
दौर- ए- कोरोना में सियासत के सलीके तो बदले ही थे अब चुनाव प्रचार के तौर तरीके भी बदल गए है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। बढ़ते कोरोना के आंकड़ों के बीच ऐलान-ए-चुनाव तो हो गया पर बंदिशों के साथ। पदयात्रा और रोड शो पर पाबंदी है, साइकिल और बाइक रैली पर भी रोक है, रात आठ बजे के बाद चुनाव प्रचार भी संभव नहीं होगा, नुक्कड़ सभाओं और रैलियों पर भी रोक रहेगी, घर-घर प्रचार में भी 5 लोग ही शामिल होंगे। फिलहाल चुनाव आयोग का ये फरमान 15 जनवरी तक के लिए है और उसके बाद स्तिथि की समीक्षा कर बंदिशे बढ़ाई -घटाई जा सकती है। पर जिस तरह देशभर में कोरोना के मामले बढ़ रहे है, ऐसे में मुमकिन है कि ये चुनाव पूरी तरह डिजिटल प्लेटफार्म पर लड़े जाएं। चुनाव आयोग का कहना है कि राजनैतिक पार्टियां डिजिटल, वर्चुअल तरीके से चुनाव प्रचार करे। पर सवाल ये है कि क्या छोटी और क्षेत्रीय पार्टियों के लिए भी वर्चुअल माध्यम का पर्याप्त इस्तेमाल करना मुमकिन है? वर्चुअल या डिजिटल आयोजनों के लिए जिस आधारभूत ढांचे की जरूरत होती है या जिन संसाधनों की आवश्यकता होती है, क्या छोटे दल या निर्दलीय प्रत्याशी उसका वहन कर सकते है? ये वो सवाल है जो चुनाव की घोषणा के बाद से कई नेता उठा रहे है। बहरहाल, पांच राज्यों के ये विधानसभा चुनाव किस तरह लड़े जायेंगे, ये राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले हर व्यक्ति के लिए जिज्ञासा का विषय बन चुका है। ये नए युग के नए चुनाव है, कोरोना महामारी की मार चुनाव पर इस कदर पड़ी है कि सदियों से चला आ रहा चुनावों का तरीका ही बदल गया। पांच राज्यों में कोविड सेफ इलेक्शन होने जा रहे है। स्पष्ट है कि सोशल मीडिया और आईटी सेल की असल महत्वता सभी राजनीतिक दलों को समझ आने वाली है। स्पष्ट ये भी है कि जिस पार्टी की जड़ें सोशल मीडिया और आईटी के पायदान पर मज़बूत होगी उनके लिए ये चुनाव कम कठिन होंगे। देश की सियासत में जब आईटी या सोशल मीडिया का जिक्र होता है तो बिना एक क्षण गवाएं भारतीय जनता पार्टी का नाम जुबां पर आ जाता है। ये अन्य पार्टियों के लिए फ़िक्र का विषय जरूर है। देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा का सबसे बड़ा आईटी सेल है। वर्चुअल रैलियां और डिजिटल कैंपेन पार्टी के लिए कोई नई बात नहीं है। पार्टी कोरोना की पहली और दूसरी लहर में अपने कार्यकर्ताओं और जनता के बीच वर्चुअल और वेबिनार के माध्यम से अपनी बात नीचे तक पहुंचाती रही है। माना जाता है कि भाजपा के पास आईटी और सोशल मीडिया की पूरी प्रशिक्षित टीम है। पार्टी के पास प्रदेश से लेकर जिले तक वर्चुअल बैठक और मल्टीपल कॉन्फ्रेंस के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार है। ई-रैली के लिए खास तरह का सॉफ्टवेयर बनाया गया है, जिससे कुछ मिनटों में ही बड़े से लेकर छोटा कार्यकर्ता एक ही प्लेटफार्म पर जोड़ा जा सकता है। पार्टी के पास वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से एक हजार लोग और वेबिनार के माध्यम से करीब 50 हजार लोगों को जोड़ने का इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। सियासत के वर्चुअल दौर में निसंदेह भाजपा को इसका लाभ मिल सकता है। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए तो ये चुनाव कठिन होंगे ही पर कांग्रेस भी वर्चुअल राजनैतिक आयोजनों में भाजपा की बनिस्पत कमतर ही दिखती आ रही है। हालांकि कोशिश बदस्तूर जारी है। कांग्रेस अपना डिजिटल कैंपेन शुरू कर चुकी है। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी फेसबुक लाइव के माध्यम से भी लोगों से रूबरू हो रही है। बाकि दल भी डिजिटल रैलियों करने का खाका तैयार कर रहे है। परन्तु क्या इतने कम समय में ये भाजपा की सालों की मेहनत का मुकाबला कर पाएंगे। सच तो ये है कि अब तक कई बड़े नेताओं के ट्विटर और फेसबुक अकाउंट भी वेरिफाइड नहीं है। जाहिर है ऐसे में इनके लिए डगर मुश्किल होगी। इन चुनावों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे की फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम अहम भूमिका में रहेंगे। वर्तमान में पार्टी के आधिकारिक पेज पर कितने लोगों की मौजूदगी है, ये आंकड़े बता रहे है। पार्टी ट्विटर पर फोल्लोवर फेसबुक पेज पर लाइक ( लगभग ) (लगभग ) भारतीय जनता पार्टी 17.3 M 15 M आम आदमी पार्टी 5.8 M 4.3 M कांग्रेस 8.4 M 5.7M बहुजन समाज पार्टी 24.2K 90 K समाजवादी पार्टी 2.8M 2.8M तृणमूल कांग्रेस 544.3K 1.4M रोड शो, रैली, पदयात्रा पर 15 तक रोक चुनाव आयोग ने 15 जनवरी तक रोड शो, रैली, साइकिल रैली पद यात्रा तक रोक पूर्ण रूप से रोक लगा दी है।इसके अलावा रात आठ बजे से सुबह आठ बजे तक कोई प्रचार, जन संपर्क राजनीतिक पार्टियां नहीं कर सकेगी। विजय जुलूस भी नहीं निकाला जा सकेगा। 15 जनवरी के बाद पर इस पर विचार किया जाएगा। 690 विधानसभा में चुनाव 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव हो जा रहे है और इन पांच राज्यों में कुल 690 विधानसभा क्षेत्र है। इन पांच राज्यों में कुल 43 राज्य सभा सीटें है। ऐसे में राष्ट्रीय राजनैतिक परिदृश्य के लिहाज से भी ये चुनाव महत्वपूर्ण है। कुल 18.34 करोड़ मतदाता पांच राज्यों के चुनाव में कुल 18.34 करोड़ मतदाता हैं, इनमें सर्विस मतदाता भी शामिल हैं। इनमें से 8.55 करोड़ महिला मतदाता हैं। कुल 24.9 लाख मतदाता पहली बार वोट डालेंगे। इनमें से 11.4 लाख लड़कियां पहली बार वोटर बनीं हैं। चुनाव आयोग की तीन प्राथमिकता चुनाव आयोग ने 3 लक्ष्यों पर काम किया है। ये लक्ष्य हैं कोविड सेफ इलेक्शन, सरल इलेक्शन, और मतदाताओं की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी। सभी बूथ ग्राउंड फ्लोर पर होंगे, ताकि लोगों को सुविधा हो। बूथ पर सैनिटाइजर, मास्क उपलब्ध होगा। 90 फीसद से ज्यादा मतदान करवाना इस बार चुनाव आयोग का लक्ष्य है। एक घंटे बढ़ाया मतदान का समय पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में इस बार मतदान के लिए समय को एक घंटा बढ़ा दिया गया है। ऐसा कोरोना की वजह से किया गया है। संवेदनशील बूथों पर होगी वीडियोग्राफी संवेदनशील बूथों पर पूरे दिन वीडियोग्राफी होगी। पांचों राज्यों में एक लाख से ज्यादा बूथों पर लाइव वेबकास्ट होगा। ऑब्जर्वर भी ज्यादा संख्या में तैनात होंगे। ये डालेंगे बैलेट पेपर से वोट सभी बूथ पर पुरुष और महिला सुरक्षाकर्मी तैनात होंगे। दिव्यांगों के लिए हर बूथ पर विशेष इंतजाम होंगे और व्हील चेयर भी उपलब्ध होगी। कोविड संक्रमित या कोविड संदिग्ध के घर वीडियो टीम के साथ आयोग की टीम विशेष वैन से जाएगी और वोट डलवा कर आएगी। इन्हें बैलेट पेपर से वोट डालने का अधिकार मिलेगा। ज्यादा संख्या में मतदान केंद्र कोविड की स्थिति को देखते हुए मतदान केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाएगी। चुनाव आयुक्त के अनुसार इस बार 1250 मतदाताओं पर एक बूथ बनाया गया है। पिछले चुनाव की तुलना में 16 फीसदी बूथ बढ़ गए हैं। चुनाव आयोग ने लांच की दो नई ऐप कोरोना के बढ़ते मामले को देखते हुए चुनाव आयोग सुविधा ऐप्लिकेशन लॉन्च की है, इसके जरिए कोई भी उम्मीदवार ऑनलाइन नॉमिनेशन फाइल कर सकेगा। इस तरह की सुविधा भी आयोग द्वारा पहली बार दी जाएगी। इसी तरह चुनाव के दौरान किसी भी गलत गतिविधि के लिए CVIGIL ऐप्लिकेशन पर शिकायत दर्ज की जाएगी। जाने किस दिन कहाँ होगा मतदान उत्तर प्रदेश : 10 फरवरी से सात फेज में वोटिंग, 10 मार्च को मतगणना पहला फेज- 10 फरवरी को होगा दूसरा फेज-14 फरवरी तीसरा फेज- 20 फरवरी चौथा फेज- 23 फरवरी पांचवां फेज- 27 फरवरी छठा पेज- 3 मार्च सातवां फेज- 7 मार्च मणिपुर: 27 फरवरी और 3 मार्च को वोटिंग, 10 मार्च को मतगणना पंजाब : 14 फरवरी को वोटिंग, 10 मार्च को काउंटिंग गोवा: 14 फरवरी को वोटिंग, 10 मार्च को मतगणना उत्तराखंड : 14 फरवरी को वोटिंग, 10 मार्च को मतगणना
आंगनबाड़ी वर्करज़ एवम हैल्परज़ यूनियन सम्बन्धित सीटू अखिल भारतीय आह्वान के तहत 24 फरवरी 2022 को हिमाचल प्रदेश में पूर्ण हड़ताल करेगी। इस दौरान प्रदेश के लगभग अठारह हज़ार आंगनबाड़ी केंद्र बन्द रहेंगे व लगभग सेंतीस हज़ार आंगनबाड़ी योजनकर्मी प्रदेशव्यापी हड़ताल करेंगे। अपनी मांगों को लेकर प्रदेश के हज़ारों आंगनबाड़ी कर्मी शिमला में विधानसभा पर जबरदस्त प्रदर्शन करेंगे। यह निर्णय शिमला में सम्पन्न हुई यूनियन की राज्य कमेटी की बैठक में हुआ। यूनियन अध्यक्ष नीलम जसवाल व महासचिव वीना शर्मा ने कहा है कि आंगनबाड़ी कर्मी प्री प्राइमरी में सौ प्रतिशत नियुक्ति, इस नियुक्ति में 45 वर्ष की शर्त खत्म करने, सुपरवाइजर नियुक्ति के लिए भारतवर्ष के किसी भी मान्यता प्राप्त विश्विद्यालय की डिग्री को मान्य करने, वरिष्ठता के आधार पर मेट्रिक व ग्रेजुएशन पास की सुपरवाइजर में तुरन्त भर्ती करने, सरकारी कर्मचारी के दर्जे, हरियाणा की तर्ज़ पर वेतन देने, रिटायरमेंट की आयु 65 वर्ष करने की मांग तथा नन्द घर बनाने की आड़ में आईसीडीएस को वेदांता कम्पनी के हवाले करके निजीकरण की साज़िश तथा डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, पोषण ट्रैकर ऐप व तीस प्रतिशत बजट कटौती के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। उन्होंने केंद्र व प्रदेश सरकार को चेताया है कि अगर आईसीडीएस का निजीकरण किया गया व आंगनबाड़ी वर्करज़ को नियमित कर्मचारी घोषित न किया गया तो आंदोलन और तेज़ होगा। उन्होंने नई शिक्षा नीति को वापिस लेने की मांग की है क्योंकि यह आइसीडीएस विरोधी है। नई शिक्षा नीति में वास्तव में आइसीडीएस के निजीकरण का छिपा हुआ एजेंडा है। आईसीडीएस को वेदांता कम्पनी के हवाले करने के लिए नंद घर की आड़ में निजीकरण को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस से भविष्य में कर्मियों को रोज़गार से हाथ धोना पड़ेगा। उन्होंने केंद्र सरकार से वर्ष 2013 में हुए पेंतालिसवें भारतीय श्रम सम्मेलन की सिफारिश अनुसार आंगनबाड़ी कर्मियों को नियमित करने की मांग की है। उन्होंने मांग की है कि आंगनबाड़ी कर्मियों को हरियाणा की तर्ज़ पर वेतन और अन्य सुविधाएं दी जाएं। उन्होंने आंगनबाड़ी कर्मियों के लिए पेंशन, ग्रेच्युटी, मेडिकल व छुट्टियों की सुविधा लागू करने की मांग की है। उन्होंने आंगनबाड़ी कर्मियों को वर्ष 2013 का नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के तहत बकाया राशि का भुगतान तुरन्त करने की मांग की है। उन्होंने मांग की है कि प्री प्राइमरी कक्षाओं व नई शिक्षा नीति के तहत छोटे बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा आंगनबाड़ी वर्करज़ को दिया जाए क्योंकि वे काफी प्रशिक्षित कर्मी हैं। इसकी एवज़ में उनका वेतन बढाया जाए व उन्हें नियमित किया जाए।


















































